Author Topic: Journalist and famous Photographer Naveen Joshi's Articles- नवीन जोशी जी के लेख  (Read 62340 times)

नवीन जोशी

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कुमाउनी कविता : तिना्ड़
तिना्ड़न कें कि चैं ?
के खास धर्ति नैं,
के खास अगाश नैं,
के खास घाम नैं,
के खास हौ-
के खास पाणि नैं।
के मिलौ-नि मिलौ
उं रूनीं ज्यून।

किलै ? कसी ?

बांणि  पणि ग्येईं ज्यूंन रूणा्क।
अतर,
उना्र के स्वींण नैं-के क्वीड़ नैं
के खुशि नैं, के दुख-के पीड़ नैं
छन लै त ना्ना-ना्न
ना्ना खुशि-

ए घड़ि घाम मिलि गयौ
कुड़-कच्चारै सई
मणीं ठौर मिलि ग्येई
उं खुशि।
बस जौरौक पांणि
जोरौक घाम
जोरैकि हौकि डर भै।
अर उ निपटि ग्येई
ज्यान बचि ग्येई
उणि-पत्येड़ि-बगि
कैं पुजि जा्ओ
कतुकै मरि-खपि लै जा्ओ
उं फिरि लै खुशि

किलै ? कसी ?

डाड़ मारणौक टैमै नि भै
फिर आंसु  आल लै
पोछल को ?
उं क्वे नकां-मुकां खा्ई
म्वा्ट-तगा्ड़ बोट जै कि भा्य
जनूकैं चैं सबै तिर बांकि`ई बांकि
और तब लै रूनीं डाड़ै मारन।

हिन्दी भावानुवाद: `तिनके´

तिनकों को क्या चाहिए ?
कुछ खास धरती नहीं
कुछ खास आसमान नहीं
कुछ खास धूप नहीं
कुछ खास हवा-
कुछ खास पानी नहीं
कुछ मिले-ना मिले
वे रहते हैं जीवित।

क्यों ? कैसे ?

आदत पड़ गई है जीने की।
वरना-
उनके कोई सपने नहीं-कोई बातें नहीं
कोई सुख-कोई दुख-कोई तकलीफ नहीं
हैं भी तो छोटे-छोटे
छोटी खुशियां-
एक बून्द पानी की मिल गई
तो वे खुश।
एक पल को भी धूप मिल गई
कूड़ा-कीचड़ ही सही
थोड़ी जगह मिल गई
ते वे खुश।
बस, तेज पानी
तेज धूप
तेज हवा की डर हुई।
और यह गुजर गऐ तो
जान बच गई जो
उण-भटक-बह कर
कहीं पहुंच जाऐं
कुछ मर-खप भी जाएँ
वे फिर भी खुश।

क्यों ? कैसे ?

रोने का समय ही नहीं हुआ उनके पास
फिर आंसू आऐंगे भी तो पोछेगा कौन ?
वे कोई नांक-मुंह तक भर कर खाने वाले
मोटे-तगड़े पेड़ जो क्या हुऐ
जिन्हें चाहिऐ सभी कुछ अधिक-अधिक ही
और तब भी रहते हैं
हर समय
रोते ही।

इसे यहाँ भी देख सकते हैं :
http://apnimaati.blogspot.com/2010/06/blog-post_04.हटमल

नवीन जोशी

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कुमाउनी कविता :[/font] घुम्तून हुं

म्येरि ज्यूनि
रात्ति व्यांणिकि
या ब्यावैकि
ठण्डि, हउवा-हऊ
हौ
या चुचिक भौ
या घ्यू नौंणिक डौ
या सन्यूत मौ
जसि न्हैं
बिल्कुल न्हैं।

यौ छु बड़ि कट्ठर
बाग-भालुना्क दु-उड्यार
या जोगि-मातना्क
नंग आंग में छा्र फो्कि
धुंणि रमूंणा्क
जोगा्क ड्या्र-डफा्र
में रूंण जसि,
उच्च हिमावा्क डा्नों
भ्योव, कप्फर, पैर-पैराड़
जसि उच्च-निच्च,
ह्यूं जसि´ई अरड़ि
ह्यूं जसि´ई ता्ति
बौड़ि-च्येलिना्क असक-असजिल
घा-लाकड़ोंक गढावों चारी भा्रि
शालुक बगेटों जसि फा्टी
चिरा्ड़ पड़ी खुटों
भालुक जसि बुकाई
मुनी बण्याठै्ल जसि कचकचाई
मांखोंल भनभनाई जस घौ।
हौर, यस्सै म्यर लाड़!

खा्लि घुमंड़ हुं नैं
मांथी-मांथी´ई चै उड़ंण हुं नैं
आपंण सामव दगड़ै ल्यै
यां खांण-पिंण हुं
सैर-तफरीह करि
इकें बिग्यूंण हुं
कै-कैं इजाजत न्हैं।

भल् मा्नो नक्
आला... अया
तुमि हमा्र परमेश्वर भया
सौ फ्या्र अया।
पर धरिया धियान
यां ऐ, यां कै खा्ण
यां कै पिंण
यां कै लगूंण
यां कै बिछूंण पड़ल
मिकैं भोगंण पड़ल
म्यरै बड़ंण पड़ल।
जो छु मंजूर
त आओ, सौ फ्यार आओ,
तुमि हमा्र परमेश्वर भया।


मेरी जिन्दगी
अल सुबह
या शाम की
ठण्डी, हल्की
हवा
या गोद के बच्चे
या घी मक्खन की डली
या ताजे शहद
सी नहीं है,
बिल्कुल ही नहीं है।

ये है बड़ी कठिन
बाग-भालुओं  की गुफा
या जोगी महात्माओं के
नग्न  शरीर में राख पोत
धूनी रमाने के
डेरों, कुटियाओं
मैं रहने जैसी,
ऊंची हिमालयी चोटियों
विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाली पहाड़ियों
जैसी ऊंची-नींची,
बर्फ सी ठण्डी
और बर्फ जैसी ही गर्म!
बहु-बेटियों के सामर्थ्य से भारी व असहज
घास-लकड़ी के बोझों से भारी
चीड़ की छाल सी फटी
भालू से नोंची गई सी
अभिमन्त्रित तलवार से पीटी हुई
ज्यों घाव पर भनभनाती मक्खियाँ.
और, ऐसा ही मेरा प्यार!

खाली घूमने को नहीं
ऊपर-ऊपर से ही देख कर उड़ने को नहीं
अपना भोजन साथ लाकर
यहां खाने-पीने
सैर तफरीह कर
मुझे भोगने-दूषित करने की
किसी को इजाजत नहीं
अच्छा मानो या बुरा
आना हो तो आइयेगा
आप हमारे परमेश्वर ठहरे
सौ बार आइयेगा।
पर रखिऐगा ध्यान
यहां आकर, यहीं का खाना
यहीं का पीना
यहीं का पहनना,
यहीं का बिछौना प्रयोग करना होगा
मुझे महसूस कर भोगना होगा
मेरा बनना पड़ेगा।
जो है मंजूर
तो आइये , सौ बार  आइये
आप हमारे परमेश्वर ठहरे।

नवीन जोशी

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2.  कुन्ब

अहा उं दिन
जब छियूं मैं लै अद्बिथर नैं पुर्रे मैंस जस,
दस दिस चांड़ी ऑख
हा्तिक जा् जंगा्ड़
बहौड़ा्क जा् का्न
मजबूत सुदर्शन आंग।

काना्क जा्ग कान
हाता्क जा्ग हात
खुटोंक जा्ग खुट
अर कपावा्क जाग कपाव।

और एक यं दिन !
जब म्यारै हात घम्कूणईं म्यारै ऑग कैं
खुट लत्यूणयीं कपाव कैं
कान न सुणणा्य, जि मूंख बलांणौ
डिमाग न समझणय, जि आंख द्यखणौ
आंगुल नांक बुजि लि रईं,
सुंगण न दिणा्य,
दान्तौल जेल बंणि गोठ्यै हालौ जिबौड़
चाखण न दिणा्य
सब उड़ंण चांणयीं
सब स्वींड़ द्यखणईं-सतरंग स्वींड़
उ लै स्वींड़ द्यखणौं, उ लै अर...उ लै...
और उं उड़ि ग्ये...यीं
म्या्र लिजी करि ग्येयीं-सतझड़ि
हात-खुट, ऑख-कान....
सब झड़नईं-एक-एक कै
इकल-इकलै !

फिरि,
हातोंल बने हालौ आपंण अलग ऑग!
खुटौंल अलग,
ख्वरा्क बाव लै अलग-अलग झड़ि
बणूणयीं आपंण अलग-अलग ऑग,
सब्नैलि अलग-अलग छजै हाली आपंण ऑग
बजार में बिचाड़ हुं धरी शिकारा्क बॉट जा.

आब खुटों थें ऑख न्हैतन
आखन थें डिमाग न्है
अर डिमाग थें ऑग न्है
कै थें आपंण अलावा क्ये न्है

मैं, कुन्ब कूंछी जकैं
आब है/रै गोयूं कुञ्ज-कुञ्ज
आब आज, अर रोजै, हर रोजै
मैं द्यखणयूं-
उं दिक् है ग्येयीं-इकलू बानर है बेर
उं उंणयीं वापिस....
मैं हात पसारि भै रयूं
कि मैं स्वींण द्यखणयूं ....?
हिंदी भावानुवाद

अहा, वे दिन भी क्या दिन थे!
जब मैं भी था पूरा मनुष्य सा...
दसों दिशाओं को देखने वाली आखें
हाथी सी जंघाएँ
वृषभ से कंधे
मज़बूत सुदर्शन शरीर...
कान की जगह कान
हाथ की जगह हाथ
पाँवों की जगह पाँव
और मस्तिस्क की जगह मस्तिस्क.

और एक ये दिन
जब मेरे ही हाथ, घूँसे ताने है मेरे ही शरीर पर
पाँव लात मार रहे हैं, मस्तिस्क को
कान नहीं सुन रहे, मुँह के बोले शब्द
दिमाग नहीं समझ रहा, आँखों के देखे दृश्य
अँगुलियों ने पकड़ बंद कर ली है नाक,
सूंघने नहीं दे रहीं
दाँतों ने कैद कर ली है जीभ,
चखने नहीं दे रहे

सब अलग अलग हो रहे हैं
शरीर से गिर रहे हैं, एक एक कर
और बनाने लगे हैं अपने अलग अलग शरीर...

हाथों, पाँवों...
यहाँ तक की सिर के बालों ने भी
गिर कर बना लिए हैं, अपने अलग शरीर
और रख लिए हैं, अलग-अलग,
बाज़ार मैं बेचने को रखे मांस के हिस्सों की तरह....

अब पाँवों के पास आखें नहीं है
आँखों के पास मस्तिष्क नहीं है
और मस्तिष्क के पास हाथ नहीं..
किसी के पास अपने अलावा कुछ नहीं....

मैं, 'परिवार' कहते थे जिसे
टुकड़े टुकड़े हो गया हूँ।
मैं देख रहा हूँ
वे परेशान हो गए हैं, आ रहे हैं वापस
मैं हाथ पसारे बैठा हूँ
क्या मैं सपना देख रहा हूँ?

नवीन जोशी

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कुमाउनी कविता : अरड़

ह्यूंना्क अरड़ी दिनों में लै
कां रैगो आब
पैलियौक ज अरड़

म्येसी ग्येईं मैंस
बारमासी
अरड़ी
रिस्त-ना्तना्क
अरड़ में-
इकलै
बिराउक चार
चुला्क गल्यूटन में लै-

कुकड़ी रयीं मैंस
लकड़ी ग्येईं उना्र जजबात
अकड़ नयीं जै-तैं हुं
हड़की कुकुरों चार।

को् भा्गि कैं मिलणौ आब
इजक लाड़
को् थांणौ आब
बाबुकि नड़क
को् मानणौ आब
सयांणौकि सला।

कि भै-कि बैंणि
कि च्यल-कि च्येलि
कि धुलौ-कि स्यैंणि
कि दा्द-कि भुलि
कि ब्वारि-कि बोजि
जैं चाओ-वैं ढण्ट
वैं अरड़
बारमासी अरड़।



हिंदी भावानुवाद: ठण्ड

बर्फ़वारी के दिनों मैं भी
कहाँ रह गई है अब
पहले जैसी ठण्ड ,

अभ्यस्त हो गए हैं लोग
बारहमासी
ठन्डे रिश्ते नातों की
ठण्ड में,
बिल्ली की तरह
चूल्हे की
बुझी राख में
अकेले दुबक कर भी,

सिमटे हुए हैं लोग
अकड़ गए हैं उनके जज्बात
घुड़क रहे हैं जिस-तिस से
पागल हुए कुत्तों की तरह,

किस भाग्यवान को मिल रहा है अब-
माँ का लाड़
कौन सह रहा
पिता की डाँट
कौन मान रहा
सयानों की सलाह,

क्या भाई-क्या बहन
क्या बेटा-क्या बेटी
क्या पति-क्या पत्नी
क्या बड़ा-क्या छोटा भाई
जहाँ देखो वहीं दिखावा
वहीँ ठण्ड
बस
बारहमासी ठण्ड.

नवीन जोशी

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कुमाउनी कविता : को छां हम?

को छां हम?

इस्कूल जांणी-
इस्कूली नैं
मांस्टर नैं
ट्यूटरै?

अस्पताल जांणी
इलाज करणी-
डाक्टर नैं
कम्पौडर नैं
चीर फाड़ करणी-
कसाई?

कुड़ सड़क बणूंणी-
इंजीनियर नैं
ठेक्दार नै
सिमंट सरी चोरंणी-
चोरै?

राजनीति करणी-
जनताक सेवक नैं
विकास करंणी नेता नैं
देश बेचंणी-
दलालै?

कोट-कच्छेरि जांड़ी -
पुलिस नैं
वकील नैं
अन्यायिन कें बचूंणी-
सिद्-सादन कैं लुटंणी-मारंण
गुण्डै ?

समाज में रूंणी-
के कै पड़ोसि नैं
इष्ट -मितुर न
सिरफ डबलोंक-
गुबरी किड़ै ?

लछिमिक पुजारि नैं
सवा्रि-
उल्लू ?
हिंदी भावानुवाद

कौन हैं हम?

स्कूल जाने वाले-
विद्यार्थी नहीं,
शिक्षक नहीं,
क्या ट्यूटर?


अस्पताल जाने वाले
चिकित्सक नहीं,
शल्यक नहीं,
क्या चीड़-फाड़ करने वाले
कसाई?


घर-सड़क बनाने वाले
इंजीनियर नहीं,
ठेकेदार नहीं,
सीमेंट-सरिया चुराने वाले
चोर-लुटेरे?


राजनीति करने वाले
जनता के सेवक नहीं,
विकास लाने वाले नेता नहीं,
देश बेचने वाले
दलाल?


कोर्ट- कचहरी जाने वाले
वकील नहीं,
जज नहीं,
अन्याय करने वालों को बचाने वाले
सीधे साधे लोगों को लूटने-मारने वाले...
गुंडे?


समाज में रहने वाले
किसी के पड़ोसी नहीं,
किसी के इष्ट-मित्र नहीं,
सिर्फ पैसों के
गुबरीले कीड़े?


लक्ष्मी के पुजारी नहीं,
सवारी-
उल्लू?

नवीन जोशी

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कुमाउनी कविता: सिणुंक

ठौक लगूंण है पैली
समझि लियो इतुक
मिं सितिल-पितिल
खालि उस-यस
दाड़ खचोरणीं,
कान खजूणीं,
कौ भड्यूणीं क्यड़ जस
नैं....कत्तई नैं।

मिं सिढ़ि बंणि
तुमा्र पुरखन कें
सरग पुजै सकूं,
सूंड में फैटि बेर
हा्थि कें लै फरकै सकूं,

जो कान
सांचि न सुंणन-
फोड़ि सकूं,
जो आं्ख
बरोबर न द्यखन्-
खोचि सकूं,
जो दाड़
भलि बात त बुलान-
ल्वयै सकूं।

फिरि तुमि कि छा ?

म्या्र/सिंणुका्क
टोड़ि बेर न करि सकना द्वि !
हौर मिं
गढ़व जै बंणि जूंलौ...
फिरि कि ?

लड़ला मिं हुं ?
आ्ओ, करि ल्हिओ ओ द्वि-द्वि हात
पर कै द्यूं इतुक
मिं सितिल-पितिल
नैं.....
मिं छुं सिणुंक।


हिन्दी भावानुवाद

छूने से पहले
समझ लो इतना
मैं सरल-नाजुक
खाली ऐसा-वैसा
दांत से फंसा निकालने
कान को खुजलाने
अथवा कौऐ (बेकार की चीजों) को जलाने वाली पतली लकड़ियों जैसा
नहीं हूं, बिल्कुल नहीं हूं।

मैं सीढ़ी बन कर
(एक पौराणिक मान्यता के अनुसार) तुम्हारे पूर्वजों को स्वर्ग पहुंचा सकता हूं
सूण्ड में घुस कर
हाथी को भी मार सकता हूं

जो कान
सच नहीं सुनते-
उन्हें फोड़ सकता हूं।
जो आंखें
सबको बराबर नहीं देखतीं
उन्हें खोंच सकता हूं।
दो दंत पंक्तियां
अच्छी बातें नहीं बोलतीं
उन्हें लहूलुहान कर सकता हूं।

फिर तुम क्या हो ?
मेरे/सींक के
तोड़कर दो हिस्से नहीं कर सकते।
और अगर में सींकों का गट्ठर जो बन जाऊंगा तो
फिर क्या ?

लड़ोगे मुझ से ?
आओ कर लो दो-दो हाथ
पर कह देता हूं इतना
में सरल-नाजुक
नहीं.....
मैं हूं सींक/ तिनका।

नवीन जोशी

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'लौ'

को कूं-
मौत आली
`मिं मरि जूंल´
मिं त एक चड़ छुं
दुसा्र फांग में उड़ि जूंल।

को कूं-गाड़ आली
`मिं बगि जूंल´
मिं त एक ढीक छुं
बस, दुसार ढीक कैं चै रूंल।

को कूं-दौलत आली
`मिं बदई जूंल´
मिं आफ्फी अनमोल छुं
बस, आपूं कैं बचै बेर धरूंल।

मिं काल छुं,बिकराल छुं,
डरो मिं बै।
नानूं भौ छुं,
लाड़ करो मि हुं।
मिं बर्मा-बिश्नु-महेश
मिं बखत जस बलवान छुं।
आदिम कैं मैंस बणूणीं
दुणिया्क कण-कण में बसी
कॉ न्हैत्यूं-को न्हैत्यूं,
यॉं लै छुं-तां लै छुं।
जां जरूरत पड़ैलि-
वां मिलुंल,
थापि दियो कत्ती-न हलकुंल,
बौयां छुं मिं, सोल हात लंब लै।

अरे ! मिं कैं ढुंढण हुं-
कां हिटि दि गोछा ?
मिं तुमा्र भितर-
मिं आपंण भितर
मिं `लौ´।

नवीन जोशी

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Beautiful Bunch of flowers for You.
Bunch of Flowers


and Nainital in Night mode...
1. Black beauty...!


and 2. Night Beauty Nainital


and how natural beauty spreads in Rains:

नवीन जोशी

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कि ल्येखूं ?


कि दि सकूं मिं
कैकैं लै ?
वी,
जि-
मकें मिलि रौ
दुनीं बै।


कि सु नई सकूं मिं
कैकैं लै ?
वी,
जि-
पढ़ि-सुणि-गुणि
राखौ यैं बै।


कि ल्येखि सकूं मिं
त्वे हुं ?
वी,
जि-
त्वील, कि कैलै
कत्ती-कबखतै
कौ हुनलै
कि ल्यख हुनल
जरूड़ै।


अतर-
कॉ बै ल्यूंल मिं
के, तुकैं दिंण हुं,
कि सुणूंल तुकैं नईं ?
कि ल्यखुंल त्वे हुं
अलगै
य दुनी है !
मिं के परमेश्वर जै कि भयूं ।

नवीन जोशी

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