Author Topic: Articles By Shri Pooran Chandra Kandpal :श्री पूरन चन्द कांडपाल जी के लेख  (Read 49514 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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साहित्यकार श्री पूरन चन्द कांडपाल जी के लेख
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Dosto,

Today Shri Pooran Chand Kandpal ji joining merapahad community. Shri Kandpal JI is a famous writer and  poet.

Kaandpal ji will write articles on uttarakhnd here. Hope you would like his articles.

Regards,

M S Mehta
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About Pooran Chand Kandpal JI

BOOKS WRITTEN-

- Jagar    (Upanyas)
- Banjar Mein Aankur (Upanyas)
- Kargil Ke Ranbankure (kargil yudh 1999)
- Ye Nirale (Kuchh Maha Manav Jeevanee)
-  Uttrakhand Ek Darpan (Uttrakhand ki tasveer)
-  Smriti Lahar (Kavita Sangraha)
-  Pokhar Ke Moti (Kahani Sangraha)
-  Bachpan Ki Buniyad (Bal Sandesh)
-  Sharab Dhumrapan Aur Aap (Swasth Shiksha)
-  India Gate Ka Shaheed (Lekh Sangraha)
-  Ukao Horao (Kumaouni Geet-Kavita'Vyanga
-  Bhal Karau Chyala Tweel (Kumaouni Kahani Sangraha)
-  Jindgi ki jung (Kahani Sangrah)
-  Yaado Ki Kalika (Kavita Sangrah)
-  Ujale Kee or (Lekh Sangrah)
-   सच की परख (कहानी संग्रह)

-   Himmat (Nasha Mukti)
-   यथार्थ का आईना (राष्ट्रहित के  १०१ मुद्दे)


राजनीति शास्त्र मे स्नातकोत्तर श्री कांडपाल जी रूडीवादी एव विकास के बादक प्रम्पराओ का विरोध करते है ! अंध विश्वास मिटाने, शीदो को ने भुलाने, देश प्रेम की जाग्रति, वधुवा मजदूर मुक्ति इता करमा प्रधानता को अपना लक्ष बनाते हुए वे बिगत दशको मे कई पुस्तके लिख चुके है है, जिनमे रूदिवादी एव बधुवा मजदूर के विरूद मे दो उपन्यास, एक कहानी संग्रह एव कविता संग्रह सम्मिलित है ! उत्तराखंड एक दर्पण, तथा उकाव - होरव ( कुमोअनी) २००७-२००८ की रचनाये है !
 `

Pooran Chandra Kandpal

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मित्रो बाबा उत्तराखंडी को कौन भूल सकता है. इस वीर पुरुष ने उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण बनाने की लिए ३८ दिन के आमरण अनशन के बाद अपना जीवन बलिदान क़र दिया. आज गैरसैण के लिए आवाज गूँज रही है. यह आवाज बंद कानो तक अवश्य पहुचेगी. जरुरत है मिलकर आवाज उठाने की.

dinesh dhyani

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मान्यवर
काॅंड़पाल ज्यू नमस्कार। आप विचार से मि पूरि तरौं सैमत छौं, राजधानी का नौं फर जनता को दगड़ राजनतौं न यों जु मजाक करि यां कु जबाव नेतों थैं दीण वास्त जनता लिजि जागरूक होण चयेनु। राजधानी लिजि हमुसणि एक हौर आन्दोलन शुरू कन पोडलु यनु दिखेणूं चा। पाड़ कि राजधानि पाड़ म बणौंण लिजि पुनः एक बार सब्बि लोकु थैं सड़कौं म उतरण पोड़लु। आशा छा कि जनता ईबेरि बि अपणि अस्मिता और पछाण का वास्त एकजुट होलि।
सादर।
आपकु अनुज
दिनेश ध्यानी

Pooran Chandra Kandpal

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                         हमारी बोली भाषा  ज्योंन धरो   

     १. कुमाउनी और गढ़वाली भाषा कें मान्यता दिलून और भारतीय सम्विधानेकी  आठूं  अनुसूची में शामिल
       करनछ.  उतराखंड में इस्कूली कोर्स में एक विषयक रूप में कुमाउनी या गढ़वाली भाषा कें शामिल करुन्छ .

         २. हामुल सब जग आपनी भाषा में बात करंछ . आपनी भाषा बुलान में शर्म करण निचेनी बल्कि गर्भ करंचेंछ.

          ३.उत्तराखंड में आजि तक हमरि भाषा अकेडमी न्हान. विकी स्थापना करनछ.

          ४.जसिके हमुल हिंदी और अंगरेजी सीखी उसीके कुमाउनी और गढ़वाली लै सीखो.

          ५.घर में आपण नना कें लै आपणी भाषा सिखुन्चेंछ.

Pooran Chandra Kandpal

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         आजकल तो गैरसैण की ही बात चल रही है और यह चलनी भी चाहिए. राज्य आन्दोलन की तरह इस मुद्दे को भी जन समर्थन मिलने वाला है बल्कि मिल रहा है. इस बीच मुझे एक मेल मिली की कुमाउनी बोली मीठी है और गढ़वाली बोली खट्टी है. यह मेल लिखने वाला भी एक गढ़वाली भाई है. मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी. दोनों ही भाषा और बोलियाँ मीठी हैं. इस तरह का नया बवाल खडा नहीं किया जाना चाहिए. हमको दोनों ही बोलियाँ सीखनी हैं. कुमाउनी वाले गढ़वाली सीखें और गढ़वाली वाले कुमाउनी सीखें. यदि हम ऐसा नहीं कर सके तो राजधानी गैरसैण कैसे जायेगी. हम भारतीय हैं फिर उत्तराखंडी हैं और उसके बाद कुमाउनी और गढ़वाली बोली भाषा की बात होनी चाहिए. धन्यबाद . पूरन चन्द्र कांडपाल

Pooran Chandra Kandpal

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                               देवभूमि तो है परन्तु 

            कुछ दिन पहले उत्तराखंड की हालत पर में एक मेल के उत्तर में मैंने लिखा की उत्तराखंड जो कभी देवभूमि या वीरभूमि के नाम से जानी जाती थी उसे अब शराबियों,नशेड़ियों और अन्धाविश्वाशियों ने शराबभूमि, धुम्रपानभूमि और अन्धाविश्वशाभूमि बना दिया है. उस बंधू को यह बात अच्छी नहीं लगी. अच्छी बात तो नहीं है परन्तु आप जमीन पर जाकर देखें यह बात आपको सत्य मिलेगी.  हम लोग भी जब उत्तराखंड जाते हैं उन्ही लोगों में शामिल हो जाते हैं.  हमने कभी विरोध का बिगुल नहीं बजाया . उन्ही के साथ शराब पी, धूम्रपान किया और मंदिरों में बकरी काटी या पशुबलि दी.  तो फिर देवभूमि को सुधरेगा कौन. मश्मश्मशाने से कुछ नहीं होता. विरोध करने की हिम्मत करनी पड़ेगी.  बहार नौकरी करनेवाले स्वयं अपने से पूछें की क्या कभी वे अपने घर या रिश्तेदार के पास कोई पुस्तक भी ले गए जिससे उनमें बदलाव आये. हमें ही पहल करनी होगी. तब बदलाव आएगा और तभी देवभूमि का भला होगा. धन्यवाद . पूरन चन्द्र कांडपाल .

Pooran Chandra Kandpal

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                                                निराश न हों.

                     कभी कभी लोग कहते हैं हमारे देश का क्या होगा, हमारे राज्य का क्या होगा

           ' एक ही उल्लू काफी था बर्बाद गुलिस्तान  करने कl
           हर शाख पै उल्लू बैठा है अंजाम ए गुलिस्तान क्या होगा'

                 मैं कहता हूँ -  उठ जाग अब मत सुप्त रह
                         मातृ भूमि कह रही,
                                   भगाओ इन उल्लूओं को,
                                   क्यों शाख मेरी ढह रही,
                                   देश का मिल राग गा
                         मत अलग ढपली लड़ा ,
                                           संस्कृति खतरे में पड़ी
                               जब देश खतरे में पड़ा.  
                                                                  पूरन चन्द्र कांडपाल
                                                              

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Very well said Kandpal Ji..

                                                 निराश न हों.

                     कभी कभी लोग कहते हैं हमारे देश का क्या होगा, हमारे राज्य का क्या होगा

           ' एक ही उल्लू काफी था बर्बाद गुलिस्तान  करने कl
           हर शाख पै उल्लू बैठा है अंजाम ए गुलिस्तान क्या होगा'

                 मैं कहता हूँ -  उठ जाग अब मत सुप्त रह
                         मातृ भूमि कह रही,
                                   भगाओ इन उल्लूओं को,
                                   क्यों शाख मेरी ढह रही,
                                   देश का मिल राग गा
                         मत अलग ढपली लड़ा ,
                                           संस्कृति खतरे में पड़ी
                               जब देश खतरे में पड़ा. 
                                                                  पूरन चन्द्र कांडपाल
                                                               


Pooran Chandra Kandpal

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       प्रिय उत्तराखंडी भाईयो,
               
                               राजधानी गैरसैण नि गयी, रैगे देहरादून
                      राजधानी आयोगक कान में घुसिगिन पिरुवाक बून
                      मुज्जफ़्फ़र्नगराक पिशाचों पर नि लाग कानून
                      शहीद पुछेन्राई किलै बहा हमुल आपण खून
                      को सुनूँ उनरी जै पर बीती
                      को हौ शहीद मेंकें के खबर न्हीती
 
              (राजधानी गैरसैण नहीं गयी, धोखा दिया. नरपिशाचों को सजा नहीं दी, धोखा किया,
              शहीद पूँछ रहे हैं हमने अपना खून क्यों बहाया? आज शहीद परिवारों पर क्या बीत रही
              होगी इसकी खबर किसे है ?)
                                                                                    पूरन चन्द्र कांडपाल
 

Pooran Chandra Kandpal

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                                     रूढिवाद को समझो

                रक्षाबंधन के दिन (५ अगस्त) बग्वाल मेला चम्पावत में देविधूरा मंदिर प्रांगन में खूनी पाषाण युद्घ में लगभग चार दर्जन लोग घायल हो गए. मेला बंद के बाद भी वहां पत्थरबाजी चलती रही. कुछ लोग इस खून खराबे को महिमामंडित करते हैं.  कुछ वर्ष पूर्व तक जिला अल्मोडा की तहसील रानीखेत पट्टी चौगाँव के ग्राम सिलंगी नामक स्थान पर भी ऐसा ही पत्थर मार मेला लगता था.  स्थानीय कई गाँव दो धडों में बंट जाते थे और बैशाखी के दिन संध्या से पूर्व दोनों ऑर से भंयंकर पत्थर बाजी होती थी.  खून बहता था और अंग भंग भी हो जाते थे. यह  खून देवी के नाम पर बहाया जाता था.
                           
                       शिक्षा के प्रसार के साथ स्थानीय लोगों ने इसे बंद करना चाहा तो इसके समर्थकों ने कहा 'खून नहीं बहा तो क्षेत्र में बीमारी फ़ैल जायेगी.  अंततः शिक्षा की जीत हुयी, वहां पर पत्थर बाजी बंद करके लोकगीत गाए जाने लगे.  समय के साथ यह बात आई गयी हो गयी और किसी को कोई दुःख बीमारी नहीं हुयी.

                             हमारे देश में ग्रामीण धरातल पर मेले लगते हैं, वहां खेल कूद होते हैं.  चम्पावत में भी इस पत्थर बाजी की जगह खेलकूद होने चाहिए.  खामों को विभिन्न खेलों की टीमें बनानी चाहिए और जीतने वाली टीम को ट्रोफी दे जानी चाहिए.  हम इस पत्थर बाजी कब तक खून बहाते रहेंगे.  देवी देवताओं के नाम पर कभी पशुबलि , कभी पत्थर बाजी, कभी जागर मशान अनुचित है.  इन रुदिवादी परम्पराओं पर हमें मंथन करना चाहिए. देवी को खुश करने के लिए मनुष्य का खून चढाना स्वयं देवी देवताओं को भी अच्छा नहीं लगता होगा.  इस बात को समझना होगा की अच्छे कार्य करने और प्रार्थना करने से ही देवी देवता प्रसन्न होते है
                                                                                                                                                                                                                पूरन चन्द्र कांडपाल

 

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