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उत्तराखंड मैं पशुबलि की प्रथा बंद होनी चाहिए !

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Author Topic: Custom of Sacrificing Animals,In Uttarakhand,(उत्तराखंड में पशुबलि की प्रथा)  (Read 1337 times)

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दोस्तों जैसा कि हम सब जानते भी हैं और कुछ लोगों ने तो देखा भी होगा कि उत्तराखंड में कई ऐसे मेले हैं और त्यौहार हैं , जिनमें पशुओं कि बलि दी जाती है, तो आप लोगों के क्या विचार हैं इस बलि प्रथा के सम्बन्ध में,आप लोग अपने सुझाव देने कि महान किर्पा करें !

गढ़वाल भर में आयोजित होने वाले अधिकांश मेले विभिन्न ऐतिहासिक आख्यानों पर आधारित होते हैं। परंपरा के मुताबिक इन मेला आयोजनों के दौरान पशुओं की बलि देने का भी रिवाज रहा है। ऐसा ही एक मेला है बूंखाल मेला। प्रतिवर्ष इस मेले में सैकड़ों बकरों समेत नर भैंसों की जान शक्ति उपासना के नाम पर ले ली जाती है। हालांकि, मेले में बलि प्रथा रुकवाने को विभिन्न सामाजिक संगठन जागरूकता अभियान चलाते हैं।

 इसके अलावा प्रशासन की ओर से भी बलि न होने देने पर जोर दिया जाता है, लेकिन बूंखाल में प्रशासन के तमाम दावे हवा हो जाते हैं। भक्त इस वर्ष दिसंबर में प्रस्तावित मेले में पशुबलि को अभी से तैयारियों में जुट गए हैं। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस बार प्रशासन बलि रुकवा पाएगा।

गढ़वाल में मेलों को अठवाड़े के नाम से भी जाना जाता है। गढ़वाल में बलि प्रथा की बात की जाए, तो साफ होता है कि यह अठवाड़े ही इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। हालांकि, अब अधिकांश मेलों में बलि प्रथा लगभग बंद हो चुकी है, लेकिन थलीसैंण तहसील क्षेत्र बुंखाल में यह क्रूर प्रथा आज भी कायम है।

पिछले वर्ष मेले में सामाजिक संगठनों व प्रशासन की लाख कोशिशों के बावजूद लगभग 90 नर भैसों व हजारों बकरों की बलि चढ़ाई गई थी। यह भी बता दें कि बूंखाल राज्य का सबसे बड़ी पशुबलि मेला है। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने पशुबलि को अवैध घोर्षित कर रखा है, लेकिन इसे रोकने के लिए अभी तक कोई कारगर कोशिश होती दिखाई नही दे रही है।

हालांकि, प्रशासन एवं सामाजिक संगठनों के समन्वित प्रयासों से कठूड़, कांडा, सवदरखाल, खोला, वरकोट, मुण्डेश्वर में बलिप्रथा पूर्णत: समाप्त हो चुकी है, लेकिन बूंखाल आज भी प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। जानकारी के मुताबिक इस वर्ष दिसंबर माह के पहले सप्ताह में मेले का आयोजन होना सुनिश्चित है। इसके लिए राठ क्षेत्र में तैयारियां जोरों पर हैं।

मेले में इस बार भी फिर सैकड़ों नर भैसों व हजारों बकरों की बलि चढ़ने की प्रबल संभावना है। इसे देखते हुए प्रशासन व सामाजिक संगठनों के हलकों में भी हरकत शुरू हो गई हैं। क्षेत्र में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं कि कि क्या चंद दिनों में इस राठ क्षेत्र की जनता में जागृति आ पाएगी।

 पशु कल्याण बोर्ड की कार्यकारी अध्यक्ष व बिजाल संस्था की अध्यक्ष सरिता नेगी कहती हैं कि जिस तरह कांडा मेले में पशुबलि रूकी, उसी तरह से बुंखाल मेले में बलि प्रथा पर अंकुश लगेगा। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में अब तक जनजागरण अभियान के साथ ही लगभग आठ गांवों में समितियों का गठन भी किया गया है, जो बलि देने वालों को समझाएंगी।

 दूसरी ओर, एसडीएम थलीसैंण एनएस नबियाल कहते हैं कि बूंखाल में बलि प्रथा पर बलपूर्वक रोक नहीं लगाई जा सकती। उन्होंने बताया कि प्रशासन की ओर से जनजागरण को विशेष प्रयास किए जाएंगे।
« Last Edit: June 30, 2010, 01:00:55 AM by devbhoomi »
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Jakhi ji,

Generally, the victimization is not only the problem of Uttarakhand. This is the problem of all over India, but it is observed that Bali Pratha is mostly common in hilly state. E.g eastern state and northern state. 

I am dead against of Bali Pratha. There is need to make people aware about it. but contradiction, believe or not. There is somewhere God fearing factor is also there.

what i realized in certain cases, man become helpless and he has to resort to such practice.
"जय १००८ मूल मूलनारायण जी की जय हो" !!

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बलि प्रथा क्या है और क्यों दी जाती है, बलि प्रथा क्या हमारी संकिरती है या हमारा साहित्य, या अंधविश्वास
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SOURCE DAINIK JAGARAN

बूंखाल मेला: क्या इस बार रुक पाएगी पशुबलि


पैठाणी (गढ़वाल)। गढ़वाल भर में आयोजित होने वाले अधिकांश मेले विभिन्न ऐतिहासिक आख्यानों-परंपराओं पर आधारित होते हैं। परंपरा के मुताबिक इन मेला आयोजनों के दौरान पशुओं की बलि देने का भी रिवाज रहा है। ऐसा ही एक मेला है बूंखाल मेला। प्रतिवर्ष इस मेले में सैकड़ों बकरों समेत नर भैंसों की जान शक्ति उपासना के नाम पर ले ली जाती है। हालांकि, मेले में बलि प्रथा रुकवाने को विभिन्न सामाजिक संगठन जागरूकता अभियान चलाते हैं।

इसके अलावा प्रशासन की ओर से भी बलि न होने देने पर जोर दिया जाता है, लेकिन बूंखाल में प्रशासन के तमाम दावे हवा हो जाते हैं। भक्त इस वर्ष दिसंबर में प्रस्तावित मेले में पशुबलि को अभी से तैयारियों में जुट गए हैं। ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस बार प्रशासन बलि रुकवा पाएगा।

गढ़वाल में मेलों को अठवाड़े के नाम से भी जाना जाता है। गढ़वाल में बलि प्रथा की बात की जाए, तो साफ होता है कि यह अठवाड़े ही इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। हालांकि, अब अधिकांश मेलों में बलि प्रथा लगभग बंद हो चुकी है, लेकिन पौड़ी गढ़वाल जिले की थलीसैंण तहसील क्षेत्र बूंखाल में यह क्रूर प्रथा आज भी कायम है।

पौड़ी मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित बूंखाल के मेले में पिछले वर्ष सामाजिक संगठनों व प्रशासन की लाख कोशिशों के बावजूद लगभग 90 नर भैसों व हजारों बकरों की बलि चढ़ाई गई थी। यह भी बता दें कि बूंखाल राज्य का सबसे बड़ी पशुबलि मेला है। हालांकि, प्रशासन एवं सामाजिक संगठनों के समन्वित प्रयासों से कठूड़, कांडा, सवदरखाल, खोला, वरकोट, मुण्डेश्वर में बलिप्रथा पूर्णत: समाप्त हो चुकी है, लेकिन बूंखाल आज भी प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। जानकारी के मुताबिक इस वर्ष दिसंबर माह के पहले सप्ताह में मेले का आयोजन होना सुनिश्चित है।

 इसके लिए राठ क्षेत्र में तैयारियां जोरों पर हैं। मेले में इस बार भी फिर सैकड़ों नर भैसों व हजारों बकरों की बलि चढ़ने की प्रबल संभावना है। इसे देखते हुए प्रशासन व सामाजिक संगठनों के हलकों में भी हरकत शुरू हो गई हैं। क्षेत्र में तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं कि कि क्या चंद दिनों में इस राठ क्षेत्र की जनता में जागृति आ पाएगी।

 पशु कल्याण बोर्ड की कार्यकारी अध्यक्ष व बिजाल संस्था की अध्यक्ष सरिता नेगी कहती हैं कि जिस तरह कांडा मेले में पशुबलि रुकी, उसी तरह से बूुखाल मेले में बलि प्रथा पर अंकुश लगेगा। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में अब तक जनजागरण अभियान के साथ ही लगभग आठ गांवों में समितियों का गठन भी किया गया है, जो बलि देने वालों को समझाएंगी।

दूसरी ओर, एसडीएम थलीसैंण एनएस नबियाल कहते हैं कि बूंखाल में बलि प्रथा पर बलपूर्वक रोक नहीं लगाई जा सकती। उन्होंने बताया कि प्रशासन की ओर से जनजागरण को विशेष प्रयास किए जाएंगे।
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You must watch this video which narrates the real story.

[youtube]http://www.youtube.com/watch?v=XdIHdix3bHw
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Offline पंकज सिंह महर

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जाखी जी, यह एक गंभीर विषय है, पशुबलि को चाहे कोई अंधविश्वास कहे या कुछ और, लेकिन यह हमारी संस्कृति का एक हिस्सा है। वर्षों से यह प्रथा चली आ रही है, डंगरियों/पश्वों द्वारा अवतरिति होने पर आण-बाण के लिये बलि देने को कहा जाता है। अगर हम अपने देवी-देवताओं में आस्था रखते हैं, सम्मान करते हैं तो आधुनिकता के इस दौर में हम मात्र इसी चीज के लिये आधुनिक नहीं हो सकते। क्योंकि अगर हम अपनी संस्कृति और सभ्यता की बात करेंगे तो इसका भी सम्मान हमें करना होगा।

क्योंकि विज्ञान और आस्था के बीच की खाई बड़ी है, अगर हम सिर्फ इसी चीज के लिये विज्ञान देखें तो यह भी ठीक नहीं होगा। आस्था और विश्वास ही किसी संस्कृति को जीवित और बांधे रख सकते हैं।
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

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उत्तरकाशी की भगीरथी घाटी के गांवों में स्वतंत्रता से पहले वार्षिक समारोहों में सांढ़ (भैंसा) या भेड़ की बलि दी जाती। इसका उद्वेश्य देवी-देवताओं को प्रसन्न करना होता। नवरात्रा (अक्तूबर में दशहरे से पूर्व नौ रात) के अवसर पर बलि का यह धार्मिक समारोह हुआ करता।

इसके लिए बड़ी संख्या में बहुत मजबूत और दुस्साहसी लोगों की आवश्यकता पड़ती। सबसे पहले जमीन पर दो लकीरें खींच उनके बीच भैंसे को बांध दिया जाता। इस संदर्भ में भगीरथी घाटी के विलोग गांव के एक वृद्ध किसान को कहते हैं, गांव का प्रमुख, मालगुजार, को ही पारंपरिक रूप से एक तलवार या कटार से सांढ़ पर प्रहार करने का पहला अधिकार होता। इसके बाद घायल पशु को खुला छोड़ दिया जाता और वह किसी भी दिशा में बेतहाशा भागता। उसके पीछे मुस्टंडे (मजबूत लोग) भागते और उसे काबू करने की कोशिश करते।

 वे घायल पशु को पत्थर या लोहे के राड से मारते और अंततः एक तलवार या कटार से धराशायी कर देते। यह देवी-देवता के नाम बलि मानी जाती।

बिलोग गांव के उसी किसान के अनुसार इसका मूलतः धार्मिक स्वरूप था। दशहरे से संबद्ध अन्य समारोह नवरात्र के आरंभ होने से एक सप्ताह पूर्व हुआ करते। इनमें भाव-भंकिया के साथ महाभारत का पाठ, गीत और मिमकरी प्रमुख थे।
   
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Offline Rajen

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पशुबलि एक आस्था का प्रश्न है.  पहाडों में आस्था की जड़ें इतनी मजबूत हैं की इसे डिगा पाना आसान नहीं.  प्रायः देखा गया है की जो ब्यक्ति मांसाहारी नहीं है वो भी पूजा पाठ के नाम पर पशुबलि देता है. 
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः | सर्वे सन्तु निरामयाः |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु | मां कश्चित्दुःख भाग भवेत ||


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पशुबलि अगर उत्तराखंड की संसकिरती और यहाँ  की आस्था है तो इन बेजुबान पशुओं की बलि देना बांध होनी चाहिए,अगर ये हमारी परम्परा है तो अब इसे बंद कर देनाचाहिए

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अगर पशुबलि हमारी संसकिरती का एक हिसा है तो ऐसी संसकिरती और संस्कार किस काम के जी की एक बेजुबान जानवर की हत्या करवाती है और कैसे हैं वो देवी देवता जो की पशुओं की बलि के बिना अपनी प्यास भुजाये बिना नहीं मानते हैं !

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ये है एक बुंखाल, पोड़ी का एक झलक जो की इस बेजुबान जानवर की मौत का तमासा दे रहे हैं

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किस तरह दी जाती है देवी देवताओ के नाम पर पशुओं की बलि
 
पौड़ी गढ़वाल के राठ में देवी बूंखाल कालिंका की पूजा के बाद बकरों ओंर भैंसों की बलि दी गई। इसके अलावा इस क्षेत्र के अन्य चार मंदिरों में भी पशुओं की बलि दी गई। राठ क्षेत्र के कई पट्टियों मे देवी बूंखाल कालिंका मंदिर के गर्भगृह में स्थित खड्ड में हर साल पशु बलि दी जाती रही है। पिछले वर्ष भी यहां नर भैंसों की बलि दी गई थी, किन्तु पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष यह आंकड़ा दुगुना हो गया है।

इसके अलावा यहाँ बकरों की अधिक बलि देने के कारन बूंखाल कालिंका का मैदान रक्त से सना नजर आया। यहां के लोग बलि को लेकर गहरी आस्था के वशीभूत होकर हजारों की संख्या में गावं के लोग सुबह होती ही भैंसों को रस्सीयों से बांधकर ढोल-दमाऊ के साथ मंदिर के अगन लाते है ओर भैंसों को रस्सों व हाथों में हथियार लेकर लोग मंदिर पहुचने तक नाचते रहे जब तक नर भैंसे का सिर कलम ना हो जाय। इस पूजा के अलावा लोगों ने देवी को सिरफल और सुपारी की पूजा भी सर्पित की कीया।

 और हजारों की भीड़ मंदिर के गर्भगृह में दर्शनों को पहुंची। और इस दौरान भीड़-भाड़ का माहोल था। इस वर्ष बूंखाल मेले में बलि विरोधी संस्थाएं दूर-दूर तक नजर नहीं आई। कोई भी संस्था मंदिर तक नहीं पहुंच पाई। क्या देवी देवताओ के नाम पर पशुओं की बलि युही चलता रहगा ?
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क्या हम अपने देवी देवताओं की पूजा मांस ओर बलि की जगह नारियल, दुध ओर फूलो से क्यूँ नहीं कर सकते क्या ऐसे करने से भगवान खुश नही होंगे. हमारे शास्त्रों में कहाँ लिखा हे की बलि देने से ही भगवान खुश होते है!

नही चाहे हमें एसे भगवान जो किसी के अस्तित्व पर ही प्रशनचिन्ह लगा दें!

 साफ सी बात हे की हम लोग सुधारना नही चाहते, हम लोग एसे पुराने रिवाजों से हटकर कुछ नया नही सोचना चाहते हम सब को एक बात याद रखनी चाहिए!

थोडा हट कर सोचो, भगवान को मानना ओर जानना दोनों अलग बाते हे जो मानते है वो जानते नही ओर जो जानते है ऊनेह मानने की जरूरत नहीं पड़ती
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Offline Rawat_72

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थोडा हट कर सोचो, भगवान को मानना ओर जानना दोनों अलग बाते हे जो मानते है वो जानते नही ओर जो जानते है ऊनेह मानने की जरूरत नहीं पड़ती



wah kya baat hai jakhi ji apki thinking bhee apki tarah smart hai.

 

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