Author Topic: Articles By Bhisma Kukreti - श्री भीष्म कुकरेती जी के लेख  (Read 1484649 times)

Bhishma Kukreti

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Grammar of Kumauni language
Grammar of Garhwali Language
Grammar of Languages of Uttarakhand
Grammar of Nepali Language
Grammar of Mid Himalayan Languages

                     मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -39



Comparative Comparative Study of Grammar of Kumauni, Garhwali Grammar and Nepali Grammar ,Grammar of Mid Himalayan Languages-Part-39




                                                  सम्पादन : भीष्म कुकरेती


                          Edited by Bhishm Kukreti


                                           गढ़वाली में क्रिया विधान - भाग -5

                                  Verbs of Garhwali Language - Part 5

 
                               

                                              सामर्थ्य सूचक संयुक क्रियाएं

                              वर्तमान काल

धातु -सकण

पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन

अन्य------------------ सकदु /सकदि--------------सकदन /सकदिन 

मध्यम ------------- सकदें -------------------------सकदां

उत्तम  --------------सकदौं -------------------------सकदां

                             भूतकालिक कल्पना


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन

अन्य----------------सकदु'सकदि  -------------------------सकदा

मध्यम -------------सकिद ---------------------------------सकदा

उत्तम --------------सकदु ---------------------------------सकदा

                    भूतकाल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन

अन्य----------------सकि------------------------------सकेन 

मध्यम -------------सकें--------------------------------सक्याँ   
 
उत्तम --------------स्क्यों ------------------------------सक्यां

 

                             भविष्यकाल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन

अन्य---------------- सकलु/सकलि ------------------सकला   

मध्यम -------------सकलि---------------------------सकल्या   
 
उत्तम --------------सकलु-----------------------------सकला 

                         भावी कल्पना


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन

अन्य---------------- सकु-----------------------------सकोन 
 
मध्यम -------------सकें --------------------------सकां

उत्तम --------------सकों -------------------------सकां

                                गढ़वाली में क्रिया विधान - भाग -6
                             Verbs of Garhwali Language - Part ६
 
                       प्रयासार्थक संयुक्त क्रियाएं 

धातु - पाण या पौण

                               वर्तमान काल कर्त्री वाच्य

पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------पांदु  -----------------------पांदन/पांदिन 

मध्यम -------------पंदे-----------------------------पांदा   
 
उत्तम --------------पंदौं ---------------------------पांदा

                   भूतकालिक कल्पना


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------पौंदु/पौंदि   -------------------------------पौंदा

मध्यम -------------पौंदि  ---------------------------------पांदा

उत्तम --------------पांदु  ----------------------------------पांदा

                              भूतकाल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------पै -------------------------------पैन

मध्यम -------------पै -------------------------------पैन

उत्तम --------------पै -------------------------------पैन

 

                भविष्य काल

 

 
पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------पौलु----------------------------पौला

मध्यम -------------पैलि ---------------------------पैल्या

उत्तम --------------पौलु ---------------------------पौला

गढ़वाली में क्रिया विधान - भाग -7
Verbs of Garhwali Language - Part 7

                                 शापार्थक क्रियाएं                           
 

 


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य---------------- पाऊ ------------------------पाओन 

मध्यम -------------पै ----------------------------पयान

उत्तम --------------पौं --------------------------पवां

                        स्वाभाव सूचक क्रियाएं

धातु - कर्न

                    वर्तमान काल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------करदु /करदि(र आधी ) --------------रदन 
 
मध्यम -------------करदें ------------------------------करदौं 

उत्तम --------------करदौं ----------------------------करदौं

                  भूतकालिक कल्पना


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------कर्दु ---------------------------कर्दा

मध्यम -------------कर्दि----------------------------कर्दा 
 
उत्तम --------------कर्दु -----------------------------कर्दा

                     भूतकाल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------कै -----------------------------कैन

मध्यम -------------कै ------------------------------कैन

उत्तम --------------कैन -----------------------------कैन

                     भविष्य काल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------  कर्लु/कर्लि--------------------कर्ला/कर्लि   
 
मध्यम -------------कर्लि -------------------------कर्ल्या

उत्तम --------------कर्लु -------------------------कर्ला

               आज्ञा या इच्छार्थक


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य---------------- कौरु---------------------------करोन 

मध्यम -------------कौर --------------------------कौरा

उत्तम --------------करौं   --------------------------करां

              भावी कल्पना

   
पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------कौरु ----------------------------करोन

मध्यम -------------कौर --------------------------कौरा

उत्तम --------------करों --------------------------करां

 गढ़वाली में क्रिया विधान - भाग -8
Verbs of Garhwali Language - Part 8
 
                 आरम्भ बोधक क्रिया विधान

धातु- जाण 

                        वर्तमान काल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------जांदु-------------------------जन्दन /जंदिन   

मध्यम -------------जंदें---------------------------- जंदां   

उत्तम --------------जन्दों --------------------------जंदां

                  भूतकालिक कल्पना (कृदंत में)



पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------  जांदु /जांदि----------------------जांदा /जांदि   

मध्यम ------------- जांदि  ------------------------------जांदा

उत्तम --------------जांदु -------------------------------जांदा

                         भूतकाल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य---------------- गै/गि-------------------------गैन/गेन   

मध्यम -------------गयें /-------------------------गयां/ग्याँ   

उत्तम --------------गायों /ग्यों -------------------गयां/ग्याँ 

                भविष्य काल


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------जालु  -------------------------------जाला

मध्यम ------------- जैलि -----------------------------जैल्या

उत्तम --------------जौलु--------------------------------जौला 

                   भावी कल्पना


पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य---------------- जावु-----------------------------जावोन 

मध्यम -------------जयें ------------------------------जवाँ

उत्तम --------------जवों-------------------------------जवाँ 

                 आज्ञार्थक

 
पुरुष -------------------एक वचन -------------------बहुवचन


अन्य----------------जावु ----------------------------जावोन

मध्यम -------------जा -----------------------------जावा

उत्तम --------------जवौं----------------------------जवां   

 चूँकि अबोध बंधु बहुगुणा ने इस तरह का कोई उदाहरण  नही दिया  अत: रजनी कुकरेती के उदहारण ही मान्य हैं

क्षेत्रीय बोली भेद अवश्यम्भावी है

सन्दर्भ


१- अबंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली ( Structure of Garhwali Grammar)
 


२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल (Structure of Nepali Grammar)

३- डा. भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद (Study of Kumauni Language Grammar)
 
४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून ( Grammar of Garhwali Language)

५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला (Garhwali- Hindi Dcitionary)
 
६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून (Garhwali hindi Dictionary )

७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत
 
८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत

९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ
 
१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल (Briefs on Nepali Grammar)

११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल (Nepali Grammar)
 
१२- चन्द्र मोहन रतूड़ी , गढ़वाली कवितावली ( सं. तारा दत्त गैरोला, प्र. विश्वम्बर दत्त चंदोला) , १९३४, १९८९

 

Comparative Study of Kumauni Grammar , Garhwali Grammar and Nepali Grammar (Grammar of , Mid Himalayan Languages ) to be continued ........
 
. @ मध्य हिमालयी भाषा संरक्षण समिति

Bhishma Kukreti

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Brand Guru 16
Marketing Guru -16
विपणन गुरु-16

                                        जगदीप कपूर :ब्रैंड  गुरु

                          Jagdeep Kapoor : Brand Guru from India

                 

( Notes on , Marketing Gurus, Advertising Guru , Sales Guru, Internet Marketing Gurus, Consumer Loyalty Guru, Branding Guru, Market Research Guru, Marketing Strategy Guru , General Management Guru, , Management Thinkers and Bright Management Practices,Management Gurus, Marketing management Guru, Human Resource Development Management Guru, Quality Management Guru, Operation Management Guru, )


                                            Bhishm Kukreti

                  जगदीप कपूर अ नाम ब्रैंडिंग मा जग प्रसिद्ध च. जगदीप कपूर न भौत स कम्पन्युं  मा ब्रैंडिंग सलाह देकी युंका ब्रैंडु तैं बड़ो स्थान दिलाई .

 जगदीप कपूर किताब   लाखों मा बिकदन अर कपूर की खासियत  या च बल भाषा बडी सरल अर जु बि कपूर सम्जान्दो वो उदारण देकी  सम्जान्दो

जगदीप कपूर न नि बि होला त १६००० से बिंडी एम्.बी.ए. छात्रों तैं ट्रेनिंग  बि दे

                           Key Books by Jagdeep Kapoor



1- 24 Brand Mantras

2-Brand Serve

3-18 Brand Astras

4- 9 Brand Shastras

5-Brand Namkaran

6-Brand Switch

7- 28 Brand Practices

8-1800 Runs Brand sales Khel me






Notes on , Marketing Gurus, Advertising Guru , Sales Guru, Internet Marketing Gurus, Consumer Loyalty Guru, Branding Guru,Market Research Guru, General Management Guru, , Management Thinkers and Bright Management Practices,Management Gurus, Marketing management Guru, Human Resource Development Management Guru, Quality Management Guru, Operation Management Guru to be continued........


 

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             Budya Lapata: An Entertaining Garhwali Drama

(Garhwali Dramas, Kumaunis Dramas, Uttarakhandi Dramas, Himalayan Dramas)
इकीसवीं सदी क गढ़वाळी स्वांग/नाटक -9
बुडया लापता : रौंस दिलंदेर हंसोड्या स्वांग फाड़ी -2

                                           Bhishm Kukreti

  Contribution of late Dinesh Bhardwaj in promoting Garhwali drama in Mumbai is tremendous. Dinesh Bhardwaj not only directed Garhwali Dramas, performed in Garhwali stage plays but wrote a drama too along with another Garhwali dramatist Raman Kukreti.
    As far as popular dramas are concerned, laud dramas run more in Mumbai than other types of dermas. Keeping in mind the psych of Mumbai’s Garhwali duo writers wrote a laud Garhwali drama ‘Budya Lapata’.
    Garhwal Chhatra Sangh and Garhwal Bhratri Mandal staged this hilarious drama. As guessed by Dinesh Bhardwaj and Raman Kukreti, the audience appreciated the drama written around end eighties.
 The story is simple but has ingredients to   glue the audience on their seats.
 An old man is missing; his son and his servant are worried. The son announces a reward for that brings back his father. Two different persons bring two different fathers and demand for reward. Each person compels the son that he should offer reward to him only. The drama takes anew turn at the end.
 The drama deals with individual’s greed and their style of making false as truthful substance.
 The main character is servant and there are six seven characters. However from stage point of view, there are four main characters whose roles are important.
   The plot is very crispy and easy to stage the written form of Budya Lapata drama. Each character is totally different than other and hence, provides variety.
  Dinesh Bhardwaj used to play mainly comic roles, Raman Kukreti had watched various hilarious Marathi dramas in Mumbai from his childhood and definitely the dialogues are best example of creating laughter.  The conversation is superb in the drama. The conversation makes the drama live. The wording is simple and phrases are easily understandable as written for specially migrated Garhwalis.  The dialogue style has poetic touch too that makes dialogue more graspable to audience.
  The dram is definitely a humorous one and director may create atmosphere as per his need.
  Definitely Budya Lapata is a gem for the modern Garhwali drama world.

Garhwali Dramas, Kumaunis Dramas, Uttarakhandi Dramas, Himalayan Drama to be continued ….

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Brand Guru 17
Marketing Guru -17
विपणन गुरु-17

                                    साइमन ऐन्हौल्ट : जैन ' नेसन एज ब्रैंड ' विचारौ  शुरुवात  कौर 

                              Simon Anholt : Who Coined tthe word 'Nation Brand'

                                       

( Notes on , Marketing Gurus, Advertising Guru , Sales Guru, Internet Marketing Gurus, Consumer Loyalty Guru, Branding Guru, Market Research Guru, Marketing Strategy Guru , General Management Guru, , Management Thinkers and Bright Management Practices,Management Gurus, Marketing management Guru, Human Resource Development Management Guru, Quality Management Guru, Operation Management Guru, )


                                                Bhishm Kukreti



      साइमन ऐन्हौल्ट आजौ महानतम ब्रैंडिंग जणगरौं मादे  एक जणगरु माने जांद. साइमन ऐन्हौल्ट न  विपन्न क्षेत्र मा पैल पैल 'प्लेस ब्रैंडिंग ' या  'नेसन ब्रैंडिंग ' की बात शुरू कार.

साइमन को बुल न च बल क्वी बि जगा, राष्ट्र, प्रदेश, शहर, कस्बा क ब्रैंडिंग होण चयेंद   पण जगौ या राष्ट्रौ ब्रैंडिंग इन णि ह्व़े सकद जन की कै साबण या तेल  ब्रैंड क ब्रैंडिंग होंद.

सबसे बड़ो कठण काम होणो परांत बि जगा, शहर, प्रदेश  या राष्ट्रौ ब्रैंडिंग होण इ चयेंद.  ग्लोबलैज़ेसन क बगत राष्ट्रौ  या प्रदेशौब्रैन्डिंग कन कन करण चयेंद मा साइमन ऐन्होल्ट  की  माहिरी च.

साइमन ऐन्हौल्ट  न कथगा इ देश, शहरूं    अर यूरोपियन यूनियन, यू.एन. वर्ल्ड टूरिज्म, वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम जन संस्थाओं तै सलाह देकी कथगा इ काम करीन .

        साइमन ऐन्हौल्ड तैं प्लेस ब्रैंडिंग जन विचार तैं प्रचारौ बान   भौत सा देशुं अर संस्थानुन पुरुष्कार बि देन



 

             Key Books by Simon Anholt


1- Palces: Identity, Image and Reputation  by by Simon Anholt

2-Brand New Justice by Simon Anholt

3-Beyond Branding ;  by Simon Anholt (Co-author)

4-Brands and Branding by Simon Anholt  (Coauthor)

5-Brand America by Simon Anholt

6- Competative Identity by Simon Anholt

7-Another one bites the grass by Simon Anholt



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Grammar of Kumaoni language
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Grammar of Mid Himalayan Languages

                            मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -40



Comparative Comparative Study of Grammar of Kumauni, Garhwali Grammar and Nepali Grammar ,Grammar of Mid Himalayan Languages-Part-40




                                                    सम्पादन : भीष्म कुकरेती
 
                             Edited by Bhishm Kukreti
 
 

                                         गढ़वाली में काल विधान

  अबोध बंधु बहुगुणा अनुसार गढ़वाली में काल विधान इस प्रकार है                         

                                             भूतकाल

भूतकाल --------------------------------पुल्लिंग ---------------------------------------स्त्रीलिंग

------------------------एकवचन  -------------बहुवचन ---------------------एकवचन ----------बहुवचन

सामान्य भूत ------गै, गए, गयूं-------------गैने, गयां ----------------गै, गए, गयूं------------गैने , गयां

आह्न्न्भूत ---------जयूं  च ----------------जयां छन ------------------जयीं च-----------------जयीं छन
 
पूर्णभूत -----------गै छौ /छयो --------------गै छ्या-----------------गै छयी/छै ---------------गै छयी

अपूर्ण भूत --------जाणु छौ/छयो ------------जाणा छा /छ्या -----जाणि छै/छई-------------जनि छै (छयी)

संदिग्ध भूत ----गै ह्व्लो ------------------गै ह्वला-------------------गै ह्वली---------------गै ह्वली 

हेतुहेतुभूत -----जयूं  होंदो ----------------  जयां होंदा ----------------जईं होंदी --------------जईं होंदी   



                     वर्तमान काल

वर्तमान काल -------------------पुल्लिंग ---------------------------------------स्त्रीलिंग
------------------------एकवचन -------------बहुवचन ------------------एकवचन ----------बहुवचन

सामान्य - ---------- जांदू , जांद ------------जांदवां/जान्दन -------------जांदू , जांद-----जांदवां/जान्दन

संदिग्ध ------------जाणु ह्वेला/हूंलो---------जाणा ह्वला/हूंला------------जाणी ह्वली ----जाणी ह्वली

अपूर्ण --------------जाणू च /छ -----------जाणा छन/छंवां-----------------जाणी च -----------  जाणी छन



                               भविष्य काल

भविष्यकाल ------------------पुल्लिंग ---------------------------------------स्त्रीलिंग
------------------------एकवचन -------------बहुवचन ------------------एकवचन ----------बहुवचनसामान्य--------------जौंला/जालो ---------जौंला /जाला ---------------जौंलो /जालि------जौंलो /जालि

संभाव ------ --------जौं/जावो ------------जंवां/जावन ------------------जौं /जावो ----------जंवां/जावन

अबोध बंधु बहुगुणा ने भविष्यकाल सम्बन्ध विधि के  उदाहरण इस प्रकार दिए हैं

१- भोळ हमर ड्यार ऐन

२-आप बैठन

३-ड़्यार चल जा

४-अब तुम तैं ड़्यार जाण चयेंद /चैन्द         



 
 
सन्दर्भ -

- अबंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली ( Structure of Garhwali Grammar)


२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल (Structure of Nepali Grammar)
 
३- डा. भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद (Study of Kumauni Language Grammar)

४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून ( Grammar of Garhwali Language)
 
५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला (Garhwali- Hindi Dcitionary)

६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून (Garhwali hindi Dictionary )
 
७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत

८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत
 
९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ

१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल (Briefs on Nepali Grammar)
 
११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल (Nepali Grammar)

१२- चन्द्र मोहन रतूड़ी , गढ़वाली कवितावली ( सं. तारा दत्त गैरोला, प्र. विश्वम्बर दत्त चंदोला) , १९३४, १९८९
 


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Kumaoni Grammar
 Garhwali Grammar
Uttarakhandi Grammar
 Nepali Grammar
Grammar of Mid Himalayan Languages

            मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -41


Comparative Comparative Study of Kumaoni Grammar,Garhwali Grammar,Uttarakhandi Grammar,Nepali Grammar ,Grammar of Mid Himalayan Languages-Part-41

                                                  सम्पादन : भीष्म कुकरेती


                                 Edited by Bhishm Kukreti


                     गढ़वाली में वाच्य विधान

अबोध बंधु बहुगुणा व रजनी कुकरेती ने वाच्य विधान की विवेचना की है. रजनी कुकरेती की विवेचना विस्तृत है . अत: बहुगुणा का वाच्य विधान की विवेचना यहाँ   देना तर्क संगत होगा

                          वाच्य

कर्तृ वाच्य ---------------------------------------कर्म वाच्य

१- तिन पोथि बांचे ---------------------------१- त्वेसे पोथि बंचेगे

२-भुला हिटणु ह्वलो ------------------------२- भुला से हिटेणु    ह्वलो

कर्तृ वाच्य--------------------------------------भाव वाच्य

१- -मिन नि बैठण ----------------------------१- में /मी से नि बैठेणो/बैठ्याणु 

२- ब्योली शरमाया करदन --------------------२- ब्योल्यों से शरमाया जांद

३- मी नि कौर सकुद /सकदो -------------------३- मी /मी से नि करे सकेंदो



सन्दर्भ -

- अबंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली ( Structure of Garhwali Grammar)


२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल (Structure of Nepali Grammar)

३- डा. भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद (Study of Kumauni Language Grammar)

४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून ( Grammar of Garhwali Language)

५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला (Garhwali- Hindi Dcitionary)

६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून (Garhwali hindi Dictionary )

७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत

८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत

९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ

१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल (Briefs on Nepali Grammar)

११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल (Nepali Grammar)

१२- चन्द्र मोहन रतूड़ी , गढ़वाली कवितावली ( सं. तारा दत्त गैरोला, प्र. विश्वम्बर दत्त चंदोला) , १९३४, १९८९

 

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                       मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -42



Comparative Comparative Study of Kumaoni Grammar,Garhwali Grammar,Uttarakhandi Grammar,Nepali Grammar ,Grammar of  Himalayan Languages-Part-42



                             सम्पादन : भीष्म कुकरेती
 
                     Edited by Bhishm Kukreti
 
 
                                         Kumauni and Garhwali Agriculture Related Words  - 1 


                                          कृषि सम्बन्धित कुमाउंनी  एवम गढ़वाली शब्द- १


हिंदी -----------------------------कुमाउंनी ------------------गढ़वाली

साझा बटोइ  पर--------------------अधेलो -------------------------अधेळ

अकुशल  --------------------------आशिपालु-------------------अयाणु   

लोहार की कार्यशाला------------------आँफर ----------------------  अणसाळ 

हंसिया ---------------------------------आंशि ------------------------दाथी

नमी ------------------------------------आद--------------------------आलि/आलु

मेंड---------------------------------------इचोलो /इचीव--------------मींड

हल का हत्था----------------------------उगौ-------------------------हत्ता/ हतेंडु

लम्बाई में खेत के किनारे --------------ऊंगपूंग --------------------चूंच

जड़ से उखाड़ना -------------------------उपाड़नो/उपाड़ण---------उपाड़ण/उपाड़णो/उपाडन

 भुनी हुई गेंहू की बालें ------------------उमा------------------------ऊमी /ऊम

एकत्रित करना --------------------एक बट्यनो/एक बट्युण-------इकबटोळण/बट्वळण 

लगातार --------------------------एक मल्या-----------------------इखारि

ऊखल -----------------------------ओखल --------------------------उर्ख्यळु/ उर्ख्यळ/उर्ख्याळि   

एक शाक जिसके बीज ---------- ओगल-----------------------------ओगळ

का आटा बनाया जाता है

खेतों में सीमासुच्क पत्थर ------------ओड़ो------------------------वाड/वाडु

चावल के टूटे/कटे छोटे कण/गेंहू ------------कनका ------------------कणखिल/कणखा   

खेती करना ---------------------------कमूनो-------------------------कमाण

छोटा खेत -----------------------------काति /कात्तो----------------क़तर

श्रमिक -------------------------------कामदार --------------------खेत्वाळु

खूंटा ------------------------------किलो-----------------------------कील

मुर्गी -------------------------------कुकड़ो---------------------------कुकड़ो/कुखड़

गुड़ाई में काम आने वाला औजार ---कुट्टी ------------------------ कुटळ /कूटी   

गूल, नहर----------------------------कुलो -------------------------कूल

सिंचाई करना ------------------------कुल्यूनो--------------------कुल्याण

कांटेदार झाड़ियाँ जिन्हें --------------केड़ो------------------------आड़ /आडु 

काट कर जला दिया जाता है

सवाया जैसा अनाज -------------------कौंनो ---------------------कौणि   

     

       

   

   

 

 

सन्दर्भ -

- अबंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली ( Structure of Garhwali Grammar)
 

२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल (Structure of Nepali Grammar)

३- डा. भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद (Study of Kumauni Language Grammar)
 
४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून ( Grammar of Garhwali Language)

५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला (Garhwali- Hindi Dcitionary)
 
६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून (Garhwali hindi Dictionary )

७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत
 
८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत

९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ
 
१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल (Briefs on Nepali Grammar)

११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल (Nepali Grammar)
 
१२- चन्द्र मोहन रतूड़ी , गढ़वाली कवितावली ( सं. तारा दत्त गैरोला, प्र. विश्वम्बर दत्त चंदोला) , १९३४, १९८९

 

Comparative Study of Kumauni Grammar , Garhwali Grammar and Nepali Grammar (Grammar of , Mid Himalayan Languages ) to be continued ........
 
. @ मध्य हिमालयी भाषा संरक्षण समिति

Bhishma Kukreti

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हुळि बगत पर लिखवारूं  दगड चबोड़-चखन्यौ,  मजाक मस्करी मा

(satire in Garhwali , Satire in Kumauni, Satire in Uttarakhandi Languages)



          चबोड्या - भीष्म कुकरेती

(लिखवार दगड्यों !बुरु मनेल्या त रोष अपण  घर्वळयूँ  पर गाडीन भैरों! )



1- जब बिटेन घ्वाडों मा 'हौर्स पावर' छौ तब तलक घ्वाडों की बडी पूछ छे

अच्काल होर्स पावर रेल, गड्डी, मोटर बाईकुं  इंजिनुं मा चलि  गे त अब बिचारा घ्वाडा इन ह्व़े गेन जन कै जितण वाळ नेता की जमानत जफ्त ह्व़े गे ह्वाऊ धौं

 

2- एक दिन पूरण पंत  द्न्तुं डाक्टर मा दांत दिखाणो गेन 

आदिमन डाक्टर तैं पूछ बल " म्यार अग्व्वाड़ी  एक दांत तुड़न छौ . डाक्टर साब ! कथगा पैसा प्वाड़ल   ? "

डाक्टरौन बथाई  बल " जादा ना एक हजार रूप्या. ल्या इं खुर्सी  मा बैठो. द्वी मिनट  मा ..."

पूरण पंत न   क्लिनिक बिटेन भैर आन्द आन्द ब्वाल, " रौण द्या, कै कवि सम्मलेन मा कै कवि क   दगड़  झगड़ा करुल  त एक क्या द्वी दांत त  टुटि जाला..'

३-  एक दिन एक लिख्वार डिल्ली बिटेन अपण गौं अयूं . लिख्वार तैं जुवा खिलणो शौक चौ .  जुवारि लिख्वार  नयार नद्यौ  छाल तर्फां ग्याई. उख कुछ काम होणु छौ.

प्रवाशी जुवारी न गजेंदर तैं पूछ बल  ' क्यानको काम होणु च भै?"

गजेंदर न जबाब दे बल , " भैजी ब्रिज बनौणो काम  हूणु च ."

प्रवासि जुवारी गढ़वाळी न  खौंळेक   ब्वाल, कनु भंगुल जाम, कन बिजोग पोड़ !  , तुम सौब ब्रिज बणौना  त  छंवां पण खिलणा किलै नि छंवां ?"

४- भौत पैलै बात च पौड़ी क उकाल्यौ   बाटो म  कवि वीरेंदर पंवार न अपण सुवा कुणि बडी कळकळि भौण मा ब्वाल  ' ए सुवा !

मीम इथगा बड़ो  मकान त नी च, ना इ मीम क्वी कार च जन  श्रीनगर मा म्यार दगड्या जोगेंदर मा च. पण मि  त्वे से भौत प्रेम करदो ."

" प्रेम त मि बि करदो छौं ." नौनी न जबाब मा ब्वाल, "  पण ज़रा  जोगेंदारो  घौरौ  पता त बथा ?"

आज वा नौनी जोगेंदरौ घर्वाळी च

५- श्रीनगर  युनिवरसिटी मा डा. दाता राम पुरोहित पढ़ाना छया, ' हमन सुलार  पैरण मुसलमानी राजाओं मांगन सीख; , अंगरेजूं मुंगन   पैंट, हैट टाई,

 पैरण  सीख , इनी क्वी उदाहरण  द्याव्दी."

एक पढंद्यारो  जबाब छौ, " तमाखू पीण मीन अपण काका मुंग  सीख, अपण बुबा जी मंगन मीन गाळी दीण सीख, अर बहुगुणा जी- नेगी जी क चुनौ

बिटेन झूट बुलण सीख."

६- एक  लिख्वारन उत्तराखंड  खबर सारौ सम्पादक विमल नेगी कुण   एक लम्बो लेख भ्याज. विमल नेगी न लिख्वारो खुणि जबाब भेज,

आदरणीय कलमदार जी ,

अपण दुश्मनौ  ददा, पड़ ददा अर भ्रष्ट नेतौं कसम खैक/ सौं घौटिक  लिखणु  छौं बल ये लेख तैं बंचण मा जथगा  रौंस आई उथगा रौंस कबि

बि कैं  लेख बंचणम  नि आई . झूट लिखणु होऊं .त म्यार सब्बी दुशमनुं  पुरखा नरक जैन अर सब्बी भ्रष्ट नेता मड़गट जोग  ह्व़े जैन.

नागराजा, उफरैं देवी  क कसम छन जु मि ए लेख तैं खबर सार मा छपुल त  मै तैं पूरो भर्वस  च  अगवाडि क दस हजार बर्सुं   तलक क्वी बि गढवाळी मा याँ से

खत्युं लेख  लिख्याण त दूर घडे /सोचे बि नि सक्यालु . दारु मैफिया क गुसैञ  सौं लेकी लिखणु छौं बल  हम तैं बड़ो दुःख च बल इथगा बड़ो स्टैंडर्डौ 

लेख  हमारा बंचनेरूं समज से भैरो बात च.   तुम से  हथ जुडै च बल तुम सिरफ़ द्वी चार इनी लेख अंग्रेजी मा छपवाओ  अर मैं तैं

पुरो भर्वस च जै दिन यू लेख अंग्रेजी मा छपी गे त वैदिन इ  अंग्रेजी जड़ नाश ह्व़े जालो या अंग्रेजी भाषा तड़म लगी जाली , अंग्रेजी की सटाक  से डंडि   सजी जाली अर दुनयौ हौरि भासौं   

भलो ह्वाऊ या नि ह्वाओ गढ़वाळिअ  त  भलो ह्वेई जालो.

हे ! नरसिंग, हे नागराजा! इन लेख कबि खबर सार क्या कै बि गढ़वाळी पत्रिका मा नि पौंछणौ    बळिञछा  (कामना ) मा अर

तुम से कबि गढ़वाळी मा लेख इ नि लिखे जाओ कि पुरी आस  मा

 तुमर त ना पण  गढ़वाळी हितैषी --विमल नेगी

७-** नामी गिरामी गढ़वाळी साहित्यौ  समालोचक भगवती प्रसाद न भीष्म कुकरेती क छाळी गढ़वाळी  लिखण पर पारेशार गौड़ मा ब्वाल

अर पूरण पंत मा बि ब्वाल, '  यू जाबळु  भीषम,  छाळी गढ़वाळी मा लिखणो इनी पुठ्या जोर लगांदु जन बुल्यां क्वी गैबण गौड़ी  कुटैम  पर स्वील होण चाणि ह्वाओ .

हूं!  गौड़ी तैं बि डा अर गौड़ी क मालिक-मालिक्याण की  बि रोणि धाणि ." हाँ ! भगवाती प्रसाद जी क समणि  डा अचला नन्द जखमोला संकलित-संपादित गढवाळी -हिंदी -

अंग्रेजी शब्द कोष छौ. 

 

८-** थाणे मुंबई मा उत्तराखंड महा सभा की एक अखिल भारतीय बैठवाक छे. विषय छौ ' मुंबई मा कुमाउंनी-गढ़वाळी कनकैक बचये जाऊ !"

पैलो भाषण डा. बिहारी लाल जालंधरी को छौ. डा. बिहारी लाल जालंधरी को छौ. डा. जालंधरी न भाषण मा ब्वाल बल कुमाउंनी अर गढ़वाळी 

क ध्वनि एकी छन. भाषण सूणि आधा से जादा लोक सुरक से हाल से भैर चली गेन

दुसर भाषाण छौ डा. राजेश्वर उनियालौ , डा. उनियालौ न लोगूँ तैं बिंगाई/समजाई  बल कुमाउंनी  अर गढ़वाळी  भाषा तैं मिलैक एक हैंकि तिसरी भाषा नि बौणलि

त  गढ़वाळी अर कुमाउंनी भाषा नि बची सकदन. डा. उनियालौ भाषण सुणदेर त सुणदेर (श्रोता),  स्टेज मा बैठयाँ स्टेज प्रेमी अर डा उनियाल बि  हौल छोडि

भैर ऐ गेन.

स्टेज मा बुलणो बारी छे डा नन्द किशोर ढौंडियाल की. डा नन्द किशोर ढौंडियालन द्याख बल एक विद्वान् सि आदिम स्टेज मा छौ.

 डा. ढौंडियाल न वै आदिम मा ब्वाल, " द्याखो भै !  तुम बि भैर जाणा छंवां त भैर जै ल्याओ . कोटद्वार बिटेन बौम्बे आन्द आन्द अब तलक मी अपण

' गढ़वाळी बचाने हेतु - प्रवासियों में कैसे गढवाळी की नई लिपि प्रचारित की जाय' भाषण रटणो इ छौं. क्वी सुणदेर नि बि ह्वाओ त मीन भाषण पढ़ण च"

स्टेज मा रयुं एकी आदिम न जबाब मा ब्वाल, '  मीन बि अपण भाषण ' जब तक गढवाळी मा हाइकु कवितौं प्रचार नि ह्वालू, तब तलक गढ़वाळी

नि बची सकदी" बीस दै रट . आज चाहे खम्बों तैं भाषण सुणौल़ू , मीन भाषण  दीण इ च ."

जब डा ढौंडियाल अर चौथू बक्ता का परिचय ह्व़े त पता चौल बल यि चौथा बक्ता अहमदाबाद मा रौणवाळ  डा. धर्मा नन्द जदली  छ्या. .

** ड्याराडूण मा  गढ़वाळी कवि  सम्मलेन छौ . स्युंसी बैजरों   बिटेन छिलबट   बि  कवि सम्मेलन मा बुलये गे छ्या.

सम्मलेन हाल क नजिक छिलबट  बाळ कटवाणो एक सैलून मा गेन

छिलबट ज़रा गंवड्या लिवास मा छया .

नाई न छिलबटो  बाळ कटद-कटद बथाइ, " आज फलण  हौल मा कवि सम्मेलन च. अर छिलबट कवि बि आणो च "

छिलबट न खौंळयाणों   भौण मा ब्वाल," अच्छा ! बड़ी मजेदार बात च बल छिलबट कवि बि औणु च !"
 
नाई न पूछ , '" मै लगद तुम बि कवि सम्मलेन  मा जाणा छंवां  ?"

छिलबट ," हाँ  ! विचार त इन्नी च ."

नाई," त टिकेट या पासौ इंतजाम ? पास या टिकेट नि ह्वाओ त फिर छिलबटो  कविता खडु  ह्वेकि सुणन  पोड़ल"

छिलबट , " ना मीम छें च  पास."

नाई, " वा !  .म्यरा गाहक बुल्दन बल छिलबटो कविता सुणण ह्वाओ त बैठिक इ सुणण चयेंद. वो इन बुल्दन

बल छिलबटो कविता खड़ो ह्वेक सुणण मा कतै बि रौंस/मजा नि आन्द. तुम त भाग्यशाली छंवा जु आज

खुर्सी मा बैठिक छिलबटो सुणनौ मौक़ा मिलणो च   "

छिलबट न रुणफति  भौण मा जबाब दे ," म्यार दुर्भाग्य च , बल जब बि मीन छिलबटो कविता सुणिन

खड़ो ह्वेक सुणिन ."

** एक दिन कनाडौ बासिन्दा पाराशर गौड़ अर ड्याराडूणो रंत रैबारऔ सम्पादक इश्वरी प्रसाद उनियालौ फोन पर छ्वीं लगीन

गौड़," उनियाल जी ! यार आप कबि बि मेरी चबोड्या कविता नि छपदा ?"

उनियाल," ह्यां ! आपका गद्य आपका पद्य से  बिंडी सवादी छन . "

गौड़," पण आपक इ रंत रैबार मा आपन भगवती परसादौ लेख छाप , जखमा नौटियाल जी न ल्याख

म्यार  गद्य गद्य बुलण लैक बि नी च."

उनियाल," गौड़ जी ! नराज  नि ह्वेन, अब नौटियाळ  जी निखत से निखत लेख बि ल्याखाल त हम सम्पाद्कुं तैं छपणइ   पोड़द '

गौड़," अरे , नौटियाळ जीन कनाडा बिटेन वैट ६९ की बोतळ मंगे छै अर वैट ६९बोतळ ल़ाणे लै छयो पण  वीं बोतळ तैं मदन डुकलाण,बिष्ट जी,  रमेश डंडरियाळ 

आदि घटगै गेनी. बस नाराजी मा नौटियाल जीन ...."

उनियाल," क्वी बात नी च अबी दें मदन डुकलाण से पैलि वैट ६९ की बोतळ मीं  तैं दिखे देन भली कविता त राई दूर  आपक सौब घळत्यण्या क्या   

खुट्या कविता बि छपी जाला."

 

** अप्रैल फूलअ  दिन ड्याराडूणडूण मा रेंजर ग्रौंड मा गढ़वाळी गीत संगीत  अर कवितौ  प्रोग्राम छौ. रेखा (धष्माना)  उनियाल बि स्टेज पैथर गीत गाणो तैयार छे.

उख  रेखा क  कजे/पति  राकेश उनियाल फैशनेबल टि शर्ट पैरिक ग्रौंड मा घुमणा छया. राकेश की शर्ट का अग्वाड़ी छ्प्युं छौ,"  मेरी धर्मपत्नी

रोमांटिक गाणा लिखदी बि च अर गांदी  बि च." अर शर्टो पैथरौ इबारत छे, " अर मी रोमांस की खोज मा रौंद" 

इनी रमाकांत बेंजवाळ की शर्ट का ऐथर लिख्युं छौ," मेरी पत्नी बीना प्रेम गीत लिखदी ." अर पैथर लिख्युं  छौ, " मी प्रेम की खोज मा रौंद."

** सुरेन्द्र सिंह सायर या चिन्मय सायर तब दर्जा छै मा पढ़दा छ्या. मास्टर जीन सुरेन्द्र जी क कापी  देखिक पैल सुरेन्द्र जीक मुंड मा खैड़ा कटांग

मार अर फिर गुस्सा मा ब्वाल," क्या बै सुलेंदर! कन खज्यात आई तेरी! अंग्रेजी क राइटिंग कनी च, किंगण्या इ किंगण्या  . कुछ पल्ला इ नि पड़णु

यू तयार लिख्युं क्या  च? राइटिंग सुधार !"

सुरेन्द्र जीन जबाब दे  ," मासाब जब राइटिंग साफ़ छे त आप खैड़ा कटांग लगान्द दें बुल्दा छ्या बल स्पेलिंग मिस्टेक ठीक कौर .."

* सुरेन्द्र सिंग या चिन्मय सायर की राइटिंग हिंदी मा बि पैल खराब इ छौ . एक दैञ सायर जीन एक भक्ति पूर्ण अर दार्शनिक

गढ़वाळी कविता   सत्यपथ मा भ्याज त कविता इन छे

मि भगवनि से प्रेम करदो अर भगवनि बान मी घरवळी छोड़ी देलू

मि धर्मी को दास छौं अर वींको बान ब्व़े -बाबु  छोड़ देलू

  ** एक बड़ा गढवाळी लिख्वार जरा देर से बिजेन  .

उंकी घर्वाळी न पूछ ," तुम तैं पता च आज क्या दिन च ?"

"हाँ ! आज भुप्यार च ," लिख्वारन चौड़ जबाब दे

घरवाळीन   उच्छंडेक ब्वाल , " आज हम तैं कुछ मनाण  चएंद, आज पच्चीस साल पैल हमारो ब्यो हे छौ."

पति न  ब्वाल, " ओहो! हाँ बिलकुल ! चलो द्वी,  मिनटों मौन रखिक बरजात  मनये जाओ."

** जादातर डा राजेश्वर उनियाल अपण नौनु तैं कार से जगता सगती /हड़बड़ाट मा स्कूल छोड़दन

एक दिन मिसेज उनियाल अपण नौनु तैं कार से स्कूल छुड़णो गे .

जब कार स्कूलों गेटऔ  अग्वाड़ी  पौंची गे  उनियाल जी क नौनु  न अपण ब्व़े तैं पूछ,"

ब्व़े! आज बाटो मां , एक बि  हरामी क औलाद, कुकरो लौड़ , गधौ लौड़ , अपण ब्व़े क  मैसु नि मील."

मिसेज उनियालौ जबाब छौ, "  हाँ! य़ी सौब तबी आन्दन जब तयार बुबा जी कार चलान्दन " 

** जग्गू नौडियालौ  न अपण रिश्तेदार पराशार गौड़ खुण चिट्ठी ल्याख -

म्यार बुबा जी तैं  घ्वाड़ा मा बैठण  मा कबि डौर नि लग.

पण बुबा जी तैं बस या कार से भौत डौर लगद  छौ.

मिं तैं कार या बस से कबि बि डौर नि लगी पण जाज औ नाम सूणिक इ  पुटुकुंद  डौरन च्याळ पोड़न बिसे जान्दन.

म्यार नौनु तैं  हवाई जाज चलाण मा डौर नि लगदी पण  घ्वाड़ा से इथगा डरदु ब्याओ  दिन बि  घोड़ीक समिण 

बि नि आई.

पाराशर गौड़ऐ  चिट्ठी इन छे -

 म्यार ददा जी तैं पाटी क  माटु मा लिखण मा कबि बि झिड़झिडि नि लग पण जनि कागज़ मा लिखणो बात आन्दि छे त ददा जी

अपण ममा कोट भागी जांदा छया

म्यार बुबा जी  तैं कागज मा लिख ण मा कबि बि अळजाट नि ह्व़े पण जनि टाइप राइटर से टाइप करणो बात आँदी छे, त बुबा जी

कैजुवल या सिक लीव ल़े लीन्दा छया

मी तैं टाइप राइटर मा टाइप करण मा क्वी झंझट नि ह्व़े पण जनि राजीव गांधियौ  क्वी कामौ  बान कम्प्यूटर मा काम करणो बगत आंदो छौ

मी  जग्वाळ फिल्मौ शूटिंग औ  बहाना लेकी कखी बि लंडखणो  चलि जान्दो छौ.

म्यार सबसे कणसो नौनु   तैं कम्प्यूटर मा काम करण मा क्वी अळजाट नि होंद पण जनि मी बोल्दु की 'मेरी तब्यत ठीक नि च. जरा  एक कागज़ मा

एक चिट्ठी लेखी दे',  त म्यार  नौनो मुख मा झामट  पोड़ी जांद अर वो दसरै गर्ल फ्रेंड लेकी दस बारा दिनों खुणि अमेरिका घुमणो चली जांद.

 ** गढ़वाली-हिंदी शब्द कोष को नयो एडिसन क कारण द्वी झण बीना  अर रमाकांत बेंजवाल मा झगड़ा ह्व़े गे.

रमाकांत बेंजवाल- ठीक च. मी अपणि गल्ति मानि ल्योलू जु तू मानि लेली बल मी सचमुच मा सही छौ

बीना बेंजवाल - ठीक च . आप पवाण लगाओ  (शुरुवात कारो).

रमाकांत बेंजवाल  -  हां! मी मणदो छौ बल सरासर गलत छौ

बीना बेंजवाल - आप बिलकुल सोळ आना सही छन

**  महेश ध्यानी न या कविता निखालिश गढवाळी पत्रिका कुणि भ्याज -

 न्याय मा   ढाञड पोडिन 

अर अन्याय मा बी  ढाञड पोडिन 

पण जादातर न्याय मा इ  ढाञड पोडिन 

किलैकि अन्याय मा

 न्याय कु   मुणुक च .

संपादक क समज मा कविता नि आई अर पोस्ट कार्ड मा उत्तर दे," ध्यानी जी !  हम हिंदी कविता नि छपदां ."

** महंत योगेन्द्र पुरी जी बुल्दा छया कति लोक मकरैणि,   बिखोत क  जग्वाळ  इलै करदन बल जां से  गंगा जी मा

नयेक ये साल औ पाप धुये जावन अर फिर  अग्वाड़ी हौर बि बड़ा बड़ा पाप करणो सुविधा मिल जाओ.

** गिरीश सुंदरियाळ  बामण  गिरी बि करदन. एक रात सुंदरियाळ जीन सत्य नारायण की कथा खतम कार अर

 एक बुडडि  आदमिण  तैं पूछ बल बोडी कन लग कथा ?

बुडडि जबाब छौ -पन्डि जी ! आजौ  कथा वीं कथा से त भली इ च ज्वा तुमन भोळ मेरी द्युराणिक इख सुणाण .

** नन्द किशोर हटवालौ  रिश्तेदार क इख सप्ताह छौ. हटवाल जी टक्क लगैक, जोगध्यान  मा व्यास जी क भगवत पाठ  सुणदा छया.

एक दिन सुबेर सुबेर व्यास जी न हटवाल जी तैं पूछ,"  कन लग म्यार भागवत पाठ ?"

हटवाल जीक जबाब  छौ, " जी व्यास जी ! अहा क्या बुलण ! ज्यू बुल्याणु च, आजि फांस लगैक मोरी जौं ! अर इच्छा च कि हैंक साल आपी म्यार सप्ताह

मा भागवत पाठ कारन."

** कवि कैलाश बहुखंडी   अर सुशील पोखरियाल मा कन्हैया लाल डंड़रियाळ  जी क कविता पर छ्वीं लगणि छे

कैलाश - यार भुला सुशील! डंडिरियाळ  जीक कविता - "हे भगवान स्ब्युं तैं धन दौलत दे पण में से कम",  तैं तू हैंको ढंग से कन लेखी सकदी 

सुशील - हे भगवान  ! कैलाश जी म्यार बड़ा प्रेमी छन . मैं तैं इन मौक़ा जरुर देन कि पैल त मी कैलाश जीक सांग पर काँद  द्यूं निथर

पश्त्यौ त जरुर द्यूं .

**  ललित केशवान जी  कुछ दिनु से बिचलित सि छया .कुछ लिख्याणु इ नि छयो . ललित केशवान जी प्रेम लाल भट्ट जी  क दगड़ वैइ  साधु मा गेन जैक

जिकर केशवान जीन अपण कविता 'घुण्ड बि  हिलाई' मा कौर छौ.

साधु न ब्वाल, " पुत्र ! एक त अपण भूतकालौ कामुं   समीक्षा कौर अर दगड मा अपण लिखीं एक एक कविता क  समीक्षा

तिन तिन दैञ कागज म  लेखिक कौर. तेरी चिंता दूर ह्व़े जाली."

अब केशवान जीन हंस्यौण्या  कविता लिखण छोड़ याल. 

प्रेम लाल भट्ट जी अब लेख लिखणा रौंदन बल "मेरो गढवाळी साहित्य हिंदी से कहीं अधिक भलु च .काश! मी हिंदी प्रेमी नि  होंद त .....!

** एक दिन चिन्मय सायर सुबेर सुबेर हगणो गुदनड़ गेन  उख लोगूँ ह्ग्युं गू से ऊँ पर दार्शनिकता क दिवता  लगी गे,  दगड़ मा

कविता नामै अन्छेरी बि लगी गे अर देखा-देखी  छपास को रणभूत बि लगी ग्याई .

चिन्मय जी न या कविता (?)ल्याख -

गू होंद च

ह्व़े सकद च गू हूंद  इ च

जु गू होंद  वु  असल मा  बिल्कुली गू नी च ,

जु गू गू हूंद  च त गू को नाद बिन्दु (ध्वनि केंद्र) क्या च ?

जु गू मा नाद (ध्वनि) हूंद   च त गूओ नाद कति किस्मौ  च ?

क्या गू ओ नाद सूक्ष्म च कि प्रखर च ?

क्या गू ओ नाद मन तै अमन करण मा सक्षम  च ?

गू द्वैत च या अद्वैत च ?

गूअक प्रारब्ध क्या च?

क्या पुटुकौ खाणक अर गू  एकी छन या गू द्वी रुपी  च

क्या गू हेय च ?

क्या गू हेयहेतु च ?

क्या गू हान  च ?

जु गू हेय च त गू क हानोपाय  च ?

सायर जीन कविता 'डांडि - काँठी' खुणि भेजी दे.

 'डांडि - काँठी'क सम्पादक केशर सिंह बिष्ट  जीक जबाब छौ

सायर जी !

आपकी कविता मा गू की गुवण्या  रस्याण खूब  च 

पण मेरी पत्रिका मा केवल शिट  अर जादा से जादा बुलशिट वाळ   विषय छपे जान्दन   !

 क्वी शिट या बुलशिट की कविता ह्वाओ त भ्याजो

शिट  या बुलशिट कवितौ जग्वाळ मा !

** जगमोहन जयरा रुड़यूँ  मा अपण दस सालौ नौनु तैं ड़्यार गढ़वाळ घुमाणो लीगेन.

 डिल्ली  बौड़णो कुछ दिन परांत एक दिन जगमोहन न नौनु पूछ बल " भगवान क्या हूंद ?"

दस सालौ नौनू जबाब छौ, " जु पुंगडौ   आळ पुटुक  ह्वाऊ त ल्वाड़ हूंद, गौं मंदिरों ह्वाऊ त  कनि बि हूंद अर हमर डिल्ली मा ह्वाऊ त बिगरैलु  मूर्ति हूंद."

**

गढ़वाळी मा मिरतु पर भौत काम लिखे गे . पण मुंबई मा मीन   मड्वे बौणिक मड़घट म पश्त्यौ बचन (शोक-श्रधांजलि ) सुणि छन जन की -

अ- एक गढवाळी राम लाल जी जु सद्यनि दुबई राई अर अचाणचक मुंबई  मा हार्ट अटैक  से भग्यान ह्व़े गेन.

डा राजेश्वर  उनियालन पश्त्यौ बचन मा ब्वाल," राम लाल जी अब हमर बीच नी छन ..."

म्यार काखम खड़ा बलदेव राणा जीन न मी तैं पूछ," पण राम लाल जी कबि बि मुंबई नि रैन . फिर उनियाल जी झूट किलै बुलणा छन ?"

ब-डा राधा बल्लभ डोभाल  न एक मड़घटम  पश्त्यौ बचन मा दार्शनिक जॉर्ज  संतायाना क बचन द्वरै  दिने, "  जनम की  क्वी दवा नि च अर मिरतु

इंटरवेल मा मजा ल़ीणो दवा च." वै दिन बिटेन डा.डोभाल तैं पश्त्यौ बचन बुलणो क्वी नि भटयांदु. '

स - भग्यान प्रोफ़ेसर मनवर   सिंह रावत  जी बड़ा ज्ञानी अर दार्शनिक छया . वीर चन्द्र सिंह गढवाली क पश्त्यौ बैठ्वाक मा प्रोफ़ेसर रावत न या कथा सुणै

भगवान बुद्ध तैं एक च्याला न पूछ ," भगवान ! क्या मिरतु अगनै जिंदगी च ?"

बुद्धौ जबाब छौ," सवालौ जबाब नी च अर बेकार की छ्वीं  छन." फिर बुद्धौ न द्यू क जोत क तरफ इशार कौरिक पूछ," द्यू जळण  से पैल या ज्योत कख छे ?"

च्याला न ब्वाल," कुज्याण ! एक तरां से सवाल इ गलत च. द्यू जळण  से पैल ज्योत छें इ नि छे"

बुद्धौ न द्यू बुझाई अर पूछ," अब जोत कख गे  ?"

च्याला," मी नि जणदो " 

बुद्धौ ण ब्वाल," हम तैं वी बात करण चएंद  जु हम जाणदा छंवां  "

ड़- मुंबई मा भग्यान डा. शशि शेखर नैथाणी सेंत जेवियर कोलेज मा गम्भीर से गम्भीर विषय तैं हौंस -मजाक मा पढ़ाणो बान प्रसिद्ध छ्या .

शैल-सुमन की एक बैठ्वाक मा स्वर्ग-नर्क  क बारा मा डा.नैथाणी न ब्वाल," सोराग एक इन शब्द, चीज च जै तैं जण्या बगैर, जै तैं  दिख्यां बगैर हरेक मजा लींद अर हरेक खुश होंद.

इनी नरक च,  अबि तलक क्वी माई क लाल पैदा नि ह्व़े जैन नरक देखी ह्वाऊ पण हम नरकौ  नाम सूणिक डरण बिसे जान्दां   "


कौपी राईट @ क्यांको कौपी राईट ? चोरिक माल च जब चाओ कट  अर पेस्ट  करी द्याओं

Bhishma Kukreti

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                      Adalat: A Realistic Garhwali Drama

        (Review of Garhwali Drama by Swarup Dhoundiyal)
(Garhwali Drama, Kumauni Stage Plays, Uttarakhandi Playwrights) 

                          Bhishm Kukreti

                Bhavani datt Thapliyal initiated writing and staging Modern Garhwali drama (Prhalad and Jay-Vijay). No doubt the subject and dialogues of Prahlad are related to society but on the back the background is religious in nature. The dramas staged at government built drama building in Tihri; dramas of Ghana Nand Bahuguna, drama Vasanti by Vishwambar Datt Uniyal ,  Professor Bhagwati Prasad Panthari; or popular drama written by Jeet Singh Negi were idealistic in nature. The dramas of Lalit Mohan Thapliyal were humorous and satirical dramas with certain kind of loudness too. The dramatists entered in the Garhwali dramatic field after Lalit M Thapliyal as, Parashar Gaud, ‘Kankal’, Virendra Mohan Raturi, Kishor Ghildiyal, Damodar Thapliyal, Hari Datt Bhatt Shailesh were influenced by orthodox disciplines of Indian dramas. Or it is said that those dramas were not on the tune of realistic dramas as the general movement of realism of western countries.
               The dramas Jank Jod (1975) and Ardhgrameshwar  (1976) by Rajendra Dhashmana were nearer to realism but the drama critics as Dr. Sudha Rani did not put these dramas in the category of realistic dramas as dramas of realism movement dramatists Aleksey Pisemsky, Leo Tolstoy, Chekhov et.
Afew critics categorized dramas of Dhashmana as modern look, experimental dramas or the dramas those broke the conventional ways of stage plays of Garhwali dramas. However, there is no doubt that Dhashmana brought modernization and real subject into modern Garhwali drama.
    Influenced by the response of audience and appreciation from non Garhwali crtics about Ardhgrameshwar, Swarup Dhoundiyal a famous Hindi fiction writer of his time wrote a Garhwali drama ‘Adalat’.  Adalat was staged in Delhi first time in the year 1978. The drama was staged eight times in Delhi. The dram was also staged in Mumbai and a few places of Garhwal as Synsi.
 The drama is truly a realistic Garhwali drama.
   The story is about tension among the family members of Garhwal of sixties and self perplexity of each family member. Everybody asks justice from the society (not shown directly) as everybody feels that she or he is right on her/his part as a family member.
          Keshar Singh is a peon in Chandigarh whose parents, wife and his child are in village. Parents of Keshar singh had to sell ancestral agriculture –fields at the time of study and marriage of Keshar Singh.  His income is not much that his parents could repay the debts of Daulat Ram. Keshar Singh has come to his village from Chandigarh and wants to take his wife with him to Chandigarh. His parents don’t want that he takes his wife to Chandigarh as they are quite old. Wife of Keshar Singh is unhappy about small –small accusations from her mother in law. Other characters are there to show the tension among family members.
 The drama is having real subject of Garhwal before seventies when migrated young or older males wanted to take their families to their working places and elders of the family wanted that Bahus/daughter in laws should be in the village.
         The situation and dialogues are totally realistic and least idealism is shown in the drama.
 Swarup Dhoundiyal used daily use dialogues and the drama is the real mirror of villages of Garhwal of pre seventies.
  Swarup Dhoundiyal brought aspects of realism in Garhwali drama as true characters, dilemmas of real characters. Dhoundiyal had been successful in creating direct attention of social and psychological problems of ordinary life. Most of the scenes are true mirror of life.  Keshar Singh and his wife at different time asking judgment (from whom?) is nothing but characters unable arriving at answers to their predicaments.
  Swarup Dhoundiyal will always be remembered in Garhwali drama world for bringing realism in Garhwali drama.  History will always remember late Swarup Dhoundiyal for strengthening realism in Garhwali drama world as people remember realistic dramatists Ibsen, Chekhov, Arthur Miller, O. Neil Athol Fugard, Oriel Gray, Inez Bensusan, Oscar Kightley,  Perez Galdos, etc.
Garhwali Drama, Kumauni Stage Plays, Uttarakhandi Playwrights to be continued….

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Bhishma Kukreti

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Aili Meri Paudi? : A Garhwali Drama Attacking on Corrupt Practices in Government Administration

   (Review of ‘Aili Meri Paudi?’ written by Girish Sundariyal)
           (Garhwali Drama, Kumauni Plays, Uttarakhandi Stage show, Himalayan Dramas)

                                        Bhishm Kukreti

            These days, satire is very common in Garhwali poetry, prose, story, films or in stage plays. The Garhwali creative understand very well their role as critics of their societies and happening in government administration.   As African contemporary writers are also conscious about wrong happenings in Africa (Lokangaka Losambe and Devi Sarinjeiv, 2001, Pre and Post colonial Drama and Theatre in Africa, pp.53), the Garhwali writers are disturbed eyewitnesses of corruption, evil methods in government-administration, exploitation, injustice, ridiculousness around them.  The Garhwali drama writers of twenty first century    as Kula Nand Ghansla, Bhishm Kukreti , Narendra Kathait and  Girish Sundariyal preferred satire as best tool for showing ridicules in the society and in government administration. The dramas of recent dramatists definitely are tools for restoring indigenous language, language promotion and language protection simultaneously.   
            Aili Meri Paudi? is one of the five dramas from drama collection ‘Asgar’ by Girish Sundariyal (2011) .      ‘Aili Meri Paudi?’ drama by famous Garhwali poet Girish Sundariyal is about an old widow of an army soldier not getting her pension. She found that she is not getting pension because according to government papers she is not alive but is dead. She visits pension-office at Paudi the capital of Paudi Garhwal. There she meets staff from peon to chief officer.  The audience experience the selfishness of government staff; ill treatment and insensitive behaviors of government staff towards the weak people as an old widow; no botheration by government workers for serving people but worried about their income and recreation; red tapes in government offices.  The audience experiences the torture and agony of a widow in the drama.
 The characterization is perfect in this drama by Sundariyal and is successful in showing the putrefying system in government offices which are becoming ant-people.
 The specialty of this drama is its well written dialogues. The dialogues are small and fit to characters. The conversation looks like daily life conversation.
The last dialogue ‘ Aili meri Paudi?’  is itself very attentive as it has multi meanings – Will you come to my Paudi, why did you come to Paudi  or you will get trouble coming to Paudi.
 The director will get pleasure in directing the well constructed drama ‘Aili Meri Paudi?’ by Girish Sundariyal.


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