Author Topic: Article by Famous Scientiest Ram Prasad Ji - वैज्ञानिक राम प्रसाद जी के लेख  (Read 25583 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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न गैरसैंण राजधानी बनेगी और न ही कोचियार लाइब्रेरी स्थापित होगी.

 

सदस्य, म्यर उत्तराखंड, धुमाकोट/नैनीडांडा  तथा इंटरनेट पर उपलब्ध दूसरे उत्तराखंडी ग्रुप

 

 कुछ काम उत्तराखंड के बुद्धिजीवी कर रहे है. भरत रावत ने फेस बुक पर सूचना दी:

हम लोग महात्मा गाँधी इंटर कोलेज़ हल्द्वणी आए थे वहाँ "उत्तराखंड दशा, दुर्दशा एवं दायित्व" पर वैचारिक गोष्टी का आयोजन किया गया था... यहाँ पहुँचें सभी बुधीजीवियों को सुनने का हमें सुअवसर मिला..; गोष्टी बहुत ही सफल रही इसकी सफलता के लिए में सभी आयोजकों को बधाई देना चाहूँगा...!

 

आज इन्टरनेट है. इस कुछ काम जो कभी बुद्धिजीवी खुद करते थे.  अब इन्टरनेट कर रहा है.  हल्द्वानी में जो कुछ हुआ उस पर कतरनों की अल्बम भी उपलब्ध है.  कहा गया है कि ऐसा ही कुछ देहरादून में भी किया जाएगा.  देहरादून राजधानी है.  वहाँ वैसे ही हलचल रहती है.  गैरसैण भी उत्तराखंड की दूसरी राजधानी है जिसकी हलचल बुद्धिजीवियों के दिमाग में होती हैं. इसलिए हल्द्वानी में भी गैरसैंण उपस्थित था. गैरसैंण और कोचियार लाइब्रेरी में ज्यादा फर्क नहीं है. पहाड़ का विकास दोनों का ही सपना है.   तभी तो विश्वास किया जाता है न गैरसैंण राजधानी बनेगी और न ही कोचियार लाइब्रेरी स्थापित होगी.   

 

वास्तव में बात तो एक ही है और वह बात है पहाड़ के औद्योगिकीकरण की. कोचियार लाइब्रेरी के संग्रहालय में वह जानकारी है जो भीष्म कुकरेती  जी ने भेजी है.  कुकरेती जी का कहना है कि पहाड का औद्योगिकीकरण तो खम्बो पर खड़ा है.  एक तो है टूरिज्म और दूसरा है होर्टिकल्चर. जो बात कोचियार लाइब्रेरी कह रही है वह तो किसी नायाब जलेबी की घिराली है  पर उत्तराखंड तो एक है.  उस के हिस्से नहीं किए जा सकते.  तभी तो विजय बहुगुणा के दृष्टिकोण का अंदाजा हमें जागरण की उस खबर से मिल जाता है जिसका शीर्षक है  केंद्र बनाएगा उत्तराखंड के औद्योगिक विकास को कार्ययोजना May 01, 01:03 am  देहरादून, जागरण ब्यूरो.  खबर यह है

केंद्रीय उद्योग मंत्रालय उत्तराखंड में औद्योगिक विकास, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल व फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में निवेश के लिए कार्ययोजना बनाएगा।

नई दिल्ली में सोमवार को उद्योग भवन में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की केंद्रीय वाणिज्य व उद्योग मंत्री आनंद शर्मा से मुलाकात के दौरान श्री शर्मा ने केंद्र सरकार के अधिकारियों को इस संबंध में निर्देशित किया। मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री श्री बहुगुणा ने केंद्र को राज्य सरकार की तरफ से कई प्रस्ताव दिए। मुलाकात के दौरान जानकारी दी गई कि उत्तराखंड में निवेश की संभावनाओं का पता लगाने के लिए आगामी जून के पहले हफ्ते में देश के उद्योगपतियों का एक प्रतिनिधिमंडल उत्तराखंड आएगा।

मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार निवेश को आकर्षित करने के लिए आद्यौगिक क्षेत्रों में सड़क, बिजली, बैंकिंग समेत आधारभूत सुविधाओं को विकसित करने को प्राथमिकता दे रही है। औद्योगिक उपक्रमों में कार्यरत कर्मचारियों के लिए कम लागत की आवासीय इकाइयां निर्मित की जाएंगी। केंद्रीय मंत्री श्री शर्मा ने कहा कि उत्तराखंड में निवेश के लिए वह स्वयं उद्योगपतियों के प्रतिनिधिमंडल के साथ आएंगे। मुख्यमंत्री ने ऊधमसिंह नगर जिले के अंतर्गत हेमपुर में नेपा लिमिटेड की 803 एकड़ भूमि को राज्य सरकार को वापस करने का भी केंद्रीय उद्योग मंत्री से अनुरोध किया।

 

सहारा समय का ध्यान तो उस खींचतान पर है जो उत्तराखंड कांग्रेस के अंदर चल रही है और जिस के कारण भाजपा को लगने लगा है कि सत्ता भाजपा के पास वापस आ सकती है. फिर भी सहारा समय ने खबर दी         

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्य के लिये जीवन रेखा मानी जाने वाली चारधाम यात्रा की मंगलवार को ऋषिकेश से शुरूआत की. ....

 

कुछ बुद्धिजीवी भी भूल रहे है और बहुगुणा जी भी. वह है वह वास्तिविकता जो कि इन्टरनेट के कारण आयी है.  बात को दोहराने से अच्छा यह होगा कि पिछली मेल  के  अंतिम भाग को एक बार फिर देख लिया जाए जिस में कहा गया था

अगर प्रोजेक्ट न बना होता हो कोचियार लाइब्रेरी पैदा ही न होती.  अगर देश ने प्लानिंग प्रक्रिया शुरू न की होती तो वह नहीं होता जो पहले प्लान के दौरान किया गया था.  अगर दूसरा प्लान विफल नहीं होता तो वह काम नहीं होता जो काम उन्होंने अपने कार्यकाल के अंतिम सालों में किया.  इस दौरान उन्होंने साइंस पालिसी पार्लियामेंट से पास कराई. प्रयोगों के द्वारा देखा कि कुछ काम ऐसे हैं जो शासन कर ही नहीं सकता.  गैरसरकारी संस्थाओं का सरकारीकरण हो जाता है और इस से भ्रष्टाचार पैदा हो जाता है. जो कुछ नेहरु जी ने किया उस का जिक्र प्रोफेसर एंडरसन की पुस्तक न्यूक्लिअस एंड नेशन में किया गया है. हाल ही में प्रकाशित यह पुस्तक भारत के विज्ञान ऊपर एक प्रकार की एन्साइक्लोपीडिया है.

 

अगर नवीन नेगी उक्त पुस्तक को पढेंगे तो उन्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा.  उस पुस्तक में लिखा है कि नेहरु जी ने अपनी जिम्मेदारी असोसिएशन ऑफ साइंटिफिक वर्कर्स को सौंप दी. इस असोसिएशन ने एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन किया जिस का विषय था साइंस एंड नेशन ड्यूरिंग थर्ड फाइव प्लान.  इस सम्मलेन की सिफारिश पर वह काम किया गया जिस से कोचियार लाइब्रेरी विकसित हुई. तभी तो इन मेलों का केन्द्र बिंदु लेंस नर्सरी है.

 

राम प्रसाद

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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am prasad <kochiyarlibrary@gmail.com>
   
11:01 AM (3 hours ago)
      
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Date: Sunday, 30 December, 2012, 5:22 AM

काम लगातार हो तो प्रभावशाली बन  ही जाता है

addressed to

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Uttara Live - Online Portal Dedicated to Uttarakhand ने कल की मेल Date: Saturday, 29 December, 2012, 6:56 AM  टुकड़ों को जोड़ कर ही तो विश्व बनता है पर सवाल पूछा

"Hey can we talk to you. Still not able to find out the objectives behind these updates. Need to know from you."

टुकड़ों को कभी भी जोड़ कर कुछ किया जा सकता है.  कोशिश की जा सकती है कि कोचियार मेलों का उद्देश्य भी टुकड़े जोड कर समझा जाए. इसलिए प्रश्न का सीधा उत्तर देने के बजाय उसे इस मेल के शीर्षक द्वारा दिया जा रहा है. कुछ नया उत्तर देने के बजाय एक पुरानी मेल:  Thu Jun 18, 2009 2:29 am  Khanduriji, Narendra Modi, BJP and industrialization of the hilly part of Uttarakhand

के इस अंश को यहाँ उद्धृत किया जा सकता है:   

Dhumakot Sangliya International Group mails are being sent to you from time to time to indicate how internet facilities could be utilized for industrializing the hilly part of Uttarakhand.  This cannot be done without extensive research and development to focus on local and global resources for this purpose.  The heart of the Dhumakot Sangliya International Group is the lens nursery which is to be established in Sangliya.  This is the pioneering technological nursery to establish know how as well as show how for industrializing the hilly part of Uttarakhand.   The responsibility of industrializing the hilly part of Uttarakhand is that of the Khanduri Government.  This government is a part what we call eBusiness.  This eBusiness is the real thing that is happening in the World today.  The focus of eBusiness is the movement of industries to the non-industrialized part of the world and the process is known as outsourcing.  Most of the netizens, that is the persons that are using internet, are enabled by eBusiness.  Dhumakot Sangliya International Group is no exception.  Most of the netizens in this group are NRIs and PIOs.  Some of them are NRIs from Uttarakhand but most of them are not persons of Uttarakhand origin.  They are taking interest because rural development is so important.

 

उसर धरती पर लगातार बारिश होनी चाहिए.  तभी तो कही कोई वनस्पति उगेगी.  ऐसा ही कुछ उत्तराखंड की धरती पर नैनीडांडा ब्लाक में हो रहा है. मेल Date: Friday, 28 December, 2012, 4:47 AMस्थाई विकास तो दूरगामी लक्ष्य ही प्राप्त कर सकते है में नैनीडांडा विकास संघ के सतेन्द्र रावत की पोस्टिंग पर चर्चा हुई थी उसके बाद उन्होंने फेस बुक पर चैट की.  वह चैट इस प्रकार हुई   

Satendra Rawat:  sir Dharm Singh Butola ji ka Gaon pata hai aapko?

Ram Prasad   chamoli jile ke hain

Satendra Rawat: oh maine unko NVS mai add kr diya

Ram Prasad:    shayad tehree se bhee jude hain

Satendra Rawat : actuaally unki rqst aayee thi NVS mai

Ram Prasad        kar leejiye wah contribute to kar hee rahe hain

Satendra Rawat:     han isiliye mujhe laga sayad we hamare Nainidanda se hi hai

Ram Prasad:    kochiyar melon men to bahar ke log interest lete rahe hain

Satendra Rawat: Sir Kochiyar mails to aaj global ho chuki hai

Ram Prasad      kaam ki shruaat hee global se huee thee alam singh guasain ne is ke bare men na jane kahaan se samagree ikattha kee

Satendra Rawat      bilkul lekin main aap se bada prbhawit hoon

Ram Prasad:    kyon?

Satendra Rawat    ki aap is lagan se is kshetra main kam kar rahe ho

Ram Prasad      kaam to ratanpur vikas samiti ne kiya tha mujhe to sarkar ne saunpa tha

Satendra Rawat hamain bhi yah jankari aapke madhyam se hi pata laga

Ram Prasad   tab kshetr men kafi kam ho raha tha mujhe to face book ki madad mili

Satendra Rawat   ji bilkul, lekin aap jis lagan se kaam kr rahe hai wah hamare liye prernashrot hai

Ram Prasad    yah to mujhe karna hee tha sarkaari kaam tha

Satendra Rawat   lekin abhi bhi to aap bahut kuchh kr rahe ho sir

Ram Prasad:    kshetr men keshav dhyani aur kedar singh rawat ne bahut kaam kiya tha unke baad ab narendr gauniyaal bhee kuchh kar rahe hain

Ram Prasad:     kshetr men keshav dhyani aur kedar singh rawat ne bahut kaam kiya tha unke baad ab narendr gauniyaal bhee kuchh kar rahe hain

 

बुद्धिजीवियों और राजनेताओं का विकास में योगदान होता है.  उनमें निष्क्रियता के स्थान पर सक्रियता लाना ज़रूरी है. इस के लिए  मानसिकता परिवर्तन चाहिए. यहाँ पर मेल  Tue Jun 7, 2011 3:35am      Are Dhumakot Sangliya Mails much stretched and far fetched के अंतिम अंश पर नज़र डाली जा सकती है जो इस प्रकार था

We may conclude this discussion by quoting the ending part of the Mails: What can separate truth from fiction and signal from noise? Tuesday, 12 April, 2011, 7:56 AM:

The title of this mail  is based on an Obama quotation  discussed now and then in these Mails. Internet is full of mysteries and the reality has to be found by entering the field of mystery as though we are playing a game on the mysterious front of Internet.  This has been cleared in the Mail: Does the Victorian control of Indian mindset and colonial morality still affect this generation in the former colonial world? Friday, 10 September, 2010 2:15PM as follows:

The Kochiyar Library is still in the planning stage. This library has to institutionalize itself on my experience I have been experimenting on what I describe as live technological nurseries. These are young people who have come to Delhi from rural India in search of jobs.  Gumod Parikrama is written by me in Hindi.  It is being written for the last ten years to discuss the problems of rural youth and the possibilities that are available to them and or that can be made available to them.  The scope has been extended to cover other parts of the country.  The daily Gumod Parikrama pieces are woven together by the Editor Dev Singh Rawat in Pyara Uttarakhand weekly in its column Phatte ki Sarkar.  The Chain of Dhumakot Sangliya Mails has made reference to Phatte ki Sarkar.  The mails have discussed the Rajasthan Nainidandian Radheyshyam only the recent mails are discussing the Bihar Nainidandian Birendar as a recent addition to the list of live technological nurseries. What I am really doing is testing these specified samples of rural youth with the Maslow model of management.  Each of them is being request to consider the possibility of self actualization. But this model perhaps does not answer the question   "The poor cannot afford morality and the rich don't need it".  This involves the questions of * and psychology beyond conventional and well known biology.  This is why it is important to understand more recent work Renovating the Pyramid of Needs: Contemporary Extensions Built Upon Ancient Foundations. 

 

ज्ञान का यह बादल जो कोचियार लाइब्रेरी ने तैयार किया है और लगातार तैयार करती जा रहा है वह अब देख रहा है कि नैनीडांडा विकास संघ के क्षेत्र में सतेन्द्र जी एक पौधे के रूप में उभरे है.  उन से चैट हुई.

इस चैट को ध्यान में लेकर उस प्रतिक्रया पर चर्चा हो सकती है जो डाक्टर बलबीर सिंह रावत ने कल की मेल Date: Saturday, 29December, 2012, 6:56 AM  टुकड़ों को जोड़ कर ही तो विश्व बनता हैपर की.

प्रतिक्रिया है:

विश्व पाहिले बना, टुकड़े बाद में हुए .

अब इन टुकड़ों को फिरसे जोड़ने की बात और कार्य हो रहे हैं। नैनीडानडियन सुन कर मुझे क्षेत्रवाद की गन्ध इसलिए आ रही है,  की जो लोग इस शब्द को लेकर (राम प्रसाद जी, बुटोला जे और बलबीर सिंह रावत के अलावा)बात कर रहे हैं ,वे पूरे उत्तराखंड  शब्द तक का प्रयोग नहीं कर रहे। प्रदेश के सम्बन्ध के विकास की बात तो दूर है।  अगर वे charity begins at homeसे प्रेरित हैं तो यह भी जताते रहें की home उत्तराखंड में ही है। न की home में उत्तराखंड, या भारत या ग्लोब। क्या मैं दुनिया को शीर्शाशन करते हुए देख रहा हूँ?

सोच से समझ आती है और समझ से आचरण . अगर सोच टुकड़े पर ही अटक गयी तो अगले कदम जो समझ और आचरण के हैं वे अकेले आगे सही दिशा में नहीं बढ़ सकते वे तो सोच के पीछे पीछे चलेंगे । नहीं मानते? तो उदहारण देता हूँ . कभी काँग्रेस पार्टी पूरे भारत की थी . जिस गांधी ने उसे संचालित किया उसका गांधी वाद तो वैश्विक हो गया  (और भारत से लुप्त), लेकिन उसकी कांगेस के लोग अपने को कांगेसी,बाकियों को जनसंघी , भाजपाई, बामपंथी , मुस्लिमो,सिक्खों,जेनियों इत्यादियों को अल्पसंख्यक, कुछ को दलित,कुछ को पिछड़े वगैरह वगेरह मानते हैं और पूर देशवासियों को भी मजबूर करते हैं की वे भी उनकी ही तरह मानें .

इसलिए पाहिले हर टुकड़े को अपने खुद को ,एक पूरे का हिस्सा मानने की बुद्धि आनी जरूरी है। तभी तो वे जुड़ने के इच्छुक होंगे?  अब यह न कहियेगा की मैं यहाँ पर राजनीति क्यों ला रहा हूँ। यह इसलिए की सोच, समझ और आचरण के role model , अनुकरणीय आदर्श ,वे ही होते हैं जिनके पास सारे "टुकड़ों" को आपस में जूड़ने या बिखरने का मार्ग दर्शन करने की शक्ति होती है। यथो राजा तथो प्रजा। यानी जिधर नेता (राजनीति का क, समाज का, (भारत में मनोरंजन का नेता  पाहिले) चलेगा जनता उधर ही जायेगी . इसलिए शीर्ष पर रहना एक सचेत जिम्मेदारी का उत्तरदायित्व है।

इसलिए प्यारे नैनीडाँडियनो कुछ प्रदेश देश की भी चर्चा करते रहो , लेंस नर्सरी को चहुँ और फैलावो , पर पाहिले यह बताओ की उसे कोई केसे अपने बूते पर चहुँ और फैला सकता है? अगर आकर्षक है तो हम भी लगा लेगे एक लेंस पौधशाला। ताकि उससे "पौध" लेकर चारो और " छोटे,बड़े, सूक्ष्म  "बाग़ बगीचे"  लगें, फल फूल खिलें, विकास के।                   

आज की व्यावहारिक सम्भावनाओं को न भूल जाऊं, इसलिए कह रहा हूँ। कल के केक के लिए प्रयास रत तो रहूँ, लेकिन आज की रोटी रोजी का भी तो प्रबंध करता रहूँ?   

 

जो सवाल डाक्टर बलबीर सिंह रावत ने पहले  उठाया है वह है ब्रह्मांड की रचना का. सही स्थिति समझने के लिए Stephen William Hawking को कोचियार लाइब्रेरी मे  बुलाया जा रहा है.  परिचय में कहा गया है

Stephen William Hawking CH, CBE, FRS, FRSA (born 8 January 1942) is a British theoretical physicist, cosmologist, and author. Among his significant scientific works have been a collaboration with Roger Penrose on gravitational singularities theorems in the framework of general relativity, and the theoretical prediction that black holes emit radiation, often called Hawking radiation. Hawking was the first to set forth a cosmology explained by a union of the general theory of relativity and quantum mechanics. He is a vocal supporter of the many-worlds interpretation of quantum mechanics.

He is an Honorary Fellow of the Royal Society of Arts, a lifetime member of the Pontifical Academy of Sciences, and a recipient of the Presidential Medal of Freedom, the highest civilian award in the United States. Hawking was the Lucasian Professor of Mathematics at the University of Cambridge between 1979 and 2009.

Hawking has achieved success with works of popular science in which he discusses his own theories and cosmology in general; his A Brief History of Time stayed on the British Sunday Times best-sellers list for a record-breaking 237 weeks.

 

इस परिचय के साथ यहाँ Howking  के प्रसिद्ध लेक्चर का `Origin of the Universe' अंतिम अंश उद्धृत किया जा रहा है:

The no boundary proposal, has profound implications for the role of God in the affairs of the universe. It is now generally accepted, that the universe evolves according to well defined laws. These laws may have been ordained by God, but it seems that He does not intervene in the universe, to break the laws. However, until recently, it was thought that these laws did not apply to the beginning of the universe. It would be up to God to wind up the clockwork, and set the universe going, in any way He wanted. Thus, the present state of the universe, would be the result of God's choice of the initial conditions. The situation would be very different, however, if something like the no boundary proposal were correct. In that case, the laws of physics would hold, even at the beginning of the universe. So God would not have the freedom to choose the initial conditions. Of course, God would still be free to choose the laws that the universe obeyed. However, this may not be much of a choice. There may only be a small number of laws, which are self consistent, and which lead to complicated beings, like ourselves, who can ask the question: What is the nature of God? Even if there is only one, unique set of possible laws, it is only a set of equations. What is it that breathes fire into the equations, and makes a universe for them to govern. Is the ultimate unified theory so compelling, that it brings about its own existence. Although Science may solve the problem of ~how the universe began, it can not answer the question: why does the universe bother to exist? Maybe only God can answer that.

 

समाज में ज्ञान धीरे धीरे क्रमबद्ध ढंग से विकसित हुआ. पहले प्राकृतिक शक्तियों को देवता के रूप में समझा गया. फिर इन देवताओं के देवता की व्याख्या हुई. ब्रह्म याने गौड की  धारणा विकसित हुई कई धर्म पैदा हुए . इन में ईसाई धर्म का महत्व है.  क्योंकि यह धर्म उस क्षेत्र का धर्म है जहां   विज्ञान ने धर्म से अलग होकर अपनी जगह बनाई. आज हम विज्ञान के माध्यम से उत्तराखंड के औद्योगिक विकास की बात कर रहे हैं.  साफ़ ज़ाहिर है कि विज्ञान और धर्म में टकराव नहीं है.  उत्तराखंड अपना धार्मिक और पारंपरिक  व्यक्तित्व बनाये रख कर विकास पथ पर अग्रसर हो सकता है. डाक्टर रावत की पोस्टिंग के शेष भाग पर चर्चा जारी रह सकती है.  मानसिकता में बदलाव लाना है तो धर्म और विज्ञान का समझौता ज़रूरी है. 

 

राम प्रसाद   

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Date: Saturday, 29 December, 2012, 6:56 AM[/color]
टुकड़ों को जोड़ कर ही तो विश्व बनता है[/font][/size]addressed to[/font][/font][/color]सदस्य, म्यर उत्तराखंड, धुमाकोट/नैनीडांडा तथा इंटरनेट पर उपलब्धदूसरे उत्तराखंडी ग्रुप[/font] [/font]इस समय कोचियार लाइब्रेरी में नैनीडांडा विकास संघ के धुमाकोट कार्यक्रम की चर्चा हो रही है. चर्चा हो चुकी है पर एक टुकड़ा छूट गया था.  वह था एक छोटा सा कमेंट जो[/font]Satpal Rawat  ने NAINIDANDA VIKAS SANGH  ग्रुप में मेल[/color]Date: Thursday, 27 December, 2012, 5:25 AM असली पारखी तो वास्तविकता ही होती है. पर सतेन्द्र रावत ने दी थी.  यह टुकड़ा था:[/font][/color]bahut badiya sujhaw .......[/font] [/font]इस छूटे हुए टुकड़े को एक दूसरे टुकड़े के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा सकता है.  वह दूसरा टुकड़ा है गढ़वाल यूनीवर्सिट की प्रतिक्रया. कल की मेल  [/color]Date: Friday, 28 December, 2012, 4:47 AM स्थाई विकास तो दूरगामी लक्ष्य ही प्राप्त कर सकते है को  H.N.B.G.U  ने पसंद किया और कमेन्ट दिया [/font][/color] Nice sir..[/font]कमेन्ट एक ही हैं .  टुकड़ों में है इस लिए फेंक दिए जाते हैं.  इसी मेल के सन्दर्भ में धर्म सिंह बुटोला ने  Bedupako.Com ग्रुप  पर  पोस्टिंग की [/font][/color]कथासार:[/font][/color]नरेंदर सिंह नेगी जी ने नौछमी नारायण की जागर लगाकर,नारायण दत्त तिवारी को देवतुल्यता प्रदान करी, जिससे उन्हें इस बात का एह्साह हुआ की "पाँव जमीं पर नहीं टिकते Myor Uttarakhand.मेरे" शायद इस कारण वह धुमाकोट नहीं विराज सके | तथा कालांतर में वे भी मतिभ्रम के पथ पर अग्रसर हुए |[/font][/color]इसी तरह कालचक्र के इस फेर में शैलन्द्र कृष्ण भी डीएम् से सेक्रेटरी के पद पर विराजमान हो गया | और इस तरह लेंस नर्सरी प्रादुर्भाव होने लगा[/font][/color]But how to implement the Lens Nurseries in Uttarakhand State Planning?[/font][/color][/color]प्रश्न भी वहीँ,[/font][/color]"लेंस नर्सरी" भी वहीँ की वहीँ[/font][/color]But still we are hopful[/font][/color] [/color]Oh! Almighty God, thanks for the "Mover and Shaker" [/font][/color] [/color] [/font][/color]यह प्रतिक्रिया भी तो टुकड़ा ही है.  वह जानते है.  इसलिए उन्होंने इसके साथ एक और टुकडा जोड़ दिया.  मेल पर ही   धर्म सिंह बुटोला ने  UANA - Uttarakhand Association of North America (Estd.1992), UTTRAKHAND KE YUVA, कौथिग ( kauthig ). Young Uttarakhand - यंग उत्तराखंड, Myor Uttarakhand. इत्यादि  ग्रुपों  पर दूसरी प्रतिक्रिया व्यक्त की[/font][/color]उत्तराखंड में सड़कों का जाल बिछ चुका है अब उस जाल का उपयोग उद्योग लगाने में कैसे किया जा सकता है.[/font][/color]वहाँ लेन्स नर्सरी स्थापित हो सकती है. यह बीज होगा जिस से फलोद्यान विकसित होगा.[/font][/color]सफल कृषि विज्ञान केन्द्रों की योजना को कोशिशों के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में नहीं लाया जा सका. इस में तो औद्योगिक राष्ट्रों और कार्पोरेट दुनिया का भारी दबाव है.[/font][/color]लेन्स नर्सरी इसी दबाव को झेलते हुए आगे बढ़ रही है |.[/font][/color]स्थाई विकास तो दूरगामी लक्ष्य ही प्राप्त कर सकते है[/font] [/font]डाक्टर बलबीर सिंह रावत का अपना अंदाज है वा टुकड़ों को बटोरते है और इस ढेर को सामने रख कर कमेंट करते है. इसी मेल के सन्दर्भ में डाक्टर बलबीर सिंह रावत ने पोस्टिंग की है[/font][/color]Again a long journey. KVKs,Lens nursery, "Shakers and Movers", yet no UVKs (Uddyog Vikaas Kendra), and all that is related to Nainidanada and Nainidaandians? Doesnt it smell of regionalism? A symbol always carries the image of the whole. The whole, called Uttarakhand is not even smelled in these discourses, what to say of being felt and seen. This is where I suggest improvements in present education system by starting vocational education schools everywhere, starting with one in each district. The existing KVKs of GBPAU can be upgraded into MULTI-VOCATIONAL GYAN KENDRAS. Has any body the will to find a way?   [/font][/color][/color]To day I interacted with a group of trainees of the UANA sponsored  Resource 4girls camp at Dehradun. The participants were teachers from various parts of Tehri and Pauri Districts. They expressed their disappointments about lack of facilities in labs, low quality materials,and parental indifference. heavy load of curriculum with respect to time available for teaching, impossibility of one on one teaching due to non existence of a fixed and workable teacher:student ratio, interference by extra non educational duties, ignorance/inability of parents in the interior [/font][/color]It seems, the meaning of education has been reduced to a building with some furniture, few teachers with no residential and other facilities, , books when deliveries come, and FULL STOP. Where is the long term target for lasting development of Education? No doubt he teacher feel they are only turning out literates and not really educated pupils.[/font][/color][/color] [/font][/color] [/color] दूरगामी लक्ष्य, स्थाई विकास . उपरोक्त सन्दर्भ एक प्रश्न उठाता है कि अगर नींव (शिक्षा, अच्छी शिक्षा ) का लक्ष्य अधूरे संसाधनों से प्राप्त करने की ठानी है तो फलस्वरूप जो स्थाई विकास होगा वोह भी तो लूला लंगडा ही होगा ना। तो क्या करें? krishi aur grameen yddyog ke liye kya theek hai? P  P   P मोड ? NGO ? TRUST ? INDUSTRIALIST ? किसे लांय कैसे लांय ?[/font][/color]So, stuck in a vicious circle , no way to get out? There is one way. It is attack simultaneously [/font][/color][/color]at all contributing factors that are making the vicious circle. Who can launch this all-front attack? None other than the Government. So the establishment has to change its mindset. Only then the target and the means to reach the target will be result oriented.     [/font][/color] [/font][/color] [/font]न जाने कैसे कोचियार लाइब्रेरी की मेलों में डाक्टर रावत क्षेत्रवाद  की झलक दिखाई दे रही है. इस झलक पर चर्चा होनी चाहिए और इस लिए मेल[/color] Date: Sunday, 23 December, 2012, 12:11 PM [/font][/color]नैनीडाँडियन शुद्ध या प्रतीकात्मक ?  का यह अंश उद्धृत किया  जा रहा है.[/font][/color]नैनीडाँडियनों को ग्लोबल इंडियन के रूप में धीरे स्वीकारा जाने लगा है.    डाक्टर बलबीर सिंह रावत इस दिशा चर्चा को आगे बढ़ाया उन्होने कहा:[/font][/color]बौद्धिक नैनीडाँडियन . नैनीडांडियन शब्द का शुद्ध अर्थ लिया जाय, भावार्थ लिया जाय , या फिर प्रतीतात्मक अर्थ लिया जाय?[/font][/color]शुद्ध अर्थ हुआ, नैनीडांडा क्षेत्र के ही लोग,[/font][/color]भावार्थ हुआ नैनीडांडा की तरह के सारे लोग  (गुणों से).[/font][/color]प्रतीतात्मक अर्थ हुआ वे सारे लोग जो अपने बूते पर नैनीडांडीयनों की तरह विकास के रास्ते पर चल रहे हैं। यानी पूरे भारत के लोग? पूरे विकासशील और अविकसित देशों के लोग?[/font][/color]यहाँ पर सारे उत्तराखंडियों को एह समझाने की आवश्यकता है कि उपरोक्त सारे लोग क्यों सब अपने को नैनीडांडियन समझें?[/font][/color]वैसे भी हम अपना परिचय पौडी गढ़वाल से, टीहरी गढ़वाल से, नैनी ताल से, अल्मोड़ा से, पिथोरागढ़ से ,चमोली से देते हैं। अभी अपने को उत्तराखंडी नहीं कहते (समझते). ऐसी समझ के चलते नैनीडांडियन का क्या अर्थ लिया जाय , कृपया यह व्याख्या कर दीजिये .                  [/font][/color]बौद्धिक नैनीडाँडियन टर्म याने  मुहाविरे की रचना तो अभी अभी हुई है पर नैनीडाँडियन टर्म या मुहाविरा तो काफी लंबे समय से प्रयोग में लाया जाता रहा है. डाक्टर रावत कहते है कि  आज भी बहुत से लोग क्षेत्रीय भावना पर अधिक और उत्तराखंड की भावना कम ज़ोर देते है.  सोच तो हर जीव की अपने तक ही होती है.  उसे अपने आप को देखना है मनुष्य प्राकृतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं का शोषण स्वभाविक तौर पर करता रहता  है.  सामाजिक ज़िम्मेदारी की भावना कुछ ही लोगों में आती है या लाई जाती. [/font][/color] [/font][/color] डाक्टर रावत के उक्त कथन से लगता था कि कोचियार लाइब्रेरी और उनका दर्शन एक ही है  पर उनकी पोस्टिंग का नीचे दिया गया अंश कुछ और ही बता रहा है[/font][/color]Again a long journey. KVKs,Lens nursery, "Shakers and Movers", yet no UVKs (Uddyog Vikaas Kendra), and all that is related to Nainidanada and Nainidaandians? Doesnt it smell of regionalism? A symbol always carries the image of the whole. The whole, called Uttarakhand is not even smelled in these discourses, what to say of being felt and seen[/font][/color][/color] [/font][/color] काम तो औद्योगिक राष्ट्रों का कार्पोरेट जगत उस  प्रोत्साहन द्वारा कर रहा है जो वह वैज्ञानिक तथा औद्योगिक  अनुसंधान और विकास  को दे रहा है.  काम टुकड़ों में किया जाता है.  बड़े पैमाने पर किया जाता है. टुकड़े दुनिया भर में फैले होते है.  बटोरने काम कार्पोरेट दुनिया खुद करती है.  उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों तथा अनुसंधान शालाओं में भी कुछ काम हुआ होगा इतना कुछ कहने के बाद उस काम पर चर्चा की जा सकती है जो इंटरनेट पर उपलब्ध फेस बुक जैसी सेवाएं कर रही है. इंटरनेट बता रहा है कि फेस बुक टाइम लाइन क्या चीज है[/font][/color]Facebook Timeline is a social media feature introduced by Facebook in September 2011 and rolled out to all users in February 2012. Timeline combines a user's Facebook Wall and Profile into one page, creating a more visually holistic profile. It includes reverse-chronological details, by year, of a user's Facebook history with key life points, including birthdays, weddings and other major events.[/font][/color]Timeline reorganizes all stored user information for display, rather than archival. In previous Facebook incarnations, it was more difficult or impossible to view outdated events, photos and comments.[/font][/color][/color] [/font][/color] इन्टरनेट इसी  परिभाषा को अलग से Techopedia  के हवाले से Facebook Timeline को इस प्रकार पेश कर रहा है[/font][/color]Initially, Timeline was optional, but in February 2012, Facebook began rolling out the change to all users. As with all Facebook changes, Timeline raised user privacy concerns, but Facebook claims the Timeline implementation does not affect privacy settings and that users maintain control over who sees their updates, photos and other entries.[/font][/color] [/font][/color] यहाँ पर इस समय यह बात भी कही जा सकती है कि परंपरागत शिक्षा का साम्राज्य अब खतरे में है.  चित्रों के मार्फ़त बहुत कुछ किया जा रहा है या बहुत कुछ  हो सकता है. इन्टरनेट मोबाइलों पर पंहुच चुका है और कम पढ़े लिखे लोग भी रोमन लिपि सीख कर चैटिंग कर लेते हैं.  पर सत्ता तो सभी  जगह परम्परागत ढंग पर ही चल रही है. पर चुनाव में कभी भी विकास महत्व पा सकता है.  यह तब होगा जब दीर्घकालीन   मुद्दे  भी चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करेंगे.  लेंस नर्सरी का मुद्दा कभी चुनाव मुद्दा बन सकता है.[/font] [/font] [/font]राम प्रसाद     
[/font]

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ram prasad <kochiyarlibrary@gmail.com>
Date: Friday, 28 December, 2012, 4:47 AM
 [/size]स्थाई विकास तो दूरगामी लक्ष्य ही प्राप्त कर सकते है[/font][/font] [/font][/font] addressed to[/font][/font]सदस्य, म्यर उत्तराखंड, धुमाकोट/नैनीडांडा तथा इंटरनेट पर उपलब्धदूसरे उत्तराखंडी ग्रुप [/font][/font] [/font][/font] नैनीडांडा विकास संघ ने धुमाकोट प्रोग्राम किया.  सफल रहा. स्थानीय मेडिकल प्रोफेसनल, समाजसेवी और पत्रकार डाक्टर नरेंद्र गौनियाल  ने उसे सफल माना.  कोचियार लाइब्रेरी में चर्चाएं जारी है.  नैनीडांडा विकास संघ ने नरेंद्र रावत की फोटोग्राफी फेस बुक में प्रस्तुत कर प्रोग्राम कई झलक फेस बुक के माध्यम से दुनिया को दिखा दी. इस अवसर पर डाक्टर गौनियाल ने मुझे सन्देश दिया[/font][/font]political leaders ki soch viaks ko lekar oonchi hoti to apki optical lens nursery ki planning kab ki dharatal par aa gayi hoti.tatha pahadi ilake ke hajaron logon ke liye rojgar ke awsar ban gaye hote.agar political leaders ne ise gambheerta se liya hota to apka concept---''kaise harit ho sakti hai devalgadh ghaati'' aaj dharatal par hota.'[/font][/color][/font] [/font][/font] हजारों लोगों को रोजगार तो तभी मिलते जब कि लेन्स नर्सरी का का क्षेत्र पूरी सूक्ष्म औद्योगिकी तथा कृषि क्षेत्र तक फैलाया जा सकता. नैनीडांडा ब्लाक Krishi Vigyan Kendra, CSGCH, Bharsar,  Via Chipalghat Distt. Pauri Garhwal-46123 के क्षेत्र में आता है  और इसे   Vice-Chancellor, G. B. Pant University of Agriculture and Technology, Pantnagar-263 145 द्वारा संचालित किया जाता है.  जैसा कि कोचियार लाइब्रेरी बताती आई है उत्तराखंड के हर जिले में कृषि विज्ञान केन्द्र है.  कम से कम  भरसार के केन्द्र की खोज खबर तो हो ही गयी है. कोचियार लाइब्रेरी लेन्स नर्सरी और कृषि विज्ञान केन्द्रों का सम्बन्ध बताती आई है.  डाक्टर स्वामीनाथन के योगदान की चर्चा करती आई है. फेस बुक का नैनीडांडा विकास संघ गांव फाउंडेशन के बलबीर गुंसाई के विचार प्रोग्राम की समीक्षा में ले आया है.  गांव फाउंडेशन का कार्यक्षेत्र  भरसार के करीब है.  इस तालमेल को बढ़ाया जा सकता है. सफल कृषि विज्ञान केन्द्रों की योजना को कोशिशों के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में नहीं लाया जा सका.  इस में तो औद्योगिक राष्ट्रों  और कार्पोरेट दुनिया का भारी दबाव है.  लेन्स नर्सरी इसी दबाव को झेलते हुए आगे बढ़ी. [/font][/font] [/font][/font]पर यहाँ  उन्होंने एक और सवाल उठा दिया है वह है अदालीखाल सेमीनार का. इस बात को समझने के लिए मेल Sun May 11, 2008 10:27 pm  How Dhumakot Sangliya Groups came into being    का नीचे दिया जा रहा भाग सामायिक है[/font][/font]Dhumakot Sangliya groups on internet are discussing matters of global concern. Tiwariji was to visit Dhumakot twenty years ago. Shailendra Krishna was the DM then. He is currently secretary to UP Chief Minister Mayawati. Tiwariji was the Chief Minister Uttar Pradesh then. Tiwariji could not visit Dhumakot then. But he could visit Dhumakot years later as Chief Minister of Uttarakhand. By then he had become Nauchami Narayan. Poet Narendra Singh Negi had made him god after taking voluntary retirement as the Information officer of the district where Dhumakot is located. Tiwariji was to visit Adalikhal which is a rival or complementary school in the same area to inaugurate the Seminar "How Green would be Deval Garh Valley". The title was given to the local touch a global sounding. How Green was my valley was a best seller that had become the best movie of its time.[/font][/color][/font]The seminar was very successful internationally and Parvatitya Times published material on Tiwariji'actual visit. But there was another seminar organised by the products of the Dhumakot school who had become VIPs like NRIs. It was necessary to add something to their effort. Came Dhumakot Sangliya Groups on internet.    [/font][/font] [/font][/color][/font] अदालीखाल सेमिनार को यहीं छोड़ कर हम मूल पुस्तक पर आ सकते है जिसके बारे में कहा गया है[/font][/font] How Green Was My Valley is Richard Llewellyn's bestselling -- and timeless -- classic and the basis of a beloved film [/font][/color][/font]The novel is set in South Wales in the reign of Queen Victoria.[/font][/color][/font]How Green Was My Valley is a 1939 novel by Richard Llewellyn, telling the story through narration of the main character, of his Welsh family and the mining community in which they live. The author had claimed to have based the book on his own personal experiences but this was proven untrue after his death; Llewellyn was English-born and spent little time in Wales though he was of Welsh descent.[/font][/font]Llewelyn gathered his facts for the novel from conversations with local mining families in Gilfach Goch.  [/font][/font] [/font][/color][/font]नावल के प्लाट में जिस घाटी का जिक्र किया गया वह हरी भरी थी.  कोयला निकालने से  उसका तहस नहस  हो गया.  कोचियार की देवलगढ़ घाटी हरी भरी नहीं है पर अब वह जो थी वह भी नहीं रही. राष्ट्रीय मार्ग के समानांतर एक और सड़क बन गयी है.  यह सड़क राष्ट्रीय  राजमार्ग  से निकल कर फिर उसी से जुड जाती है इस प्रकार देवलगढ़ घाटी एक टापू बन गई है जिस के इर्द गिर्द मोटर वाहन चलते है जहाज नहीं.  पर बात इस टापू की नहीं है उत्तराखंड के विकास की है  जिसके लिए कोचियार लाइब्रेरी काम कर रही है. इस घाटी और अदालीखाल सेमीनार पर चर्चा करने का कारण यह है कि उत्तराखंड में  सड़कों का जाल बिछ चुका है अब उस जाल का उपयोग उद्योग लगाने में कैसे किया जा सकता है.  वहाँ लेन्स नर्सरी स्थापित हो सकती है.  यह बीज होगा जिस से फलोद्यान विकसित होगा. [/font][/font] [/font][/font] इस चर्चा को  भी यहीं छोड़ कर हम उस टिप्पणी पर आ सकते है जो Satendra Rawat  ने  NAINIDANDA VIKAS SANGH ग्रुप में की.  उन्होंने कहा[/font][/font]श्रधेय रामप्रसाद जी नमस्कार, आपने अपनी चर्चा मे जिक्र किया कि ..इस काम को उत्तराखंड क्लब की सूची के मेधावी छात्र योजनाके अंदर रखा जा सकता है. कुछ लोगों ने लाभ ज़रूर उठाया होगा और कुछ और लोग आगे भी लाभ उठाते जायेंगे. सूची के बाकी काम भी तो महत्वपूर्ण हैं. उन्हें छोड कर तो किया गया काम भी अधूरा रह जायेगा. स्थानीय लोग तो रोज़गार चाहते है....बिलकुल आपने सही कहा कि बाकी काम भी महत्वपूर्ण है, अभी हम लोगों (नैनीडांडा विकास संघ) ने शिक्षा को आधार बनाया है, मेरा मानना है कि अगर शिक्षा का बिस्तार हो गया तो बाकी के काम अपने आप आसान हो जायेंगे, क्योंकि किसी भी तरह के विकास के लिए शिक्षित होना जरूरी है, अगर शिक्षा अच्छी हो गयी तो रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते है, और लोग अगर शिक्षित हो गए तो लेंस नर्सरी जैंसे प्रोजेक्ट जो आज तक उत्तराखंड के प्लान में नहीं आ पाया है शायद लोग इस और भी सोचने लगे.[/font][/font] [/font][/font] आज की पीढ़ी शायद यह नहीं जानती होगी कि ब्रिटिश राज के दौरान  भी संयुक्त प्रान्त  जो कि अब उत्तर प्रदेश राज्य है  कांग्रेस सरकार बनी थी  यह सरकार १७ जुलाई १९३७ से लेकर २ नवम्बर १९३९ तक  चली.  उत्तराखंड क्षेत्र के पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त इस के मुख्य मंत्री थे. डाक्टर सम्पूर्णानन्द इस सरकार के शिक्षा मंत्री थे.  उन्होंने शिक्षा प्रसार ग्राम पुस्तकालय योजना  चलाई थी  नैनीडांडा क्षेत्र में  कोचियार प्राइमरी स्कूल को डुंगरी प्राइमरी पाठशाला में स्थित पुस्तक केन्द से जोड़ा गया था.  डुंगरी में पुस्तकों का केन्द्र था.  इस केन्द्र से पुस्तकें सम्बंधित स्कूल को हर हप्ते भेजी जाती थी और वहाँ से वापस मांगी जाती थीं. डुंगरी जैसे न जाने कितने केंद्र स्थापित किये गए होंगे  जो नजदीकी प्राइमरी स्कूलों को जोड़ने का काम करती रही होंगी.  डाक्टर सम्पूर्णानन्द और डाक्टर राधाकृष्णन  आज भी शिक्षा के क्षेत्र में जाने जाते है.  पर आज नैनीडांडा क्षेत्र या देश में कही भी शिक्षा क्षेत्र अल्प विकसित नहीं है.  डाक्टर सम्पूर्णानन्द चर्चा में है इस लिए उनके बारे में नीचे दी जा रही जानकारी पर रौशनी डाली जा सकती है  l[/font][/font]Dr. Sampurnand was born on January 1, 1891.   He was an eminent scholar and teacher of Sanskrit and astronomy.  Dr. Sampurnanand was also a fervent freedom fighter. He participated in the Non-cooperation Movement; edited Maryada, a Hindi monthly and also contributed to the National Herald. He joined All-India Congress Committee in 1922.[/font][/color][/font]He fought the assembly elections of Uttar Pradesh legislative assembly and was elected as first chief minister of the state from 1954 to 1960. Dr. Sampurnanand had the longest tenure among any of the Uttar Pradesh’s Chief Ministers. He was U.P. Chief Minister from 28 December 1954 to 07 December 1960. [/font][/font] [/font][/font] आज प्रश्न है स्थानीय स्तर पर शिक्षा का उपयोग पर .  आजकल उत्तराखंड की संस्थाएं इंटरकालेजों में वह अवेअरनेस फैला रही है जिस से वहाँ के विद्यार्थी नौकरी पा सके.  तात्कालिक दृष्टि से यह ज़रूरी है.  पर दूरगामी लक्ष्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती.  इस के लिए यह ज़रूरी है कि स्थानीय स्तर पर इस दिशा में काम किया जाये.  इस के लिए नया नेतृत्व उभर भी रहा है. कोचियार लाइब्रेरी में इस नेतृत्व को मूवर्स एंड शेकर्स का नाम दिया गया था.  इस चर्चा को समाप्त करने के लिए यहाँ मेल Date: Tuesday, 3 August, 2010, 9:25 AM  Creating Social Responsibility among Well to Do Nainidandian within their cultural space के नीचे दिए जा रहे अंश को उद्दृत किया जा रहा है[/font][/font]The title of the last mail Nainidandians are the movers and shakers, of the world for ever, it seems. Date: Monday, 2August, 2010, 12:46 PM may appear to be confusing.  This may not be the case if one goes through the text of the mail keeping in view the previous mails:[/font][/font]Can Native Nainidandians of status be made movers and shakers for implementing Global Poverty Formula? Date: Sunday, 1 August, 2010, 8:11 AM[/font][/font]Reductionism for implementation of Dhumakot Sangliya Experiment is a new trial Date: Saturday,31 July, 2010, 8:13 AM[/font][/font]What is being done in Dhumakot Sangliya Experiment to combat aging process? Date: Friday,30 July, 2010, 9:12 AM[/font][/font]Making Well to Do Non Resident Nainidandians understand their own social responsibility Date: Thursday, 29 July, 2010, 9:17 AM[/font][/font]The mail is studying various definitions of the phrase or idiom “Movers and Shakers” to find such people at the local level who can contribute in turning the poem of the Global Poverty Formula into a visible effect. The title was created from the ode that is believed to have used the phrase to the first time.  An ode is typically a lyrical verse written in praise of, or dedicated to someone or something which captures the poet's interest or serves as an inspiration for the ode. The mail discussed various definitions of the phrase “Mover and shaker” and most of them defined it as an influential and dynamic person within an organization or group of people.[/font][/font] [/font][/font] राम प्रसाद
[/font][/font]

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Date: Wednesday, 26 December, 2012, 7:04 AM[/font][/color][/font]
सिडकुल बना एक के दो हुए फैलेंगे ही[/font][/font]
[/font][/font]
addressed to[/font][/font]
सदस्य, म्यर उत्तराखंड, धुमाकोट/नैनीडांडा तथा इंटरनेट पर उपलब्धदूसरे उत्तराखंडी ग्रुप [/font][/font]
[/font][/font]
अवसर तो हर समय मौजूद रहते है.  बात है उन अवसरों का लाभ उठाने की. कोचियार लाइब्रेरी हर साल  जनवरी माह में उपलब्ध   अवसरों पर ध्यान देती आई है.  इस महीने  प्रधान मंत्री के दो भाषण और राष्ट्रपति के दो भाषण होते है. उन्हें उनके सम्बंधित थिंक टैंक तैयार करते हैं.  यह वह थिंक टैंक हैं ई बिजनेस के क्षेत्र में सबसे अधिक विश्वसनीय माने जा सकते हैं. इस लिए  साइंस कांग्रेस का उद्घाटन भाषण , प्रवासी भारतीय दिवस का उद्घाटन और समापन भाषण   और गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या का भाषण  देश की  बौद्धिक शक्ति का परिचय देते है.  १९१३ का साल कुछ और अवसर देता है.  यह साइंस कांग्रेस का शताब्धि  वर्ष है और गद्दार मूवमेंट का शताब्धि वर्ष  भी है. स्थानीय स्तर पर  कोचियार लाइब्रेरी के सन्दर्भ में हाल ही में आयोजित नैनीडांडा विकास संघ का प्रोग्राम महत्व पूर्ण है.   नैनीडांडा विकास संघ महत्व पूर्ण है तो डाक्टर नरेंद्र गौनियाल भी.  वह डाक्टर भी हैं, सामाजिक कार्य करता हैं और पत्रकार भी. उन से चैट हुई.  नीचे दी जा रही है [/font][/font]
Ram Prasad[/font][/color][/font]
nainidanda vikas sangh ka programme kaisa raha[/font][/color][/font]
Narendra Gauniyal[/font][/color][/font]
puruskar vitran tha.mai ja nahi paya..samachar lagaa diya tha.[/font][/color][/font]
Ram Prasad[/font][/color][/font]
kuchh sthaniy prabhav pada[/font][/color][/font]
Narendra Gauniyal[/font][/color][/font]
nainidanda vikas sangh ki social activities to theek hain,lekin election time par galat bhi hota hai..[/font][/color][/font]
Ram Prasad[/font][/color][/font]
mla ka ky hal hai?[/font][/color][/font]
Narendra Gauniyal[/font][/color][/font]
MLA kya kar sakte hain..[/font][/color][/font]
Ram Prasad[/font][/color][/font]
milkar wahi to sab kuchh karte hain[/font][/color][/font]
Narendra Gauniyal[/font][/color][/font]
bharat singhji ke ladke hain..aadmi theek hai,lekin opposition me rahkar jada kuchh nahi ho sakta.[/font][/color][/font]
Ram Prasad[/font][/color][/font]
asali kaam to sarkaar ke bahar hee hota hai[/font][/color][/font]
Narendra Gauniyal[/font][/color][/font]
lekin funding, nayi planning, nayi ghoshnayen to sarkar ke sath hi ho pati hain..vipkshi kewal chilla sakte hain..kaam kewal power se hota hai..power satta me hoti hai.[/font][/color][/font]
Ram Prasad[/font][/color][/font]
tatkalik samasyaon ke bare men yah tippni thik hai par asali kam to planning ka hai kaam wah hote hain jo planning men aa jate hain aur unhe paisa mil jaataa hai[/font][/color][/font]
Narendra Gauniyal[/font][/color][/font]
darasal.HN bahuguna,ND tiwari aur BCkhanduri jaisi political thinking ki kami lag rahi hai..[/font][/color][/font]
Ram Prasad[/font][/color][/font]
narendr gauniyal jaise log bhee to kam hote hain[/font][/color][/font]
Narendra Gauniyal[/font][/color][/font]
ham log soch sakte hain,lekin planning ko working me lane ke liye achchhe political leaders ki jaroorat hoti hai.jo ab nahi dikhayi de rahe hain.[/font][/color][/font]
Ram Prasad[/font][/color][/font]
political leader bhee to aam aadmi hai. awasaron ka fayada utakar age badhta hai[/font][/color][/font]
[/font][/font]
इस का अर्थ  यह हुआ कि हेमवती नंदन बहुगुणा, एन डी तिवारी और भुवन चन्द्र खंडूरी कुछ इस लिए कर पाए कि उन्होंने अवसरों का फायदा उठाया.  बहुगुणा और खंडूरी के बीच पारिवारिक सम्बन्ध थे.  बहुगुणा और तिवारी के बीच में राजनीतिक समीकरण थे.  यह सम्बन्ध और समीकरण स्थानीय सार्वजनिक कार्यकर्ता की नजर में इसलिए आये कि उनके काम स्थानीय स्तर पर सार्वजानिक रूप में दिखाई दे रहे है. पहले प्लानिंग होती है  फिर काम होता है और फिर आंकलन. समाचार बनते है.  ऐसे ही एक समाचार भी बना होगा.  प्रकाश में आया और धर्म जी ने सोचा काम हो गया.  कल की मेल Date: Tuesday, 25 December, 2012, 8:47 AM  शुद्धता और प्रतीकात्मता  का सवाल  तो विकास के सिलसिले में भी आ ही जाता है पर उन्होंने पहले तो बिजनेस स्टैण्डर्ड के एक समाचार की ओर फेस बुक का ध्यान खींचा और कहा[/font][/font]
लीजिये आपकी टेक्नोलॉजिकल नर्सरी तैयार हो रही है[/font][/font]
this shall be a kind of Technological Nurseries in Uttarakhand.[/font][/color][/font]
फिर टिप्पणी की[/font][/font]
Bamboo houses, yoga centres, laundry facilities, souvenir manufacture, bakery products — these are the kinds of micro enterprises that can easily be nurtured in Uttarakhand, according to experts.[/font][/color][/font]
[/font][/font]
समाचार था  उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखंड शिशिर प्रशांत / देहरादून 25 Dec, 2012, 00:03 IST.  यहाँ पूरे समाचार को उद्धृत करना ठीक रहेगा[/font][/font]
बांस के घरों, योग केंद्र, कपड़े धोने की सुविधा, स्मारिका निर्माण, बेकरी उत्पाद - इन सूक्ष्म उद्यमों में से एक प्रकार की है कि आसानी से पाला जा सकता है कर रहे हैं उत्तराखंड के विशेषज्ञों के अनुसार,.[/font][/font]
राज्य सरकार औद्योगिक विकास के लिए प्रोत्साहन की एक मेजबान प्रदान कर रहा है, अकुशल युवाओं को उद्यमियों की बारी है, वे सिद्ध करना की जरूरत है. एक सर्वेक्षण के अनुसार,वहाँ 703.000 बेरोजगार युवाओं को जो अलग से पंजीकृत हैं राज्य में बेरोजगारी एक्सचेंजों, लेकिन किसी भी नौकरी लेने के लिए बेताब हैं.[/font][/font]
बेरोजगार युवकों की इस हताशा राज्य में घर गार्ड, जब स्कोर की भर्ती के लिए हाल ही में एक अभियान में स्पष्ट किया गया स्नातकोत्तरों साक्षात्कार के लिए बदल दिया. बुनियादी आवश्यकता केवल 8 मानक था.[/font][/font]
मन में बढ़ती बेरोजगारी को ध्यान में रखते हुए राज्य के लघु उद्योग और श्रम मंत्री हरीश चंद्र Durgapal नैनीताल जिले में हल्द्वानी शहर से 27 दिसंबर से एक उद्यमिता जागरूकता कार्यशाला किकस्टार्ट किया जायेगा. यह के साथ साझेदारी में राज्य सरकार की ओर से शुरू किया जा रहा है उत्तराखंड उद्योग संघ (आईएयू).[/font][/font]
"हम एक एक साल की अवधि में राज्य के सभी 13 जिलों को कवर किया जाएगा. , ने कहा कि इस समय के दौरान, हम लगभग 2000 उद्यमियों दर्ज की एक लक्ष्य निर्धारित किया है " आईएयू के अध्यक्ष पंकज गुप्ता ,. "हम जागरूकता, प्रेरणा,प्रशिक्षण, और युवाओं के हाथ पकड़े प्रदान करेगा" गुप्ता ने कहा.[/font][/font]
कार्यक्रम के दौरान युवा उद्यमियों क्षेत्र है, जहां उन्हें लगता है कि वे अच्छी तरह से कर सकते हैं के संदर्भ में उनकी वरीयताओं को दे करने के लिए कहा जाएगा. उन्होंने यह भी क्षेत्रों में जहां वे सूक्ष्म उद्यमों का निर्माण कर सकते हैं में विशेषज्ञता की तरह विकल्प दिया जाएगा.[/font][/font]
[/font][/color][/font]
इस समाचार के साथ ही सम्बंधित खबर को चर्चा में ला सकते हैं जिसका शीर्षक है उत्तराखंड मुख्यमंत्री दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति मिलता है, निवेश करना चाहता है:  शिशिर प्रशांत देहरादून / 22 दिसम्बर,2012, 17:17 IST[/font][/font]
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा अपने सप्ताह लंबी यात्रा के दौरान दक्षिण अफ्रीका के लिए दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति के साथ बैठकें आयोजित जैकब जुमा और अन्य प्रमुख नेताओं और में निवेश के लिए बुलाया उत्तराखंड .[/font][/font]
बहुगुणा भी अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) की 106 सम्मेलन में भाग लिया और एक अनन्य 1/2 Bloemfontien में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति के साथ एक घंटे की बैठक की थी. बैठक के दौरान, बहुगुणा निवेश पहाड़ी राज्य द्वारा की पेशकश के अवसरों के ज़ूमा को अवगत कराया और भी उसे उत्तराखंड का एक स्मृति चिन्ह के साथ प्रस्तुत किया.[/font][/font]
दोनों नेताओं ने लोकतांत्रिक समाजों और मुक्ति और स्वतंत्रता के लिए अपने लोगों द्वारा सामना करना पड़ा संघर्ष के अपने अनुभवों को साझा किया. Zuma हमेशा दक्षिण अफ़्रीकी एकजुटता का समर्थन और रंगभेद विरोधी आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा के लिए भारतीय लोगों और सरकार के लिए उनके प्रति आभार व्यक्त किया.[/font][/font]
बहुगुणा भी भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से ज़ूमा के क्रिसमस और नव वर्ष की बधाई दीं.[/font][/font]
इससे पहले, भारतीय उच्चायुक्त वीरेंद्र गुप्ता Bahguna के प्रिटोरिया जहां प्रमुख भारतीय व्यापारी भी उपस्थित थे में सम्मान में एक रात्रिभोज का आयोजन किया. बहुगुणा उत्तराखंड में निवेश के लिए भारतीय व्यापारिक समुदाय को आमंत्रित करने का अवसर ले लिया.[/font][/font]
वह जो भी "पूर्व का स्विट्जरलैंड 'कहा जाता है राज्य के समग्र विकास के लिए अपनी सरकार की प्रतिबद्धता सविस्तार. उन्होंने प्रस्तावित Sitarganj औद्योगिक संपत्ति जो भी रूप में जाना जाता है में उनकी सरकार द्वारा की पेशकश के अवसरों "SIDCUL चरण 2" और उद्योगों के लिए एक संशोधित पहाड़ी नीति पर सविस्तार.[/font][/font]
उन्होंने यह भी निवेश के अवसरों और पिछले 9 महीनों के दौरान अपनी सरकार की उपलब्धियों को भी और भारतीय उच्चायुक्त को एक कॉफी टेबल बुक के लिए संबंधित साहित्य प्रस्तुत किया. भारतीय उच्चायुक्त बहुगुणा का आश्वासन दिया है कि वह अपनी पूरी कोशिश करने के लिए उत्तराखंड के लिए दक्षिण अफ्रीका से निवेश को आकर्षित करेगा.[/font][/font]
दक्षिण अफ्रीका ऐस Magashule Bloemfontien के फ्री स्टेट प्रांत के प्रधानमंत्री के साथ एक लंच बैठक में बहुगुणा प्रीमियर आमंत्रित उत्तराखंड की यात्रा और भारतीय व्यवसायियों के लिए भारत में एक आकर्षक गंतव्य के रूप में उत्तराखंड में निवेश के लाभों के बारे में विस्तार से बताया.[/font][/font]
[/font][/font]
यह तो साधारण घटनाएँ है. निशंक जी को मॉरीशस में राष्ट्र्रीय और गोपियो सम्मान मिल चुके है.  समस्या तो उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्से के औद्योगिकीकरण की है.  मैदानी इलाके में निवेश होते रहेंगे तिवारी याद किये जाते रहेंगे.  पर पहाड में क्या होगा. वहाँ तो लेन्स नर्सरी प्रोजेक्ट को प्लान में लाने की सोच के लिए कोचियार लाइब्रेरी को संघर्ष करना पड़ रहा है.[/font][/font]
[/font][/font]
राम प्रसाद[/font][/font]

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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[/size]Date: Tuesday, 25 December, 2012, 8:47 AM[/font][/color][/font]
 
[/size]शुद्धता और प्रतीकात्मता  का सवाल  तो विकास के सिलसिले में भी आ ही जाता है[/font][/font] [/font][/font] addressed to[/font][/font]सदस्य, म्यर उत्तराखंड, धुमाकोट/नैनीडांडा तथा इंटरनेट पर उपलब्धदूसरे उत्तराखंडी ग्रुप [/font][/font] [/font][/color][/font] कोचियार लाइब्रेरी मे चल रही बहस में शुद्धता  और प्रतीकात्मता प्रश्न उभरता जा रहा है.  इस लाइब्रेरी का  आधार ही ई बिजनेस तथा आई बिजनेस है.  इसी आधार के कारण  प्रोजेक्ट का आज का तात्कालिक स्वरूप लेंस नर्सरी का राज्य के प्लान में रखा जाना है.  आज का  प्लानिंग कमीशन बिखरा हुआ है.  इतिहास तो है ही मजबूरी.  वह जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार करना पड़ता है.  बाहरी हस्तक्षेप तो आज़ादी के बाद शुरू से ही मौजूद था पर तब तो जवाहर लाल नेहरू मौजूद थे.  उनका व्यक्तित्व था.  उन्हे जनता का अटल विश्वास उपलब्ध था.  पहली पँच बर्षीय  योजना सफल हुई.  दूसरी पँच बर्षीय योजना उतनी सफल नही हुई जितनी अपेक्षित थी.  पर नेहरू सत्ता में थे. सत्ता को उन्होने झंझोड़ा.  जितना झंझोड़ सकते थे उतना झंझोड़ा.  निष्कर्ष  निकला कि  सरकार की विकास शक्ति सीमित है. अगर सत्ता में शक्ति होती उपनिवेशवाद क्यों समाप्त होता.  वास्तविकता तो यह है कि समाज तो लगभग उन्ही नियमों से चलता है जिन्हे न्यूटन के तीन नियमों के नाम से जाना जाता है.  समाज ही क्यो शरीर भी उन्ही नियमों से चलता है.  सत्ता भी तो उन्ही नियमों से चलती होगी.  विकास भी तो उन्ही नियमो से चलता होगा.  इस लिए नेहरू  जी ने असोसिएशन ऑफ साइंटिफिक वर्कर्स के मार्फ़त साइंस एंड द नेशन ड्यूरिंग थर्ड फाइव यियर प्लान नामक अंतरराष्ट्रीय संगोष्टी कराई. उस से कुछ निचोड़ निकला. पर इस सफलता को असोशिएशन पचा नही पाया. असोशिएशन के पास सफलता तो थी पर सत्ता गृह युद्ध में लिप्त थी.  समझोता हुआ.  निर्लिप्त की खोज हुई और सत्ता उसे सौंप दी गई.  यह सब कुछ इस लिए हुआ कि नेहरू जी की मृत्यु संगोष्टी होने से पहले ही हो गयी.  उनकी जगह उस समय के राष्ट्रपति डाक्टर डाक्टर राधाकृष्णन ने ली पर उनके पास तो प्रतीकात्मक सत्ता थी.  शुद्ध सत्ता तो प्रधान मंत्री के पास होती है. ऐसा ही कुछ असोसिएशन ऑफ साईंटिफिक वर्कर्स के साथ हुआ.  सत्ता मेरे पास थी पर थी तो प्रतीकत्मक.  तब तक सही था जब तक जब तक मैं  एन पी एल की नौकरी में था.  अगर सोविएत संघ  न जाता तो संभव है कि  कोई न कोई मेरी जगह लेता. इसलिए असोसिएशन भौतिक रूप से तो समाप्त हो गया पर प्रतीकात्मक रूप से मेरे पास ही रहता और आज वही असोसिएशन कोचियार लाइब्रेरी के रूप में उभर रहा है.  जैसे  कि कोचियार लाइब्रेरी में कहा जाता रहा है इस इतिहास का विवरण  प्रोफेसर ऐन्डरशन की ख्याति प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक में उपलब्ध है.[/font][/font] [/font][/font] जो इतिहास ऊपर बताया गया है वह इस लिए कि मेल: Date: Monday, 24 December, 2012 प्रवासी भी तो शुद्ध और प्रतीकात्मक हो  सकते है के संदर्भ मे   डाक्टर बलबीर सिंह रावत की प्रतिक्रिया है[/font][/font]पहिचान तो चलती रहेगी , होती रहेगी, प्रोजेक्ट पर आ जांय ?[/font][/font]अब तक की बार्ताऔं  से जो निष्कर्ष मैं निकाल सकता हूँ वोह है की हमें स्थान-उपयोगी प्रोजेक्ट कृषि, बागवानी, लघु, मध्यम,कुटीर, हर स्तर के हर क्षेत्र के प्रोजेक्ट बना कर हर उस संस्था,कार्यालय, मंत्रालय को भेजना चाहिए जो उसका catalytic agentया adopter बन सकता है। आवश्यकता पलायन रोक पाने की है जिसके लिए बृहद स्तर पर काम करने के साधन जरूरी हैं । सरकार ही सब से सक्षम होती है  तो क्यों न उसी से शुरू करें ?[/font][/font]प्रोजेक्ट बनाने का एक अपना तरीका, है . पाहिले उद्देश्य स्पष्ठ  होना चाहिए, फिर क्या लाभ किस किस का होगा  का बरन्णन, कैसे होगा की व्याख्या, कब तक होगा की सीमा . साथ में तकनीकी, आर्थिक , मानव संसाधन, कच्चे मालों की उपलब्धता की निरंतरता , उत्पादित उत्पाद/उत्पादों की उपयोगिता, उत्पादन लागत का एस्टीमेटबिक्री प्रबंध का उल्लेख , शुद्ध लाभ का अनुमान , और अंत में भूमि, जल,बिजली , सड़क, बैंक डाकघर, फ़ोन, इन्टरनेट इत्य्यादी सेवाओं की उपलब्धि का विवरण  सही और सिस्टम से बनाई गई प्रोजेक्ट रिपोर्ट पर ही गौर हो सकता है।[/font][/font]निर्णय कर्ताओं के पास समय, और प्रोज्र्क्त संबंधी सूझ बूझ का अभाव होता है, उनकी विशेषज्ञता अन्य क्षेत्र की होती है,इसलिए प्रजेक्ट रिपोर्ट में आसानी से समझ में आने वाले गुण ,तार्किक प्रेजेंटेशन और संभवता का विश्स्नीय दर्शन हर पेज में मजबूती से दर्शाया हुआ होना चाहिए तभी वोह "माँ की गोद और लालन पालन " पा सकता है। और धरातल पर उतारा जा सकता है।      [/font][/font]... बलबीर  सिंह रावत , 24.12.2012.[/font][/font]आइये अपने अपने बिचारो के प्रोजेक्ट बना डालिए और भेजिए इस मंच पर, या स्वयं ही ठीक जगह पर। लेकिन समन्वयित प्रया एक ही मंच से होंगे तो अधिक प्रभाव्शाली होंगे।    [/font][/font] [/font][/color][/font] जो बात आज कल डाक्टर बल पूर्वक कह रहे है वह तो 1978 में डाक्टर पंत सेमिनार के द्वारा कह चुके है.  आवश्यकता है सिफारिशों को  ज़मीन पर उतारने की.  इस के लिए यह ज़रूरी है कि  प्लानिंग प्रक्रिया  को नीचे से ऊपर की दिशा में ले जाने की यही बात डाक्टर रावत विस्तार के साथ बता रहे है.[/font][/font] [/font][/font] उधर  धर्म जी का सुझाव है कि यूनआइडी से संपर्क बनाया जाए जिसका   पता है[/font][/font] [/font][/color][/font] Mr. Antonio LEVISSIANOS[/font][/color][/font] Senior Ind. Dev. Officer[/font][/color][/font] UNIDO Field Office in INDIA[/font][/color][/font] P.O. Box 3059[/font][/font]55 Lodi Estate[/font][/font]New Delhi, 110003[/font][/font]INDIA[/font][/color][/font]Telephone:       +91 1124643484[/font][/font]FAX:   +91 1124620913[/font][/font]E-mail: office.india@unido.org[/font][/color][/font]Further Information:   http://www.unido.org/office/india[/font][/color][/font]Representative and Director, Regional Office:          Ms. Ayumi FUJINO, A.Fujino@unido.org[/font][/color][/font]Also covers:    AFGHANISTAN, BANGLADESH, BHUTAN, MALDIVES, NEPAL, SRI LANKA[/font][/color][/font] [/font][/color][/font]इस जानकारी के साथ साथ कल की मेल  पर  टिप्पणी करते हुए उन्होंने   Young Uttarakhand - यंग उत्तराखंड तथा दूसरे उत्तराखंडी फेस बुकी  ग्रुपों पर कहा    [/font][/font]Central Scientific Instruments Organisation (CSIO),[/font][/color][/font]Established in October 1959, CSIO was chartered to stimulate the growth of indigenous instrument industry in the country through development of contemporary technologies and other scientific & technological assistance.[/font][/font] [/font][/color][/font]With a view to meeting the growing demand of well trained instrument technologists, Indo-Swiss Training Centre (ISTC) was started in December 1963 with the co-operation of Swiss Foundation for Technical Assistance, Zurich, Switzerland.[/font][/font] [/font][/color][/font]Mission :-To be a leader at national level for designing and developing scientific and industrial instrument systems and devices; play a lead role in providing repair , maintenance & calibration and training of i nstrument technologists and be a custodian of instrumentation activity in the country.[/font][/color][/font] [/font][/color][/font]मिशन मेल नहीं खता है इसका उत्तराखंड के लिए, लेकिन शायद हो सकता है की इसकी भी जरूरत पड़ेगी बाद में[/font][/font]आपके कर कमलों के लिए बहुत बहुत साधुवाद, श्री राम प्रसाद जी,[/font][/font]आपका अनुभव एवं देशना जरूर कृतार्थ करेगा "उत्तराखंड" को[/font][/font]आपके सराहनीय प्रयासों के लिए मैं ह्रदय से आभार प्रकट करता हूँ |[/font][/font]- प्रणाम -[/font][/font]However, further I also tried to approach the UN offices in this regard, Hoping for a positive response in the directions of implementation of Technological Nurseries in Uttarakhand.[/font][/color][/font] [/font][/font] सी एस ई ओ को यूएनडीपी से भी सहायता मिली थी और स्विस फाउंडेशन से भी.  स्विट्ज़रर्लॅंड को तो उत्तराखंड ने विकास का माडल माना ही है  दूसरे पहाड़ी राज्यों ने भी यही किया है  इसी लिए तो भारत सरकार ने स्विट्ज़र्लॅंड से सहायता मांगी थी.  साइंटिफिक इन्स्ट्रुमेंट्स का उद्योग उत्तराखंड में अच्छी तरह स्थापित किया जा सकता है. लेंस उद्योग तो शुरुआत है[/font][/font]आम तौर से संयुक्त राष्ट्र संघ की ऐजेंसियाँ व्यक्तियों को नही व्यवस्थाओं के साथ संपर्क करती हैं. प्रचार को भी महत्व देती है.  यह व्यवस्थाए  मूल रूप से सरकारी होती है पर गैर सरकारी क्षेत्र को भी प्रोत्साहित किया जाता है. उत्तराखंड में सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र अक्षम है.  इसीलिए तो मंथन वहाँ नही कोचियार लाइब्रेरी में हो रहा है. इस लिए यहाँ भी कोचियार लाइब्रेरी की मेल Date: Tuesday, 6 July,2010, 7:11 AM   Do Non Resident Uttarakhandis too deserve minus points? के नीचे दिए गए अंश को उद्धृत कर चर्चा का समापन किया जा रहा है[/font][/font]According to the internet, the film The Third Man (1949)is a paranoid story of social, economic, and moral corruption in a depressed, rotting and crumbling, 20th century Vienna following World War II.  However,   today, Vienna  maintains  international importance by hosting international organizations, such as the United Nations (UNIDO, UNOV, CTBTO and UNODC), the International Atomic Energy Agency, the Organization of Petroleum Exporting Countries, and the Organization for Security and Cooperation in Europe.[/font][/font] [/font][/color][/font]How is the film The Third Man is still relevant to Active Politicians of Uttarakhand?   They are taken as gods by people of the state.  Then there is a middle class of people like Lakhera Ji who have suggestions what can be done to benefit the third man, that is. the poor of Uttarakhand. They have their limitations which are fully explained by Osho as follows:[/font][/color][/font] [/font][/color][/font]In a democracy you cannot change the status quo, you cannot change the class-divided society into a classless society.[/font][/color][/font]The dictatorship of the proletariat is not an ordinary dictatorship of an Adolf Hitler or Benito Mussolini. It is a dictatorship of the poor, the have-nots. Unless the have-nots have the power, they cannot stop the exploitation by the rich.[/font][/color][/font] [/font][/color][/font]In a democracy it is almost impossible for the poor to have the power for the simple reason that the rich people have enough money to fight elections, enough money even to buy the poor and their votes, enough money to buy the politicians. It is impossible in a democracy for the poor to have power, and without power there is no possibility of changing the society. Hence, Karl Marx proposed the idea of a dictatorship of the proletariat.[/font][/color][/font] [/font][/color][/font]राम प्रसाद
[/font][/font]

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[/font]
Date: Monday, 24 December, 2012, 11:35 AM[/font][/color]
प्रवासी भी तो शुद्ध और प्रतीकात्मक हो सकते है[/font]
addressed to[/font]
सदस्य, म्यर उत्तराखंड, धुमाकोट/नैनीडांडा तथा इंटरनेट पर उपलब्ध दूसरे उत्तराखंडी ग्रुप [/font]
[/font][/color]
कल की मेल Date: Sunday, 23 December, 2012, 12:11 PM  नैनीडाँडियन शुद्ध या प्रतीकात्मक ?  पर डाक्टर बल बीर सिंह रावत की प्रतिक्रिया है[/font]
हर जीव की सोच अपनी, धुमाकोट के ओरिजिनल शुद्ध नैनीडाडियन, प्रतीतात्मक नेनीडांडियन, बुद्धिजीवी नेनीडांदियन, नाना प्रकार के नेनीडांडियन, इस चर्चा में भी वही। यह भी सही है की पहले अपनी एक पहिचान भी तो हो कि हम फलां अलां हैं, या केवल अलां ही हैं . भौगोलिक रूप से हम उत्तराखंडी हैं, भारत वासी हैं। उत्तराखंड के अन्दर हम गढ़वाली और कुमाउनी, पर्वतीय जन हैं , और मैदानी भाग वाले देसी लोग हैं। राजनीतिक तौर पर हम सब उत्तराखंड के मतदाता हैं। सामाजिक तौर पर हम अभी भी पूरी तरह से उत्तराखंडी नहीं हैं, जाति से ही पहिचान देते हैं।[/font]
बौद्धिक रूप से हमें अभी कोई नाम नहीं मिला है। क्यों की कोई भी बौद्धिक स्तर का राष्ट्रीय काम कोई नहीं कर पाया (या राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकारा नहीं गया). एक नाम नैनीडाँडियन प्रस्ताबित है, क्यों की उत्तराखंड के औद्योगिक विकास की पहली अलख जगाने वाला व्यक्ति और संस्था  नैनीडाँडा क्षेत्र के हैं .यह अलग बात है की 1969 से अब तक इस प्रोजेक्ट ने जन्म नहीं ले पाया है . बाप तो है, परन्तु "माँ" नहीं मिल पायी है अबतक।[/font]
तो भाइयो तभी तो हम अपनी पहिचान ढूंढ रहे हैं अब तक . माँ - जो पहिले बच्चे (प्रोजेक्ट) को गोद में पालती है, धरती में लाती है, पाल पोस कर बड़ा करती है वोह माँ की ढून्ढ, औद्योगिकी करण को  जन्म देने के लिए हो रही है।[/font]
आइये गंभीरता से इस जन्मदात्री को ढूँढिये , शायद राजनीतिक दलों के गलियारों में कही दुबकी बैठी है ,किस से डर रही है पता नहीं, कही ऐसा तो नहीं की सम्भावित "पिताओं" (प्रोजेक्ट दाता ) में  कमी महसूस कर रही है? या पहिचान ही नहीं पा रही है? हर कोण , दृष्टिकोण से सोचिये, जाँचिये, मनन कीजिये और आगे आकर निशंकोच बताइये।                    [/font]
[/font]
इस चर्चा को फिलहाल यहीं छोड़ा जा सकता है.  कारण यह है कि प्रवासी भारतीय दिवस कोची में 7 जनवरी 2013 और 9 जनवरी 2013 के दौरान आयोजित किया जा रहा है उस से पहले 5 जनवरी से लेकर 7 जनवरी तक गोपिओ अपना बार्षिक अधिवेशन कर रहा है.  अब तक लग भाग सभी पक्ष मान गये हैं कि  कम से कम प्रतीकात्मक रूप में तो नैनीडाँडियन ग्लोबल इंडियन है ही.  इस दृष्टि से कोची प्रोग्राम नैनी डाँडियनों का प्रोग्राम भी माना जा सकता है  प्रोग्राम है  [/font]
General Council Meeting[/font][/color]
6thJanuary 2013[/font]
GOPIO Conference Program[/font][/color]
Session I    Diaspora Issues: Challenges & Opportunities[/font][/color]
Session II: Freedom Movements in the Diaspora - Gadar & Others[/font][/color]
Session III: Economic Progress in the Diaspora:[/font][/color]
  Making an Impact in Global Investments  & Business Entrepreneurship[/font][/color]
  Session IV: Economic Progress in the Diaspora:[/font][/color]
Investment in India; Creating India-Diaspora Science, Technology & Innovation Knowledge Network[/font][/color]
Session V: Conclusion & Wrap-Up[/font][/color]
  Session VI: Resolutions[/font][/color]
GOPIO Community Service Awards Banquet[/font][/color]
7thJanuary 2013[/font]
GOPIO Wrap-up Meeting [/font][/color]
GOPIO Executive & Council Meeting[/font][/color]
Finalize Resolutions; Assessment; Planning[/font][/color]
इस साल जिन व्यक्तियों  को सम्मान के लिए चुना गया है उन की सूची यह है [/font]   His Excellency H. R. Bhardwaj, Governor of Karnataka and Kerala[/font][/color] Hon. Vayalar Ravi, Minister for Overseas Indian Affairs (MOIA)[/font][/color]
Hon. Oommen Chandy, Chief Minister of Kerala[/font][/color]
Lord Bhikhu Parekh, House of Lords, London[/font][/color]
उत्तराखंड मूल की डाक्टर नीरजा अरुण इन अधिवेशनो में से एक के संचालन मे अपना योगदान देंगी[/font]
[/font]
इस चर्चा को यहीं छोड़ कर  अब हम धर्म जी की गतिविधियों  पर आ सकते है.  उन्होने साम पित्रोदा को ट्नोर्ड के बारे पत्र लीक कर अपनी इस गतिविधि की शुरुआत की.  फिर क्रमबद्ध ढंग से दूसरे वी ई पी लोगों को  पत्र  लिखते जा रहे हैं अब तक के आखरी पत्र के टेक्स्ट  को नीचे दिया जा रहा है [/font]
Kind Attention: Dr. Isher Judge Ahluwalia[/font][/color]
Chairperson, Board of Governors, the Indian Council for Research on International Economic Relations (ICRIER).[/font][/color]
[/font][/color]
Respected Madam,[/font][/color]
In reference to Hill Area Development, this is regarding implementation & setting up of Technological nurseries for rural industrialisation and entrepreneurship development in the state of UTTARAKHAND & othere parts of country[/font][/color]
[/font][/color]
Kindly find attached file for understanding about TNORD[/font][/color]
Eminent Scientist Shri Ram Prasad, who is the innovator of Technological Nursery for Optics Research and Development (TNORD), shall elaborate the detailed information in this regards[/font][/color]
His email id's are appended herewith[/font][/color]
"Ram Prasad" ram.prasader10@gmail.com & povertyresearch@yahoo.in[/font][/color]
Hoping for a positive responce in the regard[/font][/color]
Kind Regards,[/font][/color]
Dharam Singh[/font]
[/font][/color]
इस के साथ ही धर्म सिंह बुटोला ने कल की मेल Date: Sunday, 23 December, 2012, 12:11 PM  नैनीडाँडियन शुद्ध या प्रतीकात्मक ? पर Young Uttarakhand - यंग उत्तराखंड ग्रुप में कमेन्ट किया[/font]
Jee Sir, Pranaaam,[/font][/color]
विज्ञान पर आधारित उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में औद्योगिक विकास के लिए १९६९ से प्रयास चल रहे हैं, लेकिन सभी जस का तस ही लगता है|[/font]
[/font][/color]
२००३ में राज्य को स्पेशल पैकेज मिलने के साथ ही, नए सिरे से इस विषय पर पुरजोर आजमाईश की जानी चाहिए थी, शायद इस बीच कुछ हो सकता था | २००३-२०१३ के दस वर्षों में उत्तराखंड, बाकी राज्यों से काफी आगे पहुँच चूका है, industrialisation भी चरम पर है, परन्तु पहाड़ी क्षेत्र के लिए तो TNORD की लेंस नुर्सरी ही काम कर सकती है |[/font]
[/font][/color]
(However I was born in 1968, and came to know about the TNORD, just a few weeks ago, and very strongly I realised it to be a necessity of Hill Area for the development of newly born state)[/font]
[/font][/color]
तंत्र-मन्त्र सब फूँक के देख लिए लगते है शायद(तंत्र=शासन मन्त्र=राजनेता), इसलिए वैज्ञानिक तौर-तरीके भी अपनाए जाने चाहिए थे, i.e. "catalytic reactions" is required now[/font]
[/font][/color]
शायद CATALYST की कमी रही होगी, उसकी खोज कर रहा हूँ, कौन सा CATALITC AGENT उपयुक्त रहेगा, यह पहचान नहीं हो पाई है अभी तक | मैं भी कोशिश कर रहा हूँ की कोई सटीक CATALYST मिले.[/font]
[/font][/color]
मैं समझता हूँ की अनजाने में ही सही, लेकिन कुछ कुछ मिलता जुलता "लेंस नर्सरी" की तर्ज पर ही यह काम हुआ है टिहरी मैं (UNIDO के सहयोग से यह कुछ कुछ मिलता जुलता है,) =>>>CLICK_THIS_LINK=>>>http://www.unidoicamt.org/Resources/SDP_Past_Programs/File1/17_File1_Training_Programme_on_cost_effective_building_component___technlogy_for_hill_region_Tehri_22-26_nov2010.pdf[/font]
United Nations Industrial Development Organisation(UNIDO), we can use this as a catalyst, in the direction to implement the TNORD project in Uttarakhand state,[/font][/color]
[/font][/color]
http://www.unidoicamt.org/Resources/SDP_Past_Programs/File1/17_File1_Training_Programme_on_cost_effe[/font]
www.unidoicamt.org[/font][/color]
[/font]
इस पत्र के जिस अंश को Narendra Singh Kharayat ने  Welfare Association of Uttarakhand. ग्रुप में  चिन्हित किया है वह है[/font]
शायद CATALYST की कमी रही होगी, उसकी खोज कर रहा हूँ, कौन सा CATALITC AGENT उपयुक्त रहेगा, यह पहचान नहीं हो पाई है अभी तक | मैं भी कोशिश कर रहा हूँ की कोई सटीक CATALYST मिले.[/font]
[/font]
उसी मेल पर  Manoj Rawat  ने Young Uttarakhand - यंग उत्तराखंड ग्रुप में टिप्पणी दी [/font]
well done nainidandian[/font][/color]
[/font]
उक्त पोस्टिंग में धर्म जी ने  UNIDO   बहुत अधिक महत्व दिया  है.   धर्म जी को शायद यह पता नही होगा कि  सी एस आइ ओ  चंडीगढ़ UNDP  तथा स्विस फाउंड़ेशन की सहायता से स्थापित हुआ था.  मैं सी एस आइ ओ चन्डीगढ़ में चुने जाने वाला पहला टेक्निकल कर्मचारी था. बाद में मैं उसके ऑपटिक्स डिवीज़न का हेड भी रहा.  डायरेक्टर से मनमुटाव हो जाने के कारण मुझे एन पी एल में ट्रांसफर कर  दिया गया था.  लेंस नर्सरी की कल्पना सोलन को सामने रख कर मेरे विभाग की सहायता करने वाले जर्मन और स्विस विशेषज्ञो द्वारा की गई थी. उनकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट पर ही आज कल धर्म जी काम कर रहे है. [/font]
[/font]
[/font]
राम प्रसाद[/font]

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Date: [/color]Saturda[/size][/color]Saturday [/size][/color], 2[/size][/color]2[/size][/color] December, 2012[/size][/color][/size]
[/color] [/size]
[size=0pt][/color]उत्तराखंड के विकास में बौद्धिक [/size][/color]नैनीडाँड़ियनों की भूमिका [/color][/size]
addressed to
[/color]सदस्य[/color], म्यर[/font][/color] उत्तराखंड[/font][/color], धुमाकोट[/font][/color]/[/color]नैनीडांडा[/color] तथा[/font][/color] इंटरनेट[/font][/color] पर[/font][/color] उपलब्ध[/font][/color] [/color]दूसरे[/color] उत्तराखंडी[/font][/color] ग्रुप[/font][/color]
 
कल की मेल
Friday, [/font]21 December, [/color]2012, [/color]6[/color]:16 AM  [/color]अब नैनीडाँड़ियनों के पास धर्म शक्ति भी आ गयी है पर डाक्टर बलबीर सिंह रावत ने अपनी पोस्टिंग में यह प्रतिक्रिया व्यक्त की
[/color]नैनीडाडियनो में निष्क्रियता लाना मेरा  उद्दयेश नहीं है। प्रतीक का मतलब है[/color], भात की हंडिया का एक दाना कि सारा भात पका हुआ है। जिस प्रकार सारे[/font]
[/color]नैनीडांडियन सक्रिय हैं उसी प्रकार सारे उत्तराखंडी भे सक्रिय हो रहे हैं[/color], और जिस प्रकार लेंस नर्सरी को आगे बढाने में  सक्रियता आ रही है  वेसे ही उत्तराखंड के हर क्षेत्र के औद्योगीकरण  [/font][/color]( [/color]मिनी, [/color]कुटीर[/color], लघु और मध्यम स्तर के[/font][/color][/color]के लिए भी जागृती आ रही है।
[/color]धर्म का अर्थ कर्तव्य है तो केवल नैनीडान्ड्डीयनो ही क्यों सभी विकास के लिए एक सी सोच रखने वाले धर्म शक्ति से सामर्थवान होते जा रहे हैं  इसी सकती के बूते हम सब मिल कर सत्ता के अधिकार प्राप्त नेताओं और अधिकारियों को एक नयी सोच[/color], एक नए नजरिये [/font][/color], एक नयी पहल [/font][/color], एक नए योजना तंत्र [/font][/color], एक नईं कार्यशैली [/font][/color], से अवगत करा सकते हैं जो धरातल से ऊपर को उठने की दिशा लेगी और जिसमे प्रदेश के नागरिक बढ़ चढ़ कर भागीदारी करेंगे।[/font]
[/color]दुसरे तरीके से वही बात कही गयी है की एकता में दम है और दम से ही एकता है। सारे दम दारो [/color][/color]लगाओ मिल कर दम            

जब रतनपुर विकास समिति ने लेंस निर्माण प्रशिक्षण एवं उत्पादन संस्थान क प्रस्ताव रखा था तब देश का सामजिक और राजनीतिक वातावरण दूसरा था.  सत्ता में बैठे  अधिकाँश  नेताओं का आधार उनका स्वतंत्रता संग्राम था.  शीत युद्ध चल रहा था. देश की अर्थ व्यवस्था पुराने औद्योगिकी घरानों के पास थी सूचना क्रांति धीरे धीरे अपने कदम आगे बढ़ा रही थी.  नये स्वतंत्र हुए देशों में फौजी ताकतों और प्रजातंत्री ताकतों का शीत चल रहा था.  अगर इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति न आती तो वातावरण दूसरा होता.  इस क्रांति से एक ओर तो जन  जागृति पनपी तो दूसरी और सत्ता पर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हावी हो गयी.  इस वातावरण में आज लेंस नर्सरी विकसित हो रही है.  आज रतनपुर विकास समिति का  स्थान नैनीडांडियनों ने ले लिया है. यह नैनीडाँडियन बौद्धिक नैनीडाँडियन  के रूप में परिभाषित हो रहे है. उन्हे ग्लोबल इंडियन कहलाए जाने का हक लेना है.  डाक्टर बलबीर सिंह रावत का उक्त कथन जन साधारण द्वारा समझी जाने वाली भाषा में इस बात का खुलासा कर रहे है.   
इस बात को अधिक गहराई से समझने के लिए हम  एक पुरानी मेल  का नीचे दिए जा रहे अंश को चर्चा मे ला सकते है.         
[/color]These mails have just noted visions developments. Whether it is vision 2020[/font][/color] or India@75[/font][/color] both belong to what in the corridors is described as eBusiness.  It is accepted without any hesitation.  Kochiyar Library looks around and notes developments world over in the area of eBusiness.  This Library is working to create the eBusiness of organizing the Team Kochiyar Library that will create the physical structure of Kochiyar Library.  Our focus in the ongoing Mails is the Prahalad Memorial Lecture in this area of eBusiness.  The Kochiyar Library is concerned about the other contribution of Prahalad that was highlighted by Sam Pitroda at the lecture that is the book The Fortune at the Bottom of the Pyramid.
 
टीम कोचियार लाइब्रेरी के गठन की बात हो रही थी.  जब कि नैनीडाँडा विकास संघ वैसा ही कुछ कर चुका था जैसा  कि आज कल धर्म सिंह बुटोला कर रहे  हैं.  नैनीडाँडा  विकास संध ज़मीनी नैनीडाँडिय़नों का प्रतिनिधित्व कर रहा है और दूसरी ओर  दूसरी ओर धर्म जी  बौद्धिक नैनीडाँडियनों का प्रतिनिधित्व कर रहे है.  धर्म जी ने जो सक्रिय रूप  लिया है उसे कोचियार लाइब्रेरी ने धर्म शक्ति का नाम दिया है.  डाक्टर रावत ने इस शक्ति को परम्परागत धर्म शक्ति से जोड़ कर उस काम का महत्व और बढ़ा दिया है. संभव है कि धर्म जी की इस सक्रियता से  नैनीडांडा विकास संघ इस दिशा मे निष्क्रिय न हो जाए.  धर्म जी ने मुख्य मंत्री के  ना म  पत्र भेज कर अपने काम और आगे बढ़ा दिया है.  यह बात उनके नीचे दिए जा रहे  पत्र से समझी जा सकती है.
On Fri, Dec 21[/font][/color], 2012[/font][/color] at 2:20[/font][/color] PM, Dharam Singh <butola10[/font][/color]@gmail.com> wrote:Adding : Chief Mnister -Uttarakhand StateKind Attention: Shri Vijay BahugunaRespected Sir, for your kind perusal please this is regarding implementation & setting up of Technological nurseries for rural industrialisation and entrepreneurship development in the state of UTTARAKHANDKind Regards,Dharam Singh
 
उन्होंने साथ ही  उन्होंने मालविका जी के को भी धन्यवाद दिया.  शब्द थे
Thanks to Malavika Chauhan- Executive Director, Himmotthan Society, Dehradun for her positive comments and her appreciations towards TNORD Project.
-[/font][/color]Kind Regards-
 
कोचियार लाइब्रेरी में साइंस काग्रेस की चर्चा हो चुकी है.  प्रवासी भारतीय दिवस उस के बाद आयोजित हो रहा है .  इस साल केरल में हो रहा है.  धर्म जी ने अपनी पहल में सबसे पहले साम पित्रोदा को पत्र भेजा.  साम पित्रोदा और कोचियार  लाइब्रेरी में उस समय से सम्बन्ध है जब वह पहली बार भारत आकार जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हुए. कोचियार लाइब्रेरी ने प्रह्लाद मेमोरियल लेक्चर में रुचि ली. वह प्रवासी भारतीय दिवस दिल्ली में हुआ था.  दिल्ली सरकार भागीदार थी. उसके बाद यही दिवस जयपुर में आयोजित हुआ.  उस में राजस्थान सरकार भागीदार थी. अगला दिवस केरल में आयोजित हो रहा है.  केरल सरकार भागीदार है. उत्तराखंड के प्रवासी भी अपना महत्व रखते है.  वहाँ के प्रवासी भी वही मूल्य रखते हैं जैसा मूल्य दूसरे राज्यों के प्रवासी रखते है.  पर यहाँ वह प्रवासी भी मूल्य रखते है जो कि विदेशों में नहीं देश में मौजूद है.  पर इस समय चर्चा में तो अगला प्रवासी भारतीय दिवस है .  इस की चर्चा शुरु करने और उसका मूल्य समझने के लिए आज की खबर बिना किसी टिप्पणी के ज्यों की त्यों  नीचे दी जा रही है ताकि स्वतंत्र रूप में चर्चा हो सके 
Special Kerala session at Pravasi Bharatiya DivasThiruvananthapuram, Dec 21 : [/font][/color]Kerala Minister for the Diaspora K.C. Joseph Friday informed the Kerala assembly that the 11[/font][/color]th Pravasi Bharatiya Divas (PBD) will have a special session to discuss issues concerning people from the state.“The PBD is being held at Kochi Jan 7-9. [/font][/color]The first day will see an exclusive Kerala session, in which Minister for Overseas Indian Affairs Vayalar Ravi and Kerala Chief Minister Oommen Chandy will participate,” Joseph said.Joseph spoke in response to a calling attention moved by CPI-M legislator K.V. Abdul Khader.“Normally the PBD sees the participation of the cash rich diaspora. With Kerala having more than four million non-resident Keralites, it is only natural that the Kerala diaspora gets a chance to attend the meet and raise genuine needs. The delegate fee for the Kerala session is Rs.1,000[/font][/color],” Khader told .This is the first time that the PBD is being held in the state. Prime Minister Manmohan Singh will inaugurate this annual flagship event Jan 8. [/font][/color]President Pranab Mukherjee will deliver the valedictory address Jan 9[/font][/color] and also confer the Pravasi Bhartiya Samman Awards.“We consider the Kerala diaspora to be the backbone of the Kerala economy for a few decades now and the latest statistics reveal that this year alone they have brought in Rs.55,000[/font][/color] crore to the Kerala banks. We have the highest regard for the diaspora,” Joseph said.He also pointed out that there are several long standing demands of the Kerala diaspora which, include avoidance of “fleecing” by Air India, a request for posting Malayalee officials in the Middle East embassies, and providing support in handling legal issues faced by the Kerala diaspora in the Middle-East.           
     
राम प्रसाद

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Date: Sunday, 6 January, 2013, 4:49 AM
 बात मुद्दों और सुझाओं की नहीं धन-व्यवस्ता या प्लानिंग की है
 
addressed to
 सदस्य, म्यर उत्तराखंड, धुमाकोट/नैनीडांडा तथा इंटरनेट पर उपलब्ध दूसरे उत्तराखंडी ग्रुप
लगता है कि  समाज सेवी भार्गव चंदोला   मेल Date: Saturday, 5January, 2013, 4:48 AM नेहरू जी चूके नहीं न ही डाक्टर भक्त दर्शन का गहराई से अध्ययन नहीं कर पाये नहीं तो उन्होंने  उस मेल  पर वह टिप्पणी न की होती जो  Akhand Uttarakhand ग्रुप में व्यक्त की गयी है . यह टिप्पणी है   Uttrakhand Key DOORGAMI VIKAS KEY Liye JAROORI HAI... KIUTTRAKHAND KI 670 Nyay Panchayat's main SARKAR BANAYE ESI Town Ship Jismey ek Hi Compound Main School,Hospital,Bank,Sports,Technical & Higher Education,Shoping & Local Product MOUL,Small Industries,Employee Resident,Boys&Girls Hostel,Road &Transport Connectivity HO. Uttrakhand sey PLAYAN Bhi rukega, Doctor, Teacher Rukengey aur sampurn Uttrakhand Ka Vidhiwat Vikas hoga.Agar aap sabhi chahtey hain Uttrakhand ka sampurn Vikas Tow Jaroor Karen Paryas.Regard,
 Bhargava Chandola (Samajsevi,RTI Activist & Pol.)
 Dehradun.
If you want any suggestion pl. call me.  9411155139
 वह न्याय पंचायतों की बात कर रहे हैं.  न्याय पंचायत संगठन विकास के मामले में उदासीन रह सकता है.  न्याय का  क्षेत्र तो सीमित है. सामजिक  बराबरी का है.  धार्मिक बराबरी का है.  पर न्याय तो उस काम पर भी होना चाहिए जिस पर समाज की सम्पन्नता टिकी है.  न्याय पंचायत ऊपर से संसाधन पाती है. उसका सम्बन्ध बहुत पुराना है.  राजा के अस्तित्व से जुड़ा है.  धर्म के अस्तित्व से जुड़ा है. इन अस्तित्वों का भी विकास होता रहा है.  पर साथ में सम्पन्नता का भी. जो उन्हीं समाजो में आयी जिन समाजों ने विज्ञान और टेक्नोलौजी पर ध्यान दिया और प्रगति की.  इन्हीं समाजों का विस्तार हुआ.  सामंतवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद और जनतंत्र जैसी व्यवस्थाओं का  क्रमबद्ध एतिहासिक विकास हुआ.  बौद्धिक स्तर का लगातार उसी क्रमबद्ध ढंग पर विकास होता गया. पर इस क्षेत्र का विकास कुछ लोगों के प्रति असमानता लाता गया और साथ ही साथ राज व्यवस्था जटिल हो गई. इस बात को आगे समझने के लिए चर्चा का विषय  होना चाहिए बात मुद्दों और सुझाओं की नहीं है.  बात है धन यवस्था या प्लानिंग की .  इस सन्दर्भ में Date: Mon ,  10   Dec 2012 क्या उत्तराखंड में समावेश प्रोग्राम जैसी कोई चीज है?   नीचे  उद्धृत  अंश पर  दोबारा नज़र डालना ज़रूरी है.ई बिजनेस है. डाक्टर रावत उत्तराखंड विकास कोष की स्थापना करना चाहते है.  आई बिजनेसी सुझाव है.  प्लानिंग कमीशन भी तो एक प्रकार का विकास कोष ही है.  इस ने बहुत कुछ किया भी है और बहुत कुछ नहीं किया है.  ज़रूरत है उस काम पर ध्यान देने की जो ई बिजनेस नही कर पाया है और जिसे करने के लिए नई रणनीति चाहिए. इस बात को समझने के लिए ही तो कोचियार लाइब्रेरी लेनिन रायल सोसायटी एफेक्ट,रूज़वेल्ट विनीवर एफेक्ट और नेहरू भटनागर इफेक्ट की बात करती आई है.  इन तीनों इफेक्टों का रहस्य विज्ञान के लिए अतिरिक्त बजट का प्रावधान है.  बात वही है जो डाक्टर रावत कह रहे हैं.  डाक्टर रावत ई क्षेत्र में अपनी बात कह रहे पर इन इफेक्टों के इतिहास  में आई क्षेत्र में धन जुटाया गया था. सोविएत संघ में वह धन गरीबी हटाने के लिए इस्तेमाल किया गया था.  अमेरिका में रक्षा के लिए उसी रंणनीति का इस्तेमाल किया गया था.  भारत में गरीबी हटाने के लिए व्यवस्था की गयी थी.  पर उसने दूसरी राह ले ली थी.  उसे सुधारने के लिए लेंस नर्सरी प्रोजेक्ट को आगे लाया गया.  इस प्रयोग के द्वारा सुधार प्लानिंग प्रक्रिया में लाया जाना.  यह काम जमीनी स्तर से उपर की ओर ले जाया जाना है.  लेंस नर्सरी प्रोजेक्ट को राज्य की योजना में लाया जाना सबसे पहला काम है.  इस के लिए नैनीडान्डियनों में जागरूकता लानी ज़रूरी है.
 कल की मेल पर ही जो प्रतिक्रियाएं आई उनमें से एक  वह है जो धर्म सिंह बुटोला  in Myor Uttarakhand ग्रुप में की है इस में ओशो को चर्चा में लाया गया है.  कहा गया है Awareness is not good for this society.This society exists on unawareness......A child is more aware. Watch a child -- full of energy, fresh, aware, open, alert. But we teach him something else. The society does not want awareness. Awareness is dangerous for this so-called society, because the society is ill and this society has investments in unconsciousness.If people are aware, then what will happen to the industry which goes on producing cigarettes? What-will happen to the industry which goes on producing alcohol? What will happen to the industry which goes on exploiting people's *uality and their *ual desire? What will happen to the politicians? What will happen to the priests? They all exist because you are unconscious. They all can exploit you because you are unconscious.If a society becomes more alert, that society will live a rebellion; it will live in revolution. Not that it will make a revolution, because the whole thing of making a revolution is nonsense. Revolution is not a thing that you can do and be finished with. Revolution is a way of life; it is a process. You cannot do it and be finished with it. You live so awarely that you live in rebellion.Awareness is not good for this society. This society exists on unawareness.~~~OSHO~~~
ओशो पहले भी कोचियार लाइब्रेरी में आ चुके है .  मेल The Kochiyar Library is the seed for the Institute of iBusiness Date: Wednesday, 7 July, 2010, 7:58 AM की शुरुआत में कहा गया था The mail Do Non Resident Uttarakhandis too deserve minus points?  Date: Tuesday, 6 July, 2010, 7:11 AMconsidered  the limitations of the arguments and suggestions of  PG Group mail from Dhyani H M dhyanihm@... Date: Saturday, 3 July, 2010, 12:49 PMand reaction of Sumit Kainthola skainthola@...  Date: Monday, 5 July, 2010, 10:06 AM.  This mail  went back to the mail:  The eBusiness of the Third Man and the problems of the Third World .  Date: Friday, 7 May, 2010, 9:48 AM to quote   the parallel interpretation of arguments in the following words of  Osho:  In a democracy you cannot change the status quo, you cannot change the class-divided society into a classless society.The dictatorship of the proletariat is not an ordinary dictatorship of an Adolf Hitler or Benito Mussolini. It is a dictatorship of the poor, the have-nots. Unless the have-nots have the power, they cannot stop the exploitation by the rich.
 In a democracy it is almost impossible for the poor to have the power for the simple reason that the rich people have enough money to fight elections, enough money even to buy the poor and their votes, enough money to buy the politicians. It is impossible in a democracy for the poor to have power, and without power there is no possibility of changing the society. Hence, Karl Marx proposed the idea of a dictatorship of the proletariat.
 The mail then argued:
In large bodies like the world, global India , India , there are vast spaces of darkness where the light of any discussion can not reach.  This is why the Dhumakot Sangliya Mails are using the dialectics of zooming down the space to Dhumakot Sangliya  to know things clearly in a limited space in the limelight of global knowledge and then zooming up the space to the Global India and the world as a whole.
इस  भूमिका के बाद इस मेल में  धर्म सिंह बुटोला की (Bedupako.Com) में दी गई टिप्पणी को चर्चा में लाया जा सकता हैडॉ रावत ठीक कह रहे है, "यह झुनझुनाती नईं विज्ञान नीति कोलकाता से तो चल पड़ी पर मेरे गाँव तक नहीं पहुँच पायेगी।"क्यों की लोग जाग्रत नहीं होना चाहते, होने की तो बात छोड़ो इस दिशा में उनकी सोच भी बिलकुल बंद है |ठीक इसी तरह से लोग लेंस नर्सरी के बारे मैं भी नहीं जानते,और न ही जानना चाह रहे हैं, और तमन्ना रखते हैं की कोई जादू की पुडिया मिल जाये जिससे एक दम सब कुछ हो जाये,बस सिर्फ बटन दबाना हो जाये इनके लिए |ये साइंस कांग्रेस का झुनझुना लेकर कुछ और भी झुनझुने बनाये हैं सरकार ने | i.e. e-Panchayat=>>>click>>>http://pri-resources.in/InstitutionalSearch/stateInstitution.php?stateID=dAवर्ल्ड साइंस कांग्रेस में अपनी धाक ज़माने के लिए, ऐसे झुनझुने तैयार किये गये हैं UNDP के साथ मिलकर, ताकि वर्ल्ड बैंक से पैसे लिया जा सके|लेकिन ये ग्राम प्रधान, ये ग्राम सभाएं क्या वाकई मैं कुछ जानते हैं e-Panchayat के बारे मैं |Apex Institure in the Rural Development & Panchayati Raj Sector(उत्तराखंड शासन)Mission & Vision
 =========
•To examine and analyze the factors contributing to the improvement of economic and social well being of people in rural areas on a sustainable basis with focus on rural poor and other disadvantaged groups through research, action research and consultancy efforts.•To facilitate the rural development efforts with particular emphasis and focus on the rural poor by improving the knowledge, skills and attitudes of rural development officials and non-officials through organising training, workshops and seminars.•To develop competent human resource for rural governance and perform as a Centre of Excellence in the field of for the Rural Development Branch by assisting the department in developing good governance and management of rural areas.UIRD trainings are also arranged in collaboration with the Uttarakhand Academy of Administration, Nainital, Uttarakhand Forest Training Academy, Haldwani (Nainital), National Institute of Rural Development, Hyderabad and Extension Training Centres, Uttarakhand. The training strategies primarily rely upon identification of training need followed by designing of training modules, implementation and evaluation.>>> click>>>to know about URID>>http://www.uird.in/
समस्या का समाधान भी धर्म जी दूसरी पोस्टिंग में दे रहे है .  वह कहते हैयही तो लेंस नर्सरी का आधारभूत ढांचा है |(मेरे विचार से)लेकिन ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत या ऐसे ही दुसरे लोग जैसे हमारे राजनेता, हमारे समाजसेवी क्या जानते ऐसे प्रोग्रामों के बारे मैं |कैसे संचालित होंगे यह, क्या खासियत है इन प्रोग्राम्स की,क्या प्रयोजन है इनका, कौन बताएगा लोगों को |हमारे MLA या MP , या सरकारी नौकरशाह , क्या जिम्मेदारी है इनकी |लोग तो फसेबूकी हो गए हैं, पर अपना फेस छुपा लेते हैं ऐसे मुद्दों पर |पता नहीं क्यों कोई भी क्यों जानना नहीं चाहता है लेंस नर्सरी के बारे में, फेसबुक के बारे में तो नहीं बताया इनको किसी सरकार ने ?फिर कैसे कर लेते हैं फेसबुक का इतना प्रयोग ?अभीप्सा, लगाव, जरूरत और समझ यही तो चाहिए न किसी बात या क्रिया को प्रचलन में लाने के लिए |अपने अधिकारों को ही नहीं समझना चाहते हैं लोग(प्यारे उत्तराखंडी)उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र का औद्योगिक विकास, कैसे होगा, यह जानने के लिए पहले लेंस नर्सरी को समझना होगाराजनीति को विज्ञान के धरातल पर उतर कर चलना होगा |तभी जनता जागरूक हो सकेगी, अन्यथा बहुत मुश्किल है |
विकास का क्षेत्र औद्योगिकीकरण पर सीमित करना ज़रूरी है.  इसी के द्वारा उन लोगों को काम मिलता है जिन्हें धरती संभाल नहीं पा रही है. इस के लिए नया ज्ञान सृजित किया जाता है तो उसका उपयोग पुरानी उत्पादक व्यवस्था के नवीनीकरण में किया जाता है.  बहुत सा काम खुद हो जाता है क्योंकि सोये हुए लोग जाग जाते हैं और कुछ न कुछ करने लगते है.  नकारात्मक कार्यों को सकारात्मक बनाने के लिए रिसर्च और डेवेलपमेंट होता है और विकास क्रम रास्ता पाता जाता है. राम प्रसाद 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 Date: Friday, 4 January, 2013, 4:55 AM

 आई झुनझुनाती हुई नई विज्ञान नीति 2013 

 

addressed to

सदस्य, म्यर उत्तराखंड, धुमाकोट/नैनीडांडा तथा इंटरनेट पर उपलब्ध दूसरे उत्तराखंडी ग्रुप

 

कोलकाता में राष्ट्रपति ने साइंस कांग्रेस का उद्घाटन किया. प्रधान मंत्री ने जनरल प्रेजीडेंट के रूप में भाषण दिया.  इस अवसर पर झुनझुनाती हुई विज्ञान नीति २०१३ भी आ पंहुची.  भारत के ई मस्तिष्क की सामग्री का एक भाग प्रकट हो गया.  दूसरा भाग प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर प्रकट होगा.  ई मस्तिष्क के दो भाग है.  एक भाग में राष्ट्रपति के पद  का निवास है.  दूसरे भाग में प्रधान मंत्री का पद रहता है. समाचार कहता है

पहली बार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुरुवार को यहां विज्ञान कांग्रेस में 'भारत के भविष्य का निर्माण करने में विज्ञान' विषय पर एक सत्र की अध्यक्षता की। विज्ञान कांग्रेस का यह सौवां आयोजन है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार सुबह इसका उद्घाटन किया। पांच दिवसीय समारोह में छह नोबेल पुरस्कार विजेता, 60 विदेशी वैज्ञानिक और 15 हजार प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं।

 

भारतीय विज्ञान कांग्रेस में प्रधानमंत्री के  संबोधन का आरम्भ इस प्रकार हुआ

भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन के जनरल राष्ट्रपति के रूप में, यह मेरे लिए महान सम्मान हमारे मुख्य अतिथि, भारत के माननीय राष्ट्रपति, श्री प्रणव मुखर्जी का स्वागत करते है हमारे राष्ट्रपति के एक प्रतिष्ठित राजनेता है. उनकी बुद्धि, ज्ञान और जनता के विशाल अनुभव जीवन महान राष्ट्रीय संपत्ति हैं मैं भी दिग्गज, चिकित्सकों, नीति और विज्ञान के उपासक हैं, जो एक साथ आ गए आज भारतीय विज्ञान कांग्रेस के शताब्दी मनाने की आकाशगंगा का स्वागत करते हैं.

 

भारत के ई मस्तिष्क के प्रधान मंत्री कक्ष से आवाज आई

एक समग्र संगठनात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है. एक समय था जब विज्ञान एक अकेला सड़क, सामूहिक प्रयास के बजाय व्यक्तिगत उद्यम द्वारा संचालित लिया. यह है कि विकास की प्रक्रिया आज अधिकार है नवाचार और ज्ञान गहन दुनिया में उप इष्टतम है. हम विषयों और हितधारकों के बीच तालमेल के पार निषेचन की जरूरत है. सरकार प्रायोजित अनुसंधान निजी प्रयोगशालाओं में अनुसंधान से पूरक होना चाहिए. शैक्षणिक और अनुसंधान प्रणाली नवाचार और उद्यमशीलता को बढ़ावा और इसलिए वाणिज्यिक विकास में रुचि रखने वालों के साथ लिंक होना चाहिए.

 

अनुवाद कम्प्यूटरी है इस लिए साथ साथ इसी अंश का अंग्रेजी भाग भी देख लेना ठीक होगा. वह है

a holistic organizational approach is essential. There was a time when science took a lonely road, driven by individual enterprise rather than collective effort. This is sub-optimal in the innovation and knowledge-intensive world that is empowering the growth process today. We need cross-fertilization of disciplines and synergy among stakeholders. Government-sponsored research must be supplemented by research in private labs. Academic and research systems must foster innovation and entrepreneurship and therefore link up with those interested in commercial development.

 

इस आवाज के साथ ही ई मस्तिष्क के प्रधान मंत्री कक्ष ने स्वीकार किया

इस कांग्रेस के विषय के साथ ध्यान में रखते हुए, सवाल क्या हम विज्ञान के माध्यम से हमारे भविष्य का निर्माण करना चाहिए के रूप में स्वाभाविक रूप से उठता है? मैं कुछ विचारों को साझा करने के लिए करना चाहते हैं.

सबसे पहले, हम एक समाज के रूप में, क्या जवाहर लाल नेहरू वैज्ञानिक सोच के रूप में वर्णन के प्रसार को बढ़ाने चाहिए. हमारी युवा पीढ़ी एक विज्ञान आधारित मूल्य प्रणाली को अपनाने क्रम में विज्ञान क्या पेशकश है और खोए  समय के लिए कर सकते हैं लाभ के लिए करना चाहिए.

जो अंग्रेजी में इस प्रकार था

In keeping with the theme of this Congress, the question naturally arises as to what we should do to build our future through science? I would like to share a few ideas.

First, we must, as a society, enhance the spread of what Jawaharlal Nehru used to describe as the scientific temper. Our younger generations must adopt a science-based value-system in order to benefit from what science can offer and to make up for lost time.

 

प्रधान मंत्री ने इस अवसर पर खोये समय का जिक्र किया.  खोये समय में भी कुछ होता है .  उसके उपयोग के लिए आइ बिजनेस को आगे लाना होता है.  यह काम कोचियार लाइब्रेरी कर रही है.  आइ बिजनेस अभी तक ई क्षेत्रों में नहीं पंहुचा है. इसलिए इस दिशा में सरकारी मस्तिष्क का खालीपन स्वाभाविक है.  फिर भी उसकी झलक तो नीचे दिए जा रहे हिंदी और अंगरेजी में साथ साथ दिए जा रहे  अंश में मौजूद है.

हम विज्ञान के उपकरणों का दोहन करने के लिए वंचितों की जरूरतों को पूरा करने के लिए और करने के लिए अमीर और वंचितों के बीच खाई पाटने के लिए प्रयास करना चाहिए.

हमारे लोगों की लगभग 65 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं. उनके जीवन स्तर में वृद्धि कृषि उत्पादन और उत्पादकता के विकास पर काफी निर्भर करता है. बारहवीं पंचवर्षीय योजना मानता है कि प्रतिवर्ष 4 प्रतिशत की दर से एक हमारी कृषि के सतत विकास के हमारे देश के लिए खाद्य सुरक्षा की उपलब्धि के लिए आवश्यक है. इस विकास के पानी की और भी जमीन की कमी से विवश है. हम खेती के पानी की बचत प्रौद्योगिकियों में नई सफलताओं, भूमि और जलवायु लचीला किस्मों की उत्पादकता विकास की वृद्धि की जरूरत है. कृषि की इस परिवर्तन की सर्वोच्च प्राथमिकता हमारे विज्ञान और प्रौद्योगिकी की नीतियों सहित सार्वजनिक नीतियों, चिंता का विषय होना चाहिए

Since technological changes typically emanate from established structures, they may at times re-inforce them and inhibit the advancement of equity and equality. As India seeks a sustained growth of its national income, we must endeavour to harness the tools of science to cater to the needs of the underprivileged and to bridge the gap between the haves and the have-nots.

Nearly 65 percent of our people live in rural areas. The increase in their living standards depends greatly on the growth of agricultural production and productivity. The Twelfth Five Year Plan assumes that a sustained growth of our agriculture at the rate of 4 percent per annum is essential for the achievement of food security for our country. This growth is constrained by shortages of water and also of land. We need new breakthroughs in water-saving technologies of cultivation, enhancement of land productivity and development of climate-resilient varieties. This transformation of agriculture must be the top priority concern of our public policies, including science and technology policies     

 

नेहरू जी का अपना थिंक टैंक था वह था असोसिएशन ऑफ साइंटिफिक वर्कर्स ऑफ इंडिया. इसका जिक्र कोचियार लाइब्रेरी कर रही है.ग्लोबलाइजेशन के युग में यह होना ही था. साइंस कांग्रेस कोलकाता में हो रही है. इस लिए मेघनाद साहा का प्रकाश में आना भी स्वभाविक है.  कोचियार लाइब्रेरी इस समय सक्रिय है. बार बार याद दिला रही है कि क्या होना चाहिए.  इस लिए फिलहाल इस चर्चा को मेल Friday, 22 July 2011 7:36 AM  Professor Anderson knows a lot about Nehru Bhatnagar Effect के अंतिम भाग से समाप्त किया जा रहा है

Professor Anderson’s book Nucleus and Nation: Scientists, International Networks, and Power in India is a monumental book which has been widely reviewed. Among them is the review by the Indo American Prof. Umesh Garg, Physics Department, 211 Nieuwland Science Hall  University of Notre Dame Notre Dame, IN 46556USA Ph:  +1.574.631.7352 Fax: +1.574.631.5952,  whose mail  Umesh.Garg.1@...  Friday, 8 July 2011 5:50 AM on the subject  Physics Today Review is reproduced below:

I think I received one set of e-mails and because I was not fully aware of the context, it was difficult for me to fully understand the topic of discussion.

It is apparent, though, that many projects in India do not come to timely fruition because of non-scientific considerations--petty politics, personality conflicts, ego,

desire to grab all credit.... Not that such considerations do not play a role elsewhere, but it does appear that we manage to get bogged down more often and in a more serious way.

On the other hand, since I have never worked in India, I suppose it is not quite fair for me to make any comments about science in India--I truly do not know the milieu in which most scientists have to work.

 Professor Anderson was covering a field not covered anywhere in the formal academic literature and he had to seek clarifications from me as the following Mail: more about ASWI and CSIR SWA (4) Tue, 1 Jul 2008 06:01:24 +0530 (IST) indicates:

Modified next two paragraphs

3.  Dr M N Saha suspended  further expansion of the membership of his Association but did not dissolve it.  He was not sure if the new association would come up,  This was perhaps because the India was going to become independent and Nehru would not find time to look after it as the President.  Further the executive committee represented  several scientists belonging to the part of the country that would become Pakistan.

4.  But Nehru gave time to the Association.  The main task was to finalise the constitution for ratification at the  Patna Science Congress.  Things went well and the Association of Scientific Workers became funtional.  Saha's Association continued to run parallel.

5.  At the Patna Science Congress the first general assembly of ASWI was held.  Some of the executive members belonging to the Pakistani part were no longer members of ASWI.  The General Assembly Chose a new President in Major General S S Sokhey but the General Secretaries were reelected.  New members of the executive were elected and the organisation began to function.  To overview things in Delhi a body under Dr K S Krishnan began to work.

The strategy  that is being developed in these Mails has the capability of tackling poverty any where throughout the globe because Kochiyar Library, Lens Project, the real Uttarakhand Government, two UANAs and Uttarayani, Bhishma Pundits, Team Kochiyar Library are symbols to define the role of science to tackle the mass poverty.

   

राम प्रसाद

 

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