Author Topic: Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख  (Read 1484100 times)

Bhishma Kukreti

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Mangament Guru -40
प्रबंध शास्त्री - 40     

               

                              रिचर्ड टेन्नर पास्कल : प्रबन्धन मा बद्लौ ,चपलता अर जटिलता 

                    Ruchard Tanner  Pascale: Master of change, Agile and Complexity in Management     



 Notes on General management Guru, , Notes on Managemnt Thinkers and Bright Management Practices,

Management Gurus, Marketing management Guru, Qaulity Mangement Guru, Operation Managemnt Guru,

Human Resourse Development Management Guru, )


                                               Bhishm Kukreti                       


             
           रिचर्ड टेन्नर  पास्कल कु जनम  १९३८ मा ह्व़े. रिचर्ड की पढे हार्वर्ड वि.वि  मा ह्व़े . रिचर्ड टेन्नर पास्कल न होंडा क अध्ययन से जापानी प्रबंधन की खास विशेषताओं

क बयार दे .



                             जापानी प्रबंधन क सात S    
   

१- रणनीति (Strategy )

२-बुणोट (Structure )

३-रीति/पद्धति (System )

४- तरीका/भौण (Style )

५- बुद्धि/कौंळ (Skill )

६-कामकाजी (Staff )

७- मूल्य/लक्ष्य (Superordinate Goals )



                                  अनेकार्यता अर अस्पष्ट परिस्थिति

         
             रिचर्ड टेन्नर पास्कल न बोली बल प्रबन्धकुं तैं अस्पष्ट अर अनेकारी परिस्थित्युं दगड सामना करण पोडद अर

यू परिस्थित्युं से तर्क अर भावनात्मक स्तर पर निर्णय ल़ीण इ पड़दन



                             चपलता

१- संस्थान मा प्रतिश्पर्धा क बान चपलता जरूरी च. 

२-चपलता संस्थान मा रौंद ना की संस्थानौ काम मा

३- संस्थान मा  शक्ति, पछ्याणक , विरोध/स्पर्धा अर सिखणो आपस मा समन्वय होण चएंद

४-  संस्थान मा रणनीति  क संकल्प / इच्छा अर चपलता  संस्थान का सिधांत/नियम, मूल्य अर आचरण पर निर्भर करद

५- चपलता संस्थान क खास संस्था गत सिधान्तु पर निर्भर करद



                         जटिलता, अव्यवस्था अर जाणी द्याओ


रिचर्ड टेन्नर पास्कल न प्रबंधन मा जटिलता अर अव्यवस्था से कन सामना करे जन चएंद पर स्पस्ट सिधांत दुनिया क समणी

धरेन                       

                      Books by Richard Tanner Pasclae


1- Managing on the Edge: How Successful Companies Use Conflict to Staye Ahead,1990

2-The Art Of Japanese Managemegt ( With Anthony Athos) , 1982




Management Guru का बारा मा फड़कि -41 मा बाँचो

 

Management Guru, management Thinkers Series to be continued.......

Copyright @ Bhishm Kukreti

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Mangament Guru -41
प्रबंध शास्त्री - 41

                       

                         टॉम पीटर्स : सिरमौरी इन्तजामौ/ श्रेष्ठ  प्रबंधन को  जणगरु   

                                                         

                      Tom Peters : The Guru as Performer                         



 

(Notes on General management Guru, , Notes on Managemnt Thinkers and Bright Management Practices,


Management Gurus, Marketing management Guru, Qaulity Mangement Guru, Operation Managemnt Guru,

Human Resourse Development Management Guru, )


                                Bhishm Kukreti

१९४२ मा जनम्युं, स्टेनफोर्ड  कु पीएच.डी.,  मैक केन्सी  भागीदार,  टॉम पीटर को नाम प्रबंध विज्ञान मा सबसे जादा एकी किताब

'इन सर्च ऑफ़ एक्सेलेंस (बोब वाटरमैन क  दगड ) बान जादा लिए जान्द हालाँकि वैक द सर्कल ऑफ़ इन्नोवेसन बि उठ्गा इ महत्वपूर्ण च


                         इन सर्च ऑफ़ एक्सेलेंट का आठ सिद्धांत

१- सिरमौरी/श्रेष्ठ  कम्पनी अपण संस्थान मा लाल फीताशाही  तैं जगा नि दीन्दी

२- सिरमौरी /श्रेष्ठ कम्पनी गाह्कुं  भौत नजीक रौंदी 

३-मनिखों से उत्पादकता बढ़ाण मा विश्वास करदी

४-सिरमौरी/श्रेष्ठ कम्पन्युं   मा इंटरप्रिनियुवर शिप पर जोर हुंद अर इंटरप्रिनुइय्रर सुचन मा स्वतंत्र होन्दन

५-सामूहिक मूल्यों पर जोर

६-कोर बिजिनेस पर ध्यान

७- सिरमौरी संस्थान मा प्रशासन जटिल नि होंद बल्कण मा सरल होंद

८- सिरमौरी/श्रेष्ठ कम्प्न्युं म लचीलापन होंद


                              इन्नोवेसन  सर्कल

 नव निर्माण पर बि पीटर का भौत इ बढिया सिद्धांत बताये छं


                         पीटर एक कामयाब Vyas/वक्ता


अपण सिधान्तुं तैं जगा जगा पसराणो (प्रसारित)  बान टॉम पीटर्स  तैं भौत स कोंफेरेंसुं मा भाग ल़ीण 

पोडद अर आज पीटर्स दुनया का सबसे बढिया वक्ताओं मा मने जान्द जो स्टेज से दर्शकुं तैं आकर्षित  करण मा उस्ताद च



                      Books by Tom Peters



1- Thriving on Chaos:  Handbook for a Management Revolution,1989

2- Liberation Management, 1994

3-The TomPeter Seminars, 1994

4-The Persuit of Wow: Everybody guides to Topsy Turvey Times, 1997

5-The Circle of Innovation: You cant sink Your Way to greatness , 1997

6-In Search of Excellence: Lessions from America's Best run Companies, (with Bob Waterman) 1995

7-Passion for Excellence: The Leadership difference, 1986




Management Guru का बारा मा फड़कि -42 मा बाँचो

 

Management Guru, management Thinkers Series to be continued.......

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Humour/Satire

हौंस हौंस मा चबोड़
!

                                         भितर-ग्वडै (सुहाग रात ) की कथा

                   
                         भीष्म कुकरेती



                  म्यार दगडा क दड्या, दोस्त अपण भितर-ग्वडै याने सुहाग रातै कथा रस ल़े लेकी सुणान्दन.

ये मेरी भीना ! दगड़यों भितर ग्वडे क कथा मा उन्माद, राति, आवेग, मद, रोमांच उलार

क्या क्या नि होंद, ज्यू बुल्यांद सरा राती दगड्यों क भितर-ग्वडै कथा बार बार सुणणु रौंउ . अर

जब मेरी पांति (बारी ) भितर-ग्वडै कथा सुणाणो आन्द त मी ऐं बें देखिक बात टाळी दींदु.

                     गढवाळ मा भितर-ग्वडै शब्द द्वी जगा प्रयोग होंद एक जब कै तैं अड़ाणो बान भितर गव्वाड़ी क मर्चुं

धुंआं दिए जान्द या जब सुहाग रातौ बान मर्द अर जनानी तैं भितर ग्व़ाडे जान्द . ठीक इ शब्द च भितर ग्वडै'

द्वी इ घटनों मा कै ना कै तैं अडये जांद. उन अमतौर पर भितर ग्वडै क प्रयोग तब जादा होंद जब

कै द्यूर तैं रंडोळ भौज क दगड ब्याओ बान गां गौळ की रजामंदी से भितर ग्वडे जांद.

               अब जब म्यार ब्यौ होई त भितर-ग्वडै नामक सांस्कृतिक रसम बि उनि ह्व़े जन की हौर रसम को निभाण

जख मा ब्योला-ब्योली तैं क्वी मौका इ नि मील की दुयूं मादे कैकी बि चलि जाव

          उन मीन मुबई का अपण सबि सुहाग रात ना हनी मून विशेषग्य दगड्यों से पक्की ट्रेनिंग बि ल्याई . हमर टैम

पर हनी मूनौ बान क्वी फौर्मल ट्रेनिंग स्कूल नि छ्या ना ही इन्टरनेट की क्वी खबर छे त अनुभवी दगड्यों

की मौ मदद इ मानदंड छौ.

            अब जब ब्यौ गां मा होलू त बथाणो जरूरत नी च बल भितर -ग्वडे नाम को सांस्कृतिक रसम बि पवित्र हिमालय

क खुकली याने हिमालय की गोद मा ह्व़े. हौरुं खुणि हनी-मूनौ बान हिमाला जाण एक रति, श्रृंगारिक भाव वाचक

घटना होंदी होली मेखुणि भितर -ग्वडे हिमाला मा मनाण एक मजबूरी छे. हमर टैम पर हनी-मून भैर मनाण संस्कृति भंजक

मनिखों काम छौ अर मी अर म्यार ड़्यार वाळ अबि तलक निसयेंदु गरु (असह्य बोझ) संस्कृति तैं मुंड मा उठाण मा प्राउड फील

करदन. त इन बुले सक्यांद म्यरो भितर -ग्वडे की पवाण गां मा लग याने मधुचंद्र की शुरुवात हिमाला की गोद मा ह्व़े .

अब जब हम बम्बई बिटेन गां जयां छ्या त यो बि जरोरी च गां मा खूब झर फर से जीमण जामण होली. आज बि अर तैबरी बि

गां मा इन समजे जांद बल बम्बै मा गढ़वाळी रूप्या हगदन. त म्यार ब्यौ मा गां वाळ से जादा भैराक पौण छ्या. अब म्यार बुबा जी

         बम्बै का प्रवासी छ्या त मतबल बम्बै का सेठ छ्या. अर जब तथाकथित बम्बै क सेठौ नौनो ब्यौ ह्वाऊ त पौणु/मेमानुं मा लकड ददा,

पकड़ ददा , झड़ ददा , पड़ ददा से लेकी अपण ब्व़े-बाबौ क रिस्तेदारुं तैं न्यूत दीण जरूरी छौ. निथर कैन मनण थौ बल म्यार बुबा जी बम्बै रौंदन.

             उन बात बि सै च हम मुबई वाळ बौंबै मा क्वी जीमण जामण कै फाईब स्टार होटल मा कौरी बि द्योंला त क्या ह्व़े गे . अरे जख टाटा, बाटा

बिरला , अम्बानी समोदर मा क्रूज या याट मा जीमण-जामण करदा ह्वावन उख फाईब स्टार होटल की क्या बिसात ! त

हम बौंबै वल़ा इख बॉम्बे मा त कुछ दिखाई नि सकदवां त हम बौंबै वल़ा गां मा औकात से जादा खूब झर फर करदवाँ अब चाहे झर फर

दिखाण मा धौणि इ टूटी जाव धौं पण झर फर करण जरूरी च.

            त जब बरात बौड्याइ होई त वैदीन भितर -ग्व्ड़े (सुहाग रात) क सुचण इनी छौ जन बुल्यां बिरळऔ औंर खुज्याण या

तिमलौ फूल खुज्याण. गां मा कै बि मौ क इक तिल धरणे जगा नि छे बचीं त ब्योला क इख त जगा क क्या बुन ! त

वै दिन सौरी! वीं रात मून हनी नि ह्व़े बल्कण मा मून (मेरी ब्योली) पौणु/मेमानु पिपड़करू मा दिख्याई इ नी च

               दुसर दिन द्वी चार इन पौण हमर घौर से इलै बिदा ह्वेन जौंक कूड इखुली जगा मा छौ निथर स्ब्युंन अपण बेटी क सौं घटीन

बल कूड गां से भैर नि होंद च त गौ बुरी चीज वो जांदा.

त पौण दिवता जन (अतिथि देवो भव ) क वजै से दुसरी रात बि हनी मून की

           रसम रिवाज या रिचुअल अनसीन सरकमस्टांसेज से ना डिसाइडेड डिसीजन क तहत पोस्टपोन्ड करे गे.

                  पण जन गढ़वाळ मा जन आपदा-प्रबंधन/ डिजास्टर मनेजमेंट च इनी हमर इख आपदा प्रबंधन की बैठक ह्व़े . राति बारा बजी

 कुछुं तैं याद ऐ बल अरे जांक बान यू इथगा ताम झाम (याने बारात आदि ) ह्व़े बल वांको त कुछ ह्वाई नी च. अर जकता सगती (आनन फानन)

मा म्यरो भितर ग्वडे क इंतजाम करे गे.

                    ब्योली हनी मून को बान नी पुळयाई/खुस ह्वाई बल्कण मा इलै पुळयाई बल हनी-मून को सुख

मीलो या नी मीलो दस बाई दस की कोठड़ी मा जख दस जनानी छया , वै गैस चेम्बर से निजात त मीलली.उ त भलो

छौ बल सबि जनान्युं न इक्सनी खाणक खयूँ छौ जां से सब्युन्क मानव जनित नेचुरल गैस को फ्लेवर एकी छौ. हाँ ! गैस प्रोडक्सन

हॉउस को आउटलेट से जब गैस भैर दुनया मा कदम धरदी छे त अलग अलग आवाज मा , बिगळी बिगळी भौण मा गैस खुसी जतांदी छे.

या सैत च गैस अपण आणो खबर अवाज गाडीक दीणी छे . गैस प्रोडक्सन आउटलेट से पैदा हूण वळी ख़ास आवाज छे

ठुस-ठुस , फुस-फुस , प्वां प्वां . प्वीं, प्वीं, , पर्र -पर्र , पूर्र, पुर्र अर भ्वां, भ्वां ...

             अब जो काम जकता-सगती मा ह्व्वाऊ उखमा विधि विधान , पूर्व नियोजित काम को क्या काम ? म्यार लयां

काजू, किसमिस, छ्वारा बदाम अर फाईब स्टार की चौकलेट, परफ्यूम्स, टेप रिकौर्डर म्यार सूटकेस जोग इ रै गेन. भितर -ग्वडे या सुहाग राति कुणी

दूध को इंतजाम सिरफ़ फिल्मुं मा ही होंद. हम गढ़वाळी फोर्मलिटी मा विश्वास नी करदां . अरे जब अस्कदी/ आशाबंद/प्रिगनेंट

जनानी तैं दूध नी दिए जांद छौ बल्कण जै कौम मा सदियों से बाड़ी, झंग्वर अलुण गरम पाणी मा खाणो दिए जान्द छौ

वीं कौम मा भितर-ग्वडे मा दूध सेवन की बात घड़ये/सुचे इ नी सकेंद .

             हम दुयूं ब्योल़ा-ब्योली तैं कुछ कुछ अद्बिज्यां हालात मा एक कुठड़ी मा धकये ग्याई. अदरातिक डिजास्टर मनेजमेंट

क हिसाब से यें कुठड़ी से बढिया कुठड़ी आज की रात त मिली नी सकदी .असल मा डिजास्टर मनेजमेंट न मेरो भितर -ग्वडे

क प्रोग्राम इ तब बणाइ जब अदा राति मा कै तैं खयाल आई बल या कुठड़ी भौत बडी गलती से खाली रै गे अर पौण बिहीन च

.               अर गां क एक बुड्या जी (जु डिजास्टर मनेजमेंट का सदस्य बि छया) न रस लेकी, दांत कीटिक, द्वी ऊँठूँ तैं मिलैकी इन अवाज गाड

जन बुल्यां बुड्या जी न खटो लिम्बू खैइ होलू , मी तैं बताई बल यीं कुठड़ी से एक फ़ायदा च बल कुठड़ी गां क छ्वाड़/किनारों

पर च त उफंदरी/उत्पाती बच्चों क क्वी डौर नी च, अर चूंकि कुठड़ी क बगल मा गौं क गुदनड़/ गुज्यर ( ओपन ट्वाइलेट) च

त डिस्टरबेंस की क्वी गुन्जैस बि नी च. निथर अजकालौ बच्चा त ...

             भितर ग्वडे से पैलि बुड्या जी न हिदैत दे बल कुठड़ी की खिड़की नी खुलण किलैकि गुदनड़ बिटेन गंध ऐ सकदी .

अर मेरी ब्योली तैं बाटो दिखाण वळी बुडड़ी जी न ब्वाल बल रात कैं बि हालत मा द्वार खुली नी रखण , कुज्याण गुलदार/

ढीराग/बाग़, धिराग चिनखों बान इखी पुण लुक्युं ह्व्वाव त ?

             जब हम ब्योला-ब्योली कुठड़ी भितर ह्व़े गेंवां त बुड्डी जी न द्वार बन्द करदा ब्वाल "ह्यां सांकळ/ कुण्डी लगै दियां

नव्हां बाग़...' अर मीन पैल काम कार द्वारौ सांकळ ठीक से लगाई.

                          मैं तैं पता इ नी छौ की हमर स्वागत का वास्ता यीं कुठड़ी मा ख़ास बन्दोबस्त च . एक चिमनी छे ज्वा सैन/संकेत

करणि छे बल बस कुच्छ इ देर की मेमन होली किलैकि चिमनी क तेल खतम होण इ वाळ छौ अर सैत च डिजास्टर मनेजमेंट वाल़ून

सोची होलू की चिमनी कखी हनी मून मा डिस्टरबेन्स कारली त वूंन चिमनी क तेल की चिंता इ नि कार.

                मीन फिल्मुं मा कथगा द्फैं देखी छौ (अर म्यार दगड्यों न बि बतै छौ) बल गरीब से गरीब की

भितर-ग्वडे/सुहाग रात/हनी मून मा एक चौरस/चौडो, बड़ो भारी पलंग होंद, पलंग मा गुलाब का फूल होन्दन,

पलंग का चर्री तरफ फूलों झालर होन्दन आदि आदि . पण मेरो भितर-ग्वडे मा पलंग नी छौ . एक ग्वाठ मा को

झिल्लू खटला छौ. हिंदी फिलमुं मा मीन देखी छौ बल गरीब से गरीब की सुहाग रातौ पलंग मा साफ़, सुन्दर ,

गदगदो गद्दा होंद, अर गद्दा मा होंद एक रेशमी चादर . पण इख त झिलो खटला मा एक टल्लयुंन बण्यु

क्वी चीज-बस्तर छे जो गदेला क याद दिलाणो छौ. इन मा चदरो उमेद करणो मतबल बौळयापन/पागलपन.

              फिल्मुं मा मीन देखी छौ कि गरीब से गरीब की सुहाग राति क पलंग मा द्वी सुफेद साफ़ सुथरा हृदय का चित्रुं से

 चित्रित/ एम्ब्र्वाइडेड द्वी तकिया होन्दन. इख मेरो भितर -ग्वडे मा तकिया त नी छ्या पण हाँ सिरवणी/तकिया जगा एक पुराणो

खप्युं-खुप्युं जोळ/पाटा कु टुकड़ा बुलणोक/ तथाकथित गदेली क तौळ जाणि बूजिक धर्युं छौ कि लुकयुं छौ यि त भगवान इ जाण धौं !.

                     मी तैं म्यार दगड्यों न बि बथै थौ अर मीन फिल्मुं मा बि देखी छौ कि गाँव हो या शहर , गरीब होऊ या अमीर

ब्योला/बर पलंग मा बैठ्यु रौंद अर जनि ब्योली मधु-चन्द्र/हनी मून कक्ष मा भितर छिरकदी /प्रवेश करदी त ब्योला उठिक

सने-सने, धीरे-धीरे ब्योली तैं दर्वज बिटेन पलंग का तरफ लांद अर ब्योली तैं बड़ो उलार, जतन, प्रेम, उमंग,हर्स,

रोमांच , चपलता,लड्योण (लाड प्यार) से पलंग मा बिठान्द . मी येही मकसद से खटला मा झम से बैठु अर मेरी ब्योली क समज

 मा बि आई गे छौ कि मी कै मकसद से खटला मा बैठणु छौ त वा खड़ी राई कि मी (ब्योला) खटला से उठल़ू

अर वीं तैं लौलु. पण जनी मी झम से खटला मा बैठूं कि जन बुल्यां सरा कुठड़ी मा भ्युंचळ या प्रलय ऐ गे होलू.

खटला तौळ बखर-ढयबरों का चिनखों चिल्लाहट शुरू ह्व़े अर फिर हुर्स्या-हुरसी/देखादेखी /नकल मा कुठड़ी का

सबि चिनखा-चिनखी चिल्लाण लगी गेन अर मेरी ब्योली डौरन किराई अर लतडक, ढम से खटला मा

गिरी गे. मेरो जु सुच्युं छौ वो मीम इ रै गे. अर भैर थ्वडा दूर बिटेन बुडड़ी क आवाज आई "ये नर्भाग्युं ! इन बि क्या च !

सबर त कारो . सरा रात तुमारि इ च." सैत च अबि बुड्डी गौळ बि नि लांगी ह्वेली . अबि तलक हम दुयूंन मधु-चन्द्र क

रौंस मा देखी नि छौ कि कुठड़ी मा हौर बि जीवन छन. अब हम दुयूं न चिमनी क पिंगल़ो उज्यळ मा कुठड़ी क

भितर हेर/हयार/द्याख त हनी -मून क बीच मा ज्वा रस्म होण छौ वो रस्म पैलि होण बिसे गे

याने कि हम दुयूं क रंग बदरंग/वैवर्णय/चेंज ऑफ़ कलर ह्व़े गे. हनी-मून श्रृंगार रस को एक ज्वलंत

उदहारण च अर श्रृंगार रस प्राप्ति मा मुखौ रंग बदरंग/वैवर्णय/चेंज ऑफ़ कलर होई जांद पण हमारो मुखौ

रंग बदरंग संयोग- श्रृंगार रस प्राप्ति से नि ह्वेई बल्कण मा यि देखिक ह्वाई की हमारो भितर-ग्वडे/मधुचंद्र/सुहाग रात/हनी-मून

क गवाह बारा तेरा बखर-ढयबरों का चिनखा छया, चारेक त पांच छै या दस बार दिन का होला अर सब्बी फुच्ची छ्या कुछ खटला तौळ

छया बकै इन उना कूण्यों जोग छ्या . अब इ सीन त महमूद या राजेन्द्र नाथ की फिल्मुं मा बि नि द्याखी छौ त इन सीन

की कल्पना म्यार हनी-मून ट्रेनर दगड्यों न क्या करण छौ ! सबि शहरी छ्या. मेरी समज मा नि आई की इन परिस्थिति

मा हनी-मून को अगलो कदम क्या होण चयेंद .

                     मी तैं या मेरी ब्योली तैं अफिक अगला कदम उठाणे मेनत करणे जरूरत इ नि पोड़.हम दुयूं क कदम असमानों

तरफ जाण लगी गेन. हम द्वी खटला मा बैठी छ्या पण खटला इथगा झिल्लो छौ कि हम दुयूं क पश्च भाग जमीन से

चिपटा चिपटी करण मा अपण अहोभाग्य समजणा छया अर दुयुंक चर्री टंगड़ा अस्मान मा कुठड़ी क बौळी , बलिँडों तैं

लौंफ्याणो एक हैंको दगड छौम्पा दौड़ी करण मा अग्ल्यारी ल़ीणा छया. म्यार दगड्यों न मी तैं अड़ाइ छौ बल हनी-मून

कि राति कन ब्योली तैं पलंग मा बिठाये जांद अर फिर लड्योड़ (लाड -प्यार से ), प्रेम से कनो बात अगनै बढ़ये जांद पण

इख बैठण इ कठण छौ त दगड्यों सिखयूँ सौब भेळ जोग क्या गुदनड़ जोग इ ह्वेई .

                अर हाँ दगडड्यों न ख़ास बोली थौ बल द्वी तीन किस्मौ इतर/परफ्यूम जरुर ल़ी जै. जब ब्योली कम्ररा मा आली त वां से

इतर/परफ्यूम कमरा मा खासकर पलंग मा जरुर छिड़क दे सब्युंक बुलण थौ बल परफ्यूम कि सुगंध सुहाग रात तैं रंगीन बणाण मा

चमचों से बि जादा सहायक होन्दन. दगड्यों न ज्ञान बढ़े छौ बल इतर-परफ्यूम्स से जनानी जात मर्दों से आकर्षित जल्दी होंद.

अब क्या बुलण इतर परफ्यूम्स त सूटकेश मा इ रै गे छौ. पण कुठड़ी मा गंध सुगंध कि क्वी भौंकी कमी नि छे उलटं

इन गंध ना त ब्योली न सूंगी छे ना इ मीन. चिनखों बकर्वळ की अलग इ गंध छे अर चिनखों मूत की चिराण एकजोटिक छे

कि उत्तेजक छे यां पर तीस साल ह्व़े गेन हम द्वी झणो मा एकमत नि ह्व़े सौक. हाँ एक बात छे कि चिनखों चिराण

हुर्सेणि/ चिरडाणि जरुर छे बल गां मा याने हिमाला-क-खुकली (गोद) मा हनी-मून मनाण मा कुछ त नै गंध मीलली ई.

उनां चिमनी कैबरी बुजी जाओ यांकी बि फिकर छे . किलैकि दगड्यों बतयीं कथगा ई रस्म अबि बाकी छे .अर हरेक

रस्म प्रकाश मा हूण जरुरी छे

        अब जन कि बैठीक एक हैंका दगड प्रेम से छ्वीं लगाण से सुहाग रात की शुरुवात करणे बात त असम्भव ही ह्व़े गे छे . किलैकि

 जन क़ि पैलि बथाई याल बल झिल्लो खटला मा बैठण कठण ई ना असम्भव ई छौ. त दोस्तों क बतायूँ अग्वाड़ी को स्टेप कि बारी छे.

अगलो स्टेप मा हम द्वी नव विवाहित्यूं तैं पलंग मा दूर दूर पोड़ण छौ , संगीत लगाण छौ अर फिर धीरे धीरे इके कैरिक

 प्रेम ग्रन्थ का पन्ना पढ़ण थौ. जख तक संगीत को सवाल थौ मी एक पॉकेट टेपरिकौर्डर लेकी बि अयूं छौ अर द्वी तीन प्रेम से

 छळबळ/लबालब भर्याँ गाणो टेप बि लै छौ जु सूटकेश मा इ झुल्लों, इतर आदि तैं गाणा सुणाणा होला . उन हमर

 हनी-मून रूम मा म्युजिक कि क्वी कमी नि छे. चिनख बनि बनि (तरह-तरह) कि आवाज से वातावरण तैं

संगीतमय बणाणे कोशिश करणा इ छया . बाकी जो कमी रईं छे जन कि सितार जन स्ट्रिंग म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट

की त सितार की कमी तैं पुरा करण मा झांझु/मच्छरों न कुठड़ी मा सौब जगा अलग अलग सैकड़ों कन्सर्ट की कछेडी

लगाण शुरू करी याल छे. इन लगणो छौ बल जन बुल्यां झांझु/ मच्छरों हरेक झुण्ड मा संगीत की क्वी आल इंडिया कम्पीटीसन

चलणि ह्वाऊ .

सुहाग राति क अगला स्टेप क अलावा अब कवी हौरी स्टेप हम निभै नि सकदा छ्या त हम दुई खटला मा पोड़ी गेवां.

                     दोस्तुं न दस दें रटाई छौ बल पलंग मा द्वी झणो तैं दूर दूर छ्वाड़/किनारा पर पड़न/लेटना चएंद . अर फिर धीरे धीरे

ब्योली-ब्योला/दुल्हा-दुल्हन तैं एक हैंको नजीक आण चयेंद. ये दौरान श्रृंगार रस का भौत सी रीति निभाण छौ जन कि

एक हैंका कि घर द्वार की बात पुछण, हौब्बीज कि जानकारी हासिल करण, एक हैंको शारीर से छेड़खानी करण ,

चुहुलबाजी, दुल्हा तैं दुल्हन की मन माफिक बात करण आदि दसियों रस्म छे जु मै तैं अर ब्योली तैं पड़याँ- पड़याँ

निभाण छे. आकर्षण पैदा करणों वास्ता दूल्हा याने मी तैं रति विषयक, हास सम्बन्धी, रोमांच बढ़ाण वळ छ्वीं या करतब,

चपल सम्वाद , आवेग आदि क रसम निभाण छे फिर धीरे धीरे कौरिक एक हैंको नजीक आण छौ अर संयोग श्रृंगार

 को अंतिम पडाव से पैलि घंटो तक स्यूं झुल्लों क एक हैंकाक गात/ शरीर से चिपक्युं रौण थौ.

हाँ त जब हम खटला मा दूर दूर पड़णो खातिर खटला मा पोड़वां त दूर दूर हूणो जगा हम एक हैंका

क नजीक इ नि आणा बल्कण मा एक हैन्काक अळग पोड़णे कोशिश करण बिसे गेवां. अर हम या एक

हैंकाक अळग पोड़णे कोशिश क्वी प्रेमातीत आकर्षण का कारण नी करणा करना छ्या , या अफिक

जोर नी लगाणा छ्या बल्कि झिल्लो खटला क कारण गुरुत्वाकर्षण का बसीभूत ह्वेका हम दूल्हा-दुल्हन

एक हैंकाक अळग पोड़णा छ्या. दगड्यों हिसाबन भितरग्वडे मा एक हैंकाक गात/बदन पर चिपटण त

संयोग श्रृंगार क्रिया से थोडा पैलाकी क्रिया छे पण जै हो झूलेलाल नुमा खटोला की जैन विधियुं क स्टेपुं

मा इथगा उलटफेर करै दे. खैर हम फिर बि बचणा छया कि गात/बदन चिपकणो क्रिया से दूर इ रौवां पण

खटला क झिलोपन जन्मित गुर्त्वाकर्षण हमारी कोशिश पर भारी पोड़नू छौ .

                      दोस्त अर रतियुगीन कवियुं जन कि विहारी क कवितौं क असीम कृपा से मी तैं ज्ञान छौ बल

भितर ग्वडे मा चुनगी दीण या दान्तुं न खास खास शरीरो  भाग जन कि ऊंठ, गल्वडों पर दांत

चुभाण भितर-ग्वडे विधान क एक प्रमुख क्रिया-प्रतिक्रया होंद. भगवान् की असीम कृपा अर डिजास्टर मनेजमेंट

की हपड़ -दपड़ मा लियुं आपातकालीय पर समयगत निर्णय की कृपा से हम दुयूं तैं दांत बि नि खुलण पोडेन

अर हम द्वी झणो तैं भितर ग्वडे जन एक दैवीय दत प्रक्रिया मा एक हैंका पर चुनगी दीणे जरोरत इ नि पोड़.

चुनगी अर दांत कटणो काम पैल त झांझुं न बखूबी निभाई अर बाकी थकी जु कमी बेसी रयिं बि छे

वो उप्पनो न कार्य संपादन कार. प्रेम मा या श्रृंगार रस मा एक भाव होंद जै तैं असूया या जळण, ईर्ष्या, इनवे

बुले जान्द बि उत्पन होंद. हम द्वी झणो तैं झांझ/मच्छरूं अर उप्पनूं से डाह हूण, ईर्ष्या होण लाजमी छौ की यि सौब

बगैर हम तैं पुछ्याँ ओ काम करणा छन जो हमन करण छौ. झांझुं न अर उप्पनू न हम दुयूं तैं इन इन जगा काट जौं

जगा की बात ना त म्यार दगड्यों न बथै छयी ना ही रतिकालीन कै कवि न इन जगों कल्पना करे छे.

                       अब दोस्तुं क बताईं एकी बात बकै रईं छे अर वा छे कि दूल्हा दुल्हन की भुक्की प्याओ याने चुम्मा ल्याओ याने

ब्राइडग्रूम शुड टेक किस ऑफ़ ब्राइड . फिर दुल्हा तैं दुल्हन तैं इनकरेज करण चयेंद बल वा बि किस्सिंग मा शामिल

ह्व़े जाओ. पण चिनखो न सैत च रत्यां कबि मनिख नि देखी छ्या अर वो प्रेमाभूत ह्वेका मेरी दुल्हन का खुट अर मुंड

चाटण लगी गेन. दुल्हन याने नौली ब्योली तैं झिड़झिड़ी लग अर मै तैं भौत क्या भौत जादा इ बुरु लग बल मेरो इ

समणी क्वी मेरी ब्योली तैं चाटणु च. बस हमारो सुहाग रात मनाणो कार्यक्रम रद्द करण पोड़.

हम द्वी इ उठा अर चुपचाप उखी ऐ गेवां जख हम पैल सीणे छंवां.

               त हमारो भितर-ग्वडे/मधुचंद्र/ सुहाग-रात याने हनो-मून हिमाला क खुकली मा नि सम्पन ह्व़े.

क्या !             आप जणण चाँदवां की फिर हमन हनी-मून कख मनाई ? द्याखो म्यार बूड-खूड बताई गेन बल

इन बात कै तैं नि बताये जान्द बल. हनी-मून बिलकुल व्यक्तिगत बात होंद त ये सांस्कृतिक कार्यक्रम

तैं सार्वजानिक नि करण चएंद.



Copyright@ म्यार गौं क एक चिचा जौंक दगड यो डिजास्टर अछेकी ह्व़े छौ

Garhwali satire, Garhwali humour, Gadhwali wits to be continued.......


 

Bhishma Kukreti

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Humor/Satire /Wits 

चबोड़ इ चबोड़ मा


                                   फूफू क मोछ होंद त वा काका /चचा होंदी

 

                                  If Queen Had Moustaches  She Would Have Been King

 

                                                            भीष्म कुकरेती

 

                           हाँ , हम जादातर इन होंदो त, तन होंदो त, इफ्स अर बट्स, अगर, मगर, मा भगवान से बि बिंडी विश्वास करदवां.बुलद दें इन कबि नि ह्वाऊ बल हम 'इन ह्व़े जांदू त आहा कथगा भलु होंद, . आहा ! तन ह्व़े जान्द त वैकी मवसी घाम लगी

जान्द या तिकी मवासी बसी जांदी' जन वाक्य नि बवालों. फूफू क मोछ होंद त वा काका होंदी या राणी क मोछ होंद त वीन इ राजा बणण छौ हमारी संस्कृति बौणि गे.

                         अब द्याखो ना सी पोरुक सालो त छ्वीं छन जख मा फुफ क मोछ होंडा त पर बबल ह्व़े गे. . मूसी काकी क कूड छयाणो छौ. त जन कि गां मा घर्या अर्थशास्त्रीय  रिवाज च, या क्या च धौं पण ओड अर हौरी चिणे दारूं खुणि  सुबेरो नक्वळ/नास्ता, दिनौ खाणक, दिन मा चार बजे चा अर द्वी रुट्टी अर स्याम दें  खाणक दीण इ पड़दो.अर ह्व़े साको त कूड़ो काम पुरो हूण पर बखरू मारे जाव त भलो. 

 

                 अब वै दिन क्या ह्वाई बल दुफरा मा मूसी काकी ओडु तैं रूस्वड़ मा खाणक दीणि छे. चौंळ अपणो  स्यारक का छ्या .पण कुज्याण भै कुज्याण धौं कैको दाग लग धौं !  ए मेरी ब्व़े !  भात गिल्लू इ रैगे. इथगा मा मूसी काकीन ओडू तैं सुणेक ब्वाल," इ राम दा !  जरा पाणि कम  पड़दो त भात न गिल्लू नि होण छौ ". कै बि ओड न बोल बल मूसी काकी बुलणि च बल फूफुक दाड़ी- मोछ  होंद त फूफू काका ह्व़े जांदी.    अब कुटुमदरी क बात च, कूड चिण्याणो फिकर च एक दिन भात गिल्लू ह्व़े बि गे त क्या ह्वाई. अर कैबरी चौंळ बि मनिखों दगड रैकि अपण  प्रकृति बदली दीन्दन . एक मैना पैली  वी चौंळ कम  पाणी खान्दन पण एकी मैना उपरान्त दल बदलू नेतौं तरां  अपणी प्रकृति बदली दीन्दन अर वी चौंळ पाणी बिंडी /जादा  खाण बिसे जान्दन . त कबि भात गिल्लू अर कबि भात क्वर्री या कड़कड़ो  रै जांद. चौंळ छन त इन ह्वेई जांद . त वै दिन चौंळ  गिल्ला रै गेन. बात आई गाई ह्व़े गे. ना त ओडून कुछ ब्वाल ना ही पैथारां  कै कुकरो न कुछ ब्वाल जौं तैं बि वी  गिल्लू भात दिए गे.

 

                   अर ए भै वै दिन बि काण्ड लगी  गेन. अब दुसर दिन बि मूसी काकी  इ रसोई मा छे. घौर की गुस्याण छे त परम्परा से मूसी काकी कु  इ हक बणदो छौ बल भगवान जन  मेमानु खुणि वा दुफरौ खाणक बणाउ अर सौंरु(परोसना)  बि , . भात वै दिन बि गिल्लू रै गे. 'मेरी फूफुक मोछ होंद त वा काका होंदी ' जन मानसिकता की असली बेटी , असली 'मेरी फूफुक मोछ होंद त वा काका होंदी ' मानसिकता की असली सम्वाहक मूसी काकीन आदतन फिर ब्वाल बल , इ राम दां! कन भुलमार ह्व़े धौं ! आज फिर मीन पाणि जादा डाळी त क्या सुन्दर चौंळ !  फिर गिल्लू रै गेन ". बात त नियाय निसाब की इ छे. पण ओड दयाल़ू दादा  बि कम नि छौ. अपण अडगै/क्षेत्र को बीरबल च, बड़ो चबोड्या च, वैक छ्वीं  सूणीक सांक मा धर्युं मुर्दा बि हंसण बिसे जांद.   . दयलु  दादा न  चखन्यौ  मा बोली दे , '   अहा ! ये काकी  जु त्यार मोछ होंद त कसम से तीन म्यार काका लगण छौ अर काकी तीन बि हमर दगड ओड ब णण छौ.". जैन   जु समजण छौ वैन वी बींग. आज बी बात आई गाई ह्व़े गे.

 

                  पण  जब जोग इ ग्वरकटा ह्व्वान त भेमाता  बी क्या कारली ! जब निहूणी लिखीं ह्वाओ त हुणत्यरी डाळी पर कूरी त लागलि इ. तिसर दिन बी मूसी काकी न खाणक  दींद दें पाई बल आज बि भात गिल्लू इ रै गे त झटाक से मूसी काकीन ब्वाल, " ये कनो बिजोग पोड़ीन मेरी यूँ हथकुळयूँ.  पर  आज बि चौंळऊँ  मा पाणी  जादा पोड़ी गे. जरा पाणी  कम ह्व़े जान्द त भात न फरफरु होण थौ.  उंह ! बुरळ पोड़ीन यूँ हथ्युं मा जौन जादा पाणी डाळी दे.". बिचारी मूसी काकी ओडु  तैं खुस करणों बान अपण हथुं  तै इ गाळी दीण बिसे गे . पण दयलु काका बि कम नि छौ वैन बोली दे, बोली  क्या जरा जोर से इ ब्वाल, हे ! काकी! हाँ तौं  हथुं  पर लुचड़ त पड़यूँ इ च, द्वी मुठी चौंळ हौरी डाळी बि दीन्दी  त ऊँ सटयूँ दबलोँ  न खाली नि  होण छौ."  अर ये म्यार भुम्या ! वै दिन त गिल्लो  भातौ  बात सारा गां मा सौरी (फैली) गे.

 

         अब सरा गां मा ह्व़े 'फूफू क मोछ लगाणे बात अर फूफू तैं काका बणाणे'  बात पर . भुन्दरा ज्योरू  न ब्वाल, " ए ब्वारी !  तू जरा भात देर तक पकांदी त भात न गिल्लू नि होण छौ." 

        त भामा ब्यारी न नातो मा  सासु लगदी मूसी काकी तैं समजाई, "  ए जी! जु तुम आगि झौळ तेज करदा त मी सौं घौटिक   बोल्दु बल भातन कबि बि गिल्लू नि होण   थौ.".

       उमर मा चालीस साल छुटि  कमला न बोली, " ए ददि  ! जु तू पक्युं भात तैं औंध मा धरदी त कबि बि भातन गिल्लू नि रौ ण छौ. ". 

      त कमला क बौ बिमला न पैथर किलै रौण छौ अर ब्वाल, " ए जी ! जु तुमर फूलटि   क  मुंड्याळ चोदु होंद त भातन गिल्लू नि होण छौ."   

  इनी स्याम दें तक बीसेक जानना 'जु इन होंद त तन ह्व़े जांद', 'जु उन करे जान्द त तने ह्व़े जांद ', जु वा बात वैबरी नि होंद त तन कत्तई नि होण छे   ......  याने की सौब   'फूफू क मोछ, ज्वांग, दाड़ी  होंद त फूफू काका होंदी 'क सलाह मूसी काकी तैं देकी ऐ गेन.

पण कैन इन नि सोची बल जब क्वादु चून बौणी जांद त फिर 'जु इन होंद  त तन ह्व़े जांद' , 'जु उन होंद त उन्नी ह्व़े जान्द ' जन बात कौरिक क्या फैदा !  पण हम त 'जु फूफू क जोंग-दाड़ी  होंद त फूफू काका ह्व़े जांदी ' सिद्धांत  का च्याला/चेली  छं वां  त हमन इनी बुलण.

 

         इन नी  च बल या परबिरती हमारी इ ह्वाऊ. या परबिरती हम तैं राष्ट्रीय अर अंतर्राष्ट्रीय थौळ/स्थान/स्तर पर दिखणो मिल्द .   

 

      अच्काल टी. वी चैनलूं क भरमार ह्व़े गे त कामौ  क्रिकेट कमेंटेटरूं क अकाळ पड़णो इ छौ. त कत्ति टी.वी चेनलूं मा ओ कमेन्टटेटर बि छन जौन  रणजी ट्रोफी मा कबि  बि सेंचरी बणे होली धौं पण सचिन की बल्लेबाजी पर कमेन्टरि इन करदन ," जु सचिन  अपण  बल्ला तैं एक बाई दस इंच तौळ रखदु  त शर्तिया सचिन न आउट नि होण छौ.". कति कमेंटेटर इन बि छन जौन  बारा टेस्ट खेलीन  अर बारों दें शून्य पर अर और ह्वेन , आट दें पाँच रन से जादा नि टपी सकीन वो राहुल द्रबिड , सहवाग, लक्ष्मण आदि की बैटिंग  पर इन बुल्दन , " जु राहुल अपण  फीट बलेंस पर ध्यान दीन्दा  त द्रबिड न पिचासी रन पर आउट नि होण छौ. जु द्रबिड जरा  अपण दै खुटक फिफन /एडी तैं आधा मिलीमीटर अळग  रखद अर बाएँ  खुटक पंजों तैं आधा सूत इ उठान्दो त  द्रबिड न कबि बि आउट नि होण छौ. सहवाग जु अपण मुंड तैं बाएँ ना दै घुमांद त सहवाग न आउट नि होण छौ..."

   सबी क्रिकेट कमेन्टटेटर मूसी काकी क तरां ' फूफू क जोंग हुँदा त फूफू काका होंदी' मा विश्वास करदन.   

      उनि चुनाव क विश्लेषण मा हूंद . विश्लेषक बुल्दन , " जु लालू यादव वै दिन  टी.वी चनेलूं कैमराक समणि  बाजरो रुट्टी नि खांदो अर जुंडल़ो रूटळ खांदो  त शर्तिया लालू यादव न चुनौ जीत जाण छौ किलैकि जुंडळ प्रेमी वोटर बाजरो रुट्टी देखिक भड़की गेन.

 फिर क्वी विश्लेषक बोल्दु, "  जु वै दिन सोनिया गाँधी चुनाव रैली मा नीलो रंग को दुपट्टा नि पैरदी अर हौर रंग को दुपट्टा पैरदी त मुसल्मानु  न कोंग्रेस तैं भोट दीण छौ. जु लाल कृष्ण अडवानी राम नामी च्वाल़ा पैरिक अयोध्या मन्दिर नि जांदा अर हनुमान का च्वाल़ा  पैरदा त भाजपा तैं इथगा बड़ो नुकसान नि होंण छौ . हनुमान भक्त अडवानी क राम भक्ति से चिरडे गेन अर उन मुलायम सिंग तैं वोट डे द्याई."   

 

                      मोडर्न कमेन्टटेटर , आधुनिक चुनावी विश्लेषक बि मूसी काकी क तरां 'इफ क्वींस  हैड मोस्टेचो सही वुड हैव बीन किंग' या 'फूफुक ज्वांग होंद वा काका होंदी ' जन जुमलों गुलाम छौंवां. इफ अर बट्स, अगर, जु, यदि , ऐसा होता तो तैसा हो जटा जन वाक्यों का हम अभ्यस्त ह्व़े गेवां . अर जु, अगर, यदि, इफ  का चक्कर  मा  मूसी काकिक भात ना त फरफरू पकी सकदो ., ना ही जु, अगर, यदि, इफ का फेर मा लालू यादव चुनाव जीति सकदो  अर ना ही जु, इन, इफ, यदि क कारण सौवीं सेंचरी ब णे सकदो . इफ, जु, यदि सौब फोकट की बात छन . 

               

Garhwali Satire, Garhwali Humour, Garhwali Wits to be continued ...

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Mangament Guru -42

प्रबंध शास्त्री - 42

                              माइकल पोर्टर : ब्यापार अर कम्पन्युं  मा रण नीति क विचारक

                         

                                  Machael Porter : The Guru to tell What is Strategy



(Notes on General management Guru, , Notes on Managemnt Thinkers and Bright Management Practices,


Management Gurus, Marketing management Guru, Qaulity Mangement Guru, Operation Managemnt Guru,
 
Human Resourse Development Management Guru, )


                                        Bhishm Kukreti

   माइकल पोर्टर क जनम अमेरिका मा  १९४७ मा ह्व़े. प्रबंधन की पढे हार्वर्ड मा ह्व़े. पोर्टर की अपणी कंसलटेंसी  कम्पनी च. जब सन १९८०  मा माइकल पोर्टर की किताब ' Competitiv Stretigy ' छप त माइकल पोर्टर को नाम ब्यौपार अर प्रबंधन रण  नीति करों मा ह्वेई.

 पोर्टर की किताबुं मा कति सिद्धांत मिल्दन जन की

१- द्वी तरां ब्यापारिक काम : अ- प्राथमिक काम :  जु कच्चो माल तैं बदलिक नयो माल म बदल्दन  ब- द्वितीयक काम : खरीदी, मानव संसाधन, इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि

२- पांच शक्ति :

कम्प्न्युं तैं यूँ तीन बथों पर ध्यान दीण चयेंद

          अ- लागत का नेता

          ब- वैशिष्ठय  का नेता

          स- ध्यान

 पाँच शक्ति  छन जु कम्प्न्युं तैं प्रभावित करदन 

          क- ग्राहकुं  शक्ति ज्वा कीमत अर मार्जिन तैं प्रभावित करदी

           ख- सप्लायरूं ताक्ग्त

           ग- बजार मा नकल की तागत

           घ- प्रतिस्प्रधियूँ / प्रतियोगीयूँ तागत

          ज्ञं  - बजार मा नै प्रवेशार्थी

३- देश का चार कोण जु कम्पन्युं तैं नेता बणान्दन

१- राष्ट्रीय वौधिक, श्रम शक्ति अर इन्फ्रास्ट्रक्चर जु प्रतिस्पर्धा क जान छन

२- देश मा स्थानीय मांग

३- देश हौरी तत्संबंधी उद्यम अर सहायक उद्योग . कच्चो मा का  सप्लाई क उद्योग

४- कम्पनी की अपणी रण नीति अर प्रतियोगीयुं स्तिथि अर देस की स्थिति   

 

                                      Books by Michael Porter  

 
 
 

1- Compettetive  Strategy: The The Techniques for Analysing Industris and Companies, 1980
 
2- cCses in competitive Strategy, 1983

3-Competitive  Advantages: Creating and Sustaining Supirior Performance, 1985
 
4-The Competitive Advantage of Nations, 1998

5- Competition in Global Industries, 1986                           



Management Guru का बारा मा फड़कि -43 मा बाँचो

 

Management Guru, management Thinkers Series to be continued.......

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        Arjun Baja Jagar-Nach”: A Garhwali folk song (jagar) for Pandau Jagar-Dance   

(Garhwali Folk dance-Song, Traditional Folk dance-songs of Kumaun, Himalayan Folk Literature)

                                          Bhishm Kukreti
 There is popular or could be said a compulsive dance-song related to Arjun a Pandava.  The song is with the raptures of chivalry, rage, love and pathos.
पंडौं अर्जुन बाजा नृत्य-गीत

कृष्ण अब पोंछी गे हे अर्जुन
देखी तौं तब हे अर्जुन
जनीति मा विलाप हे अर्जुन
प्रण करी याले हे अर्जुन
जयद्रथ तैं मी मारी धोळलु हे अर्जुन
निथर सूरज डुबण पर भोळ हे अर्जुन
चिता मा पोड़लु हे अर्जुन
********************************
जयद्रथ घर्मु लुक्युं च हे अर्जुन
सूर्य अछ्लेणु वाळ च हे अर्जुन
अर्जुन चिता मा बैठण लगी गे हे अर्जुन
जयद्रथ तमासो दिखण को परगट ह्व़े गे हे अर्जुन
कृष्ण न अपणो माया को चक्र हटाये हे अर्जुन
सूर्य सौब जगा दिखयाण लैगे हे अर्जुन
अर्जुन न तीर मार आले हे अर्जुन
जयद्रथ को सिर आकाश उड़ेगे हे अर्जुन
तेरी परतिज्ञा रै ग्याई हे अर्जुन


सन्दर्भ : डा. शिवा नन्द नौटियाल

           The story starts when Abhimany was killed by seven army generals of Kaurava together against the rules of battle for Kurukshetra. Jaydratha  was the brother in law of Duryodhan the crowned pricnce of Kuruvansh/ Hastinapur . Jaydrath kicked the dead body of Abhimany the son of Arjun .
    Now,  Arjun  takes a vow that he will kill Jaydrath before the sun set. Jayadrath hides in his house.
                      Krishna spread his Maya (magic) and the sun sets. Arjun becomes ready to die on a Chita (pyre0. Hearing the news that Arjun is ready to do Armdah (die by fire him), Jaydrath comes out from his hide outs and shows his face at the scene. As soon as Jaydrath appears in the battle ground where, Arjun was ready for Atmdah the sun starts shining and Arjun kills Jaydrath by his arrow.

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Abhimanyu –Bjaj-Nrity-geet : a story of Pandau jagar about the Bravery of Abhimanyu

(Folk Songs of Kumaun, Folk Dance-Songs of Garhwal, Himalayan Folk Dance-Songs)
                                                  Bhishm Kukreti
     
                  Abhimanyu ‘s story brings bravery and pathos raptures  among the audience when Aujees sing the story of Abhimanyu’s entry into Chakravyuh  a circle strategy coined by Drona Chary the Army chief of Kaurava.
 Except Arjun, no other Pandavas knew about fighting against Chakravyuh. Arjun was away in another battle. Abhimanyu heard the story from his father Arjun while Abhimanyu was into womb, when Arjun was telling about breaking Chakravyuh to his wife Subhadra the mother of Abhimanyu. Kauravas killed Abhimanyu by wrong means against rules set before battle of Kurukhsetra. .
 In Garhwal, Abhimanyu Baja Nrity get is also called ‘Bala Ghnadyal’ . ghandyal is one of the oldest deities  of Garhwal
अभिमन्यु बाजा- नृत्य-गीत

तुम रौंदा होला राजा जयंती ध्रिग्पल
तुम होला राजा छत्रसाल भौर
कपटी कौरवों न राजा कुचालू रचेली
जौन रचे राजा सात द्वारों की लड़ाई
जयंती राज भंज राजा सणि पत्री देंदा
जती रंदा पांडो तुम जीती राज मान
तुम आवा पंडो अब सात द्वारों की लड़ाई
जयंती मा ह्व़े ग्याई झोंळी झंकार
सीली त ओबरी राजा झिली ह्वेगे खाट
राजा अर्जुन जायुं च दक्खन का देस
साथ छ वैका किरसण सारथी
घर मा रयुं च बालो अभिमन्यु
मी जौंलो पिता रण भूमि -लड़ाई
छै किलों की कथा मैन मा का पेट मा सुणयाले
जब माता सुभद्रा तैं लगी छै पेट की वेद
अर्जुन न लगाई छै द्वारों की कथा
चक्रव्यूह तोड्नो कु जान्दो छ बालो घंडयाळ
बीरता से दंग रेने पापी कौरव
चालो कौरिक तौं मारे बालो अभिमन्यु

स्रोत्र डा. पुरुषोतम डोभाल
सन्दर्भ डा. शिवा नन्द नौटियाल

Bhishma Kukreti

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 गढवाळी का उत्साही कवि उदय राम ममगाईं से  भीष्म कुकरेती की  लिखाभेंट

भीष्म कुकरेती;  आपना अब तक गढवाळी मा क्या क्या लेख अर कथगा कविता लेखी होला, आपक संक्षिप्त जीवन परिचय-----
उदय राम ममगाईं : गढ़वाली मा मिल लगभग ५०-५५ कबिता लेखी  यालिन और १०१ जन्म भूमि कविता संग्रह निकालना कु विचार च
मेरु संक्षिप्त परिचय आप थैं पेज फरी भी मिली जालु ..मी पौड़ी गढ़वाल कु थलीसैंण (राठ ब्लाक ) मा रणगांव कु रैं वालू छौ जैका बना मिन अपुड़ू दुस्रू नाऊ "राठी" धैर.
बचपन की पढाई लिखई थलीसैंण बटी व्हाई वैकु बाद श्रीनगर गढ़वाल बटी सिविल मा डिप्लोमा कैरी कै २० वर्ष की उम्र मा दिल्ली एई गौं
 

 

भीष्म कुकरेती     : आप कविता क्षेत्र मा किलै आइन ?
उ. म:  कविता गठ्याँन कु मी थै कुई भी बिषय मिल जौ मी शुरू होयि जांदू पर कोशिश रैंदी की अपणी जन्म भूमि से वैकु कुछ ना कुछ नातू हो
 

भीष्म कुकरेती : आपकी कविता पर कौं कौं कवियुं प्रभाव च ?
उ.म.: कवियुं कु प्रभाव ता इनी कैकु नी पर बचपन माँ पिताजी का कारण डॉ शिवानन्द नौटियाल जी का दगडा मा रयुं छौ जब वू शिक्षामंत्री छा कुछ छुईं बाता सुणन्दु छौ.
 

भी.कु.  : आपका लेखन मा  भौतिक वातावरण याने लिखनो टेबल, खुर्सी, पेन, इकुलास, आदि को कथगा  महत्व च ?
उ.म.: गुरूजी मी थैं यूँ चीजों की कभी भी जरुरत नी पोड़दी, खाली इक कलम चैंदी  और कागज, कभी कभी कागज नी हुन्दु ता मी हाथ फरी ही लेखी दिंदु
 

भी.कु.: आप पेन से लिख्दान या पेन्सिल से या कम्पुटर मा ? कन टाइप का कागज़ आप तैं सूट करदन मतबल कनु  कागज आप तैं कविता लिखण मा माफिक आन्दन?
उ.म.: मिन बोली च आपकू की मी कै बगत ता टोइलेट मा भी लेखन शुरू कैरी दिंदु मोबाइल मा बिषय टाइप कैरी दिंदु अर बाद मा वै थै पूरु करदू
 

भी.कु.: जब आप अपण डेस्क या टेबले से दूर रौंदा अर क्वी विषय दिमाग मा ऐ जाओ त क्या आप क्वी नॉट बुक दगड मा रखदां   ?
उ.म.: जब मी मा कुई साधन नी हुन्दीन ता मी खाली विषय थैं दिमाग मा कुटुरी बंधी कै धैरी दिंदु

 

 भी.कु.: माना की कैबरी आप का दिमाग मा क्वी खास विचार ऐ जवान अर वै बगत आप उन विचारूं तैं लेखी नि सकद्वां त आप पर क्या बितदी ? अर फिर  क्या करदा   ?
 उ.म.: जब मी मा कुई साधन नी हुन्दीन ता मी खाली विषय थैं दिमाग मा कुटुरी बंधी कै धैरी दिंदु
 

भी.कु.: आप अपण कविता तैं कथगा दें रिवाइज  करदां ?
उ.म.: कै कै बगत ता ४-५ बार भी रिवाइज करण पोडदू. दुई दफा ता कम से कम करण ही पोडदू
 

भी.कु. क्या कबि आपन कविता वर्कशॉप  क बारा मा बि स्वाच? नई छिंवाळ तैं गढवाळी कविता गढ़णो  को प्रासिक्ष्ण  बारा मा क्या हूण चएंद /आपन कविता गढ़णो बान क्वी औपचारिक (formal ) प्रशिक्षण ल़े च ?
उ.म.: मिन कभी भी कुई प्रशिक्षण नी ल्याई अपणी मन की उपज थैं कागज मा उकेर दींदु , बाकी आपक पिछला सवाल जबाब का सज्जन विनोद जेठुड़ी थै थोड़ी भौत बाटु बताई .दुई चार  और भी छन जौन थैं थोड़ी भौत लिखना कु बार मा बताई और वू आज फेसबुक मा महारथ हाशिल करण छन ता मी थैं भी भरी ख़ुशी हुन्दी .
 

 भी.कु.: हिंदी साहित्यिक आलोचना से आप की कवितौं या कवित्व  पर क्या प्रभौ च . क्वी उदहारण  ?
उ.म.: आलोचना जख माँ हुन्दी ता आप थैं अहसास हुन्दु की मिन क्या गलत लेखी होलू ता आप थैं सुधार करण कु इक अछू माध्यम मिलदु ,  मी थैं तभी जादा मजा आन्दु जब मी कै कवी का दगडा मा कवित्व की जंग छेडदू
 

भी.कु  : आप का कवित्व जीवन मा रचनात्मक सूखो    बि आई होलो त वै रचनात्मक सूखो  तैं ख़तम करणों आपन क्या कौर ?
उ.म.: मेरी कविताओं मा सुख की और दुःख की दुयों कु समान आधार च . रचनात्मक सुख की अनुभूति मी थैं वै बगत वहयी जब मी थैं कवी सम्मेलन मा पैलू स्थान कु पुरूस्कार मिली म्यारा आँखा भोरी गिनी फिर मिन और भी अछू लिखना कु विचार मन मा गेड़ी पाड़ी कै धैरी दयाई
(Here the poet took Sukho as happiness and not DRY days in the life of poet when he can’t create poetry)
 
भी.कु  : कविता घड़याण मा,  गंठयाण मा , रिवाइज करण मा इकुलास की जरुरत आप तैं कथगा  हूंद ?
एकांत जरुर चैंदु किलै की मन का जू तार छन वूँ थैं बाटोलाना जरुरी च तभी कुछ शब्दों कु भंडार खुल्दु
 
भी.कु: इकुलास मा जाण या इकुलासी मनोगति से आपक पारिवारिक जीवन या सामाजिक जीवन पर क्या फ़रक पोडद ? इकुलासी मनोगति से आपक काम  (कार्यालय ) पर कथगा फ़रक पोडद
उ.म.: एकुलास मी कभी भी महसूस नी करदू किलै की मेरु ज्यादा समय लोखों दगडी और बच्युन समय कुटुम्ब्दारी दगड़ा बीती जांदू .
 

भी.कु:  कबि इन हूंद आप एक कविता क बान  क्वी पंगती लिख्दां पं फिर वो पंगती वीं कविता मा प्रयोग नि

करदा त फिर वूं  पंगत्यूं क्या कर्द्वां ?
उ.म.: मी विषय का बारा मा सोच्दु और पंक्ति भी विषयपरक ही हुन्दी ता वै से हठी कै जाणा कु ता कुई मतलब ही नी हुन्दु
 
भी.कु : जब कबि आप सीण इ वाळ हवेल्या या   सियाँ रैल्या अर चट चटाक से क्वी कविता लैन/विषय आदि  मन मा ऐ जाओ त क्या करदवां ?
उ.म.: भीष्म जी यु बडू ही अछू सवाल कैरी आपन ...मेरी कुटुम्ब्दारी भी कभी कभी सोच मा पोड़ी जांदी की यु ता सिणा की तैयारी छां करणा फिर अचानक या कलम कागज अगर विषय दिलचस्प होलू ता नींद आणा कु सवाल ही नी

भी.कु: आप को को शब्दकोश अपण दगड  रख्दां  ?
उ.म.: मेरु शब्दकोष मेरु समाज-हमारा गीत संगीत और आज का जमाना मा इन्टरनेट जै मा लोगों की कई शब्दावली थैं मी संभाली दींदु ..आपका आजतक का सभी मेल जू गढ़वाली भाषा से नाता रखदा हो म्यारा डोरा मा भोरी कै धर्याँ छन
 
भी.कु: हिंदी आलोचना तैं क्या बराबर बांचणा रौंदवां ?
उ.म.: प्राइवेट नौकरी मा किताब खोलण कु टैम ही नी रैंदु जैका कारण लगातार लिखे भी नी जांदू
 

 भी.कु: गढवाळी समालोचना से बि आपको कवित्व पर फ़रक पोडद ?
उ.म.: आलोचना-समालोचना और ब्यंग कवी तै और भी सुदृढ़ करदीन जै का कारण वू अगने बढदी जांदू
 
भी.कु: भारत मा गैर हिंदी भाषाओं वर्तमान काव्य की जानकारी बान आप क्या करदवां  ? या, आप यां से बेफिक्र रौंदवां
उ.म.: गैर हिन्दी भाषा मा मी कभी कभी बंगाली लिपि देख्दु और सोच्दु की हमारी अपणी गढ़वाली लिपि कब तैयार होली . जै कार्य मा गढ़वाली विश्वविध्यालय का प्रोफेषर डॉ पुरोहित जी और भी कई गणमान्य ब्यक्ति छन जू कोशिश करणा छन वैका बारा मा दिलचस्पी च की वा लिपि कनि बणिली
 
भी.कु : अंग्रेजी मा वर्तमान काव्य की जानकारी बान क्या करदवां आप?
उ.म.: पढाई लिखई हिन्दी माध्यम मा हुण का कारण अंग्रेजी मा ज्यादा दिलचस्पी नी
 तीन साल दुबई मा भी बीतैनी वख भी मिन अपणी भाषा थैं ही महत्व दयाई जैका कारण वख भी मी थैं कवी सम्मेलन मा पुरुस्कृत कैरे ग्यायी , अंग्रेजी केवल अंग्रेजों दगडी मा ...आपन देखि होली की कभी दुई मल्लू ..या दुई मराठी या कुई भी दूसरी कौम का लोग मिल्दन ता वू अपड़ी बोली मा शुरू होयि जान्दन , डेनमार्क ..स्वीडन गौं ता वख भी वी हाल छा सब्या अपड़ी बोली मा लग्याँ छा सरपट ..मी थैं जख मा समझ मा नी आणु छौ मी गढ़वाली मा बड़बडानो शुरू कैरी दींदु छौ वूँ कु समझ मा नी आन्दु  छौ फिर वू भी ओके ओके बोली दिंदा छा .
भी.कु: भैर देसूं गैर अंगरेजी क वर्तमान साहित्य की जानकारी क बान क्या करदवां ?
उ.म.: ये बारा मा मिन कभी दिलचस्पी नी धैरी
 
भी.कु: आपन बचपन मा को को वाद्य यंत्र बजैन   ?
उ.म.: बामण हुण का नाता डौंरी थकुली खूब बजैयीं चा. हारमोनियम बजाणा की काफी इच्छा च .. गढ़वाली संगीत मा काफी मन लग्युं रैंदु जै का बाना मिन २००६ मा टी-सीरिज बटी अपणी इक एल्बम निकाली छै " हे दारु" 

परम आदरणीय कुकरेती जी आपकू भौत भौत धन्यबाद जू आपन अपुड़ू कीमती समय हमकु निकाल सदा आपकू मार्गदर्शन कु भूकू छौ कभी बुजुर्ग लोग अपड़ा आशिर्बाद से हमुथैं बंचित नी कैर्याँ .

 

आपकू अपुड़ू

उदय ममगाईं "राठी"

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Satire and Fatkar

                 Whom Shall I Vote in Coming Uttarakhand Assembly Election?

                             
                                                         Bhishm Kukreti
                                           
       
                       Since last election of Uttarakhand  results were declared , M.S Mehta  of Mera pahad .com, Purnendu Chauhan of Young Uttaranchal/Uttarakhand, Chandra Shekhar Joshi of Himalay Log.com  , many newspaper journalist friends and my own friends have been asking me  whom I shall vote in the coming election of 2012. My above friends will be happy now, that I could open my silence but others will comment that I am blowing my own trumpet. Well! I am from marketing that I shall not blow other’s trumpet at all but will blow my trumpet only.
 Till yesterday, they were just reminding me but now calls are pouring to me to declare my choice of political party for Uttarakhand assembly.  Let me tell you the secret:
      I am very much confused as Anna team is confused that now, which party they should believe because from their angle of concern, all politicians are of same feathers or in clear words all politicians are black sheep.   Since, to launch  white sheep politicians (new honest political party ) or to call the real honest politicians for fighting election  is as taking the bit in the teeth, Anna team and myself have to choose better black sheep  from the herd of political  black sheep.
     My first Ghanghtol (Confusion) is whether I should vote the politician for whom politics is bread and butter or I should rely on politicians who just entered into political arena.  In both cases, both candidates have set eyes on the powerful post rather than eying on the causes benefitting the people.  Let me first clear this confusion and then I shall decide whom I should vote.  Both believe in  gold-digging  through political means.
            Second Ghanghtol (puzzlement) is whether independents are worthy to try or let them be happy by losing the election for the sake of making democracy strong or may be making mockery of democracy.
          There is always a  Ghanghtol (riddle) before election’s ‘halchal ‘ starts  whether I should go for according to my Jat (Caste) and follow our oldest and centuries old custom of ‘Kha’ aur ‘B’ ( A fight for power between Rajput and Brahmin ) of Garhwal  or I should show my snobbishness that I am  intellectual and don’t care for Brahmin-Rajput phenomenon. My Ghanghtol (enigma) would be  that if I defy the oldest tradition of Garhwal that is Kha’ aur ‘B’ (A fight for power between Rajput and Brahmin), people of my Brahmin community and even Rajput population will definitely perceive that I only write articles about protecting Garhwali culture and do not practice it. Since, I believe in ‘Mau chhodi deen pan Ganv ni chhodan’ (Leave your brother for community sake), I will not follow the intellectualism.  I always  follow the tradition and will definitely protect our cultural heritage of ‘Kha’ aur ‘B’ ( A fight for power between Rajput and Brahmin ) of Garhwal  . Therefore choice would be Brahmin for me.
    Another Ghanghtol (question) is about whether I should go for a political party or the best candidate. Well! I shall take lesions from my grandfather that a successful person should always go with winning candidate.  Since, I would like to be called a successful person I shall go for winning candidate and I heard not from horse to mouth but watched BBC for that sake and came to from CNN International news channel too that in my area, no independent candidate wins except once Shri Bhairav Datt Dhulia. Since, we believe that BBC or CNN are better news analysts than the people in my area I shall not go for best candidate but will choose from the political parties.   
              There is less Ghanghtol (problem) about Samajvadi Party in my mind. Though Vinod Barthwal is my close relative as he is eldest son of daughter of co-wife (saut) of my mothers’ fufu (father’s sister). Due to being a true Uttarakhand movement agitator, I shall never vote for Samajvadi party, though in turn, Vinod  Barthawal ‘s mother will break relationship  with my mother’s relatives who are poor .
                  Since Bahujan samajvadi party does not have any Pakka agenda for hills of Uttarakhand except changing name of Badrinath into Mahtma Budh or Kedarnath into Budhnath, I shall not think about BSP at all.
                   I came to know from a newspaper (You will not know this weekly as the said paper is published for file purpose that is the paper published only for government advertisement in ten or twelve copies) that there is a Parivartan party.  By name, the party seems to be  fair and square party and I would like to take fancy of Parivartan party but then principle taught by my grandfather (whom his grandfather taught) does not allow me to vote for Parivartan Party as there is hundred percent surety for Parivartan party not only losing the election from my area but losing deposit by its candidate too. My grandfather taught me to be with winning person and not with losing person.
     
                From political point of view I would prefer to vote and canvas for Uttarakhand Kranti Dal as UKD is my first love.  For an Uttarakhand movement agitator, Uttarakhand Kranti Dal is always first love. I heard speeches of late Dr D.D. Pant, K.S. Airi, under the banner of UKD in Mumbai I heard the false speeches of minister of Uttarakhand Divakar Bhatt in Garhwal Darshan Mumbai and supported late Arjun Singh Gusain for his election campaign as Uttarakhand Kranti Dal member of parliament candidate though in principle, I was against that late Gusain ji should take part in election.  However, Kranti dal is a party of past and not of future, though, nothing is impossible in political arena.  Therefore, I shall not vote for UKD though, it is still my first love in politics.  I shall not go for losing party as taught by my grandfather whom his grandfather taught not to be with losing side at all.
    Congress can balance every sects of India. Now the chance of my voting to Congress is very bleak because I will never encourage dynasty practices in democracy.  The democracy was chosen by people to stop dynasty provision and if I vote for Congress I shall definitely be against the basic principle of democracy. To save the principles of Democracy, I shall not vote for congress candidate who may be a Brahmin of my cast level.
   Now, there is only one political party left in the fray and that is Bhartiy Janta Party. However, I can’t think to vote Bhartiy Janta Party as its game is up about Ram Mandir and its play of double game about
‘The Party with Difference’ is also exposed after it ruled India and in many states including Uttarakhand. Bhartiy Janta Party is very poor copy of Indian National Congress party. I would never vote a party which is poor copy of Congress party.
     Therefore, I shall not go for voting but go outing and will take lunch with Patvari ji who will offer me pork killed by area farmers and various alcoholic drinks got from the agents of various political parties, of course, both would be free.

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Mangement Guru- 43

प्रबंधन गुरु - 43   

 

                                            सी.के प्रहलाद : आतंरिक प्रतियोगिक गुण  अर नै रण नीति क जणगरु 

 

                                          C.K Prahlad : Famous for Core Competency and New Straegy 

 


(Notes on General management Guru, , Notes on Managemnt Thinkers and Bright Management Practices,Management Gurus, Marketing management Guru, Human Resourse Development Management Guru, Qaulity Mangement Guru, Operation Managemnt Guru, )
 

 

                                                                                 Bhishm Kukreti
 

सी.के.प्रहलाद को जनम भारत मा १९४१ मा ह्व़े . इंजीनियर अर आई.आई.एम् को एम्.बि.ये. न हार्वर्ड वी.वी से पीएच.ड़ी कार अर भात सा नामी प्रबंधन संस्थानु मा पढ़ाणा  रौंद, भौत सी व्यापारिक कम्पन्युं क सलाहकार बि च प्रहलाद.
 
                                                                          भोळ क बान प्रतिस्पर्धी बणण

 

 प्रहलाद अर हैमल की किताब 'कम्पिटिंग फॉर फ्यूचर ' न प्रबंधन दुनिया णा तहलका मचाई. प्रहलाद अर हैमल को बुलण छौ बल प्रतिस्पर्धा भोळ कु  बान होंद णा की आजौ बान .

 

                                                                           आतंरिक प्रतियोगिक गुण

आतंरिक प्रतियोगिक गुण , वा  योग्यता , सक्यात होंद  ज्वा  भौत सी तकनिकुं  मा समन्वय स्थापित  करद अर , संस्थान को  उत्पाद, बाजार अर रिजल्ट तैं सर्वोच्च  पद पर ल़ी जांदी
 
 

                                            प्रहलादौ   हौरी ख़ास बात

 * भौत स बाजारों पर ध्यान , नया उत्पादन का बारा मा सम्वेदनशील, मूल्य (प्राइस ) वस्तु का बीच का संबंधों तैं उलटा  कारो, ग्राग्कू क पार्वाण/नेता बौणो  , से संस्थान मा कल्पनाशीलता औंदी

*सफल वस्तु मा क्वी नयी क्रिया जुड़ण, कै नयो रूप, बिलकुल इ नयो सिद्धांत की वस्तु तैं नव निर्माण बुल्दन

 

                                          Key Book by C.K.Prahlad and Hamel
 
 

Competing for the Future , 1994

 

बकै हैंको   Mangement Guru  का बारा मा फड़की 44 मा बाँचो .....
 
Notes on General management Guru, , Notes on Managemnt Thinkers and Bright Management Practices,Management Gurus, Marketing management Guru, Qaulity Mangement Guru, Operation Managemnt Guru,
 
Human Resourse Development Management Guru to be continued ......in part 44

 

 Copyright@ Bhishm Kukreti

 

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