Author Topic: Aipan: Uttarakhand Art - ऐपण  (Read 61558 times)

पंकज सिंह महर

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #10 on: November 30, 2007, 02:33:32 PM »
कुमाऊँ में भिप्ति - चित्रण व अलंकरण की कोटि के अन्तर्गत वर-बूंद आते हैं, जो निम्न प्रकार के हैं - सूरजी वर, गुलाब चमेली वर, मुष्टि वर, अलमोड़िया खोडस, गलीची वर, विशिष्ट गलीचीवर, कटारी वर, २० बिन्दु का संगलिया वर, २२ बिन्दु का संगलिया वर, १६ बिन्दु का भद्र वर, १९ बिन्दु का भद्र, स्वास्तिक फूल या ६ फूल वर, २४ बिन्दु का, ६ फूल वर, २२ बिन्दु का, घौर तिलक ३७ बिन्दु का वर, हर हर मण्डल वर, ३७ बिन्दु का नींबू वर, ९ (नौ) बिन्दु का मछिया वर, खोड्स वर या खोड्स वर, २२ बिन्दु का, खोड्स वर २४ बिन्दु का, खोड्स वर ६ बिन्दु का, खोड्स वर १२ बिन्दु का।

कुमाऊँनी ऐपणों को अगर सूक्ष्मता से देखा जाए तो बोध होता है कि इन पर बंगाल का स्पष्ट प्रभाव है। भले ही कुछ प्रतीक व नाम शुद्ध कुमाऊँनी भाषा व क्षेत्र के ही हैं परन्तु पूर गठन बंगाल की अल्पना के प्रभाव से पूर्ण दिखाई देता है। १६वीं सदी के तारानाथ, जो तिब्बती इतिहासकार थे, द्वारा लिखित इतिहासकार से ज्ञात होता है कि ७वीं सदी में पश्चिमी भारत में 'भाखड़' से एक चित्र शैली प्रचलित हुई और ९वीं सदी से पूर्वी भारत में भी एक शैली का प्रचलन हो चला था। पहले नेपाल के चित्रकार पश्चिम भारतीय शैली में काम करते थे परन्तु बाद को उन्होंने पूर्वी शैली को अपना लिया। यह पूर्वी शैली ही आगे चलकर 'सेन' और 'पाल' शैली कहलाई। इस शैली में जहाँ चित्रों का निर्माण मात्र लाल, पीला, नीला, काला, सफेज, बैगनी रंगो में होता था, वहीं चित्रांकन उसी प्रकार होता था जिस प्रकार कुमाऊँ में लिख थापों व वर बूंदों में। बंगाल में सेन व पाल शासन में अनेक वज्रयानी (तांत्रिक) स्थविर प्रगट हुए तथा उस समय तांत्रिक बैद्ध (वज्रयानी) केवल नेपाल, बिहार तथा बंगाल में ही शेष रह गए थे और तिब्बत बज्रयानी लामावाद का दुर्ग बन चुका था। इसलिए कुमाऊँ के वर बूंद, जो १२ या १३ प्रकार के हैं, के विषय में कुमाऊँ की वयोवृद्ध जानकारों का कहना है कि यह कला भोट देश अर्थात् तिब्बत से आयी है। मान्यतानुसार शिव का स्थान कैलाश पर्वत तथा विष्णु का मानसरोवर दोनों भोट प्रदेश (तिब्बत) में हैं। इसी प्रकार शिव-पार्वती व विष्णु की पूजा अर्चना के लिए हर हर मण्डल व गौर तिलक का निर्माण किया जाता है।

कुमाऊँनी ऐपणों में चावल पिष्टि के घोल का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार बंगाल के ऐपणों का निर्माण व आलेखन होता है। बंगाल में कृषि विषयक लौकिक आचार तथा अनुष्ठान की अल्पना है। कुमाऊँ में भी इसी प्रयोजन के लिए लोक संस्कृति में हरेला, डिकरा, बिरुड़िया व डोर दुबज्योड़ पूजा का विधान व थापे तथा ऐपण हैं।

कुमाऊँ में लक्ष्मी व्रत व पूजा के लिए अल्पना द्वारा षट् कोणीय श्रीयंत्र का मध्य में निर्माण कर अथवा सरस्वती पीठ का निर्माण कर अष्ट दल कमल से घेर दिया जाता है। तत्पश्चात चारों सम्पूर्ण क्षेत्र को विभिन्न पुष्पों व लताओं के प्रतीकों से भर दिया जाता है।

कुमाऊँ में विवाहोत्सव अवसर पर रंगों द्वारा भी चित्रों का निर्माण किया जाता है जैसे - ज्यूति पट्टा (विवाह का), वर बूंद, मातृका चौकी (काष्ठ पर), पंच पात्रों (पांच प्रकार के बर्तन) व जाल के साथ भेंट की जाने वाली विवाह चौकी। यह वर व कन्या पक्ष दोनों बनाते है।

पंकज सिंह महर

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #11 on: November 30, 2007, 02:38:17 PM »
one more
सुचिरा जी, बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने हमारी लोक संस्क्रति पर विषय प्रारम्भ किया,
बहुत अच्छा प्रयास, शुभकामनायें, साधुवाद  एवं.............+१

suchira

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #12 on: November 30, 2007, 02:44:28 PM »

लता, कमला, प्रीति, मिताली रहे ऐपण व कला के श्रेष्ठ प्रतिभागी
Nov 09, 02:32 am

लोहाघाट(चम्पावत)। खेतीखान दीप महोत्सव के दौरान आयोजित बेबी-शो प्रतियोगिता का खिताब उज्ज्वल खर्कवाल ने जीता। संदीप जोशी व गुंजन बोहरा द्वितीय व तृतीय स्थान पर रहे। इसके अलावा ऐपण सीनियर प्रतियोगिता में लता गहतोडी, जूनियर में कमला वर्मा, कला सीनियर में मिताली वर्मा व जूनियर में प्रीति गहतोडी ने पहला स्थान प्राप्त किया।

ऐपण सीनियर प्रतियोगिता में रीता सोराड़ी, श्रीमती सुषमा जोशी, जूनियर में सुनिधि व नेहा बोहरा द्वितीय व तृतीय स्थान पर रहीं जबकि कला जूनियर में लता खर्कवाल दूसरे व सपना सोराडी तीसरे स्थान पर रही। इस प्रतियोगिता के सीनियर वर्ग में रीता सोराडी दूसरे व रजत श्रीवास्तव तीसरे स्थान पर रहे। महिला आरक्षण की प्रासंगिकता विषय पर आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता में गिरीश सोराड़ी व अंजलि बोहरा संयुक्त रूप से पहले, बीडी भट्ट दूसरे तथा सुरेन्द्र देऊपा तीसरे स्थान पर रहे। कास्को बाल से खेली जा रही क्रिकेट प्रतियोगिता का फाइनल स्पो‌र्ट्स क्लब खेतीखान ने जीत लिया। इस टीम ने ब्लू स्टार को 25 रनों से मात दे दी। प्रतियोगिता के मैन आफ दी सीरीज नरेन्द्र बोहरा रहे। समापन समारोह के मुख्य अतिथि पूर्व विधायक केसी पुनेठा, भाजपा सहकारिता प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष हयात सिंह माहरा व जिला पंचायत सदस्य पूरन सिंह फत्र्याल ने प्रतिभागियों को पुरस्कार वितरण किया।

suchira

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #13 on: December 03, 2007, 07:28:50 PM »

Rachana Bhagat

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #14 on: December 03, 2007, 08:29:24 PM »
Aare Suchira ji,

Saab kuch hi pasand aa gaya hai. Ye kala hi kuch aise hai ki es mai kuch na pasand aane wali baat hi nahi hai.

kuch pasand aaya ya sab kuch

हलिया

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #15 on: December 04, 2007, 04:01:09 PM »
महाराज.....
इतू किसमका ऐपण देखि बेर और उनरा बारा में पढि बेर क्या कूनि मेरा आंखा त खुला का खुला रै गिन.  भौतै बढिया हैरो।

suchira

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #16 on: December 04, 2007, 07:08:11 PM »
Art Heritage - Paintings

AIPAN (The Folk Art of Kumaon)
   


D.S. Rawat
   

On the bank of the Suyal River near Barechhina in District Almora, two painted rock-shelters have been discovered. They reveal paintings of animals, humans and also tectiforms done with fingers in black, red and white colours. There is circumstantial evidence for regarding the Barechhina paintings as prehistoric and representing the starting point of art in Kumaon.
   

The womenfolk of Kumaon have played a major role in perpetuating the traditions of folk art. The style of painting is locally known as Aipan. Using their nimble fingers and palms, the Kumaoni women have not only preserved the memories of past events and the styles, designs, etc., but also have given expressions to their own ideas and concepts on aesthetic values. During ceremonies and festivals the women set themselves to decorating the floor and walls of their houses with designs and patterns. The floor paintings are usually associated with some ritualistic figures. The floor of the worship room and specially the seat of Gods and Goddesses, are decorated with specific tantric motifs called Peeth. The kitchen walls are painted with animalistic motifs. The entrance doors are done with symbols boding good omen. The material used is the paste of rice mixed with ochre

For the Namkaran Sanskar, a ceremony when the child is given a name, the Aipan on the wooden Chauki comprises motifs of sun, moon, bell, conch shell and the utensils used in Puja.

In the Janeu (sacred-thread) ceremony initiating a boy of the social rituals, the Aipan shows the zodiacal sign of Great bear (Sapta Rishis) arranged in hexagons.
   
   

This is to invoke the blessings of the very learned and sagacious Sapta Rishis.

In the Byah (Vivaah or marriage) ceremony the Dhuliargh Chauki (wooden seat for the groom) bears a design of big water-Jar, symbolizing primordial water from which the universe emerged. The upper portion has a crown and at

the center is a motif drawn by four horizontal and bisecting lines making nine squares.Lotus petals encircle this motif.

PEETH

The floor of the place of worship and the seat of Gods and Goddesses are decorated with specific tantric motifs known as Peeth or Yantra, related to the deity concerned. A Yantra is a diagrammatic representation of the deity, and consists of linear or septal geometrical permutations of patterns considered as the plan of the terrestrial places where the deity resides.

For Shiva and Vishnu the Peeth is a square figure drawn by putting 12 to 19 dots, both logitudinally and transversally. In the Vishnu Peeth the number of dots is 19. The dots are joined to denote the cosmic field condensed at the central point. The center or Bindu represents the place where the deity resides. The outer Largest Square is the plan of a raised altar and the internal lines leading towards the center represent the flight of steps. The steps symbolize entry from the earth through the cosmic field to the throne of divinity.

Shakti Peeth is represented by two interlocked triangles forming a hexagon. The circles represent lotus petals numbering 12 to 64. Lines of a square frame the whole Yantra. It is an area where the object and subject meet the central point, Bindu that controls everything, serving as the vehicle of the mind. The circles symbolize wholeness or totality and denote the elemental earth or the material quality of nature.

A common Peeth for all deities including Ganesh and Panch Devatas is known as Swastic Peeth. It comprises geometrical design made by nine-point square. The dots are joined to make nine Swastic symbols within the square. The outer part of the remaining area is filled with wavy and zigzag dashed lines, or of designs of flowers, leaves, conch, shells, petals, swastic, etc.
 

Author is D.S. Rawat, a social worker from village Mohnari,
P.O. Chaunalia, Ranikhet, Uttaranchal

suchira

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #17 on: December 04, 2007, 07:14:32 PM »
 Aipan and Other Art Forms

During the last two decades many rock paintings belonging to the protohistoric period have been discovered in Kumaon. Among them Lakhu Udiyar and Lwethaap are well known. The Pahari Kalam (style of painting) probably also developed in Kumaon, when it was being practiced in some of the Himalayan regions. Unfortunately very few examples of this style are available today.

The Aipan (Alpana) is a popular art form of Kumaon, and walls, papers and pieces of cloth are decorated by the drawing of various geometric and other figures belonging to gods, goddesses and objects of nature. Pichhauras or dupattas are also decorated in this manner. At the time of Harela there is a tradition of making clay idols (Dikaras).

'Aepan' or Aipan or Alpana is an art which has a special place in all Kumaoni homes. The word "Aepan' is a derivative of 'Arpan'. A commonly used word for it is “Likhai” (writing), although it is a pattern made with the fingers. Aepan are used as ritual designs for Pujas, festivals and ceremonies connected with birth, janeu (the sacred thread ceremony), marriage and death.

The raw material used is simple ochre (Geru) colour and rice paste. It is mostly women who paint the designs on the floors and walls of their homes using the last three fingers of the right hand. Once the ochre base is ready the artist draws the pattern free hand. Chowkies are made with mango wood and painted with special designs for each occasion. Pattas & Thapas are made directly on the walls or on paper and cloth. Earlier the paint used was made from natural 'dyes. Today, poster and oil paints both are used. We are using the traditional "patterns for cards, wall hangings, cushion covers, table cloths, even T-Shirts. The decorative patterns used to adorn doorways have been adapted for gift tags, bookmarks, clay items, wooden boxes, trays and coasters.

suchira

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #18 on: December 04, 2007, 07:24:01 PM »
उत्तराखंड  मे  दीपावली मे घर मे ऐपण बनाये जाते हैं
पूजा घर मे, पूजा स्थान मे, सारी देलीयों   मे
सारे दरवाजों से अन्दर की तरफ़ लक्ष्मी जी के पदचिन्न बनाये जाते हैं
ऐसा  मानना  है  की  लक्ष्मी  जी  इन  मे  चल  कर  ही  घर  मे  प्रवेश  करती  हैं  और पूजा स्थान मे बनाये गए आसन (वहां भी ऐपण बनाते हैं) मे वीराज मान होती हैं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: ऐपण - UTTARAKHANDI ART
« Reply #19 on: June 09, 2008, 09:05:34 AM »
ऐपण कला को संरक्षित रखने पर जोरJun 08, 11:53 pm

अल्मोड़ा। श्री लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब में कुमाऊं की लोक कला पर आयोजित कला शिविर 'शकुनांखर' चौथे दिन भी जारी रहा। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भोपाल व आधारशिला के तत्वावधान में प्रतिभागियों को ऐपण की विधाओं को करीब से जानने का मौका मिल रहा है। मानव संग्रहालय भोपाल की शम्पा साह व दुलाल मन्ना ने बताया कि उनका उद्देश्य पहाड़ की संस्कृति को पूरे विश्व में फैलाने का है। उन्होंने कहा कि इस कला को जन-जन तक पहुंचाने के लिए युवा पीढ़ी भी अब उनके साथ है। शम्पा साह ने बताया कि अब तक प्रतिभागियों ने ऐपण की प्रमुख विधाओं भद्र, थापा, दुर्गा पट्ट, ज्यूॅती पट्ट, वट सावित्री पट्ट व स्वास्तिक सहित अनेक प्रकार की कला सीखी है। उन्होंने कहा कि अब सभी प्रतिभागियों को पुराने घरों में दीवारों पर की जाने वाली चित्रकला से रूबरू कराया जाएगा।