नरेन्द्र सिंह नेगी दगड़ा वीरेन्द्र पंवार कि मुखाभेंट
Virendra Panwar Interviews Legendary Narendra Singh Negi
[ नरेन्द्र सिंह नेगी गढ़वाळी गीत-संगीत जगत का पुरोधा त छई छन !वु
गढ़वाळी का बहोत्त अच्छा कवि छन अर कविता का बहुत अच्छा छाँट निराळ कन्न
वळ जणगूर बी ! पौड़ीमा वूंका घौरमु वुंसे गढ़वाळी कविता अर हौरि
विसयू पर लम्बी छवीं- बत्त व्हेनि ! इख्मु प्रस्तुत छन व़ी बातचित कि
खास - खास बात ]
सवाल : आजै गढ़वाळी कविता [१९८० का दसक बटी आज तकै ] तै आप कै तरौ से देख्दन ?
जवाब : आजै गढ़वाळी कविता अच्छा दौरमा छ ! गढ़वाळीमा जत्गा कवि आज
लिखणा छन,इत्गा पैलि नि छा ! यांसे अन्ताज़ लगै सकदा कि गढ़वाळीमा
कविता लगातार लोकप्रिय होणी छ अर ऐथर बढनी छ !.
सवाल : पुराणी अर अबारी गढ़वाळी कवितामा आपतै कत्गा अर क्या फरक मैसुस
होंदु ? यु फरक कथ्य अर शिल्प का देख्णन कत्गा अच्छो या बुरो छ ?
जवाब : गढ़वाळी कि पुराणि अर नै कवितामा सबसे बडू फरक यो छ की पैलि कविता
छंदमा लिखेंदी छै !अब हिंदी कि तरो मुक्तछंद मा लिखे जाणि छन .पुराणा
समयमा कवितो का विषय जादातर धार्मिक अर सामाजिक उत्थान वळ होंदा छा !
गढ़वाळी का पुराणा लिखवार हमारा इत्यास का जीतू बगद्वाल,तीलू
रौतेली,माधो सिंग भंडारी जना पात्रु से प्रभावित रैनी,त वून यु पात्र
अपड़ी कवितोंमा उकेरनी ! आज आम आदिम पर कविता लिखेणी छन! आजै कविता
कथ्य अर शिल्प दुयों का देखण से बदलेगी ! आजा कवि आम आदिम तै
केंद्रमा रखिक कविता लिखणा छन, वेका सुख-दुःख समेत सबी सरोकार तई
शब्द देणा छन! ज्व़ा अच्छी बात छ !
सवाल : ये फरक को ख़ास कारण आप क्या समज्दन ?
जवाब : ये फरको खास कारण पीढ़ीगत छ! आजा हालातमा फरक ऐगी,इल्लै
कवितामा फरक औणी छ ! गढ़वाळीमा पैलि नेतो पर कविता नि लिखेंदी छै, अब
बहुत लिखेणी छन!
सवाल : गढ़वाळी साहित्य मा जु कविता आज ल्यखेनी छन,आप वासे कत्गा संतुस्ट छन ?
जवाब : कवितों से संतुस्ट नि होए सकेंद! मि अबि बि अपड़ा गीत, कवितों
से संतुस्ट नि छौ! पर इतगा जरुर छ कि नया लिख्वार कथ्य तै जै तरो से
पकड़ना छन वासे लगदु कि भवेस्यमा अच्छी रचना लिखेलि ! अच्छी रचना
अनुभव से औंदन अर अनुभव उमर का हिसाब से औंदो! ज्वानिमा कतामत सी
रान्दी !
सवाल : आप्र गढ़वाळी कवितों से संतुस्ट नि छा ता यांको कारण ?
जवाब : य़ाका बिन्डी कारण छन! खास कारण यीबि छ कि गढ़वाळी लिख्वारू
तै विरासतमा कविता कि क्वी ससक्त परंपरा नि मिलि ! इख तक कि गढ़वाल बटी
हिंदी काव्य जगतमा अपड़ी धाक जमोण वल़ा लीलाधर जगूड़ी, विरेन डंगवाल
अर मंगलेश डबराल जना बड़ा कव्यून बी गढ़वाळी कवितै आलोचना ता करी छ, पर
यूंन अपड़ी लोकभासामा कबि क्वी कविता नि लिखि,क्वी उधारण समणि नि रखि
कि लोकभासोमा कविता इन्नी लिखेण चएंदी!
सवाल : गढ़वाळी कव्यु पर इन्नी भगार लगदी बल वु पुराणअ कव्यु
,रचनाकारू तै पड़दा नि छन ? सहि बात छ ?
जवाब : य़ा बात बहुत सइ छ ! यी किसमा लिख्वार बहुत छन,जौंन गढ़वाळी
साहित्य कि क्वी किताब तक नि देखि!
सवाल : यांका कारण ......?
जवाब : एक ख़ास कारण त यो छ कि अबा जमानामा मनोरंजना इत्गा साधन छन कि
कैमा किताब पड़णों समय नी! पैलि सिर्फ रेडियो छौ,तबारी पढना वास्ता
किताबो बहुत ग्लैमर छौ !
सवाल : गढ़वाळीमा पिछल्या तीन चार दशक बटी जादातर कविता हिंदी की तरौ
मुक्त -छंद मा ल्याखे जाणी छन ,आप क्या समजदन पड़दरअ पसंद कन्ना
छन ?
जवाब : असलमा छंद वाळी कविता पड़दरों तै याद रै जांद जबकि छंदमुक्त
रचना पड़दरों तै याद नी रैंदी ! पर जौं छंदमुक्त कवितों मा वजन होलो अर
अछि होलि वा जरुर पसंद करे जाँदि !
ललित केशवानै "पांच अंगुल़ा" अर आपै "क्वी स्वचदै स्वचदा मोर जांद" जनि
मुक्त छंद कवितों तै लोग बहुत पसंद करदन ! असलमा रचना तई लोगो की सोच
का साथ लिखे जावू त, लोकप्रिय होलि !
सवाल : गढ़वाळी भाषा बिसेस का देख्णन मुक्त छँदै नयी कविता का सामणि
ख़ास चुनोति क्या छन ?
जवाब : जन मिन बोलि असली चुनोती कथ्य कि छ ! आप कें बात तै कै तरो से
बोन्न चाणअ छन अर आपै बोंली बातमा कत्गा दम छ! असल बात या छ! अछि रचनो
तै त लोग आण-पखाणों कि तरो इस्तमाल करदन ! असली चुनोती पड़दरों कि बि छ
! ख़ास बात या छ कि अपड़ी भाषा का पड़दारा बि चयेणा छन !
सवाल : कव्यु पर इन्नी बि भगार लगणी छ बल वु नयी कविता नौ पर बहुत
कमजोर कविता लिखणअ छन ? कतगा सहि छ ?
जवाब : या बात बिलकुल सहि छ! असलमा लिखण से पैलि पुराणअ साहित्यकारु तै
पड़णों जरुरी छ ! हमुन बी जीत सिंग नेगी ,चन्द्र सिंग राही,केशव अनुरागी
बटी सुरुवात करी ! वून बी अफु से पैल्या लिखवार पड़ी होला ! परंपरा इन्नी
चलदन !
सवाल :आपतै नि लगदु क़ि गढ़वाळी की नयी कविता रूखी होंद जाणी छ ?
जवाब : रूखि त नि बोल सकदा , पर हां कवि तै मालूम होण चैन्द कि वु कविता
कैका वास्ता लिखणअ छन ! जनता कि पसंद को ध्यान बि रखण पोड़लो ! कविता
पड़दरों का बिंगणमा बि औंण चैन्द ! अर जु कविता पड़दरों का मानसिक स्तर
से ऐंच व्हे जाली त वा पड़दरों से दूर व्हे जाली !
सवाल :याँसे गढ़वाळी कविताक भवेस्य पर कत्गा फरक पोड़लो ?
जवाब : फरक त यु पोड़लो कि अछि कविता लिखेलि त कविता को भवेस्य बि अछू होलो !
सवाल : गढ़वाळी साहित्यमा जु गीत [ कैस्सेट वला ना ] लिखे जाणा छन,वूसे
आप कत्गा संतुष्ट छन ?
जवाब : असलमा मिन गढ़वाळी का जादा गीत पड़ी नीन, इल्ले यान्का
बारामा मि अपड़ी क्वी सौ-सला नि दे सक्दो! एक सच यो बि छ,अर या बहुत बड़ी
कमि बि छ कि लिख्याँ गीत लोगु तक अबेरमा पहुँचदन !
सवाल : आप क्या समज्दन कि अजकाला गढ़वाळी कैसेटी गीतुमा लोकतत्व
मौजूद छ ?
जवाब : लोकतत्व गीत-गीत पर निर्भर करदू !हम हिंदी जना
ब्यापक लोक छेत्र वाळी भाषा से अपड़ी तुलना नि करि सकदा ! हमारू बहुत
सीमित लोक छ, हम वेसे भैर जौला त पड़दारा, सुणदारा बिदकि जाल़ा!
तकनालोजी का विकास का दगडा- दगड़ी लोकमा बि फरक औणु रैद ! जीवन जिणों
तरीका बदलणअ छन, त लोकतत्व कि परिभाषा बि बदलनी रांदी!
सवाल : गढ़वाळी साहित्य की गीत या कविता बिधामा लोक तत्व बणय़ू राव,
खास करीक यांका वास्ता जरुरी क्या छ ?
जवाब : यांका वास्ता सबसे पैलि लिख्वारू तै अपड़ा लोक अर अपड़ा सरोकारू
कि जानकारी होणि जरुरी छ !
सवाल : आपका गितु कि भाषा, क्वी कख्यु बी हो ,सबी लोग आराम से बिंग
जन्दन ,जबकि कव्यू का लिख्याँ तै सबी एक समान नि बिन्ग्दन, यांको क्या
कारण होलो
जवाब : आपन या बात अछि छेड़ी ! जख तक मेरा गितु कि भाषा को सवाल छ, त
अपड़ा गितुमा मि यिं बातो खास ख्याल रखदो कि भाषा को चयन यिं तरो से हो कि
गीत सब्वी समज मा ऐ जावन! लिख्याँ अर लिखणों सम्बन्ध भाषा से छ !हम सबि
लिख्वारू तै इतिहास से सीखिक "फालो " कन चएंद!
सबि जणदन कि गढ़वाळी भाषामा लिखण कि सुरुवात राजदरबार बटी व्हे छाई
,याने टीरी बटी ! यांको मतलब यो छ कि ज्वा भाषा इत्गा पुराणअ समय बटी
लिखयेणी होलि,एक त लिखणमा रैण का वजे से वा सुद्ध होलि अर दुसरि वांमा
जादा बि लिखे होलु !
श्रीनगर अर यांका नजदिकै भाषा तै येइ कारण से गढ़वाळी कि मानक
भाषा बोले जान्द! एक बड़ा हित का कारण से हम सबि लिख्वारू तै "श्रीनगरी
गढ़वाळी" भाषा तै अपड़ा लिखण- पड़णमा स्वीकार कन चएंद ! भाषा का खातिर
हमतै अपड़ा खोला ,गौं ,पटी से भैर त औंण ही पोड़लो !
सवाल : गढ़वाळी गीत -संगीत जगतमा अच्छा गीत नि औणा छन यांपर आपै क्या राय छ ?
जवाब : मेरा बिंगणमा त यु आंदो कि लिखदरोंमा स्वाध्याय कि कमि छ!
सवाल : कैसेटु मा अच्छा गीत कम औणा छन ,यांको एक कारण इ बी व्हे
सक्दो कि गढ़वाळीमा अच्छा साहित्यिक गीत नि छन लिखेणा या कम लिखेणा छन ?
जवाब : दुर्भाग्य यो छ कि लोग कैसेटी गीतु तै हि गीत मनणा छन, अच्छा
गीत लिख्याँ बी होला पर किताबु का भित्रा गीत त भित्री रैगेनी!
सवाल : आपै रायमा साहित्यिक गीत भैर कनम आला ?
जवाब : संस्कृति बिभाग ये काम तै कर सकदो!अच्छा गीतु तै संकलित करीक
कैसेटु का जरिया घर-घर पोंछे सकदो !
सवाल : गढ़वाळी कवितामा खुद अर खौरी पैलि जादा छाई कि अबरी जादा अभिब्यक्त होणी छ ?
जवाब : समाज होंदु- खांदू होणु छ ! इल्लै खुद अर खौरि बी अब कम होणी छ !
पर यिं बात तै बि बिंगण पोड़लो कि लोक जीवनमा खौरि त राली ! इत्गा जरुर
छ कि अब खौरि का रूप बदल जाला, खौरि पैलि शारीरिक होंदी छाई, अब मानसिक
व्हे जाली !
सवाल : आजा गढ़वाळी समाज देखिक लगदो कि यखा लोग अब होंदा-खांदा व्हेगेनी
, इन्नामा यखा साहित्य पर कनु अर कत्गा फरक पोड़लो ?
जवाब : पंवार जि,असलमा हमारो दुर्भाग्य यो छ कि अपड़ी भाषा का निब्त
हमारी सोच ख़राब छ ! कुछ बरस पैलि गढ़वाळीमा "गढ़-ऐना " नौ से एक अखबार
निकल्दो छौ, वु बंद व्हे ! दारू फलणि -फुलणि छ ,बाकि चीज बर्बाद होणी छन
! इना होंदा -खान्दारो को बि क्य कन्न ? अपड़ी भाषा का निब्त जबारि तक
हमारा आँखा खुलदन,तबारी तक बहुत कुछ खतम व्हे जालो !
सवाल : इन्टरनेट से गढ़वाळी साहित्य तै कत्गा फैदा होलो ?
जवाब : इंटरनेट से बहोत्त फैदा होलो,किलैकि इंटरनेट तै पड़य़ू-लिख्यू
तबका अर ज्वान जादा इस्तमाल कना छन, अर यूँ दुयों तै अपड़ी भाषाई फिकर छ
!
सवाल : क्या अज्काले गढ़वाळी कविता अपड़ा समै अर समाज तै रेखांकित कर्द चलनी छ ?
जवाब : प्रयास होणा छन ,अच्छा स्तर कि रचना बि औणी छन!
सवाल : आपकि नज़रमा पलायन समस्या छ कि समाधान .......?
जवाब : मेरी नज़रम पलायन समस्या छ! पलायन, समाधान त व्हेइ नि सकदो!
सवाल : गढ़वाली कवितामा पलायन एक समस्या बणीक उभरी छ ? लोग ब्वल्दन
पलायन से प्रगति बी व्है गढ़वालमा ..!
जवाब : पलायन से आदमी अमीर त बण जालो,पर वेको गौं, संस्कार ,रिंगालै
कंडी, हौळ, निसुड़ा,लाट जनि कला सौब ख़तम व्हे जाला ! पलायन से प्रगति
ब्यक्ति की व्हे,गड़वाळ कि नि व्हे ! संस्कृति कि नि व्हे ! पलायन से
गौं,संस्कार,कला, सौब ख़त्म व्हे जांद! आदमी का लखपति,करोड़पति बणन से
क्वी संस्कृति नि बणदि ! होदा- खांदा अर लिख्याँ -पड्यां लोग अपड़ा घौरमु
गढ़वाळी अखबार या किताब त रख हि सक्दन !
सवाल : अजकाल गढ़वाळीमा कवि समेलन बहुत लोकप्रिय हूँणा छन ,यांका कारण....?
जवाब : पैलि गढ़वाळम साहितिक वातावरण नि छौ अब बणनू छ ! लोग कव्यु तैं
सुणन लग गेनी ! वुंकी लिक्खीं किताब बी पड़ण लग गेनी ! फरक त पोड़ी छ !
सवाल : मंचीय कविता से गढ़वाळी कविता तै कत्गा फैदा या नुकसान होलो ?
जवाब : कवि सम्मेलनों से बहोत्त फैदा हि व्हे अर होलो,मंचु से कव्यु तै
मंच मिली,नया कवि ऐथर ऐनी,कविता संग्रह छपेनी,कव्यु कि पछ्याण बणि !
हालाँकि कवितो का जरिया अपड़ी पछ्याण बनौण बहुत मुस्कल काम छ ! तौ बी
यांसे बहुत से कव्यु तै अपड़ा गौं खोल़ा का लोग बि पछ्याणन बैठ गेनी! आम
लोगु तै बी अब कविता पड़नौ, सुणनों ढब्ब पोडनू छ गढ़वाळी कविता अर
साहित्य दुयों का वास्ता या बहुत अछि बात छ !
सवाल : आप गढ़वाळी का पुराणअ कौं कव्यु से प्रभावित छन ?
जवाब : हर्सपुरि, तारादत्त गैरोला,चक्रधर बहुगुणा ,केसव अनुरागी,
गिरधारी प्रसाद 'कंकाल',केसव ध्यानी, अबोध बंधू बहुगुणा , कनाया लाल
डंडरियाल !
सवाल : अबारी गढ़वाळीमा बहुत कवि लिखना छन पर टीरी अर उत्तरकाशी बटी बहुत
कम लिखवार लिखणा छन, क्या करये जावु
जवाब : चमोलि बटी बि कम लिखणा छन! बकि हौरि जिलों बटी कुछ ना कुछ
जरुर लिखणा छन ! यूँ जिलोंमा भाषा का निब्त जागरुकता लौणे जर्वत छ !
किल़ेकि जै दिन गढ़वाळी भाषा को मानकीकरण होलो, वे दिन य़ू छेत्र का
लोगुन सबसे पैलि बोन्न की यी गढ़वाळी भाषामा त हमारि भाषा का शब्द नि
छन अयान ! जब क्वी अपड़ी भाषामा लिखलो हि न , त वखा शब्द कख बटी औण !
या हरेक मनखी कि जिम्मेदारी छ की वो अपड़ा इलाका का शब्दु तै जीवित
रखो ! वखा लिख्वार अपड़ी भाषामा नि लिखला त वे छेत्र का शब्द वखि रै
जाला या त हर्ची जाला !
यिं बातो आप तै एक छोटु सि उधारण देंदो ,मिन उत्तरकाशीमा कुछ फुल्लू
का नौ सुणनि, ई फूल सिर्फ उख ही मिल्दन ,हमारा यख [पौड़ी मा ] सैत नि
मिल्दन ! जनकि "जयाण ", "लैसर ," ताज" आदि, इन्नी अर इना बहुत सारा
शब्द !जयाण का फूल बी नीला अर पीला द्वी रंगा होंदन ! अब इना शब्दू
अर जानकारी तै वखा लिखवार ही त ऐथर ल्हाला !
सवाल : हिंदी अकादमी दिल्लीन साल २०१० मा पैली बार गढ़वालीक द्वी कव्यु
तै समान्नित करि ,या से गढ़वाली भासा अर साहित्य पर कत्गा अर क्या फरक
पोड़लो ?
जवाब : हिंदी अकादमी का पुरस्कार मिलण से फरक त जरुर पड़लो!
दुर्भाग्य यो छ कि अकादमी का यूँ पुरस्कार तै जादा प्रचार प्रसार नि मिल
साकि! अकादमि पछ्याण देली त लिख्वारू तै होसला मिललो !
सवाल : गढ़वाळीमा जबकि आपा गितुमा पूरी एक संस्कृति ज्यूंदी छ, आपतै नि
लग्दो कि आप तै अबारी तक रास्ट्रीय स्तर पर ‘ पद्मश्री ‘ या क्वी हैंको
बडू सम्मान मिल जाण चयेणु छौ ?
जवाब : जरुरी नि छ ! जत्गा सम्मान मेतै मिल्यां छन,वू जनता दियां छन अर
यु बड़ा सम्मान छन ! सरकारी पुरस्कार पाणा वास्ता प्रयास या सिफारिश
कराण पोड़दि ! य़ाकि मि कबी उम्मीद नि करि सकदू ! मि जब सरकार का खिलाप
लिखदो त पुरस्कार कनक्वे मिलण !
सवाल : नई पौंळ का लिख्वारू तै आप क्या सलाह देण चैल्या ?
जवाब : नई पौंळ का लिख्वारू से हतजुड़े कर सकदो कि गढ़वाळी समाज का बीच
बैठी लिखा त जादा बड़ीया लिखेलो,यखौ वातावरण लिखणों तई बहुत प्रेरित करदो
!लिखणा वास्ता वातावरण बहुत सहायक होंदो अर अच्छा वातावरण से बेहतर
रचना औंदन ! पित्र-लिख्वारो का लिख्या तई जरुर पड़न चएंदो!
सवाल : अर आखिर दा, आपे नजरमा गढ़वाळी कविता को भवेस्य क्या छ ?
जवाब : देश कि होरी भाषाऑ कि तरो गढ़वाळीमा बि अछि कविता लिखेलि त
कविता को भवेस्य बि अछू होलो अर कव्यु को बी !
with regards
वीरेन्द्र पंवार