Author Topic: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख  (Read 21073 times)


Mani Ram Sharma

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गृह मंत्रालय सरकार एक प्रमुख अंग है जो मुख्य रूप से पुलिस से सम्बन्ध रखता है व  पुलिस ज्यादतियों से सम्बंधित शिकायतों पर समुचित कार्यवाही करने का दायित्व मंत्रालय पर है| किन्तु व्यवहार में पाया गया है कि स्वतंत्रता के बाद भी पुलिस के रवैये में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है| देश में पुलिस बलों का गठन यद्यपि जनता की सुरक्षा के लिए किया गया है किन्तु देश की पुलिस आज भी अपने कर्कश स्वर का प्रयोग जनता को भयभीत करने के लिये ही कर रही है परिणामत: देश का पुलिस संगठन अपराधियों का मित्र और आम नागरिक के दुश्मन की तरह देखा जाता है| आज भी आम नागरिक पुलिस से दूर ही रहना चाहता है|
मंत्रालय भी अपने कर्तव्यों में घोर विफल है और पुलिस अभी भी बेलगाम है तथा पुलिस बल का उपयोग आमजन की सुरक्षा की बजाय मात्र (आर्थिक या राजनैतिक) सतासीन लोगों की रक्षा के लिए हो रहा है| इस स्थिति पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि स्वयं केन्द्रीय गृह मंत्रालय में 20 से अधिक पुलिस अधिकारी नियुक्त/प्रतिनियुक्त हैं जो गृह मंत्रालय सचिवालय की कार्यशैली व संस्कृति को अपदूषित कर रहे हैं| राज्यों की स्थिति भी लगभग समान ही है| इससे यह गृह मंत्रालय कम और पुलिस मंत्रालय ज्यादा नजर आता है| मैं अपने अनुभव से यह बात स्पष्ट तौर पर कह सकता हूँ कि सम्पूर्ण देश के पुलिस बलों में निष्ठावन और योग्य व्यक्ति मिलने कठिन है | देश के पुलिस बलों का वातावरण ही ऐसा है कि वहां कोई भी निष्ठावान  व्यक्ति टिक नहीं सकता| जो लोग आज पुलिस बलों में टिके हुए हैं वे सभी अपने कर्तव्यों और जनता के प्रति निष्ठावान के स्थान पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों और राजनेताओं के स्वामिभक्त अधिक हैं और उनके प्रसाद स्वरुप ही पदोन्नतियाँ और पदक पा रहे हैं| यदि कोई निष्ठावान व्यक्ति भ्रान्तिवश इस बल में भर्ती हो भी जाए तो उसे भीरु बनकर पुलिस की अस्वस्थ परम्पराओं को निभाना पडेगा या पुलिस सेवा छोडनी पड़ेगी| यदि एक व्यक्ति सर्वगुण  सम्पन्न होते हुए भीरु हो तो उसके सभी गुण निरुपयोगी हैं क्योंकि वह उनका कोई उपयोग नहीं कर सकता|
पुलिस के विरुद्ध आने वाली समस्त शिकायतों में दोषी पुलिस अधिकारी का बचाव करने के लिए गृह मंत्रालय में पर्याप्त पुलिस अधिकारी लगा रखे हैं| ऐसी स्थिति में पुलिस सुधार की कोई भी आशा करना ही व्यर्थ है| गृह मंत्रालय में इन पुलिस अधिकारियों को लगाने से कोई जन अभिप्राय: सिद्ध नहीं होता क्योंकि जो पुलिस वाले अपने कार्यक्षेत्र में रहते हुए पुलिस को जनोंन्मुखी नहीं बना सके वे मंत्रालय में किस प्रकार सहायक हो सकते हैं|  यदि देश का पुलिस बल निष्ठा पूर्वक कार्य करता तो शायद नीतिनिर्माण के अतिरिक्त गृह मंत्रालय की कोई आवश्यकता ही नहीं रहती और जितना बड़ा गृह मंत्रालय का बीड़ा है उसका एक चौथाई ही पर्याप्त रहता|   

वैसे भी पुलिस तो जनता की सुरक्षा के लिए क्षेत्र में कार्य करने वाला बल जिसका कार्यालयों में कोई कार्य नहीं है| सभी स्तर के पुलिस अधिकारियों को कार्यक्षेत्र में भेजा जाना चाहिए और उन्हें, अपवादों को छोड़कर, हमेशा ही चलायमान ड्यूटी पर रखा जाना चाहिए| आज संचार के उन्नत साधन हैं अत: आवश्यकता होने पर किसी भी पुलिस अधिकारी से कभी भी कहीं भी संपर्क किया जा सकता है व आमने सामने बात की जा सकती है और पुलिस चलायमान ड्यूटी पर होते हुए भी कार्यालय का कामकाज देख सकती है|
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को यह भी निर्देश हो को वे पुलिस थानों के कार्यालय की बजाय जनता से संपर्क कर निरीक्षण रिपोर्ट बनाएं| पुलिस का कार्य विशुद्ध रूप से जनता को सुरक्षा उपलब्ध करवाना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, किसी भी प्रकार से प्रशासन में हस्तक्षेप करना उनका कार्य नहीं है| पुलिस को वैसे भी सचिवालय में कार्य करने का कोई प्रशिक्षण नहीं होता अपितु शस्त्र चलाने, कानून-व्यवस्था का ही प्रशिक्षण दिया जाता है अत: सचिवालय के लिए पुलिस का कोई उपयोग न्यायोचित नहीं है| सचिवालय को, जो पुलिस अधिकारी कहीं पर उपयुक्त न हों, ऐसे नाकाम पुलिस अधिकारियों की शरण स्थली नहीं बनाया जाए| 

वास्तव में देखा जाये तो वर्दी में छिपे अपराधी ही आज समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं| अतेव गृह मंत्रालय को पुलिस प्रभाव से पूर्णतया मुक्त कर गृह मंत्रालय का शुद्धिकरण किया जाये, पुलिस को अपने कार्य क्षेत्र में भेजा जाय,  और प्रत्यक्ष सुरक्षा के अतिरिक्त किसी भी पुलिस अधिकारी को गृह मंत्रालय में नियुक्ति अथवा प्रतिनियुक्ति पर नहीं रखा जाए| 

आपराधिक मामलों में पुलिस जांच अपराधी को कम और पीड़ित को ज्यादा दुःख देने वाली होती है| यहाँ तक की पुलिस द्वारा जांच में, निर्धारित नियमों से विपरीत प्रक्रिया अपनाई जाती है| यद्यपि पुलिस को अपराध की सूचना मिलने पर तुरंत घटना स्थल पर जाकर प्रमाणों को सुरक्षित करना चाहिये और अपराधी का पक्ष जानना  चाहिए किन्तु पुलिस ठीक इसके विपरीत, पहले पीड़ित के बयान लेती है और अक्सर पीड़ित को धमकाकार उसे मामला वापिस लेने के लिए दबाव बनाती है| जबकि यदि पुलिस पहले अपराधी के बयान ले और बाद में इन बयानों के आधार पर पीड़ित के बयान ले तो पीड़ित पक्षकार, अपराधी के बयानों के विषय में, और बेहतर स्पष्टीकरण  दे सकता है और पीड़ित के बयान तो स्वयम ऍफ़ आई आर या न्यायालय के माध्यम से प्राप्त परिवाद में पहले से ही होते हैं| इससे स्थिति प्रारम्भिक स्तर पर ही अधिक स्पष्ट हो सकेगी| पुलिस अनुसन्धान का अभिप्राय किसी पक्ष को पीड़ा पहुंचाना न होकर दोनों पक्षों को सुनकर निष्पक्ष तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार करना है  जबकि पुलिस द्वारा मनमानी प्रक्रिया अपनाई जाती| आश्चर्य होता जब कई बार पुलिस किसी अभियुक्त की लम्बी अवधि के लिए रिमांड की मांग करती है वहीं कई बार अभियुक्त से कोई पूछताछ किये बिना ही उसे दोषी मान बैठती है| 

जनता की पुलिस के प्रति शिकायतों में भी कोई कमी नहीं आयी है और पुलिस वालों को यह विश्वास है  कि वे चाहे जो करें उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है| आंकड़े बताते हैं कि वर्ष भर में पुलिस के विरुद्ध प्राप्त होने वाली शिकायतों में मुश्किल से मात्र 1 प्रतिशत में ही कोई कार्यवाही होती है क्योंकि  इन शिकायतों की जांच किसी पुलिस अधिकारी के द्वारा ही की जाती है| आखिर वे अपनी  बिरादरी के विरुद्ध कोई कदम कैसे उठा सकते हैं? अत: यह व्यवस्था की जाए कि भविष्य में किसी भी पुलिसवाले – चाहे किसी भी स्तर का क्यों न हो, के विरुद्ध जांच पुलिस द्वारा नहीं की जायेगी| अब तक की प्रवृति के अनुसार देश में जांचें दोषियों को बचाने के लिए की जाती रही हैं न कि दोषी का दायित्व निश्चित करने के लिए| मैं एक उदाहरण से आपको यह स्पष्ट करना चाहूंगा| एक बार ट्रेन के कुछ डिब्बे पटरी से उतर गए तो जांच के लिए इंजीनियर आये और डिब्बे वाले इंजीनियरों ने रिपोर्ट दी कि पटरी का अलायन्मेंट सही नहीं था और पटरी वाले इंजीनियरों का कहना था कि डिब्बे के पहियों का अलायन्मेंट ठीक नहीं था किन्तु किसी ने भी अपने विभाग को सही और दुरस्त होने या सही नहीं होने पर कोई टिपण्णी नहीं की|  आज हमारी सरकारें इस प्रकार के छद्म बहानों की तामीर पर ही चल रही हैं और जांचों में मुख्य मुद्दे से हटकर ही कोई निष्कर्ष निकाला जाता है जिससे दोषियों को फलने फूलने का अवसर मिल रहा है और देश में दोषी लोक सेवक रक्तबीज की तरह बढ़ रहे हैं| 
अनुसन्धान में अग्रसर होने के लिए पुलिस तुरंत अपराधी का पक्ष जाने और पहले पीड़ित के बयान लेने में अनावश्यक समय बर्बाद नहीं करे क्योंकि जांच का उद्देश्य अभियुक्त की गिरफ्तारी के मजबूत आधार तैयार करना नहीं होकर सत्य का पता लगाना है|   न ही अभियुक्त की गिरफ्तारी न्याय का अंतिम लक्ष्य है|
दंड प्रक्रिया संहिता एवं पुलिस नियमों में पुलिस हैड कांस्टेबल को पुलिस थाना के प्रभारी की शक्तियां दी  हुई हैं  अत: निरीक्षक का हमेशा थाने पर उपस्थित रहना आवश्यक नहीं और एफ आई आर दर्ज करने के लिए हैड कांस्टेबल को किसी प्रशासनिक आदेश की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह कानून द्वारा ऐसा करने के लिए पहले से ही सशक्त है और कोई भी पुलिस अधिकारी कानून से ऊपर नहीं है|  जरूरत है पुलिस की कार्य शैली और भूमिका में जनानुकूल परिवर्तन कर इसे एक नई दिशा दी जाए |

Mani Ram Sharma

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अपने मातहत पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राप्त दुर्व्यवहार की सभी शिकायतों, आदि की  तुरंत जांच एक राजपत्रित अधिकारी द्वारा करवाया जाना  जिला अधीक्षक के महत्वपूर्ण कर्तव्यों में से एक होना चाहिए और की गई कार्रवाई के संबंध शिकायतकर्ताओं को सूचना भेजी जानी चाहिए| इसके अलावा, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को  दिन-रात हर समय जनता के लिए आसानी से सुलभ होना चाहिए |पुलिस अधिकारियों की दक्षता को पहचानने के लिए उन पर अनुचित बल प्रयोग जैसी अवांछनीय प्रथाओं- अपराध के गैर पंजीकरण या न्यूनतम पंजीकरण , निर्दोष व्यक्तियों को दंड प्रक्रिया संहिता या विशेष अधिनियमों आदि में निवारक धारा में फांसने के विभिन्न प्रकार के लिए प्रेरित किये जाने को अस्वस्थ मान्यता प्राप्त हो रही है| वरिष्ठ अधिकारियों को आंकड़ों से जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष नहीं निकालने  का परिवेश बनाना चाहिए| वे अपराध के  पूर्ण और सही पंजीकरण के लिए प्रोत्साहित करें,  और एक अच्छा सांख्यिकीय रिकॉर्ड बनाने के लिए निर्दोष व्यक्तियों को फंसाने के किसी भी प्रयास के साथ सख्ती से निपटें| हमारे लिए यह विशेष चिंता का विषय है कि यह बात विशेष रूप से समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को प्रतिकूल प्रभावित करता है| बेहतर प्रशिक्षण, शिकायतों का गहन पर्यवेक्षण और तुरंत ध्यान से जांच अधिकारी को कदाचारों से दूर रखने और पुलिस के कामकाज के तरीकों में अधिक से अधिक जनता के विश्वास को बढ़ावा मिलेगा| मौजूदा आपराधिक कानून के तहत अपराधों के  संज्ञेय और गैर संज्ञेय के रूप में वर्गीकरण पुलिस की छवि को प्रतिकूल प्रभावित करता है क्योंकि संज्ञेय क्षेत्र तक  ही पुलिस सेवा सीमित है| इस तरह के वर्गीकरण से सबसे अधिक समाज के गरीब और कमजोर वर्गों के लोग प्रभावित होते हैं जिनके पास अदालत में जाने के लिए अपने संसाधन या समय नहीं होता है| एक ओर जहां पुलिस से हमारे कल्याणकारी  लोकतंत्र की प्रोन्नति की भूमिका अदा करने की उम्मीद कर रहे हैं तो  गैर संज्ञेय मामलों में उल्लंघन के खिलाफ सकारात्मक या तत्काल कार्रवाई के लिए पुलिस को स्वयं कार्यवाही से रोके जाने से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | इस तरह के विभेद  का एक मुश्त उन्मूलन व्यावहारिक नहीं है, लेकिन सरकार को जल्द से जल्द इस समस्या पर विचार करना चाहिए |पुलिस को समाज कल्याण कानून के प्रवर्तन के लिए जिम्मेदार होना चाहिए | वे समुदाय के कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए अपनी प्रतिबद्धता की भावना के साथ इस कार्य को पूरा किये बिना बहुसंख्य लोगों के सामने खुद की  अच्छी छवि पेश नहीं कर सकते | इस प्रक्रिया में पुलिस की  विस्तृत भागीदारी से उनकी ताकत बढ़ाने की जरूरत होगी | सामाजिक सुरक्षा कार्य में भी पुलिस की अधिक से अधिक भागीदारी होनी चाहिए|छात्र समुदाय के साथ संपर्क पुलिस जनता के संबंधों में एक बहुत ही संवेदनशील और नाजुक मामला है| बड़े शहरों और विश्वविद्यालयों में छात्र समस्याओं से निपटने के लिए पुलिस अधिकारियों को विशेष रूप से चयनित और प्रशिक्षित किया और उन्हें विश्वविद्यालय संकाय और छात्र समुदाय दोनों के साथ निकट संपर्क का विकास करना चाहिए| माध्यमिक स्कूलों में छात्र समुदाय के साथ खेलकूद, विभिन्न मुद्दों पर स्कूल कार्यों और एक साथ बैठकों में भागीदारी के माध्यम से संपर्क स्थापित किया जाना चाहिए | वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को इस संबंध में एक मिसाल कायम करनी  है और स्वतंत्र रूप से छात्र समुदाय के साथ घुलमिल जाने के लिए और, यातायात जैसे पुलिस कर्तव्यों में, जितना संभव हो सके, स्कूलों आदि के पास  भीड़ नियंत्रण  आदि में उन्हें सक्रिय रूप से शामिल करने के लिए प्रयास करने के लिए अपने अधीनस्थ अधिकारियों को प्रोत्साहित करना चाहिए| उन्हें  सीमाओं आदि की पुलिस चौकसी, सड़क , सुरक्षा , अपराध की रोकथाम के उपायों के नियम जैसे विषयों पर फिल्म शो के साथ वार्ता करने के लिए कभी कभी स्कूलों और कॉलेजों का दौरा करना चाहिए|युवा स्कूल के लिए पाठ्य पुस्तकों में पुलिसकर्मी द्वारा लोगों को मदद जैसे  अध्याय शामिल करना चाहिए | पुलिस जनता की भलाई के लिए क्या करती है या क्या कर सकती है की एक उद्देश्यपरक तस्वीर प्रस्तुत करने में सहायता के लिए  साहित्यकारों, पत्रकारों और फिल्म निर्माताओं के साथ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को मुक्त रूप से रूप से घुलना मिलना चाहिए | पुलिस महानिदेशक को काम के विभिन्न पहलुओं के बारे में लेख लिखने के लिए और उनकी कठिनाइयों को दूर करने के लिए और उपलब्धियों को प्रसारित करने के लिए प्रसिद्ध व्यक्तियों को आमंत्रित करने की संभावना तलाशनी चाहिए | उपयुक्त पुस्तकें नाटक और दस्तावेजी फ़िल्में भी जनता के आकलन में पुलिस छवि को ऊपर उठाने में महत्वपूर्ण योगदान कर सकती हैं| हमलों और अन्य आंदोलनकारी गतिविधियों से निपटने में पुलिस कार्रवाई से भी लोगों के बड़े वर्गों के साथ गलत समझ और तनावपूर्ण संबंधों के लिए जिम्मेदार है| ऐसे अवसरों पर पुलिस को तटस्थता का परिचय देना चाहिये और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि पुलिस हिंसा और शांति के उल्लंघनों को रोकने के लिए ही मौके पर मौजूद है  व  किसी भी पार्टी का साथ देने के लिए नहीं | ऐसे दृष्टिकोण को विकसित किया जाना चाहिए कि अक्सर बिगड़ी हुई परिस्थितियों को बल प्रयोग के बिना हल किया जा सकता है| धैर्य और समझदारी के दृष्टिकोण को अपनाया जाना चाहिए| दोनों के बीच अपर्याप्त या प्रतिबंधित  संचार से लोगों और पुलिस के बीच की खाई बढ़ी  है | लोगों की सेवा में पुलिस द्वारा किए गए कई महत्वपूर्ण योगदान को अक्सर जनता नहीं जानती है | पुलिस अधिकारियों को पुलिस विभाग की गतिविधियों के बारे में जनता के लिए उद्देश्यपरक  जानकारी प्रस्तुत करने से  यह संभव है | समान रूप से यह भी आवश्यक है कि लोगों को यह बताया जाए कि वे  सामाजिक सुरक्षा के लिए क्या करें व क्या न करें और वे किन तरीकों तथा साधनों से पुलिस के लिए महत्वपूर्ण  योगदान दे सकते हैं| पुलिस अधीक्षक द्वारा  जिले , उप – खंड और पुलिस थाना स्तर पर समुदाय और अन्य सम्मानित व्यक्तियों की विभिन्न व्यावसायिक समूहों के प्रतिनिधियों से मिलकर नागरिक समितियों के गठन का प्रयोग उपयोगी हो सकता है |

Mani Ram Sharma

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भारतीय न्यायचरित मानस

अक्सर मिडिया और अग्रणी लोगों द्वारा प्रसारित किया जाता है कि देश के न्यायालय लोकतंत्र की रक्षा में मजबूती से खड़े हैं किन्तु मेरे स्वतंत्र मतानुसार वास्तविक स्थिति इससे भिन्न है| भ्रष्ट और शक्तिशालों लोगों को यदाकदा दण्डित करने मात्र से 125 करोड़ का जनतंत्र मजबूत नहीं होता है| न्यायालयों के तो समस्त निर्णयों में प्रजातंत्र झलकना चाहिये और अपवाद स्वरुप किसी मामले में दोषी को दण्डित करने में मानवीय चूक हो सकती है जिसे जनता सहन-वहन कर सकती है| आज स्थिति यह है कि कार्यरत और सेवानिवृत न्यायाधीशों पर भी नैतिक अधपतन तक के आरोप लग रहे हैं यद्यपि सेवारत न्यायाधीशों पर बहुत कम आरोप लग रहे हैं| इसका यह कदापि अभिप्राय नहीं है कि भारत में सेवारत समस्त न्यायाधीश भले और ईमानदार हैं अथवा रहे हैं| ऐसा नहीं है कि ये लोग आदित: सदचरित्रवान रहे हों और कालान्तर में इनका नैतिक अधपतन हुआ हो| सेवारत होते हुए किसी न्यायाधीश पर आरोप लगाने पर अवमान कानून का “न्यायिक आतंकवाद” की तरह प्रयोग किये जाने का जोखिम बना रहता है अत: इस कानून के कारण नागरिक न्यायपालिका के सम्बन्ध में अपने विचार भी खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं और पीड़ित लोग न्यायाधीशों की सेवानिवृति तक आरोप लगाने का इन्तजार करते हैं| भारत में पत्रकारों द्वारा न्यायालयों की कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग भी दबी जुबान से ही होती है जो प्राय: अर्द्धसत्य ही होती है| वास्तव में भारतीय न्यायालय अवमान कानून न केवल ब्रिटेन के कानून से अश्रेष्ठ और आतंकी है बल्कि श्रीलंका का अवमान कानून भी भारतीय कानून से श्रेष्ट है| जहाँ ब्रिटेन के कानून में किसी न्यायाधीश पर आरोप लगाना अवमान नहीं है बल्कि किसी मामले में सीधे अवरोध उत्पन्न करना ही अवमान है वहीं किसी मामले में झूठी गवाही देने, झूठे साक्ष्य पेश करने जैसे मामलों में भारत में मुश्किल से ही किसी दोषी को सजा होती है| न्यायालय अपराधियों के प्रति उदारता का परित्याग कर जिस दिन ऐसा करने लगेंगे उस दिन रक्तबीज की तरह बढती अनावश्यक मुकदमेबाजी स्वत: ही घट जायेगी और सरकारी अधिकारी इससे सबसे अधिक प्रभावित होंगे| ठीक इसी प्रकार श्रीलंका में अलग से कोई अवमान कानून ही नहीं है अपितु न्यायिक कार्यवाही में अवरोध करना ही अवमान माना जाता है| प्रथम तो भारत में कोई वकील अपवाद स्वरुप ही राजनीति या किसी राजनैतिक दल से घनिष्ठ संपर्क से दूर है और भारत में उच्च न्यायालयों व उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और उसके पैंतरों को देखने से भी यह एहसास नहीं होता कि ये नियुक्तियां गैर-राजनैतिक ढंग से स्वच्छतापूर्वक  होती हैं|   

अभी हाल ही में चारा घोटाले में लालू यादव व जगन्नाथ मिश्र को सुनाई गयी सजा (सजा भुगतेंगे कितनी यह अभी भविष्य के गर्भ में है) से शायद देश की जनता को ऐसा भ्रम होगा कि देश में कानून का राज है और दोषियों को बख्शा नहीं जाता| किन्तु विचारणीय है कि क्या लालू यादव या जगन्नाथ मिश्र का यह पहला आपराधिक मामला है जहां उन्हें सजा सुनाई गयी है| यदि नहीं तो फिर आज तक ये आजाद क्यों घूमते रहे? क्या आजादी का मतलब इतना उदार है ? एक ओर उच्च वर्ग के अपराधी या पीड़ित के मामले में पुलिस पीछा करने या गिरफ्तार करने के लिए हवाई यात्रा का खर्चा वहन करती है वहीं आम गवाह को बजट नहीं होने का बहाना बनाकर बस यात्रा व भोजन व्यय का भी भुगतान नहीं करती है| सैद्धांतिक तौर पर पुलिस पर भी न्यायपालिका का नियंत्रण बताया जाता है अत: पुलिस द्वारा ढंग से छानबीन नहीं की जाए या अपराधियों को बचाया जाए और निर्दोष लोगों को फंसाया जाए तो न्यायालय मूकदर्शी नहीं रह सकते| फिर अपराधी आखिर दंड से क्यों बच निकलते हैं?  किसी भी अपराधी को यदि अपराध करने पर दंड नहीं मिले तो वह दुस्साहसी हो जाता है और देश की कानून-व्यवस्था को ठेंगा दिखाता है| एक सामान्य अपराधी जेबकाटने से प्रारम्भ कर कालांतर में चोर और डाकू बनता है| देश की जनता जानती है कि निश्चित रूप से उक्त मामले के आरोपियों-लालू यादव व जगन्नाथ मिश्र के ये पहले अपराध नहीं थे किन्तु आज तक दण्डित नहीं हुए फलत: ये अपराध की दुनिया में आगे तेजी से कदम बढाते गए| बिहार राज्य की जनता तो इनके बारे में काफी कुछ जानती है|

जगन्नाथ मिश्र 1972 से 1974 तक बिहार में मंत्री पद पर रहे हैं और मुख्यमंत्री भी रहे हैं| इस अवधि में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा बिहार के सहकारिता विभाग की ऑडिट की गयी और इस रिपोर्ट में गंभीर अनियमितताएं पायी गयी| रिपोर्ट के अनुसार अवैध ऋण वितरण, भ्रष्टाचार और गबन भी पाया गया| जगन्नाथ मिश्र पर पुरानी तारीख में आदेश करने और रिकार्ड में हेराफेरी करने के भी आरोप थे| मजिस्ट्रेट न्यायालय से मामले की शुरुआत हुई और परीक्षण के दौरान मामला कई बार उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय गया| इस बीच राज्य सरकार ने मामला वापिस लेने की अनुमति दे दी किन्तु शिवनंदन पासवान के विरोध के कारण मामला शीघ्र बंद नहीं हो सका| मामला दुबारा उच्चतम न्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण याचिका के रूप में सुनवाई हेतु आया और न्यायालय के सामने प्रमुख प्रश्न था कि क्या सरकार द्वारा आपराधिक मुकदमा  वापिस लेने का कोई नागरिक विरोध कर सकता है| न्यायालय ने इस सैद्धांतिक प्रश्न का तो सकारात्मक जवाब दे दिया किन्तु मामले में पुन: परीक्षण के आदेश नहीं दिए और घटना के लगभग 14 वर्ष बाद भी दोषियों के विरुद्ध परीक्षण न्यायालय में कोई प्रभावी कार्यवाही प्रारम्भ तक न हो सकी| परिणामत: इस निर्णय का कोई वास्तविक और व्यावहारिक लाभ देश की जनता को नहीं मिला और भरसक प्रयास  के बावजूद  भ्रष्टाचार, गबन, अमानत में खयानत, रिकार्ड में हेराफेरी का अभियुक्त न केवल दण्डित होने से बच गया बल्कि उसे एक अभियुक्त की तरह न्यायालयी कार्यवाही का सामना तक नहीं करना पडा| कालान्तर में जगन्नाथ मिश्र ने प्रगति की और चारा घोटाले में लिप्त हो गए और लालू यादव के साथ उन्हें भी दोषी पाया गया है| यदि जगन्नाथ मिश्र के विरुद्ध 1980 के दशक में ही प्रभावी कार्यवाही हो गयी होती तो शायद दुस्साहस इस स्तर तक नहीं बढ़ता| 

बिहार राज्य में ही भागलपुर में न्यायालय में बैठे न्यायाधीश पर पुलिस द्वारा हमला करने के मामले में पटना उच्च न्यायालय ने 3 माह से भी कम अवधि में अवमान कार्यवाही के मामले में अन्वीक्षा पूर्ण कर दोषी पुलिस कर्मियों को दण्डित कर दिया| ठीक इसी प्रकार नडियाद (गुजरात) में मजिस्ट्रेट को जबरदस्ती शराब पिलाकर जुलूस निकालने के मामले में अवमान कार्यवाही में उच्चतम न्यायालय ने समस्त दोषी पुलिस अधिकारियों व झूठा प्रमाण पत्र देने वाले डॉक्टर को भी दण्डित कर दिया| किन्तु देश की जनता का मानना है कि जब यही प्रश्न किसी दोषी न्यायिक अधिकारी को दण्डित करने के सम्बन्ध में उठता है तो भारत के न्यायाधीशों का रुख भिन्न पाया जाता है| लगभग 10 वर्ष पूर्व अहमदाबाद के एक मजिस्ट्रेट पर आरोप लगाए गए कि उसने कुछ वकीलों के साथ मिलकर 40000/- रूपये के बदले भारत के राष्ट्रपति,  मुख्य न्यायाधीश, एक अन्य न्यायाधीश व एक वकील के विरुद्ध फर्जी मामले में वारंट जारी किये| मामला सी बी आई को जांच हेतु दिया गया और एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट भी आ गयी थी किन्तु मामले में परीक्षण उच्चतम न्यायालय में आज तक लंबित है|   
 
ऐसे ही एक मामले में कलकता उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने पश्चिम बंगाल की ज्योति बासु सरकार के पक्ष में एक आदेश जारी करके उपकृत किया और बदले में उसी दिन आवेदन कर मुख्य मंत्री के विवेकाधिकार कोटे से साल्ट लेक में सस्ती दर पर एक प्लाट आवंटित करवा लिया| मामले की फ़ाइल को भी न्यायाधीश ने अपने पास रख लिया और कोई भी नागरिक फ़ाइल से कोई नकल तक नहीं ले सका| न्यायाधीश महोदय के सेवानिवृत होने तक 12 वर्ष तक फ़ाइल उनके कब्जे में रही| यदपि यह प्रथम दृष्टया व्यक्तिगत लाभ के लिए पद के स्पष्ट दुरूपयोग का मामला था| इस प्रसंग में कलकता उच्च न्यायाल में भी रिट लगाई गयी किन्तु उसमें याची को कोई राहत नहीं मिली| मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा और उच्चतम न्यायालय ने मात्र प्लाट का आवंटन को रद्द करने का प्रभाव रखने वाला ही आदेश दिया जिससे  मिला अनुचित लाभ सरकार को लौटाना पड़े किन्तु पद के दुरूपयोग के लिए कोई दांडिक कार्यवाही के आदेश नहीं  दिए गये| यद्यपि मामले में स्वयं उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हमें स्मरण रखना चाहिए कि बाहरी तूफ़ान की बजाय अन्दर के कथफोड़ों से अधिक ख़तरा है|

राज्य सभा सदस्य रशीद मसूद को एम बी बी एस सीटों के आवंटन में गड़बड़ी के आरोप में दोषी मानते हुए हाल ही में सजा सुनाई गयी है| लगभग ऐसा ही एक मामला  महाराष्ट्र राज्य में वर्ष 1985 में हुआ था जिसमें एम डी की प्रवेश परीक्षा में उत्तर पुस्तिका से छेड़छाड़ कर महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री के रिश्तेदारों को बम्बई विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाकर उपकृत किया गया था| परिणामत: अन्य पात्र सामान्य डॉक्टर एम डी में प्रवेश से वंचित हो गये थे| कालान्तर में मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा और उच्चतम न्यायालय ने पाया कि इस बात में  काफी सशक्त संदेह है कि श्री पाटिल या उसके चहेतों को प्रसन्न करने के लिए गड़बड़ी की गयी और गड़बड़ी साबित है| गड़बड़ी से लाभ मिलने वालों की रिश्तेदारी भी साबित है| मुख्य मंत्री द्वारा सार्वजनिक जांच समिति के सामने उपस्थिति से इन्कारी भी रिकार्ड पर है| न्यायालय ने आगे कहा कि मुख्यमंत्री की पुत्री जो पहले 3 बार अनुतीर्ण हो चुकी थी को उत्तीर्ण करवाने के लिए प्रयास किया गया| फिर भी उच्चतम न्यायालय ने मामले में आपराधिक कार्यवाही करने का कोई आदेश नहीं दिया|   

उक्त कथानक तो भारतीय न्यायतंत्र का, महासागर में तैरते हिमखंड के दिखाई देने वाले भाग की तरह, एक अंश मात्र है| अमेरिका में न्यायपालिका की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सरकारें निजी संस्थाओं से सर्वेक्षण करवाती हैं और उसके आधार पर सरकारें न्यायिक सुधार की रूपरेखा तैयार करती हैं| यदि यही प्रक्रिया भारत में भी अपनाई जाये तो दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है| जिम्मेदार पत्रकारिता जगत यह कार्य भारत में भी स्वत: कर सकता है क्योंकि उसके पास आवश्यक नेटवर्क भी है| अब उक्त तथ्यों के आधार पर विद्वान पाठक ही अनुमान लगाएं कि देश की न्यायपालिका उनकी आशाओं और अपेक्षाओं पर कितनी खरी उतर रही है व कितनी स्वतंत्र, निष्पक्ष, तटस्थ और दबावमुक्त है| स्वयं प्रज्ञावान नागरिक यह भी मूल्यांकन करें कि न्याय का तराजू कितना संतुलित है और हमारा गणतन्त्र मात्र सीमा पर ही नहीं अंदर से कितना सुरक्षित है |
जय हिन्द ! ....

Mani Ram Sharma

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सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 के प्रावधानों के अंतर्गत केंद्र व राज्यों में  आयोगों की स्थापना की गयी है और केन्द्रीय प्रतिष्ठानों में “अधिकार” की प्रोन्नति का दायित्व केन्द्रीय सूचना आयोग को सौंपा गया है| केन्द्रीय आयोग की स्थापना से अब तक लगभग 170,000 अपीलें व परिवाद याचिकाएं आयोग में दायर हुई हैं और लगभग 140,000 याचिकाएं निस्तारित की जा चुकी हैं| किन्तु विडंबना यह है कि लोक प्राधिकारियों द्वारा 80-90प्रतिशत  मामलों में देय सूचना से अभी भी इन्कार ही किया जाता है और शासन व्यवस्था व लोक प्राधिकारियों के कार्यकरण में अभी भी अपार  अस्वच्छता-भ्रष्टाचार-अपारदर्शिता कायम है| जहां प्रथम वर्ष में आयोग में मात्र 7000 याचिकाएं प्राप्त हुई वहीं आठवें वर्ष में 40000 याचिकाएं प्राप्त हुई हैं व औसत याचिका की सुनवाई में एक वर्ष से अधिक का समय लग रहा है जो आयोग के गठन के उद्देश्य को ही मिथ्या साबित कर रहा है| यह स्थिति एक भयावह चित्र प्रस्तुत करती है| सूचना हेतु मना करने पर नागरिक आयोग में याचिका दायर करते हैं और इस संख्या में सुपरसोनिक जेट की गति से वृद्धि हो रही है| यह वृद्धि  इस कारण नहीं है कि नागरिकों में जागरूकता का संचार हो रहा है अपितु आयोग दोषी जन सूचना अधिकारियों के साथ मित्रवत व्यवहार कर रहा  है और आम लोक प्राधिकारी में यह विश्वास गहरा रहा है कि वे चाहे किसी भी सूचना के लिए मना करें उनका कुछ भी बिगड़नेवाला नहीं| अधिक से अधिक यह हो सकता है कि आयोग द्वारा एक आवेदक को दो वर्ष संघर्ष करने के बाद सूचना देने के आदेश हो जाएँ व उसकी अनुपालना तो फिर भी संदिग्ध है| आयोग द्वारा दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव करने से जनतंत्र के इस औजार की धार लगभग कुंद हो चुकी है व जनता की नजर में आयोग स्वामिभक्त रहे सेवानिवृत अधिकारियों को रोज़गार देकर उपकृत करने का एक संस्थान मात्र रह गया है| कुछ आयुक्तों द्वारा किन्हीं अपवित्र कारणों या सस्ती लोकप्रियता के लिए अतिउत्साहित होकर कुछेक जनानुकूल दिखाई देने वाले निर्णय देने मात्र से 125 करोड़ भारतवासियों का हित नहीं सध सकता| यद्यपि, आपवादिक मामलों को छोड़ते हुए, अधिकाँश मामलों में आयोग ने सूचना प्रदानगी  के  आदेश दिये हैं किन्तु फिर भी दिए गये अधिकाँश निर्णय कानून व न्याय की कसौटी पर खरे नहीं हैं| ऐसे भी मामले हैं जहां समाजसेवा के कुछ थोक व्यापारियों पर आयुक्तों ने उपकार किया हो और उनके मामलों को दर्ज होने से पहले ही निर्णित कर दिया हो| मीडिया की सुर्ख़ियों में रहने को लालायित ऐसे स्वामिभक्त लोग आयोग और आयुक्तों का यशोगान करने वालों की अग्रिम पंक्ति में दुधिया प्रकाश में खड़े नजर आते हैं और आयोग को अयोग्य बना रहे हैं|

केन्द्रीय आयोग ने अपनी स्थापना से लेकर अब तक 1000 से भी कम प्रकरणों में अर्थदंड लगाया गया है और उसका भी लगभग 40प्रतिशत  भाग वसूली होना शेष है| देश की नौकरशाही जिम्मेदारी व पारदर्शिता से कार्य नहीं कर रही थी और इस पवित्र उद्देश्य को ध्यान में रखकर अधिनियम बनाया गया| किन्तु आयोगों में उन्हीं सेवानिवृत नौकरशाहों को नियुक्त कर दिया गया है जो इस अंग्रेजी शासन से चली आ रही गैर-जिम्मेदार, अस्वच्छ, हठधर्मी, राजतान्त्रिक, निरंकुश व अपारदर्शी व्यवस्था का कल तक अंग रहे हैं और इसी के लिए उपयुक्त रहे हैं| तभी तो वे अपना सेवाकाल सहर्ष पूर्ण कर पाए अन्यथा ये लोग यदि अंत:करण, विचारों, कार्यशैली  व मन से इस मलिन व्यवस्था को अंगीकार नहीं करते तो निश्चित रूप से अपना सेवाकाल सहर्ष पूर्ण नहीं कर पाते| इनसे कुछ सुधार की आशा करना दिन में स्वप्न देखने से अधिक कुछ भी नहीं है| अर्थात सरकारों ने बिल्ली को दूध की रखवाली की जिम्मेदारी देने की कहावत चरितारार्थ कर दी है| सेवा निवृति के बाद पुन:नियुक्त ये नौकरशाह अपनी बिरादरी के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं कर सके हैं यह तथ्य आंकड़ों से साबित है| केन्द्रीय आयोग में अब तक लगभग 20 आयुक्त नियुक्त हो चुके हैं जिसमें से आपवादिक तौर पर मात्र एक ही गैर-नौकरशाह रहे हैं| ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि केन्द्रीय आयोग द्वारा अर्थदंड लगाने के कुल 1000 मामलों में से आधे से ज्यादा तो अकेले इस गैर-नौकरशाह आयुक्त के हैं अर्थात शेष 19 आयुक्तों ने मिलकर अपने सम्पूर्ण कार्यकाल में मात्र 300 मामलों में अर्थदंड लगाया है जोकि प्रति आयुक्त 15 मामले आते हैं| उक्त विश्लेष्ण से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि आयोग में एक औसत नौकरशाह आयुक्त ने एक वर्ष में मात्र 3 मामलों में अर्थदंड लगाया है और दोषी अधिकारियों का पर्याप्त पक्षपोषण व बचाव कर जनतंत्र के इस प्रभावी उपकरण को भी नकारा साबित कर दिया है| व्यथित नागरिकों को हर्जाना दिलाने के मामले तो ढूंढने से भी मिलना कठिन है| 
अधिनियम की धारा 19(5) व 20(1) में समय पर सूचना नहीं देने का औचित्य स्थापित करने का भार सूचना अधिकारी पर है और इसमें विफल रहने पर सूचना अधिकारी पर कानून के अनुसार अर्थदंड निरपवाद स्वरूप लगाया जाना चाहिए| अधिनियम में आयुक्तों को कोई विवेकाधिकार नहीं दिया गया है| यहाँ तक कि  सम्पूर्ण अधिनियम में विवेकाधिकार शब्द तक का प्रयोग नहीं किया गया है जिससे विधायिका का मंतव्य स्पष्ट है| समाज में व्यवस्था बनाये रखने के लिए कानून में दंड का प्रावधान रखा जाता है किन्तु प्राय:आयोग के निर्णयों में न ही तो सूचना नहीं देने का औचित्य स्थापित माना जाता है और न ही दोषी पर अर्थदंड लगाया जाता जिससे सूचना अधिकारियों को यह सन्देश जाता है कि आयोग एक दंतविहीन, रस्मी व दोषियों का मैत्रीपूर्ण संस्थान है और आयोग की कार्यवाहियां मैत्रीपूर्ण मैच हैं| दोषी लोगों को दंड नहीं देने से अन्य बचेखुचे अधिकारी भी कानून का उल्लंघन करने को लालायित व प्रेरित होते हैं जिससे सम्पूर्ण वातावरण अपदूषित होता है| इस मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए आयोग को न्यूनतम 10 प्रतिशत मामलों में अर्थदंड लगाना चाहिए था| आयोग ने शक्तिसंपन्न विभागों के विरुद्ध यद्यपि कई मामले निर्णित किये हैं किन्तु आश्चर्य का विषय है कि आज तक उनमें से एक भी मामले में अर्थदंड नहीं लगाया है इससे आयोग की निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगता| आयोग ने गृह मंत्रालय व न्याय विभाग के विरुद्ध कई हजार मामले निर्णित किये हैं जहां आवेदकों को अनुचित रूप से सूचना हेतु मना किया गया किन्तु आयोग ने इन विभागों के अधिकारियों पर किसी मामले में मुश्किल से ही कोई अर्थदंड लगाया हो| न्यायालय, सतर्कता, पुलिस  आदि ऐसे ही अन्य सशक्त विभाग हैं जिन पर स्वयम आयोग ने अर्थदंड लगाने से परहेज़ कर अपनी कर्तव्य विमुखता का परिचय दिया है और अपनी विश्वसनीयता व निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है| एक मामले में तो आयोग ने न्यायालय द्वारा सुनवाई में समय मांगने पर न्यायालय की बजाय स्वयम अपने खजाने से याची को क्षतिपूर्ति दी है| आयोग द्वारा अर्थदंड लगाए जाने के मामलों का विश्लेष्ण करने पर ज्ञात होता है कि मात्र स्थानीय निकाय, शिक्षा विभाग, बिजली, पानी, परिवहन, निर्माण विभाग जैसे निरीह व शक्तिहीन लोक प्राधिकारी ही अर्थदंड चुकाने के लिए विवश किये गए हैं| 

आयोगों को यह चाहिए कि जहां सूचना हेतु याची के पक्ष में आदिष्ट करे उस प्रत्येक निर्णय में या तो धारा 19(5) व 20(1) के अंतर्गत दोषी अधिकारी द्वारा स्थापित औचित्य को अपने निर्णय में साबित समझे अन्यथा दोषी अधिकारी पर अर्थदंड अवश्य लगाए ताकि अधिनियम कारगर साबित हो सके और यह एक कागजी व कोरी औचारिकता नहीं रह जाए|   
राज्य आयोगों की स्थिति भी लगभग समान ही है क्योंकि वहां पर भी किसी न किसी स्वामिभक्त सेवानिवृत नौकरशाह को देव मूर्ति की तरह स्थापित कर उपकृत किया गया है और दोषी अधिकारियों का भरपूर बचाव किया जा रहा है| सरकार का यह कुतर्क हो सकता है कि सेवानिवृत लोगों को नियुक्त करने पर उन्हें आधा ही वेतन (आधा भाग तो वे पेंशन के रूप में पहले से ही प्राप्त कर रहे होते हैं) देना पड़ता है अत: यह सस्ता है किन्तु इस सस्तेपन की जनता को वास्तव में कितनी कीमत चुकानी पडती है इसका आकलन नहीं किया जा रहा है| इससे भी अधिक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि कई बार तो पुलिस विभाग के अधिकारियों को आयुक्त नियुक्त कर दिया जाता है जिनके सम्पूर्ण सेवाकाल में मूल अधिकारों का तो क्या मानव-अधिकारों की रक्षा करने का कोई वातावरण आसपास तक नहीं रहा हो| स्वयम पुलिस अधिकारी जानते हैं कि सेवानिवृति के बाद उनका जनता में कितना सम्मान होता है| इस डर से कई पुलिस अधिकारी तो फेसबुक जैसे  सामाजिक माध्यमों पर अपना खाता तो खोल लेते हैं किन्तु अपना पूर्व सेवाकाल तक प्रकट नहीं करते हैं| देश की जनता को सूचना की स्वतंत्रता के लिए अभी मीलों का सफर व काफी संघर्ष करना बाकी है क्योंकि अधिनियम अभी तक तो एक कोरी औपचारिकता है– जनता को भुलावे व सस्ती लोकप्रियता का एक साधन मात्र है|
केंद्र सरकार व राज्य सरकारों को यह नीति बनानी चाहिए कि किसी भी आयोग या बोर्ड में 20 प्रतिशत से अधिक सेवानिवृत नौकरशाह नियुक्त नहीं किये जाएंगे तभी इस देश की जनता का हित सध सकता है- वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा| प्रजातंत्र में नौकरशाहों की नियुक्ति मात्र परामर्श के लिए ही उचित है किसी भी निर्णय करने के लिए नहीं| सरकार में भी किसी भी स्तर के सचिव को नीतिगत निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है अपितु वे मंत्री के मात्र सलाहकार हैं| इसी सिद्धांत का यहाँ भी अनुसरण किया जाना चाहिए क्योंकि जिन्होंने अपने सम्पूर्ण सेवाकाल में मात्र परामर्श दिया हो और वे निर्णय लेने में अनुभवहीन हों उन्हें निर्णय करने का पद आखिर क्योंकर दिया जाए|     
जय भारत !

Mani Ram Sharma

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आवेदक राजेंद्र सिंह ने दिनांक 08.09.2010 से 10.09.2010 के बीच अपने आवासीय परिसर में आयकर विभाग के अधिकारियों द्वारा की गयी खोज और जब्ती की कार्यवाही के दौरान अपने मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत को लेकर बिहार मानवाधिकार आयोग से निवेदन किया| आवेदक की शिकायत थी कि वह अल्पसंख्यक सिख समुदाय से संबंध रखता है| उसने कहा कि पटना शहर में मीठापुर में आरा मिल व  लकड़ी का व्यापार कर वह अपनी आजीविका अर्जित करता था|  दिनांक  08.09.2010 को  श्री सौरभ कुमार, श्री सुमन झा , श्री कनकजी  और श्री अचुतन नामक आयकर विभाग के अधिकारीगण छह अन्य सहयोगियों के साथ उसके  घर आये और मुख्य गेट बंद कर दिया जोकि प्रवेश और निकास का एक मात्र रास्ता है| उन्होंने आवेदक और उपस्थित दूसरे लोगों के मोबाइल फोन ले लिये और छापे के दौरान उन्हें बाहर के किसी भी व्यक्ति से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी| यहाँ तक कि उन्हें खाना पकाने के लिए भी अनुमति नहीं दी गयी| उन्होंने  महिलाओं सहित परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार किया| उन्होंने निर्भय होकर वहां धूम्रपान किया है, शिकायतकर्ता की  धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है, तथा सिख गुरुओं और स्वर्ण मंदिर की तस्वीरों पर सिगरेट के टुकड़े  और सिगरेट के खाली पैकेट फेंक दिये| उन्हें शौचालय जाने की अनुमति भी नहीं दी गयी| आवेदक ने अपने वकील को बुलवाया किन्तु उसे वह  जगह छोड़ने के लिए विवश किया गया|  उन्होंने छापे के दौरान अन्य दंडात्मक कार्रवाई की धमकियों भी दी|
उक्त के आलोक में आयोग द्वारा मुख्य आयकर आयुक्त बिहार को नोटिस जारी किया गया जो आगे आयकर महानिदेशक (अनुसंधान ) को भेज दिया गया | अंततः विभाग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में आवेदक द्वारा किए गए आरोपों का खंडन किया गया| कई बार स्थगन के बाद अंत में आवेदक अपने वकील के साथ उपस्थित हुए और श्री विजय कुमार, अपर आयकर आयुक्त की उपस्थिति में प्रकरण दिनांक को 18.04.2011 को सुना गया| 
आयोग के समक्ष कार्यवाही में आवेदक ने  शिकायत में वर्णित आरोपों  दोहराया| उसने खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता और औचित्य पर सवाल उठाया|  शिकायतकर्ता ने कहा कि उक्त सम्पूर्ण कार्यवाही मात्र आवेदक को परेशान करने के लिए की गयी है और अधिकारियों के इस  वैमनस्यपूर्ण कार्यवाही से भी संतुष्ट नहीं होने पर यह खोज और जब्ती की कार्यवाही आज तक जारी है| शिकायतकर्ता द्वारा यह जानकारी भी दी गयी कि विभाग ने आवेदक के खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्य सरकार के वन विभाग और पंजीकरण विभाग से  भी संपर्क किया है| श्री विजय कुमार , विभागीय प्रतिनिधि ने आवेदक के आरोपों का खंडन किया|
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार के बाद आयोग ने महिला सदस्यों सहित अपीलार्थी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने व परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार के संबंध में आरोप के तथ्यों के निर्धारण हेतु विचारण उचित समझा|   
सुनवाई के अनुक्रम में आयोग ने यह कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही की वैधता की जांच का मामला आयकर अधिनियम के सुसंगत प्रावधानों के तहत उचित मंच पर उठाया  जा सकता है| आयोग ने माना कि आवेदक के यहाँ 8 से 10 सितंबर 2010 तक जिस ढंग से खोज और जब्ती की कार्रवाई की गयी उसका मूल्यांकन करने में आयोग सक्षम नहीं है| विभाग के प्रतिनिधियों ने कहा कि खोज और जब्ती की कार्यवाही तो इस प्रकरण में लगे समय से भी ज्यादा समय के लिए भी जारी रह सकती है| आयोग मोटे तौर पर इससे सहमत है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही के लिए अवधि के रूप में कोई समय सीमा तय नहीं की  जा सकती  लेकिन आयोग की राय में खोज और जब्ती की कार्यवाही संबंधित व्यक्ति के मानवाधिकारों के अनुरूप होनी  चाहिए|
आयोग ने माना कि यह स्वीकृत तथ्य है कि खोज और जब्ती की कार्यवाही दिनांक 08.09.2010 को प्रात: 9:30 बजे  शुरू और दिनांक 10.09.2010 को  रात्रि 9.20 बजे  पर संपन्न हुई  है| आवेदक की शिकायत थी कि इस अवधि के दौरान उससे लगातार 30 घंटे के लिए पूछताछ की गयी| आयकर विभाग द्वारा  धारा 132 के तहत शपथ पर दर्ज आवेदक के बयान के प्रश्न संख्या 15 में अधिकारी  श्री सौरभ कुमार  ने दर्ज किया है कि उससे  खाताबहियाँ  आदि पेश  करने के लिए कहा जा रहा था लेकिन 36 से अधिक घंटे बीतने के बावजूद आवेदक ने एक भी प्रस्तुत नहीं की है| इससे कार्यवाही में लगे समय का अनुमान लगाया जा सकता है| 

विभागीय प्रतिनिधि द्वारा यह बताया गया कि दिनांक 9.9.10 को रात्रि 10 बजे तक मात्र 15 प्रश्न पूछे गए थे जिससे यह स्पष्ट है कि पूछताछ में लिया गया समय किसी भी प्रकार से उचित नहीं था| आयोग का विचार है कि छापामार दल के सदस्यों को खोज और जब्ती कार्यवाही संपन्न करने में समय लग सकता है लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों में व्यक्ति के  बुनियादी मानव अधिकार को ध्यान में रखा जाना चाहिए| उन्हें कार्यवाही करने के लिए शारीरिक और मानसिक यातना देने का कोई अधिकार नहीं है| प्रभारी अधिकारी यदि पूछताछ/बयान की रिकॉर्डिंग की प्रक्रिया जारी रखना चाहता  है तो वह दिन के उचित समय पर ही बंद कर दी जानी चाहिए  और अगली सुबह फिर से शुरू की जानी चाहिए था| लेकिन हस्तगत प्रकरण में किसी भी विश्राम या अंतराल के बिना प्रात: 03:30 बजे तक प्रक्रिया जारी रही है जबकि यह शयन का समय है और आवेदक तथा / या उनके परिवार के सदस्यों को ऐसे अनुचित समय तक जागते रहने के लिए के लिए मजबूर करना एक सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता| यह व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है और इसलिए मानव अधिकारों का उल्लंघन था| यहां तक कि दुर्दांत अपराधियों को भी मानवाधिकारों से वंचित  नहीं किया जा सकता| आवेदक की स्थिति तो इससे बदतर नहीं थी| आयोग की राय में आयकर विभाग को भविष्य में बड़े पैमाने पर खोज और जब्ती कार्यवाही में सुनिश्चित करना चाहिए कि  बुनियादी मानव अधिकारों का उल्लंघन न हो| आयोग ने आगे कहा कि वह प्रथम दृष्टया संतुष्ट है कि खोज और जब्ती कार्यवाही  जारी रखते  हुए आयकर विभाग के संबंधित अधिकारियों द्वारा आवेदक के मानव अधिकारों का उल्लंघन किया गया है जिसके लिए वह आर्थिक  मुआवजा पाने का अधिकारी  है|

लेखक का मत है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी परिस्थितियों के विपरीत व्यवहार भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| यथा कश्मीर जैसे शीत प्रदेश के निवासी को भीषण गर्मी वाले मरुस्थल में या इसके विपरीत रखना या रहने के विवश करना मानवाधिकारों का हनन है| ठीक इसी प्रकार अशक्त या अस्वस्थ व्यक्ति को उसकी परिस्थति के अनुसार भोजन न उपलब्ध करवाना भी मानवाधिकारों का उल्लंघन है| पंजाब राज्य मानावाधिकार आयोग ने तो सेवा, न्याय आदि से सम्बंधित मामलों को भी मानवाधिकार हनन  माना है| भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार, “ किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं|”

हाल ही में सांसद धनञ्जय सिंह को एक अभियोग में पुलिस हिरासत में लिया गया था और हिरासत अवधि के दौरान उन्होंने अपने घर पर बने भोजन के लिए पुलिस से अपेक्षा की किन्तु पुलिस ने कहा कि न्यायालय की अनुमति के बाद ही ऐसा किया जा सकता है| जबकि कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि एक परीक्षण के अधीन हिरासत में व्यक्ति को घर के भोजन से वंचित किया जाएगा अथवा इसके लिए कोई अनुमति की आवश्यकता है| लेखक स्वयम ने यह प्रकरण राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया और आयोग ने इस प्रकरण में गृह मंत्रालय को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये हैं| ठीक इसी प्रकार तरुण तेजपाल के मामले में भी हाल ही में तहलका की  एक संपादिका को गोवा पुलिस ने गवाही हेतु पूछताछ के लिए उसके निवास से भिन्न स्थान पर बुलाया और रात्रि 2 बजे तक उससे पूछताछ की गयी| जबकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अनुसार एक महिला और 15 वर्ष तक के बालक गवाह से मात्र उसके निवास पर ही पूछताछ की जा सकती है| लेखक द्वारा यह मामला भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाये जाने पर गोवा पुलिस को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश जारी किये गए हैं| अत: जागरूक पाठकों से आग्रह है कि जहां भी वे मानवाधिकार उल्लंघन का कोई मामला देखें उसकी रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को आवश्यक कार्यवाही हेतु भेजें ताकि मानव गरिमा का रक्षा हो सके|   

Mani Ram Sharma

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जनता को न्याय देना राजा का राजधर्म होता है इसलिए  न्याय बिलकुल  मुफ्त होना चाहिए| अमेरिका जैसे देशों में आज न्याय शुल्क नहीं है जबकि भारत में आज भी कई राज्यों में न्याय मद पर  खर्चे की बजाय आय अधिक हो रही है और न्यायालय एक लाभप्रद उपक्रम की तरह कार्य कर रहे हैं |  फिर भी   निर्धन का तो जिक्र ही क्या करना आज आम व्यक्ति न्याय से वंचित है| एक कहावत प्रचलित है कि भारत में न्याय केवल वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है जिसके लोहे के  ( न थकने वाले ) पैर हों व सोने के ( न खत्म होने वाला धन) के हाथ हों| देश में 70 प्रतिशत जनता प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर आश्रित है जिसका सकल घरेलू उत्पाद में 15 प्रतिश्त से भी कम योगदान है | स्पष्ट है कि देश में आय के वितरण में भारी असमानताएं हैं और स्वतंत्रता के 66 वर्ष बाद भी जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग गरीबी का जीवन यापन कर रहा है| जनसंख्या के इस निर्धन वर्ग के लिए अपना गरिमा मय जीवन यापन करना ही कठिन है ऐसी स्थिति में यह वर्ग मुकदमेबाजी का खर्च उठाने के लिए पूरी तरह असमर्थ ही है|  भारत की जटिल, खर्चीली, थकाने वाली व ऊबाऊ न्याय प्रक्रिया के बारे में  एक अन्य कहावत यह भी प्रचलित है कि आप अपने जीवन काल में मुकदमा दायर कर उसकी वसीयत तो कर सकते हैं किन्तु अपने जीवन काल में न्याय प्राप्त नहीं कर सकते|  मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने भी देश की न्याय-प्रणाली की अविश्वसनीयता के बारे में कहा  है कि जिन लोगों के विवाद हैं उनमें से मात्र 10 प्रतिशत ही न्यायालयों तक पहुँचते हैं|
दिनांक 3 जनवरी 1977 से संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 39 क जोड़कर प्रावधान किया गया है कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और , वह विशिष्टतया, यह सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति से नि:शुल्क    विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा| भारत सरकार ने, निर्धन व्यक्ति न्याय से वंचित न हो इस लक्ष्य को लेकर, विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम बनाया है जिसकी धारा 6  में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण व धारा 8 ए  में उच्च न्यायालय विधिक सेवा कमिटी के गठन का प्रावधान है| इन कमेटियों के जरिये सरकार वंचित श्रेणी के लोगों को  विधिक सहायता उपलब्ध करवाने का दावा करती है और झूठी  वाहीवाही लूटती  आ रही है|

दूसरी ओर  बहुत से उच्च न्यायालयों के स्तर पर तो स्वतंत्र रूप से अलग से कमेटियों का गठन ही नहीं हुआ है| यहाँ तक की दिल्ली राज्य में अलग से उच्च न्यायालय विधिक सेवा कमिटी कार्यरत नहीं है तथा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ही यह कार्य देख रहा है|  इससे भी अधिक दुखदायी तथ्य यह है कि उच्च न्यायालय में एक मामले की पैरवी के लिए कमिटी द्वारा मात्र 500 रूपये की सहायता दी जा रही है जबकि स्वयम सरकार अपने एक एक मामले के लिए वकील के उपस्थित न होने पर भी जनता के लाखों रूपये पानी की तरह बहा रही है| वास्तविकता की ओर दृष्टि  डालें तो   500 रूपये में तो डाक, टाइपिंग , फोटोस्टेट के खर्चों की भी प्रतिपूर्ति तक होना मुश्किल है अत: इतनी  छोटी राशि से  किसी योग्य वकील की सेवाएं किस प्रकार उपलब्ध हो सकती हैं, अपने आप में यह एक यक्ष प्रश्न है |

सरकार के कार्यकरण में पारदर्शिता और शुचिता को बढ़ावा देने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया है और इन कमेटियों से भी अपेक्षा ही कि वे अपना सम्पूर्ण हिसाब-किताब वेबसाइट पर सार्वजनिक दृष्टिगोचरता में रखें  किन्तु शायद ही किसी कमेटी ने इस अपेक्षा की पूर्ति की है और निहित हितों के लिए उनके कार्य गुप्त रूप से  संचालित हैं – जनता का धन खर्च होने के बावजूद जनता को इस धन के उपयोग से अनभिज्ञ  रखा जा रहा है| अपारदर्शिता भ्रष्टाचार व अनाचार की जननी है| एक  उच्च न्यायालय की विधिक सेवा कमिटी को चालू वर्ष में कुल 52,93,360  रूपये का बजट आवंटन हुआ है जिसमें व्यावसायिक एवं विशेष सेवाओं के लिए मात्र 50,000 रूपये का प्रावधान है जोकि आवंटित बजट के 1 प्रतिशत  से भी कम है| शेष भाग वेतन व कार्यालय खर्चों के लिये आवंटित है | अन्य विधिक कमेटियों की स्थिति भी इससे ज्यादा भिन्न नहीं है|  यह भी ध्यान देने योग्य है कि निर्धन लोगों को इतनी छोटी सी राशि बांटने के लिए वकीलों के अतिरिक्त  12 कार्मिकों का दल लगा हुआ है जिस पर बजट का 99 प्रतिशत  खर्चा हो रहा है| इस प्रकार कमिटी निर्धनों की बजाय कार्मिकों की ज्यादा आर्थिक सहायता कर रही है | एक सामन्य बुद्धिवाले व्यक्ति को भी आश्चर्य होना स्वाभाविक है कि निर्धन को एक रूपये बांटने के लिए  निन्यानवे रूपये खर्चा किया जा रहा है और इसे निर्धन को कानूनी सहायता का जामा पहनाया जा रहा है| अन्य राज्यों में भी आवंटित राशि का मात्र 5 प्रतिशत  तक ही निर्धन लोगों को प्रत्यक्ष सहायता के रूप में उपलब्ध करवाया जा रहा है|

मेरे विचार से मिथ्या प्रचार व सस्ती लोकप्रियता के लिए यह न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी है बल्कि निर्धन लोगों को कानूनी सहायता की बजाय उनके साथ एक क्रूर मजाक किया जा रहा है|  अत: यह नीति बनायी जानी चाहिए  कि प्रत्येक विधिक कमिटी के बजट का न्यूनतम 75 प्रतिशत  भाग निर्धनों को सहायता उपलब्ध करवाने के लिए उपयोग हो और इसके लिए इतना ज्यादा स्टाफ रखने के भी कोई आवश्यकता नहीं है| आरंभिक चरण में इसे 25 प्रतिशत  से प्रारम्भ कर 3 वर्षों में इस लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं|  स्टाफ खर्चे  के भारी  बोझ से छुटकारा पाने के लिये आवेदन एवं स्वीकृति / पुनर्भरण  कार्य को ऑनलाइन कर दिया जाए व वकीलों को उनके खाते में सीधे ही जमा करने की परिपाटी का अनुसरण किया जाए जिससे पक्षपात व भ्रष्टाचार पर नियंत्रण में भी सहायता मिलेगी|  इस कार्य के संचालन के लिए अध्यक्ष व सचिव को मानदेय दिया जा सकता है और शेष कार्य न्यायालय के ही किसी स्टाफ से अंशकालिक तौर पर लिया जा सकता है तथा बदले में उसे भी उचित मानदेय दिया जा सकता है|

Mani Ram Sharma

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परिवार के न कमानेवाले सदस्यों के भरण  पोषण का नैतिक दायित्व परिवार के कमाने वाले सदस्यों पर माना जाता रहा  है| किन्तु इसे कानूनी रूप देने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता में धारा 125 जोड़कर इसे बाध्यकारी रूप दिया गया है| इस प्रावधान  के अनुसार व्यक्ति की सन्तान, पत्नी व माता पिता जो अपना भरण पोषण करने में असमर्थ हैं वे भरण-पोषण प्राप्त करने के अधिकारी हैं|   
शोभा सैनु विरकर ने तलाक याचिका के साथ परिवार न्यायालय स. 3 मुंबई में गुजारा भत्ते के लिए याचिका दायर की और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद न्यायाधीश ने दिनांक 7.7.12 को अंतरिम तौर पर शोभा के पति पुलिस कर्मचारी सैनु बाबा विरकर को  8000 रूपये प्रति माह गुजारा भाता अपनी पत्नी व 8000 रूपये बच्चों को देने का आदेश दिया| इसके साथ ही आदेश दिया गया कि वे जिस मकान में वर्तमान में रह रहे हैं उसमें उसकी पत्नी व बच्चे रहते रहेंगे| इस आदेश से असंतुष्ट होकर सैनु बाबा ने  बम्बई उच्च न्यायालय में अपील दाखिल की| अपील में प्रार्थी शोभा के पति  पुलिसमैन का कहना था कि वह एक पुलिसमैन है और मात्र 15,822 रूपये कमाता है इसलिए इतना अधिक गुजारा भत्ता वह वहन नहीं कर सकता |
उसकी वेतन पर्ची से ज्ञात हुआ है कि उसका सकल मासिक वेतन 26,278 रूपये है जिसमें से सामान्यतया होने वाली कटौतियों के अतिरिक्त 5,883 रूपये सोसाइटी को चुकाने पड़ते हैं| इसके अतिरक्त उसे आवासीय फ्लैट के लिए  भी मासिक क़िस्त चुकानी पडती है यद्यपि उसने फ्लैट  का कोई करारनामा प्रस्तुत नहीं किया |
प्रत्यर्थी शोभा ने कहा  कि फ्लैट तो वर्ष 2004 में लिया गया था जबकि तलाक हेतु आवेदन मई 2011 में व गुजारा भत्ता हेतु आवेदन नवम्बर  2011 में प्रस्तुत किया गया था और ऋण के लिए आवेदन अप्रैल 2011 में में किया गया |  प्रार्थी पुलिस कर्मी ने यह भी कहा कि सोसाइटी की किस्तों के अतिरिक्त उसे 3128 रूपये बैंक को भी क़िस्त देनी है| प्रार्थी ने यद्यपि  2,992 रूपये सोसाइटी को रखरखाव पेटे देने की रसीद पेश की किन्तु उसने 5,883 रूपये वेतन में से कटौती की मांग की |
स्वयम याची प्रार्थी ने अप्रैल 2010 का 1220 रूपये बिजली बिल प्रस्तुत किया जिससे स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति 15,000 रूपये कमाता है वह प्रतिमाह 1200 रूपये की बिजली का उपभोग कर रहा है और बड़े ठाठबाठ  से रह रहा है तथा अपनी आय को तोडमरोड़कर प्रस्तुत कर रहा है | सुनावाई  के दौरान पत्नी शोभा ने बताया कि याची पुलिस वाला होने के नाते रिश्वत लेता है और उसने प्रतिवर्ष ली जाने वाली रिश्वत की राशि भी गणना कर बतायी| याची अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से वास्तव में अधिक आरामदायक जीवन व्यतीत कर रहा था|

संभव है भ्रष्टाचार सम्बंधित कानून के अंतर्गत चाहे याची के विरुद्ध कोई कार्यवाही हो या न हो किन्तु उसकी पत्नी के तर्क व पुलिस अधिकारियों के कार्य की प्रकृति जोकि भ्रष्ट दिखाई देते हैं इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती | पत्नी का यह भी तर्क रहा कि पुलिस अधिकारी के तौर पर आय के अतिरिक्त उसके पास 5 एकड़ कृषि भूमि भी है| राजस्व रिकार्ड से ज्ञात होता है कि इसमें प्याज, कपास, ज्वार और गेहूं उपजता है और भूमि कोई बेकार नहीं बल्कि उपजाऊ है| अत: भूमि भी अच्छी आय का स्रोत है|

इस प्रकार बम्बई उच्च न्यायालय की न्यायाधीश रोशन दलवी ने अपने आदेश दिनांक 30 नवम्बर 2012 से अधीनस्थ न्यायालय का आदेश पुष्ट कर दिया और कहा  कि अधीनस्थ न्यायालय का आदेश उचित है और विद्वान् अधीनस्थ न्यायाधीश ने तथ्यों का सही मूल्यांकन किया है अत: आदेश में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है |  रिट याचिका खारिज कर दी गयी|

Mani Ram Sharma

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स्वतंत्र भारत के इतिहास में सूचना का अधिकार अधिनियम को मील का पत्थर माना जा रहा है | निश्चित तौर पर इस कानून को बनाने में जनहित का काफी ध्यान रखा गया है किन्तु फिर भी इसमें, अन्य भारतीय कानूनों की ही तरह,  नौकरशाही के मनमानेपन पर अंकुश लगाने का इस कानून में भी कोई प्रावधान नहीं है | मेरे विचार से भारतीय शासन को आज भी वास्तव में ब्रिटिश राज की भांति नौकरशाह ही संचालित करते हैं और कोई कानून बनाने से पहले उनसे सलाह मशविरा  किया जाता है कि इससे उनको तो कोई तकलीफ नहीं है मानो कि जनप्रतिनिधियों को जनता की बजाय नौकरशाहों की तकलीफें सुनने के लिए चुना गया हो| सूचना कानून की उद्देशिका में जो उद्देश्य बताये गए हैं उनको पूरा करने का किसी का कोई दायित्व नहीं बताया गया है और न ही इन शब्दों की आगे अधिनियम में कोई पुनरावृति की गयी है|
यद्यपि सूचना कानून में 30 में सूचना प्रदानगी की कल्पना की गयी व सूचना प्राप्त नहीं होने पर अपीलें दायर करने का प्रावधान है | कानून के अनुसार प्रथम अपील अधिकरी अधिकतम 45 दिन में अपील पर निर्णय देगा|  किन्तु प्रथम अपील अधिकारी द्वारा अपने कर्तव्यों की निष्ठापूर्वक अनुपालना न करने पर कोई दंड का प्रावधान अधिनियम से गायब है| ठीक इसी प्रकार आयोगों द्वारा निर्णय देने की कोई समय सीमा कानून में नहीं है अत: सूचना देने हेतु निर्धारित 30 दिन की प्रारम्भिक समय सीमा अर्थहीन व शून्य है और अपरिपक्व लोगों को मात्र एक भ्रमजाल में फंसाने का उपकरण है| सूचना आयोग  ट्रिब्यूनल है और ट्रिब्यूनल का गठन जनता को शीघ्र और सस्ता न्याय देने के लिए किया जाता है जहां जटिल कानूनी प्रक्रियाओं का अनुसरण नहीं होता है | किन्तु “सूचना आयोग”  आज आयोग कम और “अयोग्य” ज्यादा दिखाई देते हैं |   

मद्रास उच्च न्यायालय का एक औसत न्यायाधीश, जहां जटिल विधिक व तथ्य सम्बंधित प्रश्न भी अन्तर्वलित होते हैं,  प्रतिदिन 25 मामले निर्णित करते हैं जबकि केन्द्रीय सूचना आयोग में एक बेंच प्रतिदिन मात्र 10 निर्णय कर रही है और जम्मू –कश्मीर सूचना आयोग ने तो इसकी पराकाष्ठा  ही पार कर दी है जहां एक बेंच एक दिन में मात्र 3 निर्णय ही पारित करती है| परिणाम यह है कि केन्द्रीय सूचना आयोग में आज 4 वर्ष पुराने बहुत से मामले भी निर्णय की प्रतीक्षा में हैं| सूचना का कानून भारत में कितना सफल है  इसका इस तथ्य से सहज अनुमान लगाया जा सकता है|  अब जनता को किसी भुलावे में नहीं रहना चाहिए|

सूचना आयुक्तों द्वारा अधिनियम के उद्देश्यों के विपरीत आचरण करने से आम नागरिक व्यथित हैं| ऐसा ही एक प्रकरण कलकता उच्च न्यायालय के समक्ष आया जिसमें अखिल कुमार रॉय ने दिनांक 25 मई 2009 को प.बंगाल सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील प्रस्तुत की किन्तु उस पर समय पर निर्णय नहीं हुआ क्योंकि आयोग के पास बकाया मामलों का अम्बार लगा हुआ था और प.बंगाल राज्य सूचना का अधिकार नियमों के अंतर्गत अपील पर निर्णय के विषय में कोई समय सीमा निर्धारित नहीं थी|  कानून में यद्यपि प्रथम अपील के लिए निर्णय हेतु 30 दिन की समय सीमा निर्धारित है व आपवादिक परिस्थितियों में वह सकारण 45 दिन के भीतर निर्णय दे सकता है |
उच्च न्यायालय का विचार रहा कि द्वितीय अपील का निस्तारण  इस लिए नहीं किया गया है क्योंकि कानून में द्वितीय अपील के निस्तारण के लिए कोई समय सीमा नियत नहीं है| फिर भी द्वितीय अपील अधिकारी – सूचना आयोग का कर्तव्य है कि वह द्वितीय अपील पर निर्णय एक तर्कसंगत समय सीमा में करे| प्रथम अपील में असंतोषजनक निर्णय से द्वितीय अपील की जाती है व धारा 7 के अंतर्गत दिए निर्णय से व्यथित होने पर प्रथम अपील की जाती है| ऐसा प्रतीत होता है कि अधिनियम द्वारा प्रदत्त चिंगारी रुपी शक्ति की गति द्वितीय अपील में कुंद व लुप्त हो गई है| अधिनियम के तैयार  किये गए दिसम्बर 2004 के प्रारम्भिक प्रारूप में द्वितीय अपील के विनिश्चय की समय सीमा 30 दिन रखने का प्रावधान था किन्तु बाद में इसका त्याग कर दिया गया|  इस कारण द्वितीय अपील की योजना ने धारा 6 के अंतर्गत आवेदन को दरदर भटकने, हिचकोले खाने के लिए और इस प्रकरण की भांति न्यायालयों की  अवांछनीय कार्यवाही की ओर धकेल दिया है|   न्यायाधीश का मत रहा कि मेरे विचार से प्रथम अपील के निर्णय हेतु व सूचनार्थ आवेदन के निपटान हेतु  निश्चित अधिकतम समय सीमा को ध्यान रखते हुए अपील दायर करने के 45 दिन के भीतर द्वितीय अपील पर निर्णय हो जाना चाहिए| अधिनियम की भावना को ध्यान में रखते हुए यह समय सीमा मेरे विचार से तर्कसंगत है | तदनुसार न्यायाधीश ने द्वितीय अपील का निपटान 45 दिन में देने के निर्देश दिए और रिट याचिका अखिल कुमार रॉय बनाम प. बंगाल सूचना आयोग का दिनांक 7 जुलाई 2010  को निपटान दिया गया |

 

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