Author Topic: Bhitauli Tradition - भिटौली: उत्तराखण्ड की एक विशिष्ट परंपरा  (Read 28289 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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प्रयाग पाण्डे " भिटौली " के लिए भाई की प्रतीक्षा में  बहिन
 
 मित्रो ! बसंत  का सुआगमन हो गया है | बुरांश फुल गया है और सरसों  फूलने लगी है । " कपुवा "के साथ ही  अन्य पंछियों के सुमधुर स्वर सुनाई देने लगे हैं | हरेक प्राणी उल्लास से भर गया है | " भिटौली " का महीना  आ गया है । " भिटौली " के लिए  ब्याहता बहिने ससुराल में अपने भाइयों की प्रतीक्षा करने लगी  हैं कि उनके भाई " भिटौली " लेकर आते ही होंगे । " भिटौली " के इस महीने में  आज आपको कुमांऊँ का बहुत पुराना ऋतु लोक गीत से रूबरू करा देते है |
 
 रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा |
 डाली में कफुवा वासो , खेत फुली दैणा |
 कावा जो कणाण , आजि रते वयांण |
 खुट को तल मेरी आज जो खजांण |
 इजु मेरी भाई भेजली भिटौली दीणा |
 रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा |
 वीको बाटो मैं चैंरुलो |
 दिन भरी देली मे भै रुंलो |
 वैली रात देखछ मै लै स्वीणा |
 आगन बटी कुनै ऊँनौछीयो -
 कां हुनेली हो मेरी वैणा ?
 रितु रैणा , ऐ गे रितु रैणा |
 रितु ऐ गे रणा मणी , रितु ऐ रैणा ||
 
 भावार्थ :-
 
 रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती |
 डाल पर "कफुवा " पक्षी कुजने लगा | खेतों मे सरसों फूलने लगी |
 आज तडके ही जब कौआ घर के आगे बोलने लगा |
 जब मेरे तलवे खुजलाने लगे , तो मैं समझ गई कि -
 माँ अब भाई को मेरे पास भिटौली देने के लिए भेजेगी |
 रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती |
 मैं अपने भाई की राह देखती रहूंगी |
 दिन भर दरवाजे मे बैठी उसकी प्रतीक्षा करुँगी |
 कल रात मैंने स्वप्न देखा था |
 मेरा भाई आंगन से ही यह कहता आ रहा था -
 कहाँ होगी मेरी बहिन ?|
 रुन झुन करती ऋतु आ गई है | ऋतु आ गई है रुन झुन करती ||
 
 ( कुमांऊँ का लोक साहित्य )


विनोद सिंह गढ़िया

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