Author Topic: Articles By Rajendra Joshi - वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र जोशी जी के लेख  (Read 10976 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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दोस्तों,

श्री राजेन्द्र जोशी जी पत्रकारिता मे लगभग २० वर्षो से ज्यादा समय से है ! Joshi Ji has been into fourth esate for almost two decades. Through his articles, Joshi Ji has been raising various issues of Uttarakhand. Be it development, cultural and other issues.

यहाँ पर जोशी जी के कई लेख उत्तराखंड के विभिन्न विषयो पर आपको पड़ने को मिलेंगे !

एस एस मेहता



 राजेन्द्र जोशी जी का परिचय उन्हीं के शब्दों में
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" लेखनी जो कभी सत्ता की साथी नहीं रही,
    लेखनी जो कभी सरकारी इनामों की प्यासी नहीं रही,
         लेखनी जो स्वाभिमान देष, प्रदेष तथा स्वयं का जगाती रही,
                     लेखनी जो लोकतंत्र के हत्यारों का नकाब उठाती रही
,
    
चमोली जिले के सीमांत क्षेत्र थराली विकास खण्ड के बजवाड़ गांव जो कुलसारी बस स्टेण्ड से पांच किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पर है मेरा जन्म स्थान, पढाई लिखाई पर्वतीय परिवेष में हुई। पाटी बोळख्या से कक्षा एक दो की पढ़ाई जोषीमठ में इसके बाद मोडल स्कूल गौचर से सात पास किया व आठवीं तथा नौवीं पास राजकीय ईण्टर कालेज नागनाथ पोखरी से किया। इसके बाद दसवीं तथा बारहवीं राजकीय इण्टर कालेज गौचर से स्नातक विज्ञान विषय से गोपेष्वर राजकीय स्नातक महाविद्यालय से प्राप्त कर षिक्षा पूर्ण की। फिर वही नौकरी की खोज करते-करते पत्रकारिता के मैदान में आ जमा।

पिछले 24 सालों से इस मैदान में उछल कूद मचा रहा हूं।

स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्रों से होता हुआ बारह सालों तक राष्ट्रीय सहारा में पत्रकारिता के बाद हलद्वानी नैनीताल से प्रकाषित उत्तराखण्ड के पहले हिन्दी समाचार पत्र उत्तर उजाला में देहरादून व्यूरो के कार्योे का सम्पादन किया।

इसके बाद मुजफ्फरनगर से प्रकाषित रायल बुलेटिन मे बतौर क्षेत्रीय सम्पादक कार्य किया वहीं इसी बीच स्वतंत्र पत्रकारिता का जूनून सवार हुआ से अब पीटीआई भाषा के साथ ही कई अन्य नामी -गिरामी समाचार पत्र संस्थानों के लिए लेखन चल रहा है।
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Rajendra Joshi

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पांच हजार की मशीन पचास हजार में खरीदी

राजेन्द्र जोशी

देहरादून : प्रदेश के जलागम परियोजना के अधिकारियों ने अपनी जेब भरने के लिए पांच हजार रूपए की एक मिक्सर मशीन को पचास हजार में खरीद डाला। उपर से अधिकारियों की यह धमकी कि यदि किसी ने शिकायत की तो वे इस परियोजना को ही बंद करवा देंगे। यह हुई न चोरी भी और सीना जोरी भी। उधार की रकम से घी पीने की उत्तराखण्ड के अधिकारियों की पुरानी आदत है। तभी तो जलागम प्रबंध निदेशालय के मातहत अधिकारियों ने विश्व बैंक से राज्य को उधार में मिले रूपयों को इस कदर पानी की तरह बहाया कि शायद ही कोई अधिकारी होगा जिसने रूपयों की बहती इस गंगा में हाथ साफ न किये हों।

उल्लेखनीय है कि राज्य के जलागम प्रबंध निदेशालय के अधिकारियों नें यू डी डब्ल्यू डी पी योजना के अंतर्गत् गढ़वाल तथा कुमांयूं क्षेत्रों के ग्रामीणों को चीड़ के पेड़ की पत्तियों से कोयला बनाने की योजना शुरू की है। इसके पीछे मंतव्य तो साफ था कि ग्रामीण उनके आस -पास के जंगलों से चीड़ की पत्तियों जिसे निष्प्रयोज्य माना जाता है ,को एकत्र करें और इसे ईंधन के रूप में प्रयोग करें। लेकिन नीचे आते इस योजना को ही ग्रहण लग गया और अधिकारियों ने इस योजना जिसमें राज्य सरकार को विश्व बैंक से कर्जे में एक बहुत बड़ी रकम मिली है को ही ठिकाने लगाने के प्रयास शुरू हो गए। विश्व बैंक से मिले कर्ज की रकम इन भ्रष्ट अधिकारियों को तो वापस नहीं करनी है तो रूपयों की बेदर्दी से खर्च करने में भी इन्हे दर्द का अहसास आखिर क्यों होता। सो इन्होने कर्ज के रूप में राज्य को मिले रूपयों को अपनी जेबें भरने क ी नीयत से एक सप्लायर के साथ मिलकर ठिकाने लगाने की योजना बना डाली।

सूत्रों के अनुसार निविदा प्रक्रिया पूरी किए बिना इन अधिकारियों ने सीधे ही पांच हजार में बाजारों में आमतौर से बिकने वाली मशीन को पचास हजार में यह कहकर खरीद डाला कि यह मशीन चीड़ के पेड़ की पत्तियों से कोयले को आकार देने के लिए विशेष तौर पर बनायी गयी है। जबकि इस मशीन में पत्तियों को डालने से पहले उन्हे एक तंन्दूर जैसे उपकरण में जलाया जाता है जिसके अवशेष को बाद में गोबर तथा मिट्टी में हाथ से मिलाया जाता है । यह मशीन मात्र गोबर मिट्टी तथा पत्तियों को मिलाकर बनाए गए पेस्ट को शक्ल ही देता है जबकि हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत तरीके से गोबर से उपले बनाने की तकनीक पहले से ही है जिन्हे हाथ से शक्ल दी जाती रही है। इससे तो यह साफ है कि मात्र अपनी जेबें भरने के लिए ही यह मशीनें खरीदी गयीं हैं।

इतना ही नहीं इन मशीनों को खरीदने से पहने जलागम परियोजना के अधिकारियों ने इससे बनने वाले कोयले का रसायनिक परीक्षण भी नहीं करवाया। जबकि वैज्ञानिकों का मानना है कि चीड़ की पत्तियों को हवा में जलाने से भीषण रसायनिक प्रक्रिया होती है जो जहरीली गैसों (मिथेन) को उत्सर्जित भी करती है। जिससे प्राणियों को जान तक का खतरा हो सकता है। इतना ही नहीं इस मशीन पर जो दो हार्स पावर की विद्युत मोटर लगाई गई है उस पर कितनी बिजली खर्च होगी इसकी भी गणना अधिकारियों ने नहीं की है। वहीं इसको चलाने पर आने वाले खर्च तथा मोटर की मरम्मत पर आने वाले खर्च को कौन वहन करेगा यह भी साफ नहीं है। जबकि जंगल से चीड़ की पत्तियों को ढो कर लाने तथा गांव में गोबर एकत्र करने सहित इससे कोयले को बनाने के लिए क्या ग्रामीण तैयार हैं इसकी भी रिपोर्ट विभाग के पास नहीं है। यहां यह भी पता चला है कि वन विभाग द्वारा हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड में पूर्व में ही इस तरह की योजना चलाई गयी थी जोकि फ्लप शो साबित हुई। इसके बाद विभाग को यह योजना बंद करनी पड़ी थी।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जलगम विभाग ने इससे पहले भी इसी तरह से सरकार के पैसे को चूना लगाने की नियत से कई तरह के करोड़ों रूपयों के निष्प्रयोज्य उपकरण खरीदे है जिनका प्रयोग आज तक नहीं किया जा सका है और ये विभाग के गोदामों में धूल फांक रहे हैं। इनमें अभी-अभी करोड़ों में खरीदे गए टर्बेक्यूमीटर तथा मौसम यंत्र शामिल हैं।

वहीं सरकार ने इस मामले के संज्ञान में आने के बाद इसकी जांच के आदेश दे दिये हैं। मंख्यमंत्री ने मामले की जांच मुख्य सचिव को सौंप दी है।

Rajendra Joshi

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वन विभाग के अधिकारियों का कारनामा
सात पैदल मार्ग और घोटाला भी सात करोड़

राजेन्द्र जोशी

देहरादून: सीमांत क्षेत्र विकास योजना (बार्डर एरिया डेवलेपमेन्ट प्रोग्राम)के तहत उत्तरकाशी वन प्रभाग द्वारा भारत तथा सीमा के भीतर गश्त करने के लिए सात ट्रेकिं ग मार्गों पर सात करोड़ रूपये के घोटाले का मामला प्रकाश में आया है। विभाग द्वारा बनाए जा रहे इस पैदल मार्ग को बनाने की स्वीकृति न तो उच्चतम न्यायालय से ही प्राप्त की गयी है और न ही भारत तिब्बत सीमा पुलिस से। इतना ही नहीं करोड़ों के इस कार्य के लिए विधिवत निविदा प्रक्रिया के न अपनाये जाने की जानकारी सूत्रों से मिली है। इतना ही नहीं विभागीय वरिष्ठ अधिकारियों को पता तक नहीं है कि यह पैदल मार्ग बना भी या नहीं।

उल्लेखनीय है कि भारत चीन सीमा पर भारत के सीमांत क्षेत्र के भीतर गश्त करने के लिए केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा राज्य सरकार को वहां के पैदल मार्गों के मरम्मत तथा नए पैदल मार्गो के निर्माण के लिए धन मुहैया कराये जाने की स्वीकृति दी जाती रही है। इस बार भी केन्द्र से सात पैदल मार्गों के लिए केन्द्र ने सीधे जिलाधिकारी उत्तरकाशी के खाते में सीधे सात करोड़ रूपए डाल दिये जिसे जिलाधिकारी द्वारा प्रभागीय बनाधिकारी उत्तरकाशी के खाते में डाल दिया गया। इन मार्गों में तुंगला से थांगलापास (एक), तुंगला से थांगलापास (दो), जादूंग से थांगलापास (एक),जादूंग से थांगलापास (दो), मेढ़ी से सनचोकला, नीलापाली से मुनिग्ला तथा नीलापानी से रोकीनाला प्रमुख हैं।

सूत्रों के अनुसार इन पैदल मार्गों के निर्माण में करोंड़ों का घोटाला बताया गया है। सूत्रों के अनुसार यह पैदल मार्ग गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान के अंतर्गत आता है इस लिहाज से इन मार्गों के निर्माण से पूर्व उच्चतम न्यायालय की स्वीकृति का लिया जाना आवश्यक था जो नहीं ली गयी है। इतना ही नहीं सीमांत क्षेत्र होने के कारण यह क्षेत्र भारत तिब्बत सीमा पुलिस के अधीन आता है और यहां किसी भी तरह की गतिविधियों को संचालित करने से पहले आईटीबीपी से स्वीकृति का लिया जाना आवश्यक था जिसे नहीं लिया गया है। वहीं सूत्रों का दावा है कि जिस पैदल मार्ग को वन विभाग बनाने की बात कर रहा है वह मार्ग न तो भारतीय सर्वेक्षण विभाग के मानचित्र में ही दर्ज है और न ही वन विभाग द्वारा इसे कभी अपनी कार्ययोजना (वर्किंग प्लान) में ही रखा था। इतना ही वन विभाग के आला अधिकारियों तक को इस सड़क की जानकारी नहीं है कि आखिर यह पैदल मार्ग बन कहां रहा है। सूत्रों के अनुसार वन विभाग के आला अधिकारियों ने इस मार्ग के निर्माण पर आपत्ति तक जताई है कि आखिर यह पैदल मार्ग किसकी स्वीकृति से बनाया जा रहा है। शासन ने मामले में प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री को इसकी जांच सौंप दी है।

ईधर इस मार्ग का कार्य करा रहे प्रभागीय वनाधिकारी उत्तरकाशी श्री पटनायक ने स्वीकार किया कि उनके क्षेत्र के सीमावर्ती क्षेत्र में पैदल मार्ग के कार्य तो चल रहे हैं लेकिन उन्हे कार्य कराने के लिए किसी से स्वीकृति की आवयकता नहीं है। उन्होने यह भी माना कि उन्हे भारत सरकार से पैसा मिला है जिसमें से वे 50 लाख रूपए खर्च भी कर चुके है ं वहीं उन्होने बताया कि गैर वानिकी कार्यो ंके लिए ही उच्चतम न्यायालय से स्वीकृति की आवश्यकता पड़ती है बानिकी कार्यो के लिए नहीं।

Rajendra Joshi

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56 घोटाले और जांच आयोग का सचराजेन्द्र जोशी
देहरादून:   कांग्रेस शासन में हुए 56 घोटालों के लिए बनाए गए जस्टिस एएन वर्मा ने इस्तीफा तो दे दिया लेकिन वे इस इस्तीफे के पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गए है जिनका जवाब अब सरकार को देना होगा है कि आखिर ऐसे कौन से कारण थे जो वर्मा को यह पद छोडऩा पड़ा।      भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस से सत्ता हथियाने में उनके शासन काल के दौरान 56 घोटालों की बात उठायी थी और जनता से चीख-चीख कर यह कहा था कि सत्ता में काबिज होते ही वह इन 56 घोटालों के प्रकरण पर दूध का दूध और पानी का पानी कर घोटालों मे लिप्त लोगों को जेल के भीतर पहुंचा कर ही दम लेंगे। विधान सभा चुनाव भी हुए सरकार भी भाजपा की बनी लेकिन सरकार ने जिस जस्टिस एएन वर्मा को इन 56 घोटालों की जांच की कमान सौंपी वे साल भर बाद ही स्वास्थ खराब होने की बात कहकर इस आयोग से अपना पिंड छुड़ाकर चल निकले। कहा जाता है हमाम में सब नंगे हैं। यह कहावत जस्टिस वर्मा के सामने तो सच ही निकली। जब घोटालों में सब के सब ही लिप्त हों तो बेचारा जांच आयोग तो खुद ही अपाहिज होगा, और हुआ भी यही।     सूत्रों के अनुसार जस्टिस वर्मा ने जब इन घोटालों की जांच के लिए तमाम विभागों से पत्राचार शुरू किया तो उन्हे यह आभास तक नहीं था राज्य की नौकरशाही इतनी बेलगाम हो चुकी है कि उसके सामने जब मुख्यमंत्री के आदेश ही कोई मायने नहीं रखते तो बिना नाखून तथा दांत वाले आयोग की उनके सामने क्या बिसात। हुआ भी यही सैकड़ों बार पत्राचार करने के बाद भी विभागीय अधिकारियों से लेकर सचिवों तक ने उनके पत्रों का जवाब देना गवारा नहीं समझा, तो ऐसे में वे यहां अकेले बैठकर करते तो क्या करते।     इतना ही तीन दशक से ज्यादा न्यायिक सेवा में रहकर नाम कमाने वाले जस्टिस वर्मा ने जब इन विभागीय अधिकारियों तथा सचिवों को इन घोटालों से सम्बधित जानकारियों के लिए पत्रों  के बाद इनक े उत्तर पाने के स्मरण पत्र तक भेजे तो उनका भी वही हश्र हुआ तो पूर्व में भेजे गए पत्रों का हुआ शायद वे भी रद्दी की टोकरी की भेंट चढ़ गए। ऐसे में एक जांच अधिकारी वह भी न्यायिक सेवा का कैसे इस आयोग का अध्यक्ष रहता सो उसने कोई न कोई बहाना तो बनाना ही था तो उन्हेाने स्वास्थ्य का बहाना बनाकर यहां से अपना पिंड छुड़ा दिया।    जस्टिस वर्मा तो गए लेकिन अब जो नए साहब आएंगें जैसा कि मुख्यमंत्री कहते है कि नए अध्यक्ष बनाए जाएंगे ऐसे में जब उनके साथ भी ऐसा होगा तो इस बात की क्या गारंटी है कि वे भी यहां टिक कर इस मामले की जांच को अंजाम तक पहुंचा पाएंगे। जिन घोटालों की बैसाखियों के सहारे भाजपा सत्ता तक पहुंची।    ऐसे में अब एक बात औ उठ रही है कि सरकार इसी आयोग में नए अध्यक्ष का चुनाव कर  इस आयोग का कार्यकाल बढ़ाएगी। और वहीं यह बात भी सत्ता के गलियारों में तैर रही है कि हो सकता है सरकार अब कोई नया आयोग ही बना डाले। लेकिन जिन परिस्थितियों में जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दिया उससे तो यह साफ ही लगता है कि जिन 56 घोटालों की बात भाजपा ने की थी वह सही थी और उसमें वे सभी अधिकारी तथा सचिव तक लिप्त थे जिन्होने जस्टिस वर्मा का जांच में असहयोग किया था।    कहा जाता है राजनीति में कोई स्थाई मित्र अथवा स्थाई दुश्मन नही होता । इन 56 घोटालों में से एक तिवारी सरकार का आबकारी घोटाला। तत्कालीन आबकारी मंत्री जब कांगेस में थे तो भाजपाईयों को वे सबसे ज्यादा भ्रष्टï तथा चर्चित आबकारी घोटाले का सूत्रधार लगते थे लेकिन राजनीतिक मजबूरीवश जब उन्हेाने भाजपा का दामन सभांलना पड़ा तो वे ही भाजपाईयों की नजर में सबसे ज्यादा ईमानदार बन गए। तो ऐसे में जांच आयोग के अध्यक्ष के सामने तो परेशानी होनी ही थी। जिनके खिलाफ वे सबूत ढूंढ रहे थे अब उन्हे ही बचाने की जिम्मा उनके कंधों पर आ गया ऐसे में इस्तीफा नहीं देते तो क्या करते? [/size]

Rajendra Joshi

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फूलों की घाटी का अस्तिव संकट मेंराजेन्द्र जोशी
देहरादून : उत्तराखण्ड की फूलों की घाटी में फूलों से ज्यादा ऐसी घास उग आयी है कि इसके कारण यहां उगने वाले फूलों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है। वैसे तो पूरी की पूरी भ्यूंडार घाटी इस घास से परेशान है लेकिन फूलों की घाटी जिसका अंर्तराष्ट्रीय महत्व है को लेकर पर्यावरणविद से लेकर वन विभाग तक के आला अधिकारी इसके कारणों को खोजने में लगे हैं। पौलीगोनियम जिसे स्थानीय भाषा में अमेला अथवा नाट ग्रास कहा जाता है इस फूलों की घाटी को अपने चपेट में ले चुकी है। इसे जड़ से समाप्त करने के लिए अब प्रदेश के वन विभाग ने इसे उखाड़ने के लिए एक कार्ययोजना बनाई है, जिसपर कार्य आरम्भ भी हो चुका है।
प्रदेश के ऋषिकेश बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर गोविन्दघाट से सिक्खों के पवित्र तीर्थ हेमकुण्ड को जाने वाले मार्ग मेें घंघरिया से पांच किलोमीटर बायीं ओर लगभग 87.5 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस क्षेत्र में लगभग पांच सौ से ज्यादा फूलों की प्रजातियां कभी यहां पाई जाती थी। आज इस घाटी के अधिकांश भाग में इन मोहक फूलों की जगह पौलीगोनियम घास जिसे स्थानीय भाषा में अमेला कहा जाता है, फैल चुका है। यह घास घाटी में उगने वाले फूलों की अन्य प्रजातियों पर क ैंसर की तरह लग गया है। इसके क ारण फूलों की घाटी का अस्तित्व ही समाप्त होने को हैं। वहीं घाटी में इससे मिलती-जुलती पौलीस्टाइका (सरों) घास , पार्थीनियम (गाजर घास ) भी यहां उगने लगी है। फूलों की घाटी में बहने वाले बामनदौड़, स्विचंद आदि नालों तक में पौलीगोनियम घास फैल चुका है। इस क्षेत्र में कई प्रकार की जड़ी बूटियां भी अब देखने को मिलती थी जो इस तरह की घास के उग जाने के कारण अब नहीं दिखाई देती।
उल्लेखनीय है कि 6 नवम्बर 1982 में फूलों की घाटी को नन्दादेवी बायोस्फेयर रिजर्व (नन्दादेची जीवमंडल विशेष क्षेत्र) घोषित किया गया था और तभी से इस क्षेत्र मे पशुओं के चुगान तथा प्रवेश को प्रतिबंधित भी कर दिया गया था। यह इसलिये किया गया था ताकि पशुओं के पैरों से यहां मिलने वाले फू लों की विशेष प्रजातियां कहीं खत्म न हो जांए। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि पशुओं की आवातजाही न होने कारण भी इस क्षेत्र में फूलों की संख्या में कमी हुई है। इनका कहना है कि भेड़-बकरियों के आने जाने तथा उनके गोबर से यहां पैदा होने वाले फूलों को खाद तो मिलती ही थी साथ ही बकरियों के खुरों से बीज भी इधर से उधर होने पर अन्य प्रजातियां विकसित होती थी। इन्हीं लोगों का कहना है कि यहां उगने वाले विनाशकारी घास की जो प्रजातियां आज फूलों की घाटी में उग रही उन्हे उस दौरान यहां आने वाले जानवर ,भेड़-बकरियां चुग लेती थी।
वनस्पतिशास्त्रियों के अनुसार यहां उगने वाले नुकसान देह पौधे की लंबाई ज्यादा होने के कारण छोटी प्रजाति के पुष्प इनके नीचे नहीं पनप पाते हैं। नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के डीएफओ श्रवण कुमार ने माना कि पौलीगोनियम यहां पनप रहा है और इसके जल्दी बढने से छोटी प्रजाति के फूल नहीं खिल पा रहे। उन्होंने बताया कि पौलीगोनियम की करीब चार प्रजातियां फूलों की घाटी में विकसित हुई हैं। इनके अनुसार यदि इस तरह की घास को यथाशीघ्र इस क्षेत्र से उखाडा नहीं गया तो एक दिन यह फूलों की घाटी जहरीली घास की घाटी में बदल जाएगी।
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Rajendra Joshi

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तो क्या गैरसैंण होगी राजधानी?
राजेन्द्र जोशी
देहरादून: राजधानी चयन आयोग ने प्रदेश की स्थाई राजधानी के चयन को लेकर अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है लेकिन राजधानी कहां हो यह सरकार पर छोड़ दिया है।
रिपोर्ट में गैरसैंण,रामनगर,ऋषिकेश तथा देहरादून का व्यापक अध्ययन के साथ ही स्कूल आफ प्लानिंग एण्ड अर्किटेक्चर की रिपोर्ट भी लगायी गयी है। राजधानी चयन को लेकर यह रिपोर्ट पूरे आठ साल में तैयार हो पाई है। राजधानी चयन आयोग का गठन राज्य की पहली भाजपा की अंतरिम सरकार के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री नित्यानन्द स्वामी ने किया था इसके बाद से लेकर अब तक 11 बार इस आयोग का कार्यकाल बढ़ाया जा चुका है। बीती 31 जुलाई को इसे अंतिम बार उच्चन्यायालय के निर्देश के बाद 17 दिनों के लिए बढ़ाया गया था जिसकी सीमा बीते दिन समाप्त हो गई। बीते दिन ही राजधानी चयन आयोग के अध्यक्ष जस्टिस वीरेन्द्र दीक्षित ने मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार जस्टिस वीरेन्द्र दीक्षित ने इस रिपोट्र को बनाने में बड़ी ही गोपनीयता रखी। उन्होने स्वयं ही रिपोर्ट को टाईप कर अपने सामने बाईंडिंग करवा कर लिफाफा तक अपने सामने सील कर स्वयं ही मुख्यमंत्री को सौंपा है। जबकि सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री को सौंपी गयी इस रिपोर्ट में किसी भी स्थान को निर्दिष्टï नहीं किया गया है। इस रिपोर्ट में राजधानी को लेकर जन सामान्य का तर्क, प्रस्तावित स्थलों की हवाई,सडक़,संचार उपलŽधता, निर्माण खर्च, प्रस्तावित स्थलों की भूगर्भीय,पर्यावर्णीय संरचना, जल तथा सीवेज की व्यवस्था आदि पर रिपोर्ट शामिल है। इतना ही नहीं इसमें राजधानी बनने के बाद सरकार पर आने वाले वित्तीय भार की भी इसमें रिपोर्ट दी गयी है।
अब जबकि राजधानी को लेकर देहरादून में कई स्थाई निर्माण कार्य सरकार द्वारा कराए जा चुके हैं और अन्य स्थानों की अपेक्षा देहरादून में वह सारी सुविधाएं जुटाई जा चुकी हैं ऐसे में राजधानी कहीं और बने यह सोचना नामुमकिन है। जबकि राज्य निर्माण में अपने प्राणों की आहुति देने वाले राज्य आन्दोलनकारी शहीदों की पहली प्राथमिकता गैरसैंण में राजधानी हो को लेक र आन्दोलन शुरू किया गया था। लेकिन बदले परिदृश्य में लखनऊ से यहां आए अफसरान तथा कुछ एक नेता गैरसैंण जाने को क्या तैयार होंगे यह विचारणीय है

Rajendra Joshi

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मंदिर,मस्जिद से लेकर कब्रिस्तान तक भू माफियाओं के चंगुल में।
राजेन्द्र जोशी
देहरादून: उत्तराखण्ड के मंदिर,मस्जिद सहित गिरिजाघरों तक की सम्पत्तियों पर अब यहां के भू माफियाओं की नजर लग चुकी है। जबकि संविधान के अनुसार इस तरह की सम्पत्तियों की कोई खरीद-फरोख्त ही नहीं कर सकता है। लेकिन भूमाफिया हैं जो कानून को जेबों में रख इस तरह की सम्पत्तियों की खरीद-फरोख्त ही नहीं कर रहे हैं बल्कि इनकी जमीनों पर बड़े-बड़े ब्व्यवसायिक भवनों का निर्माण कर कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। इनमें कई सफेदपोश नेता तक भी शामिल हैं। जो या तो प्रदेश में काबिज सत्ता से सम्बध रखते हैं या फिर इनकी अफसरशाही में पकड़ है।
अस्थाई राजधानी देहरादून के राजपुर मुख्यमार्ग पर दिलाराम बाजार के पास स्थित अंग्रेजों के जमाने से बने गिरिजाघर की सम्पत्ति पर जहां भाजपा के एक पूंजीपति नेता के परिजनों ने कŽजा ठोंका है। यह मामला न्यायालय में सरकार बनाम श्यामसुन्दर गोयल के नाम बीते कुछ सालों से चल रहा है। वहीं ईसी रोड़ पर मस्जिद की जमीन पर कांग्रेस के एक नेता ने कŽजा ही नही की बल्कि इस पर एक व्यवसायिक भवन तक बना डाला है।
उत्तराखण्ड वक्फ बोर्ड के रिकार्ड के अनुसार देहरादून शहर सहित समूचे जिले में 119 कब्रिस्तान थे, जिनमें 169 एकड़ जमीन उपलŽध थी, मगर आज लगभग आधे कब्रिस्तान अतिक्रमण के कारण गायब हो गये हैं। जो कब्रिस्तान बचे हुए हैं वे भी तेजी से सिमट रहे हैं। मुस्लिम वक्फ बोर्ड के एक अधिकारी के अनुसार सबसे गंभीर समस्या देहरादून में खड़ी हो गई है। यहां दिन प्रतिदिन आबादी बढऩे के साथ ही मरने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। मगर कब्रस्तान एक-एक कर इमारतों के जंगलों में खोते जा रहे हैं। वक्फ बोर्ड के रिकार्ड के अनुसार देहरादून शहर के अन्दर कभी 5.2 एकड़ का अधोईवाला कब्रिस्तान, 4 एकड़ का खुड़बुड़ा, 2 एकड़ का मुस्लिम कालोनी कब्रिस्तान था। इनमें से आज एक भी कब्रिस्तान मौजूद नहीं है और इन पर इमारतों के जंगल उग आये हैं। आज हालात यह हैं कि इतने बड़े शहर के मुसलमानों के लिये धर्मपुर तथा चन्द्रनगर में ही सुपुर्देखाक होने के लिये थोड़ी सी जमीन रह गई है। धर्मपुर में भी अब वक्फ बोर्ड के हस्तक्षेप के बाद लोगों को दफनाने के लिये जगह मिल पा रही है।
शहर के दक्षिण में स्थित एकमात्र सबसे बड़ी कब्रगाह की हालत भी नाजुक हो चुकी है। वक्फ बोर्ड के रिकार्ड में चन्दरनगर क्षेत्र में तीन कब्रिस्तान दर्ज हैं। इनमें से केवल एक कब्रिस्तान के नाम ही 25 बीघा जमीन दर्ज है, मगर धरातल पर वहां केवल एक ही कब्रगाह मौजूद है और इसमें भी 4-5 बीघा से अधिक जमीन नहीं रह गई है।
मौलवी अŽदुल समद का कहना है कि शहर के चन्द्रनगर स्थित कब्रिस्तान की स्थिति नाजुक हो गई है। अतिक्रमण के बाद एक सीमित स्थान पर कब्रों के ऊपर कब्रें बनानी पड़ रही हैं। कब्र खोदते समय कंकाल निकलना तो सामान्य बात है, मगर अब तो नई कब्र खोदते समय साबुत मुर्दे भी निकलने लग गये हैं, जिन्हें दुबारा दफनाना पड़ रहा है।
मुस्लिम नेता कमर सिद्दकी का कहना है कि इस एक मात्र कब्रिस्तान में बार-बार कब्रें खोदने से मिट्टी इतनी पोली हो गई है कि कब्र ही धंसने लगती है। इस तरह की मिट्टी में जानवरों द्वारा मुर्दों को निकालने का भी भय रहता है। मौलवी अŽदुल समद के अनुसार चन्द्रनगर कब्रिस्तान को कम से कम 10 वर्ष के लिये आराम की जरूरत है। उन्होंने बताया कि मुस्लिम समुदाय को समझाया बुझाया जा रहा है कि वे कुछ वर्षों तक शवों को धर्मपुर कब्रिस्तान में दफनाएं।
देहरादून शहर से अधिक गंभीर स्थिति मसूरी की हो गई है। जहां कब्रिस्तान सहित वक्फ की 60 प्रतिशत सम्पत्ति पर भू माफियाओं का अवैध कŽजा हो गया है। मुर्दों को दफन करने के लिये देहरादून शहर के आस-पास के कब्रिस्तान भी तंग होते जा रहे हैं। कई कब्रिस्तान तो गायब हो गये मगर जो मौके पर मौजूद हैं वे भी सिमटते जा रहे हैं। तेलीवाला, माजरा, मेहूंवाला, नवादा, चानचक, कारगी ग्रांट, आमवाला, मोहबेवाला, शाहनगर, अजबपुर खुर्द एवं ब्राह्मणवाला के कब्रिस्तान अतिक्रमण के कारण बहुत तंग हो गये हैं।
मुर्दों को दफनाने के मामले में मुसलमानों से अधिक गंभीर संकट देहरादून के ईसाइयों के सम्मुख खड़ा हो गयी है। देहरादून शहर में ईसाइयों के केवल 2 कब्रिस्तान हैं । इन पर भी अवैध कŽजों के बाद जो थोड़ी बहुत जमीन बची हुई है, उनमें पक्की सीमेंट की कब्रें बनने के कारण नई कब्रों के लिये एक-एक इंच जमीन जुटाना मुश्किल हो गया है। सी.एन.आई. चर्च के रिवर्ड सुनील ल्यूक के अनुसार ईसाइयों को इन कब्रस्तानों में पक्की कब्रें न बनाने की सलाह दी जा रही है। पादरी जे.पी. ग्रीन का कहना है कि पक्की कब्रों के निर्माण को हतोत्साहित करने के लिये कब्र बनाने का शुल्क बढ़ाने का निर्णय लिया गया है।
उत्तराखण्ड मुस्लिम वक्फ बोर्ड से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश की पूर्व समाज कल्याण सचिव एवं वक्फ सर्वे कमिश्नर राधा रतूड़ी ने 7 दिसम्बर 2005 को सभी जिला कलक्टरों को पत्र लिख कर वक्फ सम्पत्तियों का सर्वेक्षण कराने के निर्देश दिये थे। मगर उस पत्र पर कोई कार्यवाही नहीं हुई।
उत्तराखण्ड में कब्रिस्तानों सहित वक्फ की सम्पत्तियों पर भारी कŽजों की शिकायतें मिलने पर तत्कालीन मुख्य सचिव एम. रामचन्द्रन ने 25 जनवरी 2006 को सभी जिला कलक्टरों को पत्र लिख कर उन्हें याद दिलाया था कि वक्फ समपत्तियों का 20 साल में एक बार सर्वेक्षण कराया जाना अनिवार्य है। मुख्य सचिव ने पत्र में यह भी कहा था कि 1984 के बाद इन सम्पत्तियों का सर्वेक्षण नहीं हुआ। उन्होंने तत्काल अवैध कŽजे हटाने के भी आदेश दिये थे, मगर उन आदेशों का भी पालन नहीं हुआ। जिला प्रशासनों की ढील के कारण देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल एवं उधमसिंहनगर जिलों में कब्रस्तानों की अधिकांश जमीनें भूमाफियाओं द्वारा अभी तक कŽजाई जा चुकी हैं।
सन् 2001 की जनगणना के अनुसार उत्तराखण्ड में मुसलमानों की जनसंख्या 1012141 तथा देहरादून में 139197 है। प्रदेश में ईसाइयों की आबादी 27116 तथा देहरादून में 10322 है। इनमें 7681 की आबादी देहरादून शहर में रहती है। इसी प्रकार 2001 में देहरादून शहर की मुस्लिम आबादी 54543 थ


Rajendra Joshi

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प्राचीन घराट विलुप्ति के कगार पर
राजेन्द्र जोशी
देहरादून : दूसरी व तीसरी सदी में पत्थरों के बड़े-बड़े शिलापटों से बनने वाली हाथ की चक्कियों से गेहूं व अन्य खाद्यान्न पीसने की तकनीक में विकास के बाद ग्रामीणों द्वारा उन्नत जल शक्ति के प्रयोग की तकनीक से जन्में घराट (पनचक्की) वर्तमान समय में विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं। ग्रामीणों के लिए खर्चीली तथा आधुनिक तकनीक के उपयोग व सरकार की उपेक्षा से आज घराटों का अस्तित्व ही समाप्ति के कगार पर जा पहुंचा है। जबकि दूसरी ओर सरकार का उपक्रम अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा) राज्य के घराटों में सुधारीकरण योजना के दावे तो कर रहा है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। परिणाम अब यहां तक आ पहुंचा है कि न तो वे प्राचीन घराट ही बचे है और न आधुनिक घराट। इसकी बानगी जनपद पौड़ी में देखी जा सकती है जहां योजना के करीब पांच वर्ष बीतने के बाद महज सात घराटों को ही उच्चीकृत किया जा सका है।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड राज्य में स्वयं सेवी संगठन हैस्को द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य के अस्तित्व में आने के समय तक लगभग 70 हजार घराट थे। जबकि सरकारी उपेक्षा के चलते वर्तमान में मात्र 30 हजार घराट ही शेष हैं। जबकि अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा) राज्य में मात्र 15 हजार घराट ही बताता है। एक जानकारी के अनुसार वर्तमान में देश के हिमालयी राज्यों में घराटों की संख्या ढाई लाख के आस-पास बताई जाती है। जबकि अकेले उत्तराखंड में इनकी संख्या 30 हजार के लगभग बतायी जाती है। वर्तमान में इनकी स्थिति काफी दयनीय है। उरेडा द्वारा हाल में ही कराए गए सर्वेक्षण की मानें तो घराटों की दक्षता व क्षमता धीरे-धीरे कम हो रही है। इसका कारण इनकी घटती उपयोगिता है। वर्ष 2002 में उरेडा द्वारा घराटों का अस्तित्व बचाने के लिए घराट सुधारीकरण कार्यक्रम चलाया गया था। इसके तहत घराटों को चिन्हित कर आधुनिक उपकरणों से लैस करके इन्हें उपयोग में लाना है। योजना लागू होने के पांच वर्ष बाद भी पौड़ी जिले में मात्र सात घराटों को उपकरण से लैस कर उपयोग में लाया जा रहा है। जनपद के कुल पंद्रह ब्विकास खण्डों में वर्तमान में 672 घराट बंद तथा 295 घराट चालू हालत में हैं। घराट सुधारीकरण योजना के तहत लाभार्थी को विद्युत उत्पादन के लिए एक लाख व उपयोग में लाने के लिए 30 हजार तक का अनुदान दिए जाने की व्यवस्था है। बावजूद इसके घराटों का अस्तित्व समाप्ति के कगार पर है। जनपद के एक मात्र ब्विकासखण्ड थैलीसैंण में ही सात घराट उपयोग में लाए जा रहे हंै। विभाग की शिथिलिता व घराटों के उपयोग के घटते चलन से आज भी अधिकांश लोग घराट से भी अनभिज्ञ हैं। विभाग का पौड़ी विकासखंड के अंतर्गत खंडा में मांडल घराट स्थापित करने का सपना भी साकार नहीं हो पा रहा है। इसमें तकनीकी खामियां उजागर हुई है। घराटों की घटती संख्या के बाबत विभाग के पास कोई सटीक जवाव नहीं है। विभाग का कहना है कि इस दिशा में प्रयास चल रहे हैं।
जबकि दूसरी ओर पद्यम् श्री डा0 अनिल जोशी के अनुसार राज्य में सबसे ज्यादा चमोली,उत्तरकाशी, टिहरी, पिथौरागढ़, चम्पावत तथा बागेश्वर में घराट थे। उन्हेाने बताया कि प्रदेश के गांवों के लिए घराट सबसे ज्यादा विकेन्द्री उद्योग बन सकता है जिसमें गांवों के संसाधनों का सबसे ज्यादा उपयोग भी किया जा सकता है,लेकिन सरकार की इस संबध में कोई स्पष्टï नीति न होने के कारण आज इनकी संख्या दिन ब दिन घटती जा रही है। उनके अनुसार यह बात भी सोचने की है कि आखिर दूसरे तथा तीसरे सदी के ये घराट आज तक कैसे जिन्दे रहे और इनका ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में क्या योगदान रहा। उनके अनुसार उरेडा को यदि स्थिति में सुधार लाना है तो सबसे पहले उसे इसकी तकनीक सस्ती तथा सुलभ बनानी होगी तभी इनका कायाकल्प हो सकता है।


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रूपकुण्ड से गायब हो रहे हैं कंकालराजेन्द्र जोशी
रूपकुण्ड के रहस्य को भेदने के दावे तो बहुत होते हैं लेकिन आज भी रूपकुण्ड के नरकंकाल रहस्य ही बने हुए हैं. लेकिन दुर्भाग्य से अब ये कंकाल कम हो रहे हैं.

रूपकुण्ड में मिलने वाले मानव कंकाल पर्वतारोहियों तथा मनुष्य के अत्यधिक आवागमन के कारण खतरे में हैं। यहां पाए जाने वाले विलक्षण तथा रहस्यमय मानव कंकाल धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। सरकार इस ऐतिहासिक तथा रहस्यों से भरी धरोहर को संजोए रख पाने में असफल ही साबित हुई है। यही कारण है कि नौवीं सदी के ये अस्थि अवशेष समाप्त होने के कगार पर हैं। इस बात की प्रबल संभावना है कि रूपकुण्ड के अस्थि अवशेषों की तस्करी हो रही है और दुनियाभर से आनेवाले ट्रैकर इन अस्थियों को यहां से बाहर ले जा रहे हैं.

उत्तराखण्ड का हिमालयी क्षेत्र अपने आप में कई रहस्यों तथा चमत्कारों से भरा पड़ा है। इन्हीं में से एक रहस्यमयी झील जिसे `रूपकुण्ड´ कहा जाता है इसी हिमालय की पर्वत श्रृंखला त्रिशूल तथा नन्दाघाटी के नीचे स्थित है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई लगभग 16499 फीट है। यह स्थान चमोली जनपद के देवाल क्षेत्र में आता है। यह वही पवित्र स्थान है जहां हर बारह साल में नन्दा देवी राजजात की यात्रा का यह अंतिम पड़ाव है यहां के बाद यह कहा जाता है कि सीधे स्वर्ग का मार्ग जाता है। एक कहावत यह भी है कि यहां से ही भगवान शिव पार्वती को कैलाश की ओर ले गए थे। जब रास्ते में पार्वती को प्यास लगी तो भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से इस पर्वत पर एक झील बना डाली थी जिसका पानी पीकर पार्वती ने अपनी प्यास तो बुझाई थी वही इस झील में अपने प्रतिविंब को देखकर पार्वती ने इसे ही रूपकुण्ड का नाम दिया था।

इसी झील में तथा इसके आसपास सैकडों मानवों के अस्थिकंकाल बिखरे पड़े थे, जिनका लंदन तथा हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने रेडियोकार्बन टेस्ट कर उम्र पता लगाने की कोशिश की तो पता चला कि ये सभी नौंवीं सदी के लोगों के अस्थि कंकाल थे। इतिहासकारों के अनुसार कन्नौज के राजा यशोधवन भगवान शंकर को प्रसन्न करने इसी हिमालय क्षेत्र की ओर अपनी फौज के साथ आये थे. साथ में उनकी गर्भवती पत्नी तथा दासिंयां भी आयीं थीं. यहां से पहले बलुआ कुनड़ के पास रानी को प्रसव हो गया और राजा अपनी सेना को लेकर आगे रूपकुण्ड की ओर बढ़ते चले गए लेकिन वे प्रसव के कारण अपवित्र हो चुके थे लिहाजा प्रकृति के नाराज होने के फलस्वरूप उनके ठिकाने के पास भारी ओले गिरने के साथ ही बर्फीले तूफान चलने लगे जिससे कन्नोज के राजा सहित उसकी फौज तथा रानी तथा दासिंया वहीं दफन होकर रह गए।

आज यहां जो अस्थिकंकाल मिलते हे वे आज के मानवों से काफी बड़े हैं जिनकी लम्बाई लगभग दस से बारह फीट है। वहीं यह कहा जाता है कि इतनी संख्या में या तो ये लोग किसी संक्रामक बीमारी से मरे होंगे या फिर ठंड के कारण। इतना ही नहीं कहा तो यह तक जाता है कि ये लोग तिब्बती व्यापारी रहे होगें जो अपना रास्ता भटक गए थे। क्योंकि इसी जिले के हिमालयी क्षेत्र में सन् 1962 से पूर्व तक भारत व चीन के मध्य व्यापार हुआ करता था। वहीं वैज्ञानिकों का मानना है कि इनकी मृत्यु भारी ओलों (क्रिकेट की बाल के जितने) के गिरने से ही हुई होगी। उनका यह भी मानना है कि भारी ठंड तथा बर्फ के कारण ही इनके शरीर प्रीजर्ब रह पाए। वैज्ञानिकों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण यहां यदा-कदा भू-स्खलन होता रहता है इसी कारण ये मानव शरीर धीरे-धीरे रूपकुण्ड में आ पहुंचे होंगे।

स्थानीय बुजुर्गों ने मुझे कई साल पहले बताया था कि इन नरकंकालों के शरीर पर उस दौरान तक उनके पहने कपड़े जैसे कि कश्मीरी लवादा जैसा लोग सर्दी बचाने को पहना करते थे इनके शरीर पर थे लेकिन वे इतना गल चुके थे कि हाथ लगाते ही मात्र राख सी ही हाथ में आती और इनकी हड्डियों से मांस धीरे-धीरे गल चुका था। ऐसा बतानेवालों में मेरे एक रिश्तेदार भी थे जो वहां फारेस्ट आफिसर के तौर पर काम कर चुके थे।

सरकार ने आज से कई साल पहले लोहा जंग नामक स्थान पर एक चेक पोस्ट स्थापित किया थी लेकिन इस ओर जाने तथा यहां से निकलने के कई और रास्ते हैं जिसपर अबाध रूप से आवाजाही होती है. जिलाधिकारी चमोली डीएस गर्ब्याल के अनुसार रूपकुण्ड मार्ग तथा जिले के अंतिम गांव वाण के लोगों ने एक समिति का गठन किया हुआ है जो इस तरह की तस्करी पर वन विभाग के साथ मिलकर रोक लगाने का प्रयास करती है साथ ही जिलाधिकारी ने यह स्वीकार किया कि इस क्षेत्र में आने तथा जाने के कई और मार्ग हैं इन पर चैकिंग की व्यवस्था के लिए प्रदेश सरकार को प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है, ताकि हर मार्ग पर इन कंकालों के साथ ही वन्य उपज की तस्करी को रोका जा सकेगा

Rajendra Joshi

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दरक रहा है पहाड़
राजेन्द्र जोशी

बिजली मुफ्त नहीं आती. इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. आप जो कीमत चुकाते हैं उससे ज्यादा वे गांव इसकी कीमत अदा कर रहे हैं जहां बिजली पैदा होती है.

आप भले ही कुछ रूपया देकर उपभोक्ता होने का अहंकार पाल लें लेकिन वे गांववाले क्या करें जिनके घर ही टूटकर बिजली की खेती के कारण अपना अस्तित्व ही खो रहे हैं. टिहरी की बिजली में दिल्ली के माल भले ही रोशन हो रहे हों लेकिन यहां के 24 गांव पानी में समा गये. उत्तराखण्ड राज्य के चमोली जिले का एक और गांव चांई भी ऊर्जा राज्य बनाने की चाह की भेंट चढ़ गया। चाईं अकेला गांव नहीं है. बिजली उत्पादन के लिये प्रमुख नदियों को पहाड़ों के अन्दर सैकड़ों किमी लम्बी सुरंगों के अन्दर डालने की योजना के चलते दर्जनों गांवों के अस्तित्व पर सवालिया निशान लग गया है।

चमोली जिले के भारत-तिब्बत सीमा से जुड़े सीमान्त ब्लाक जोशीमठ के चांई गांव में शुरू हुए भूस्खलन के कारण 28 मकान पूरी तरह नष्ट हो गये हैं, जबकि लगभग 100 मकानों पर दरारों के कारण समूचा चाईं गांव खेती की जमीन सहित अलकनंदा की ओर खिसक रहा है। जोशीमठ की एसडीएम निधि यादव के अनुसार इस भूस्खलन से अब तक तीन मकान पूरी तरह जमींदोज़ हो चुके हैं, जबकि 25 से 30 मकान क्षतिग्रस्त हैं। निधि यादव के अनुसार इस भूस्खलन के कारण मकानों की 89 लाख रुपये तथा जमीन की 4.75 करोड़ रुपये की क्षति का आंकलन हुआ है और जिलाधिकारी चमोली ने यह रिपोर्ट प्रदेश सरकार को भेज दी है। उन्होंने बताया कि ये सभी परिवार गांव छोड़ चुके हैं। इनके लिये जोशीमठ और मारवाड़ी में रहने की अस्थाई व्यवस्था की गयी है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के निदेशक डा. पी.सी. नवानी के अनुसार चाईं गांव के निचले हिस्से के लिये भी खतरा उत्पन्न हो गया है और जान माल की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रशासन को गांव को अन्यत्र बसाना पड़ेगा।

जिन लोगों के मकान ध्वस्त हुए हैं उनके नाम हैं- थैबाड़ी में भूपाल सिंह पंवार, देवनारायण महाराज, गीता देवी, दीपक पंवार, यशपाल पंवार, कपिलदेव पंवार, महेंद्र पंवार, शैलेंद्र पंवार, पुष्कर लाल, जोत सिंह, प्रेम सिंह, दुलप सिंह, उछव सिंह, राम सिंह पंवार तथा रघुबीर सिंह. इसी गांव के ब्यूरा नामक स्थान पर लम्बे आकार में करीब एक मीटर गहरी दरार जमीन पर उभर आयी है. यह करीब 500 मीटर लम्बी है। गांव के ऊपरी हिस्से में आ रही आबादी भी कैसे सुरक्षित रहेगी जब उसके नीचे कब्रगाह तैयार हो चुका है। ब्यूरा में अखिलेश कठिहार, दिगम्बर चौहान, नरेन्द्र बिष्ट, सरस्वती राणा, जानकी देवी, पुष्कर सिंह चौहान, भगवती देवी, दलबीर सिंह पंवार, इन्द्र सिंह बिष्ट, सतेंद्र सिंह, बांके लाल, रूपा देवी, मदन सिंह एवं गोपाल सिंह के मकान भी इस धंसाव की चपेट में आने के कारण चिंता का सबब बन गये हैं। उनका आशियाना कभी भी लुढ़क सकता है।

मुसीबत इन्हीं लोगों पर नहीं, बल्कि उनके मवेशियों पर भी टूटती दिखाई दे रही है। परियोजना स्थल के ऊपरी हिस्से पर टिन शेड्स पर इनके रहने की व्यवस्था न हो पाने और विस्थापित किये गये लोगों को करीब 10-12 किमी दूर जोशीमठ में रखने के कारण यह व्यवस्था और भी विकराल रूप में सामने आ रही है। 110 परिवारों के इस गांव की आबादी करीब 630 है। इनमें से 25 घरों के लोग तो सड़क पर आ चुके हैं और शेष ग्रामीणों के सामने बेघरबार होने की समस्या खड़ी हो गयी है।

भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के निदेशक डॉ पीसी नवानी के अनुसार उन्होंने आपदा प्रबंधन विभाग एवं वाडिया इंस्टीट्यूट के भूवैज्ञानिकों के सहयोग से चाईं गांव का प्राथमिक सर्वेक्षण कर रिपोर्ट उत्तराखण्ड सरकार को सौंप दी है। उन्होंने बताया कि यह भूस्खलन चांई गांव के दोनों ओर के नालों के कारण हो रहा है। उन्होंने आशंका जतायी कि यह विष्णु प्रयाग जल विद्युत परियोजना की 12 किलोमीटर लम्बी सुरंग के लीकेज के कारण भी हो सकता है। नवानी ने बताया कि अभी इस मामले में विस्तृत सर्वेक्षण किये जाने की जरूरत है,ताकि इस भूस्खलन के असली कारण सामने आ सकें। इस संबंध में इस परियोजना का संचालन करने वाली जयप्रकाश कम्पनी से कुछ विवरण मांगे गये हैं। उन्होंने बताया कि यह भूस्खलन नाले की दिशा बदलने के कारण भी हो सकता है। अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर एक भूवैज्ञानिक का कहना था कि यद्यपि इस सुरंग का निर्माण करने वाली जयप्रकाश कम्पनी के पास सुरंग निर्माण की विशेषज्ञता हासिल है और उनकी बनायी हुई सुरंगों में अब तक इस तरह की कोई शिकायतें नहीं आयी हैं, फिर भी यहां इस आपदा का कारण सरसरी तौर पर सुरंग का रिसना प्रतीत हो रहा है।
प्रख्यात पर्यावरणविद् एवं चिपको आंदोलन के प्रणेता चण्डी प्रसाद भट्ट ने चांई गांव का दौरा करने के बाद बताया कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में जल विद्युत क्षमता का अविवेकपूर्ण दोहन का पहला दुष्परिणाम सामने आ गया है और भविष्य में इस प्रकार की आपदायें आम हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री को पहले ही आगाह कर चुके हैं कि इस तरह प्रकृति के साथ बेतहाशा छेड़छाड़ कर विकास के सपने देखना मानवता के साथ खिलवाड़ करना है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में जहां यह परियोजनायें बन रही हैं, वहां का पारिस्थितिकीय तंत्र बेहद संवेदनशील है और कुदरत किसी भी रूप में अपना गुस्सा प्रकट कर सकती है

 

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