Author Topic: Articles By Rajendra Joshi - वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र जोशी जी के लेख  (Read 10840 times)


Rajendra Joshi

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उत्तराखण्ड में भाजपा चली कांग्रेस की राह
राजेन्द्र जोशी
देहरादून : प्रदेश में काबिज पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के शासनकाल के दौरान बांटी गई लाल बत्तियों के विरोध के बूते सत्ता हासिल करने वाली भाजपा सरकार भी अब उसी राह पर चल निकली है। यही कारण है भाजपा सरकार द्वारा प्रदेश के 23 पदों को आफिस आफ प्रोफिट की श्रेणी से बाहर करने को इसी रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है कि अब भाजपा सरकार भी अपने प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ ही कुछ विधायकों को लाल बत्ती से नवाजने जा रही है यह वही भाजपा है जिसने विधानसभा चुनाव में लालबत्ती को मुद्दा बनाया था और इस समेत कई अन्य मुद्दों के साथ ही वह कांग्रेस के सामने खड़ी थी, और कांग्रेस से सत्ता छीनने में कामयाब हुई थी।
 उल्लेखनीय है कि प्रदेश में काबिज भाजपा बीते विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस सरकार द्वारा बेतहाशा लालबत्तियों के आवंटन, मुख्यमंत्री राहत कोष के आवंटन के साथ ही फिजूल खर्ची सहित उद्योगपतियों को रियायतें दिये जाने को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई थी। इतना ही नहीं भाजपा ने कांग्रेस द्वारा गार्डनर को विधानसभा में एंग्लो इंडियन सदस्य के रूप में नामित किये जाने को भी मुद्दा बनाया था और वह इसके खिलाफ राज्यपाल से लेकर उच्च न्यायालय तथा चुनाव आयोग  तक में गयी थी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह साफ दिखाई देने लगा है कि भाजपा सरकार भी उसी कांग्रेसी सरकार के पद चिन्हों पर चलती नजर आ रही है। बीते दिन भाजपा सरकार ने जहां अपने कार्यकर्ताओं तथा विधायकों में सरकार के प्रति उठ रहे विरोध के स्वरों को दबाने के लिए प्रदेश के तमाम विभागों के 23 पदों को आफिस आफ प्रोफिट के दायरे से बाहर कर उन्हे इन पदों पर एडजस्ट करने की कवायद शुरू कर दी है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अगले कुछ दिनों में कई भाजपाईयों को इन पदों पर बैठा दिया जाएगा इसके लिए भाजपा संगठन ने सूची बनानी शुरू कर दी है कि किस कार्यकर्ता को किस पद पर एडजस्ट किया जायेगा। ईधर भाजपा सूत्रों का कहना है कि सरकार इन्हे केवल दायित्वधारी तक ही सीमित करना चाहती है तथा इन पदों पर काबिज कार्यकर्ताओं को मानदेय भी दिया जाएगा।
  दायित्वों से नवाजे जाने के मामले पर नेता प्रतिपक्ष डा0 हरक सिंह रावत का कहना है कि तिवारी सरकार ने तो सरकार के तीन साल बाद अपने कार्यकर्ताओं को दायित्वधारी बनाया जबकि भाजपा ने मात्र 20 महीने में ही अपने कार्यकर्ताओं को दायित्वों से नवाजने की तैयारी कर दी है। उनका कहना है कि नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली भाजपा को भी यही सब करना था तो उसने कांग्रेस की आलोचना क्यों की थी और प्रदेश की जनता को क्यों झूठे सपने दिखाये थे। मामले में डा0 हरक सिंह रावत का साफ कहना है कि मुख्यमंत्री अपने खिलाफ उपजे असंतोष को दबाने के लिए यह सब कर रहे हैं।
   उन्होने कहा कि पूर्व कांग्रेस सरकार ने लालबत्ती से नवाजे गये दायित्वधारियों को केवल बैठक में जाने के दौरान ही टैक्सी किराया व मामूली रकम को मानदेय के रूप में देने की ही अनुमति दी थी लेकिन कांग्रेस सरकार पर फिजूलखर्ची का आरोप लगाने वाली भाजपा ने अब इससे आगे बढक़र अपने कार्यकर्ताओं को दायित्वों के साथ ही मानदेय में कई गुना बढ़ोत्तरी कर इसे साढ़े आठ हजार से दस हजार रूपये तथा असीमित यात्रा व्यय तक देने के आदेश दिये हैं। उन्होने कहा जहां तक कांग्रेस शासनकाल में मुख्यमंत्री राहत कोष की बंदरबांट का मामला भाजपा द्वारा उठाया गया और इसे चुनावी मुद्दा तक बनाया गया लेकिन स्थिति इसके एकदम उलट है। प्रदेश सरकार ने जिस आरएसएस के व्यक्ति को इसे बांटने का जिम्मा सौंपा है उसकी पौ बारह हो गयी है। अंधा बांटे रेवड़ी अपने-अपने को देय की कहावत यहां चरितार्थ हो रही है प्रदेश मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष का जमकर दुरपयोग किये जाने की शिकायतें आम हो गयी है। इस मामले पर कांग्रेस के नेता व नेता प्रतिपक्ष डा0 हरक सिंह रावत का तो साफ कहना है कि तिवारी जी के शासनकाल में उन पर उंगली उठाने वाली भाजपा तो उससे आगे चल निकली है। उनका कहना है कि कांगे्रस शासनकाल में मुख्यमंत्री राहत कोष का लाभ प्रदेश के हर उस जरूरतमंद व्यक्ति को मिला जिसको जरूरत थी लेकिन वर्तमान सरकार ने इसे आरएसएस कोष बनाकर रख दिया है और जिस जरूरतमंद व्यक्ति को विवेकाधीन कोष से आर्थिक सहायता की जरूरत है उसे धक्के खाने पड़ रहे हैं। कांगे्रसी नेता का कहना है कि मितव्ययता की बात करने वाली भाजपा सरकारी संसाधनों का जमकर दुरपयोग कर रही है। मंत्रिमंडल की बैठक में कोरम पूरा करने के लिए बीमार मंत्रियों को हैलीकाप्टर से लाया जा रहा है। सरकार संवेदनहीन हो चुकी है इसका उदाहरण यह है कि बीते दिनों हुई बस दुर्घटनाओं में घायलों को यदि हैलीकाप्टर से पहाड़ी क्षेत्रों से अस्पतालों तक पहुंचाया जाता तो कई घायल बच सकते थे लेकिन सरकार के पास उनके लिए समय नहीं है। मुख्यमंत्री केवल हवाई जहाज अथवा हैलीकाप्टर से यात्रा कर रहे हैं। दुर्घटनाओं के बाद अस्पतालों में जीवन मौत से जूझ रहे घायलों को देखने का वक्त न तो मुख्यमंत्री के पास है और न उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों के पास।
 
     


Rajendra Joshi

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आठ साल वही सवाल
राजेन्द्र जोशी
उत्तराखंड देश का एक ऐसा राज्य है जहां प्रकृति ने अपना पूरा खजाना लूटा रखा है, यहां प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं, यहां के रमणीक स्थल स्वीटजरलैंण्ड से कम नहीं, यहां के लोगों में वो जीवटता है जो किसी में नहीं, यहां के लोगों में वह वीरता है जो कहीं नहीं, यहां के लोगों में देष के लिए मर मिटने का जज्बा है लेकिन फिर भी यह राज्य क्यों विकास में पीछे है इसका मूल्याकंन आपको ही करना होगा कि आखिर वह कौन सी वजह है जो यह प्रदेष इन आठ सालों में वह तरक्की नहीं कर पाया जो इसे करनी चाहिए थी
   भारतीय गण राज्य के राजनैतिक मानचित्र पर नौ नवम्बर 2000 की मध्यरात्री से अस्तित्व में आये देश के 27 वें राज्य के रूप में स्थान पाने वाला यह पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड पूरे आठ साल का हो गया है, और आम आदमी को बिजली, पीने का पानी और जीवन की गाड़ी ढोने के लिये अब भी सडक़ों का इन्तजार है। डाक्टर और शिक्षकों का रोना तो आम पहाड़ी लोग अब भी रो रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या अब भी रोजगार की है जिसकी तलाष में यहां के बेरोजगारों का पलायन रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की किरण न पहुंच पाने के कारण पिछले 10 सालों में 12लाख से ज्यादा परिवारों ने प्रदेश के तराई वाले क्षेत्रों की ओर रूख किया है। जिससे पर्वतीय क्षेत्र की जनसंख्या कम हुई है। उत्तराखण्ड राज्य के गठन के समय 10 करा़ेड के ओवर ड्राफ्ट के साथ इस राज्य का सरकारी कामकाज शुरू हुआ था और आज इसका नान प्लान का बजट ही छह हजार करोड़ के बराबर है। इसी तरह राज्य की सालाना योजना उस समय हजार करोड़ से कम थी जोकि आज 4778 करोड़ तक पहुंच गयी है। यही नहीं राज्य ने कई क्षेत्रों में पुराने और स्थापित राज्यों को भी पीछे धकेलने में सफलता हासिल की है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस नये राज्य की जिस तरह से बुनियाद रखी गयी थी उस हिसाब से यह चल नहीं रहा है। पिछले दो सालोंं में तो विकास में ठहराव सा आ गया। राज्य सरकार के अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की संख्या 623790 तक पहुंच गयी है राज्य गठन के समय यह संख्या तीन लाख 75 हजार के करीब थी। उत्तराखण्ड की 3805 बस्तियां घोर पेयजल संकट से तथा 12247 बस्तियां आंशिक पेयजल संकट से जूझ रही हैं। प्रदेश की लगभग समूची और खास कर ग्रामीण, गरीब और पहाड़ी आबादी पूरी तरह सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर निर्भर है और सरकार 50 फीसदी अस्पतालों में डाक्टर नहीं करा पा रही है। राज्य के गठन से पहले भी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या स्कूलों में शिक्षकों और अस्पतालों में डाक्टरों के अभाव की रही है। राज्य गठन के आठ साल बाद भी इस पहाड़ी राज्य में निरक्षरों की संंख्या कुल 84 लाख की आबादी में से 3383567 है। इसी तरह बेरोजगारों की संख्या सात लाख तक चली गयी है। राज्य सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आने के बाद भी उत्तराखण्ड के कई गांवों के लोगों को एक गगरी पानी के लिये पांच किलोमीटर से भी दूर जाना पड़ता है। इसी तरह 239 गांवों के बच्चों को जूनियर हाई स्कूल में पढऩे के लिये पांच कि.मी. से दूर जाना पड़ता है। सरकारी रिकार्ड के अनुसार 2470 गांवों से सीनियर बेसिक स्कूल बालक, 7432 गांवों को सीनियर स्कूल बालिका 3695 गावों के लिये हायर सेकेण्डरी स्कूल पांच कि.मी से दूर है। इसी तरह 8716 गांवों के लिये ऐलोपैथिक अस्पताल भी पांच कि.मी. से दूर हैं। 2229 गांव ऐसे हैं जो कि पक्की सडक़ों से दूर हैं और उनमें बहतरा जैसे दर्जनों गांव हैं जो सडक़ से 30 कि.मी. से अधिक दूर हैं। 2646 गांवों के लिये बस स्टाप अब भी पांच कि.मी दूर से दूर हंै। रेलवे स्टेशन तो 15069 गांवों की पहुंच से दूर हैं। दशकों के संघर्ष के बाद नौ नवम्बर सन् 2000 को अस्तित्व में आने वाले उत्तराखण्ड राज्य ने आठ सालों में चार मुख्यमंत्री देखने के साथ ही कई राजनीतिक उतार चढ़ाव भी देख लिये। इन गुजरे वर्षों में शायद ही कोई ऐसा महीना रहा हो जब मुख्यमंत्री बदलने या सत्ताधारी दलों में उथल पुथल की चर्चाएं गर्म नहीं रही हों। इस तरह की राजनीतिक अस्थिरता के कारण इस राज्य में विकास की गाड़ी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाई। यहां तक कि नारायण दत्त तिवारी जैसा देश का सर्वाधिक अनुभवी राजनेता भी काफी कुछ करने के बाद भी उतना तो नहीं कर पाया जितना वह सोच कर उत्तराखण्ड आये थे। उत्तराखण्ड में मार्च 2007 से सत्ता परिवर्तन के साथ ही विकास का पहिया तो लगभग ठहर सा गया है। खुद मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने स्वीकारा है कि इन दो सालों के दौरान पांच चुनाव आ जाने से बार-बार चुनावी आचार संहिता लगती रही और विकास अवरुद्ध होता रहा। इन दो सालों में प्रदेश में एक भी उद्योग नहीं लगा। इसके विपरीत टाटा की महत्वाकांक्षी परियोजना नैनो प्रदेश के हाथ आते- आते सरकार की लापरवाही से गुजरात चली गयी। इन दो सालों में कोई नया उद्योग तो इस प्रदेश में लगा नहीं परन्तु भाष्कर इनर्जी और हौण्डा जैसे उद्योग लाल फीताशाही के चलते यहां से खिसक गये। पंडित नारायण दत्त तिवारी ने इसे उर्जा राज्य बनाने की घोषणा की थी और उनके कार्यकाल में कई बिजली परियोजनाओं पर काम भी शुरू हुआ मनेरी भाली उन्होंने ही शुरू की थी। लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में नयी परियोजनाऐं तो शुरू हुयी नहीं मगर दो बड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाऐं अवश्य स्थगित हो गयीं। बीस सूत्रीय कार्यक्रम गरीबी उन्मूलन और समाज के आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान के लिये शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम की प्रगति से ही पता चलता है कि किस राज्य में आम लोगों की भलाई के लिये क्या हो रहा है। तिवारी के शासन में उत्तराखण्ड देश में लगातार चार बार पहले स्थान पर रहा और अब यह प्रदेश और नीचे सातवें स्थान पर जा पहुंचा है। गांवों में सडक़, बिजली, और पानी जैसी मलभूत सुविधाओं के लिये भी काम ठप्प पड़े हैं। इसी लिये कई लोगों का मानना है कि प्रदेश की सत्ता लखनऊ से कुछ नेताओं और अधिकारियों की मौज के लिये ही देहरादून पहुंची है और आम आदमी की हालत जस की तस है। प्रदेश में विधायकों के 70 पद पहले से ही थे एक पद मनोनयन का फिजूल में ही बढ़ गया। इसके बाद 12 पद मंत्रियों के और जिन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सका उनके लिये पिछले दरवाजे से सैकड़ों पद बना दिये। यह बात दीगर है कि आम आदमी के बेटे बेटी के लिये छोटी सी भी नौकरी नहीं है। यही कारण है कि रोजगार की तलाश में आज भी पहाड़ का युवा मैदानी इलाकों की ओर रूख कर रहा है। और तो और पर्वतीय क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में वहां जीवन बसर कर रहे ऐसे लोग जो अब कहीं जाकर रहने की स्थिति में आ चुके हैं वे भी इन पर्वतीय इलाकों को छोडक़र मैदान की ओर रूख करने लगे हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव इस पहाड़ी क्षेत्र पर पड़ रहा है। राजनैतिक दृष्टिï से भी इस क्षेत्र का नुकसान ही हुआ है। यहां जनसंख्या कम होने के कारण विधानसभा सीटें घटी हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव यहां के विकास कार्यों पर पड़ेगा। क्योंकि विधानसभाओं के कम होने से यहां के विकास कार्यों पर खर्च होने वाली विधायक निधि भी अन्य स्थानों पर खर्च होगी।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मै जोशी जी के विचारों के पूरी दंग से सहमत हूँ.


आठ साल वही सवाल
राजेन्द्र जोशी
उत्तराखंड देश का एक ऐसा राज्य है जहां प्रकृति ने अपना पूरा खजाना लूटा रखा है, यहां प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं, यहां के रमणीक स्थल स्वीटजरलैंण्ड से कम नहीं, यहां के लोगों में वो जीवटता है जो किसी में नहीं, यहां के लोगों में वह वीरता है जो कहीं नहीं, यहां के लोगों में देष के लिए मर मिटने का जज्बा है लेकिन फिर भी यह राज्य क्यों विकास में पीछे है इसका मूल्याकंन आपको ही करना होगा कि आखिर वह कौन सी वजह है जो यह प्रदेष इन आठ सालों में वह तरक्की नहीं कर पाया जो इसे करनी चाहिए थी
   भारतीय गण राज्य के राजनैतिक मानचित्र पर नौ नवम्बर 2000 की मध्यरात्री से अस्तित्व में आये देश के 27 वें राज्य के रूप में स्थान पाने वाला यह पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड पूरे आठ साल का हो गया है, और आम आदमी को बिजली, पीने का पानी और जीवन की गाड़ी ढोने के लिये अब भी सडक़ों का इन्तजार है। डाक्टर और शिक्षकों का रोना तो आम पहाड़ी लोग अब भी रो रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या अब भी रोजगार की है जिसकी तलाष में यहां के बेरोजगारों का पलायन रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की किरण न पहुंच पाने के कारण पिछले 10 सालों में 12लाख से ज्यादा परिवारों ने प्रदेश के तराई वाले क्षेत्रों की ओर रूख किया है। जिससे पर्वतीय क्षेत्र की जनसंख्या कम हुई है। उत्तराखण्ड राज्य के गठन के समय 10 करा़ेड के ओवर ड्राफ्ट के साथ इस राज्य का सरकारी कामकाज शुरू हुआ था और आज इसका नान प्लान का बजट ही छह हजार करोड़ के बराबर है। इसी तरह राज्य की सालाना योजना उस समय हजार करोड़ से कम थी जोकि आज 4778 करोड़ तक पहुंच गयी है। यही नहीं राज्य ने कई क्षेत्रों में पुराने और स्थापित राज्यों को भी पीछे धकेलने में सफलता हासिल की है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस नये राज्य की जिस तरह से बुनियाद रखी गयी थी उस हिसाब से यह चल नहीं रहा है। पिछले दो सालोंं में तो विकास में ठहराव सा आ गया। राज्य सरकार के अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की संख्या 623790 तक पहुंच गयी है राज्य गठन के समय यह संख्या तीन लाख 75 हजार के करीब थी। उत्तराखण्ड की 3805 बस्तियां घोर पेयजल संकट से तथा 12247 बस्तियां आंशिक पेयजल संकट से जूझ रही हैं। प्रदेश की लगभग समूची और खास कर ग्रामीण, गरीब और पहाड़ी आबादी पूरी तरह सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर निर्भर है और सरकार 50 फीसदी अस्पतालों में डाक्टर नहीं करा पा रही है। राज्य के गठन से पहले भी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या स्कूलों में शिक्षकों और अस्पतालों में डाक्टरों के अभाव की रही है। राज्य गठन के आठ साल बाद भी इस पहाड़ी राज्य में निरक्षरों की संंख्या कुल 84 लाख की आबादी में से 3383567 है। इसी तरह बेरोजगारों की संख्या सात लाख तक चली गयी है। राज्य सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आने के बाद भी उत्तराखण्ड के कई गांवों के लोगों को एक गगरी पानी के लिये पांच किलोमीटर से भी दूर जाना पड़ता है। इसी तरह 239 गांवों के बच्चों को जूनियर हाई स्कूल में पढऩे के लिये पांच कि.मी. से दूर जाना पड़ता है। सरकारी रिकार्ड के अनुसार 2470 गांवों से सीनियर बेसिक स्कूल बालक, 7432 गांवों को सीनियर स्कूल बालिका 3695 गावों के लिये हायर सेकेण्डरी स्कूल पांच कि.मी से दूर है। इसी तरह 8716 गांवों के लिये ऐलोपैथिक अस्पताल भी पांच कि.मी. से दूर हैं। 2229 गांव ऐसे हैं जो कि पक्की सडक़ों से दूर हैं और उनमें बहतरा जैसे दर्जनों गांव हैं जो सडक़ से 30 कि.मी. से अधिक दूर हैं। 2646 गांवों के लिये बस स्टाप अब भी पांच कि.मी दूर से दूर हंै। रेलवे स्टेशन तो 15069 गांवों की पहुंच से दूर हैं। दशकों के संघर्ष के बाद नौ नवम्बर सन् 2000 को अस्तित्व में आने वाले उत्तराखण्ड राज्य ने आठ सालों में चार मुख्यमंत्री देखने के साथ ही कई राजनीतिक उतार चढ़ाव भी देख लिये। इन गुजरे वर्षों में शायद ही कोई ऐसा महीना रहा हो जब मुख्यमंत्री बदलने या सत्ताधारी दलों में उथल पुथल की चर्चाएं गर्म नहीं रही हों। इस तरह की राजनीतिक 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मगर दो बड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाऐं अवश्य स्थगित हो गयीं। बीस सूत्रीय कार्यक्रम गरीबी उन्मूलन और समाज के आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान के लिये शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम की प्रगति से ही पता चलता है कि किस राज्य में आम लोगों की भलाई के लिये क्या हो रहा है। तिवारी के शासन में उत्तराखण्ड देश में लगातार चार बार पहले स्थान पर रहा और अब यह प्रदेश और नीचे सातवें स्थान पर जा पहुंचा है। गांवों में सडक़, बिजली, और पानी जैसी मलभूत सुविधाओं के लिये भी काम ठप्प पड़े हैं। इसी लिये कई लोगों का मानना है कि प्रदेश की सत्ता लखनऊ से कुछ नेताओं और अधिकारियों की मौज के लिये ही देहरादून पहुंची है और आम आदमी की हालत जस की तस है। प्रदेश में विधायकों के 70 पद पहले से ही थे एक पद मनोनयन का फिजूल में ही बढ़ गया। इसके बाद 12 पद मंत्रियों के और जिन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सका उनके लिये पिछले दरवाजे से सैकड़ों पद बना दिये। यह बात दीगर है कि आम आदमी के बेटे बेटी के लिये छोटी सी भी नौकरी नहीं है। यही कारण है कि रोजगार की तलाश में आज भी पहाड़ का युवा मैदानी इलाकों की ओर रूख कर रहा है। और तो और पर्वतीय क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में वहां जीवन बसर कर रहे ऐसे लोग जो अब कहीं जाकर रहने की स्थिति में आ चुके हैं वे भी इन पर्वतीय इलाकों को छोडक़र मैदान की ओर रूख करने लगे हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव इस पहाड़ी क्षेत्र पर पड़ रहा है। राजनैतिक दृष्टिï से भी इस क्षेत्र का नुकसान ही हुआ है। यहां जनसंख्या कम होने के कारण विधानसभा सीटें घटी हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव यहां के विकास कार्यों पर पड़ेगा। क्योंकि विधानसभाओं के कम होने से यहां के विकास कार्यों पर खर्च होने वाली विधायक निधि भी अन्य स्थानों पर खर्च होगी।



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From Rajesh JOshi JI.

उत्तराखंडियों को अब भी विकास का इन्तजार
देहरादून से राजेन्द्र जोशी
उत्तराखंड देश का एक ऐसा राज्य है जहां प्रकृति ने अपना पूरा खजाना लूटा रखा है, यहां प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं, यहां के रमणीक स्थल स्वीटजरलैंण्ड से कम नहीं, यहां के लोगों में वो जीवटता है जो किसी में नहीं, यहां के लोगों में वह वीरता है जो कहीं नहीं, यहां के लोगों में देष के लिए मर मिटने का जज्बा है लेकिन फिर भी यह राज्य क्यों विकास में पीछे है इसका मूल्याकंन आपको ही करना होगा कि आखिर वह कौन सी वजह है जो यह प्रदेष इन आठ सालों में वह तरक्की नहीं कर पाया जो इसे करनी चाहिए थी
   भारतीय गण राज्य के राजनैतिक मानचित्र पर नौ नवम्बर 2000 की मध्यरात्री से अस्तित्व में आये देश के 27 वें राज्य के रूप में स्थान पाने वाला यह पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड पूरे आठ साल का हो गया है, और आम आदमी को बिजली, पीने का पानी और जीवन की गाड़ी ढोने के लिये अब भी सडक़ों का इन्तजार है। डाक्टर और शिक्षकों का रोना तो आम पहाड़ी लोग अब भी रो रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या अब भी रोजगार की है जिसकी तलाष में यहां के बेरोजगारों का पलायन रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की किरण न पहुंच पाने के कारण पिछले 10 सालों में 12लाख से ज्यादा परिवारों ने प्रदेश के तराई वाले क्षेत्रों की ओर रूख किया है। जिससे पर्वतीय क्षेत्र की जनसंख्या कम हुई है। उत्तराखण्ड राज्य के गठन के समय 10 करा़ेड के ओवर ड्राफ्ट के साथ इस राज्य का सरकारी कामकाज शुरू हुआ था और आज इसका नान प्लान का बजट ही छह हजार करोड़ के बराबर है। इसी तरह राज्य की सालाना योजना उस समय हजार करोड़ से कम थी जोकि आज 4778 करोड़ तक पहुंच गयी है। यही नहीं राज्य ने कई क्षेत्रों में पुराने और स्थापित राज्यों को भी पीछे धकेलने में सफलता हासिल की है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस नये राज्य की जिस तरह से बुनियाद रखी गयी थी उस हिसाब से यह चल नहीं रहा है। पिछले दो सालोंं में तो विकास में ठहराव सा आ गया। राज्य सरकार के अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की संख्या 623790 तक पहुंच गयी है राज्य गठन के समय यह संख्या तीन लाख 75 हजार के करीब थी। उत्तराखण्ड की 3805 बस्तियां घोर पेयजल संकट से तथा 12247 बस्तियां आंशिक पेयजल संकट से जूझ रही हैं। प्रदेश की लगभग समूची और खास कर ग्रामीण, गरीब और पहाड़ी आबादी पूरी तरह सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर निर्भर है और सरकार 50 फीसदी अस्पतालों में डाक्टर नहीं करा पा रही है। राज्य के गठन से पहले भी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या स्कूलों में शिक्षकों और अस्पतालों में डाक्टरों के अभाव की रही है। राज्य गठन के आठ साल बाद भी इस पहाड़ी राज्य में निरक्षरों की संंख्या कुल 84 लाख की आबादी में से 3383567 है। इसी तरह बेरोजगारों की संख्या सात लाख तक चली गयी है। राज्य सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आने के बाद भी उत्तराखण्ड के कई गांवों के लोगों को एक गगरी पानी के लिये पांच किलोमीटर से भी दूर जाना पड़ता है। इसी तरह 239 गांवों के बच्चों को जूनियर हाई स्कूल में पढऩे के लिये पांच कि.मी. से दूर जाना पड़ता है। सरकारी रिकार्ड के अनुसार 2470 गांवों से सीनियर बेसिक स्कूल बालक, 7432 गांवों को सीनियर स्कूल बालिका 3695 गावों के लिये हायर सेकेण्डरी स्कूल पांच कि.मी से दूर है। इसी तरह 8716 गांवों के लिये ऐलोपैथिक अस्पताल भी पांच कि.मी. से दूर हैं। 2229 गांव ऐसे हैं जो कि पक्की सडक़ों से दूर हैं और उनमें बहतरा जैसे दर्जनों गांव हैं जो सडक़ से 30 कि.मी. से अधिक दूर हैं। 2646 गांवों के लिये बस स्टाप अब भी पांच कि.मी दूर से दूर हंै। रेलवे स्टेशन तो 15069 गांवों की पहुंच से दूर हैं। दशकों के संघर्ष के बाद नौ नवम्बर सन् 2000 को अस्तित्व में आने वाले उत्तराखण्ड राज्य ने आठ सालों में चार मुख्यमंत्री देखने के साथ ही कई राजनीतिक उतार चढ़ाव भी देख लिये। इन गुजरे वर्षों में शायद ही कोई ऐसा महीना रहा हो जब मुख्यमंत्री बदलने या सत्ताधारी दलों में उथल पुथल की चर्चाएं गर्म नहीं रही हों। इस तरह की राजनीतिक अस्थिरता के कारण इस राज्य में विकास की गाड़ी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाई। यहां तक कि नारायण दत्त तिवारी जैसा देश का सर्वाधिक अनुभवी राजनेता भी काफी कुछ करने के बाद भी उतना तो नहीं कर पाया जितना वह सोच कर उत्तराखण्ड आये थे। उत्तराखण्ड में मार्च 2007 से सत्ता परिवर्तन के साथ ही विकास का पहिया तो लगभग ठहर सा गया है। खुद मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने स्वीकारा है कि इन दो सालों के दौरान पांच चुनाव आ जाने से बार-बार चुनावी आचार संहिता लगती रही और विकास अवरुद्ध होता रहा। इन दो सालों में प्रदेश में एक भी उद्योग नहीं लगा। इसके विपरीत टाटा की महत्वाकांक्षी परियोजना नैनो प्रदेश के हाथ आते- आते सरकार की लापरवाही से गुजरात चली गयी। इन दो सालों में कोई नया उद्योग तो इस प्रदेश में लगा नहीं परन्तु भाष्कर इनर्जी और हौण्डा जैसे उद्योग लाल फीताशाही के चलते यहां से खिसक गये। पंडित नारायण दत्त तिवारी ने इसे उर्जा राज्य बनाने की घोषणा की थी और उनके कार्यकाल में कई बिजली परियोजनाओं पर काम भी शुरू हुआ मनेरी भाली उन्होंने ही शुरू की थी। लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में नयी परियोजनाऐं तो शुरू हुयी नहीं मगर दो बड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाऐं अवश्य स्थगित हो गयीं। बीस सूत्रीय कार्यक्रम गरीबी उन्मूलन और समाज के आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान के लिये शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम की प्रगति से ही पता चलता है कि किस राज्य में आम लोगों की भलाई के लिये क्या हो रहा है। तिवारी के शासन में उत्तराखण्ड देश में लगातार चार बार पहले स्थान पर रहा और अब यह प्रदेश और नीचे सातवें स्थान पर जा पहुंचा है। गांवों में सडक़, बिजली, और पानी जैसी मलभूत सुविधाओं के लिये भी काम ठप्प पड़े हैं। इसी लिये कई लोगों का मानना है कि प्रदेश की सत्ता लखनऊ से कुछ नेताओं और अधिकारियों की मौज के लिये ही देहरादून पहुंची है और आम आदमी की हालत जस की तस है। प्रदेश में विधायकों के 70 पद पहले से ही थे एक पद मनोनयन का फिजूल में ही बढ़ गया। इसके बाद 12 पद मंत्रियों के और जिन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सका उनके लिये पिछले दरवाजे से सैकड़ों पद बना दिये। यह बात दीगर है कि आम आदमी के बेटे बेटी के लिये छोटी सी भी नौकरी नहीं है। यही कारण है कि रोजगार की तलाश में आज भी पहाड़ का युवा मैदानी इलाकों की ओर रूख कर रहा है। और तो और पर्वतीय क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में वहां जीवन बसर कर रहे ऐसे लोग जो अब कहीं जाकर रहने की स्थिति में आ चुके हैं वे भी इन पर्वतीय इलाकों को छोडक़र मैदान की ओर रूख करने लगे हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव इस पहाड़ी क्षेत्र पर पड़ रहा है। राजनैतिक दृष्टिï से भी इस क्षेत्र का नुकसान ही हुआ है। यहां जनसंख्या कम होने के कारण विधानसभा सीटें घटी हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव यहां के विकास कार्यों पर पड़ेगा। क्योंकि विधानसभाओं के कम होने से यहां के विकास कार्यों पर खर्च होने वाली विधायक निधि भी अन्य स्थानों पर खर्च होगी।

Rajendra Joshi

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महिलाओं को भूल ही गये सारे राजनैतिक दल
April
5
लोक सभा चुनाव - 2009


Uttrakhandi Womens in Panchayat

राजेन्द्र जोशी
देहरादून । भारतीय इतिहास में महिलाओं का संघर्ष  और योगदान स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है लेकिन साढ़े आठ वर्ष पुराने राज्य उत्तराखण्ड में महिलाओं की भूमिका को तो कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि पृथक राज्य प्राप्ति आंदोलन में मातृशक्ति की अग्रणी भूमिका थी और यह भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इस आन्दोलन में कई महिलाओं ने अपने पिता, पति और पुत्र तक को गंवाया था।
जी हां पहाड़ों से रोजगार के लिए पलायन हर पहाड़ी महिलाओं के लिए नासूर अब भी बना हुआ है। राज्य तो मिल गया और रोजगार के लिए पलायन का दर्द कम नहीं हुआ।  लेकिन ऐसा लगता है कि पहाड़ में मातृशक्ति को आगे बढऩे का कभी मौका ही नहीं मिलेगा। लोक सभा चुनाव में भले ही प्रदेश स्तरीय मुद्दे महत्व न रखते हो किन्तु राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर जनता कभी वोट भी नहीं करती यह भी सत्य है। उत्तराखण्ड में लोकसभा की पांच सीटें हैं किन्तु इन पांचों लोकसभा सीटों में से उन राष्ट्रीय पार्टियों ने जो कि महिला सशक्तिकरण, महिला उत्थान तथा महिला आरक्षण की बात करती है, ने एक भी एक सीट पर भी किसी महिला को टिकट देना उचित नहीं समझा। सत्ता की भागदौड़ में राष्ट्रीय राजनीतिक दल महिलाओं की भूमिका को कैसे नकार सकते हैं। यह देखना हो तो उत्तराखण्ड की पांच लोक सभा सीटों देखा जा सकता है। कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा और उक्रांद किसी भी दल ने राज्य की पांच संसदीय सीटों पर किसी महिला को टिकट देकर मातृशक्ति को सम्मान देने की बजाय उन्हें और हाशिये पर धकेलने का काम किया है। प्रदेश में कुल जनसंख्या में 45 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या महिलाओं की है। राज्य प्राप्ति आंदोलन में भी महिलाओं की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। ऐसे सवाल यह उठ रहा है कि क्या राजनीतिक दलों की सोच पुरुषवादी समाज की ही रहेगी। किसी भी दल ने क्यों किसी महिला प्रत्याशी बनाने में रूचि नहीं ली क्या लोक सभा चुनाव में राजनीतिक दलों को महिला को टिकट देकर एक सीट गंवाने का भय था या फिर दलों को अपनी महिला कार्यकर्ताओं पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं है। राजनीतिक मंचों पर महिला सशक्तिकरण महिला उत्थान और महिला आरक्षण की बातें तो खूब कही जाती हैं लेकिन जब बात आगे बढ़कर नेतृत्व करने की हो तो दलों को कुर्सी के अलावा कुछ भी दिखायी नहीं देता। इस आधी आबादी पर पुरुष मानसिकता हमेशा हावी रही है और रहेगी। उत्तराखण्ड जिसके इतिहास में महिलाओं की भूमिका हमेशा इतिहास के पन्नों में जहां स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगी। वहीं एक पन्ना इस राज्य की महिलाओं सिर्फ संसद में पहुंचने का छूटा रहेगा क्योंकि यहां राजनीतिक दलों की सोच तो कुछ इसी ओर इशारा कर रही है। यदि कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा और उक्रांद की स्थिति पर दौड़ाये तो इन दलों की हालत पता चलेगी। कांग्रेस जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्षा इस समय एक महिला है और इस पार्टी से एक महिला ने देश का नेतृत्व किया है। उसे राज्य में एक सीट पर महिला नहीं मिली। भाजपा जो संसद में महिला आरक्षण बिल लाने की बात करती है और राज्य में हुए पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण भी देती है किन्तु राज्य में एक सीट भी महिला को टिकट देना गवारा नहीं समझती। बहुजन समाज पार्टी जिसकी लीडर एक महिला है। राज्य में उसे भी एक महिला की पीड़ा को समझते हुए राज्य की पांच सीटों में से एक पर महिला को टिकट देना चाहिए था। समाजवादी पार्टी जो कि राज्य गठन के बाद से आज तक अपना बजूद खड़ा नहीं कर पायी है उसने भी महिलाओं को हाशिये पर रख छोड़ा है। क्षेत्रीय दल होने और प्रदेश की हर स्थिति से वाकिफ होने के चलते उक्रांद को तो यह बात समझाने की भी जरूरत नहीं है कि महिलाओं का इस राज्य के लिए कितना बड़ा योगदान है। हालांकि इस दल ने महिला को प्रत्याशी बनाया जरूर था किन्तु सत्ता के फेर में पत्ते खोलने से हिचक ने उससे यह हक छीन लिया और दलों की बात करना बेमानी है।

हेम पन्त

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जोशी जी आपने बहुत ही सही विषय पर लेख लिखा है, वास्तव में इन लोकसभा चुनावों में उत्तराखण्ड में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है. इसका कारण सभी दलों की  जिताऊ उम्मीदवारों को लङाने की सोच रही है. यह बात शायद गलत नही होगी कि वर्तमान में उत्तराखण्ड की राजनीति में गिनी चुनी महिलाएं ही अग्रिम पंक्ति में गिनी जाती है, चाहे कांग्रेस हो बीजेपी हो या अन्य दल. पिछले पंचायती चुनावों में महिलाओं ने जिला पंचायत व ब्लाक में कई अनारक्षित सीटों पर भी विजय पायी थी. मुझे लगता है कि आगे आने वाले 5-10 सालों में इन प्रतिनिधियों के बीच से कुछ महिलाएं अवश्य ही प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत पकङ जरूर बना लेंगी.

Rajendra Joshi

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स्थायी राजधानी के लिए जनता की सोच अलग
मकसद एक राज्य का विकास हो
राजेन्द्र जोशी
देहरादून   । स्थायी राजधानी के मद्दे पर जनता के विचार भी भिन्न-भिन्न हैं, सबकी सोच अलग जरूर है लेकिन मकसद एक ही है कि राज्य का विकास हो और सरकार का पैसा सही जगह लगे।
राज्य गठन के बाद से ही स्थायी राजधानी के लिए धरने प्रदर्शन जारी थे तथा प्रदेश की सरकारें भी इस मुद्दे पर पशोपेश की स्थिति में रही हैं। वहीं अस्थायी राजधानी देहरादून में भी करोड़ों रुपये की लागत से निर्माण कार्य करवाये गये। विधान सभा सत्र में दीक्षित आयोग की रिपोर्ट को पटल में रखने से इस मुद्दे ने फिर जोर पकड़ लिया। उस पर सभी दल खुलकर बोलने को तैयार नहीं हैं। वहीं गैरसैण राजधानी बनाने का बीड़ा उठाकर घूम रहे उत्तराखण्ड क्रांति दल में भी दोफाड़ होती दिखाई दे रही है। जहां एक ओर सत्ता में शामिल उक्रांद नेता चुप्पी साधे हैं वही कार्यकर्ता सडक़ों पर उतर आये हैं।
इस मामले में जब नेता चुप हैं तब जनता की राय भी जरूरी है। दून बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजपाल पुण्डीर व सचिव राजीव शर्मा बंट्टू का स्थायी राजधानी के बारे में संयुक्त मत है कि जब पर्वतीय राज्य मंागा था तब उधमसिंह नगर, देहरादून व हरिद्वार की बात नहीं उठी थी। उनका कहना है कि पर्वतीय राज्य का विकास तभी होगा जब उसका केन्द्र पहाड़ में हो और प्रदेश के आईएएस व आईपीएस अधिकारी वहां रहें। आज के समय में सभी अधिकारी देहरादून में रहते हैं। उनके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा भी यहीं हो रही है और वे पहाड़ पर जाने को भी तैयार नहीं है। उनका कहना है कि राज्य निर्माण के नौ साल पूरे होने के बाद अभी तक ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है।
वहीं अधिवक्ता चन्द्रशेखर तिवारी स्थायी राजधानी के लिए दून को ही उपयुक्त मानते हैं। उनका कहना है कि अब स्थायी राजधानी के लिए अरबों रुपये खर्च करना व्यर्थ है। जितना रूपया नयी राजधानी के लिए खर्च होना है वह विकास में लगाया जाय। इसे राजनीति का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। सरकार को प्रदेश के विकास कार्यों को देखना चाहिए और राजधानी के मुद्दे को छोड़ पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर ध्यान देना चाहिए। अधिवक्ता अजय त्यागी का मानना है कि राजधानी गैरसैण होनी चाहिए क्योंकि राज्य आंदोलन के समय पर ही गैरसैण को राजधानी बनाने की बात तय हुई थी और अगर अब गैरसैण को राजधनी नहीं बनाया जाता तो राज्य आंदोलन में अपनी जान गंवा बैठे शहीदों का अपमान होगा।
डीएवी कालेज के पूर्व अध्यक्ष व व्यवसायी महिपाल शाह का मानना है कि स्थायी राजधानी गैरसैण होनी चाहिए। उनका कहना है कि प्रदेश का विकास पहाड़ों में रहकर ही हो सकता है। जब कोई पहाड़ों में रहेगा ही नहीं तो वहां की समस्याओं के बारे में कैसे जान पायेगा। लोग जब पहाड़ों में रहेंगे तो विकास भी होगा। वहीं अधिवक्ता दीपक कुमार का  कहना है कि राजधानी दून ही होनी चाहिए क्योंकि यहां मूलभूत सुविधाएं हैं जिससे सरकार का करोड़ों रुपया भी बचेगा। पल्टन बाजार के दुकानदार गीत अग्रवाल का मानना है कि राजधानी पर्वतीय क्षेत्र में होनी चाहिए। उनका कहना है कि सारे नेता व अधिकारी यहीं रहते हैं और जब वह पहाड़ में जाएंगे ही नहीं तो वहां का उद्धार कैसे होगा जबकि व्यवसायी मोहित वालिया का कहना है कि राजधानी दून होनी चाहिए यहां परिवहन, रेलवे की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। राजधानी के नाम पर खर्च होने वाले पैसे को विकास के नाम पर प्रयोग करना चाहिए। व्यवसायी अभिषेक साही का मत कुछ भिन्न है। उनका मानना है कि स्थायी राजधानी शहर से बाहर होनी चाहिए जिससे लोगों को दिक्कत न हो, कृषि भूमि को भी नुकसान नहीं होना चाहिए तथा जनता की सुविधाओं का भी ध्यान रखना होगा। उनका मानना है कि दून में बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए यह स्थायी राजधानी के लिए उपयुक्त जगह नहीं है।

Rajendra Joshi

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हताशा व निराशा के दस साल
« Reply #28 on: November 10, 2010, 07:58:14 AM »
    हताशा  व निराशा के दस साल  राजेन्द्र जोशी 
नौ नवम्बर को उत्तराखण्ड 10 वर्ष का हो गया। यूं तो दस साल का सफर कोई बहुत ज्यादा  नहीं होता लेकिन खुदा कसम बहुत कम भी तो नहीं होता। दस वर्षों में किसी भी नवजात शिशु  के आकार मजबूत तथा उसकी बुनियाद ठोस पड़ती है। लेकिन अफसोस कि शिशु रूपी यह उत्तराखण्ड  कुपोषण का शिकर हो गया जिस राज्य ने इन दस सालों में पांच मुख्यमंत्री तथा आठ मुख्य सचिव बदलते हुए देखे हों  उस राज्य में तरक्की की कल्पना करना भी बेइमानी जैसी लगती है। राज्य के मुख्यमंत्री  खजाना लुटाने में मस्त रहे तो नौकरशाही दुम हिलाकर इस खजाने को ठिकाने लगाने में मशगूल  रही। राजनीतिक तौर पर भलेही कंगाली आज भी जारी है लेकिन राजनेताओं व ब्यूरोक्रेट के  गठजोड़ ने इस राज्य को लूटने का पूरा इंतजाम कर रखा है। जहां उत्तरप्रदेश के जमाने में  इस राज्य को दो मण्डलायुक्त चलाते थे वहीं इस राज्य को अब एक मुख्यमंत्री सहित दो –दो  मुख्य सचिव चला रहे हैं। कर्मचारियों के वेतन के लिए तो हर दस साल में आयोग समीक्षा  करता है लेकिन प्रदेश के नेताओं तथा दायित्वधारियों को प्रमुख सचिवांे के बराबर वेतन  की मंजूरी जरूर मिल गयी है। जो लगभग हर साल बढ़ रही है। इतना ही नहीं यह प्रदेश ब्यूरोक्रेटों  के सेवा काल के बाद रोजगार का आशियाना भी बन गया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शायद  उत्तराखण्ड देश का एकमात्र ऐसा राज्य होगा जहां बेरोजगारों को तो रोजगार के अवसर अभी  तक नहीं ढूंढे जा सके है लेकिन सेवानिवृति के बाद बड़े अधिकारियों के रोजगार के अवसर  सुरक्षित हैं। इस राज्य की इससे बड़ी बदकिस्मती क्या हो सकती है कि दस वर्षो के बाद  भी इसकी अपनी कोई स्थायी राजधानी नहीं है। सरकारें दीक्षित आयोग की आड़ में जनता भी  भावनाओं और पहाड़ी राज्य की अवधारणा से खुले आम खिलवाड़ कर रही है। जबकि वहीं दूसरी ओर  देहरादून में स्थायी राजधानी के पूरे इंतजामात सरकारों ने कर दियाहै। देहरादून में  अब तक कई विभागों ने अपने स्थायी निदेशालयों तक के भवन तैयार ही नहीं कर दिये बल्कि  वहां से काम भी शुरू हो चुकाहै।
 
  राजनीतिक स्वार्थ की चर्बी राजनेताओं में इस हद तक चढ़ चुकी है कि परिसीमन जैसा गंभीर  मुद्दा नेताओं ने स्वीकार कर अंगीकृत तक कर लिया है। नये परिसीमन का आलम यह है कि वर्ष  2032 के बाद उत्तराखण्ड के पहाड़ी हिस्सों में कुल 19 सीटें ही बच पायेंगी। जबकि 51  सीटों के साथ मैदान मालामाल होंगे। साफ है कि आने वाले दो दशक बाद हम एक बार फिर उत्तरप्रदेश  के दूसरे संस्करण का हिस्सा होंगे। वहीं दूसरी ओर देश में उत्तराखण्ड जैसी परिस्थिति  वाले उत्तर-पूर्वी राज्यों में आवादी के हिसाब से नहीं बल्कि भौगोलिक क्षेत्रफल के  आधार पर विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया गया है। उत्तराखण्ड के साथ यह बड़ी विडम्बना  ही कही जा सकती है कि यहां अब भी उत्तरप्रदेश की मानसिकता वाले राजनीतिज्ञ व ब्यूरोक्रेट  राजनीति व नीति निर्धारण में पूरी तरह से सक्रिय है जिसके चलते राज्य गठन की मूल अवधारणा  पूरी नहीं हो पा रही है बल्कि नये परिसीमन तो कुछ पहाड़ विरोधी नेताओं को ऐसे हथियार  के रूप में मिला है जो उत्तराखण्ड के स्वरूप को ही बिगाड़ देगा। आगे चल कर यह राज्य  उत्तराखण्ड की जगह दो खण्डों में विभक्त न हो जाये इस से इंन्कार नहीं किया जा सकता।  विकास का सारा आधारभूत ढांचा जिस तरह से राज्य के तराई के क्षेत्र में ही विकसित किया  जा रहा है यह इस बात का रोलमाडल है कि तराई मिनी उत्तरप्रदेश के रूप में तब्दील होता  जा रहा है।
   पलायन पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या रही है। लेकिन राज्य बनने के बाद यह मर्ज कम होने  के बजाय और बढ़ गया है। पहाड़ों के जो लोग पहले लखनऊ, दिल्ली व मुम्बई जैसे स्थानों पर  रोजगार की तलाश करते-करते बर्तन मांजते थे। नीति निर्धारकों ने उनके  लिए रोजगार  के नये दरवाजे खोलने के बजाय बर्तन मलने की देहरादून, हरिद्वार तथा हलद्वानी जैसे स्थानों  पर व्यवस्था कर दी है। उत्तराखण्ड से बाहर के लोगों से रिश्वत लेकर इन्हे माईबाप बनाने  में हमारे नेता एक सूत्रीय कार्यक्रम में जुटे हुए हैं। खेती बाड़ी पहले ही बिक चुकी  थी सो रहे सहे गाड़ गधेरे इन सरकारों ने बेच डाले हैं। दस सालों में पंचायती राज एक्ट,  कृषि नीति, शिक्षा नीति और न जाने कितनी ही और नीतियां न हीं बन पायी हैं। विकास की  चकाचौंध हलद्वानी, हरिद्वार और देहरादून में ही दिखायी देती है। इसकी एक नन्ही सी किरण  भी पहाड़ी गांवों व कस्बों तक नहीं पहुंची है अपराधी और माफियाओं के लिए सत्ता प्रतिष्ठान  आश्रय के केन्द्र बने हुए हैं तो सत्ताधीश उनके कवच का काम कर रहे हैं। राजनीतिक कंगाली  इस हद तक गहरा गयी है कि विकास की उम्मीदों के अब सिर्फ निशां ही बाकी हैं। राज्य का  असल नागरिक लाचार और हताश है।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Great writeup Sir. Aapne bilkul sahi vyakhya kari hai aaj ke Uttarakhand ki.

 

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