Author Topic: Articles On Environment by Scientist Vijay Kumar Joshi- विजय कुमार जोशी जी  (Read 22078 times)

VK Joshi

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रावत जी आपका स्वागत है. समयाभाव के चलते अगला लेख नहीं लिख पाया हूँ, जल्द ही लिखूंगा. समय से अधिक गर्मी मार रही है-साथ बिजली और पानी कि समस्या तो रहती ही है.

VK Joshi

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  •     सिकुड़ता गंगोत्री: भयाक्रांत उत्तराखंड

    जीवनदायिनी, पापविमोचिनी, मोक्षदायिनी गंगा आदिकाल से हिंदुओं की श्रद्धा  पात्र रही है. गंगा ही नहीं हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों को देख ऋग्वेद के  काल में भी इनकी पूरी श्रद्धा के साथ स्तुति की जाती थी. पिछले पचास वर्षों में  हमने इन नदियों को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अब सिकुड़ती गंगा को देख  डर कर हम अपने आप से ही प्रश्न कर रहें हैं, सिकुड रहा है गंगोत्री हिमनद-क्या सूख जायेगी गंगा?
    यदि एकदम साफ़ शब्दों में आपको इसका उत्तर दूँ तो वः है यदि सूख भी जाये गंगोत्री तो भी  कभी न सूख पायेगी गंगा. पर हाँ यदि हमने गंगा के रीचार्ज क्षेत्र को कंक्रीट से  ढक दिया तो कुछ भी हो सकता है.

    खैर गंगा कि बात फिर कभी करेंगे, आज तो जाने गंगोत्री का हाल.
    जल के अगाध स्रोत हिमनदों की चाल पर नजर रखने के लिए १९६९ में बनी  अंतर्राष्ट्रीय समिति ने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (भा भू स) को हिमालय के  हिमनदों के आंकड़े एकत्रित करने का कार्य सौंपा. तब से आज तक ४१ वर्षों से लगातार  भा भू स के हिमनद विज्ञानी हिमालय के समस्त हिमनदों के आंकड़े एकत्रित करने में  कार्यरत हैं. मजे की बाट यह है कि इस कार्य के लिए ये हिम्मती विज्ञानी हिमनद पर  रह कर उसके सभी आंकड़े एकत्रित करते हैं. हिमनद की चल भी समय-समय पर मापी जाती है. 
    गंगोत्री हिमनद भागीरथी द्रोणी में स्थित है. इस द्रोणी के ७५५.४३ वर्ग किमी  क्षेत्र में २३७ हिमनद हैं, जिनमे ६७.०२ घन किमी हिम का भंडार है. गंगा के स्रोत  गंगोत्री को आसपास के अनेक हिमनद सदियों से हिम देते रहें हैं. जैसे बड़ी नदियों कि  धारा अनेक छोटी नदियों के मिलने से बनती है, बड़ी होती जाती है, वैसे ही अनेक छोटे  हिमनदों से मिलकर बड़ा हिमनद बन जाना प्रकृति में आम होता है.

    गंगोत्री में नौ हिमनद थे जो उसमें हिम का योगदान करते थे-इनमे से रक्तवर्ण,  चतुरंगी, मंडा, भृगुपन्त एवं मेरु इतने पीछे जा चुके हैं कि अब हिम के स्थान पर  मात्र जल दे पाते हैं. शेष चार हिमनद कीर्ति, घनोबिम, स्वच्छंद एवं मैदी आज भी  सक्रिय रूप से अपना अंशदान करते हैं. गंगोत्री हिमनद के मुँह से गंगा कि अविरल धारा  हजारों वर्षों से बह रही है. हिमनद एवं नदी दोनों चलायमान हैं-अंतर मात्र इतना है  कि नदी आगे बढते हुए सागर में विलीन हो जाती है और हिमनद धीमी गति से पीछे हटता  जाता है. जिस प्रकार नदी की धारा के रूप समय एवं मौसम के अनुरूप बदलते रहते हैं  उसी प्रकार हिमनदों के भी आकार बदलते रहते हैं. यह क्रम दोनों कि उत्पत्ति से आजतक  निरंतर चला आ रहा है.
    १९५६ से २००१ तक के आंकड़ो के अनुसार गंगोत्री हिमनद शताब्दी के पूर्वार्ध में  कम गति (१०.१६ मीटर प्रति वर्ष) से और अंतिम ५० वर्षों में तेज गति (२६.५ मीटर  प्रति वर्ष) की गति से पीछे हटा. इस हिमनद कि पीछे हटने की सर्वाधिक गति ३८.००  मीटर १९७५-७६ में रिकार्ड कि गई.

    आंकड़ो के अनुसार हिमनद का पीछे हटना जारी है. पर प्रकृति में यह कोई नई बाट  नहीं है. वर्तमान में गोमुख समुद्र तल से ४००० मीटर पर गंगोत्री मंदिर से १७ किमी  आगे है. परन्तु इस क्षेत्र कि भूआकृति इस बाट को साफ़ बतलाती है कि काफी समय पहले  गोमुख मंदिर से लगभग १० किमी नीचे स्थित था.

    प्रश्न यह है कि अगले १०० वर्षों में क्या गोमुख सूख जाएगा? क्या गंगा का  अस्तित्व समाप्त हो जाएगा? हिमनद विज्ञानियों के अनुसार ऐसा सम्भव नहीं है. हिमनद  और नदी का कोई मुकाबला नहीं है. हिमनद कि रफ्तार अत्यंत धीमी होती है. पिछली  शताब्दी में गंगोत्री कि पीछे हटने कि गति थोडा बढ़ी अवश्य थी पर उसमे बदलाव आते  रहते हैं. जो गति तब थी अब उस से बहुत धीमी हो चुकी है.

    वायुमंडल का प्रभाव हिमनद पर सीधा पड़ता है. इसलिए गंगोत्री क्षेत्र को प्रदूषण  मुक्त रखना नितांत आवश्यक है. यह तभी सम्भव हो सकता है जब सरकार व समाज दोनों मिल  कर काम करें. टूरिज्म के लालच में आकर इस समय नोट तो कमाए जा सकते हैं पर ऐसा न हो  कि आने वाली पीढियां कहें कि हमारे दादाजी जायदाद तो छोड़ गए पर गंगोत्री अपने साथ  ले गए!

    जय हिंद

VK Joshi

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    जब क्रोधित हो उठा वरुणाव्रत
वर्ष २००३ की बात है उत्तरकाशी में प्रति वर्ष की भांति दशहरे की तैयारियाँ  चल रहीं थीं कि यकायक ऐसी दुर्घटना घटी जिसने सबको थर्रा दिया. हुआ यूँ कि २४  सितम्बर को वरुणाव्रत पर्वत अचानक खिसकने लगा. बस भाग्यवश किसी की जाँ नहीं गयी.  शायद इतिहास में प्रथम बार ऐसा हुआ कि भूवैज्ञानिकों की चेतावनी को जिला प्रशासन  ने गम्भीरता से लिया. अगस्त में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (भा भू स) के भूवैज्ञानिकों  ने  वरुणाव्रत पर्वत की चोटी के आस-पास  सर्वे करते समय देखा कि पर्वी धीमे धीमे नीचे कि ओर खिसक रहा है. बस जैसे ही पर्वत  के ख्सिकने की गति पता चली तो उनके अनुमान की पुष्टि हो गयी और उन्होंने तुरंत  जिला अधिकारीयों से सम्पर्क कर चेतावनी दी. सौभाग्यवश प्रशासन ने उनकी बात कों  गम्भीरता से लिया और रातों रात खतरनाक इलाके से सब परिवारों कों हटाया गया. वरुणाव्रत  का भूस्खलन कितना शक्तिशाली था इसका अनुमान इसी बात से लग जाता है कि लगभग १ करोड़  रूपये की जायजाद नष्ट हो गयी और २५००० लोगो के घर नेस्तनाबूद हो गए. यदि जिला  प्रशासन उस चेतावनी की हमेशा की भांति सूनी-अनसुनी कर देता तो... सोच के ही रोंगटे  खड़े हो जाते हैं. उस दिन जो बड़े बड़े बोल्डर पर्वत से लुड़क कर आए उनकी चपेट में यदि  कोई आ जाता तो बचना तो दूर की बात शायद लाश तक न बचती!
एक अचम्भे की बात है कि हिमालय के जितने भी तीर्थ स्थल हैं वे सब जोखिम भरे  स्थानों पर ही हैं. हिदुओं के पावन तीर्थ गंगोत्री का रास्ता उत्तरकाशी से होकर ही  जाता है. पिछले तीन-चार दशकों में उत्तरकाशी ने प्रकृति के कुछ रौद्र रूप देखे  हैं. भागीरथी की एक सहयोगी नदी की धारा एक भूस्खलन से ७० के दशक में बंध गई. जब यह  बाँध फटा तब उत्तरकाशी वासियों को अचानक उफनती नदी की बाद का सामना करना पड़ा. उसके  बाद १९८० का ज्ञानसू भूस्खलन और १९९१ के भूस्खलन ने तो यहाँ के वासियों को झकझोर  दिया. पर दिक्कत यह है कि मान याददाश्त क्षीण होती है-इतने जोखिम देखने के बावजूद  लोगों ने जोखिम भरे स्थानों पर बसासत कर ली.
पर्वतीय ढलानों और भूस्खलन का चोली-दामन का साथ है. बरसात हुई नहीं कि अनेक  ढलान चल पड़ते हैं नीचे की ओर. पर्वतीय ढलानों पर खिसकने वाली चट्टाने आमतौर पर एक  प्राकृतिक संतुलन से टिकी रहती हैं. पर यदि किसी कारणवश यह संतुलन बिगड गया तो  इनको असुन्त्लित होकर खिसकते डेरी नहीं लगती. इस संतुलन के गडबडाने के प्राकृतिक  कारण तो होते ही हैं पर अनेक बार विकास की आंधी भी इस क्रिया में योगदान करती है.
उत्तरकाशी में घाटी संकरी है और आबादी नदी के किनारे बसी हुई है. संकरी घाटी  होने के कारण मकान बनाने की जमीन की तंगी स्वाभाविक है. साथ ही सड़क भी संकरी हो  चली थी. अतएव जब चौरस जमीन निकानले के लिए तथा सड़क चौड़ी करें के लिए घाटी के  किनारे की ढलान को काटा गया तो चट्टानों का प्राकृतिक संतुलन बिगड गया. इन ढलानों  को बाँध कर रखने में वृक्षों का अपना अलग योगदान होता है. जब  ढलान को कटा गया तो वृक्ष तो चपेट में आने ही थे. साधारणतया शांत रहने वाला वरुणाव्रत  चल पड़ा नीचे को.
उत्तरकाशी जनपद की भूआकृति में वह सब गुण हैं जो भूस्खलन प्रारम्भ करने में  मदद करते हैं. इस क्षेत्र की समुद्रतल से ऊंचाई २५०० मी से ७१३८ मी है. इनमे से  ऊंची चोटियाँ हिमाच्छादित रहती हैं. हिमनद की बर्फ या जाड़ों में पड़ी बर्फ की कटान  से पर्वत श्रेणियाँ नुकीले शिखरों के साथ तेज धार वाली आरी के समान बन हो जाती  हैं. हिम की कटान से चट्टानों का चूरा एवं उनमे जोड़ पैदा हो जाते हैं. इन ढलानों  में नीचे की ओर जो कभी हिमनदी घाटी थी उसको भागीरथी ने काट कर अपनी घाटी बना लिया  है जिसके दोनों पार्श्व एकदम सीधी ढाल वाले हैं. एक अजीब स्थिति है-ऊपर जहाँ ढलान  तीक्ष्ण नहीं है वहाँ बर्फ के कारण चट्टाने कमजोर हैं और उनका चूरा निरंतर बनता  जाता है. नीचे जहाँ चट्टाने थोडा मजबूत हैं वहाँ ढलान इतनी अधिक है कि जरा सा मौकअ  मिला नहीं कि चट्टानों का संतुलन बिगड जाता है. गनीमत है कि नीचे की ओर ६० डिग्री  से अधिक की ढलान होने के बावजूद वृक्षों कि जड़ों की पकड़ से आमतौर से ढलान स्थिर  रहती हैं. पर हाल के वर्षों में जमीन के प्रयोग में भरी बदलाव आने के कारण इन  ढलानों को काफी खतरा पैदा हो चुका है.
उत्तरकाशी की ढलानों पर मार्च-अप्रैल में जब बर्फ पिघलती है तथा बरसात के  मौसम में पानी चट्टानों को चलायमान करने में चिकनाई की भाँति काम करता है-जिस पर  टूटी चट्टानें तथा हिम के दबाव में पिसी चट्टानों का चूरा आसानी से बह कर/फिसल कर  नीचे आने लगता है. जब एक बार यह प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई तो लगता है समूचा पर्वत  ही नीचे आ जाएगा! इसके रास्ते में वृक्ष, मकान जो कुछ भी आता है उस पर लगता है  मानों बुलडोजर चल गया हो!
ऐसा नहीं है कि पहाड़ के निवासी इस आपदा से अनभिग्य हैं-सब कुच्छ जानते समझते  हैं पर फिर भी जोखिम वाले स्थानों में घर बना कर और कुछ समय बाद घर को और बड़ा करने  के चक्कर में अपने और आस-पास के लोगों के लिए आपदा बुला लेते हैं. उत्तरकाशी में  कुछ ऐसा ही हुआ. ऐसा न्ह्यीं है कि वाहन प्रथम बार भूस्खलन हुआ हो. पूर्व में भी  हो चुका है. पुराने भूस्खलन के मलबे के स्थिर हो जाने पर उसके ऊपर घर बना लिए गए.  कुछ गलती मकान बनाने वालों की और उससे बड़ी गलती नक्शा पास करने वालों कि होती है.  यदि स्थानीय निकाय में कार्य कर रहें लोग कुछ वर्षों के लिए सख्त हो जाये तो ऐसे क्षेत्रो  में हजारों जाने बच सकती हैं.
नीचे बसे लोग इस बात से अनभिग्य हैं कि वरुणाव्रत के ऊपरी भाग (ऊत्तरकाशी  नगर से ७०० मी ऊपर) से एक त्रिशूल के आकार का भूस्खलन वर्षों से एक्टिव है. पूर्व  में ताम्बाखाणी और ज्ञानसू के भूस्खलनो से यह भूस्खलन प्रभावित हो चुका है. यह  दोनों भूस्खलन त्रिशूल के दाये व बाये पार्श्व थे तो ऊत्तरकाशी भूस्खलन बीच वाला  भाग है. इस भूस्खलन से लगभग ४० से ५० हजार घन मी मलबा नीचे आया, जिससे लगभग ३६२  मकान, टूरिस्ट लौज आदि ध्वस्त हो गए. यहाँ तक कि कलेक्ट्रेट कम्पाउंड के अंदर भी  कुछ भवन ध्वस्त हो गे. उत्तरकाशी-गंगोत्री सड़क मार्ग बंद हो गया, जिसे खोलने में  एक महीना लगा. इस एक कि मी लम्बे मलबे के ढेर को हटाना मामूली बात नहीं थी. नीचे  से बुलडोजर जितना हटाते उससे दोगुना ऊपर से और आ रहा था. वर्षा अलग मुसीबत किये  हुए थी. इस भूस्खलन से जो नुक्सान हुआ है उसकी भरपाई पैसों से नहीं हो सकेगी,  क्योंकि हजारों वृक्ष भी इसकी चपेट में आ गए. जो वृक्ष नष्ट हो गए उनको दुबारा पूर  जैसी स्थिति में आने में सौ वर्ष लगेंगे.
इस बार का भूस्खलन १२ वर्ष बाद हुआ था. इन १२ वर्षों में घाटी में खूब मकान  बने. देखने में शांत का क्रोध बहुत विकट है. जब भी उत्तरकाशी निवासी और निकाय में  कार्यरत लोग नियमों का उल्लंघन करते रहेंगे- वरुणाव्रत का क्रोध झेलते रहेंगे.
जय हिंद
 





एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जोशी जी ... मेरा पहाड़ पोर्टल आपका आभारी है जी हम लोग आपने जरिये इतनी महतवपूर्ण मिल रही है !

उत्तरकाशी या यह भूसक्लन वास्तव में बहुत भयानक था!  जैसे की हम फोटो में देखते है!   जोशी जी इसके कारण मुख्य रूप से क्या हो सकते है !  पेड़ो का ज्यादे कटना या जमीन के अन्दर की हलचल?


VK Joshi

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मेहता जी उत्तरकाशी भूस्खलन के लिए प्रकृति और लोग दोनों ज़िम्मेदार हैं. प्रकृति पर तो अपना जोर नहीं पैर लोग यदि म्युनिसिपल क़ानून का उल्लंघन न करें तो काफी बचाव हो सकता है. इस भूस्खलन से हजारों जाने चली जाती यदि जिला प्रशासन चेतावनी की अनसुनी क्र देता तो. खतरा तो अभी है ही, भले ही कुछ समय के लिए टल गया हो.  उतने समय में लोग भूल चुके होंगे की कभी भूस्खलन हुआ था...!

VK Joshi

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    छकाते पर भूस्खलन का खतरा अब भी है
 
[/color]नैनीताल का नाम याद करते ही सुरम्य झील और चारों ओर पहाड़ों पर घने देवदार और  अयार के वृक्षों की चादर की छवि मन में उभरती है. किसी जमाने में नैनीताल क्षेत्र  को कुमाउनी में छकाता अर्थात ६० झीलों वाला क्षेत्र कहा जाता था. कालान्तर में  अधिकांश झीलें तो समाप्त हो गयीं, जो बची हैं (नैनीताल, भीमताल, नौखुचियाताल,  सातताल) आदि का अस्तित्व भी अब खतरे में है. इनमे से सबसे अधिक पर्यटकों को लुभाता है नैनीताल, जिस पर इस समय आबादी का  दबाव भी चरम सीमा पर है. १८४० में जब रोज़ा के घुमंतू, व्यापारी बैरन अपने फौजी  मित्र से मिलने रातीघाट कैम्प गया तो अनजाने में नैनीताल के रास्ते चला गया. वहाँ  की झील और नैसर्गिकता देखकर बैरन मुग्ध हो गया. अगले वर्ष अपने मित्र के साथ वः  दुबारा आया. इस बार वह रातीघाट से सीधा लड़ियाकांटा जा पहुंचा. शेर का डांडा के  शिखर से जो दृश्य दोनों ने देखा तो इतना मोहित हो गए कि निश्चय कर लिया कि कैसे भी  हो नैनीताल में जमीन खरीदेंगे. तब नैनीताल गद्दी लोगों की चरागाह हुआ करता था.  कहते हैं सारी मिल्कियत नरसिंह थोकदार की थी. दोनों अँगरेज़ अपने साथ २० की नाव भी लेकर गए थे. नरसिंह  को झील में नौकाविहार का लालच देकर दोनों ने बीच झील में डुबो देने की धमकी देकर  लगभग पूरा नैनीताल अपने नाम स्टाम्प पेपर पर अंगूठा लगवा कर झटक लिया. एवज में  मामूली सी रकम सरकार से दिलवा दी.वहाँ से प्रारम्भ हुआ नैनीताल का शहरीकरण. तब से अब तक अनेक भूस्खलनो की मार नैनीताल  ने सही है. आज के नैनीताल का बहुत बड़ा भाग पुराने भूस्खलनों के मलबे पर बसा हुआ  है. नैनीताल  नगर नया-नया बसना प्रारम्भ हुआ था कि १८६७ में अचानक नैना पीक (चाइना पीक) वाले  पर्वत की ढलान यकायक चल पड़ी नीचे की ओर. बरसात के दिन थे और पानी कि उचित निकासी न  हो पाने के कारण भूस्खलन हो गया. चूना पत्थर का यह मलबा कालान्तर में पानी में घुल  कर ठोस हो गया. उस मलबे के ऊपर बन गई बहुत सी इमारतें-जैसे मेट्रोपोल होटल,  सचिवालय आदि. यह भूस्खलन इतना तगड़ा था कि नैनीताल क्लब के बाहर कि ओर कि इमारतें  जैसे शैले हॉल तक खतरे में आ गई. इस घटना से सबक लेकर अंग्रेजों ने इस ढलान पर ही नहीं बल्कि नैनीताल की समस्त  ढलानों पर नालियों और नालों का जल निकासी के लिए निर्माण किया. पर इसके बावजूद  १८८० में भरी वर्षा के कारण शेर का डांडा की ढलान खसक कर आ गई नीचे. बैरन ने जब  नैनीताल में घर बनाया तथा अपने इष्टमित्रों को भी निमंत्रित किया कि यहाँ आकर  बसों, तब उसने सब बातों का तो ध्यान रखा, पर भूस्खलन की सम्भावनाओं कि ओर उसका  ध्यान गया ही नहीं. परिणामतः १६ सितम्बर १८८० को प्रारम्भ हुई भीषण वर्षा से ४०  घंटों में २५  बारिश हो गई. साथ में तेज हवा भी चलती रही. लगभग १० बजे विक्टोरिया होटल के पीछे  ऊपर से पत्थर गिरना शुरू हुए. शेर का डांडा का पूरा पर्वत मानों पानी से भीगी हुई  लुगदी के समान उस समय हो चुका था. बस चंद मिनिटों में भूस्खलन प्रारम्भ हो गया.  प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक ऐसा तो होना ही था क्योंकि नगर विकास कर रहे लोगों  ने पानी की निकासी के उचित प्रबंध किये ही नहीं थे. इस भूस्खलन में १९३ लोग मारे  गए. कुल आठ मिनिट में सब खेल समाप्त हो गया. उस दौरान लोगों को ऐसा लगा मानों  पर्वत के गर्भ में बादल गरज रहे हों. इतना अधिक मलबा आया कि झील का उत्तरी भाग पट  गया-जिस आज फ्लैट्स के नाम से जाना जाता है.शेर का डांडा के ढलान आज एकदम शांत एवं सुरक्षित प्रतीत होते हैं! उन पर  देवदार और अयार के जंगलों के स्थान पर मकानों के जंगल उग आये हैं. कुछ वर्ष पूर्व  किये गये सर्वेक्षण के अनुसार शेर का डांडा के ढलान के कुछ खम्बे २ से मी प्रति  वर्ष कि दर से झील की ओर को झुक रहे हैं. उधर ढलान के ठीक नीचे झील के किनारे १८७३  में बने ग्रैंड होटल पिछले तीन दशकों में १.५ मी से  अधिक धंस चुका है. उसे प्रकार झील के किनारे के वृक्ष १० से ३५ डिग्री के अंश पर  झील की ओर झुक गए हैं. यह सब साक्ष्य इंगित करते हैं कि नैनीताल में पर्वत के गर्भ  में उथल-पुथल चल रही है. तीन चौथाई से अधिक नैनीताल भूस्खलनो की दृष्टि से  असुरक्षित हो चुका है, फिर भी हम वहाँ घर बनाने की होड़ में लगे हैं.१८८० के आठ मिनिट में तो मात्र १९३ जाने गई-आज की तारीख में यदि वैसे आठ मिनिट  पुनः हो गए तो गजब हो जाएगा. इस त्रासदी से बचने के लिए सरकार से अधिक नानिनीतल  वासियों को सोचना होगा. यद पर्वतीय ढलानों पर जल निकासी का उचित प्रबंध न हो तो  परिणाम जोखिम भरे होते हैं. यद भूस्खलनो कि मार से बचना है तो जल निकासी की  नालियों और नालों को अवरुद्ध होने से बचान होगा-कृपया देख ले कहीं आपका घर ही तो  निकासी में अवरोध नहीं पैदा कर रहा है?
जय हिंद [/size][/font]

VK Joshi

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मित्रों इधर कुछ दिनों से व्यस्त होने के कारन मेरापहाड़ से मैं गायब हूँ. कुछ दिन की मोहलत और चाहता हूँ, फिर वापस आ जाऊँगा आप सबके पास.
जय हिंद

VK Joshi

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मित्रों व्यस्तता के कारन आजकल मेरापहद से मैं गायब हूँ. शीघ्र लौटूंगा.
जय हिंद

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मित्रों इधर कुछ दिनों से व्यस्त होने के कारन मेरापहाड़ से मैं गायब हूँ. कुछ दिन की मोहलत और चाहता हूँ, फिर वापस आ जाऊँगा आप सबके पास.
जय हिंद

Sure Joshi ji.. Please take your time...

Looking forward more such articles soon.

नवीन जोशी

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जोशी जी, अपने क्षेत्र में बेहतरीन कार्य करने के साथ ही अपने घर "पहाड़" वाशियों को जागरूक करने का आपका प्रयास स्तुत्य है. मुझे आपकी भाषा भी बेहद रोचक लगी, पता ही नहीं चलता कि इतनी गूढ़ बात हो रही है, वरन लगता है कि कहानी पढ़ रहे हैं. में चूँकि पत्रकार हूँ, इसलिए मेरी जिज्ञासा और रूचि "चलक" पर बहुत है.  क्या में कभी आपके लेख की जानकारियों को अपनी सम्बंधित ख़बरों में उद्धृत कर सकता हूँ ? मेरा पहाड़ फोरम से क्या आपसे अपनी जिज्ञाशाएं भी शांत कर सकता हूँ ? 
नवीन जोशी,  राष्ट्रीय सहारा, नैनीताल. संपर्क : 9412037779.

 

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