Author Topic: Articles By Dinesh Dhyani(Poet & Writer) - कवि एव लेखक श्री दिनेश ध्यानी के लेख  (Read 24412 times)

dinesh dhyani

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जिन्दगी!

दिनेश ध्यानी-9/9/09/ समय- 6 बजकर 18 मिनट सांय।

जिन्दगी
कभी धूप कभी छांव
गरम रेत में नंगे पांव
कभी शहर, कभी गांव
कभी ममता की छांव।

जिन्दगी
कभी ओस पर चलने का
ठंड़ा अहसास
कभी आम, कभी खास
कभी अपने से दूर और
कभी अपने-अपनों के पास।

जिन्दगी!
एक बन्द किताब
आधी-अधूरी बात
कभी घात-अपघात
पूस की ठंड़ी रात।

जिन्दगी!
अपनों की चाह
बहुत कठिन राह
कभी एकदम सपाट
जैसे बोरी की टाट।

जिन्दगी
पथरीली जमीन
पानी बिन मीन
कभी धरती की माटी
कलम और पाटी।

जिन्दगी!
अधरों की प्यास
उम्मीदों की बारात
रेत पर लिखी इबादत
अनलिखी किताब।

जिन्दगी!
गांव की सौधी माटी की महक
धान की बालियों की चमक
कभी मुड़ेरों पर पसरी घास
भुनें भुट्टों की बास।

जिन्दगी!
गांव का पंदेरा
स्कूली बस्ता, पहाड़ी रस्ता
बचपन की यादों की बारात
बिछुड़े साथियों से मुलातात।

जिन्दगी!
पहाड़ का जीवन
पहाड़ से लड़ती औरत
कभी ममता की मूरत
कभी पहाड़ की चमकाती सूरत।

जिन्दगी!
बचपन की यादें
मां, बाप, आमा, बूबू के सपने
कभी भाई-बहन की कसमें
और कभी रीति, रिवाज और रस्में।

जिन्दगी!
स्कूल के वे दिन
घास-पात, खेती पाती
कभी घास और दंरांती
मेरा गांव की यादें और
दूर परदेश से आती पांती।


जिन्दगी!
उनकी चाहत
एक अनपढा सा खत
सपनों की बारात
कभी सुबह और कभी रात।

जिन्दगी!
उनका अहसास
करीब होने का फसाना
कभी हंसना और कभी रूलाना।

जिन्दगी!
उनसे मीठीं बातें
उनींदी होती रातें
कभी दिन-रात की तपन
एक अजीब सी तड़पन।

जिन्दगी!
उनका रूठना मनाना
कभी पास आना
और कभी दूर चली जाना
एक अजीब सा फसाना।

जिन्दगी!
उनसे मिलने की ललक
जमीं और कभी फलक
कभी अजीब सी बातें
तारे गिन-गिन कटती रातें।

जिन्दगी!
नसीब का खेल
अपनापन मिला तो पास
नहीं तो एकदम फेल
कभी जो मिला अपना सा कोई
जिन्दगी लगती साफगोई।

जिन्दगी!
प्रेमिका की मुस्कराहट
पत्नी से खटपट
कभी अलगाव की सौगात
फोन पर मीठी बात।

जिन्दगी!
एक अधूरी किताब
अधूरे चुने ख्वाब
अधूरी सौगात
कभी पूरी नही होती बात।

जिन्दगी!
आपका अहसास
आपसे मिलन के बाद
लगती है खास
सच इससे पहले
कुछ भी नही थी रौनक
सबकुछ चलता यों ही यंत्रवत।

जिन्दगी!
सपनों की बारात
जिसके पूरे हुए
उसे लगे सौगात
और जो न पा सका मुकाम
उसके लिए बेकार
बकवास।।

जिन्दगी!
मिलना-बिछुडना
मानना-मननाना
खोना-पाना
आना-जाना
एक अनजाना तराना।


Dinesh Bijalwan

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bahut khoob dhyaniji-
ek choti kavita  aapke dhyanarth:

jeevan kaarm  kya maatr dristee bharm,
kitna saral par kitna abhooj
jitne muh utni baaten-
kya kuch aur bhi hai janm ke baad marne ki niyate ke-
saayad yah ki marne ke baad  mittee aur  hum mein phark nahi rahta
raja bhi rank ki bagal mein chain se sota hai-
ajeeb bidambana hai- jindgi bhar bujarva rahta hai ,
markar saamya vaadi ho jata hai

dinesh dhyani

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गढवलि आण-पाख।

1.   सूलि आग लग पूलि हाथ।
2.   उलटि ह्वै ब्याट करों कि द्योखर गैंन पात मंगण कु।
3.   उलटि रांड़ छै उंब्बु खुणि बोगिह्वैलि।
4.   अपण लाट कि सानि अफ्फि जणेंदी।
5.   जबरि जोगी दस बाट म आंद तबरि खनु घूसि दींद।
6.   तामा लौलिकु चलमुलु भात।
7.   जन्नों क तन्न बल ह्वाल कन्न।
8.   जन जयड़ तन्नि मयड़ा।
9.   हैंक कि माया अंद्यरम म छाया।
10.    ब्वारिकु सगोर दिखेंद सिवा लगाण बिटि।


dinesh dhyani

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गजल

दिनेश ध्यानी

कैम किलै रूणंू छै?

सुद् िकैम किलै रूणों छै
अपण आंसू किलै खूणंू छै,
दुन्या कौथग्यार ह्वैग्ये लाटा
माया कैथै बिगांणू तु छै?

लोग समणि जु ब्वलदी यख
क्यो कु विश्वास करणू तु छै,
यों कि चाल्यों थै बिगणू नि तू
तबि त दिन-रात पछताणु छै।

ओंम सुख-दुख लगै कि क्य कन?
जौल ठट्टा हि समझण त्वैं थै,
ओंम आंसू ब्वगांदि किलै
जौल आंसू नि फुंजणा ज्यरा।

अब त चुप रै क्यो बौल्या बण्यंू
सुद् िजै कैम क्यो रूणू छै,
अपणा आंसू बटोरि रख
यों कि कीमत क्यों समझदि नि छै?


dinesh dhyani

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अधिकार

दिनेश ध्यानी

तुमने कहा था
तुम पर मेरा
किसी भी सूरत में
अधिकार नही है।

हे! मित्र मैं मानता हॅू
और जानता भी हूॅ
लेकिन यह भी निवेदन चाहता हॅूं
कि अधिकार मात्र शब्द भर नहीं।

अहसास का आकार लेना
किसी को अपना समझना
और उससे कुछ अपेक्षा
कुछ हठ पूर्वक अपनेपन से चाहना
मात्र अधिकार नही मित्र!।

जो जीवन पथ में प्रिय लगे
जो भी अपनेपन का अहसास कराये
चाहे वह मित्र हो, सखा हो,
जिसे मिलकर ऐसा लगे कि यह अपना है
उससे मांगा नही जाता
स्वतः ही आकार लेने लगता है
कुछ चाहना/मांगना जो
अधिकार कदापि नही।

मात्र शब्दार्थ में न पड़ें
क्यों कि मानव शब्दों का
अपने स्वार्थ के हिसाब से
पोस्टमार्टम करने में माहरत पा चुका है
इसीलिए शब्दों की ढ़ाल बनाकर
अपनों को ही ठगता रहता है।

हे! मित्र मैं तो यही निवेदन
चाहता हॅंू कि रिश्तों की परधि से
किसी चाहर दीवारी से
और किसी सीमित दायरे से
बहुत यदि कुछ चाहा जाये
कुछ मांगा जाये
तो उसे मात्र अधिकार का नाम
क्यों दिया जाये?

dinesh dhyani

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मेरा अक्ष
दिनेश ध्यानी

आज सुबह मैंने शीशे में
अपने चेहरे को देखा है।

जरा गौर से नजर गड़ाई
दशकों का इतिहास भरा है।

उसमें धूमिल दिखा हिमालय
गंगा-यमुना का दुःख झलका।

छिन्न-भिन्न सी दिखी प्रकृति
वन अरू घन का नाम नही।

मृत प्रायः सी दिखी मानवता
संबधों में आंच नही थी।

आमा, बूबू मात-पिता की
स्नेहिल छाया मुझे दिखी।

तुम ही तुम थी छाया बनकर
मेरे आगम और निगम में।

तुम बिन अब तक रहा अधूरा
लेकिन अब दिखता हूॅं पूरा।

अपने गांव अरू पनघट की
पगड़डी पर नजर गई।

बंजर सा था गांव लग रहा
उजड़े घर अरू सूखा पंदेरा।

नौनिहाल लग रहे थके से
उनमें अपना अक्ष निहारा।

लेकिन ये क्या बचपन में ही
कांति रहित था बचपन सारा।

शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क अरू पानी
जैसा पहले वही कहानी।

रोटी की खातिर आज भी
शहरों को बहती है जवानी।

बात वही है वही कहानी
बहता पानी बहती जवानी।

अपने ही लहू में जैसे
नही रही अब शेष रवानी।।


dinesh dhyani

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गढ़वाली के प्रसिद्ध लोक गायक और नाटककार
जीत सिंह नेगी


   गढ़वाली गीत तथा संगीत की शुरू से ही अपनी अलग विशिष्ठ छटा तथा परिपाटी रही है। यह अलग बात है कि यहां के अधिकांश गीतकार अपने गीतों को लोक गीत बताकर हमेशा से ही लोकगीतों के स्वरूप तथा लोकोक्तियों को अपभ्रंसित करते रहते हैं। लोक गीत वह विधा है जो लोक के मध्य से निकली है। लोक गीत में लोक भावना और परिदृश्य होता है। जीत सिंह नेगी जो कि पर्वतीय संस्कृति एवं भाषा के अनन्य उपासक हैं। उनके गीतों में पर्वतीय संस्कृति भाषा, लोकगीतों, लोक-गाथाओं, लोक-नृत्य, लोक-संगीत, स्वस्थ-परम्पराओं के पुर्नजीवन एवं उत्थान के लिए निरन्तर समर्पित भाव समाहित हैं। उनके स्वरचित गीतों, नृत्य-नाटिकाओं एवं गीत-नाटकों के मंचन के माध्यम से उन्होंने पर्वतीय जन-जीवन को बड़ें ही मार्मिक, सजीव एवं प्रभावी ढंग से चित्रित किया है।
   विगत 56 वर्षों से गढ़वाली-गीतों की धुनों में स्वरचित सैकड़ों गीतों को अपनी मधुर व प्रेरक वाणी में गाकर यहां के जन-मानस को आल्हादित करते हुए अपनी संस्कृति की ओर आकर्षित करते आ रहे हैं। गढ़वाल के सांस्कृतिक कार्य-कलापों में उनके नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही है तथा गढ़वाली गीतों की धुनों को बनाने एवं सजाने-संवारने में उनकी विशिष्टता को, लोक-साहित्य समिति, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सचिव श्री विद्यानिवास मिश्र तथा आकाशवाणी दिल्ली के चीफ प्रोड्यूसर ;म्यूजिकद्ध ठाकुर जयदेव सिंसह ने गढ़वाली-गीतों को बनाने तथा गीत-रिकार्डिगं के लिए उन्हें आमत्रित कर मान्यता दी है। श्री नेगी के गीतों की व्यापकता और लोकप्रियता को भारतीय जनगणना सर्वेंक्षण विभाग ने भी प्रमाणित किया है। भारत सरकार के जनगणना विभाग 1961 वौल्यूम ग्ट उत्तर प्रदेश भाग टप् के ग्राम्य सर्वेंक्षण, ग्राम, थापली तहसील पौड़ी, जनपद गढ़वाल के पृष्ठ 48 पर सामयिक सर्वप्रिय लोक-गीतों में श्री नेगी के गीत जिसका विशेष उल्लेख किया गया है।:-

   तू होली बीरा उंची निसी ड़ाड्यों मां घसियारी का भेष मा
   खुद मां तेरी रूणूं छौउ यखुली मी परदेश मां।

   प्रायः सभी महत्वपूर्ण आयोजनों के अवसर पर, यथा चीनी प्रतिनिधि-मण्डल के स्वागत में तथा तत्कालीन गृहमंत्री, भारत सरकार, स्वर्गीय पं. गोबिन्द वल्लभ पंत आदि के समक्ष श्री नेगी ही गढ़वाल की सांस्कृतिक टोलियांें का नेतृत्व करते रहे हैं, आज भी कर रहे हैं। साथ ही गढ़वाल के सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करने में वे नेतृत्व प्रदान करते आ रहे हैं। उनके अनेक अनुयायी हैं जो उनके प्ररक मार्गदर्शन में पर्वतीय जनजीवन को चित्रित करने वाले गीत एवं नाटक लिख रहे हैं और आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के अच्छे कलाकारों में स्थान पा रहे हैं।
2 फरवरी, 1927 को ग्राम अयाल, पट्टी- पैडुलस्यूं, पौड़ी गढ़वाल में जन्में जीतसिंह नेगी वर्तमान में 108/12, धर्मपुर, देहरादून, उत्तराखण्ड में रह रहे हैं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वर्मा में तथा माध्यमिक शिक्षा ड़ी.ए.वी हाई स्कूल पौड़ी गढ़वाल में तथा डी.ए.वी. काॅलेज, देहरादून में हुई।
मुख्य रचनाओं में    
प्रकाशित रचनायें     ;पद्ध गीत गंगा ;गीत-संग्रहद्ध
          ;पपद्ध जौंळ-मंगरी ;गीत-संग्रहद्ध
 ;पपपद्ध छम घंुघरू बाजला ;गीत-संग्रहद्ध
 ;पअद्ध मलेथा की कूल ;ऐतिहासिक-नाटकद्ध
 ;अद्ध  भारी भूल ;ऐतिहासिक-नाटकद्ध

;खद्ध  अप्रकाशित   ;पद्ध जीतू-बगड्वाल ;ऐतिहासिक-नाटकद्ध
;पपद्ध राजू पोस्टमैन ;एकांकीद्ध
;पपपद्ध रामी ;गीत-नाटिकाद्ध
;गद्ध ;अप्रकाशितद्ध
;पद्ध पतिव्रता नारी ;हिन्दी-नाटकद्ध
                               ;पपद्ध राजू पोस्टमैन ;एकांकी हिन्दी रूपान्तरद्ध
6. मंचन किए गए नाटकः-

;पद्ध भारी भूलः सन् 1952 में गढ़वाल भाृत-मण्डल बुम्बई के तत्वाधान में प्रथम बार इस गढ़वाली नाटक का सफल मंचन हुआ। मुम्बई के प्रवासी गढ़वालियों का यह सर्वप्रथम बड़ा नाटक था। तत्पश्चात 1954-55 में हिमालय कला संगम, दिल्ली के मंच से उक्त नाटक का सफल निर्देशन व मंचन किया गया। इसके अतिरिक्त विभिन्न नगरों मं जनता की भारी माॅंग पर अनेक बार इस नाटक का मंचन किया गया।
;पपद्ध    मलेथा की कूलः ऐतिहासिक पुरूष टिहरी नरेश के सेनाध्यक्ष तिब्बत विजेता, शूरमा  व श्रमदानी माधोसिंह भण्डारी द्वारा मलेथा गांव की कूल के निर्माण की रोमांचक घटना पर आधारित स्वरचित  मलेथा की कूल  ऐतिहासिक नाटक का प्रथम बर 1970 देहरादून में निर्देशन व मंचन किया गया। 1983 में पर्वतीय कला मंच के तत्वाधान में इस नाटक के देहरादून में पांच मंचित किया गया। इस प्रकार चण्डीगढ़, दिल्ली,टिहरी गढ़वाल, मसूरी एवं मुम्बई आदि मिलाकर इस नाटक को 18 बार प्रदर्शित किया गया।
;पपपद्ध     जीतू बगड़वालः गढ़वाल की लोक-गाथा के प्रसिद्ध नायक बांसुरी- वादक जीतू बगड़वाल पर मधुर लोक-धुनों में गीत-नृत्य-नाटक, जीतू बगड्वाल  का प्रदर्शन व मंचन पर्वतीय कला मंच के तत्वाधान में सन् 1984 में देहरादून में किया गया। सन् 1986 में देहरादून में ही इस नाटक के आठ प्रदर्शन हुए। 1987 में पुनः चण्डीगढ़ में इस नाटक के चार प्रदर्शन किए गए।
;पअद्ध    पतिव्रता रामीः 1956 में पर्वतीय सेवा समाज, दिल्ली के मंच से दो बार हिन्दी में इस सामाजिक नाटक का मंचन व निर्देशन किया गया।
;अद्ध    रामीः 1961 में टैगोर शताब्दी के अवसर पर इस गढ़वाली गीत-नाटिका का नरेन्द्र नगर में सफल मंचन हुआ। इस नाटिका के अब तक मुम्बई, दिल्ली, मसूरी, मेरठ, सहारनपुर आदि नगरों में सैकड़ों प्रदर्शन किए गए है।
;अपद्ध    राजू पोस्टमैनः गढ़वाल-सभा, चण्डीगढ़ के तत्वाधान में टैगोर  थियेटर में इस हिन्दी गढ़वाली मिश्रित एकांकी का मंचन किया गया। इसके अतिरिक्त इस नाटिका का प्रदर्शन मुरादाबाद, देहरादून तथा अन्य नगरों में सात बार किया गया।
;अपपद्ध    आकाशवाणी से प्रसारित रचनाएंः जीतू बगड्वाल एवं मलेथा की कूल गीत-नाटकों का कई बार आकाशवाणी नजीबाबाद से प्रसारण किया गया। सन् 1954 से अब तक आकाशवाणी दिल्ली, लखनउू व नजीबाबाद से पांच-छः सौ बार गढ़वाली गीतो का प्रसारण किया गया।
;अपपपद्ध    दूरदर्शन दिल्ली से प्रसारित रचनाएंः रामी गीत-नाटिका का दिल्ली दूरदर्शन से पहलीबार हिन्दी रूपान्तर प्रसारण।

;पगद्ध    गढ़वाली लोक-गीतोंः नृत्यों के रंगारंग कार्यक्रम राष्ट्रीय त्यौहारों, धार्मिक उत्सवों तथा विभिन्न शताब्दी समारोहों के अवसरों पर 1950 से देश के विभिन्न नगरों में प्रदर्शन।

7. उपलब्धियां

;कद्ध गढ़वाली लोक-गीतों को विभिन्न लुप्त, अर्द्धलुप्त धुनों के सम्बर्द्धक, सरचियता एवं स्वर समा्रटः-
   अन्य पहाड़ी-प्रदेशों की मिलती-जुलती मधुर धुनों का समावेश कर सम्बर्द्धन एवं स्वरचित उत्तराखण्ड परिवार की धुनों में अभिवृद्धि की। प्राचीन लुप्त व विस्मृत धुनों को अपनी मौलिक प्रतिभा से पुर्नजीवित किया। उमड़ते-घुमड़ते बादलों, वर्षा की रिमझिम बूंदों, झरनों, नदी-नालों को कलकल, फूलों की मुस्कान, पशु-पक्षियों का हाल-लास आदि प्रकृति के विभिन्न रूप बिम्बवत उनके गीतों में सन्निहित है। यथा मेरा मैत का देश ना बांस घुघूतीए ना बांस घुघुती घू.........
   श्री नेगी के मुख से निकलेने वाले गढ़वाली लोक-गीतों के प्रत्येक शब्द में बसे मधुर स्वरों को सुनकर मनुष्य की क्या पशु-पक्षी भी अपने गंतव्य को भूल जाते हैं।
;खद्ध प्रथम गढ़वाली लोक-गीतकार जिन्हौंने गढ़वाली लोक गीतों को सर्वप्रथम हिज मास्टर व्हाइस एवं ऐजिंल न्यू रिकार्ड़िंग कम्पनी में छः गीतों को रिकार्डिं़ग की।

 ;गद्ध गढ़वाली लोक-गीतों द्वारा गढ़वाल के प्राचीन व आधुनिक सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक आदि विचारों को वहां के जन-जीवन से जोड़कर नाटक व गीतों में पिरोकर अभिव्यक्त किया।
;घद्ध भविष्य की पीढ़ी के गीतकारों के लिए गढ़वाली लोक-गीतों के स्वर, ताल, लय व धुन को शोध के विषय का मार्ग प्रशस्त किया।
 
;ड़द्ध गढ़वाली लोक-गीतों व नाटकों द्वारा रचनाकारों को उनके जीवन-यापन से जोड़ने के लिए मार्ग-दर्शन किया। उनकी कई रचनाओं के आज चलचित्र भी बन रहे हैं।

8. अतिरिक्त सर्वोंत्तम सांस्कृतिक गतिविधियांः-

सन् 1942 में छात्र जीवन से ही गढ़वाल की राजधानी पौड़ी के नाटक-मंचों से स्वरचित गढ़वाली-गीतों के सस्वर पाठ से गायन-जीवन का शुभारम्भ। प्रारम्भ से ही आकर्षक सुरीली धुनों में लोकगीत गाकर जन-प्रियता को प्राप्ति।
सन् 1949 में यंग-इण्डिया ग्रामोफोन कम्पनी, मुम्बई से छः गढ़वाली गीतों की रिर्काड़िग, ये गीत बहुत ही प्रचलित हुए और सराहे भी गए।
   सन् 1954 में, मुम्बई में ही फिल्म मूवी इण्डिया द्वारा निर्मित खलीफा चलचित्र में सहायक निर्देशन की भूमिका निभाई।
   उन्ही दिनों चैहदवीं रात फिल्म जो कि मुम्बई की मून आर्ट पिक्चर ने बनाई थी, उसमें भी सहायक निर्देशक के रूप में कार्य किया।
   नेशनल ग्रामोफोन रिकार्ड़िग कम्पनी मुम्बई में भी सहायक संगीत निर्देशक के पद पर कार्य किया।
   1955 में दिल्ली आकाशवाणी से गढ़वाली गीतों का प्रसारण आरम्भ होने पर प्रथम बैच का गीत गायक तब से निरन्तर सक्रिय।
   1955 में ही दिल्ली रघूमल आर्य कन्या पाठशाला में छात्राओं को सांस्कृतिक दिशा देने हेतु रंगारंग कार्यक्रम का निर्देशन।
   1955 में कानपुर में चीनी प्रतिनिधि मण्डल के स्वागत समारोह में पर्वतीय जन-विकास समिति के तत्वाधान में संास्कृतिक दल का नेतृत्व।
   1955 व 56 में सरस्वती महाविद्यालय दिल्ली के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का निर्देशन।
   1955 में गढ़वाल भूमि सुधार से सम्बधिंत दिल्ली स्थित प्रवासी गढ़वालियों के वृह्द सम्मेलन में प्रगतिवादी एवं कृर्षि-उत्थान सम्बन्धी गढ़वाली गीतों द्वारा जन-जागरण में प्रमुख  योगदान।
    सन् 1956 में माननीय पं. गोबिन्दबल्लभ पंत, केन्द्रीय गृह-मंत्री द्वारा उद्घाटित पर्वतीय लोक-नृत्य से भरपूर सांस्कृतिक समारोह में गढ़वाल की टोली का नेतृत्व।
   1956 में लैन्सीड़ौंन गढ़वाल में बुद्ध जयन्ती समारोह के अवसर पर धार्मिक प्रेरणा-प्रद गीतों का गायन कार्यक्रम में भाग लिया।
   सन् 1956 में गढ़वाली लोक-गीतों की अन्य नगरों में गीत-संध्या का आयोजन करते हुए भ्रमण।
   सन् 1957 में लोक साहित्य समिति, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सचिव श्री विद्यानिवास मिश्र द्वारा विशेष रिकार्डि़ग के लिए स्वरचित गढ़वाली लोग-गीतों के गायन का निमंत्रण, गीतों की स्वीकृति और उनकी रिकार्ड़िग।
   1957 व 1964 में एच.एम.वी. एवं कोलम्बिया ग्रामोफोन कम्पनी के लिए स्वयं गाकर आठ गढ़वाली-गीतों की रिकार्डि़ग जो कि अत्यधिक प्रचलित हुए और सराहे गए।
   1957 में सूचना विभाग एवं लोक-साहित्य समिति द्वारा संचालित साॅंस्कृतिक कार्यक्रम, लखनउ में गढ़वाल की ओर से पर्वतीय कार्यक्रमों की प्रस्तुति एवं गढ़वाली -भाषा कविता पाठ में सक्रिय भाग लिया।
   1957 में लैन्सीड़ौन गढ़वाल में प्रथम ग्रीष्म-उत्सव में कवि-सम्मेलन एवं साॅंस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया। इसी अवसर पर गढ़वाल साॅंस्कृतिक विकास समिति का सदस्य निर्वाचित।
   1957 में देहरादून में आयोजित ऐतिहासिक विराट साॅंस्कृतिक सम्मेलन में गढ़वाल की लोक-गीत-नृत्य टोली का नेतृत्व। तत्पश्चात इसी संस्था का कला-सचिव निर्वाचित।
   1960 में पर्वतीय साॅंस्कृतिक सम्मेलन, देहरादून के मंच से लोक-गीत एवं नृत्यों का आयोजन एवं प्रदर्शन।
   1962 में पर्वतीय साॅंस्कृतिक सम्मेलन, देहरादून के मंच से लोक-गीत एवं नृत्यों का प्रदर्शन।
   1963 में हरिजन सेवक संघ, देहरादून के तत्वाधान में राष्ट्रीय सुरक्षा कोष के लिए पर्वतीय बाल-कलाकारों को प्रश्क्षिित कर लोक-गीत व नृत्यों का अभूतपूर्व आयोजन। इस कार्यक्रम का उद्घोषक भी बाल-कलाकार को ही बनाया।
   1964 में श्रीनगर गढ़वाल में हरिजन सेवक संघ के लिए मनोरम कार्यक्रम का निर्देशन।
   1966 में गढ़वाल भ्रात-मण्डल, मुम्बई के तत्वाधान में उत्तराखण्ड के लोक-गीत व नृत्यों के कार्यक्रम में गढ़वाली साॅंस्कृतिक टोली का नेतृत्व।
   1970 में मसूरी  शरदोत्सव समारोह के अवसर पर शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के रंगारंग कार्यक्रम प्रतियोगिताओं में निर्णायक।
1972 में गढ़वाल-सभा मुरादाबाद  के मंच पर देहरादून की अपनी सांस्कृतिक टोली द्वारा साॅंस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तति।
   1976 में गढ़वाल-भ्रातृ-मण्डल, मुम्बई के लिए वहीं के गढ़वाली कलाकारों द्वारा साॅंस्कृतिक कार्यक्रमों का निर्देशन।
   1979 में मसूरी टी.वी. टावर के उद्घाटन के अवसर पर दिल्ली दूरदर्शन के लिए अपनी टोली द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रस्तुतीकरण।
   1979 में सेन्ट्रल डिफेन्स एकाउण्ट के शताब्दि-समारोह के अवसर पर रंगारंग कार्यक्रम की प्रस्तुति।
1980 में गढ़वाल-सभा चण्डीगढ़ के तत्वाधान में टैगोर थियेटर में सांस्कृतिक टोली का नेतृत्व एवं रंगारंग कार्यक्रमों की प्रस्तुति।
1982 में पर्वतीय कला मंच के गठन के बाद देहरादून में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के चार प्रदर्शन तथा इसी वर्ष गढ़वाल-सभा, चण्डीगढ के मंच पर भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों के चार प्रदर्शन।
1883 में पर्वतीय कला मंच का सचिव नियुक्त।
1986 में गढवाली समाज, कानपुर के गढ़वाली कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता।
1987 में भारत सरकार द्वारा संचालित उत्तर मध्य सांस्कृतिक क्षेत्र द्वारा आयोजित इलाहाबाद में सम्पन्न सांस्कृतिक समारोह में पर्वतीय कला मंच की टोली का नेतृत्व।
1987 में ही दृष्टिवाध्तिार्थ राष्ट्रीय संस्थान, देहरादून में आयोजित संगीत, गायन नृत्य और नाटक की प्रतियोगिता में निर्णायक।

9. विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

;पद्ध रघुमल आर्य कन्या पाठशाला, दिल्ली द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए 1955 में सम्मानित।
;पपद्ध गढ़वाली गीतों का प्रथम संग्रह गीत-गंगा पुस्तक अखिल गढ़वाल सभा देहरादून द्वारा 1956 में सम्मानित।
;पपपद्ध  प्रान्तीय रक्षा दल, देहरादून द्वारा आयोजित खेलकूद व सांस्कृतिक प्रतियोगिता के अवसर पर जिलाधीश श्री मोहम्मद बट्ट द्वारा 1956 मंे सम्मानित।

;पअद्ध पर्वतीय जन-वि&

dinesh dhyani

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9. विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

;पद्ध रघुमल आर्य कन्या पाठशाला, दिल्ली द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए 1955 में सम्मानित।
;पपद्ध गढ़वाली गीतों का प्रथम संग्रह गीत-गंगा पुस्तक अखिल गढ़वाल सभा देहरादून द्वारा 1956 में सम्मानित।
;पपपद्ध  प्रान्तीय रक्षा दल, देहरादून द्वारा आयोजित खेलकूद व सांस्कृतिक प्रतियोगिता के अवसर पर जिलाधीश श्री मोहम्मद बट्ट द्वारा 1956 मंे सम्मानित।

;पअद्ध पर्वतीय जन-विकास, दिल्ली  द्वारा गढ़वाली लोक-संगीत के लिए 1956 में सम्मानित।
;अद्ध   सरस्वती महाविद्यालय, दिल्ली द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए 1956 में सम्मानित।
;अपद्ध   आचार्य नरेन्द्र देव शास्त्री विधायक व सांसद माननीय श्री भक्तदर्शन द्वारा 1957 में प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित।
;अपपद्ध पर्वतीय सांस्कृतिक सम्मेलन, देहरादून द्वारा गणतंत्र दिवस के अवसर पर लोकगीतों के रंगारंग कार्यक्रमों के लिए 1958 में सम्मानित।
;अपपपद्ध लोक-विद्यालय की ओर से साहित्य-सम्मेलन, चमोली द्वारा 1962 में लोकरत्न उपाधि से सम्मानित।
;अगद्ध मलेथा की कूल नाटक के सफल मंचन हेतु हिमालय कला संगम, देहरादून द्वारा 1970 में सम्मानित।
;गद्ध  ड़िफेंस एकाउन्टस रिक्रेशन क्लब सी.ड़ी.ए. देहरादून द्वारा 1979 में सम्मानित।
;गपद्ध लोक-संगीत-स्वर परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर आकाशवाणी, नजीबावाद द्वारा 1980 में प्रशस्ति पत्र।
;गपपद्ध 15 अगस्त 1984 को स्वतंत्रता-दिवस के अवसर पर दून मनोरजन क्लब की ओर से जिलाधीश श्री आशुतोष चतुर्वेदी द्वारा सम्मानित।

10. विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित क्रमशः।

;गपपपद्ध गढवाली लोक-गीत, संगीत एवं रंगकर्म के क्षेत्र में विशिष्ठ योगदान के लिए गढ़वाल भ्रातृ मंड़ल मुम्बई द्वारा गढ़-रत्न उपाधि से सम्मानित 1990 में।
;अगद्ध उत्तर-प्रदेश संगीत नाटक अकादमी द्वारा लोक गीत एवं रंगकर्म के क्षेत्र में विशिष्ठ योगदान के लिए 27/3/1995 में सम्मानित।
;गअद्ध नागरिक परिषद देहरादून द्वारा 1995 में गढ़रत्न से सम्मानित।
;गअपद्ध गढ़वाल भ्रातृ मण्डल क्लमेंट टाउन क्षेत्र देहरादून द्वारा 1995 में गढ़रत्न अलंकार से सम्मानित।
;गअपपद्ध उत्तराखण्ड भ्रात1 मण्डल सोलन द्वारा 1997 में सम्मानित।
;गअपपपद्ध अखिल गढ़वाल सभा देहरादून द्वारा उत्तराखण्ड महोत्सव-1999 में सम्मानित।
;पगगद्ध उत्तराखण्ड के लोकनृत्य/लोकगीत, टैगोर थियेटर, चण्डीगढ़ उत्तराखण्ड युवामंच द्वारा 7/2/1999 में सम्मानित।
;गगद्ध संगीत नाटक अकादमी उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित निर्बल वर्गजन कल्याण समिति , गढ़वाल मण्डल द्वारा 16/4/1995 में सम्मानित।
;गगपद्ध अखिल भारतीय उत्तराखण्ड एकादमी दिल्ली द्वारा प्रशस्ति-प्रमाण पत्र से सम्मानित 7/5/1995 मे।

;गगपपद्ध हिमालय सामाजिक व सांस्कृतिक संस्था देहरादून द्वारा 6/1/1996 में अभिनन्दन पत्र से सम्मानित।
;गगपपपद्ध गढ़वाली साहित्य परिषद कानपुर द्वारा पं. आदित्यराम नवानी, गढ़वाली भाषा प्रोत्साहन पुरस्कार से 1988 में सम्मानित।
;गगपअद्ध गढ़वाली भ्रातृ मण्डल और्डनेन्स फैक्टरी स्टेशन रायपुर देहरादून द्वारा अभिनन्दन पत्र से 13/4/199 को सम्मानित।
;गगअद्ध नन्दादेवी कलासंगम द्वारा सुमन-स्मृति सम्मान - 1994
;गगअपद्ध एग्रीरियनस फील्ड एवं फाॅरेस्ट लिमिटेड़ द्वारा उत्तराखण्ड सम्मान से 1994 में सम्मानित।
;गगअपपद्ध मैत्री सांस्कृतिक कला संगम देहरादून द्वारा सम्मानित 1994 में।
;गगअपपपद्ध अखिल गढ़वाल सभा, देहरादून द्वारा उत्तरायण महोत्सव 1994 में सम्मानित।



11.राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थाओं से सम्बद्ध।

;पद्ध       मनोरंजन क्लब, पौड़ी गढ़वाल।
;पपद्ध       हिमालय कला संगम, दिल्ली।
;पपपद्ध       पर्वतीय जन-कल्याण समिति दिल्ली।
;पअद्ध       गढ़वाल भ्रातृ-मण्डल, मुम्बई।
;अद्ध       हिमालय कला संगम, देहरादून।
;अपद्ध       पर्वतीय सांस्कृतिक सम्मेलन, देहरादून।
;अपपद्ध         पर्वतीय कला मंच, देहरादून।
;अपपद्ध     सरस्वती महाविद्यालय, दिल्ली।
;अपपपद्ध         शैल-सुमन, मुम्बई।
;पगद्ध          अखिल गढ़वाल सभा, देहरादून।
;गपद्ध       गढ़वाल रामलीला परिषद, देहरादून।
;गपपद्ध        गढ़वाल साहित्य मण्डल, दिल्ली।
;गपपपद्ध        उत्तर-प्रदेश हरिजन सेवक समाज, देहरादून।
;गपअद्ध       भारत सेवक समाज, देहरादून।


दिनेश ध्यानी


नागजुण्डा नागराजा अयाल का थाल, ये गुठयार,
चामुण्डा मादेव, वख, बल्द जुंटा धार।।
मेरू वोल्यूं औल्यंू कू स्वाद सूण जरा बस।
रौंत्यलु गुठयार म्यारू, हाथु देदे हाथ।-रघुवीर सिंह रावत ष्आयळष्



dinesh dhyani

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भाषा का काॅकटेल उचित नही।
श्रृद्धेय
ड़ाक्टर जलन्धरी जी सादर, पुनः एक विचार जो कई दिनों से कचोट रहा था आपके सम्मुख रख रहा हूॅं। इसे आप हमारा पैत्रिक बंधनों से पीड़ित होना समझें जैसा कि आपने अपने एक वक्तव्य में भी कहा है, या कुछ और लेकिन हमें जो लगा आपके सम्मुख रख दिया। चूॅंकि मैं समझता हूं कि भाषा एक विशद विषय है और इस बारे में किसी प्रकार की जल्दबाजी या गुटबाजी अथवा किसी प्रकार की खेमेबंदी से काम नही चलेगा। इस विषय में साहित्यकारों, लेखकों एवं विद्वानों की सहमति के आधार पर निर्णय लिया जाए तो वह स्वच्छ एवं उचित होगा। अन्यथा वही होगा जो पर्वू में उत्तराखण्ड मे हुआ। भाषा की संजीदगी अगर आप और हम नही समझेगंे तो बाहर वालों के लिए तो वह व्यापार मात्र ही होगा। जैसा कि पर्वू में तिवारी सरकार में भी कोई मोहम्मद जी गढ़वाली बोली सिखाने का इस्टीट्यूट चला रहे हैं और कोई खुराना जी गढ़वाली भाषालिपि का सृजन करते हैं और राजभवन में उनका सम्मान भी होता है। और हमारे साहित्यकार तालियां बजाकर समोसा और चाय पीते रहते हैं। कम से कम हम भाषा जैसे विषय को व्यापार न बनने दें यह भी तो हमारी ही दायित्व है।
पिछले कुछ दिनों से देखने में आया है कि हमारे कुछ विद्वान और चिंतक गढ़वाली एवं कुमाउंनी बोलियों को एक संयुक्त भाषा के रूप में स्थापित करने की सोच रहे हैं। यह बात समझ नही आ रही है कि किसी भी भाषा को जबरदस्ती किसी बंधन में बांधकर कैसे एक किया जा सकता है? दूसरी ओर यह भी देखने में आ रहा है कि वे लोग भाषा संबधी पोस्टमार्टम कर रहे हैं जिनका किसी भी सूरत में उक्त बोलियों के साहित्य से दूर-दूर का संबध भी नही रहा है।
इसी परिपेक्ष्य में डाक्टर साहब का प्रयास सराहनीय है लेकिन आपको भी मित्रवत एवं एक अदना लेखक होने के नाते सादर निवेदन है कि भाषाओं को अपनी वास्तविकता एवं पूर्व वेग से बहने दिया जाए। किसी प्रकार की ड़ाक्टरी या आॅपरेशन करने का प्रयास घातक होगा। हां हमें दोनों बोलियों को बोलना चाहिए, दोनों को उत्तराखण्ड की राज भाषा बनाया जा सकता है लेकिन जबरदस्ती किसी भाषा या बोली को गड़मड्ड करने का प्रयास समझ से परे है। आशा है हमारे सुधी विद्वान एवं चिंतक इस विषय पर या तो विस्तृत धरातल पर बात करंेगे अन्यथा इस प्रकार की प्रक्रिया उक्त बोलियों के लिए लाभकारी तो कदापि नही होगी।
आशा है इस दिशा में संजीदगी से सोचेंगे और भविष्य में भाषा संबधी विषयों पर किसी प्रकार की हील हवली नही होने देंगे। भाषा की विशदता एवं जटिलता के लिए सार्थक प्रयास होने चाहिए और अब समय आ गया है कि गढ़वाली एवं कुमाउंनी को भाषा का दर्जा देने के लिए सभी प्रयास किए जाने चाहिए। आशा है हमारी उक्त बोलियों को उचित सम्मान एवं स्थान मिलेगा।
सादर,

आपका मित्र
दिनेश ध्यानी

ravidabral

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It is our privilege to read articles of intellectual writer like Dinesh Dhyaniji in our Merapahad portal.  Best wishes to him and for his awakening articles and stories. Regards, Ravi Dabral

 

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