Author Topic: Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख  (Read 626785 times)

Bhishma Kukreti

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अन्तोगत्वा धामी  को मोदी व योगी की  छवि से प्रतियोगिया करनी ही पड़ेगी
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(Based on  Principles  of  Interproduct Competition  in  a  Brand )
राजनीतिक विपणन  : योग   सिद्धांत  पर आधारित - ९
Political Marketing: Theories based on Yoga Principles -9 
 
   भीष्म कुकरेती (प्रबंध आचार्य )
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( राजनैतिक विपणन में चव्वी के अतिरिक्त छवि व अन्य आयामों में प्रतिष्पर्धा होती है।  राजनैतिक विपणन  प्रतिष्पर्धा केवल एक दल का विरोधी दल से ही नहीं होती है अपितु एक ही दल के अंदर भी एक नेता का दुसरे  राजनैतिक नेता के साथ पर्तिस्पर्धा होती है।  मुख्य मंत्री चयन में आपस में एक ही दल के नेताओं मध्य पर्तिस्पर्धा /प्रतियोगिता का सबसे सही उदाहरण है।  ।  इसी तरह मुख्य मंत्री की छवि  का देस के प्रधान मंत्री  की छवि से भी प्रतिस्पर्धा होती रहती है।  इस लेख में धामी का उदाहरण देते हुए एक ही दल में  राजनैतिक को छवि प्रतियोगिता कैसे  होती है पर चर्चा की जाएगी।  )
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        भाजपा के लिए धामी महत्वपूर्ण व्यक्ति है
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      २३ मार्च २०२२ के दिन पुष्कर सिंह धामी ने १२ वे मुख्य मंत्री के रूप में शपथ ली।  उनसे उत्तराखंड की जनता व भाजपा दल की बड़े बड़ी आशाएं हैं।  भारतीय झंडा पार्टी की आशा पुष्कर सिंह धामी से अधिक इसलिए हैं कि  सन  २००४ के लोक सभा  चुनाव में धामी के नेतृत्व से लाभ ले उत्तराखंड की पांचो सीटें प्राप्त करना है।  भारतीय जनता पार्टी के प्रबंधक जानते हैं कि  विरोधी दल अब एकजुट भी होंगे और मोदी को असफल बनाने हेतु कोई कोर कोशिश नहीं छोड़ेंगे।  तो छोटे छोटे प्रदेशों की लोक सभा सीटें भी महत्वपूर्ण हो जाएंगी।  उत्तर प्रदेश व बंगाल को दोहराना प्रत्येक समय सरल नहीं होगा तो भारतीय जनता पार्टी के लिए उत्तराखंड की पांच लोक सभा सीटें महत्वपर्ण हो ही जाती हैं।  यदि  दिसंबर २०२३ तक धामी ने प्रखरप्रशाशक , जनता प्रेमी  छवि निर्मित कर दी तो मोदी का करिश्मा व धामी ब्रैंड पाँचों सीट पर भाजपा पुनः जीत हासिल कर पाएगी।
   धामी की समस्या है कि  जनता व अन्य राजनरीतिज्ञ भी भाजपा  मुख्य मंत्री की छवि से सीधे प्रधान मंत्री मोदी से करते हैं।  यह एक सत्य है कि अनुभवी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री  शिव राज चौहान की तुलना
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धामी की समस्या है कि  जनता व अन्य राजनरीतिज्ञ भी भाजपा  मुख्य मंत्री की छवि  तुलना  सीधे प्रधान मंत्री मोदी से करते हैं।  यह एक सत्य है कि अनुभवी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री  शिव राज चौहान की तुलना प्रधान मंत्री मोदी से होती है।  यदि राजस्थान व मध्य मध्य प्रदेश में २० १८  में भाजपा हारी तो इन प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों की छवि मोदी के निकट नहीं आ पायी थी।  यही हाल झारखंड में हुआ रघुबर दास की छवि फिस्सड्डी नेता की ही निर्मित हुयी थी।  राजनीति धरातल पर  चौहान की मोदी छवि के  निकट है किन्तु जन मन में यह छवि वास्तव में मोदी के उलट  सुलझे , कम बोलु नेता की है।  बंगाल में भाजपा २०२१ का चुनाव हारी तो एक कारण यह भी था स्थानीय नेता मोदी के निकट की छवि ना निर्मित कर सके या ममता बनर्जी के समानांतर की छवि की अपेक्षा होती है ।  उत्तर प्रदेश में मुख्य मंत्री आदित्यनाथ योगी की  जन मन में छवि  मोदी के बहुत निकट पंहुची है।  अतः    राजनैतिक छवि परिपेक्ष में बिना मोदी को चिढ़ाए उत्तराखंड के मुख्य मंत्री धामी को अपनी नई छवि मोदी के समकक्ष  निर्माण करनी ही होगी।  उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश  में जनता उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री आदित्यनाथ  की दीवानी बन चुकी है जिसका  कारण है कि योगी की छवि मोदी के समकक्ष ठहरती है। उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री  आदित्यनाथ योगी की छवि   अनुकरण  अब भारतीय जनता पार्टी के कई मुख्य मंत्री निर्माण पर्यटन करेंगे जिससे वे क्षेत्रीय राजनीति में अपनी जनता को आकर्षित कर पुनः भाजपा हेतु वोट प्राप्त करने में सक्षम हो सकें।  जैसे मध्य प्रदेश के वर्तमान मुख्य मंत्री वरिष्ठ भाजपा नेता शिव राज चौहान अपनी छवि बुलडोजर मामा की छवि निर्माण का  प्रयत्न कर रहे हैं।   
धामी को भी वोट पाने के मामले मोदी ,  योगी या चौहान की सीमा तक पंहुचना होगा। 
  राजनीति ही नहीं अपितु व्यापारिक विपणन में एक कम्पनी के प्रोडक्ट दूसरे  प्रोडक्ट के साथ आपस में प्रतियोगिता करते हैं।  जैसे कैनस्टार में  कई मिक्सर  ग्रिंडर   मॉडल  केनस्टार का सबसे अधिक बिकने वाला मॉडल स्टालियन  मॉडल से भी प्रतियोगिता करते रहते हैं।  सिम्फोनी का सूमो कूलर मॉडल सिम्फोनी के अन्य मॉडलों से पर्तिस्पर्धा करता रहता है।  इसी तरह धामी को मोदी व योगी की छवि से प्रतिष्पर्धा करनी ही होगी।   
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 योजनाओं की क्रियान्वयन आवश्यक  व दुनिया को बतलाना भी आवश्यक है -
 मोदी या योगी की छवि वोटर रिझाऊ बनी है तो  कारण केवल  प्रबल हिन्दू आकर्षण नहीं रहा है अपितु दोनों राजनीतिज्ञों की छवि प्रचंड वक्त , व जन लाभ की योजनाओं को क्रियान्वयन वाले प्रशाशक की निर्मित हुयी है।  मोदी गुजरात में योजनाओं को धरातल पर लाने वाले मुख्य मंत्री रूप में प्रसिद्ध हुए व अब दिल्ली में भी भारतियों ने देखा कि मोदी केवल रिझाऊ भाषणबाज नहीं अपितु जन लुभाउ योजनाओं को धरातल पर लाने वाले प्रधान मंत्री सिद्ध हुए हैं यथा शौचालय , गैस सिलिंडर की सुविधा , २४ घंटे बिजली , जहां बिजली नहीं वहां बिजली मिलना , हर घरको पानी , जैसे जन हितकारी योजनाओं का क्रियान्वयन हुआ है।  योगी ने इन योजनाओं को उत्तर प्रदेश में क्रियान्वयित ही नहीं किया अपितु  उत्तर प्रदेश की जनता को बतलाया व लोगों को यकीन भी आया क्योंकि धरती पर योजना दिख भी रहीं थीं।  योगी ने विज्ञापनों , जन सम्पर्क माध्यमों से जनता को बतलाया व जतलाया भी।
     २०१७ से २०२२ तक  योगी द्वारा उत्तर प्रदेश के पर्यटक स्थलों जैसे अयोध्या , वाराणसी व चित्रकूट को  पर्यटन मामले में नए रूप में देकर उत्तर प्रदेश की छवि में १८० अंश का परिवर्तन कर योगी ने अपनी छवि भी चमकाई।
  राज्य स्तर के महामार्ग  राष्ट्रीय महामार्गों  व ग्राम सड़कों का जाल , मेडिकल कॉलेजों में वृद्धि आदि कई जनउपयोगी योजनाए उत्तर प्रदेश में धरातल पर दिखीं व योगी ने जनता के मन में  छवि निर्मित की  कि  योगी जन हितकारी योजनाओं को जमीनी धरातल में लाने में सक्षम है। 
               इसी तरह योगी को हिन्दू मसीहा भी बनना ही था।    शपथ ग्रहण उपरान्त  सर्व प्रथम योगी का बुलडोजर 'अनधिकृत मांश कारखानों या बुच्चड़खानों पर चला व कई अनधिकृत बूचड़ खाने ताबड़ तोड़ बंद करवा दिए गए।  यह एक सोची समझी चाल थी।  जिला या ब्लॉक स्तर पर जनपद अधिकारी अपने स्तर पर अनधिकृत बुचड़खानों को बंद करते रहते हैं व यह सब न्यायोचित होता है कि अनधिकृत या पर्यावरण को  हानि पंहुचाने वाले बूचड़खाने बंद हों।  योगी ने  अनधकृत व पर्यावरण को हानिकारी बूचड़खानों को एक ही झटके में राज्य स्तर पर बंद करवा डाला। बूचड़खाना बंद करने के समाचार को राष्ट्रीय स्तर के माध्यमों में बड़ी जगह मिली।  कानूनी व सामजिक लाभ दृष्टि से यह कार्य सही था।  किन्तु  अधिसंख्य बूचड़खानों के मालिक मुस्लिम होने से आदित्यनाथ की छवि मुस्लिम विरोधी निर्मित हुयी किन्तु हिन्दुओं में हिन्दू धर्म रक्षक की ही छवि निर्मित हुयी। 
   अयोध्या में हर दीपावली में   भव्य व राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दीपउत्स्व (गिनीज बुक रिकॉर्ड ) मनाना भी योगी की हिन्दू रक्षक की छवि में वृद्धि करता गया।  वाराणसी में सुधार व कई कार्यकर्म , प्रयाग राज का रूपांतर , प्रयागराज में भव्य व आधुनिक तकनीक  स्तर पर कुम्भ मेला का कार्यक्रम ने भी योगी की हिन्दू रक्षक छवि में अति वृद्धि की।
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    संक्षेप में कहें तो धामी को भी उत्तराखंड में जनता के प्रिय योजनाओं को कार्यान्वयित करना होगा व कई योजनाएं २०२४ तक पूरे करवाने हेतु एड़ी  चोटी का जोर लगाना होगा।  जो योजनाएं केंद्र व वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थानों की हैं (जहां धन  प्राप्त हो  रहा है,  सुगम भी है ) उन्हें तेजी से पूरा करना या करवाना होगा जिससे दिखे कि  धामी कामगति मुख्य मंत्री है। त्रिवेंद्र सिंह के जैसे सुस्त  (छवि की बात हो रही है ) नहीं होना चाहिए और तीर्थ सिंह जैसे मुर्कतापूर्ण बयान तो बिलकुल नहीं देने चाहिए। या निशंक जैसे बड़बोला किन्तु काम में फिस्सड्डी भी नहीं होना चाहिए (छवि की चर्चा हो रही है ।

              धामी को यूनिफॉर्म  सिविल कोड नियम  (UCC ) विधान सभा लाने में शीघ्रता करनी चाहिए और जनसंख्या नियंत्रण क़ानून विधान सभा में लाना चाहिए व जनसम्पर्क साधनों  से पूरे भारत में अपनी कट्टर हिंदी रक्षक की छवि निर्ममित करनी होगी कि  अन्य क्षेत्रों में  चुनावों में  भाजपा के प्रचार हेतु  धामी की मांग आये । 
 मोदी की छवि गुजरात में ही एक शीघ्र  निर्णय लेने वाले  राजनेता की बन गयी थी। अनिर्णय व मोदी दो छोर हैं की छवि बनी है।  उसी तरह योगी  शीघ्र निर्णय करने   वाला व अपने निर्णय पर ठीके रहने वाले राजनेता की ही निर्मित हुयी है।  धामी को भी निर्णय लेने वाला राजनेता की छवि निर्मित करनी ही होगी साथ में ना घूस )  खाऊंगा ना  (घूस ) खिलाऊंगा की छवि भी बरकरार रखनी होगी। 
उत्तराखंड को धार्मिक पर्यटक क्षेत्र से अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में उच्चता हासिल करना। शिक्षा निर्यात को भी महत्वपूर्ण स्थान मिलना आवश्यक है। 
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 धामी को मोदी व योगी की छवि निकट  छवि निर्माण में निम्न कुछ सिद्धांतों को अपनाना आवश्यक है
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मौलिक सोच की छवि - धामी को मौलिक , विशेष सोच की छवि निर्मित करनी ही होगी। 
निष्कपट , ईमानदार , विश्वसनीय राजनीतिज्ञ की छवि - धामी को मोदी व योगी के निकट की छवि प्राप्ति हेतु एक निष्कपट राजनीतिज्ञ की छवि तो निर्मित करनी ही होगी। अभी तक धामी की छवि ईमानदार नेता की बनी है है।  प्रस्तुत छवि को नई ऊंचाई देनी ही होगी।
समझदार - किसी भी राजनीतिज्ञ को समद्दार व्यक्ति की छवि निर्मित करनी ही चाहिए। 
धाकड़  नेता - आज की जनता को भाजपा में धाकड़ नेता के प्रति रूचि अधिक है जो सही व शीघ्र निर्णय ले सके व भ्रष्ट नेताओं , अधिकारियों , माफियों पर वार कर सके। धामी को भी धाकड़ नेता की छवि निर्माण करनी ही होगि कि जनता धामी के नाम पर २०२४ में लोक सभा हेतु भाजपा को जिता  दे।
निरंतरता  व अडिग - धामी को अडिग नेता की छवि निर्माण आवश्यक है। 
प्रत्येक कृत्य  का दिखना -  धामी को पता ही होगा कि राजनीतिज्ञ के हर कामगार कार्य जनता को दिखना चाहिए वा सभी भागीदारों (स्टेकहोल्डरों ) को जानकारी भी होनी चाहिए।  नरेंद्र मोदी की यह सबसे बड़ी विशेषता रही है कि  प्रत्येक जनहित के कार्यों की जानकारी जनता को मिल जाती है। 
धामी का महत्व - प्रत्येक राजनीतिज्ञ की राजनातिक उन्नति तभी होती है जब राजनीतिज्ञ की जनता हेतु , दाल हेतु महत्व साबित हो।  धामी को भी अपना राजनैतिक महत्व साबित करना होगा तभी २०२४ में जनता धामी की सुनेगी व उत्तराखंड से लोकसभा की  ५ के ५ सीटें भाजपा को दे सके। 
डिजिटल माध्यम पर छा जाना -  पारंपरिक माध्यमों के अतिरिक्त धामी को डिजिटल मीडिया में प्रशंसा पानी होगी।
जनसम्पर्क में विशेषज्ञता - धामी को अपना जन सम्पर्क मशीनरी  इतना सक्षम तैयार करना होगा कि  धामी राष्ह्ट्रीय नेता के कद के नेता कहे जांय।
उपयोगी  सलाहकार - धामी को राजनीति हेतु कामगति के सलाहकार ही चुनना चाहिए।  चमचों के स्थान पर कम्पीटेटिव कंसल्टेंट सही होता है। 
   संक्षिप्त में निष्कर्ष निकलता है कि  वर्तमान मुख्य मंत्री पुष्कर सिंह धामी को  इंटरप्रोडक्ट कम्पीटिशन मॉडल सिद्धांत अनुसार मोदी व योगी की छवि से प्रतिष्पर्धा करनी पड़ेगी और जनता के मध्य छवि मामले में धामी को  ऐसे  ब्रांडिंग कार्य करने आवश्यक हैं कि वे २०२४ का लोक सभा चुनाव भाजपा को जीता सकें और अन्य प्रदेशों में उन्हें भाजपा हेतु चुनावों  प्रचार (स्टार प्रचारक  )  बुलाया जाय।  इसके लिए धामी को हिन्दू रक्षक , धाकड़ , ईमानदार , भरस्टाचार भगाऊ ,धाकड़ , निर्णय लेने में सक्षम नेता की छवि निर्माण करना ही होगा।  इन उद्देश्यों की प्राप्ति तभी होगी जब धामी उत्तराखंड के विकास हेतु विशेष कार्य करेंगे। 
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 Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai 2022   
 ,  Political Marketing articles will be continued in next chapter
राजनीतिक विपनण न  : योग   सिद्धांत  पर  श्रृंखला ,  राजनैतिक ब्रैंडिंग  , राजनीति में ब्रैंडिंग , पोलिटिकल मार्केटिंग ,  राजनैतिक ब्रैंडिंग , राजनीति में छवि बिगड़ने के अवसर ,  राजनैतिक  विपणन, राजनीति  छवि  निर्माण सिद्धांत  आधारित  लेख शेष आगे .,Political Marketing , Political Branding , Tips for Political actvists for getting noticed by High Command


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श्री संत सदा नन्द कुकरेती का योगदान

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ढोल ने कुमाऊं -गढ़वाल में कब  प्रवेश किया ?

आलेख: भीष्म  कुकरेती

 ढोल भारत का अवनद्ध वाद्यों में एक महत्वपूर्ण वाद्य है।  ढोल हमारे समाज में इतना घुल गया है किआप किसी भी पुस्तक को पढ़ें तो लिखा पायेंगे कि ढोल भारत का एक प्राचीन पोला -खाल वाद्य है।  जैसे उत्तराखंडी कद्दू , मकई को पहाड़ों का परम्परागत   भोजन समझते हैं।  वास्तव में ढोल भारत में पन्द्रहवीं सदी में आया व दो शताब्दी में इतना प्रसिद्ध हो चला कि ढोल को प्राचीनतम वाद्य माना जाने लगा।
ढोल है तो डमरू , हुडकी , मृदंग की जाति का वाद्य किन्तु ढोल मृदंग या दुंदभि  की बनावट व बजाने की रीती में बहुत अधिक अंतर है।  ढोल का आकार एक फुट के वास का होता है व मध्य व मुख भाग लगभग एक ही आकार के होते हैं।  ढोल को एक तरफ से टेढ़ी लांकुड़ व दूसरे हिस्से को हाथ से बजाया जाता है जब कि दमाऊ  को दो लांकुड़ों से बजाया जाता है।
       ढोल का संदर्भ किसी भी प्राचीन भारतीय संगीत पुस्तकों में कहीं नहीं मिलता केवल 1800 सदी में रची पुस्तक संगीतसार में ढोल का पहली बार किसी भारतीय संगीत साहित्य में वर्णन हुआ है।  इससे पहले आईने अकबरी में ही ढोल वर्णन मिलता है।

                       क्या सिंधु घाटी सभ्यता में ढोल था ?
 सौम्य वाजपेयी तिवारी (हिंदुस्तान टाइम्स , 16 /8/2016 ) में संगीत अन्वेषक शैल व्यास के हवाले से टिप्पणी करती हैं कि धातु उपकरण , घटम के अतिरिक्त कुछ ऐसे वाद्य यंत्र सिंधु घाटी समाज उपयोग करता था जो ढोल , ताशा , मंजीरा व गोंग जैसे।  इससे सिद्ध होता है बल सिंधु घाटी सभ्यता में ढोल प्रयोग नहीं होता था।

   वैदिक साहित्य में ढोल
वेदों में दुंदभि , भू दुंदभि घटम , तालव का उल्लेख हुआ है (चैतन्य कुंटे, स्वर गंगा फॉउंडेशन )

उपनिषद आदि में चरम थाप वाद्य यंत्र
उपनिषदों में कई वीणाओं का उल्लेख अधिक हुआ है चरम थाप वाद्य यंत्रों का उल्लेख शायद हुआ ही नहीं।

पुराणों में चरम थाप वाद्य यंत्र
पुराणों में मृदंग , पाणव , भृग , दारदुरा , अनाका , मुराजा का उल्लेख है किन्तु ढोल जैसा जो लान्कुड़ व हाथ की थाप से बजाया जाने वाले चरम वाद्य यंत्र का जिक्र पुराणों में नहीं मिलता (संदर्भ २ )
वायु पुराण में मरदाला , दुंदभि , डिंडिम  उल्लेख है (,  प्रेमलता शर्मा , इंडियन म्यूजिक पृष्ठ 26 )मार्कण्डेय पुराण (9 वीं सदी ) में मृदंग , दरदुरा , दुंदभि , मृदंग , पानव का उल्लेख हुआ है किन्तु  ढोल शब्द अनुपस्थित  है।

   महाकाव्यों , बौद्ध व जैन साहित्य में ढोल
  महाकाव्यों , बौद्ध व जैन साहित्य में डमरू  मर्दुक ,  दुंदभि  डिंडिम , मृदंग का  उल्लेख अवश्य मिलता है किन्तु ढोल शब्द नहीं मिलता।  अजंता एलोरा , कोणार्क आदि मंदिरों , देवालयों में ढोल नहीं मिलता।
    गुप्त कालीन तीसरी सदी रचित नाट्य शास्त्र में ढोल
भरत नाट्य शास्त्र में मृदंग , त्रिपुष्कर , दार्दुर , दुंदभि  पानव , डफ्फ , जल्लारी का उल्लेख तो मिलता है किन्तु ढोल शब्द व इससे मिलता जुलता वाद्य यंत्र नदारद है।
तमिल साहित्य पुराणानुरू (100 -200 ई )
तमिल साहित्य में चरम थाप वाद्य यंत्रों को बड़ा सम्मान दिया गया है व इनको युद्ध वाद्य यन्यत्र , न्याय वाद्य यंत्र व बलि वाद्य यंत्र में विभाजित किया गया है। ढोल प्राचीन तमिल साहित्य में भी उल्लेखित नहीं है।
कालिदास साहित्य
कालिदास साहित्य में मृदंग  पुष्कर , मरजाजा , मरदाला जैसे चरम थाप वाद्य यंत्रों का उल्लेख हुआ है।
( पुराण से कालिदास तक संदर्भ , प्रेमलता शर्मा , इंडियन म्यूजिक )

   मध्य कालीन नारदकृत संगीत मकरंद में चर्म  थाप वाद्य यंत्र

संगीत मकरंद में ढोल उल्लेख नहीं मिलता है

   तेरहवीं सदी का संगीत रत्नाकर पुस्तक

संगीत रत्नाकर पुस्तक में मृदंग , दुंदभि , तुम्ब्की , घट , मर्दल , दार्दुल , हुड़का ( हुड़की ) कुडुका , सेलुका , ढक्का , डमरुक , रुन्जा का ही उल्लेख है (चैतन्य कुंटे )

  सुलतान काल व ततपश्चात में वाद्य यंत्र
आमिर खुशरो ने दुहुल का उल्लेख किया है (इजाज इ खुसरवी ) और खुसरो को सितार व तबला का जनक भी माना जाता है।

भक्ति काल
दक्षिण व उत्तर दोनों क्षेत्रों के भक्ति कालीन साहित्य में  मृदंग का ाहिक उल्लेख हुआ है। 15 वीं सदी के विजयनगर कालीन   अरुणागिरि नाथ साहित्य में डिंडिम का उल्लेख हुआ है।
        आईने अकबरी
आईने अकबरी में चर्म  वाद्यों में नक्कारा /नगाड़ा , , ढोलक /डुहुल , पुखबाजा , तबला का उल्लेख मिलता है। (आईने अकबरी , वॉल 3 1894 एसियाटिक सोसिटी ऑफ बंगाल पृष्ठ  254 )
प्रथम बार भारतीय साहित्य में आईने अकबरी में ही आवज (जैसे ढोल ), दुहूल  (ढोल समान ) , धेडा (छोटे आकार का ढोल ) का  मिलता है ( दिलीप रंजन बरथाकार , 2003 , , द म्यूजिक ऐंड  इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ नार्थ ईस्टर्न  इण्डिया,  मित्तल पब्लिकेशन दिल्ली , भारत पृष्ठ 31 ). आईने अकबरी में नगाड़ों द्वारा नौबत शब्द का प्रयोग हुआ है जो भारत में कई क्षेत्रों में प्रयोग होता है जैसे गढ़वाल व गजरात में दमाऊ से नौबत बजायी जाती है
     इससे साफ़ जाहिर होता है बल ढोल (दुहुल DUHUL ) का बिगड़ा रूप है , तुलसीदास का प्रसिद्ध दोहा ढोल नारी ताड़न के अधिकारी भी कहीं न कहीं  अकबर काल में ढोल की जानकारी देता है
    खोजों के अनुसार duhul तुर्किस्तान , अर्मेनिया क्षेत्र का प्राचीनतम पारम्परिक चर्म थाप वाद्य  है जो अपनी विशेषताओं के कारण ईरान में प्रसिद्ध हुआ और अकबर काल में भारत आया।  चूँकि ढोल संगीत में ऊर्जा है व सोते हुए लुंज को भी नाचने को बाध्य कर लेता है तो यह बाद्य भारत में इतना प्रसिद्ध हुआ कि लोक देव पूजाओं का हिस्सा बन बैठा।
जहां तक पर्वतीय उत्तराखंड में ढोल प्रवेश का प्रश्न है अभी तक इस विषय पर कोई वैज्ञानिक खोजों का कार्य शुरू नहीं हुआ है।  इतिहासकार , संस्कृति विश्लेषक जिस प्रकार आलू , मकई , कद्दू को गढ़वाल -कुमाऊं का प्राचीन भोज्य पदार्थ मानकर चलते हैं वैसे ही ढोल  को कुमाऊं -गढ़वाल का प्राचीनतम वाद्य लिख बैठते हैं।
    इस लेखक के गणित अनुसार यदि ढोल उपयोग राज दरबार में प्रारम्भ हुआ होगा तो वह कुमाऊं दरबार में शुरू हुआ होगा।  कुमाऊं राजाओं के अकबर से लेकर शाहजहां से अधिक अच्छे संबंध थे और कुमाऊं राजनेयिक गढ़वाली राजनैयिकों के बनिस्पत दिल्ली दरबार अधिक आते जाते थे तो संभवत: चंद राजा पहले पहल ढोल लाये होंगे. .चूँकि नौबत संस्कृति प्रचलित हुयी तो कहा जा सकता है बल ढोल दमाऊ पहले पहल राज दरबार में ही प्रचलित हुए होंगे।  बड़ा मंगण /प्रशंसा जागर भी इसी ओर इंगित करते हैं बल ढोल वादन संस्कृति राज दरबार से ही प्रचलित हुयी होगी।  इस लेखक के अनुमान से श्रीनगर में सुलेमान शिकोह के साथ  ढोल का अधिक उपयोग  यदि समाज ने ढोल अपनाया तो ढोल बिजनौर , हरिद्वार , बरेली,  पीलीभीत से भाभर -तराई भाग में पहले प्रसिद्ध हुआ होगा और ततपश्चात पर्वतीय क्षेत्रों में प्रचलित हुआ ।  अनुमान किया जा सकता है ढोल गढ़वाल -कुमाऊं में अठारहवीं सदी में प्रचलित  हुआ व ब्रिटिश शासन में जब समृद्धि आयी तो थोकदारों ने ढोल वादकों को अधिक परिश्रय दिया।  अर्थात ढोल का अधिक प्रचलन ब्रिटिश काल में ही हुआ।  उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ढोल प्राचीन नहीं अपितु आधुनिक वाद्य ही है के समर्थन में एक तर्क यह भी है कि ढोल निर्माण गढ़वाली या कुमाउँनी नहीं  करते थे और ब्रिटिश  काल के अंत में भी नहीं।  ब्रिटिश काल में श्रीनगर में भी ढोल व्यापार मुस्लिम व्यापारी करते थे ना कि गढ़वाली।
 ढोल सागर को भी गढ़वाली बोली का साहित्य बताया जाता है जबकि ढोल सागर ब्रज भाषायी साहित्य है और उसमे गढ़वाली नाममात्र की है।  इस दृष्टि से भी ढोल प्राचीन वाद्य नहीं कहा जा सकता है। 
 
संदर्भ -
२- शोधगंगा inflinet.ac.in

Copyright @Bhishma  Kukreti , Mumbai , October 2018

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 द्वी बीजुं  कथा
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गढ़वळि  बाल कथा (सांख्य योग से प्रेरित )
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प्र . भीष्म कुकरेती
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बरखा शुरू हूण इ  वळ  छे।  तैबारी इ डक्खू  एक पक्यूं  पपीता खांद खांद  अपण  रुस्वड़ से भैर आयी।  पपीता खांद खांद  डक्खू  का हाथ म द्वी पपीता क बीज दिखेन।  डक्खून द्वी बीज   तौळ क उपजाऊ  सग्वड़ म चुलै  देन।  पपीता भौत मिट्ठु  अर पूरा पक्यूं छौ।  द्वी बीज बि जमण लैक  हुयां  छा। 
एक बीजन अपण मन इ मनम  ब्वाल -" मीन जमण च , मीन जमण च।  मि अपण जलड़ भूमि पुटुक  भिजलु अर तख म्यार जलड़ शक्ति से जम जाला. मि तब मथि  तरफ अपण कोम्पल उगौलु।  मेरी सुंदर कमल कली तब धीरे धीरे  मेरी पत्ती आली अर फिर डंठल बि ाली धीरे धीरे मि एक छुट पेड़ बण जौलु।  अर  कुछ वर्षों उपरान्त मि परिपक्व पेड़ बण जौलू।  में पर खूब बड़ा बड़ा  फल आला।  फिर लोग फल खाला अर  बीज इना ऊना चुलाला तो म्यार नया नया पेड़ उग जाला।  मि  तै जमीन पुटुक धंसण  चयेंद। "
 इथगा म बरखा आयी अर  यू  बीज जमीन पुटुक जनमणो  तयारी म लग गे।  कुछ वर्ष बाद यु बड़ो पेड़ बण गे  छौ।
 दुसर  तरफ हैंको बीज बि जमीन म पड्यूं  छौ  पर घंघतोळ (विभ्रांति ) म छौ तैन  मन म ब्वाल " जु मि अपण जलड़  भूमि पुटुक  लिजौलू अर  जु तौळ  माट स्थान पर  पौड़   ऐ  जाल , तौळ  अंध्यर  बि  होलु  हि  अर  अंध्यर मने अणभर्वस , फिर पौड़  आयी गे  तो  मेरो परिश्रम  अनर्थक चल जालो।  म्यार खोळ  से कोम्पल  आइ  गे  अर  गंडेळन खाइ  दे  तो बि  म्यार परिश्रम निष्फल ह्वे  जालो।  माना कि  मि  जामि  बि  गे  अर  क्वी बच्चा पत्तों तै तोड़ि  द्यावो त बि म्यार परिश्रम निष्फल हि  ह्वालो।  मि कुछ दिन जग्वाळ  करदो तब जमुल     "
यु नकारत्मक बीज नकारत्मक इ  सुचणु  राइ  अर  समौ  रौंद  नि  जाम।  एक दिन कुखड़  पिंजरा से फूची  ऐन  अर माट तै रदबदोलण लग गेन अर एक कुखुड़  तै स्यु पपीता बीज दिखे अर  वैन  स्यु बीज घू ळ  दे।  एक संभावना इनम  समाप्त ह्वे गे।
 कथा क सार च - जु सकारात्मक अर  बड़  सुचद  स्यु हि सफलता पांद।  नकारात्मक सोच वळ असफल ही हूंद। 





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मासौ सैंण नैली बाजार रामलीला हवाई
पब्लिका बीच मंजू भली बांद राई। 

जूनी को गरण  हे मंजू , जूनी को गरण  हे मंजू
राति बारा बजी हवाई सीता कु हरण।
 
मसौ सैंण नैली बाजार रामलीला हवाई
पब्लिका बीच मंजू भली बांद राई। 

खाई जाला आम हे मंजू, खाई जाला आम
मासो सैंण ऐकी मंजू ह्वेगे बदनाम।

मसौ सैंण नैली बाजार रामलीला हवाई
पब्लिका बीच मंजू भली बांद राई। 

कपड़ों को थान हे मंजू, कपड़ों को थान
नैली बाजार आंदि मंजू रामलीला का बान।

मसौ सैंण नैली बाजार रामलीला हवाई
पब्लिका बीच मंजू भली बांद राई। 

पाणी को गिलास हे मंजू पाटीसैण प्यूला
म्यारु यनु विचार चा मंजू ब्याऊ कैरी द्यूला।

 मसौ सैंण नैली बाजार रामलीला हवाई
पब्लिका बीच मंजू भली बांद राई। 

- लोक गीत।

 

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