Author Topic: Journalist and famous Photographer Naveen Joshi's Articles- नवीन जोशी जी के लेख  (Read 63316 times)

नवीन जोशी

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जय सीता राम...
नैनीताल की रामलीला की फोटो

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नवीन जोशी

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नैनीताल की खिली धूप में अबाबील: आज में ऊपर...आसमान नींचे...
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नवीन जोशी

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प्रदेश के दिवंगत जनकवि गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' ([/size]जन्म: 09 सितंबर 1945, [/size]निधन: 22 अगस्त 2010) की दो एक्सक्लूसिव दो कवितायें:
[/size]1. `फिर चुनाव की रितु आने वाली है बल'

[/size]यह कविता गिर्दा ने वर्ष 2009 की होलियों पर लिखी थी, इसे वह ठीक-ठाक कर ही रहे थे कि, मैंने इसे मांग लिया, और उन्होंने सहर्ष दे भी दी थी.


फिर चुनाव की रितु आने वाली है बल,
घर घर में तूफान मचाने वाली है बल,
हर दल में `मैं´`मैं´ का दलदल गहराया,
यह `मैं´ जाने क्या कर जाने वाली है बल,
सौ बीमारो को एक अनार दिखला,
हो सके जहां तक मतकाने वाली है बल,
संसद में नोटों का करतब दिखा चुके,
अब `रैली´ में `थैली´ आने वाली है बल,
फिर भी लगता अपने बल चलने वाली,
कोई सरकार नहीं आने वाली है बल,
मिली जुली सरकारों का फिर स्वांग रचा,
जाने कब तक ठग खाने वाली है बल,
पर सब को ही नाच नचाने वाली है बल,
जाने क्या क्या स्वांग दिखाने वाली है बल,
फिर चुनाव की रितु आने वाली है बल´


[/size]2. [/size]यह कविता गिर्दा ने मई 2009 में, केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम पर दैनिक जगनन के पत्रकार द्वारा जूता मारने से प्रेरित होकर लिखी थी, और ३ मई २००९ को मेरे द्वारा आयोजित 'राष्ट्रीय सहारा' के कार्यक्रम "सही नेता चुने जनता" में प्रस्तुत किया था. इस कविता में कुमाउनी शब्द "भन्काया" पर गिर्दा का विशेष जोर देकर कहन था कि 'जूता मारा नहीं वरन गुस्से की पराकाष्ठा के साथ मारा है, जरूरी नहीं कि वह सामने वाले को छुवे ही, पर उसका असर होना अवश्यंभावी है '


ये जूता किसका जूता है, ये जूता किस पर जूता है!
ये जूता खाली जूता है, या जूते के ऊपर जूता है!
जिस पर यह जूता फैंका क्या, उस पर ही यह जूता फेंका है!
जिसने यह जूता फेंका आखिर, उसने क्यों कर फेंका है!
क्या नालायक नेताओं की यह साजिश सोची समझी है!
या नेताओं पर लोगों के गुस्से की यह अभिव्यक्ती है।
जूते की यात्रा लंबी है, जूते का मतलब गहरा है,
आखिर क्यों लोगों का गुस्सा, जूता `भनका´ कर निकला है!
इन मुद्दों पर सोचो यारो, वर्ना हालत नाजुक होगी,
आगे यह स्थिति लोकतन्त्र के लिए बहुत घातक होगी।


नवीन जोशी

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on Page 15: 
....हो रही बालीवुड की हिंदी फिल्म ’दाएं या बाएं‘ की हो रही है। फिल्म का प्रदर्शन सरोवरनगरी में भी चल रहे दूसरे नैनीताल फिल्म महोत्सव के तहत किया गया। फिल्म की निदशिका, लेखिका, संपादक व संवाद लेखक बेला नेगी नैनीताल में ही पली बढ़ी है। फिल्म का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि इसमें नगर के गत दिनों दिवंगत हुए कलाकार जनकवि गिरीश तिवारी ’गिर्दा‘ हेडमास्टर की भूमिका में दिखाई दिए है। उनके अलावा भी नगर के जहूर आलम, जितेंद्र बिष्ट, आरती धामी व मुकेश धस्माना सहित दर्जन भर कलाकार फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में है। फिल्म की कहानी एक प्रतिभावान कलाकार रमेश माजिला (दीपक डोबरियाल) की है जो मुंबई से वापस लौटकर अपने गांव को विकसित करना चाहता है। गांव आकर उसे लगता है कि पहाड़ की सामान्य लगने वाली समस्याओं का हल वास्तव में बड़ा कठिन है। इस कड़ी में वह स्कूल मास्टर बनने से लेकर कई परिस्थितियों में फंसता हुआ उपहास का पात्र भी बन जाता है, लेकिन हिम्मत न हारकर आखिर सफल होता है। फिल्म में हास्य के कई मजेदार दृश्य तो है ही, साथ ही पहाड़ की आंचलिकता हर दृश्य में मौजूद रहती है। जैसे नई कार ने पर नायिका द्वारा कार की पूजा करना हो अथवा नायिका का बुरांश के खिले पेड़ों के बीच का चित्रण। पहाड़ की कड़वी सच्चाइयों के साथ ही सुबह की ओस और कोहरे में डूबे व सूर्य की पहली किरण में दमकते पहाड़ व हिमालय बेहद सुंदर लगते है। साथ ही फिल्म अंत तक दर्शकों को बांधे रखने में भी समर्थ है। ’भोर का शांझ का  लाल है रंग, आस का प्यार का लाल है रंग‘ जैसे गीत भी फिल्म को लय में बांधे रहते है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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बहुत बेहतर जानकारी जोशी जी. .. धन्यबाद.

आशा है पाठको को अपने द्वारा दी जा जानकारी पसंद आ रही hogee !

नवीन जोशी

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'घाम दीदी' को बाहों में लेने की कोशिश में 'बादल भिना'


नवीन जोशी

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सरोवरनगरी को प्रकृति माँ ने ओढाया 'रंग्वाली पिछौड़ा'
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नवीन जोशी

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‘स्टेपी ईगल’ पक्षियों से गुलजार हुआ नैनीताल

[/size][/color]शीतकालीन प्रवास पर यहां हर वर्ष आते है विदेशी परिंदे, करते है प्रजनन
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[/color][/size]नवीन जोशी नैनीताल। देश-दुनिया में सरोवरनगरी को यूं ही पक्षियों का ’तीर्थ‘ नहीं कहा जाता। देखना चाहते हो तो नगर के निकट ’कूड़ा खड्ड‘ चले आइए। गंदगी और बदबू के चलते भले ही इस स्थान पर आप अधिक देर तक न ठहर पायें, लेकिन इस जगह की यह कमी इसे दुनिया के पक्षी प्रेमियों के पास मिलने वाले नक्शे में स्थान दिलाती है। इन दिनों यह जगह मध्य एशियाई देशों- मंगोलिया, रोमानिया व अफगानिस्तान के शिकारी नस्ल के पक्षी ’स्टेपी ईगल‘ से गुलजार है। इन्हें कैमरों में कैद करने के लिए दुनियाभर के पक्षी विशेषज्ञ भी नैनीताल पहुंच रहे है। स्टेपी ईगल (अक्विला निपालेन्सिस) 62 से 81 सेमी लंबा शिकारी नस्ल का पक्षी होता है जो 165 से 200 सेमी तक फैलाव वाले अपने पंखों के साथ आसमान में ऊंची उड़ानें भरता हुआ बेहद दिलकश लगता है। इसकी मादा (2.3-4.9 किग्रा भार) नर (2.3-5 किग्रा) के मुकाबले थोड़ी अधिक बलिष्ठ होती है। इसकी चोंच मुड़ी हुई होती है एवं गले में सफेद धारी बनी होती है। हर वर्ष अक्टूबर अंतिम सप्ताह अथवा नवम्बर प्रथम सप्ताह में उत्तराखंड के पहाड़ों खासकर नैनीताल, रानीखेत व अल्मोड़ा में स्टेपी ईगल का आगमन होता है। विशेष रूप से नैनीताल का कूड़ा खड्ड दुनिया के वर्ल्ड वाचर्स के नक्शे में स्टेपी ईगल के लिए अंकित है। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार इसी स्थान पर ये पक्षी प्रजनन करते है। मादा ऊंची चोटियों पर स्थित पेड़ों पर एक से तीन अंडे तक देती है और गर्मियां शुरू होने से पूर्व मार्च तक बच्चों के उड़ने लायक होने के बाद ये पक्षी यहां से वापस [/size]लौट जाते हैं [/font][/font]

 

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