Author Topic: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख  (Read 31233 times)

Mani Ram Sharma

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[justify]देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000  और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये कर दिया गया है! दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी की ओर देखें तो यह वर्ष 2005  में रुपये 2500 रूपये थी जो 2009  में बढ़कर मात्र 4000 रूपये ही हो पायी है| इस प्रकार हमारे माननीय जन प्रतिनिधियों की परिलब्धियों में 4 वर्ष में 1100% से अधिक बढ़ोतरी हुई और महंगाई की मार से त्राहीत्राही करते आम मेहनतकश मजदूर की मजदूरी में समान अवधि में मात्र 60% वृद्धि हुई है| ठीक इसी प्रकार कृषि उत्पादों के मूल्यों की तुलना में औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में वृद्धि भी 50% अधिक हुई है और देश के अन्न उत्पादक आत्म हत्याएं कर रहे हैं| देश का संविधान कहता है कि इस प्रकार की आर्थिक नीतियाँ अपनायी जाएँगी कि क्षेत्रीय और वर्गवार विषमता में कमी आये| आम नागरिक यह समझने में असमर्थ है कि इन नीतियों से किस प्रकार विषमता दूर हो रही है| जहां आम आदमी के लिए 30 रुपये रोजना पर्याप्त बताये जाते हैं वहीं एक दिन के समारोह पर करोड़ों फूंक दिये जाते हैं और जनता के धन से खुद पर रोजाना 10000 रुपये से भी ज्यादा खर्च किये जाते हैं| यदि 30 रूपये प्रतिदिन पर्याप्त हों तो, कार्य करने के बदले वेतन को छोड़ भी दिया जाए,  कम से कम सरकारी कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को बिना कार्य किये  मिलने  वाली पेंशन तो 900 रूपये प्रतिमाह किया जाना  उचित ही है|
सरकार जनता को विभन्न प्रलोभन देकर सब्ज बाग़ दिखाकर बना रही है|  एक ओर यह वक्तव्य दिये जाते हैं कि देश में मात्र 20% लोग गरीब हैं, वहीं दूसरी ओर दो तिहाई जनता को अन्न उपलब्ध करवाने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून बनाकर सच्चाई की अनूठी बानगी प्रस्तुत की जाती है| केंद्र सरकार के कर्मचारियों की परिलब्धियों में वृद्धि के अध्ययन के लिए वेतन आयोग ने पूर्व में विदेशी दौरे भी किये और वहां की वेतन सम्बंधित स्थिति का जायजा लिया| किन्तु इस दल ने विदेशी कार्मिकों के कार्य निष्पादन, जवाबदेही, आचरण के नियम, भूमिका, कार्यप्रणाली आदि के विषय में कोई जानोपयोगी जानकरी नहीं ली है| न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण हेतु देश से कोई दल शायद ही विदेशों में अध्ययन हेतु भेजा गया हो| दिल्ली उच्च न्यायालय अनुसार निचले तबकों में तो शादियाँ टूटने का एक कारण मुद्रास्फीति/महंगाई की मार भी है जिसके चलते वे इस महंगे शहर में जीवन निर्वाह करना मुश्किल पाते हैं| हमारे वित्तमंत्री इस उपलब्धि और सुन्दर (शोषणकारी)  नियोजन के लिए धन्यवाद के पात्र हैं|

आज से 16 वर्ष पूर्व भारत में सेवा कर नाम का कोई कर नहीं था और आज इस नाम से 100000 करोड़ रुपयों की जनता की जेब प्रतिवर्ष काटी जाती है| लगभग सभी सेवाओं पर कर लगा दिया गया है तथा आज सेवा कर न लगने वाली सेवाओं की (नकारात्मक) सूची है व इन सेवाओं को छोड़कर सभी सेवाओं पर सेवा कर देय है| देश के अपरिपक्व या अस्वच्छ बुद्धि वाले नागरिक इसे अच्छा नियोजन भी कह सकते हैं| एक तरफ देश की आम आदमी से प्रत्येक सेवा और वस्तु पर कर वसूलो और बाद में दो तिहाई लोगों को गरीबी के नाम पर नरेगा, अनुदान आदि के नाम पर बांटो| पहले करों की वसूली में भ्रष्टाचार और बाद में जनता का ही धन जनता को बांटने में| नौकरशाही और जनप्रतिनिधियों की पौ बारह है| सरकार का कुतर्क हो सकता है कि इससे राजस्व में वृद्धि हो रही है किन्तु राजस्व और भ्रष्टाचार में क्या अनुपात है शायद सरकार को ज्ञान नहीं है| भारत आज भ्रष्टाचार के मामले में मात्र चौथे पायदान पर है| जब देशी बंदूक के लाइसेंस का शुल्क एक रुपया पचास पैसा था तब नवीनीकरण के लिए पांच रूपये रिश्वत ली जाती थी| जमीन के एक कारोबारी से बातचीत में उसने बताया कि जमीन के उपयोग परिवर्तन के लिए जितना शुल्क जमा करवाया उससे दुगुना पैसा कलेक्टर को देना पडा| नगर नियोजक, राजस्व विभाग, स्थानीय निकाय, पटवारी आदि को दी जाने वाली भेंटे अलग हैं| सरकार कर संग्रहण के आंकड़ों से भी बड़ी खुश होती है और राजस्व विभाग के अधिकारियों की पीठ थपथपाती है| किन्तु देश में 2% प्रतिवर्ष जनसंख्या वृद्धि से सेवाओं और वस्तुओं के उपभोग में वृद्धि हो रही है तथा गत दशकों से 10% से ऊपर महंगाई दर में वृद्धि हो रही है| अत: 12% तक कर संग्रहण में वृद्धि तो स्वाभाविक है और इससे कितनी अधिक वृद्धि हो रही है, यह सरकार और जनता दोनों जानते हैं| 12% तक जनहित के किसी मद में बजट में प्रतिवर्ष वृद्धि का अभिप्राय तो मात्र स्थिरता है और वास्तव में कोई वृद्धि नहीं है|
विदेशों में समान प्रकृति के कार्य के लिए सरकारी क्षेत्र में निजी क्षेत्र से 2-3 गुणा वेतन दिया जाता है जबकि भारत में समान कार्य के लिए सरकारी सेवा में 6-8 गुणा वेतन दिया जा रहा है| भारत में सरकारी कार्यालय डाक घर की भांति मात्र पत्रों को इधर-उधर भेजने का कार्य कर रहे हैं और प्रतिमाह लाखों रुपये जनता के खजाने से लेने वाले कई आई ए एस तो पूरे महीने में जनता से सम्बन्धित 10 निर्णय लेने/टिपण्णी हस्ताक्षर करने का कार्य भी नहीं करते हैं| वे मात्र ऊँचे अधिकारियों से आने वाले पत्रों का जवाब देना आवश्यक समझते हैं | सरकारी क्षेत्र के लगभग 4 करोड़ संगठित कर्मचारियों के 20 करोड़ परिजनों के लिए भी छठा वेतन आयोग वरदान साबित हुआ था और उनकी परिलब्धियों में पूर्व में वर्ष 2006  में 150% से अधिक की वृद्धि कर हमारे जन प्रतिनिधियों ने अपने लिए वेतन और सुख- सुविधा वृद्धि का मार्ग सुगम, निर्विघ्न और निष्कंटक बना लिया| केंद्र सरकार के वेतन आयोग के बाद सभी राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों और शासन के अन्य अंगों में वेतन वृद्धियां आवश्यक हो जाती है| अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग की स्वीकृति दे दी है| आखिर दे भी क्यों नहीं चुनावी वर्ष है और करों के रूप में वसूली गयी जनता की गाढे पसीने की कमाई को ये लोग अपनी पैत्रिक सम्पति समझते आये हैं| अब जनता को समझ लेना चाहिए कि वेतन आयोग के गठन से जनप्रतिनिधियों के वेतन में न केवल बढ़ोतरी का मार्ग पुन: निष्कंटक होगा बल्कि सत्तासीन  दल अपने पक्ष में अधिक मतों की भी अपेक्षा रखता है| मंहगाई में वृद्धि होगी जिससे सांसदों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा और व्यापारियों, जमाखोरों  व उद्योगपतियों के मुनाफे में वृद्धि होने से वे अच्छा चुनावी चन्दा दे सकेंगे| पसीने तो आम जनता के छूटने हैं| इस प्रकार सातवें वेतन आयोग के गठन से सरकार ने एक ही ढेले में कई चिड़िया मारने की योजना बनाई है| अब जनता को सावधान हो जाना चाहिए कि जन प्रतिनिधियों के नापाक मंसूबों को सिरे न चढ़ने दें और मांग करें कि वेतन आयोग में बहुमत में सिविल सोसायटी के लोग सदस्य हों जो जनहित पहलू पर विचार कर सकें क्योंकि नौकरशाह और जन प्रतिनिधि तो अपना हित त्याग नहीं सकते| नौकरशाहों और जन प्रतिनिधियों का  स्पष्ट हित तो जनता की जेब से अधिकतम दोहन करने में है| हमारे माननीय प्रधान मंत्री और वित्तमंत्री दोनों ही विदेशों में अंग्रेजी वातावरण में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त हैं| भारत पूर्व में भी अंग्रेजों  की कुटिल नीतियों का लम्बे समय तक शिकार रह चुका है| छठे वेतन वेतन आयोग के बाद सांसदों के वेतन में 4 वर्षों में 16 गुणी वृद्धि कर उसे 50000 रुपये प्रतिमाह कर दिया था और अब इसमें यदि इसी दर से वृद्धि की गयी तो अगली लोकसभा में सांसदों का वेतन 600000 रुपये प्रतिमाह हो जाएगा| अत: मेरे प्रिय भारतवासियों जागो समय आ गया है, सरकार की संविधान विरोधी और जन विरोधी नीतियों का एकजुट होकर पुरजोर विरोध करने का – याद रहे|     
[/justify][/justify]

Mani Ram Sharma

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प्रतिष्ठा में,
माननीय श्री ए के सीकरी ,
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधिपति  व
माननीय श्री  राजीव सहाय एंडला,
न्यायाधिपति
दिल्ली  उच्च न्यायालय,
नई दिल्ली

मान्यवर,
विषय :  लेटर्स पटेंट अपील  संख्या  190/2012 – अशोक कुमार गोयल  बनाम जन सूचना अधिकारी

माननीय उच्च न्यायालय में सूचना के अधिकार  के उक्त प्रकरण में आपके निर्णय दिनांक 07.03 .2012  के लिए मैं आप द्वय को धन्यवाद देता हूँ|  मीडिया जगत में आपके उक्त निर्णय के प्रकाशन से मुझे माननीय न्यायालय के उक्त निर्णय का ज्ञान हुआ  किन्तु इस प्रसंग में मेरा विचार किंचित भिन्न है|
माननीय उच्चतम न्यायालय ने एम आर पराशर बनाम फारुक अब्दुल्ला (1984 SCC (Cri.) 254) के मामले में कहा है कि न्यायालय यह धारणा बनाना पसंद नहीं करते कि उनके कार्यों में किसी सुधार की आवश्यकता नहीं है| हमारे पवित्र संविधान के अनुच्छेद 51क (एच )में नागरिकों का यह मूल कर्तव्य बताया गया है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानव वाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे| इसी प्रकार अनुच्छेद 51 क (जे ) में कहा गया है कि नागरिक व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले| उक्त प्रावधानों ने मुझे आपको यह पत्र लिखने को प्रेरित किया है| आप द्वारा यह पत्र पढने के लिए अपने अमूल्य समय में से समय निकालने के लिये धन्यवाद |


माननीय न्यायालय के उक्त निर्णय का सम्मान करते हुए मेरे विचार इस प्रकार हैं:
1.   माननीय न्यायालय ने प्रासंगिक प्रकरण में निर्णय प्रसारित करते हुए अन्य बातों  के साथ साथ कहा है कि  अपीलार्थी एक जिद्दी मुकदमेबाज़ है जो प्रतिवादी संख्या 2 -अपने भाई को परेशान करने पर तुला हुआ है | प्रतिवादी संख्या 2 विक्रय कर कानून के अंतर्गत विक्रय कर आयुक्त के यहाँ एक पंजीकृत फर्म है और अपनी विवरणियां प्रस्तुत करती है| याची ने विक्रय कर आयुक्त से कुछ सूचनाओं की अपेक्षा की थी | किन्तु उसे सूचनाएं देने से मना कर दिया गया और उसने केन्द्रीय सूचना आयोग के समक्ष अपील की| केन्द्रीय सूचना आयोग ने भी कड़ी टिप्पणियाँ करते हुए सूचना प्रदानगी से मना कर दिया| किन्तु याची इसके बावजूद भी नहीं रूका और उसने माननीय न्यायालय के समक्ष रिट याचिका दायर की जिसे माननीय एकल न्यायाधीश ने उक्त दृष्टिकोण लेते हुए रूपए 25000खर्चा लगाकर निरस्त कर दी | दिल्ली मूल्य संवर्धित कर अधिनियम की धारा 98 में प्रावधान है कि ऐसी विवरणियां गोपनीय हैं और उन्हें किसी आपराधिक कार्यवाही के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकरण  में प्रस्तुत नहीं किया जायेगा | न्यायालय ने आगे कहा है कि हमारे विचार में विचाराधीन  अपील कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग मात्र है और इसे हम 50000 रुपये खर्चा लगाते हुए निरस्त करते हैं |
2.   यह है कि प्रस्तुत प्रकरण में विक्रय कर विवरणियों की प्रतियों की मांग की गयी थी और केन्द्रीय सूचना आयोग ने बहुत से प्रकरणों में आयकर विवरणियों की प्रतियां दिए जाने के आदेश दिए हैं | व्यावहारिक तौर पर देखा जाये तो दोनों विवरणियों की प्रकृति एक जैसी ही है| अतः इस प्रकरण के मूल में तो सूचना आयोग के निर्णयों में संगतता का अभाव  परिलक्षित होता है|
3.   यह है कि जहां तक दिल्ली मूल्य संवर्धित कर अधिनियम की धारा 98 का प्रश्न है, सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 22 अन्य सभी कानूनों पर अभिभावी प्रभाव रखती है|स्वयं माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारत संघ बनाम केन्द्रीय सूचना आयोग रिट याचिका सं0 8396/2009 के निर्णय में कहा है कि याची का कथन कि प्रत्यर्थी सं0 2 को दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन एफ आई आर  की प्रति नहीं दी जा सकती है गुणहीन है, जैसे कि कथित सूचना सूचना का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत चाही गयी है और सूचना देय है या नहीं इसका निर्णय सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधान लागू करके ही जांच की जा सकती है। अधिनियम की धारा 22 के अनुसार कथित अधिनियम संहिता सहित पूर्ववर्ती किसी भी कानून पर अभिभावी है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 सूचना का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत मनाही का आधार नहीं हो सकती। जहां कहीं भी सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों तथा दूसरे कानून जो इसके अधिनियम की तिथि को विद्यमान थे के मध्य टकराव हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2 (एफ) में परिभाषित सूचना मांग लेता है तो उसके लिए धारा 8 या 9 में उल्लिखित आधारों के अतिरिक्त सूचना चाहने वाले को मना नहीं किया जा सकता। लोक सूचना अधिकारी या अपील प्राधिकारी सूचना देने के लिए नये कारण या आधार नहीं जोड़ सकते।
4.   यह है कि कानून के अच्छे शासन के लिए यह आवश्यक है कि माननीय न्यायालय के निर्णयों में सुसंगतता बनी रहे ताकि देश में विधि के समक्ष समानता के गारंटीकृत अधिकार का वास्तविक महत्त्व रहे|
5.   यह है कि दुर्भाग्य से देश की विधायिका ने रिट याचिका में खर्चे लगाने और क्षतिपूर्ति के लिए कोई मानक तय नहीं कर रखे हैं किन्तु व्यवहार प्रक्रिया संहिता की धारा  35 क  में प्रावधान है कि किसी वाद या अन्य कार्यवाही में (किन्तु अपील या पुनरीक्षण में नहीं) किसी तंग करने वाली कार्यवाही के लिए खर्चा लगाया जा सकता है| प्रस्तुत मामले का नाम/शीर्षक  कुछ भी रहा हो किन्तु वास्तव में यह आयोग के निर्णय के विरूद्ध अपील थी अतः सिद्धांततः प्रकरण में खर्चा नहीं लगाया जाना चाहिए था|
6.   यह है कि माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्यायपालिका के कर्तव्यों को रेखांकित करते हुए शेलेस्वर नाथ सिंह के मामले के निर्णय दिनांक 11.08.1999 में कहा भी है कि प्रत्येक को समझ लेना चाहिए कि न्यायपालिका जनता की सेवा के लिए बनाई  गयी है न कि वकीलों और न्यायाधीशों की सेवा के लिए| नागरिकगण वकील की राय के आधार पर न्यायालयों में कार्यवाहियों में अग्रसर होते हैं और वकीलों के लिए निर्धारित आचरण के नियमों के अनुसार उन्हें अपने मुवक्किलों को सही-सही राय देनी चाहिए| संभवतया प्रस्तुत प्रकरण में भी याची ने वकील की राय के आधार पर ही कार्यवाही संस्थित की थी और एक विधि विशेषज्ञ से प्राप्त राय को सही और सद्भाविक मानकर यदि कोई व्यक्ति कार्यवाही करे तो उसके लिए मुवक्किल को दोषी मानकर उस पर कोई खर्चा या दंड लगाये जाने का न्याय के सुस्थापित सिद्धांत समर्थन नहीं करते| हाँ, ऐसी विधिविरुद्ध या उपेक्षापूर्ण राय देने वाले वकील के विरुद्ध न्यायालय द्वारा कार्यवाही का विकल्प उसी प्रकार खुला हो सकता है जैसे एक चिकित्सक द्वारा लापरवाही के मामले में|
7.   यह है कि माननीय न्यायालय ने प्रस्तुत प्रकरण में पाया है कि याची ने प्रतिवादी संख्या 2 को परेशान किया है किन्तु उसे किसी प्रकार का खर्चा या क्षतिपूर्ति नहीं दिलाई है अपितु खर्चे की राशि का भी प्रतिवादी संख्या 1 को भुगतान करने की आदेश दिए हैं|
8.   यह है कि संवैधानिक न्यायालय के निर्णय न केवल पक्षकारों पर प्रभाव डालते हैं अपितु दृष्टान्त के रूप में जनजन पर व्यापक प्रभाव डालते हैं| माननीय न्यायालय भी एक खुला और जनता का न्यायालय है |

उपरोक्त परिस्थितियों और तथ्यों के सन्दर्भ में माननीय न्यायालय का उक्त निर्णय मेरी विनम्र राय में संविधान, माननीय न्यायालय की गरिमा और जनतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं है| मैं यहाँ पर यह भी निवेदन करना प्रासंगिक समझता हूँ कि प्रत्येक विवेकी शक्ति के प्रयोग का आधार जनहित प्रोन्नति होना चाहिए विशेषतः जब यह अहम प्रश्न संविधान के संरक्षक उच्च न्यायालय के सामने हो| माननीय न्यायालय के उक्त निर्णय के विरुद्ध अपील भी दायर की जा सकती है किन्तु वह भी एक अंतहीन, खर्चीली और जटिल व थकाने वाली प्रक्रिया होगी| माननीय न्यायालय उदार हृदय से आत्मावलोकन कर इस प्रकरण में स्वप्रेरणा से पुनरीक्षा कर पूर्ण और वास्तविक न्याय देने के लिए सशक्त है| भारतीय गणतंत्र को मज़बूत बनाने की ईश्वर आप द्वय को सदैव सद्प्रेरणा देते रहें| इसी आशा और विश्वास के साथ ,

आपका शुभेच्छु

मनीराम शर्मा
                                                                                                   दिनांक:12.04.2012
ईमेल :maniramsharma@gmail.com 
प्रतिलिपि :
1.माननीय मुख्य न्यायाधिपति,
   भारत का उच्चतम न्यायालय,
   नई दिल्ली - 110001
2.न्याय सचिव,
   न्याय विभाग,
   जैसलमेर हाउस
  26, मानसिंह रोड
   नई दिल्ली  – 110011



Mani Ram Sharma

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यह शर्मिला शर्मा के बच्चों का दुर्भाग्य था या पंचकुला पुलिस की घोर लापरवाही कि अक्टूबर 2012 में एक सडक दुर्घटना में शर्मिला के पति की मृत्यु हो गयी थी| हरियाणा सरकार ने कहने को तो ऐसे मामलों में मुआवजा देने की घोषणा कर रखी है किन्तु पीड़ितों को अभी तक कोई मुआवजा नहीं दिया गया| शर्मिला अपने बच्चों का येन केन प्रकारेण पालन पोषण कर रही थी और अपने पति की मृत्यु के लिए मुआवजे हेतु संघर्ष कर रही थी कि 6 माह बाद दिनांक 07.05.13 को उसके परिवार पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पडा| चंडीगढ़ के सेक्टर 10 में चंडीगढ़ परिवहन उपक्रम की एक बस उसे कुचलते हुए निकल गयी| शर्मिला के सिर में गहरी चोट आयी थी| जिस स्थान पर यह दुर्घटना हुई वहां से मल्टी स्पेसीलिटी अस्पताल मात्र 100 मीटर की दूरी पर ही है| किन्तु अपने आचरण के लिए ख्यात लापरवाह और अमानवीय पुलिस अधिकारी वहां 2 घंटे बाद पहुंचे जिससे शर्मिला को बचाया नहीं जा सका| सेक्टर 3 पुलिस थाने के प्रभारी श्री प्रकाश जब 2 घंटे बाद घटना स्थल पर पहुंचे तो शर्मिला सडक पर खून से लथपथ पड़ी थी यद्यपि अधीनस्थ पुलिस उस स्थान पर पहले से ही उसकी प्रतीक्षा करते रहे| इस घटना से शर्मिला के दो किशोरवय बच्चे पूरी तरह से अनाथ हो गये| यह भी ध्यान देने योग्य है कि शहरी क्षेत्र में परिवहन के लिए अधिकतम 10 मीटर तक लम्बाई की बसें ही उपयुक्त हैं जबकि 13.5 मीटर तक लम्बी असुरक्षित बसों को प्रयोग किया जा रहा है|   

उक्त तथ्य पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के ध्यान में आने पर दिनांक 10.05.13 को स्व-प्रेरणा से संज्ञान लिया गया और अग्रिम कार्यवाही की गयी| उच्च न्यायालय ने अपने हाल ही के आदेश दिनांक 25.09.13 में कहा और आदेश दिया है कि पुलिस के संवेदनहीन आचरण से दो बच्चे अनाथ हो गये| किसी सामाजिक सुरक्षा की योजना के अभाव में इन दुखान्तिकाओं से नाबालिग बच्चे और अधिक पीड़ित हैं| न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आदेश दिया कि हरियाणा सरकार की योजनानुसार 15 दिन के भीतर एक लाख रुपये की राशि भुगतान की जाए| न्यायालय की टिप्पणी थी कि संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़ की संवेदनहीन पुलिस पीड़ित को मदद करने की बजाय क्षेत्राधिकार के मुद्दे को उलझाने में अधिक रुचिबद्ध रही है| न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले तक तो दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव किया जाता रहा| सुनवाई के दौरान यह बताया गया है कि अब कई अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही प्रारंभ की गयी है जिसका अभी तक निष्कर्ष नहीं निकला है किन्तु इससे अवयस्क अनाथ बच्चों को कोई सांत्वना प्राप्त नहीं होती है| कम से कम, बच्चों को आर्थिक मदद तो दी ही जा सकती है| अत: चंडीगढ़ प्रशासन को आदिष्ट किया जाता है कि दोनों बच्चों के नाम से 1-1 लाख रूपये की राशि अंतरिम राहत के तौर पर 15 दिन के भीतर जमा करवाए| सत्यापन के बाद बच्चों को प्रतिमाह शिक्षा व पालन पोषण खर्चे के लिए 14200 रूपये भुगतान किये जाएँ| यह राशि सितम्बर माह से प्रारंभ होगी जोकि 7 अक्तूबर या इससे पूर्व देय होगी| न्यायमित्र की सहायता से तदनुसार आवेदन का निपटान किया गया|
फिर भी चंडीगढ़ प्रशासन और पंजाब सरकार से हरियाणा की तर्ज पर ऐसे मामलों में एक सम्यक नीति बनाने की अपेक्षा की गयी| इस प्रकार की घटनाओं को टालने के उपाय करने और दोषी पुलिस अधिकारियों पर अधिकतम एक माह की अवधि में कार्यवाही करने की रिपोर्ट के लिए मामले को पुन: दिनांक 19.11.13 को सूचीबद्ध करने के आदेश दिए गए व आदेश की दस्ती प्रति पक्षकारों को दी गयी|   
   

Mani Ram Sharma

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Scurrilous attack on the very fiber of Democracy
« Reply #73 on: October 23, 2013, 09:15:00 PM »
To,
 
All the Authorities
 
Functional within
 
The Territory of India
 
Sir,
 
DEALING WITH POLICY MATTERS
 
I would like to draw your pointed attention to the selected excerpts from Central Secretariat Manual of Procedure in vogue as under: -
 
Application of methods and procedures in organizations dates back to early civilization. The procedures prescribed in this Manual, attempt to balance the conflicting considerations of speed and propriety.   Every rule and step in the procedure must serve a definite purpose. A well designed procedure serves as a standing order, a means to coordinating effort, a tool of communication, and a basis for performance measurement and appraisal.
PARA
3.       The Council of Ministers -

(1)     In the exercise of his functions, the President is aided and advised by a Council of Ministers headed by the Prime Minister. In actual practice the executive power of the Union resides in the Council of Ministers.

(2)     The Council of Ministers consists of three categories of Ministers, namely:

(a)  Cabinet Ministers;

(b)  Ministers of State; and

(c)  Deputy Ministers.

(3)     The Cabinet, which consists of Ministers of the first category only, is responsible for shaping the overall policies of the Government in discharging its responsibilities. It sometimes functions through its Committees.

PARA
5.      Department -

(1)     A department is responsible for formulation of policies of the government in relation to business allocated to it and also for the execution and review of those policies.

(2)     For the efficient disposal of business allotted to it, a department is divided into wings, divisions, branches and sections.

(3)     A department is normally headed by a secretary to the Government of India who acts as the administrative head of the department and principal adviser of the Minister on all matters of policy and administration within the department.

 
 It is very clear from the above text that the Cabinet Ministers (Not State Ministers) are responsible for policy decisions in a department/ Ministry, and only they are exclusively authorized to consider a public petition requiring any change in Policy Matter. But it has been observed that not only Secretaries but Joint Secretaries are overstepping and exceeding their authority, and misadventuring deciding petitions involving policy matter which is a scurrilous attack on the very fiber of Democracy. Therefore please ensure that no matter involving policy be finanlised without consent of a Cabinet Minister hence forth because even the State Ministers have no say in Policy Matters.
 
Please apprise me of the action taken by you in this behalf per return of email.
 
Thanking you in anticipation.
 
Yours sincerely
 
 
Mani Ram Sharma


Mani Ram Sharma

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PROACTIVE DISCLOSURE U/S 4 OF RTI ACT – NON –COMPLIANCE
« Reply #74 on: October 25, 2013, 05:27:46 PM »
From:   Mani Ram Sharma
Chairman, Indian National Bar Association, Churu- Chapter
Nakul Niwas,
Behind Roadways Depot
Sardarshahar- 331 403-7 District- Churu (Raj)
INDIA TVC
Email:maniramsharma@gmail.com
  Cell: 919460605417,919001025852
                  Dated: 24th Oct, 2013
 
FOR PERSONAL ATTENTION TO



The Secretary,
Department of Personnel and Training,
Government of India,
New Delhi

 &

The Secretary,
Central Information Commission,
New Delhi

Sir,

SUO MOTU DISCLOSURE U/S 4 OF RTI ACT

Please recapitulate that Department of Personnel and Training, has issued detailed guidelines on suo motu disclosure vide No. No.1/6/2011-IR     Dated the 15th April, 2013. The gist of the OM envisages as under:

“It may be kept in mind that proactive disclosure should be done in local language so that it remains accessible to public. All Public Authorities shall proactively disclose RTI applications and appeals received and their responses, on the websites maintained by Public Authorities with search facility based on key words. All discretionary /non-discretionary grants/ allocations to state governments/ NGOs/Other institutions by Ministry/Department should be placed on the website of the Ministry/Department concerned. Annual Accounts of all legal entities who are provided grants by Public Authorities should be made available through publication, directly or indirectly on the Public Authority’s website. Orders of the public authority should be uploaded on the website immediately after they have been issued. Website should contain all the relevant Acts, Rules, forms and other documents which are normally accessed by citizens.

Information must be presented from a user's perspective, which may require re-arranging it, simplifying it etc. Every webpage displaying information or data proactively disclosed under the RTI Act should, on the top right corner, display the mandatory field ‘Date last updated (DD/MM/YY)’. All government officers have to follow laid down office procedure manual or the other rules which gives details of how representations, petitions and applications from citizens must be dealt with. Templates, formats, and basic steps of decision-making are briefly explained in such manuals. These descriptions constitute the elements of decision-making processes in general.

The powers of each officer including powers of supervision over subordinates involved in the chain of decision-making must also be spelt out next to the flow chart or in a simple bullet-pointed format in a text-box. The exceptional circumstances when such standard decision-making processes may be overridden and by whom, should also be explained clearly. Where decentralization of decision-making has occurred in order to grant greater autonomy to public authorities, such procedures must also be clearly explained.
3.4.2 Citizen Charters, which are mandatory, for each central Ministry/Department/Authority, are good examples of vehicles created for laying down norms of performance for major functions and for monitoring achievements against those standards.
Funds released to various autonomous organizations/ statutory organizations/ attached offices/ Public Sector Enterprises/ Societies/ NGOs/ Corporations etc. should be put on the website on a quarterly basis and budgets of such authorities may be made accessible through links from the website of the Ministry/Department.

Each Ministry/Public Authority shall ensure that these guidelines are fully operationalized within a period of 6 months from the date of their issue. The Action Taken Report on the compliance of these guidelines should be sent, along with the URL link, to the DoPT and Central Information Commission soon after the expiry of the initial period of 6 months.”
I regret to say that some of the Departments/ Ministries/ Organisations  have not only not complied with the guidelines but expressed ignorance or unawareness as to above guidelines while the outer time limit of 6 months fixed for compliance has expired. Therefore please call reports from all the Public Authorities now regarding compliance and issue suitable instructions to complete the task within the mandated period forthwith.
Please keep abreast me of the progress in the matter and meanwhile please acknowledge receipt.

Sincerely yours

Mani Ram Sharma

Mani Ram Sharma

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मनीराम शर्मा
अध्यक्ष, इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन , चुरू प्रसंग
रोडवेज डिपो के पीछे
सरदारशहर  331403
दिनांक 26.10.13
मो- 9460605417, ईमेल- maniramsharma@gmail.com


श्रीमान अध्यक्ष महोदय,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ,
नई दिल्ली

महोदय,

पुलिस थानों में साइबर कैमरे हेतु

मान्यवर को ज्ञात ही है कि पुलिस थानों में नागरिकों के साथ हिंसा और अभद्र व्यवहार होता हैं तथा मानव गरिमा का हनन होता है| स्मरणीय है कि ओंटारियो (कनाडा) के मानवाधिकार ट्रिब्यूनल ने एक प्रवासी व्यक्ति को  बन्दर कहने पर भी हर्जाना दिलाया है जबकि भारत में तो पुलिस द्वारा गाली-गलोज रोजमर्रा का काम है और उसका कोई संज्ञान तक नहीं लिया जाता है| इसके पीछे सामान्यतया कारण यह रहता है कि भारत में अंग्रेजी कालीन साक्ष्य सम्बंधित कानून पीड़ित के पक्ष में नहीं है और पीड़ित अपने पर थाने में किये गए अत्याचारों को प्रमाणित नहीं कर पाता क्योंकि न तो कोई स्वतंत्र गवाह वहां उपलब्ध होता है और न ही ऐसा कोई साहस कर पाता है| भाईचारे के बंधन में बंधे पुलिसवाले भी  किसी पीड़ित के पक्ष में गवाही देने को तैयार नहीं होते हैं अत: रक्षक के स्थान पर भक्षक की भूमिका निभाने के बावजूद भी पुलिसवाले दंड से बच निकलते हैं| 

थानों में घटित होने वाले उक्त घटनाक्रम का सही और सत्य रिकार्ड रखने के लिए आवश्यक है कि थानों में साइबर कैमरे लगाए जांए|  मेरा यह दृढ विश्वास है कि इस व्यवस्था से न केवल मानवाधिकारों की बेहतर प्रोन्नति होगी अपितु आपराधिक तत्वों के पुलिस से सांठगाँठ व पुलिस द्वारा झूठी दर्ज की गयी रोजनामचा आम से भी पर्दा उठ सकेगा| गुजरात राज्य में यह कार्य पर्याप्त पहले शुरू हो चुका है| अत: आपसे विनम्र अनुरोध है कि अधिनियम का धारा 12 (जे) में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए कृपया समस्त सरकारों को निर्देश प्रदान करने की अनुकम्पा करें कि वे एक वर्ष की अवधि में समस्त पुलिस थानों और चौकियों में विभिन्न स्थानों पर इस प्रकार साइबर कैमरे स्थापित करें कि थाने का समस्त स्थान कैमरे की नजर से दूर न रहे |

मैं यह भी निवेदन करना चाहता हूँ कि इस व्यवस्था पर बहुत कम खर्च की आवश्यकता पड़ेगी और इसके अनुरक्षण का दायित्व किसी निजी एजेंसी को दे दिया जाय ताकि खराबी  की शिकायत नहीं रहे| इस प्रसंग में आप द्वारा की गयी कार्यवाही को जानकर मुझे प्रसन्नता होगी|

भवनिष्ठ

मनीराम शर्मा                               

Mani Ram Sharma

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EFFICIENT AND CLEAN PUBLIC SERVICES – JOB ROTATION AND TRANSFERS
« Reply #76 on: October 27, 2013, 05:35:38 PM »
From:   Mani Ram Sharma
Chairman, Indian National Bar Association, Churu- District
Nakul Niwas,
Behind Roadways Depot
Sardarshahar- 331 403-7 District- Churu (Raj)
INDIA TVC
May mail to : maniramsharma@gmail.com
  May call: 919460605417,919001025852
                  Dated: 27th Oct, 2013


The Prime Minister,
Govt. of India,
New Delhi

Sir,

EFFICIENT AND CLEAN PUBLIC SERVICES – JOB ROTATION AND TRANSFERS
Of late I have observed that Employees/Officers in Government services do continue to remain and enjoy in the same Office from the joining to superannuation. This anti-people mismanagement not only promotes lethargy and inefficiency but also tends to degenerate productivity and clean services. A person sitting tight over matters for years may hide his own misdemeanor, and indulge into corrupt practices and misuse of power and position on the same seat. Such long staying employees/officers perform the duties of touts of power centers in general maintaining good rapport and links with politicians and senior functionaries of Government with loyalty. Such of the personnel are instrumental in under hand dealings too, and therefore rewarded rich benefits of no transfer of job or station. Their criminal misconducts may be put under carpet and nourished for pretty enough periods seriously jeopardizing public interest.
It is also noteworthy that some officers are not transferred to another office even after promotions, and they carry on holding and handling the same job like an ancestral office. A person dealing with a single job   can’t learn more about dealing with other jobs which embarks adversely upon the smooth delivery of public services, and the functioning of public services machinery renders handicapped and crippled by such malpractice.
Job rotation in Banking Industry is being practiced after every 6 months so that all the employees may understand functioning and procedure of all the seats/desks/counters. The maximum stay period of an officer in an (banks) office is restricted to 3 years, and that at one station is restricted to 5 years in view of vigilance angel. Bank Officers are also transferred after promotion to meet the new challenges, and develop & better their skills in the institutional as well as personal interest. Institutional development is coherent to personal development. But the said constructive practices are missing from Central and State Services.
Therefore a transparent and comprehensive transfer policy be framed and implemented for Government services to maintain efficiency and cleanliness. Kindly apprise me of the concrete steps taken by your good office in the instant matter. Meanwhile please acknowledge receipt in terms of Para 66  and 14 of Central Secretariat Manual of Procedure.

Yours faithfully 

Mani Ram Sharma                               





Mani Ram Sharma

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From:   Mani Ram Sharma
Chairman, Indian National Bar Association, Churu- Chapter
Nakul Niwas,
Behind Roadways Depot
Sardarshahar- 331 403-7 District- Churu (Raj)
INDIA TVC
Email: maniramsharma@gmail.com
  Cell: 919460605417,919001025852
                  Dated: 30th Oct, 2013
 


 A humble request to all
The Judicial and Quasi- Judicial
Authorities within
Territories of India


Sir,

PROACTIVE DISCLOSURE U/S 4 OF RTI ACT – EXHIBITION OF POWERS AND DUTIES OF OFFICERS

Please recapitulate that Department of Personnel and Training, has issued detailed guidelines on suo motu disclosure vide OM No.1/6/2011-IR    Dated the 15th April, 2013. The OM, inter alia, requires as under:
“The elements of information listed in the various sub-clauses of Section 4(1)(b) must be disclosed in an integrated manner. For example, the functions and responsibilities of a public authority cannot be understood in isolation from the powers and functions of its employees, the norms that inform its decision making processes and the rules, instructions and manuals that are used in the discharge of its functions. Description of one element presupposes the existence of another. SO EVERY PUBLIC AUTHORITY MUST ENDEAVOUR TO INTEGRATE THE INFORMATION MENTIONED IN THESE SUB-CLAUSES WHILE PREPARING VOLUNTARY DISCLOSURE MATERIALS.  THE CHALLENGE IS TO PRESENT A SIMPLIFIED VERSION OF THE DECISION-MAKING PROCEDURE THAT IS OF INTEREST TO A COMMON CITIZEN.”

The Income Tax Appellate Tribunal has taken initiative in the right direction and the powers have been displayed over (http://lawmin.nic.in/RTI/OfficersPowers&Functions.pdf) in a digest. The precedent set by the tribunal deserves commendation. Regrettably  the same   has not been complied with by your good office, and the material available in your website is insufficient to serve the public expectations. Therefore please follow the precedent and put the material in public domain in a comprehensive manner within the 2 weeks period forthwith.

Meanwhile please acknowledge receipt.
Sincerely yours
Mani Ram Sharma

Mani Ram Sharma

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संलग्नक देखें

Mani Ram Sharma

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Throne of Vikramaditya or Jehangir ..?
« Reply #79 on: November 05, 2013, 08:35:09 AM »
Mani Ram Sharma
Chairman, Indian National Bar Association, Churu- Chapter
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Dated: 05.11.13
To,
The Hon’ble Chief Justice,
Supreme Court of India,
New Delhi

Sir,
WRIT PETITION (CIVIL) NO. 46 OF 2004- PIL IN THE MATTER OF ISSUANCE OF WARRANTS OF ARREST OF FOUR DIGNITARIES OF INDIA
I wish to draw your pointed attention to the above matter, involving blatant abuse of judicial process and milking money, hovering for a decade in the Hon’ble Court. Warrants of arrest of Four Dignitaries were issued by Magistrate Brahmbatt in league with some advocates practicing at Ahemdabad which cropped up in a sting operation. The case should have shocked the conscience of Judiciary of the Country, and public expects from an impartial Judiciary to take immediate stock of the position and conduct introspection for remedial measures to treat the ailments of Indian Judiciary and keep it disinfected and pure like Ganges. This is not only a case of buying-off but amounts to a scurrilous attack on the credibility of judiciary putting big sign of interrogation.

A gang of police officers had on 18.11.1997attacked an ADJ while sitting in Court Room in Bhagalpur in Bihar earlier. Certainly this was not an attack on ADJ personally but this offence was misadventure of Uniformed Force to undermine confidence in judiciary and an outrageous attack on freedom of Judiciary. The Hon’ble Patna High Court stepped into and commenced trial of the case, and the contemnors were convicted on 10.02.1998 within a short span of 3 months. The convicted contemnors appealed before this court, and this court not only affirmed the conviction under Contempt of Courts Act but further directed to speed up the disciplinary action as well as criminal prosecution.
Unfortunately the instant petition in hand involving the very question of dignity of judiciary was registered on 28.01.2004, and CBI had submitted it’s enquiry report on 06.02.2004. But the country is awaiting still the fate of this petition and the culprits are roaming free for this pretty enough period. Whether the petitioner has prayed for punishment to the culprits or not but an impartial and neutral Court gaining knowledge can’t turn a blind eye to the offences committed by anybody irrespective of his height, post or profession. Meanwhile the case had been listed for hearing a number of times but the progress is not pleasing. Public expects that a hearing should be an effective hearing and not merely an empty formality or ritual.

The delay, knowingly or unknowingly, by the court has proven helpful for the culprits instrumental in mockery of judicial system and gives a wrong impression to common mind. Dragging the proceedings unnecessarily would impede the speed and efficiency with which justice has to be administered. The threat of immediate punishment is the most effective deterrent against misconduct. It is undesirable that a criminal prosecution should wait till everybody concerned has forgotten all about the crime. The public interests demand that criminal justice should be swift and sure; that the guilty should be punished while the events are still fresh in the public mind and that the innocent should be absolved as early as is consistent with a fair and impartial trial.
This Hon’ble Court should re-evaluate the position since the delinquent Magistrate may retire gracefully meanwhile. In Mahabharat Duryodhan asks Bhishm, “Though you have been eradicating thousands of soldiers of opponents daily but have not hit down even a single Pandav.” Bhishm replies, “No tree may chop his own branch.” Since the persons involved in the episode belong to judicial business hence the misgivings deepen in the minds of persons of ordinary prudence in the matter. However the Scale of Justice before the Throne of Vikramaditya or Jehangir should remain balanced in any case.

I may also add that the basis of every law or every rule OR EVERY EXERCISE OF DISCRETION or every decision of Constitutional Bodies take, is on the premise of greatest good of the greatest number of people.

May GOD be with you and your companion judges always and every time to strengthen the confidence of common man of this democratic country in the institution.

Sincerely   yours
Mani Ram Sharma


 

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