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Author Topic: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख  (Read 1042 times)

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एम.एस. मेहता /M S Mehta

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Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख
« on: February 24, 2013, 10:45:42 PM »
Dosto,

We will be posting here articles by Shri Mani Ram Sharma. Brief Introduction of Mr Mani Ram Sharma Ji is given below:-

नाम: मनीराम शर्मा

पता: नकुल निवास, रोडवेज डिपो के पीछे

सरदारशहर -331403

जिला: चुरू (राजस्थान)

संपर्क: 919460605417 , 919001025852

शैक्षणिक योग्यता : बी कोम , सी ए आई आई बी , एल एल बी

एडवोकेट

वर्तमान में, 22 वर्ष से अधिक स्टेट बैंक समूह में अधिकारी संवर्ग में सेवा करने के पश्चात

स्वेच्छिक सेवा निवृति प्राप्त, एवं समाज सेवा में विशेषतः वास्तविक लोकतंत्र की चिंगारी

सुलगाने में व्यस्त

ई-मेल :maniramsharma@gmail.com

मेरा ब्लॉग: जनतांत्रिक अधिकार

Name: Mani Ram Sharma
Address: Nakul Niwas , Behind Roadways Depot
Sardarshahar -331403
Distt. Churu (Raj)
M- 919460605417,919001025852
Qualifications: B. Com., CAIIB, LL B
Advocate
Presently Busy Bee in Serving Societal Interests especially to flame the saga
of conceptual democracy, after taking voluntary retirement on completion of 22
years services in Officer Grade in State Bank Group
E-mail: maniramsharma@gmail.com
My Blog: justicemiracle-mrp.blogspot.in
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M S Mehta
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Re: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख
« Reply #1 on: February 24, 2013, 10:46:54 PM »
भारत में जन विरोधी बजट व आर्थिक नीतियाँ

By - Mani Ram Sharma

देश की आजादी के समय हमारे पूर्वजों के मन में बड़ी उमंगें थी और उन्होंने अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुन्दर सपने संजोये थे| आज़ादी से लोगों को आशाएं बंधी थी कि वे अपनी चुनी गयी सरकारों के माध्यम से खुशहाली और विकास का उपभोग करेंगे | देश में कुछ विकास तो अवश्य हुआ है लेकिन किसका, कितना और इसमें किसकी भागीदारी है यह आज भी गंभीर प्रश्न है जहां एक मामूली वेतन पाने वाला पुलिस का सहायक उप निरीक्षक निस्संकोच होकर धड़ल्ले से अरबपति बन जाता है उच्च लोक पदों पर बैठे लोगों की तो बात क्या करनी है| वहीं आम नागरिक दरिद्रता के कुचक्र में जी रहा है- उसे दो जून की रोटी भी उपलब्ध नहीं हो रही है| शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसे झूझना पड़ता है| स्वयं योजना आयोग ने लगभग 40 वर्ष पहले भी माना था कि आज़ादी के बाद अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ी है जबकि हमारा पवित्र संविधान सामाजिक और आर्थिक न्याय का पाठ पढाता है| आज तो यह खाई इतनी बढ़ चुकी है कि शायद आने वाली कई पीढ़ियों के लिए भी इसे पाटना मुश्किल हो जाएगा|
एक नागरिक पर उसके सम्पूर्ण परिवार के भरण पोषण का नैतिक और कानूनी दायित्व होता है| इस तथ्य को स्वीकार करते हुए अमेरिका में आयकर कानून बनाया गया है और वहां नागरिकों का कर दायित्व उनकी पारिवारिक व आश्रितता की स्थिति पर निर्भर करता है| यदि करदाता अविवाहित या अलग रहता हो तो भी यदि उस पर आश्रित हों तो उसे आयकर में काफी छूटें उपलब्ध हैं| उदाहरण के लिए एक अविवाहित पर यदि कोई आश्रित नहीं हों तो उसकी मात्र 9750डॉलर तक की वार्षिक आय करमुक्त है वहीँ यदि उस पर आश्रितों की संख्या 6 हो तो उसे 32550 डॉलर तक की आय पर कर देने से छूट है| ठीक इसी प्रकार यदि एक व्यक्ति घर का मुखिया हो व उस पर आश्रितों की संख्या 6 हो तो उसे 35300 डॉलर तक की आय पर कोई कर नहीं देना पडेगा|इसी प्रकार आश्रितों की विभिन्न संख्या और परिवार की संयुक्त या एकल स्थति के अनुसार अमेरिकी कानून में छूटें उपलब्ध हैं| इस प्रकार अमेरिका पूंजीवादी देश होते हुए भी समाज और सामाजिक-आर्थिक न्याय को स्थान देता है| 
भारत में अंग्रेजी शासनकाल में 1922 में राजस्व हित के लिए 64 धाराओं वाला संक्षिप्त आयकर कानून का निर्माण किया गया था और तत्पश्चात स्वतंत्रता के बाद 1961 में नया कानून बनया गया| इस कानून को बनाने में यद्यपि संवैधानिक ढांचे को ध्यान में रखा जाना चाहिए था किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं किया गया है| कानून को समाज का अनुसरण करना चाहिए और इनके निर्माण में जन चर्चाओं के माध्यम से जनभागीदारी होनी चाहिए क्योंकि कानून समाज हित के लिए ही बनाए जाते हैं| भारत के संविधान में यद्यपि समाजवाद, सामजिक न्याय और आर्थिक न्याय का उल्लेख अवश्य किया गया है किन्तु इन तत्वों का हमारी योजनाओं,नीतियों और कानूनों में अभाव है| भारत में सभी नागरिकों को एक सामान रूप से कर देना पड़ता है चाहे उन पर आश्रितों की संख्या कुछ भी क्यों न हो| संयुक्त परिवार प्रथा भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है| हमारे यहाँ परिवार के कमाने वाले सदस्य पर शेष सदस्यों के भरण-पोषण का नैतिक और कानूनी दायित्व है क्योंकि भारत में पाश्चात्य देशों के समान सामजिक सुरक्षा या बीमा की कोई योजनाएं लागू नहीं हैं| जबकि पश्चात्य संस्कृति में परिवार नाम की कोई इकाई नहीं होती और विवाह वहां एक संस्कार के स्थान पर अनुबंध मात्र है| पाश्चात्य देशों में एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में औसतन 5-6 विवाह करता है| परिस्थितिवश जब परिवार में एक मात्र कमाने वाला सदस्य हो और उस पर आश्रितों की संख्या अधिक हो तो भारत में उसके लिए आयकर चुकाने की क्षमता तो दूर रही अपना गरिमामयी जीवन यापन भी कठिन हो जाता है | वैसे भी भारत में आश्रितता की औसत संख्या5 के लगभग आती है| इन सबके अतिरिक्त समय समय पर विवाह जन्मोत्सव आदि सामाजिक समारोहों पर होने वाले व्यय का भार अलग रह जता है| इस प्रकार हमारा आयकर कानून हमारे सामाजिक ताने बाने पर आधारित नहीं और न ही यह अमेरिका जैसे पूंजीवादी समर्थक देशों की प्रणाली पर आधरित है| बल्कि हमारे बजट, कानून और नीतियाँ तो, जैसा कि एक बार पूर्व प्रधान मंत्री श्री चंद्रशेखर ने कहा था, आयातित हैं जिनका देश की परिस्थितियों से कोई लेनादेना या तालमेल नहीं है| उक्त विवेचन से यह बड़ा स्पष्ट है कि देश में न तो अमेरिका की तरह पूंजीवाद है और न ही समाजवाद है बल्कि अवसरवाद है तथा हम आर्थिक न्याय, समाजवाद और सामजिक न्याय का मात्र ढिंढोरा पीट रहे हैं, उसका हार्दिक अनुसरण नहीं कर रहे हैं| 
 
देश में सत्तासीन लोग नीतिगत निर्णय लेते समय राजनैतिक लाभ हानि व सस्ती लोकप्रियता पर अधिक और जनहित पर कम ध्यान देते हैं| हमारे पास दूरगामी चिंतन, दीर्घकालीन तथा टिकाऊ लाभ देने वाली नीतियों  का सदैव अभाव रहा है| सामाजिक हितों के सरोकार से देश में 14 बैंकों का 1969 में राष्ट्रीयकरण किया गया और 1980 में फिर 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया किन्तु कुछ समय बाद ही इन्हीं बैंकों के निजीकरण पर मंथन होने लगा| यह हमारी अपरिपक्व और विदेशी इशारों पर संचालित नीतियों की परिणति है| देश में बैंकों और वितीय कंपनियों, जिनमें जनता का धन जमा होता है,  पर निगरानी रखने और उनके लिए नीतियाँ निर्धारित करने का कार्य रिजर्व बैंक को सौंपा गया है| किन्तु ध्यान देने योग्य तथ्य है कि देश में नई-नई निजी वितीय कम्पनियां और बैंकें मैदान में बारी बारी से  आती गयी हैं और इनमें जनता का पैसा फंसता रहा है| इन कमजोर और डूबंत बैंकों का अन्य बैंकों में विलय कर दिया गया या अन्य तरीके से उनका अस्तित्व मिटा दिया गाया| रिजर्व बैंक अपने कानूनी दायित्वों के निर्वहन में, और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करने में विफल रहा है| देश को राष्ट्रीय सहारा जैसी कंपनियों द्वारा दिए गए जख्म भी अभी हरे हैं| आज देश में राष्ट्रीय स्तर का ऐसा कोई भी निजी क्षेत्र का बैंक या वितीय कंपनी नहीं है जिसका 20 वर्ष से पुराना उज्जवल इतिहास हो| कुल मिलाकर वितीय और बैंकिंग क्षेत्र में हमारी नीतियाँ जनानुकूल नहीं रही हैं| जो निजी क्षेत्र के बैंक आज देश में कार्यरत हैं उनकी भी वास्तविक वितीय स्थिति मजबूत  नहीं है चाहे उन्होंने चार्टर्ड अकाऊटेन्ट की मदद से कागजों में कुछ भी सब्ज बाग़  दिखा रखे हों| 

देश के संविधान में यद्यपि समाजवाद का समावेश अवश्य है किन्तु देश के सर्वोच्च वितीय संस्थान रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में ऐसे सदस्यों के चयन में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है जिनकी समाजवादी चिंतन की पृष्ठभूमि अथवा कार्यों से कभी भी वास्ता रहा है| सर्व प्रथम तो बोर्ड के अधिकाँश सदस्य निजी उद्योगपति – पूंजीपति हैं| जिन सदस्यों को उद्योगपतियों के लिए निर्धारित कोटे के अतिरिक्त -  समाज सेवा , पत्रकारिता आदि क्षेत्रों से चुना जाता है वे भी समाज सेवा, पत्रकारिता आदि का मात्र चोगा पहने हुए होते हैं व वास्तव में वे किसी न किसी  औद्योगिक घराने से जुड़े हुए हैं| एक उद्योगपति का स्पष्ट झुकाव स्वाभाविक रूप से व्यापार के हित में नीति निर्माण में होगा| इससे भी अधिक दुखदायी तथ्य यह है कि  केन्द्रीय बोर्ड के 80% से अधिक सदस्य विदेशों से शिक्षा प्राप्त हैं फलत: उन्हें जमीनी स्तर की भारतीय परिस्थितियों का कोई व्यवहारिक ज्ञान नहीं है अपितु उन्होंने तो “इंडिया” को मात्र पुस्तकों  में पढ़ा है| ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक बोर्ड द्वारा नीति निर्माण में संविधान सम्मत और जनोन्मुख नीतियों की अपेक्षा करना ही निरर्थक है| रिजर्व बैंक, स्वतन्त्रता पूर्व 1934 के अधिनियम से स्थापित एक बैंक है अत:उसकी स्थापना में संवैधानिक समाजवाद के स्थान पर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की बू आना स्वाभाविक  है| देश के 65% गरीब, वंचित और अशिक्षित वर्ग का रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड में वास्तव में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है| दूसरी ओर भारत से 14 वर्ष बाद 1961 में स्वतंत्र हुए दक्षिण अफ्रिका के रिजर्व बैंक के निदेशकों में से एक कृषि व एक श्रम क्षेत्र से होता है| 
संयुक्त राज्य अमेरिका में आयकर ढांचा
 
           No. of Dependents→
 Status
                   EXEMPTED INCOME  IN $    0 1 2  3 4 5  6 Single  9750 13550 17350 21150 24950 28750 32550 Married joint 19500 23300 27100 30900 34700 38500 42300 Married separate   9750 13550 17350 21150 24950 28750 32550 Head of house 12500 16300 20100 23900 27700 31500 35300
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Re: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख
« Reply #2 on: February 28, 2013, 08:48:34 AM »
भारतीय न्याय व्यवस्था पर श्वेत-पत्र
From - Mani Ram

उदारीकरण से देश में सूचना क्रांति, संचार , परिवहन, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में सुधार अवश्य हुआ है किन्तु फिर भी आम आदमी की समस्याओं में बढ़ोतरी ही हुई है| आज भारत में आम नागरिक की जान-माल-सम्मान तीनों ही सुरक्षित नहीं हैं| ऊँचे लोक पद धारियों को जनता के पैसे सरकार सुरक्षा उपलब्ध करवा देती है और पूंजीपति लोग अपनी स्वयं की ब्रिगेड रख रहे हैं या अपनी सम्पति, उद्योग, व्यापार की सुरक्षा के लिए पुलिस को मंथली, हफ्ता या बंधी देते हैं| छोटे व्यवसायी संगठित रूप में अपने सदस्यों से उगाही करके सुरक्षा के लिए पुलिस को धन देते हैं और पुलिस का बाहुबलियों की तरह उपयोग करते हैं| अन्य इंस्पेक्टरों अधिकारियों की भी वे इसी भांति सेवा करते हैं| व्यावसायियों को भ्रष्टाचार से वास्तव में कभी कोई आपति नहीं होती, जैसा कि भ्रष्टाचार के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधिपति ने कहा है,  वे तो अपनी वस्तु या सेवा की लागत में इसे शामिल कर लेते हैं और इसे अंतत: जनता ही वहन करती है|
भारत में एक सरकारी कर्मचारी को किसी दुराचार का संदिग्ध पाए जाने पर उसे निलंबित किया जा सकता है किन्तु उसे इस अवधि में जीवन यापन भत्ता दिया जाता है और उसे निर्दोष पाए जाने पर सभी बकाया वेतन और परिलब्धियां भुगतान कर नियमित सेवा में पुन: ले लिया जाता है| यदि उसे गंभीर दुराचार का दोषी पाया जाने पर उसकी सेवाएं समाप्त भी कर दी जाएँ तो भुगतान किया गया जीवन यापन भत्ता उससे वसूल नहीं किया जाता| दूसरी ओर यदि एक सामान्य नागरिक को किसी अपराध का संदिग्ध पाया जाये तो अनावश्यक होने पर भी पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है और मजिस्ट्रेट उसे जेल भेज देता है| देश के पुलिस आयोग के अनुसार 60% गिरफ्तारियां अनावश्यक हो रही हैं| गिरफ्तार व्यक्ति की प्रतिष्ठा को तो अपुर्तनीय क्षति होती ही है, इसके साथ साथ उसका परिवार इस अवधि में उसके स्नेह, संरक्षा व सानिद्य से वंचित रहता है| गिरफ्तार व्यक्ति हिरासती यातनाएं सहने के अतिरिक्त अपने जीविकोपार्जन से वंचित रहता है जिसका परिणाम उसके आश्रितों व परिवार को अनावश्यक भुगतना पड़ता है| कमजोर और भ्रष्ट न्याय व्यवस्था के चलते देश में मात्र 2% मामलों में दोष सिद्धियाँ हो पाती हैं और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में भी यह 26% से अधिक नहीं है| एक लम्बी अवधि की उत्पीडनकारी कानूनी प्रक्रिया के बाद जब यह गिरफ्तार व्यक्ति मुक्त हो जाता है तो भी उसे इस अनुचित हिरासत की अवधि के लिए कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी जाती जबकि सरकारी कर्मचारियों के दोषमुक्त होने पर उन्हें सम्पूर्ण अवधि का वेतन और परिलब्धियां भुगतान की जाती हैं| हमारी यह व्यवस्था जनतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत और साम्रज्यवादी नीतियों की पोषक है| दिल्ली पुलिस (दंड एवं अपील) नियम,1980 के नियम 11(1) में तो यह विधिवत प्रावधान है कि यदि एक पुलिस अधिकारी को न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध कर दिया जाता है तो भी वह अपील के निस्तारण तक सेवा में बना रहेगा| उल्लेखनीय है कि सी बी आई भी इसी नियम से शासित है और इससे लाभान्वित होती है| ऐसे भी उदाहरण हैं जहां इस नियम की आड़ में सरकार ने पुलिस अधिकारियों को अन्तिमत: दोषी पाए जाने के बावजूद भी 12 वर्ष तक सरकारी सेवा में बनाए रखा क्योंकि इन्हीं पुलिस अधिकारियों का अनुचित उपयोग कर लोग सत्ता में बने हुए हैं| ऐसी स्थिति में यह विश्वास करने का कोई कारण  नहीं कि देश में लोकतंत्र है  बल्कि लोकतंत्र तो मात्र कागजों तक सिमट कर रह गया है| 
 
अमेरिका में एक अभियुक्त को “संयुक्त राज्य का अपराधी” कहा जाता है और वहां सभी आपराधिक मामले राज्य द्वारा ही प्रस्तुत किये जाते हैं व वहां भारत की तरह कोई व्यक्तिगत आपराधिक शिकायत नहीं होती है| अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 256 और भारत में 130 पुलिस है जबकि अमेरिका में भारत की तुलना में प्रति लाख जनसंख्या 4 गुणे मामले दर्ज होते हैं| तदनुसार भारत में प्रति लाख जनसंख्या 68 पुलिस होना पर्याप्त है| किन्तु भारत में पुलिस बल का काफी समय विशिष्ट लोगों को वैध और अवैध सुरक्षा देने, उनके घर बेगार करने, चौथ वसूली करने आदि में लग जाता है| अपनी बची खुची ऊर्जा व समय  का उपयोग भी पुलिस अनावश्यक गिरफ्तारियों में करती है| आपराधिक मामले को अमेरिका में मामला कहा जाता है और सिविल मामले को वहां सिविल शिकायत कहा जाता है| भारत में भी गोरे कमेटी ने वर्ष 1971 में यही सिफारिश की थी कि समस्त आपराधिक मामलों को राज्य का मामला समझा जाये किन्तु उस पर आज तक कोई सार्थक कार्यवाही नहीं हुई है| हवाई अड्डों की सुरक्षा में तैनात पुलिस आगंतुकों के साथ, जो उच्च वर्ग के होते हैं, बड़ी शालीनता से पेश आती है| वही मौक़ापरस्त पुलिस थानों  में पहुंचते ही गाली-गलोज, अभद्र व्यवहार और मार पीट पर उतारू हो जाती है क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान और विश्वास है कि आम आदमी उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता चाहे वह किसी भी न्यायिक या गैर न्यायिक अधिकारी के पास चला जाये, कानून और व्यवस्था उसके पक्ष में ही रहेगी|  राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार एक वर्ष में पुलिस द्वारा मानव अधिकारों के हनन के सभी प्रकार के मात्र 141 मामले बताये जाते हैं जिनमें 466 पुलिस अधिकारियों को दोष सिद्ध किया गया| वहीं एशियाई मानव अधिकार आयोग के अनुसार देश में 9000 मामले तो मात्र हिरासत में मौत के हैं| इसमें अन्य मामले जोड़ दिए जाएँ तो यह आंकड़ा एक लाख को पार कर जाएगा| यह स्थिति पुलिस की कार्यप्रणाली और तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने की सिद्धहस्तता का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करती है| जब  आपराधिक मामलों में न्याय के लिए ऐसी पुलिस पर निर्भर रहना पड़े तो न्याय एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं हो सकता| भारतीय रिजर्व बैंक की सुरक्षा में तैनात पुलिस कर्मियों की समय-समय पर अचानक जांच में काफी नफरी नदारद भी पाई जाती है और उस पर कोई कार्यवाही नहीं होती है| यह पुलिस और उसके वरिष्ठ अधिकारियों की कर्तव्यनिष्ठा का द्योतक है| |
 
 
देश में कानून और न्यायव्यवस्था की दशा में सोचनीय  गिरावट आई है समाज में बढती आर्थिक विषमता ने इस आग में घी का काम किया है| इस स्थिति के लिए हमारे न्यायविद, पुलिस अधिकारी और राजनेता संसाधनों की कमी का हवाला देते हैं और विदेशों की स्थिति से तुलना कर गुमराह करते हैं| किन्तु उनके इस तर्क में दम नहीं है| पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित महानगरीय संस्कृति को छोड़ दिया जाये तो भारत एक आध्यात्मिक चिंतन और उन्नत सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि वाला देश है| यहाँ लोग धर्म- कर्म और ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते हैं| भारत में मात्र 4.2% लोगों के पास बंदूकें हैं जबकि हमारे पडौसी देश पकिस्तान में 11.6% और अमेरिका में 88.8% लोगों के पास बंदूकें हैं| इससे रक्तपात और अपराध की संभावना का अनुमान लगाया जा सकता है| अमेरिका में कानून, और कानून का उल्लंघन करने वालों के प्रति न्यायाधीशों- दोनों ही का रुख सख्त हैं अत: कानून का उल्लंघन करने वालों को विश्वास है कि उन्हें न्यायालय दण्डित करेंगे| इस कारण अपराधी लोग वहां प्राय: अपना अपराध कबूल कर लेते हैं जिससे मामले के परीक्षण में लंबा समय नहीं लगता और ऐसी स्थिति में दंड देने में न्यायाधीशों का उदार रवैया रहता है यद्यपि उनके पास दंड की अवधि निर्धारित करने के लिए भारत की तरह ज्यादा विवेकाधिकार नहीं होते| ऐसी व्यवस्था के चलते अमेरिका में 75% सिविल  मामलों में न्यायालय में जाने से पूर्व ही समझौते हो जाते हैं| अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या 5806 मुकदमे दायर होते हैं जबकि भारत में यह दर मात्र 1520 है| इसके अतिरिक्त अमेरिका में संघीय और राज्य कानूनों के लिए अलग अलग न्यायालय हैं| उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति बैंक का एटीएम तोड़ता है तो बैंक संघ का विषय होने के कारण संघीय न्यायालय का मामला होगा किन्तु वही व्यक्ति यदि एटीएम कक्ष में किसी व्यक्ति की चोरी करता है तो यह राज्य का मामला होगा| प्रति लाख जनसंख्या पर अमेरिका में 10.81  और भारत में 1.6 न्यायाधीश हैं | एक अनुमान के अनुसार भारत के न्यायालयों में दर्ज होने वाले मामलों में से 10% तो प्रारंभिक चरण में या तकनीकी आधार पर ही ख़ारिज कर कर दिये जाते हैं, कानूनी कार्यवाही लम्बी चलने के कारण 20% मामलों में पक्षकार अथवा गवाह मर जाते हैं| 20% मामलों में पक्षकार थकहार कर राजीनामा कर लेते हैं और 20% मामलों में गवाह बदल जाते हैं परिणामत: शेष 30 % मामले ही पूर्ण परीक्षण तक पहुँच पाते हैं| इस प्रकार परिश्रम और समय की लागत के दृष्टिकोण से भारत में दायर होने वाले मामलों को आधा ही मना जा सकता है और भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर दायर होने वाले मामलों की संख्या मात्र 760 आती है जो अमेरिका से लगभग 1/7 है और भारत में प्रति लाख जनसंख्या न्यायाधीशों की संख्या लगभग 1/7 ही है जो दायर होने वाले मामलों को देखते हुए किसी प्रकार से कम नहीं है|अमरीका में न्यायालय में दिए गए अपने वक्तव्य से एक वकील बाध्य है और वह कानून या तथ्य के सम्बन्ध में झूठ नहीं बोल सकता क्योंकि ऐसी स्थिति में दण्डित करने की शक्ति स्वयं न्यायालय के ही पास है| मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति किरुबकर्ण ने हाल ही एक अवमान मामले की सुनवाई में कहा है कि देश की जनता न्यायपालिका से पहले ही कुण्ठित है अत: मात्र 10% पीड़ित लोग ही न्यायालय तक पहुंचते हैं| यह स्थिति न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर स्वत: ही एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाती है|
पूर्ण न्याय की अवधारणा में सामाजिक और आर्थिक न्याय को ध्यान में रखे बिना न्याय अपने आप में अपूर्ण है| भारत में प्रति व्यक्ति औसत आय 60000 रुपये, न्यूनतम मजदूरी 72000 रुपये और एक सत्र न्यायधीश का वेतन 720000 रुपये वार्षिक है वहीँ यह अमेरिका में क्रमश: 48000, 15000 और 25000 डॉलर वार्षिक है| अमेरिका में न्यायालयों में वर्ष भर में मात्र 10 छुटियाँ होती हैं वहीँ भारत में उच्चतम न्यायालय में 100, उच्च न्यायलय में 80 और अधीनस्थ न्यायालयों में 60 छुटियाँ होती है| इस दृष्टि से देखा जाये तो भारतीय न्यायाधीशों का वेतन बहुत अधिक है |इस प्रकार भारत की जनता कानून और न्याय प्रशासन पर अपनी क्षमता से काफी अधिक धन व्यय कर रही है| इस सत्य को किसी वर्ग द्वारा स्वीकार या अस्वीकार किये जाने से भी तथ्य नहीं बदल जाता| उक्त धरातल स्तरीय तथ्यों को देखें तो भारत में कानून और न्याय प्रशासन के मद पर होने वाला व्यय किसी प्रकार से कम नहीं है बल्कि देश में कानून-व्यवस्था और न्याय प्रशासन कुप्रबंधित हैं| भारत में कानून, प्रक्रियाओं और अस्वस्थ परिपाटियों के जरिये  जटिलताएं उत्पन्न कर न्यायमार्ग में कई बाधाएं खड़ी कर दी गयी हैं जिससे मुकदमे द्रौपदी के चीर की भांति लम्बे चलते हैं| भारत में 121 करोड़ की आबादी के लिए 17 लाख वकील कार्यरत हैं अर्थात प्रति लाख जनसँख्या पर 141 वकील हैं और अमेरिका में प्रति लाख जनसंख्या पर 391 वकील हैं| परीक्षण पूर्ण होने वाले मामलों के साथ इसकी तुलना की जाये भारत में यह संख्या 60 तक सीमित होनी चाहिए| दूसरी ओर हमारे पडौसी चीन में 135 करोड़ लोगों की सेवा में मात्र 2 लाख वकील हैं| इस दृष्टिकोण से भारत में प्रति लाख जनसंख्या पर चीन से 10 गुने ज्यादा वकीलों की फ़ौज हैं जिनके पालन पोषण का दायित्व अप्रत्यक्ष रूप से न्यायार्थियों पर आ जाता है| दिल्ली राज्य की तो स्थिति यह है कि वहां हर तीन सौ में एक वकील है| वहीँ  चीन का यह सुखद तथ्य है कि वहां न्यायालयों के लिए निर्णय देने की समय सीमा है और इस सीमा के बाद निर्णय देने के लिए उन्हें उच्च स्तरीय न्यायालय से अनुमति लेनी पड़ती है जबकि भारत में तो न्यायालय के मंत्रालयिक कर्मचारियों के लिए तारीख पेशी देना, जैसा कि रजिस्ट्रार जनरलों की एक मीटिंग में कहा गया था, एक आकर्षक धंधा है और उससे न्यायालयों की बहुत बदनामी हो रही है|
 
उच्चतम और उच्च न्यायालयों में प्रमुखतया सरकारों के विरुद्ध मामले दर्ज होते हैं और यदि सरकारी बचाव पक्ष अपना पक्ष सही सही और सत्य रूप में प्रस्तुत करे तो मुकदमे आसानी से निपटाए जा सकते हैं किन्तु सरकरी पक्ष अक्सर सत्य से परे होते हैं फलत: मुकदमे लम्बे चलते हैं| यदि मामला सरकार के विरुद्ध निर्णित हो जावे तो भी उसकी अनुपालना नहीं की जाती क्योंकि सरकारी अधिकारियों को विश्वास होता है कि न्यायाधीश उनके प्रति उदार हैं अत: वे चाहे झूठ बोलें या अनुपालना न करें उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है, आखिर एक नागरिक को ही गीली लकड़ी की भांति अन्याय की अग्नि में सुलगना है| अत: एक ही समान  मुकदमे अनावश्यक रूप से बारबार दर्ज होते रहते हैं|  उच्चतम और उच्च न्यायालयों में सामान्यतया कोई साक्ष्य नहीं होता है और मात्र बहस व शपथपत्र के आधार पर निर्णय होते हैं अत: इनमें लंबा समय लगने को उचित नहीं ठहराया जा सकता है| फ़ास्ट ट्रेक न्यायालयों का भी कोई महत्व नहीं रह जाता जब मामले को उच्च स्तरीय न्यायालयों द्वारा स्टे कर दिया जाये और उसे फ़ास्ट ट्रैक मामला ही मानते हुए तुरंत निपटान नहीं दिया जाए| देश के प्रबुद्ध, जागरूक, जिम्मेदार और निष्ठावान नागरिकों से अपेक्षा है कि वे इस स्थिति पर मंथन कर देश में अच्छे कानून का राज पुनर्स्थापित करें|
जय हिन्द ! 
 
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Re: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख
« Reply #3 on: March 04, 2013, 10:35:19 PM »

From Mr Mani Ram

भारत में समाजवाद और आर्थिक-सामाजिक न्याय का सपना ब्रिटिश सरकार ने भारत के देशी उद्योग धंधों को नष्ट कर दिया था| कच्चा माल ब्रिटेन जाता था और बदले में तैयार माल आता था| इस प्रकार देश का शासन विशुद्ध व्यापारिक ढंग से संचालित था| स्वतंत्रता के पश्चात देशवासियों को आशा बंधी थी कि रोजगार में वृद्धि से देश में खुशाहाली  आएगी और देश फिर से सोने की चिड़िया बन सकेगा|भारत में प्राकृतिक और मानव संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं| यहाँ तक कि देश में उपलब्ध संसाधनों की अमेरिका, चीन, जापान और दक्षिण अफ्रिका से तुलना की जाये तो भी भारत किसी प्रकार से पीछे नहीं है| जापान में तो मात्र 1/6 भूभाग ही समतल और कृषि योग्य है और वहां बार बार भूकंप आते रहते हैं किन्तु फिर भी वहां कुछ घंटों में ही जनजीवन सामान्य हो जाता है| भारत की स्थिति पर नजर डालें तो यहाँ आम व्यक्ति को पेयजल, बिजली, सडक जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए महानगरों से लेकर ढाणियों तक वंचित रहना पड़ता है और धरने प्रदर्शन करने पड़ते हैं फलत: उत्पादक समय नष्ट होता है| हमारी सरकारें वर्षा अच्छी होने पर भी बिजली पर्याप्त नहीं दे पाती और बहाने बनाती हैं कि कोयला खदान में पानी भर जाने से कोयला नहीं पहुँच सका, बिजली की लाइनें खराब हो गई| वहीं वर्षा की कमी होने से सरकार कहती है कि गर्मी के कारण फसलों की सिंचाई व सामान्य उपभोग में बढ़ोतरी के कारण बिजली की कमी आ गयी है| ठीक यही हालत पेयजल की है| हमारी सड़कें भी बरसात से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और गर्मी में आंधियों से सड़कें मिटटी से सन जाती हैं|कुल मिलाकर प्रकृति चाहे हमारे पर मेहरबान या कुपित हो, हम दोनों ही स्थितियों का मुकाबला करने के स्थान पर बहाने गढ़ने में माहिर है| नगरपालिका क्षेत्र में नालों की सफाई के लिए कई दिनों तक जलापूर्ति रोकनी पड़ती है| इन सभी के लिए संसाधनों की कमी एक बहुत बड़ा कारण बताया जाता है किन्तु चुनाव नजदीक आते ही संसाधनों का जुगाड़ हो जाता है और जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए सडक, बिजली और पानी की व्यवस्था को कुछ समय के लिए सुचारू बना दिया जाता है और  वोटों के ठेकेदारों को थैलियाँ भेंट कर दी जाती हैं| फिर 5 वर्ष के लिए रामराज्य की पुन:स्थापना हो जाती है| यह हमारी लोकतांत्रिक  व्यवस्था है जिस कारण देश में आर्थिक विकास की गति मंद रही है और स्वतंत्रता के वृक्ष  के फल आम आदमी की पहुँच से बाहर हैं| देश नौकरशाही और लालफीताशाही के शिकंजे से आज भी मुक्त नहीं है अत; विकास की गति धीमी है| भ्रष्टाचार, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की स्थिति तो और भी खराब है अत: आम व्यक्ति अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाता है| देश के आम नागरिक को कोई उपक्रम शुरू करने से पूर्व अपनी पूंजी की सुरक्षा और सरकारी तंत्र की भेंटपूजा के विषय में कई बार सोचना पड़ता है| दूसरी ओर जापान, जो द्वितीय विश्व युद्ध में 1946 में  जर्जर हो गया था विश्व पटल पर आज एक गण्यमान्य स्थान रखता है| दक्षिण अफ्रिका को जो भारत से 14 वर्ष बाद आजाद हुआ उसने भी काफी तेजी से विकास किया है और आज वहां प्रति व्यक्ति आय (10,973 डॉलर) भारत (3,694) से  3 गुणी है वहीं युद्ध जर्जरित व्यवस्था का पुनर्निर्माण करने के बाद आज  जापान की प्रति व्यक्ति आय (34,740) भारत से 9 गुणा है| यही नहीं भारत की प्रति व्यक्ति आय विश्व की प्रति व्यक्ति औसत आय (10,700) से भी एक तिहाई है|  आज जिस गति से भारत में हवाई जहाज चलते हैं उस गति से तो जापान में रेलगाड़ी चलती है| भारत में देशी उद्यमियों को जिन छूटों से इनकार किया जाता है वे छूटें विदेशी निवेशकों को दे दी जाती हैं| जिस दर पर विदेशों से घटिया गेहूं आयात किया जाता है वह समर्थन मूल्य देश के मेहनतकश किसानों को उपलब्ध नहीं करवाया जाता है| क्या लोकतंत्र का यही असली स्वरूप है जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजो की लाठियां और गोलियां खाई थी या देश का नेतृत्व फिर विदेशी और पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली मात्र रहा गया है| देश की खराब हालत का जिक्र करने पर नेता लोगों का बचाव होता है कि बड़ा क्षेत्र होने के कारण नियंत्रण नहीं हो पाता है| किन्तु उनका यह बहाना भी बनावटी मात्र है| एक छोटा सा महावत अपनी युक्ति, इच्छाशक्ति और कौशल के आधार पर विशालकाय हाथी पर भी नियंत्रण कर लेता है| दूसरी और हमने इसी तर्क पर झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य भी बनाकर देख लिए हैं किन्तु इन राज्यों में अराजकता, असुरक्षा और सार्वजानिक धन की लूट में बढ़ोतरी ही हुई है कोई कमी नहीं आई है| छोटे प्रदेश तो राज नेताओं को अधिक पदों का सृजन कर अपने स्वामीभक्तों को उपकृत करने के लिए चाहिए| वास्तव में आज भारत में जनता के सुख-दुःख से राजनीति का कोई सरोकार नहीं रह गया है|        जब देश में निगरानी, नियंत्रण और शासन व्यवस्था मजबूत हो तो नीजी क्षेत्र से भी अच्छा काम लिया जा सकता है| अमेरिका और इंग्लॅण्ड में आज जेलें, जोकि सरकार का संप्रभु कार्य है, भी निजी क्षेत्र में सफलतापूर्वक संचालित हैं| भारत में सरकारें सामाजिक उद्देश्यों की आड़ में राजनैतिक हित साधने के लिए  उद्यमों का भी राष्ट्रीयकरण करती हैं किन्तु आज भारत में जनता का रक्तपान करने की दौड़ में सरकारी उपक्रम भी पीछे नहीं हैं| जब बैंकों की ब्याज दरों पर रिजर्व बैंक का नियंत्रण हुआ करता था तब रिजर्व बैंक के उप गवर्नर की अध्यक्षता में भारत सरकार ने बैंकों की मियादी जमा पर ब्याज दरों के निर्धारण के लिए एक कमेटी का गठन किया था| तत्कालीन कमिटी का आकलन था कि मियादी जमाओं पर ब्याज दर चालू मुद्रा स्फीति की दर से 2% प्रतिशत अधिक होनी चाहिए ताकि जमाकर्ता को वास्तव में सकारात्मक ब्याज मिले अन्यथा मुद्रा स्फीति की दर से कम ब्याज दर से तो जमाकर्ता को ऋणात्मक ब्याज मिलेगा और उसे बचत से किसी वस्तु का संग्रहण करने के बजाय जमा कराने पर शुद्ध हानि होगी| बाद में रिजर्व बैंक की ही एक अन्य कमिटी ने दिनांक 17.09.01 को प्रस्तुत एक अन्य रिपोर्ट में भी इस तथ्य पर विचार किया है| कमजोर कानून और न्यायव्यवस्था के चलते देश के निजी क्षेत्र में निवेश सुरक्षित नहीं है अत: निजी क्षेत्र को जनता से सीधा धन मिलना कठिन होता है| एक व्यवसायी के लिए तो कोई भी ब्याज दर मायने नहीं रखती क्योंकि उसने तो अपने उत्पाद या सेवा की लागत में ब्याज को भी जोड़ना है| व्यवसायी लोग तो स्टोक का अपसंचय कर मुनाफाखोरी और कालाबाजारी के माध्यम से सामान्य लाभ के अतिरिक्त अच्छा लाभ कमा लेते हैं अत: मुद्रास्फीति  भी उनके लिए लाभकारी होती है और वे उसका विरोध नहीं करते|समाजवादी सिद्धांतों के विपरीत, कालांतर में पूंजीपतियों के इशारों पर, बैंकों जमा की ब्याज दरों को अनियंत्रित कर दिया गया ताकि ऋणों की ब्याज दरों में कमी होने से उनको लाभ मिल सके| भारत में स्वतंत्रता काल से आज तक की मुद्रास्फीति दर का औसत 8% वार्षिक चक्रवृद्धि आता है| गत 10 वर्ष में तो यह दर 13% आती है किन्तु आज किसी भी बचत योजना में ब्याज दरें मुद्रा स्फीति की इस  दर से अधिक होना तो दूर रहा इसके बराबर भी नहीं है और बचत करने वालों को शुद्ध हानि हो रही है| आज मियादी जमाओं पर ब्याज दरें 9% के दायरे में चल रही हैं और ब्याज दरों में कमी का लाभ बैंकों के माध्यम से जहां एक ओर ऋण लेने वाले पूंजीपतियों को प्राप्त हो रहा है, वहां अल्प साधनों वाले नागरिकों को बचत करने से शुद्ध हानि हो रही है| इनमें भी सेवानिवृत और वृद्ध नागरिक जो अपनी बचतों को किसी अन्य स्थान पर लगाने या व्यवसाय करने की स्थिति में नहीं हैं उन्हें विवश होकर अपनी बचतों को मात्र बैंकों या अल्प बचत योजनाओं में लगाना पड़ता है| लोक –प्रदर्शन के लिए उन्हें ½% की दर से अतिरिक्त ब्याज दिया जाता है जो किसी भी प्रकार से पर्याप्त नहीं है| उक्त वृतांत से बड़ा स्पष्ट है कि  संवैधानिक उद्देश्यों के विपरीत कमजोर वर्ग से सस्ती दर पर जमाएं एकत्रित करके समर्थ व्यावसायियों को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाने में हमारा बैंकिंग तंत्र मदद कर रहा है और मजबूर लोगों का शोषण कर रहा है| ऐसी स्थिति में देश में समाजवाद कैसे स्थापित हो सकता है|हमारी सरकारों के छुपे हुए एजेंडे होते हैं जिन पर चलकर वे लोक कल्याण के स्वांग करती हैं| आज से 10 वर्ष पूर्व जब सीमेंट और स्टील उद्योग मंदी का गिरफ्त में था तो बैंकों को निर्देश देकर आवास ऋण की ब्याज दरें 7% तक नीचे ला दी गयी और कालान्तर में उक्त उद्योग मंदी से उबर गए हैं और भू सम्पतियों की दरें आसमान छूने लगी हैं| अब मकानों की अधिक लागत के कारण ऋण की आवश्यकताएं बढ़ी हैं किन्तु अब आवास ऋणों की ब्याज दरें 11% कर दी गयी हैं| वित्तीय क्षेत्र में लोग जनता का धन लूटकर उसका मनमाना उपभोग करते हैं अथवा  फरार हो जाते हैं व उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता है  और जनता हाथ मलती रह जाती है| देश की इस कमजोर व जिम्मेदारी विहीन कानूनी और न्याय व्यवस्था को देखकर ही निजी व विदेशी लोग बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्र में आने को आतुर रहते हैं| ये लोग जानते हैं कि इस देश में चाहे कितने ही सख्त कानून बना दिए जाएँ उन्हें पैसे की शक्ति से नर्म बनाया जा सकता है| अत: बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र विदेशी और निजी निवेशकों के लिए बड़ा आकर्षक है| भारत में जीवन बीमा व्यसाय में मात्र 1.5% जोखिम है किन्तु वे एजेंटों के माध्यम से जनता को डरावने सपने दिखाकर व्यवसाय कर रहे हैं और बीच में पालिसी बंद करने वालों का धन अवैध रूप से हडप रहे हैं| आम जनता को भ्रमित करने, और बीमा योजनाओं को बैंकों से अधिक आकर्षक बताने के लिए बीमा कम्पनियां अपना बोनस भी प्रतिशत के स्थान पर प्रति हजार घोषित करती हैं जोकि 3-5% आता है और यह भारत में प्रचलित मुद्रा स्फीति की दर से ही कम है| अत: बीमा में निवेश करने पर भी आम जनता को हानि ही हो रही है| बीमा कंपनियों द्वारा संग्रहित इस धन में से 5% हिस्सा सरकार को सस्ते ब्याज पर उपलब्ध हो जाता है अत: सरकार भी इस लोभ में जनता के शोषण के प्रति आँखें मूंदे रहती है और इस आकर्षक क्षेत्र में भी निजी और विदेशी निवेशक आने को लालायित रहते हैं| बैंकिंग, दूर संचार, शेयर बाजार, बीमा आदि व्यवसायों की नियामक एजेंसियां भी जनता को कोई राहत नहीं देती हैं और अंत में जनता को सक्षम न्यायालय/मंच में जाने का परामर्श देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं|     केंद्र सरकार ने कृषि ऋणों पर ब्याज दरें कम करने और नियमित खातों पर कृषकों को ब्याज अनुदान  देने की घोषणा की किन्तु इस घोषणा का भी वास्तविक लाभ किसानों को नहीं मिला| सरकारी बैंकें पहले 30000  रूपये तक के कृषि ऋणों पर मात्र 25 रूपये वार्षिक खाता प्रभार लिया करते थे किन्तु सरकार द्वारा रियायती ब्याज दर की घोषणा करने पर यह प्रभार 10 गुना से भी अधिक अर्थात 280 रूपये वार्षिक कर दिया गया है|इस प्रकार किसानों को सरकार ने एक हाथ लाभ दिया और दूसरे हाथ सरकारी बैंकों के माध्यम वसूल लिया| कृषि ऋण खातों की निगरानी के लिए सामान्यतया बैंक अधिकारीगण कोई निरीक्षण नहीं करते फिर भी अवैध रूप से रूपये 500  से अधिक वार्षिक निरीक्षण प्रभार वसूल रहे हैं| भारी भरकम नवीनीकरण शुल्क अलग रह जाता है| बहुत सी बैंक शाखाओं में इन वसूले गए प्रभारों की राशि बैंक द्वारा खर्च किये गए यात्रा भत्ता बिलों की राशि से भी अधिक हो सकती है| कृषि क्षेत्र के ऋण के लिए रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार किसी अन्य बैंक या वित्तीय संस्था से कोई अदेय प्रमाण-पत्र लेने की आवश्यकता नहीं है और इसके लिए मात्र संभावित ऋणी से इस आशय का शपथ पत्र लेना पर्याप्त है| राजस्थान सरकार ने वर्ष 1980 में एक अधिसूचना जारी कर सरकारी बैंकों के शाखा प्रबंधकों को इस शपथ पत्र के सत्यापन के लिए अधिकृत कर रखा है और इस पर देय स्टाम्प शुल्क की भी छूट दे दी गयी है| किन्तु इसके बावजूद बैंकें कृषकों से अदेय प्रमाण पत्र पर बल देती हैं जिनके लिए उन्हें शुल्क देना पड़ता है और समय नष्ट होता है| रिजर्व बैंक के निर्देश हैं कि आवश्यक होने पर कृषकों के अदेय प्रमाण पत्र ऋणदाता बैंकें एक साथ समूह में अपने स्वयम के ही स्तर पर मंगवा सकती हैं| किन्तु इन निर्देशों की अवहेलना खेदजनक तथ्य है|    भारत गाँवों का देश है और कृषि व सम्बंधित उद्योग उसकी आत्मा है| कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को सस्ता व सुलभ ऋण उपलब्ध करवाने के लिए सहकारिता आन्दोलन की शुरुआत की गयी थी और सहकारिता के माध्यम से देश के ग्रामीण क्षेत्र की बड़ी आर्थिक सहायता की जा रही है| केंद्र सरकार सहकारिता क्षेत्र को वितीय सहायता उपलब्ध करवा सकती है| सहकारिता, राज्य सरकारों का विषय है अत: इस क्षेत्र में अतिक्रमण करने के लिए केन्द्र सरकार ने बिना किसी व्यवहारिक योजना के 1974   से  जिला स्तर पर 300 से अधिक ग्रामीण बैंकों की स्थापना की| कुछ समय तक ग्रामीण बैंकों की अंधाधुंध शाखाएं खोलने का सिलसिला चला और इस हेतु प्रशस्ति-पत्र दिए गए| किन्तु शीघ्र ही इस अभियान से सरकार को हाथ खेंचने पड़े| बाद में इन शाखाओं को अर्थक्षम और व्यवहारिक नहीं पाया गया अत: इनमें से लगभग आधी शाखाओं को बंद कर दिया गया या अन्य शाखाओं में मिला दिया गया अथवा स्थापित उद्देश्यों के विपरीत शहरी  क्षेत्र में अंतरित कर दिया गया| कालान्तर में ये बैंकें भी जब सक्षम नहीं रही तो इनका विलय कर अब मात्र 56 ग्रामीण बैंकें बना दी गयी हैं| यह सब हमारी अपरिपक्व व अदूरदर्शी सोच और सस्ती  लोकप्रियता मूलक  नीतियों का परिणाम था|
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Re: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख
« Reply #4 on: March 05, 2013, 03:11:22 PM »
श्री मनमोहन सिंह जी,
प्रधान मंत्री,
भारत सरकार,
नई दिल्ली

मान्यवर, 
नीतिगत मामले : अधिकारों का प्रत्यायोजन एवं प्रयोग

मैं आपको यह स्मरण करवाने की आवश्यकता नहीं समझता कि शक्तियों के उचित प्रयोग करने के लिए पारदर्शिता होना आवश्यक है और इस दिशा में सूचना का अधिकार अधिनियम अधिनियमित करने का श्रेय  भी आपकी लोकप्रिय सरकार को जाता है| अधिनियम की धारा 4 (1) (b) (ii) में  सभी अधिकारियों की शक्तियां स्वप्रेरणा से प्रकाशित करना बाध्यता है किन्तु अधिकाँश कार्यालयों ने इसकी अनुपालना नहीं की है और अपनी शक्तियों के अतिक्रमण में निर्णय ले रहे हैं| वित्त मंत्रालय के बजट खंड, राज्य सभा सचिवालय, लोक सभा सचिवालय इसके सुन्दर उदाहरण हैं जहां नीतिगत मामलों में जन परिवेदनाओं को, बिना किसी जनप्रतिनिधि की अनुमति के, सचिव स्तर पर ही निस्संकोच निरस्त कर  दिया जाता है| इससे यह विशवास नहीं होता कि देश में लोकतांत्रिक सरकार कार्यरत है|   
 
लोकतंत्र में सरकारी अधिकारी अपने विभाग प्रमुख के प्रति जवाबदेह हैं और जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हैं| किसी भी नीतिगत मामले में हस्तक्षेप करने, संशोधन करने या स्वीकार करने का अधिकार मात्र जनप्रतिनिधियों को ही है| निश्चित रूप से जब किसी नीतिगत मामले को स्वीकार करने का किसी अधिकारी को कोई अधिकार नहीं है तो फिर उसे अस्वीकार करने का भी कोई अधिकार नहीं हो सकता| यदि अस्वीकार करने का अधिकार ही नीचे के स्तर पर दे दिया जाए या प्रयोग किया जाए तो फिर उच्च स्तर पर ऐसा कोई अधिकार अर्थहीन रह जाएगा| अतेव कृपया व्यवस्था करें कि समस्त अधिकारियों की शक्तियां सहज दृश्य रूप में प्रकाशित की जाती हैं और नीतिगत मामलों में कोई भी निर्णय, यथा स्थिति, सशक्त सम्बंधित मंत्री, समिति या अध्यक्ष की अनुमति के बिना नहीं लिया जाये ताकि देश में वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो सके| आप द्वारा इस प्रसंग में की गयी कार्यवाही का मुझे उत्सुकता से इन्तजार रहेगा| 
 
सादर,
 
भवनिष्ठ

मनीराम शर्मा                                       दिनांक: 05.03.2013
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Re: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख
« Reply #5 on: March 06, 2013, 09:35:49 AM »
Mani Ram Sharma <maniramsharma@gmail.com>

भारत में समाजवाद और आर्थिक-सामाजिक न्याय का सपना ब्रिटिश सरकार ने भारत के देशी उद्योग धंधों को नष्ट कर दिया था| कच्चा माल ब्रिटेन जाता था और बदले में तैयार माल आता था| इस प्रकार देश का शासन विशुद्ध व्यापारिक ढंग से संचालित था| स्वतंत्रता के पश्चात देशवासियों को आशा बंधी थी कि रोजगार में वृद्धि से देश में खुशाहाली  आएगी और देश फिर से सोने की चिड़िया बन सकेगा|भारत में प्राकृतिक और मानव संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं| यहाँ तक कि देश में उपलब्ध संसाधनों की अमेरिका, चीन, जापान और दक्षिण अफ्रिका से तुलना की जाये तो भी भारत किसी प्रकार से पीछे नहीं है| जापान में तो मात्र 1/6 भूभाग ही समतल और कृषि योग्य है और वहां बार बार भूकंप आते रहते हैं किन्तु फिर भी वहां कुछ घंटों में ही जनजीवन सामान्य हो जाता है| भारत की स्थिति पर नजर डालें तो यहाँ आम व्यक्ति को पेयजल, बिजली, सडक जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए महानगरों से लेकर ढाणियों तक वंचित रहना पड़ता है और धरने प्रदर्शन करने पड़ते हैं फलत: उत्पादक समय नष्ट होता है| हमारी सरकारें वर्षा अच्छी होने पर भी बिजली पर्याप्त नहीं दे पाती और बहाने बनाती हैं कि कोयला खदान में पानी भर जाने से कोयला नहीं पहुँच सका, बिजली की लाइनें खराब हो गई| वहीं वर्षा की कमी होने से सरकार कहती है कि गर्मी के कारण फसलों की सिंचाई व सामान्य उपभोग में बढ़ोतरी के कारण बिजली की कमी आ गयी है| ठीक यही हालत पेयजल की है| हमारी सड़कें भी बरसात से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और गर्मी में आंधियों से सड़कें मिटटी से सन जाती हैं|कुल मिलाकर प्रकृति चाहे हमारे पर मेहरबान या कुपित हो, हम दोनों ही स्थितियों का मुकाबला करने के स्थान पर बहाने गढ़ने में माहिर है| नगरपालिका क्षेत्र में नालों की सफाई के लिए कई दिनों तक जलापूर्ति रोकनी पड़ती है| इन सभी के लिए संसाधनों की कमी एक बहुत बड़ा कारण बताया जाता है किन्तु चुनाव नजदीक आते ही संसाधनों का जुगाड़ हो जाता है और जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए सडक, बिजली और पानी की व्यवस्था को कुछ समय के लिए सुचारू बना दिया जाता है और  वोटों के ठेकेदारों को थैलियाँ भेंट कर दी जाती हैं| फिर 5 वर्ष के लिए रामराज्य की पुन:स्थापना हो जाती है| यह हमारी लोकतांत्रिक  व्यवस्था है जिस कारण देश में आर्थिक विकास की गति मंद रही है और स्वतंत्रता के वृक्ष  के फल आम आदमी की पहुँच से बाहर हैं| देश नौकरशाही और लालफीताशाही के शिकंजे से आज भी मुक्त नहीं है अत; विकास की गति धीमी है| भ्रष्टाचार, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की स्थिति तो और भी खराब है अत: आम व्यक्ति अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाता है| देश के आम नागरिक को कोई उपक्रम शुरू करने से पूर्व अपनी पूंजी की सुरक्षा और सरकारी तंत्र की भेंटपूजा के विषय में कई बार सोचना पड़ता है| दूसरी ओर जापान, जो द्वितीय विश्व युद्ध में 1946 में  जर्जर हो गया था विश्व पटल पर आज एक गण्यमान्य स्थान रखता है| दक्षिण अफ्रिका को जो भारत से 14 वर्ष बाद आजाद हुआ उसने भी काफी तेजी से विकास किया है और आज वहां प्रति व्यक्ति आय (10,973 डॉलर) भारत (3,694) से  3 गुणी है वहीं युद्ध जर्जरित व्यवस्था का पुनर्निर्माण करने के बाद आज  जापान की प्रति व्यक्ति आय (34,740) भारत से 9 गुणा है| यही नहीं भारत की प्रति व्यक्ति आय विश्व की प्रति व्यक्ति औसत आय (10,700) से भी एक तिहाई है|  आज जिस गति से भारत में हवाई जहाज चलते हैं उस गति से तो जापान में रेलगाड़ी चलती है| भारत में देशी उद्यमियों को जिन छूटों से इनकार किया जाता है वे छूटें विदेशी निवेशकों को दे दी जाती हैं| जिस दर पर विदेशों से घटिया गेहूं आयात किया जाता है वह समर्थन मूल्य देश के मेहनतकश किसानों को उपलब्ध नहीं करवाया जाता है| क्या लोकतंत्र का यही असली स्वरूप है जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजो की लाठियां और गोलियां खाई थी या देश का नेतृत्व फिर विदेशी और पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली मात्र रहा गया है| देश की खराब हालत का जिक्र करने पर नेता लोगों का बचाव होता है कि बड़ा क्षेत्र होने के कारण नियंत्रण नहीं हो पाता है| किन्तु उनका यह बहाना भी बनावटी मात्र है| एक छोटा सा महावत अपनी युक्ति, इच्छाशक्ति और कौशल के आधार पर विशालकाय हाथी पर भी नियंत्रण कर लेता है| दूसरी और हमने इसी तर्क पर झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य भी बनाकर देख लिए हैं किन्तु इन राज्यों में अराजकता, असुरक्षा और सार्वजानिक धन की लूट में बढ़ोतरी ही हुई है कोई कमी नहीं आई है| छोटे प्रदेश तो राज नेताओं को अधिक पदों का सृजन कर अपने स्वामीभक्तों को उपकृत करने के लिए चाहिए| वास्तव में आज भारत में जनता के सुख-दुःख से राजनीति का कोई सरोकार नहीं रह गया है|        जब देश में निगरानी, नियंत्रण और शासन व्यवस्था मजबूत हो तो नीजी क्षेत्र से भी अच्छा काम लिया जा सकता है| अमेरिका और इंग्लॅण्ड में आज जेलें, जोकि सरकार का संप्रभु कार्य है, भी निजी क्षेत्र में सफलतापूर्वक संचालित हैं| भारत में सरकारें सामाजिक उद्देश्यों की आड़ में राजनैतिक हित साधने के लिए  उद्यमों का भी राष्ट्रीयकरण करती हैं किन्तु आज भारत में जनता का रक्तपान करने की दौड़ में सरकारी उपक्रम भी पीछे नहीं हैं| जब बैंकों की ब्याज दरों पर रिजर्व बैंक का नियंत्रण हुआ करता था तब रिजर्व बैंक के उप गवर्नर की अध्यक्षता में भारत सरकार ने बैंकों की मियादी जमा पर ब्याज दरों के निर्धारण के लिए एक कमेटी का गठन किया था| तत्कालीन कमिटी का आकलन था कि मियादी जमाओं पर ब्याज दर चालू मुद्रा स्फीति की दर से 2% प्रतिशत अधिक होनी चाहिए ताकि जमाकर्ता को वास्तव में सकारात्मक ब्याज मिले अन्यथा मुद्रा स्फीति की दर से कम ब्याज दर से तो जमाकर्ता को ऋणात्मक ब्याज मिलेगा और उसे बचत से किसी वस्तु का संग्रहण करने के बजाय जमा कराने पर शुद्ध हानि होगी| बाद में रिजर्व बैंक की ही एक अन्य कमिटी ने दिनांक 17.09.01 को प्रस्तुत एक अन्य रिपोर्ट में भी इस तथ्य पर विचार किया है| कमजोर कानून और न्यायव्यवस्था के चलते देश के निजी क्षेत्र में निवेश सुरक्षित नहीं है अत: निजी क्षेत्र को जनता से सीधा धन मिलना कठिन होता है| एक व्यवसायी के लिए तो कोई भी ब्याज दर मायने नहीं रखती क्योंकि उसने तो अपने उत्पाद या सेवा की लागत में ब्याज को भी जोड़ना है| व्यवसायी लोग तो स्टोक का अपसंचय कर मुनाफाखोरी और कालाबाजारी के माध्यम से सामान्य लाभ के अतिरिक्त अच्छा लाभ कमा लेते हैं अत: मुद्रास्फीति  भी उनके लिए लाभकारी होती है और वे उसका विरोध नहीं करते|समाजवादी सिद्धांतों के विपरीत, कालांतर में पूंजीपतियों के इशारों पर, बैंकों जमा की ब्याज दरों को अनियंत्रित कर दिया गया ताकि ऋणों की ब्याज दरों में कमी होने से उनको लाभ मिल सके| भारत में स्वतंत्रता काल से आज तक की मुद्रास्फीति दर का औसत 8% वार्षिक चक्रवृद्धि आता है| गत 10 वर्ष में तो यह दर 13% आती है किन्तु आज किसी भी बचत योजना में ब्याज दरें मुद्रा स्फीति की इस  दर से अधिक होना तो दूर रहा इसके बराबर भी नहीं है और बचत करने वालों को शुद्ध हानि हो रही है| आज मियादी जमाओं पर ब्याज दरें 9% के दायरे में चल रही हैं और ब्याज दरों में कमी का लाभ बैंकों के माध्यम से जहां एक ओर ऋण लेने वाले पूंजीपतियों को प्राप्त हो रहा है, वहां अल्प साधनों वाले नागरिकों को बचत करने से शुद्ध हानि हो रही है| इनमें भी सेवानिवृत और वृद्ध नागरिक जो अपनी बचतों को किसी अन्य स्थान पर लगाने या व्यवसाय करने की स्थिति में नहीं हैं उन्हें विवश होकर अपनी बचतों को मात्र बैंकों या अल्प बचत योजनाओं में लगाना पड़ता है| लोक –प्रदर्शन के लिए उन्हें ½% की दर से अतिरिक्त ब्याज दिया जाता है जो किसी भी प्रकार से पर्याप्त नहीं है| उक्त वृतांत से बड़ा स्पष्ट है कि  संवैधानिक उद्देश्यों के विपरीत कमजोर वर्ग से सस्ती दर पर जमाएं एकत्रित करके समर्थ व्यावसायियों को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाने में हमारा बैंकिंग तंत्र मदद कर रहा है और मजबूर लोगों का शोषण कर रहा है| ऐसी स्थिति में देश में समाजवाद कैसे स्थापित हो सकता है|हमारी सरकारों के छुपे हुए एजेंडे होते हैं जिन पर चलकर वे लोक कल्याण के स्वांग करती हैं| आज से 10 वर्ष पूर्व जब सीमेंट और स्टील उद्योग मंदी का गिरफ्त में था तो बैंकों को निर्देश देकर आवास ऋण की ब्याज दरें 7% तक नीचे ला दी गयी और कालान्तर में उक्त उद्योग मंदी से उबर गए हैं और भू सम्पतियों की दरें आसमान छूने लगी हैं| अब मकानों की अधिक लागत के कारण ऋण की आवश्यकताएं बढ़ी हैं किन्तु अब आवास ऋणों की ब्याज दरें 11% कर दी गयी हैं| वित्तीय क्षेत्र में लोग जनता का धन लूटकर उसका मनमाना उपभोग करते हैं अथवा  फरार हो जाते हैं व उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता है  और जनता हाथ मलती रह जाती है| देश की इस कमजोर व जिम्मेदारी विहीन कानूनी और न्याय व्यवस्था को देखकर ही निजी व विदेशी लोग बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्र में आने को आतुर रहते हैं| ये लोग जानते हैं कि इस देश में चाहे कितने ही सख्त कानून बना दिए जाएँ उन्हें पैसे की शक्ति से नर्म बनाया जा सकता है| अत: बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र विदेशी और निजी निवेशकों के लिए बड़ा आकर्षक है| भारत में जीवन बीमा व्यसाय में मात्र 1.5% जोखिम है किन्तु वे एजेंटों के माध्यम से जनता को डरावने सपने दिखाकर व्यवसाय कर रहे हैं और बीच में पालिसी बंद करने वालों का धन अवैध रूप से हडप रहे हैं| आम जनता को भ्रमित करने, और बीमा योजनाओं को बैंकों से अधिक आकर्षक बताने के लिए बीमा कम्पनियां अपना बोनस भी प्रतिशत के स्थान पर प्रति हजार घोषित करती हैं जोकि 3-5% आता है और यह भारत में प्रचलित मुद्रा स्फीति की दर से ही कम है| अत: बीमा में निवेश करने पर भी आम जनता को हानि ही हो रही है| बीमा कंपनियों द्वारा संग्रहित इस धन में से 5% हिस्सा सरकार को सस्ते ब्याज पर उपलब्ध हो जाता है अत: सरकार भी इस लोभ में जनता के शोषण के प्रति आँखें मूंदे रहती है और इस आकर्षक क्षेत्र में भी निजी और विदेशी निवेशक आने को लालायित रहते हैं| बैंकिंग, दूर संचार, शेयर बाजार, बीमा आदि व्यवसायों की नियामक एजेंसियां भी जनता को कोई राहत नहीं देती हैं और अंत में जनता को सक्षम न्यायालय/मंच में जाने का परामर्श देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं|     केंद्र सरकार ने कृषि ऋणों पर ब्याज दरें कम करने और नियमित खातों पर कृषकों को ब्याज अनुदान  देने की घोषणा की किन्तु इस घोषणा का भी वास्तविक लाभ किसानों को नहीं मिला| सरकारी बैंकें पहले 30000  रूपये तक के कृषि ऋणों पर मात्र 25 रूपये वार्षिक खाता प्रभार लिया करते थे किन्तु सरकार द्वारा रियायती ब्याज दर की घोषणा करने पर यह प्रभार 10 गुना से भी अधिक अर्थात 280 रूपये वार्षिक कर दिया गया है|इस प्रकार किसानों को सरकार ने एक हाथ लाभ दिया और दूसरे हाथ सरकारी बैंकों के माध्यम वसूल लिया| कृषि ऋण खातों की निगरानी के लिए सामान्यतया बैंक अधिकारीगण कोई निरीक्षण नहीं करते फिर भी अवैध रूप से रूपये 500  से अधिक वार्षिक निरीक्षण प्रभार वसूल रहे हैं| भारी भरकम नवीनीकरण शुल्क अलग रह जाता है| बहुत सी बैंक शाखाओं में इन वसूले गए प्रभारों की राशि बैंक द्वारा खर्च किये गए यात्रा भत्ता बिलों की राशि से भी अधिक हो सकती है| कृषि क्षेत्र के ऋण के लिए रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार किसी अन्य बैंक या वित्तीय संस्था से कोई अदेय प्रमाण-पत्र लेने की आवश्यकता नहीं है और इसके लिए मात्र संभावित ऋणी से इस आशय का शपथ पत्र लेना पर्याप्त है| राजस्थान सरकार ने वर्ष 1980 में एक अधिसूचना जारी कर सरकारी बैंकों के शाखा प्रबंधकों को इस शपथ पत्र के सत्यापन के लिए अधिकृत कर रखा है और इस पर देय स्टाम्प शुल्क की भी छूट दे दी गयी है| किन्तु इसके बावजूद बैंकें कृषकों से अदेय प्रमाण पत्र पर बल देती हैं जिनके लिए उन्हें शुल्क देना पड़ता है और समय नष्ट होता है| रिजर्व बैंक के निर्देश हैं कि आवश्यक होने पर कृषकों के अदेय प्रमाण पत्र ऋणदाता बैंकें एक साथ समूह में अपने स्वयम के ही स्तर पर मंगवा सकती हैं| किन्तु इन निर्देशों की अवहेलना खेदजनक तथ्य है|    भारत गाँवों का देश है और कृषि व सम्बंधित उद्योग उसकी आत्मा है| कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को सस्ता व सुलभ ऋण उपलब्ध करवाने के लिए सहकारिता आन्दोलन की शुरुआत की गयी थी और सहकारिता के माध्यम से देश के ग्रामीण क्षेत्र की बड़ी आर्थिक सहायता की जा रही है| केंद्र सरकार सहकारिता क्षेत्र को वितीय सहायता उपलब्ध करवा सकती है| सहकारिता, राज्य सरकारों का विषय है अत: इस क्षेत्र में अतिक्रमण करने के लिए केन्द्र सरकार ने बिना किसी व्यवहारिक योजना के 1974   से  जिला स्तर पर 300 से अधिक ग्रामीण बैंकों की स्थापना की| कुछ समय तक ग्रामीण बैंकों की अंधाधुंध शाखाएं खोलने का सिलसिला चला और इस हेतु प्रशस्ति-पत्र दिए गए| किन्तु शीघ्र ही इस अभियान से सरकार को हाथ खेंचने पड़े| बाद में इन शाखाओं को अर्थक्षम और व्यवहारिक नहीं पाया गया अत: इनमें से लगभग आधी शाखाओं को बंद कर दिया गया या अन्य शाखाओं में मिला दिया गया अथवा स्थापित उद्देश्यों के विपरीत शहरी  क्षेत्र में अंतरित कर दिया गया| कालान्तर में ये बैंकें भी जब सक्षम नहीं रही तो इनका विलय कर अब मात्र 56 ग्रामीण बैंकें बना दी गयी हैं| यह सब हमारी अपरिपक्व व अदूरदर्शी सोच और सस्ती  लोकप्रियता मूलक  नीतियों का परिणाम था|
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देश आईसीयू के सहारे चल रहा है शेयर बाजार में हुए घोटालों में देश के निवेशक कई बार अपने हाथ जला चुके
« Reply #6 on: March 06, 2013, 06:11:33 PM »
शेयर बाजार में हुए घोटालों में देश के निवेशक कई बार अपने हाथ जला चुके हैं और  देश की जनता का धन कहीं भी सुरक्षित नहीं है| सरकार इन घोटालों से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए किसी न किसी आयोग, मंडल, प्राधिकरण, कमिटी आदि का गठन कर देती है परन्तु इनका दायित्व कहीं पर भी तय नहीं होता| जनता से शिकायत प्राप्त होने पर ये मंडल, कमिटी, आयोग या प्राधिकरण जवाब में जनता को उपभोता फॉर्म या सक्षम न्यायालय में जाने का परामर्श देकर अपने कर्तव्य की औपचारिक पूर्ति कर देते हैं| वास्तव में देखा जाये तो हमारी विधायिकाएं और मंत्रिमंडल भी बहु सदस्यीय निकाय हैं| अत: यदि कमिटी, मंडल, आयोग या प्राधिकरण के गठन से कोई अभिप्राय: सिद्ध होता तो ये तो पहले से ही कार्यरत हैं| इसके विपरीत इन बहु सदस्यीय निकायों के गठन के कुछ नकारत्मक पहलू हैं| प्रथम तो किसी निकाय के बहुसदस्यीय होने पर किसी अनुचित कृत्य या निर्णय के लिए दायित्व ही हवा में विलीन हो जाता है| दूसरा, यदि इन निकायों के सदस्य यदि स्वच्छ छवि वाले न हों (जिसकी भारतीय वातावरण में पर्याप्त संभावनाएं हैं) तो फिर भ्रष्टाचार के रूप में इन सभी सदस्यों के पेट भरने तक भारी कीमत चुकानी पड़ेगी जबकि एकल सदस्य के होने पर मात्र एक सदस्य का ही पेट भरना पर्याप्त रहेगा| अत: बहु सदस्यीय निकाय भ्रष्टाचार को बढ़ावा ही देते हैं| वास्तव में निकाय के बहु सदस्यीय होने की बजाय निर्णायक व्यक्तियों का जवाबदेय होना ही अधिक महत्वपूर्ण है| तीसरा बहु सदस्यीय निकाय द्वारा किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए तुलनात्मक रूप में विलम्ब होगा|     
जब जनता किसी मुद्दे पर उद्वेलित हो जाती है या आक्रोशित होकर सड़कों पर उतर आती है तो उसे ठन्डे छींटे देने के लिए फिर किसी कमेटी या आयोग का गठन कर दिया जाता है| बाद में ये रिपोर्टें धूल  चाटती हैं| स्वतंत्रता के बाद देश के विधि आयोग ने 300 से अधिक रिपोर्टें और परामर्श पत्र भारत सरकार को प्रस्तुत किये हैं किन्तु मुश्किल से ही इनमें से 10% पर कोई कार्यवाही की गयी है| इन रिपोर्टों पर की गयी कार्यवाही की जानकारी को सार्वजनिक पहुँच के भीतर भी नहीं रखा जा रहा है व इस प्रकार विधि आयोग पर किया गया खर्चा मात्र सार्वजनिक धन का अपव्यय साबित हो रहा है| इसी कूटनीति की बैशाखियों पर स्वतंत्रता के बाद की हमारी राजनीति की धुरी केन्द्रित है, चाहे सत्ता या विपक्ष में कोई सा ही राजनैतिक दल शामिल रहा हो| भारत में कानून बनाने और उसमें संशोधन के परामर्श के लिए विधि आयोग का स्थायी कार्यालय है किन्तु विधि आयोग के समस्त पद 1 सितम्बर 2012 से रिक्त होने वाले थे और  सरकार ने इन पदों पर अभी तक नियुक्तियां नहीं की हैं| और जब दिल्ली बलात्कार काण्ड के बाद जनता सड़कों पर उतरी तो इसके एवज में आनन-फानन में एक नई वर्मा कमिटी का गठन कर दिया| यह हमारी अपनी चुनी गयी सरकार की संजीदगी, संवेदनशीलता, जागरूकता और जनोन्मुखी होने का श्रेष्ठ नमूना है|
सरकार विभिन्न क्षेत्रो में विदेशी पूंजी निवेश के लिए अपनी सहमति देती है किन्तु इस कटु सत्य को भूल रही है कि पूरे देश को गुलाम बनाने के लिए मात्र एक ईस्ट इंडिया कंपनी ही पर्याप्त थी तो विदेशी व्यापारियों को देश में निवेश की खुली छूट देने की क्या परिणति हो सकती है| विदेशी निवेशक एक रणनीति तैयार कर अपने आपको सुरक्षित कर लेते हैं| हर्षद मेहता काण्ड के समय जांच में पाया गया कि सीमित शाखाओं वाले संलिप्त सिटी बैंक ने 20 स्टाफ सदस्य आई ए एस या आई पी एस के रिश्तेदार लगा रखे थे ताकि उनके रसूक के बल पर किसी अनहोनी को टाला जा सके| इस काण्ड में अहम् भूमिका के बावजूद सिटी बैंक का कुछ भी नहीं बिगड़ा| इसी तर्ज पर भारत में भी चतुर लोग अपने व्यवसाय की रक्षा के लिए सेवानिवृत कर, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को सेवा में रखते हैं क्योंकि भारत में कानून नाम की कोई चीज नहीं है अत: इनके संपर्कों के आधार पर काम बनाया जा सकता है| सरकारी क्षेत्र के संगठित कर्मचारियों के लिए भी छठा वेतन आयोग वरदान साबित हुआ है और उनकी परिलब्धियों में वर्ष 2006  में 200% की वृद्धि कर हमारे जन प्रतिनिधियों ने अपने लिए वेतन वृद्धि का मार्ग सुगम, निर्विघ्न और निष्कंटक बना लिया| सरकारी कर्मचारियों की परिलब्धियों में वृद्धि के अध्ययन के लिए वेतन आयोग ने विदेशी दौरे भी किये और वहां की वेतन सम्बंधित स्थिति का जायजा लिया| किन्तु इस दल ने विदेशी कार्मिकों के कार्य निष्पादन, जवाबदेही, आचरण के नियम, कार्यप्रणाली आदि के विषय में कोई जानोपयोगी जानकरी नहीं ली है| न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण हेतु भी देश से कोई दल शायद ही विदेशों में अध्यन हेतु भेजा गया हो| देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000  और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये कर दिया गया है! दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी की ओर देखें तो यह वर्ष 2005  में रुपये 2500 रूपये थी जो 2009  में बढ़कर मात्र 4000 रूपये ही हो पायी है| इस प्रकार हमारे माननीय जन प्रतिनिधियों की परिलब्धियों में 4 वर्ष में 1100% से अधिक बढ़ोतरी हुई और महंगाई की मार से त्राहीत्राही करते आम मेहनतकश मजदूर की मजदूरी में समान अवधि में मात्र 60% वृद्धि हुई है| जहां आम आदमी के लिए 30 रुपये रोजना पर्याप्त बताये जाते हैं वहीं एक दिन के समारोह पर करोड़ों फूंक दिये जाते हैं और जनता के धन से खुद पर रोजाना 10000 रुपये से भी ज्यादा खर्च किये जाते हैं !  दिल्ली उच्च न्यायालय अनुसार निचले तबकों में तो शादियाँ टूटने का एक कारण मुद्रास्फीति भी है जिसके चलते वे इस महंगे शहर में जीवन निर्वाह करना मुश्किल पाते हैं| हमारे वित्तमंत्री इस उपलब्धि और नियोजन के लिए धन्यवाद के पात्र हैं| आशा है वे जल्दी ही गांधीजी के सपनों को साकार कर देंगे| देश के गैर सरकारी और असंगठित कार्मिकों को अपने पारिश्रमिक में वृद्धि के लिए फिर भी हड़ताल, धरने, प्रदर्शन, विरोध जूलूस आदि का आयोजन करना पड़ता है| जब हम ऐसी जनविरोधी नीतियों का अनुसरण कर रहे हों तो देश में सामाजिक-आर्थिक न्याय, समाजवाद की सभी बातें बेमानी लगाती हैं और यह कल्पना भी नहीं कर पाते कि जिस समाजवाद का सपना अपने पूर्वजों ने देखा था वह कितनी पीढ़ियों बाद पूरा हो सकेगा| इस प्रकार भारतीय गणतंत्र तो नौकरशाहों और नेताओं के गठबंधन से संचालित है व पांच वर्ष में एक दिन मतदान के अतिरिक्त जनता की इसमें कोई सक्रिय भागीदारी नहीं है| क्या यही हमारा लोकतंत्र है और लोकतंत्र के इसी स्वरुप के लिए हमारे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी| वास्तव में देखा जाये तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की आज जो भव्य अट्टालिका दिखाई दे रही है उसकी नींव तो मेहनतकश और मजदूर लोगों के शोषण पर टिकी हुई है| अब समय आ गया है देश में विगत 65 वर्षों से जो लोकतंत्र का जो स्वांग चल रहा है उसका शीघ्र पटाक्षेप होना चाहिए|

देश के ऐसे हालात में समाजवाद और लोकतंत्र कैसे स्थापित हो सकता है जब संसद में चिंतन के स्थान पर मात्र निरर्थक बहस हो और जनप्रतिनिधियों व संविधान के रक्षकों के स्वयम चरित्र व आचरण में समाजवाद का नितांत अभाव हो| देश के शासन की बागडोर आज गैर जिम्मेदार हाथों में है और रेल पटरी से उतर चुकी है| पटरीवाले इंजीनियर कहते हैं कि पहियों का अलाइअनमेंट दोषपूर्ण है और गाड़ीवाले इंजीनियर कहते हैं कि पटरी का अलाइअनमेंट दोषपूर्ण है और अंत में दंड दिया जाता है बेचारे गैंगमेन को| देश में आज पंचतत्वों – न्यायिक व पुलिस अधिकारियों, राजनेताओं, धनासेठों, प्रशासनिक अधिकारियों और अपराधियों का शासन है व उनकी समानांतर सरकारें और सत्ताएँ चल रही हैं| लोकतंत्र तो सर धुन रहा है| देश की पुलिस तो किसी आतंककारी से भी अधिक भयावह है जो अफजल, कसाब जैसे खून्कारों को तो ढूढकर फांसी तक पहुंचा सकती है किन्तु किसी पुलिस वाले को ढूंढकर उसे समन भी तामिल नहीं करवा सकती| देश में आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से ये 10% लोग ही सुरक्षित हैं और तुष्टिकरण की नीति के तहत हमारे राजनेता लैंगिक आधार पर महिलाओं, व जातिगत आधार पर दलितों व वंचितों के लिए आरक्षण की बात करके वोट बैंक की राजनीति करते हैं|  वास्तव में आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता तो देश के 90% लोगों को है जब देश में 65% लोग गरीब और अशिक्षित हों तथा मात्र 3% लोग आयकर देते हों व 121 करोड़ के देश में 20 लाख से अधिक आय वाले  मात्र 4 लाख लोग हों| देश में कालेधन को लेकर बवाल मच रहा है किन्तु काले धन की सुरक्षा के लिए हमारे आयकर कानून में पर्याप्त स्थान है और हमारा आयकर कानून भी  अपराधियों और कर चोरों के बड़ा अनुकूल है| आयकर अधिनियम की धारा 142 के अनुसार आयकर अधिकारी मात्र 3 पूर्व वर्षों तक की विवरणियाँ दाखिल करने की ही अपेक्षा कर सकता है अर्थात 3 वर्ष से पुराना कोई कला धन हो तो सरकार के पास उस पर कर वसूलने का कोई अधिकार नहीं है| इसी कानून का लाभ देश के उद्योगपति उठा रहे हैं| यद्यपि विश्व के चुनिन्दा पूंजीपतियों में भारत के कई उद्योगपतियों के नाम आते हैं किन्तु देश के शीर्ष 10 आयकर दाताओं में मात्र 3 ही उद्योगपति हैं और शेष अन्य क्षेत्रों से ही हैं| दूसरी ओर अमेरिका में 50% लोग आयकरदाता हैं और  कुल आयकर में उपरी 1% लोगों का 95% योगदान है जबकि भारत में मात्र 0.3% लोग ही कुल आयकर में 90% योगदान देते हैं| यह स्वतन्त्रता के बाद की अनुसरण की गयी हमारी संविधान विरोधी नीतियों का ही परिणाम है कि आज आय के स्रोत, धन व आर्थिक सत्ता कुछ हाथों में ही केन्द्रित हो गयी है और संविधान में समाहित आर्थिक व सामाजिक न्याय के सपने आज 65 वर्ष बाद भी अधूरे हैं|     
       
विश्वविद्यालयों द्वारा समान परीक्षाओं के लिए ही स्वयंपाठी छात्रों से नियमित छात्रों की तुलना में दुगुना परीक्षा शुल्क लिया जाता है| वे नब्ज टटोल लेते हैं कि स्वयंपाठी छात्र संगठित नहीं अत: उनका शोषण किया जा सकता है जबकि नियमित छात्र संगठित होकर विरोध करेंगे| हमारी सरकारें पशुओं की भांति हैं जो मात्र हांकने पर गतिमान होती हैं और विरोध का इन्तजार करती रहती हैं| हमारी लोकप्रिय सरकारें सनकपूर्ण नीतियाँ का अनुसरण कर रही हैं और वे एक ओर बेरोजगारी भता देने की बातें करती हैं, दूसरी ओर बेरोजगारों से विभिन्न नौकरियों के लिये भारी फीस वसूलती और शोषण करती हैं| राजस्थान सरकार ने तो बेरोजगारों का शोषण करने में निर्लजतापूर्वक सारी सीमाएं ही पार कर दी हैं और हाल में पंचायत राज की भर्तियों में, जिनमें कोई परीक्षा नहीं होनी और मात्र उच्च माध्यमिक परीक्षा के प्राप्तांकों के आधार पर चयन करना है, 500 रूपये शुल्क निर्धारित किया है| राज्य का शासन कहने को लोकतांत्रिक सरकार द्वारा चलाया जा रहा है न कि किसी व्यापारी द्वारा किन्तु मन गवाही नहीं देता है| शुल्क लेने का उद्देश्य मात्र उस गतिविधि पर होने वाले व्यय की प्रतिपूर्ति प्राप्त करना होता है न कि ऐसी गतिविधि से कोई लाभ कमाना| जब कोई परीक्षा नहीं आयोजित हो रही तो इतने शुल्क का  क्या औचित्य है? ठीक इसी प्रकार स्वास्थ्य रक्षा के नाम पर सरकार मुफ्त दवाइयां उपलब्ध करवाने का स्वांग कर रही हैं और दूसरी ओर अपनी लागत से 20 गुणा विक्रय मूल्य लिखी दवाइयां बाजार में बिक रही हैं, क्योंकि इन दवा निर्माताओं ने सरकार को, भेंट पूजा के अतिरिक्त, इस बीस गुणा मूल्य पर कर देना स्वीकार कर लिया है| सरकार को इस बात की कोई फ़िक्र नहीं है कि जनता के साथ कितना बड़ा अन्याय हो रहा है, उसे तो अपना छोटा सा हित मात्र अपना राजस्व देखना है| राजस्थान राज्य में वर्ष 1989 से पूर्व स्थानीय निकायों में पेंशन योजना लागू नहीं थी| वोट बैंक और सस्ती लोकप्रियता की नीतियों के चलते  सामाजिक सुरक्षा की दुहाई देते हुए 1989 से स्थानीय निकायों में भी पेंशन लागू कर दी गयी| किन्तु केंद्र सरकार ने जल्दी ही 2001 में चालू पेंशन योजना को नयी भर्तियों के लिए बंद कर दिया और मात्र अंशदायी पेंशन योजना लागू कर दी| तत्पश्चात राज्य सरकारों ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया| हमारी योजनाओं में चिंतन और दीर्घकालीन सोच का सदा ही अभाव रहा है फलत: देश का समुचित आर्थिक विकास नहीं हुआ है और जो थोड़ा बहुत विकास हुआ है वह भी असंतुलित है और उसका फल लक्षित समूह तक नहीं पहुंचा है| ठीक इसी प्रकार कुछ वर्ष पूर्व आठवीं कक्षा के लिए बोर्ड परीक्षा का प्रावधान किया गया और उसके बाद पांचवीं कक्षा के लिए भी बोर्ड परीक्षा का प्रावधान किया गया| किन्तु थोड़े ही समय पश्चात मात्र इन बोर्ड परीक्षाओं के प्रावधान को नहीं हटा दिया गया बल्कि दसवीं कक्षा के लिए भी बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक कर दी गयी| मानव संसाधनों के विकास के नाम पर देश में बहुत से प्रशिक्षण संस्थान तो मात्र कागजों में चल रहे हैं| देश में वाहन तो 75 टन से भी अधिक क्षमता के बनाए जा रहे हैं किन्तु सड़कें 20 टन के भी योग्य नहीं हैं| लगभग यही हाल बिजली, पेयजल, दूरसंचार, नगर नियोजन आदि का है| हमारी योजनाओं में सुसंगतता और परिपक्वता का भी नितांत अभाव है |

हमारे नेताओं को अब स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र को प्रशासकों या प्रशासनिक अधिकारियों के स्थान पर ऐसे प्रबंधकों की आवश्यकता है जो जन भावनाओं के अनुरूप कार्य कर सकें व जनता के सीमित साधनों के आधार पर सर्वोतम परिणाम दें| जनतंत्र में सभी लोक पदधारी जनता के ट्रस्टी होते हैं| एक ट्रस्टी का कर्तव्य अपने नियोक्ता की भावना और निर्देशों के अनुरूप कार्य करना होता है और ऐसा करने में उसे न तो कोई विवेकाधिकार है और न ही वह अपने कोई व्यक्तिगत विचार रखने की कोई छूट का उपयोग कर सकता बल्कि वह तो अपने नियोक्ता का प्रवक्ता होता है| जनतंत्र एक सतत संवाद वाली प्रक्रिया है जिसमें जन प्रतिनिधियों का यह कर्तव्य है कि वे सरकार की नीतियों के सम्बन्ध में जनता के विचार जानें और उन्हें सदन तक पहुंचाएं व उनके अनुरूप ही मतदान करें, चाहे उनके व्यक्तिगत विचार अथवा हित कुछ भी क्यों न हों क्योंकि  उन्हें प्रतिनिधि की हैसियत में ही सदन में जाने का अधिकार है|           

हमारा लोकतंत्र आज सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बंधक है, मतदान के अतिरिक्त जनता का कोई महत्व नहीं है| जनता की चीख पुकार के बावजूद भी हमारी संवेदनहीन सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है| बीकानेर में विश्वविद्यालय खोलने के लिए वर्ष 1973-74 में संभाग स्तर पर हड़ताल हुई थी किन्तु सरकार ने जनता की यह वाजिब मांग आखिर 31 वर्ष बाद 2005 में पूरी की है| स्वतंत्रता से पूर्व बीकानेर राज्य में अपना उच्च न्यायालय था उसे बंद कर दिया गया और आज मुकदमेबाजी व जनसंख्या दोनों बढ़ जाने के बावजूद देश के सबसे बड़े राज्य में अतिरिक्त बेंचें खोलने के मुद्दे पर सरकार राजनीति  कर रही है जबकि राजस्थान से लगभग समान आबादी और कम क्षेत्रफल वाले मध्यप्रदेश राज्य में तीन बेंचें कार्यरत हैं| सरकार एक ओर जहां पेयजल की आपूर्ति करने में असमर्थ है और नागरिकों को बिना पम्पों की सहायता के जल नहीं मिल पाता वहीं पानी खेंचने के लिए पम्पों का उपयोग अपराध घोषित कर रखा है| सरकार का निशुल्क दवा  और चिकित्सा का दावा भी खोखला है| विधान सभा की भी जानकारी में है कि 6 लाख आबादी वाली तहसील में 20 से अधिक सरकारी डॉक्टर कार्यरत हैं वहां पूरे वर्ष में एक भी ओपरेशन नहीं होता| डाक्टरों द्वारा यह बहाना बनाया जाता है कि निश्चेतक विशेषज्ञ के अभाव में ओपरेशन नहीं किये जा रहे हैं, वहीँ परिवार कल्याण के लक्ष्य प्राप्ति के लिए ओपरेशन किये जाते रहते हैं| आखिर सरकारी सेवा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों और राजनेताओं को प्रसन्न रखना-खुशामद करना मात्र पर्याप्त है, जनता की सेवा कोई मायने नहीं रखती है और न ही जनता की अप्रसन्नता कोई मायने रखती है| उचित भी हो सकता है, किसी भी कार्य के लिए प्रेरक बिंदु- सकारात्मक (प्रोत्साहन) या नकारत्मक (दंड)- होना  आवश्यक है और आज की हमारी इस व्यवस्था में दोनों का ही लगभग अभाव है अत: कोई भी सरकारी कर्मचारी जनता की सेवा करना अपना धर्म नहीं समझता है| कमोबेश यही स्थिति अन्य राज्यों की है बल्कि संभव है कुछ इससे भी आगे हों |आज लोकपद तो जनता का शोषण करने और लूटने के लाइसेंस की तरह प्रयोग हो रहे  हैं और शासन एक व्यापार की भांति संचालित है| सरकारी नियुक्तियां नीलाम हो रही हैं और कर्मचारियों के ट्रांसफर ने एक फलते-फूलते उद्योग का रूप ले लिया है| अत: ट्रांसफर के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायी जाती है| लगभग सरकारी कार्यालयों ने सत्ता की दलाली के केन्द्रों का रूप धारण कर लिया है| रिश्वत के सम्बन्ध में सरकारी कार्यालयों में एक बड़ी लोकप्रिय कहावत प्रचलित है कि वेतन तो वे पद का लेते हैं और जनता को काम निकलवाना हो तो पैसे देने ही पड़ेंगे| अब जनता की फ़रियाद सुनने के लिए कोई मंच शेष नहीं रह गया है जब जनता के किसी आवेदन की निर्धारित रसीद पुलिस थानों में तो क्या लोकसभा सचिवालय द्वारा भी नहीं दी जाती है| नीतिगत मामलों को भी जनप्रतिनिधियों की अनुमति के बिना सचिवों द्वारा ही निरस्त कर दिया जाता है| बस यूँ समझिये कि देश चल रहा है तो “आईसीयू” - विटामिन, ग्लूकोज, ओक्सिजन की कृत्रिम मदद के सहारे से|             



« Last Edit: March 07, 2013, 10:19:06 AM by Mani Ram Sharma »
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Mani Ram Sharma

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A FINE DECISION ON VIOLATION OF HUMAN RIGHTS
« Reply #7 on: March 07, 2013, 10:24:22 AM »
BIHAR HUMAN RIGHTS COMMISSION
9, Bailey Road, Patna – 15
File No. BHRC/COMP. 1071/12
Case of SUNITA DEVI

Complaint in this matter was made to the National Human Rights Commission (NHRC), and transferred to this Commission for disposal. The complaint is about the arrest and detention of applicant Sunita Devi wife of Pawan Singh @ Braj Mohan Singh – resident of village Lodipur within Sahar P.S. of Bhojpur district. The applicant was arrested in connection with Sahar P.S. Case No.74/11 under section 364 IPC with respect to the alleged kidnapping of one Bimal Chaudhary – a co-villager. Fardbeyan with respect to the alleged occurrence was lodged by Jeera Devi wife of the alleged victim at 7 A.M. on 4.10.2011. At 7:30 AM the applicant was apprehended from her house situate 5/6 houses away from Jeera Devi’s house. During this period of half an hour, further statement of the informant as also statements of a few witnesses were purportedly taken which means that the applicant was apprehended no sooner than the fardbeyan (STATEMENTS) was made. It is another matter that formal arrest – as per the case diary – was shown to have been made at 5:30 PM.
Interestingly, Bimal Chaudhary, the alleged victim, himself appeared on 15.10.2011 and denied to have been kidnapped. He stated that he got a false case instituted by his wife out of fear of Yadavs of the same village. Notwithstanding the fact that the very case stood falsified by none else than the alleged victim himself, the applicant remained in judicial custody till 18.11.2011, that is, for 45 days.
In her complaint the applicant claimed that no female constable was present at the time of arrest. The police party was led by the then SHO Sahar P.S, S.I. Ram Naresh Singh – also the Investigating Officer of the case, and the then SHO Chauri P.S, S.I. Rana Ran Vijay Kumar. It is also her complaint that she was shabbily treated and physically abused by the police prior to her production before the magistrate and judicial custody. S.P. Bhojpur vide his report dated 8.6.2012 supported the complaint version about the applicant’s arrest in a fake case. The report stated that in view of the statement of Bimal Chaudhary, application was filed in the court of CJM for release of the applicant on 16.10.2011. The report also stated that instructions had been given to the I.O. to file case against the informant (of Sahar P.S. Case No.74/11), the so-called victim Bimal Chaudhary and others under sections
182/211 IPC. The report however denied the applicant’s case about absence of female personnel at the time of her arrest. Relying on the case diary and the station diary it claimed that a female chowkidar was member of the police party which raided the applicant’s house and arrested her at 5:30 PM on 4.10.2011.
The female chowkidar, as per the report, remained with the applicant until her production before the magistrate for judicial remand. In the facts of the case, notice in terms of section 16 of the Protection of Human Rights Act was issued to S.I. Ram Naresh Prasad Singh and S.I. Rana Ran Vijay Kumar. They filed their written defence and appeared for hearing along with advocates. The matter was finally heard on 22.1.2013.
The defence of S.I. Ram Naresh Prasad Singh is that the applicant’s house was raided and she was taken into custody on the direction of SDPO Piro. Arrest was made to facilitate recovery of the person said to have been kidnapped, which in the prevailing circumstances was considered necessary. The allegation of kidnapping was supported by witnesses. It is also his defence that arrest was made in accordance with the laid down procedure. However, the alleged victim, Bimal Chaudhary, on 15.10.2011 personally appeared at Piro Police Station. On receipt of information, he (S.I. Ram Naresh Prasad Singh) reached there and interrogated him. His statement revealed that the case was concocted and false.
Without losing time, on 16.10.2011 application was filed in the court of CJM Ara for release of the applicant. CJM however orally observed that the question of release will be considered after submission of final form. Submission of final form took time as this required the approval of S.P./Dy.S.P. Finally, S.P.’s orders were received on 30.10.2011. On the next day final report ‘false’ was submitted. On 10.11.2011 the applicant filed application for bail and by order dated 17.11.2011 bail was granted to her. She was released on the next day. The officer has denied the allegation about manhandling and physical abuse in police custody.
The defence of S.I. Rana Ran Vijay Kumar is that he was posted as SHO Sahar P.S. earlier between 29.1.2008 and 30.5.2010. As he performed his duties honestly he made enemies and for political and caste reasons he has been falsely implicated in this case. He does not deny his presence in village Lodipur at the time of arrest; as regards the fact that Lodipur is situate within another police station not under his jurisdiction, his explanation is that he had gone there to control law and order on the direction of senior officers. It is also his defence that the applicant has filed court complaint (Case No.2114C/11) in the court of CJM
Bhojpur which is pending in the court of Ms. Namita Singh, Judicial Magistrate, First Class, Ara in the stage of enquiry.

There is dispute about the timing of arrest of the applicant. Whereas according to the applicant she was arrested from her house in the morning of 4.10.2011 itself; according to the officers’ version, she was arrested at 5:30 PM – and they place reliance on the case diary to buttress their stand.
The Commission would observe that the contents of the case diary have to be read with a pinch of salt. Where a document is written by the very person against whom the complaint is made, its contents cannot be taken on face value. In response to the Commission’s observation about the circumstances justifying the applicant’s arrest in a case under section 364 IPC – almost immediately after the alleged victim was supposedly kidnapped – without making any serious attempt to trace his whereabouts – the officers stated that there was tension in the village and the applicant was taken into custody, to avoid any untoward incident. If that was the reason and the situation was really such – the Commission is inclined to think – the police must have taken away the applicant in the morning itself, and the Commission is therefore inclined to accept the applicant’s version. As per the diary, the police party returned to the P.S. at 12:30 PM and if that was so, it is unlikely that he would go to the village at 5 PM just to arrest her.
The Commission is unable to appreciate the haste with which the applicant – a young woman – and wife of a serving engineer – was arrested. She certainly was victim of some petty village politics. The officers should have seen through the situation rather than taken sides. It was really unusual that the police accepted the informant’s version about her husband being kidnapped to be true – and without any investigation made the arrest.
The presence of S.I. Rana Ran Vijay Kumar strengthens the conclusion about the officers taking sides. Admittedly, he had served as SHO of Sahar P.S. until a year ago between 2008 and 2010 and he apparently intervened in the matter for extraneous considerations – as alleged by the applicant.
May be that application was filed in the court of CJM Bhojpur to release the applicant on the next day after Bimal Chaudhary appeared at Piro P.S. and denied the entire occurrence. It however took the applicant a month to walk out of prison. S.I. Ram Naresh Prasad Singh has given an explanation. According to him, the CJM orally observed that the question of release will be considered after submission of final form. On his own case, the final form was submitted on 31.10.2011 after a fortnight. The Commission is at a loss to appreciate the subsequent delay. Clearly, in view of the statement of Bimal Chaudhary, nothing remained for investigation and therefore police could have submitted final form on the very next day. S.I. Ram Naresh Prasad Singh has sought to pass on the blame on the Dy.S.P./S.P. According to him, final form could not be submitted without their approval. If this indeed was the requirement, the Dy.S.P./S.P. should have shown greater awareness and promptly done their part. Even if Ram Naresh Singh is not guilty for the subsequent delay after 16.10.2011, it is clear that month long detention of the applicant after 16.10.2011 was the result of a systemic failure which does not in any way affect the applicant’s case for compensation.
There is dispute as to whether the applicant was arrested in presence of a female personnel. According to the applicant no female staff was present; according to the officers on the other hand, a female chowkidar no.2/1 Chandrawati Kunwar was member of the police party which raided the house. On behalf of the applicant, attention was drawn to the interpolations in the station diary in this regard.
As indicated above, the Commission has found the applicant’s version of being arrested in the morning of 4.10.2011 to be more plausible, and if that is so, the entry about female chowkidar Chandrawati Kunwar being member of the police party which went to the applicant’s house for raid and arrest in the evening becomes doubtful. Having recorded the statement of the witnesses after recording the fardbeyan and further statement of the informant, and returned to the police station at about 12:30 PM, it is unlikely that they would go back to the village at 5 PM for raid – especially when the applicant’s house is situate only 5-6 houses away from the informant’s house. The Commission would accordingly hold – agreeing with the applicant – that there was no female constable (or chowkidar) present at the time of her arrest. The plea that court complaint is pending with respect to the applicant’s arrest does not cut any ice. The criminal case may, or may not, end in conviction, whereas the scope of the present proceeding before the Commission is different – involving the question of violation of human rights and therefore the Commission is not inclined to close the matter in view of the pendency of the criminal case.
In the light of the discussions made above the Commission holds that the applicant came to suffer violation of her human rights at the hands of the two officers for which she is entitled to monetary compensation. The Commission also holds that the burden of compensation should be borne by these officers and that they should be subjected to disciplinary proceedings.
In the result, the Commission holds that S.I. Ram Naresh Prasad Singh the then SHO Sahar P.S. (now SHO Charpokhari P.S.) and S.I. Rana Ran Vijay Kumar – the then SHO Chauri P.S. (now SHO Jagdishpur P.S.) – guilty of violating the human rights of the applicant, and upon consideration of their respective role, directs that they do pay compensation of rupees fifty thousand and twenty-five thousand respectively to the applicant.
S.I. Bhojpur is directed to deduct said amounts from their salaries and pay the same to the applicant. This should be done within six weeks. S.P. Bhojpur is also directed to initiate disciplinary proceedings against them and take the matter to its logical end.
Put up in the last week of April 2013 awaiting compliance report.
Copy of this order may be sent to (i) applicant (ii) S.P. Bhojpur, Ara (iii) S.I. Ram Naresh Prasad Singh, S.H.O. Charphokhar P.S. district Bhojpur and (iv) S.I. Rana Ran Vijay Kumar S.H.O. Jagdishpur P.S. district Bhojpur for information and compliance as the case may be.

Justice S.N. Jha   Date: 06.03.2013
Chairperson
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Mani Ram Sharma

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SUO MOTU COGNISANCE ON POLICE BRUTALITIES
« Reply #8 on: March 07, 2013, 08:07:39 PM »
IN RE: PRESS REPORTS CAPTIONING "PUNJAB COPS BEAT UP WOMAN IN PUBLIC" AND "POLICE LATHI-CHARGE PROTESTING CONTRACTUAL TEACHERS IN PATNA" PUBLISHED IN VARIOUS NEWSPAPERS OF THE COUNTRY DATED 05.03.2013 AND 06.03.2013
Date: 06/03/2013
This matter was called on its own motion.

The Court made the following O R D E R

Almost all leading newspapers of the country published reports with the caption "Punjab Cops beat up woman in public" [The Hindustan Times (New Delhi) dated 05.03.2013], "Police assaulting women" [The Tribune (New Delhi) dated 06.03.2013), "Woman beaten up by Punjab Police when she went for protection" [Punjab Kesari (Delhi) dated 05.03.2013], "Punjab Police beat up the young girl by making her to run [Dainik Jagran (New Delhi dated 05.03.2013), "Police beat up father and daughter" [Jansatta (New Delhi) dated 05.03.2013][Amar Ujjala (New Delhi) dated 05.03.2013] [Punjab Kesari (Delhi) dated 06.03.2013]. Another report published in various newspapers dated 06.03.2013 show that contractual teachers who were demanding regular wages were brutally beaten by the police [The Statesman (New Delhi) dated 06.03.2013][Dainik Jagran (New Delhi) dated 06.03.2013,[Jansatta (New Delhi) dated 06.03.2013] and [Hindustan (New Delhi) dated 06.03.2013]. The xerox copies of the newspapers are taken on record. The contents of the news items revealed that members of the Punjab Police and Patna Police have mercilessly beaten an unarmed woman and teachers. Both the incidents have shocked the conscience of the entire nation. Unfortunately, the administration of the Governments of Punjab and Bihar have not taken adequate steps for protecting the people against the wholly unwarranted action taken by the police at Taran Taran and Patna. These incidents raise important constitutional issues relating to Article 21 of the Constitution and dignity of individual. We, therefore, feel that it is proper for this Court to take congizance of the gross violation of the human rights as well as the constitutional rights of the people.
We request the learned Attorney General to assist the Court. We also request S/Shri Harish N.Salve and U.U.Lalit, Senior Advocate, to assist the Court as amicus.
The Registry is directed to place the matter before the Hon'ble the Chief Justice of India and seek His Lordship's direction for listing of the case on 11.03.2013.
(Satish K.Yadav)                    (Phoolan Wati Arora)
Court Master                         Court Master

NOTE PER AUTHOR: THOUGH THE COURT HAS ISSUED DIRECTIONS BUT ONE CAN’T HOPE VERY MUCH FURTHER. A SIMILAR INCIDENCE WITH BABA RAMDEV COULD NOT MAKE ANY DENT IN THE HISTORY OF PROTECTION OG HUMAN RIGHTS. AFTER ALL CITIZENS HAVE TO DEFEND THEMSELVES UNITEDLY.

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एम.एस. मेहता /M S Mehta

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Re: Articles by Mani Ram Sharma -मनी राम शर्मा जी के लेख
« Reply #9 on: March 07, 2013, 11:30:08 PM »
From Mani sharma

देश आईसीयूके सहारे चल रहा है
शेयर बाजार में हुए घोटालों में देश के निवेशक कई बार अपने हाथ जला चुके हैं और  देश की जनता का धन कहीं भी सुरक्षित नहीं है| सरकार इन घोटालों से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए किसी न किसी आयोग, मंडल, प्राधिकरण,कमिटी आदि का गठन कर देती है परन्तु इनका दायित्व कहीं पर भी तय नहीं होता| जनता से शिकायत प्राप्त होने पर ये मंडल, कमिटी, आयोग या प्राधिकरण जवाब में जनता को उपभोता फॉर्म या सक्षम न्यायालय में जाने का परामर्श देकर अपने कर्तव्य की औपचारिक पूर्ति कर देते हैं| वास्तव में देखा जाये तो हमारी विधायिकाएं और मंत्रिमंडल भी बहु सदस्यीय निकाय हैं| अत: यदि कमिटी, मंडल, आयोग या प्राधिकरण के गठन से कोई अभिप्राय: सिद्ध होता तो ये तो पहले से ही कार्यरत हैं| इसके विपरीत इन बहु सदस्यीय निकायों के गठनके कुछ नकारत्मक पहलू हैं| प्रथम तो किसी निकाय के बहुसदस्यीय होने पर किसी अनुचित कृत्य या निर्णय के लिए दायित्व ही हवा में विलीन हो जाता है| दूसरा, यदि इन निकायों के सदस्य यदि स्वच्छ छवि वाले न हों (जिसकी भारतीय वातावरण में पर्याप्त संभावनाएं हैं) तो फिर भ्रष्टाचार के रूप में इन सभी सदस्यों के पेट भरने तक भारी कीमत चुकानी पड़ेगी जबकि एकल सदस्य के होने पर मात्र एक सदस्य का ही पेट भरना पर्याप्त रहेगा| अत: बहु सदस्यीय निकाय भ्रष्टाचार को बढ़ावा ही देते हैं| वास्तव में निकाय के बहु सदस्यीय होने की बजाय निर्णायक व्यक्तियों का जवाबदेय होना ही अधिक महत्वपूर्ण है| तीसरा बहु सदस्यीय निकाय द्वारा किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए तुलनात्मक रूप में विलम्ब होगा|     
जब जनता किसी मुद्दे पर उद्वेलित हो जाती है या आक्रोशित होकर सड़कों पर उतर आती है तो उसे ठन्डे छींटे देने के लिए फिर किसी कमेटी या आयोग का गठन कर दिया जाता है| बाद में ये रिपोर्टें धूल  चाटती हैं| स्वतंत्रता के बाद देश के विधि आयोग ने 300 से अधिक रिपोर्टें और परामर्श पत्र भारत सरकार को प्रस्तुत किये हैं किन्तु मुश्किल से ही इनमें से 10% पर कोई कार्यवाही की गयी है| इन रिपोर्टों पर की गयी कार्यवाही की जानकारी को सार्वजनिक पहुँच के भीतर भी नहीं रखा जा रहा है व इस प्रकार विधि आयोग पर किया गया खर्चा मात्र सार्वजनिक धन का अपव्यय साबित हो रहा है| इसी कूटनीति की बैशाखियों पर स्वतंत्रता के बाद की हमारी राजनीति की धुरी केन्द्रित है, चाहे सत्ता या विपक्ष में कोई सा ही राजनैतिक दल शामिल रहा हो| भारत में कानून बनाने और उसमें संशोधन के परामर्श के लिए विधि आयोग का स्थायी कार्यालय है किन्तु विधि आयोग के समस्त पद 1 सितम्बर 2012 से रिक्त होने वाले थे और  सरकार ने इन पदों पर अभी तक नियुक्तियां नहीं की हैं| और जब दिल्ली बलात्कार काण्ड के बाद जनता सड़कों पर उतरी तो इसके एवज में आनन-फानन में एक नई वर्मा कमिटी का गठन कर दिया| यह हमारी अपनी चुनी गयी सरकार की संजीदगी, संवेदनशीलता, जागरूकता और जनोन्मुखी होने का श्रेष्ठ नमूना है|
सरकार विभिन्न क्षेत्रो में विदेशी पूंजी निवेश के लिए अपनी सहमति देती है किन्तु इस कटु सत्य को भूल रही है कि पूरे देश को गुलाम बनाने के लिए मात्र एक ईस्ट इंडिया कंपनी ही पर्याप्त थी तो विदेशी व्यापारियों को देश में निवेश की खुली छूट देने की क्या परिणति हो सकती है| विदेशी निवेशक एक रणनीति तैयार कर अपने आपको सुरक्षित कर लेते हैं| हर्षद मेहता काण्ड के समय जांच में पाया गया कि सीमित शाखाओं वाले संलिप्त सिटी बैंक ने 20 स्टाफ सदस्य आई ए एस या आई पी एस के रिश्तेदार लगा रखे थे ताकि उनके रसूक के बल पर किसी अनहोनी को टाला जा सके| इस काण्ड में अहम् भूमिका के बावजूद सिटी बैंक का कुछ भी नहीं बिगड़ा| इसी तर्ज पर भारत में भी चतुर लोग अपने व्यवसाय की रक्षा के लिए सेवानिवृत कर, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को सेवा में रखते हैं क्योंकि भारत में कानून नाम की कोई चीज नहीं है अत: इनके संपर्कों के आधार पर काम बनाया जा सकता है| सरकारी क्षेत्र के संगठित कर्मचारियों के लिए भी छठा वेतन आयोग वरदान साबित हुआ है और उनकी परिलब्धियों में वर्ष 2006  में 200% की वृद्धि कर हमारे जन प्रतिनिधियों ने अपने लिए वेतन वृद्धि का मार्ग सुगम, निर्विघ्न और निष्कंटक बना लिया| सरकारी कर्मचारियों की परिलब्धियों में वृद्धि के अध्ययन के लिए वेतन आयोग ने विदेशी दौरे भी किये और वहां की वेतन सम्बंधित स्थिति का जायजा लिया| किन्तु इस दल ने विदेशी कार्मिकों के कार्य निष्पादन, जवाबदेही, आचरण के नियम, कार्यप्रणाली आदि के विषय में कोई जानोपयोगी जानकरी नहीं ली है| न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण हेतु भी देश से कोई दल शायद ही विदेशों में अध्यन हेतु भेजा गया हो|देश के सांसदों का प्रतिमाह वेतन, वर्ष जो 2005 तक 4000 रूपये था, को दिनांक 12.09.2006 से 16000  और शीघ्र ही दिनांक 18.05.09 से बढाकर 50000 रूपये कर दिया गया है! दूसरी ओर न्यूनतम मजदूरी की ओर देखें तो यह वर्ष 2005  में रुपये 2500 रूपये थी जो 2009  में बढ़कर मात्र 4000 रूपये ही हो पायी है| इस प्रकार हमारे माननीय जन प्रतिनिधियों की परिलब्धियों में 4 वर्ष में 1100% से अधिक बढ़ोतरी हुई और महंगाई की मार से त्राहीत्राही करते आम मेहनतकश मजदूर की मजदूरी में समान अवधि में मात्र 60% वृद्धि हुई है|जहां आम आदमी के लिए 30 रुपये रोजना पर्याप्त बताये जाते हैं वहीं एक दिन के समारोह पर करोड़ों फूंक दिये जाते हैं और जनता के धन से खुद पर रोजाना 10000 रुपये से भी ज्यादा खर्च किये जाते हैं !  दिल्ली उच्च न्यायालय अनुसार निचले तबकों में तो शादियाँ टूटने का एक कारण मुद्रास्फीति भी है जिसके चलते वे इस महंगे शहर में जीवन निर्वाह करना मुश्किल पाते हैं| हमारे वित्तमंत्री इस उपलब्धि और नियोजन के लिए धन्यवाद के पात्र हैं| आशा है वे जल्दी ही गांधीजी के सपनों को साकार कर देंगे| देश के गैर सरकारी और असंगठित कार्मिकों को अपने पारिश्रमिक में वृद्धि के लिए फिर भी हड़ताल, धरने, प्रदर्शन, विरोध जूलूस आदि का आयोजन करना पड़ता है| जब हम ऐसी जनविरोधी नीतियों का अनुसरण कर रहे हों तो देश में सामाजिक-आर्थिक न्याय, समाजवाद की सभी बातें बेमानी लगाती हैं और यह कल्पना भी नहीं कर पाते कि जिस समाजवाद का सपना अपने पूर्वजों ने देखा था वह कितनी पीढ़ियों बाद पूरा हो सकेगा| इस प्रकार भारतीय गणतंत्र तो नौकरशाहों और नेताओं के गठबंधन से संचालित है व पांच वर्ष में एक दिन मतदान के अतिरिक्त जनता की इसमें कोई सक्रिय भागीदारी नहीं है| क्या यही हमारा लोकतंत्र है और लोकतंत्र के इसी स्वरुप के लिए हमारे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी| वास्तव में देखा जाये तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की आज जो भव्य अट्टालिका दिखाई दे रही है उसकी नींव तो मेहनतकश और मजदूर लोगों के शोषण पर टिकी हुई है| अब समय आ गया है देश में विगत 65 वर्षों से जो लोकतंत्र का जो स्वांग चल रहा है उसका शीघ्र पटाक्षेप होना चाहिए|

देश के ऐसे हालात में समाजवाद और लोकतंत्र कैसे स्थापित हो सकता है जब संसद में चिंतन के स्थान पर मात्र निरर्थक बहस हो और जनप्रतिनिधियों व संविधान के रक्षकों के स्वयम चरित्र व आचरण में समाजवाद का नितांत अभाव हो| देश के शासन की बागडोर आज गैर जिम्मेदार हाथों में है और रेल पटरी से उतर चुकी है| पटरीवाले इंजीनियर कहते हैं कि पहियों का अलाइअनमेंट दोषपूर्ण है और गाड़ीवाले इंजीनियर कहते हैं कि पटरी का अलाइअनमेंट दोषपूर्ण है और अंत में दंड दिया जाता है बेचारे गैंगमेन को| देश में आज पंचतत्वों – न्यायिक व पुलिस अधिकारियों, राजनेताओं, धनासेठों, प्रशासनिक अधिकारियों और अपराधियों का शासन है व उनकी समानांतर सरकारें और सत्ताएँ चल रही हैं| लोकतंत्र तो सर धुन रहा है| देश की पुलिस तो किसी आतंककारी से भी अधिक भयावह है जो अफजल, कसाब जैसे खून्कारों को तो ढूढकर फांसी तक पहुंचा सकती है किन्तु किसी पुलिस वाले को ढूंढकर उसे समन भी तामिल नहीं करवा सकती| देश में आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से ये 10% लोग ही सुरक्षित हैं और तुष्टिकरण की नीति के तहत हमारे राजनेता लैंगिक आधार पर महिलाओं, व जातिगत आधार पर दलितों व वंचितों के लिए आरक्षण की बात करके वोट बैंक की राजनीति करते हैं|  वास्तव में आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता तो देश के 90% लोगों को है जब देश में 65% लोग गरीब और अशिक्षित हों तथा मात्र 3% लोग आयकर देते हों व 121 करोड़ के देश में 20 लाख से अधिक आय वाले  मात्र 4 लाख लोग हों| देश में कालेधन को लेकर बवाल मच रहा है किन्तु काले धन की सुरक्षा के लिए हमारे आयकर कानून में पर्याप्त स्थान है और हमारा आयकर कानून भी  अपराधियों और कर चोरों के बड़ा अनुकूल है| आयकर अधिनियम की धारा 142 के अनुसार आयकर अधिकारी मात्र 3 पूर्व वर्षों तक की विवरणियाँ दाखिल करने की ही अपेक्षा कर सकता है अर्थात 3 वर्ष से पुराना कोई कला धन हो तो सरकार के पास उस पर कर वसूलने का कोई अधिकार नहीं है| इसी कानून का लाभ देश के उद्योगपति उठा रहे हैं| यद्यपि विश्व के चुनिन्दा पूंजीपतियों में भारत के कई उद्योगपतियों के नाम आते हैं किन्तु देश के शीर्ष 10 आयकर दाताओं में मात्र 3 ही उद्योगपति हैं और शेष अन्य क्षेत्रों से ही हैं| दूसरी ओर अमेरिका में 50% लोग आयकरदाता हैं और  कुल आयकर में उपरी 1% लोगों का 95% योगदान है जबकि भारत में मात्र 0.3% लोग ही कुल आयकर में 90% योगदान देते हैं| यह स्वतन्त्रता के बाद की अनुसरण की गयी हमारी संविधान विरोधी नीतियों का ही परिणाम है कि आज आय के स्रोत, धन व आर्थिक सत्ता कुछ हाथों में ही केन्द्रित हो गयी है और संविधान में समाहित आर्थिक व सामाजिक न्याय के सपने आज 65 वर्ष बाद भी अधूरे हैं|     
       
विश्वविद्यालयों द्वारा समान परीक्षाओं के लिए ही स्वयंपाठी छात्रों से नियमित छात्रों की तुलना में दुगुना परीक्षा शुल्क लिया जाता है| वे नब्ज टटोल लेते हैं कि स्वयंपाठी छात्र संगठित नहीं अत: उनका शोषण किया जा सकता है जबकि नियमित छात्र संगठित होकर विरोध करेंगे| हमारी सरकारें पशुओं की भांति हैं जो मात्र हांकने पर गतिमान होती हैं और विरोध का इन्तजार करती रहती हैं| हमारी लोकप्रिय सरकारें सनकपूर्ण नीतियाँ का अनुसरण कर रही हैं और वे एक ओर बेरोजगारी भता देने की बातें करती हैं, दूसरी ओर बेरोजगारों से विभिन्न नौकरियों के लिये भारी फीस वसूलती और शोषण करती हैं| राजस्थान सरकार ने तो बेरोजगारों का शोषण करने में निर्लजतापूर्वक सारी सीमाएं ही पार कर दी हैं और हाल में पंचायत राज की भर्तियों में, जिनमें कोई परीक्षा नहीं होनी और मात्र उच्च माध्यमिक परीक्षा के प्राप्तांकों के आधार पर चयन करना है, 500 रूपये शुल्क निर्धारित किया है| राज्य का शासन कहने को लोकतांत्रिक सरकार द्वारा चलाया जा रहा है न कि किसी व्यापारी द्वारा किन्तु मन गवाही नहीं देता है| शुल्क लेने का उद्देश्य मात्र उस गतिविधि पर होने वाले व्यय की प्रतिपूर्ति प्राप्त करना होता है न कि ऐसी गतिविधि से कोई लाभ कमाना| जब कोई परीक्षा नहीं आयोजित हो रही तो इतने शुल्क का  क्या औचित्य है? ठीक इसी प्रकार स्वास्थ्य रक्षा के नाम पर सरकार मुफ्त दवाइयां उपलब्ध करवाने का स्वांग कर रही हैं और दूसरी ओर अपनी लागत से 20 गुणा विक्रय मूल्य लिखी दवाइयां बाजार में बिक रही हैं, क्योंकि इन दवा निर्माताओं ने सरकार को, भेंट पूजा के अतिरिक्त, इस बीस गुणा मूल्य पर कर देना स्वीकार कर लिया है| सरकार को इस बात की कोई फ़िक्र नहीं है कि जनता के साथ कितना बड़ा अन्याय हो रहा है, उसे तो अपना छोटा सा हित मात्र अपना राजस्व देखना है| राजस्थान राज्य में वर्ष 1989 से पूर्व स्थानीय निकायों में पेंशन योजना लागू नहीं थी| वोट बैंक और सस्ती लोकप्रियता की नीतियों के चलते  सामाजिक सुरक्षा की दुहाई देते हुए 1989 से स्थानीय निकायों में भी पेंशन लागू कर दी गयी| किन्तु केंद्र सरकार ने जल्दी ही 2001 में चालू पेंशन योजना को नयी भर्तियों के लिए बंद कर दिया और मात्र अंशदायी पेंशन योजना लागू कर दी| तत्पश्चात राज्य सरकारों ने भी इसी मार्ग का अनुसरण किया| हमारी योजनाओं में चिंतन और दीर्घकालीन सोच का सदा ही अभाव रहा है फलत: देश का समुचित आर्थिक विकास नहीं हुआ है और जो थोड़ा बहुत विकास हुआ है वह भी असंतुलित है और उसका फल लक्षित समूह तक नहीं पहुंचा है| ठीक इसी प्रकार कुछ वर्ष पूर्व आठवीं कक्षा के लिए बोर्ड परीक्षा का प्रावधान किया गया और उसके बाद पांचवीं कक्षा के लिए भी बोर्ड परीक्षा का प्रावधान किया गया| किन्तु थोड़े ही समय पश्चात मात्र इन बोर्ड परीक्षाओं के प्रावधान को नहीं हटा दिया गया बल्कि दसवीं कक्षा के लिए भी बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक कर दी गयी| मानव संसाधनों के विकास के नाम पर देश में बहुत से प्रशिक्षण संस्थान तो मात्र कागजों में चल रहे हैं| देश में वाहन तो 75 टन से भी अधिक क्षमता के बनाए जा रहे हैं किन्तु सड़कें 20 टन के भी योग्य नहीं हैं| लगभग यही हाल बिजली, पेयजल, दूरसंचार, नगर नियोजन आदि का है| हमारी योजनाओं में सुसंगतता और परिपक्वता का भी नितांत अभाव है |

हमारे नेताओं को अब स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र को प्रशासकों या प्रशासनिक अधिकारियों के स्थान पर ऐसे प्रबंधकों की आवश्यकता है जो जन भावनाओं के अनुरूप कार्य कर सकें व जनता के सीमित साधनों के आधार पर सर्वोतम परिणाम दें| जनतंत्र में सभी लोक पदधारी जनता के ट्रस्टी होते हैं| एक ट्रस्टी का कर्तव्य अपने नियोक्ता की भावना और निर्देशों के अनुरूप कार्य करना होता है और ऐसा करने में उसे न तो कोई विवेकाधिकार है और न ही वह अपने कोई व्यक्तिगत विचार रखने की कोई छूट का उपयोग कर सकता बल्कि वह तो अपने नियोक्ता का प्रवक्ता होता है| जनतंत्र एक सतत संवाद वाली प्रक्रिया है जिसमें जन प्रतिनिधियों का यह कर्तव्य है कि वे सरकार की नीतियों के सम्बन्ध में जनता के विचार जानें और उन्हें सदन तक पहुंचाएं व उनके अनुरूप ही मतदान करें, चाहे उनके व्यक्तिगत विचार अथवा हित कुछ भी क्यों न हों क्योंकि  उन्हें प्रतिनिधि की हैसियत में ही सदन में जाने का अधिकार है|           
 
 हमारा लोकतंत्र आज सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बंधक है, मतदान के अतिरिक्त जनता का कोई महत्व नहीं है| जनता की चीख पुकार के बावजूद भी हमारी संवेदनहीन सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है| बीकानेर में विश्वविद्यालय खोलने के लिए वर्ष 1973-74 में संभाग स्तर पर हड़ताल हुई थी किन्तु सरकार ने जनता की यह वाजिब मांग आखिर 31 वर्ष बाद 2005 में पूरी की है| स्वतंत्रता से पूर्व बीकानेर राज्य में अपना उच्च न्यायालय था उसे बंद कर दिया गया और आज मुकदमेबाजी व जनसंख्या दोनों बढ़ जाने के बावजूद देश के सबसे बड़े राज्य में अतिरिक्त बेंचें खोलने के मुद्दे पर सरकार राजनीति  कर रही है जबकि राजस्थान से लगभग समान आबादी और कम क्षेत्रफल वाले मध्यप्रदेश राज्य में तीन बेंचें कार्यरत हैं| सरकार एक ओर जहां पेयजल की आपूर्ति करने में असमर्थ है और नागरिकों को बिना पम्पों की सहायता के जल नहीं मिल पाता वहीं पानी खेंचने के लिए पम्पों का उपयोग अपराध घोषित कर रखा है| सरकार का निशुल्क दवा  और चिकित्सा का दावा भी खोखला है| विधान सभा की भी जानकारी में है कि 6 लाख आबादी वाली तहसील में 20 से अधिक सरकारी डॉक्टर कार्यरत हैं वहां पूरे वर्ष में एक भी ओपरेशन नहीं होता| डाक्टरों द्वारा यह बहाना बनाया जाता है कि निश्चेतक विशेषज्ञ के अभाव में ओपरेशन नहीं किये जा रहे हैं, वहीँ परिवार कल्याण के लक्ष्य प्राप्ति के लिए ओपरेशन किये जाते रहते हैं| आखिर सरकारी सेवा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों और राजनेताओं को प्रसन्न रखना-खुशामद करना मात्र पर्याप्त है, जनता की सेवा कोई मायने नहीं रखती है और न ही जनता की अप्रसन्नता कोई मायने रखती है| उचित भी हो सकता है, किसी भी कार्य के लिए प्रेरक बिंदु- सकारात्मक (प्रोत्साहन) या नकारत्मक (दंड)- होना  आवश्यक है और आज की हमारी इस व्यवस्था में दोनों का ही लगभग अभाव है अत: कोई भी सरकारी कर्मचारी जनता की सेवा करना अपना धर्म नहीं समझता है| कमोबेश यही स्थिति अन्य राज्यों की है बल्कि संभव है कुछ इससे भी आगे हों |आज लोकपद तो जनता का शोषण करने और लूटने के लाइसेंस की तरह प्रयोग हो रहे  हैं और शासन एक व्यापार की भांति संचालित है| सरकारी नियुक्तियां नीलाम हो रही हैं और कर्मचारियों के ट्रांसफर ने एक फलते-फूलते उद्योग का रूप ले लिया है| अत: ट्रांसफर के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायी जाती है| लगभग सरकारी कार्यालयों ने सत्ता की दलाली के केन्द्रों का रूप धारण कर लिया है| रिश्वत के सम्बन्ध में सरकारी कार्यालयों में एक बड़ी लोकप्रिय कहावत प्रचलित है कि वेतन तो वे पद का लेते हैं और जनता को काम निकलवाना हो तो पैसे देने ही पड़ेंगे| अब जनता की फ़रियाद सुनने के लिए कोई मंच शेष नहीं रह गया है जब जनता के किसी आवेदन की निर्धारित रसीद पुलिस थानों में तो क्या लोकसभा सचिवालय द्वारा भी नहीं दी जाती है| नीतिगत मामलों को भी जनप्रतिनिधियों की अनुमति के बिना सचिवों द्वारा ही निरस्त कर दिया जाता है| बस यूँ समझिये कि देश चल रहा है तो “आईसीयू” - विटामिन, ग्लूकोज, ओक्सिजन की कृत्रिम मदद के सहारे से|
« Last Edit: March 09, 2013, 10:35:04 PM by एम.एस. मेहता /M S Mehta »
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Mani Ram Sharma

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THE PARAMETERS FOR MEASURING STRENGTH OF JUSTICE DELIVERY SYSTEM
« Reply #10 on: March 08, 2013, 07:41:52 AM »

Following are selected excerpts from Report of World Justice Project, Washington:-

What is the Rule of Law?

The rule of law is a system in which the following four universal principles are upheld:

1.   The government and its officials and agents are accountable under the law.
2.   The laws are clear, publicized, stable and fair, and protect fundamental rights, including the security of persons and property.
3.   The process by which the laws are enacted, administered, and enforced is accessible, efficient, and fair.
4.   Justice is delivered by competent, ethical, and independent representatives and neutrals who are of sufficient number, have adequate resources, and reflect the makeup of the communities they serve.
These four universal principles which comprise the WJP's notion of the rule of law are further developed in the nine factors of the WJP Rule of Law Index.

WHY THE RULE OF LAW MATTERS TO EVERYONE

The rule of law is the underlying framework of rules and rights that make prosperous and fair societies possible. The rule of law is a system in which no one, including government, is above the law; where laws protect fundamental rights; and where justice is accessible to all.

FACTORS

Limited Government Powers

In a society governed by the rule of law, the government and its officials and agents are subject to and held accountable under the law. Modern societies have developed systems of checks and balances, both constitutional and institutional, to limit the reach of excessive government power, and to subject the government power, or ruler, to legal restraints. These checks and balances take many forms in various countries around the world: they do not operate solely in systems marked by a formal separation of powers, nor are they necessarily codified in law. What is essential, however, is that authority is distributed in a manner that ensures that no single organ of government has the practical ability to exercise unchecked power.

Absence of Corruption

The absence of corruption - conventionally defined as the use of public power for private gain - is one of the hallmarks of a society governed by the rule of law, as corruption is a manifestation of the extent to which government officials abuse their power or fulfill their obligations under the law. Forms of corruption vary, but include bribery, extortion, improper influence by public or private interests, and misappropriation of public funds or other resources.

These three forms of corruption are examined with respect to government officers in the executive branch, the judiciary, the legislature, and the police and the military.

Order and Security

Human security is one of the defining aspects of any rule of law society. Protecting human security, mainly assuring the security of persons and property, is a fundamental function of the state. Not only does violence impose wounds on society, it also prevents the achievement of other aims, such as exercising fundamental human rights, and ensuring access to opportunities and justice. In extreme situations, violence might become the norm if legal rules are not enforced. Under the rule of law, the state must effectively prevent crime and violence of every sort, including political violence and vigilante justice. It encompasses three dimensions: absence of crime; absence of civil conflict, including terrorism and armed conflict; and absence of violence as a socially acceptable means to redress personal grievances.

Fundamental Rights

Under the rule of law, fundamental rights must be effectively guaranteed. A system of positive law that fails to respect core human rights established under international law is at best “rule by law”. Rule of law abiding societies should guarantee the rights embodied in the Universal Declaration of Human Rights including the right to equal treatment and the absence of discrimination; the right to life and security of the person; the right to the due process of the law; the freedom of opinion and expression; the freedom of belief and religion; the absence of any arbitrary interference of privacy; the freedom of assembly and association; and the protection of fundamental labor rights.

Open Government

Open government is essential to the rule of law. It involves engagement, access, participation, and collaboration between the government and its citizens, and plays a crucial role in the promotion of accountability. Requesting information from public authorities is an important tool to empower citizens by giving them a way to voice their concerns and demand accountability from their governments. Open government is far more than transparency, and encompasses elements such as clear, publicized, and stable laws; administrative proceedings that are open for public participation; official drafts of laws and regulations that are available to the public; and the availability of official information.

Civil Justice

In a rule of law society, ordinary people should be able to resolve their grievances and obtain remedies in conformity with fundamental rights through formal institutions of justice in a peaceful and effective manner, rather than resorting to violence or self-help. Civil justice requires that the system be accessible, affordable, effective, impartial, and culturally competent. Accessibility includes general awareness of available remedies; availability and affordability of legal advice and representation; and absence of excessive or unreasonable fees and hurdles. Impartiality includes absence of arbitrary distinctions, such as social and economic status, as well as decisions that are free of improper influence by public officials or private interests. Effective civil justice also implies that court proceedings are conducted in a timely manner and judgments are enforced without unreasonable delay. Finally, in a rule of law society, it is essential that alternative dispute mechanisms provide effective access to justice, while refraining from binding persons who have not consented to be bound by the mechanism.


Criminal Justice

An effective criminal justice system is a key aspect of the rule of law, as it constitutes the natural mechanism to redress grievances and bring action against individuals for offenses against society. An effective criminal justice system is capable of investigating and adjudicating criminal offences effectively, impartially, and without improper influence, while ensuring that the rights of suspects and victims are protected.

Informal Justice

For many countries it is important to acknowledge the role played by traditional, or ‘informal’, systems of law — including traditional, tribal, and religious courts, as well as community-based systems — in resolving disputes. These systems often play a large role in cultures where formal legal institutions fail to provide effective remedies for large segments of the population or when formal institutions are perceived as foreign, corrupt, and ineffective. While recognizing the importance of these informal systems, a necessary element of the rule of law is that informal systems are effective, impartial, and protect fundamental rights, and are held to the same standards of fairness in resolving disputes as formal systems.

Vigilant, Responsible and Enlightened Citizens may evaluate our Indian Judicial System how so far it fulfills the demands as above or is it befitting to democracy.

For my more work may visit my blog justicemiracle-mrp.blogspot.in (in Hindi) and judicialreform.in (in English).
« Last Edit: March 08, 2013, 07:46:00 AM by Mani Ram Sharma »
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Mani Ram Sharma

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कर्मचारियों के तबादलों में अब नेताओं की मर्जी और डिजायर नहीं चलेगी ‌‌
« Reply #11 on: March 09, 2013, 09:17:59 PM »
यद्यपि कानून में तबादला दंड के रूप में परिभाषित नहीं है किन्तु फिर भी इसे एक दंड के औजार या हिसाब बराबर करने के रूप में काम में लिया जा रहा है जिसे कानून की भाषा में न्यायिकेतर (Extra-judicial Punishment) दंड कहा जाता है| तबादला किसी शिकायत का कोई हल भी नहीं है | यदि कर्मचारी ने वास्तव में कोई कदाचार किया है तो उसे दण्डित किया जाना चाहिए अन्यथा जो कर्मचारी आज यहाँ कदाचार से जनता को परेशान कर रहा है आगे नए स्थान पर जाकर भी जनता को परेशान ही करेगा | तबादले को एक शोर्टकट के रूप में प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए | वैसे तबादले करने वाले अधिकारी अपना सिरदर्द टालने व राजनेतिक तुष्टिकरण के लिए यह सब कर रहे हैं और देश के न्यायालय भी इस समस्या की जड़ तक नहीं पहुँच रहे थे| 
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने अमिर चंद बनाम हिमाचल राज्य के मामले में दिनांक 09.01.2013 को अपने आदेश से प्रदेश के लाखों सरकारी कर्मचारियों के लिए बनाई गई तबादला नीति में संशोधन करने के आदेश दिए हैं ताकि सभी कर्मचारियों को राजनीतिक द्वेष के चलते प्रताडऩा से बचाया जा सके। न्यायालय ने सरकार को 28 फरवरी तक का समय देते हुए हिदायत दी है कि यदि तबादला नीति में अदालत के दिशा-निर्देशों के अनुसार संशोधन नहीं किए जाते तो यह अदालत की अवमानना माना जाएगा।
न्यायाधीश दीपक गुप्ता व न्यायाधीश राजीव शर्मा की खंडपीठ ने कुछ कर्मचारियों द्वारा तबादला आदेशों को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं का एक साथ निपटारा करते हुए उपरोक्त आदेश पारित किए। न्यायालय ने खेद प्रकट करते हुए कहा कि प्रदेश में कर्मचारी राजनीतिक आकाओं के इशारे पर धड़ल्ले से बदले जाते हैं और जिन कर्मचारियों का कोई राजनीतिक या प्रशासनिक आका नहीं है, को बेवजह प्रताडि़त किया जाता है। कुछ कर्मचारी दुर्गम क्षेत्रों में फंसे रहते हैं तो कुछ पूरा सेवाकाल शहरों में ही निकाल देते हैं।
मंत्रियों, विधायकों व राजनीतिक लोगों द्वारा तबादला आदेशों में दखल को बेवजह व नाजायज ठहराते हुए न्यायालय ने कहा कि यदि किसी नेता की किसी कर्मचारी की सेवाओं से शिकायत है तो वह इसकी शिकायत कर सकताहै परंतु संबंधित कर्मचारी का तबादला शिकायत की जांच के बाद ही सही पाए जाने पर किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने अपने आदेशों में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सरकार तबादला नीति में संशोधन करे और विभिन्न स्टेशनों को अलग-अलग दर्ज श्रेणियों के हिसाब से बांटे।
सरकार को 4 या 5 श्रेणियों में विभिन्न स्टेशनों को बांटने के आदेश देते हुए कहा गया है कि सरकार शिमला, धर्मशाला व मंडी जैसे शहरों को ‘ए’ श्रेणी में रखे और डोडरा क्वार, काजा जैसी जगहों को ‘डी’ या ‘ई’ श्रेणी में रखे। ‘ए’ श्रेणी से शुरूआत करते हुए कर्मचारी को सभी श्रेणी की जगहों में बदला जाए और ‘ए’ श्रेणी की जगहों में कर्मचारी केवल एक बार ही अपनी सेवाएं दे।
इन सेवा शर्तों में केवल अति संवेदन मामलों में ही छूट दी जाए और इस बारे में विस्तृत आदेश पारित किए जाएं। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि चुने गए प्रतिनिधियों का कोई हक नहीं बनता कि कोई कर्मचारी उसकी इच्छा की जगह में सेवाएं दे। यह इच्छा केवल प्रशासनिक मुखिया की होती है। प्रशासनिक मुखिया प्रतिनिधियों की ऐसी मांगें वापस लौटाने के लिए स्वतंत्र है। माना जा रहा है कि इस आदेश से कर्मचारियों को राजनैतिक कोप भाजन से बड़ी राहत मिलेगी और नेताओं का राजकीय सेवा में अनुचित दखल समाप्त हो सकेगा|



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Mani Ram Sharma

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नागरिक को सूचना उसकी भाषा में दी जनि चाहिए
« Reply #12 on: March 10, 2013, 10:31:22 AM »
उतराखण्ड उच्च न्यायालय ने राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष  आयोग बनाम उतराखण्ड राज्य सूचना आयोग के निर्णय दिनांक 27/03/10 में कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का मौलिक सिद्धान्त है कि सूचना जैसा कि अधिनियम में परिभाषित है  नागरिकों को सूचना बिना बाधा या नौकरशाही के व्यवधान के दी जानी चाहिए। अधिनियम इसके उद्देश्य तथा कारणों में कहता है कि यह नागरिकों को सूचना के अधिकार के व्यावहारिक शासन देने के लिए अधिनियमित किया गया है। यहां तक कि आज भी यह भ्रान्त धारणा है कि सूचना नागरिकों द्वारा मांगने पर ही दी जाती है। मामला यह नहीं है अधिकांश  सूचनाएं लोक प्राधिकारी द्वारा स्वप्रेरणा से धारा 4 के अन्तर्गत देनी है तथा इन्टरनेट सहित विभिन्न साधनों से अद्यतन करनी है ताकि सूचना प्राप्ति हेतु इस अधिनियम का प्रयोग न्यूनतम करना पड़े। दूसरे शब्दों में लोक प्राधिकारी को इस प्रकार प्रयास करने चाहिये कि नागरिकों को सूचना उपलब्ध संचार संसाधनों इन्टरनेट सहित से तैयार मिले ताकि उन्हें धारा 6 के अन्तर्गत आवेदन ही न करना पड़े। एक सूचना नागरिक को ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए जिसे वह समझता हो। यह विधायी आदेश  है कि क्षेत्र की स्थानीय भाषा को देखते हुए सूचना प्रसारित की जानी चाहिए। ऐसा ही आदेश  संविधान के अनुच्छेद 350 सहपठित अनुच्छेद 345 में दिया गया है। चूंकि लोक प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश  एक प्रलेख है तथा धारा 2 (आई) एवं 2 (एफ) में सूचना है। इस बात में कोई विवाद नहीं है कि राज्य उपभोक्ता आयोग राज्य का उपकरण है। उन्हें राज्य के समेकित कोष  से वेतन दिया जाता है तथा राज्य सरकार द्वारा उनकी सेवा शर्तें नियत की जाती है। एक लोक प्राधिकारी को नागरिकों को सुगम तरीके से नागरिकों को  सूचनाएं देने में सुविधा देनी चाहिए।
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Mani Ram Sharma

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The Ten General Principles of Public Life
« Reply #13 on: March 10, 2013, 09:50:24 PM »

Selflessness – Public Authority should serve only the public interest and should never improperly confer an advantage or disadvantage on any person.

Honesty and integrity – Public Authority should not place themselves in situations where their honesty and integrity may be questioned, should not behave improperly, and should on all occasions avoid the appearance of such behaviour.

Objectivity – Public Authority should make decisions on merit, including when making appointments, awarding contracts, or recommending individuals for rewards or benefits.

Accountability – Public Authority should be accountable to the public for their actions and the manner in which they carry out their responsibilities, and should co-operate fully and honestly with any scrutiny appropriate to their particular office.

Openness – Public Authority should be as open as possible about their actions and those of their authority, and should be prepared to give reasons for those actions.

Personal judgement – Public Authority may take account of the views of others, including their political groups, but should reach their own conclusions on the issues before them and act in accordance with those conclusions.

Respect for others – Public Authority should promote equality by not discriminating unlawfully against any person, and by treating people with respect, regardless of their race, age, religion, gender, *ual orientation or disability. They should respect the impartiality and integrity of the authority’s statutory officers and its other employees.

Duty to uphold the law – Public Authority should uphold the law and, on all occasions, act in accordance with the trust that the public is entitled to place in them.

Stewardship – Public Authority should do whatever they are able to do to ensure that their authorities use their resources prudently, and in accordance with the law.

Leadership – Public Authority should promote and support these principles by leadership, and by example, and should act in a way that secures or preserves public confidence.
« Last Edit: March 10, 2013, 09:56:06 PM by Mani Ram Sharma »
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बलात्कार की सजा क्या और कैसे ?
« Reply #14 on: March 11, 2013, 06:13:07 PM »
दिल्ली में चलती बस में सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद उबाल खाई और अक्रोशित जनता सडक पर उतर आई है और जगह-जगह जनता भावावेश में आकर बलात्कारियों को मृत्यु दंड देने की मांग कर रही है| ऐसा नहीं है कि बलात्कार के विषय में यह आक्रोश पहली बार उभरा हो| पूर्व में भी इस जघन्य अपराध के विरोध में स्वर उठते रहे हैं किन्तु भावावेश से किसी निर्णायक बिंदु पर नहीं पहुंचा जा सकता है| दिल्ली हमारी राजनीति का केंद्र है और यहाँ हर गली में नेता बसते हैं| उल्लेखनीय है कि जिस दिल्ली की सड़कों पर घटना के बाद लाखों की तादाद में लोग उतरे उसी दिल्ली की सडक पर पीडिता दो घंटे तक खून से लथपथ हालत में पड़ी रही और पुलिस सहित  किसी भी राहगीर ने उसकी कोई सुध तक नहीं ली| समाज सेवा के नाम पर राजनीति करने वालों की संख्या यदि इसमें जोड़ दी जाये तो यह एक बहुत बड़ी जनसँख्या हो जायेगी| स्मरण रहे कि इस प्रकार की घटनाओं पर राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए पहले भी मृत्यु दंड के प्रावधान की मांग उठी थी किन्तु स्वयं महिला संगठनों ने ही इस प्रावधान का विरोध किया था| महिला संगठनों का यह विचार था कि यदि बलात्कारी को मृत्यु दंड दिया जाने लगा तो पर्याप्त संभव है कि वे पीड़ित महिला से दुष्कर्म के बाद उसकी ह्त्या ही कर देंगे| मानवाधिकारों की रक्षा के चलते आज विश्व में मृत्यु दंड को समाप्त करने की मांग उठ रही है और कई देशों ने अपने कानून में से मृत्यु दंड के प्रावधान को ही समाप्त कर दिया है| भारत में भी उच्चतम न्यायालय का यह विचार है कि मृत्यु दंड की सजा आपवादिक तौर पर और बिरले से बिरले मामलों में ही दी जाये| यहाँ तक कि सामूहिक हत्याओं के मामले में भी मृत्यु दंड नहीं दिया जाता बल्कि मृत्यु दंड तो उन बिरले मामलों में ही दिया जाता है जहां मृत्यु अत्यंत नृशंस तरीके से कारित की गयी हो| ऐसी स्थिति में यदि कानून की किताब में सैद्धांतिक तौर पर मृत्यु दंड का प्रावधान कर दिया गया तो भी वह उक्त कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा और वास्तव में मृत्यु दंड किसी बलात्कारी को मिल पायेगा यह संदेहास्पद है| जहां पीड़ित महिला की ह्त्या ही कर दी गयी हो वहाँ तो स्पष्ट प्रमाण के अभाव में यह और कठिन हो जाएगा| कारावास का उद्देश्य दोषी में सुधार करना होता है जबकि मृत्यु दंड तब दिया जाता है जब उसमें सुधार की संभावनाएं समाप्त हो गयी हों| सजा देने हेतु न्यायालय के लिए मात्र अपराध की प्रकृति ही पर्याप्त नहीं है अपितु पीड़ित व अभियुक्त दोनों का पूर्ववर्ती चरित्र, अभियुक्त की उम्र, पश्चाताप आदि के साथ साथ साक्ष्य की प्रकृति भी विचारणीय होती है| 

हाल ही के वर्षों में देश के बलात्कार कानून में संशोधन किये गए हैं और आज इस अपराध के लिए अधिकतम सजा आजीवन कठोर कारावास व न्यूनतम सजा सात वर्ष है| मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से सोचा जाये तो यह प्रावधान अपराध की रोकथाम के लिये पर्याप्त और उचित है यदि देश के पास वास्तव में कठोर कारावास के लिए व्यवस्था हो| क्योंकि कठोर कारावास में दोषी जीवन भर पीड़ित होता जबकि मृत्यु दंड में तो उसे क्षणिक पीड़ा ही होती है और उसकी मृत्यु का दुष्परिणाम, बिना किसी अपराध के, उसका परिवार जीवन भर के लिए भुगतता है| उच्चतम न्यायालय ने भी एडिगा बनाम आंध्र प्रदेश (1974 AIR 799) में कहा है कि देरी से दिए गए मृत्यु दंड की बजाय शीघ्र दिया गया आजीवन कारावास अधिक प्रभावी है|
 दूसरी ओर हम आये दिन सुनते हैं कि सरकारी जेल में प्रभावशाली लोगों को सभी सुविधाएं मुहैय्या करवाई जाती हैं तथा पेशेवर व खूंखार अपराधी जेल से ही अपराध जगत का संचालन करते हैं और चुनावों में जीतकर ये कानून तोडने वाले ही कानून बनाने वाले बन जाते हैं| यह भी सुना जाता है कि देश की जेलों में प्रभावशाली लोगों के स्थान पर अन्य (प्रोक्सी) जेल की सजा काटते हैं और वास्तविक दोषी बाहर स्वतंत्र विचरण करते रहते हैं| देश की सभी जेलों के हालत लगभग एक जैसे ही हैं अलबता जहां जेल प्रशासन अधिक सख्त दिखाई देता है वहाँ इस सख्ती को नरम बनाने के लिए अतिरिक्त कीमत अदा करनी पड़ सकती है| अत: ऐसी स्थिति में देश में प्रभावशाली लोगों के लिए तो कोई सजा है ही नहीं और जो अपने गरिमामयी गुजर बसर की व्यवस्था भी ठीक से करने में असमर्थ हैं उनके लिए सामान्य जीवन भी एक सजा बन जाता है| जबकि आज अमेरिका, इंग्लॅण्ड आदि देशों में प्राइवेट जेलें भी सफलता पूर्वक कार्य कर रही हैं| एक अन्य विचारणीय पहलू यह भी है कि भारत में आजीवन कारावास की प्रभावी अवधि प्राय: 14 वर्ष ही होती है व विभिन्न अपराधों के लिए भी दोषी पाए जाने पर किसी एक अपराध के लिए जो अधिकतम दंड निधारित हो वही दिया जाता है और सभी सजाएं एक साथ चलती हैं| जबकि अमेरिका में आजीवन कारावास की अवधि 30 वर्ष है और भिन्न– भिन्न अपराधों की सजाएं अलग अलग चलती हैं व इनकी सम्मिलित अवधि आजीवन कारावास से भी अधिक हो सकती है|
मृत्यु दंड की सजा के पहलू का दूसरा भाग यह है कि निचले स्तर के मजिस्ट्रेट न्यायालयों में तो पैरवी हेतु अभियोजन सञ्चालन के लिए पूर्णकालिक स्थायी सहायक लोक अभियोजक नियुक्त होते हैं किन्तु सत्र न्यायालय, जहां बलात्कार के मामलों की सुनवाई होती है, में अभियोजन के सञ्चालन के लिए मात्र अंशकालिक और अस्थायी लोक अभियोजक नियुक्त किये जाते हैं| इन लोक अभियोजकों को नाम मात्र का पारिश्रमिक देकर उन्हें अपनी आजीविका के लिए अन्य साधनों से गुजारा करने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है| वर्तमान में लोक अभियोजकों को लगभग सात हजार रुपये मासिक पारिश्रमिक दिया जा रहा है जबकि सहायक लोक अभियोजकों को पूर्ण वेतन लगभग तीस हजार रुपये दिया जा रहा है| यह अनुमान लगाना सहज है कि बलात्कार के मामलों में पैरवी कितनी ईमानदारी और निष्ठा से होती है| दंड का प्रावधान जितना कड़ा होगा, पुलिस और अभियोजन को अभियुक्त के साथ मोलभाव करने का उतना ही अच्छा अवसर उपलब्ध होगा और दोषी के दण्डित होने के अवसर घटते जायेंगे ऐसी संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता| देश की पुलिस ही वास्तव में सबसे बड़ी राजनेता और मनोवैज्ञानिक है| सरकार के दोनों पक्षों को खुश रखते हुए वह दोहन चालू रखती है| अक्सर संसाधनों की कमी बताने वाली पुलिस पहले पीड़ित पक्ष को सहायता की दिलाशा दिखाकर साक्ष्य जुटाएगी व शोषण करेगी और बाद में अभियुक्त को उन्हीं साक्ष्यों की गंभीरता बताकर अपना काम करेगी, साक्ष्य गायब कर देगी| किन्तु परिवादी के प्रभावशाली होने पर यही पुलिस हवाई जहाज से दौडती हुई अपराधी का पीछा करती है|  चिकित्सकीय प्रमाण का भ्रष्ट दांवपेच अलग रह जाता है|

राजस्थान में कुछ विदेशी महिलाओं के साथ हुए दुष्कर्म के मामलों में दोषी लोगों को कुछ घंटों अथवा कुछ दिनों में ही दण्डित कर दिया गया था| पद ग्रहण करते समय न्यायाधीश शपथ लेते हैं कि वे राग, द्वेष व भयमुक्त होकर कार्य करेंगे| न्यायाधीश ऐसी धातु से बने होने चाहिए जो किसी भी तापमान पर नहीं पिघले| किन्तु आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व एक छोटे स्तर की सरकारी कर्मचारी भंवरी देवी ने बाल विवाह की रिपोर्ट की और फिर भी बाल विवाह संपन्न हो गया| बदले की आग से धधकते विरोधी लोगों ने उसके पति के सामने ही भंवरी देवी से सामूहिक बलात्कार किया और सत्र न्यायाधीश ने यह कहते हुए सभी बलात्कारियों को मुक्त कर दिया कि सामान्यतया बलात्कार किशोरों द्वारा किया जाता है और चूँकि अभियुक्त मध्यम उम्र के हैं इसलिए उन्होंने बलात्कार नहीं किया होगा| इतना ही नहीं न्यायाधीश ने आगे लिखा कि एक ऊँची जाति का व्यक्ति नीची जाति की औरत से बलात्कार कर अपने आपको अपवित्र नहीं कर सकता| महिला आई ए एस अधिकारी बजाज के साथ हुए यौन शोषण के मामले में काफी संघर्ष के बाद भी अभियुक्त पुलिस अधिकारी को मात्र अर्थ दंड से ही दण्डित किया गया| न्यायालयों में सामान्यतया समय पर निर्णय नहीं होते और मामले पुराने होने पर ऊपर से दबाव बढ़ने पर आनन फानन में ताबडतोड निर्णय देते हैं जिसमें निर्णय की गुणवता भेंट चढ जाती है| लगभग 15 वर्ष पूर्व बीकानेर में अपने कनिष्ठ पुलिस अधिकारी की पत्नि के साथ अशोभनीय व्यवहार के लिए हाल ही में अभियुक्त पुलिस अधिकारी पर भी जुर्माना ही लगाया गया है, उसे किसी प्रकार के कारावास की सजा नहीं दी गयी है| इसी भारत भूमि पर महाभारत काल में द्रोपदी के शीलहरण पर दुर्योधन की जंघा तोड़ी गयी थी और दुशासन की छाती के लहू से वेणी-संहार किया गया था| जेब कतरने से अपराध जगत में कदम रखने वाला एक अपराधी ही दण्डित नहीं होने पर आगे चलकर क्रमशः निस्संकोच चोर, ठग और डाकू बनता है| जिस व्यक्ति को यौन शोषण के लिए कोई कारावास की सजा नहीं दी जाये वह बलात्कार का दुस्साहसपूर्ण कदम उठा सकता है| उक्त मामलों में न्यायाधीशों ने अपनी शपथ, यदि उसका कोई मूल्य हो तो, किस प्रकार निर्वाह किया है, समझ से परे है| इस प्रकार देश का तथा कथित सम्पूर्ण लोकतान्त्रिक ढांचा पीड़ित व्यक्ति के अनुकूल नहीं है| जैसा कि एक बार पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन ने कहा था कि प्रजातंत्र के चार स्तंभ होते हैं और भारत में उनमें से साढ़े तीन स्तम्भ क्षतिग्रस्त हो चुके हैं| अत: देश की विद्यमान व्यवस्था में आम आदमी के लिए न्याय पीड़ादायी और कठिन मार्ग है| जब तक पीड़ित को न्याय नहीं मिले न्याय हेतु किया गया सारा सार्वजानिक खर्च राष्ट्रीय अपव्यय है और पीड़ित के दृष्टिकोण से न्यायतंत्र एक भुलावा मात्र है|दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 में सरकार को किसी भी आरोप को न्यायालय की अनुमति से वापिस लेने का अधिकार है और वोट बैंक की राजनीति में न्यायालयों की कृपा से यह विशेषाधिकार  आतंकवादियों तक को छोड़ने में प्रयोग हो रहा है|  यदि आम आदमी के लिए न्याय सुनिश्चित करना हो तो देश के संविधान, विधायिका, कानून, न्याय एवं पुलिस सभी औपनिवेशिक प्रणालियों का पूर्ण शुद्धिकरण करना होगा तथा सस्ती लोकप्रियता व तुष्टिकरण मूलक नीतियों का परित्याग करना होगा|
दक्षिण अफ्रिका में न्यायालयों की कार्यवाही का सही और सच्चा रिकार्ड रखने के लिए 1960 से ही ओडियो रिकार्डिंग की जाती है और भारत में न्यायालय अपनी कार्यवाही का सही और सच्चा रिकार्ड रखने से परहेज करना चाहते हैं| यदि कोई पक्षकार किसी इलेक्ट्रोनिक साधन से न्यायिक कार्यवाही का रिकार्ड रखे तो बड़ी ही तत्परता से उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ बताकर हिरासत में भेज दिया जाता है और उस पर न्यायिक अवमान का मुकदमा अलग से ठोक दिया जाता है| देश में दर्ज आपराधिक मामलों में सजा दो प्रतिशत से भी कम में ही हो पाती है और बलात्कार के मामलों में भी यह मात्र 26 प्रतिशत है अत: किसी कागजी प्रावधान से कोई उद्देश्य पूर्ति नहीं होगी अपितु न्यायतंत्र से जुड़े सभी जन सेवकों को संवेदनशील व जनता के प्रति जिम्मेदार बनाना पहली आवश्यकता है| भारत में जैसे जैसे सरकारी अधिकारियों का अनुभव और पद की ऊँचाई बढती जाती है उसी अनुपात में उनमें स्वछंदता परिपक्वता होती जाती है|  विद्यमान व्यवस्था में यदि बलात्कारी को मृत्युदंड का प्रावधान कर भी दिया गया तो उसको मृत्यु दंड दिलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य कौन जुटाएगा, कौन कीमत चुकायेगा व कौन मृत्यु दंड देगा – एक रहस्यमय प्रश्न है |

 
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« Last Edit: March 13, 2013, 08:08:15 AM by Mani Ram Sharma »
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