Author Topic: Festival Dates - उत्तराखंड के विभिन्न त्योहारों एव मेलो को मनाने की निश्चित तिथि  (Read 30198 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bhishma Kukreti

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   गढ़वाल में वसंत पंचमी सरस्वती पूजा हेतु नहीं अपितु हरियाळी पूजन और सामूहिक गीत प्रारंभ हेतु प्रचलित थी
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आलेख - भीष्म कुकरेती
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  फेसबुक व अन्य इंटरनेट माध्यमों में हम (मै भी ) वसंत पंचमी को सरस्वती पूजन का पर्याय मानकर के एक दूसरे  को वधाईयें देते रहते हैं।  किन्तु गढ़वाल में वसंत पंचमी में सरस्वती पूजा एक गौण पक्ष रहता था।  हाँ यदा कड़ा कोई बच्चे को पाटी  दिखा देता था बस सरस्वती पूजा यहीं तक सीमित थी (मुझे भी इसी दिन पाटी दिखाई गयी थी ). हमारे सामान्य लोक या लोक साहित्य में कहीं  भी सरस्वती बंदना के कोई प्रतीक सामने नहीं आये हैं कि  हम कह सकें कि वसंत पंचमी का सरस्वती पूजन से सबंध है।
     वास्तव में वसंत पंचमी का वसंती रंग से भी उतना संबंध नहीं है जितना हम इंटरनेट माध्यम में शोर करते हैं।  किसी ने एकाध रुमाल हल्दी के रंग में रंग दिया तो रंग दिया अन्यथा मेरे बचपन में बसंती  रंग व पीले रंग में कोई अंतर् भी नहीं समझा जाता था।
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                     हरियाली याने कृषि और लोहार का  सम्मान
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      वास्तव में गढ़वाल में बसंत पंचमी का अलग महत्व है जो अन्य मैदानी क्षेत्रों में है ही नहीं।
   गढ़वाल में बसंत पंचमी का पहले अर्थ होता था हरियाली लगाना।  इस दिन लोहार अपने अपने ठाकुर के लिए प्रातः काल से पहले जौ को जड़ समेत उखाड़ कर अपने ठाकुर के चौक में रख देते हैं।
    फिर परिवार वाले स्नान आदि कर हरियाली अनुष्ठान शुरू करते हैं
पहले दरवाजे के ऊपरी हिस्से में हल्दी से पिटाई लगाई जाती है और पिठाई जौ के पौधों में भी छिडकी जाती है। पुराने हरियाली को उखाड़ा जाता है
      तीन चार जौ की जड़ों को ताजे गाय के गोबर में रोपा जाता है और फिर उन जौ के पौधों को दरवाजे के दोनों मोहरों  (दरवाजे के  ऊपरी कोने -क्षेत्र ) में चिपकाया जाता है।  इस तरह सभी कमरों पर हरियाली चिपकायी जाती है।  आळों में भी हरियाली चिपकायी जाती है। इसी तरह गौशाला के हर कमरे के मोहरों में भी जौ की हरियाली चिपकायी जाती है।
   इस दिन स्वाळ -पक्वड़  भी बनाये जाते हैं और बांटे जाते हैं लोहार हेतु विशेष  ध्यान रखा जाता है। लोहार को अन्न या धन दिया जाता है। इस दिन गुड़ का मीठा भात याने ख़ुश्का भी बनाया जाता है।
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             गंगा स्नान
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बहुत से लोग गंगा स्नान हेतु छोटे या बड़े संगम पंहुचते थे।
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 कर्ण व नासिका छेदन
वसंत पंचमी के दिन नासिका व कर्ण छेदन को शुभ माना जाता है।   
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  सामूहिक गीत व नृत्य की शुरुवात
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      आज बसंत पंचमी की रात से गाँवों में सामूहिक नृत्य , गीत व लोक नाट्य कार्यकर्म भी शुरू होते थे जो बैशाखी तक चलते रहते थे।
   मुझे एक लोक गीत की पहली पंक्ति याद है जो पहले दिन अवश्य ही गाया जाता था -
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 हर हरियाली जौ की
खुद लगी बौ की।
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     बद्रीनाथ कपाट खुलने  का दिन निश्चितीकरण
बसंत पंचमी के दिन न्य पंचांग भो खोला जाता है और नए वर्ष की कुंडली भी देखि जाती है।
 बसंत पंचमी के दिन बद्रीनाथ कपाट खुलने का दिन भी निश्चित होता है।   
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Copyright @ Bhishma  Kukreti , 2017
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Bhishma Kukreti

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गढ़वाल में ईगास बग्वाल की विशिष्ठ परम्परा
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डॉ. नंद किशोर हटवाल

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दीपावली के ठीक ग्यारह दिन बाद गढ़वाल में एक और दीपावली मनाई जाती है जिसे ईगास बग्वाल कहा जाता है। इस दिन पूर्व की दो बग्वालों की तरह पकवान बनाए जाते हैं, गोवंश को पींडा ( पौस्टिक आहार ) दिया जाता है, बर्त खींची जाती है तथा विशेष रूप से भेलो खेला जाता है।
कब मनाई जाती है ईगास बग्वाल
गढ़वाल में चार बग्वाल होती है, पहली बग्वाल कर्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को। दूसरी अमावश्या को पूरे देश की तरह गढ़वाल में भी अपनी आंचलिक विशिष्टताओं के साथ मनाई जाती है। तीसरी बग्वाल बड़ी बग्वाल के ठीक 11 दिन बाद आने वाली, कर्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। गढ़वाली में एकादशी को ईगास कहते हैं। इसलिए इसे ईगास बग्वाल के नाम से जाना जाता है। चौथी बग्वाल आती है दूसरी बग्वाल या बड़ी बग्वाल के ठीक एक महीने बाद मार्गशीष माह की अमावस्या तिथि को। इसे रिख बग्वाल कहते हैं। यह गढ़वाल के जौनपुर, थौलधार, प्रतापनगर, रंवाई, चमियाला आदि क्षेत्रों में मनाई जाती है।
क्यों मनाई जाती है ईगास बग्वाल
इसके बारे में कई लोकविश्वास, मान्यताएं, किंवदंतिया प्रचलित है। एक मान्यता के अनुसार गढ़वाल में भगवान राम के अयोध्या लौटने की सूचना 11 दिन बाद मिली थी। इसलिए यहां पर ग्यारह दिन बाद यह दीवाली मनाई जाती है। रिख बग्वाल मनाए जाने के पीछे भी एक विश्वास यह भी प्रचजित है उन इलाकों में राम के अयोध्या लौटने की सूचना एक महीने बाद मिली थी।
दूसरी मान्यता के अनुसार दिवाली के समय गढ़वाल के वीर माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना ने दापाघाट, तिब्बत का युद्ध जीतकर विजय प्राप्त की थी और दिवाली के ठीक ग्यारहवें दिन गढ़वाल सेना अपने घर पहुंची थी। युद्ध जीतने और सैनिकों के घर पहुंचने की खुशी में उस समय दिवाली मनाई थी। रिख बग्वाल के बारे में भी यही कहा जाता है कि सेना एक महीने बाद पहुंची और तब बग्वाल मनाई गई और इसके बाद यह परम्परा ही चल पड़ी। ऐसा भी कहा जाता है कि बड़ी दीवाली के अवसर पर किसी क्षेत्र का कोई व्यक्ति भैला बनाने के लिए लकड़ी लेने जंगल गया लेकिन उस दिन वापस नहीं आया इसलिए ग्रामीणों ने दीपावली नहीं मनाई। ग्यारह दिन बाद जब वो व्यक्ति वापस लौटा तो तब दीपावली मनाई और भैला खेला।
हिंदू परम्पराओं और विश्वासों की बात करें तो ईगास बग्वाल की एकादशी को देव प्रबोधनी एकादशी कहा गया है। इसे ग्यारस का त्यौहार और देवउठनी ग्यारस या देवउठनी एकादशी के नाम से भी जानते हैं। पौराणिक कथा है कि शंखासुर नाम का एक राक्षस था। उसका तीनो लोकों में आतंक था। देवतागण उसके भय से विष्णु के पास गए और राक्षस से मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना की। विष्णु ने शंखासुर से युद्ध किया। युद्ध बड़े लम्बे समय तक चला। अंत में भगवान विष्णु ने शंखासुर को मार डाला। इस लम्बे युद्ध के बाद भगवान विष्णु काफी थक गए थे। क्षीर सागर में चार माह के शयन के बाद कार्तिक शुक्ल की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु निंद्रा से जागे। देवताओं ने इस अवसर पर भगवान विष्णु की पूजा की। इस कारण इसे देवउठनी एकादशी कहा गया।
गढ़वाल में ईगास बग्वाल
बड़ी बग्वाल की तरह इस दिन भी दिए जलाते हैं, पकवान बनाए जाते हैं। यह ऐसा समय होता है जब पहाड़ धन-धान्य और घी-दूध से परिपूर्ण होता है। बाड़े-सग्वाड़ों में तरह-तरह की सब्जियां होती हैं। इस दिन को घर के कोठारों को नए अनाजों से भरने का शुभ दिन भी माना जाता है। इस अवसर पर नई ठेकी और पर्या के शुभारम्भ की प्रथा भी है। इकास बग्वाल के दिन रक्षा-बन्धन के धागों को हाथ से तोड़कर गाय की पूंछ पर बांधने का भी चलन था। इस अवसर पर गोवंश को पींडा (पौष्टिक आहार) खिलाते, बैलों के सींगों पर तेल लगाने, गले में माला पहनाने उनकी पूजा करते हैं। इस बारे में किंवदन्ती प्रचलित है कि ब्रह्मा ने जब संसार की रचना की तो मनुष्य ने पूछा कि मैं धरती पर कैसे रहूंगा? तो ब्रह्मा ने शेर को बुलाया और हल जोतने को कहा। शेर ने मना कर दिया। इसी प्रकार कई जानवरों पूछा तो सबने मना किया। अंत में बैल तैयार हुआ। तब ब्रह्मा ने बैल को वरदान दिया कि लोग तुझे दावत देंगे, तेरी तेल मालिश होगी और तुझे पूजेंगे।
पींडे के साथ एक पत्ते में हलुवा, पूरी, पकोड़ी भी गोशाला ले जाते हैं। इसे ग्वाल ढिंडी कहा जाता है। जब गाय-बैल पींडा खा लेते हैं तब उनको चराने वाले अथवा गाय-बैलों की सेवा करने वाले बच्चे को पुरस्कार स्वरूप उस ग्वालढिंडी को दिया जाता है।
बर्त परम्परा
बग्वाल के अवसर पर गढ़वाल में बर्त खींचने की परम्परा भी है। ईगास बग्वाल के अवसर पर भी बर्त खींचा जाता है। बर्त का अर्थ है मोटी रस्सी। यह बर्त बाबला, बबेड़ू या उलेंडू घास से बनाया जाता है। लोकपरम्पराओं को शास्त्रीय मान्यता देने के लिए उन्हें वैदिक-पौराणिक आख्यानों से जोड़ने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है। बर्त खींचने को भी समुद्र मंथन की क्रिया और बर्त को बासुकि नाग से जोड़ा जाता है।
भैलो खेलने का रिवाज
ईगास बग्वाल के दिन भैला खेलने का विशिष्ठ रिवाज है। यह चीड़ की लीसायुक्त लकड़ी से बनाया जाता है। यह लकड़ी बहुत ज्वलनशील होती है। इसे दली या छिल्ला कहा जाता है। जहां चीड़ के जंगल न हों वहां लोग देवदार, भीमल या हींसर की लकड़ी आदि से भी भैलो बनाते हैं। इन लकड़ियों के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक साथ रस्सी अथवा जंगली बेलों से बांधा जाता है। फिर इसे जला कर घुमाते हैं। इसे ही भैला खेलना कहा जाता है।
परम्परानुसार बग्वाल से कई दिन पहले गांव के लोग लकड़ी की दली, छिला, लेने ढोल-बाजों के साथ जंगल जाते हैं। जंगल से दली, छिल्ला, सुरमाड़ी, मालू अथवा दूसरी बेलें, जो कि भैलो को बांधने के काम आती है, इन सभी चीजों को गांव के पंचायती चौक में एकत्र करते हैं।
सुरमाड़ी, मालू की बेलां अथवा बाबला, स्येलू से बनी रस्सियों से दली और छिलो को बांध कर भैला बनाया जाता है। जनसमूह सार्वजनिक स्थान या पास के समतल खेतां में एकत्रित होकर ढोल-दमाऊं के साथ नाचते और भैला खेलते हैं। भैलो खेलते हुए अनेक मुद्राएं बनाई जाती हैं, नृत्य किया जाता है और तरह-तरह के करतब दिखाये जाते हैं। इसे भैलो नृत्य कहा जाता है। भैलो खेलते हुए कुछ गीत गाने, व्यंग्य-मजाक करने की परम्परा भी है। यह सिर्फ हास्य विनोद के लिए किया जाता है। जैसे अगल-बगल या सामने के गांव वालों को रावण की सेना और खुद को राम की सेना मानते हुए चुटकियां ली जाती हैं, कई मनोरंजक तुक बंदियां की जाती हैं। जैसे- फलां गौं वाला रावण कि सेना, हम छना राम की सेना। निकटवर्ती गांवों के लोगों को गीतों के माध्यम से छेड़ा जाता है। नए-नए त्वरित गीत तैयार होते हैं।
भैलो के कुछ पारम्परिक गीत इस प्रकार हैं-
सुख करी भैलो, धर्म को द्वारी, भैलो
धर्म की खोली, भैलो जै-जस करी
सूना का संगाड़ भैलो, रूपा को द्वार दे भैलो
खरक दे गौड़ी-भैंस्यों को, भैलो, खोड़ दे बाखर्यों को, भैलो
हर्रों-तर्यों करी, भैलो।

भैलो रे भैलो, खेला रे भैलो
बग्वाल की राति खेला भैलो
बग्वाल की राति लछमी को बास
जगमग भैलो की हर जगा सुवास
स्वाला पकोड़ों की हुई च रस्याल
सबकु ऐन इनी रंगमती बग्वाल
नाच रे नाचा खेला रे भैलो
अगनी की पूजा, मन करा उजालो
भैलो रे भैलो।
इस अवसर पर कई प्रकार की लोककलाओं की प्रस्तुतियां भी होती हैं। क्षेत्रों और गांवों के अनुसार इसमें विविधता होती है। सामान्य रूप से लोकनृत्य, मंडाण, चांचड़ी-थड़्या लगाते, गीत गाते, दीप जलाते और आतिशबाजी करते हैं। कई क्षे़त्रों में उत्सव स्थल पर कद्दू, काखड़ी मुंगरी को एकत्र करने की परम्परा भी है। फिर एक व्यक्ति पर भीम अवतरित होता है। वो इसे ग्रहण करता है। कुछ क्षेत्रों में बग्ड्वाल-पाण्डव नृत्य की लघु प्रस्तुतियां भी आयोजित होती हैं।
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Bhishma Kukreti

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बग्वाळ-इगास हमरि लोक परम्पराओं तैं संजौणा तिवार।

दिनेश ध्यानी।

हमरा पहाड़ म छवटि दिवाळी खुणि बग्वाळ बुल्दन। दिवाळी से पैल्या दिन बग्वाळ मनये जांद। लोग भूड़ा, स्वाळा, खीर अर भांति-भांति का पकवान बणौंदन। घरों म दिया अर मोमबत्ती जळौंदन। अर लोग रात गौं म इकट्ठा हेांदन अर सब्बि मिलिकि भैलु ख्यलदन। ये दिना खुणि नरक चर्तुदशी या यम चर्तुदशी बि बुल्दन। बुल्दन बल ये दिन भगवान श्री कृष्ण ला नरकासुरौ बध कै छौ। तबी ये दिना खुणि नरक चर्तुदशी या यम चर्तुदशी बि बुल्दन। ये दिन लोग गौड़ि, बल्दों का सींगों परैं तेल लगौंदन, तैं टीका लगौंदन, वों का खुटा धुंदन अर वों तैं पींडु खिलौंदन।ये दिन हैळ नि लगौंदा। सुबेर गौड़ि, बछरा अर बळ्दों तैं पीडुं पाणि खलैपिलैकि चरणा खातिर जंगळ भेजि दिदन। दिनभर गोर चरणा रंदन अर फिर ब्यखुनि दौं अपणा गुठ्यार म ऐ जंदन।
यो ता ह्वे बग्वाळै बात। अब आप तैं बथदौं इगासै बात। हमरा लोक म हर तिवार अर रीति रिवाजा खातिर लोक कथा अर लोक किंवदतीं छन।
बुल्दन बल एक गौं म एक मवासा का गुठ्यार म गौड़ि, बल्दों का दगड़ि एक बोड़ छौ जैकु नौ छौ झल्या बोड़। वो भौत नटखट अर चंट बोड़ छौ। बग्वाळा दिना बात चा वीं मवा ल सब्बि गौड़ि, बल्दों तैं गुठ्यार म पींडु, पाणि खवै, सब्यों को संिगों परैं तेल लगै, वोंकि पूजा कैरि अर वों तैं ड़ांडा चरणा खातिर हकै देन ग्वैरा का दगड़ि। पर झल्या तैं म्यलणों बिसरि गैन। वो बिचरू छनुड़ा भितर हि बंध्यों रैगे। जबरि गोर ड़ांडा जाणा छया तबरि झल्या रामि बि च पण कैन वैकि आवाज नि सूणि। जब गोर ड़ांडा पौंछि गैन तब पला चालि कि अरै झल्या ता घौर म हि रैगे।
तब आनन-फानन म ग्वैर छानि म गै अर झल्या तैं मेलिकि जंगळ ल्हे ऐ चरणा खातिर पण यीं रकारोड़म वैका सिंगों परैं न त कैन तेल लगै, न वैकि पूजा कै अर न वै तैं पींडु पाणि खवै। बस तता कैकि ल्ही गैंन ड़ांडा चरणा खातिर। य बात झल्या का मन म बैठि गे अर वो रूसै गे। इलै झल्या हौरि गोरों सै अलग दूर जंगळा भितनै चलिगे। अर जांदा-जांदा कतना दूर पौंछि गे य बात झल्या तैं बि पता नि चलि।
इनां ग्वैर जबरि शाम दों गोरों तों घरबौडु कना खातिर धै लगैकि बुलौणा छया ता वोंन देखि कि सबि गौर ऐगेन पण वो झल्या अज्यों तलक नि ऐ। वोंन सोचि ऐ जालु पण काफी देर बात बि जब वो नि ऐ तो ग्वैर वै तैं इनां, उनां जंगळ म ख्वजणा रैन पण झल्या छौ कि कखि दिखे नी। टौखणि बि मरीन, धै बि लगै पण झल्या ता कखि बिटिन रमणों बि नि लग्यों । रात होण लगीं छै जगंळ म बाघ, स्यू कि डैर अर घौर वळों तैं फिकर होलि कि गोर अर ग्वैर किलै नि बौड़ा अज्यों तलक यी सोचिकि ग्वैरों न सोचि कि हम गोरों तैं ल्हेकि घौर चलि जंदन। झल्या तैं ख्वजणा खातिर बाद दिखे जालि।
ग्वैर गोरों तैं ल्हेकि घौर ऐगेन। घार वळों जब पता चालि ता वोंन ग्वैरों तैं खरि, खोटि सुणै कि बोड़ कख हरचैदेन? रात लोग लालटेन बाळी, गैस बाळी झल्या तैं ख्वजणां खातिर जुगळ गैन। अध राति तलक झल्या तैं खोजि पण झल्या छौ कि कखि दिखे नी।
तै दिन बिटिन लगातार झल्या तैं ख्वजणा रैंन पण झल्या छौ कि मीलि हि नी। लोगोंन सोचि कि सैद बाघन मारि यालि हो। पण बाघ बि मरदु ता कखि वैका हड़गा ता मिल्दा। सबि अचरज म छया कि गै चा ता गै कख चा झल्या? न यंी ढंया, न वै पाखा न तै रौला पण लोगोंन बि झल्या तैं ख्वजणु जारी राख।
एक दिन जब ख्वजदा दूर जंगळ म पौंछी ता वोंन देखि डाळों का झुरमुट का निसा एक गदनि ब्वगणीं अर समणि झल्या खडु चा। लोगों ने देखी ता वख आपरूपी शिवलिंग बि वों तैं दिखे। वै हि शिवलिंगा समणि झल्या एकटक खडु हुयों छौ। लोगोंन व जगा साफ कैरि, शिवलिंग मा पाणि चढै अर झल्या तैं घौर ल्हेऐन।
झल्या तैं घौर ल्हाणा बाद कै दाना सयाणा न बोलि यु बोड़ हर्चि नी चा। तुमन वैकि गयळि कैरि, बग्वाळा दिन न तुमन झल्या तैं छनुड़ भितनै बिटिन न म मेलि अर न वै तैं पींडु, पाणि दे, न सींगों परैं तेल लगै इलै वो रूसै गे। तब वे दिन झल्या पूजा करेगे, वै का कुंपळा सिंगों परैं तेल लगये गे अर वैकि पूजा करेगे। किलैकि झल्या यकुलु बोड़ छौ जैकि ये दिन पूजा करेगे, पींडु, पाणि दियेगे अर सिंगों परैं तेल लगये गे इलै ये दिना नौ पोड़ि इगास मतलब इ माने यकुलु अर गास माने जै तैं गास या पेंडु, पाणि खाणु दियेगे। तब ये दिना खुणि इगास बुल्दन। बग्वाळा बाद बारा दिन बाद मीलि छौ झल्या तबी ये दिना खुणि इगासा रूपम मनये जांद।
हमरा लोक जीवन अर लोक परम्पराओं म भौत कुछ चा जो सौब से अलग अर अनुकरणींय चा। हमरा पुरण्यों न जो परम्परा अर तीज तिवार बणाया छया वों का पिछनै लोक हित अर लोक परम्पराओं तैं अगनै बढ़ौणा विचार खास छौ। इगासा कहानि कखि अलग रूपम बि होलि अर वखा लोक वै तैं अलग रूपम प्रस्तुत कर्दौंलु पण भाव सब्यों को एक ही चा।
अमणि ता घर गौं म लोग दूध नि देण वळि गौड़ितैं जंगळ बांधिकि औणा छन। भ्याळु द लमडै देणा छन अर वों का गिच्चों परैं प्लास्टिका पन्नी बांधि देणा छन ताकि न त उज्याड खौ अर न हम तैं गाळि मील। हम देवभूमि का मनखि कतना स्वार्थी अर र्निलज्ज बणि ग्यों? जैं गौड़ि से हमरू ज्यूणु-म्वना सारू छौ, संस्कार छया वीं गौड़ि कि अमणि यनि कुदशा? सोचिकि मन खराब सि होंद। जब समाजा यनि कु दशा अर भ्रष्ट सोच होलि ता वख क्या इगास अर क्य बग्वाळ पण फेर बि हमरि संस्कृति चा अर हमरा पुरण्यों का रीति, रिवाज छन। स्वचदां के सैद मनख्यों का मन बदलेला अर वो गौ वंशा यनि गयळि नि काराला।

अमणि हम लोग अपणा घर,गौं बिटिन इनां, उनां बसणा छंवा। दीन, दुन्या म हमरा अपणा लोग बस्यां छन। सब्यों से हमरि हथ जुडै़ चा कि अपणा रीति, रिवाज, तीज, तिवारों तैं नि बिसर्यां।यों से बोर नि हुयां। किलै कि हम कतना बड़ा बि बणि जौंला, कखि बि पौंछि जौंला पण हमरा जलड़ा जब तलक हमरा दगड़ राला तबी तलक हम उत्तराखण्डी छंवा। तबी तक हमरि पछ्याण बची रालि। इलै अपणि नै पीढ़ि तैं अपणी परम्परा सिखाणु अर वों तैं हस्तातंरित कनु बि हमरू फर्ज चा। त आवा हम अर आप अपणि लोक परम्परा को तिवार तैं मनंदा अर अपणि भाषा, संस्कृति कि रख्वाळि बि कर्दां।

आप सब्यों तैं सपरिवार अर इष्टमित्रों समेत इगास -बग्वाळा भौत-भौत बधै अर शुभकामना छन।

यो लोक परम्परा को लेख हमुन पण्डित सत्यप्रकाश रत्यूड़ी जी से वार्ता का आधार परैं लिखे गयों चा। रत्यूडी जी को बि आभार।

Bhishma Kukreti

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सिध्द पीठ गोदेश्वर महादेव
शिवरात्री का मेला
अनुवाद-सरोज शर्मा
श्री गोदेश्वर महादेव जनपद पौड़ि गढ़वाल उत्तराखंड म ढांगू पट्टी मा ठिठोली ग्राम का उत्तर मा लगभग एक किलोमीटर दूर एक सुरम्य पर्वत शिखर मा च।वर्तमान मा यै महादेव कु प्रत्यक्ष महात्म्य यी च जु भि निसंतान दम्पति यख पूजा श्रद्धा भक्ति से यात्रा करदिन ऊंथै संतान सुख कि प्राप्ति हूंद। गोद भरणा कि मनोकामना पूर्ण हूंण क कारण यै सिध्द पीठ थैं गोदेश्वर महादेव बव्लदिन। पूर्व काल मा यख घौण जंगल छा कौशिक वंशीय राजा कृशाम्भु निसंतान छाई, पुत्र कामना से यै ही चोटि मा साम्भसदाशिव कु पंचाक्षर मंत्र कि दीक्षा लेकि बारा बर्ष तक तपस्या मा लीन ह्वै गैं। यूं हि राजा कु पुत्र महामुनी विश्वामित्र हुईं। भगवान शंकर गोपेश्वर अवतार मा यूं भक्त राजा थैं साक्षात पुत्र रत्न क वरदान मिल। पैल से अब तक यू महादेव मंदिर संतान प्राप्ति और मनोकामना खुण सिध्द रै, लिंग पुराण,स्कन्दपुराण, श्री शिवपुराण मा श्री साम्भसदाशिव का असंख्य अवतार बणयै गैं, ऐमा हि एक गोपेश्वर अवतार बतयै ग्या, आजकल का पुत्रहीन लोग यखमा पूजा पाठ आदि करैक पुत्र प्राप्ति ह्वै जाण से गोदेश्वर नाम से जणै जांद, (आधारित श्री गोदेश्वर महादेव महात्म) लेखक पं भैरव दत्त शास्त्री किवदंती क आधार पर यी शब्द प्रमाणनुसार यी सत्य विश्वसनीय मनै ग्या कि सत्रहवी शताब्दी मा एक भैस सिध्द पीठ गोदेश्वर महादेव क पिंड मा रोज दूध चढ़ाना आंदि छै, एक बार श्रवण मास मा वै क मालिक थैं पता ह्वै गे कि या भैसं रात मा कखि जंगल मा घास चरण कु जांद, और फिर खूंटा मा ऐ जांद यै क थन मा दूध भि नि रैंद किसान न एक दिन छिप की भैस कु पिछनै ग्या, वैल दयाख कि भैस न थनो कु दूध शिव पिंडी मा छोड़ दयाई, भैस क मालिक न गुस्सा मा दूध से भ्वरी कुंडि ढुंग मारिक तोड़ द्या इतगा मा वा दुधारू भैस भि अदृश्य ह्वै ग्या वी अधा टूटीं कुण्डी पत्थर पोखर मात्र आज सिध्द पीठ गोदेश्वर महादेव मा अक्षय कुण्डी क नाम से विधमान च, यै बामण लोग आज भि यजमान भक्तो थैं विल्व पत्रो से अभिषेक करनदिन,
जोगीधार नामक वू किसान भैस कु मालिक क्रोध मा कुंडी त्वणण क बाद भैस क खोज मा जगा जगा भटकण लाग लंगूर गढ़ से नौगढ़ तक वा भैस नि मिली जु यख गोदेश्वर महादेव क पास पश्चिमी उत्तर कि ओर एक भंयकर चट्टान वल पैनी धार वल भयंकर पहाड च यख गुफा भी च यीं गुफा मा किसान अपण भैस क प्रतीक्षा मा रै, और साधुवेश मा धूनि रमा कैकि ऊं नम:शिवाय क जप कनू रै, यै कारण यै क नाम जोगीधार भि प्वाड, मंदिर स्थान से लगभग द्वी सौ मीटर कि दूरी च,यै देखण कु पथरीली चट्टान कंटीलि झाड़ियो से जाण प्वड़द ,
गोदियू छिंछडा नाम यख से कुछ दूरी मा एक झरणा च, श्रावण मास मा वर्षा कि अधिकता क कारण ई बद्री नाथ कि वसुधारा जन दिखै जांद, गरमियो मा यै क पाणि सूख जांद,
जोगीधारा गुफा मा किसान साधु अपणी तुम्मा भ्वरण यखी आंद छा, यु जल हि वू गोदेश्वर महादेव मा चणाद छाई, तब से ये क नाम गोदियू छिंछडा पोड़ ग्या यै छिंछडा से शिलाजीत और अन्य औषधि भि मिलदन,
सिध्द पीठ गोदेश्वर महादेव मा कै भि मैना या वार कु आई सकदौ किलैकि यी प्रसिद्ध सिध्द पीठ


Bhishma Kukreti

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होलि का बनि बनि रूप, साहित्य म होली अर होली संगीत
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सरोज शर्मा-गढ़वाली जन प्रिय साहित्य

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होलि रंगो और कु और हंसण खेलण कु त्यौहार च जु आज सरया दुनियाभर म मनयै जांद
भारत म अलग अलग हिस्सों म अलग अलग तरीका से मनयै जांद ,ब्रज कि होलि आज भि सरया दुनियाभर मा प्रसिद्ध च,और आकर्षण क बिंदु च, बरसाने कि लठठ मार होलि काफी प्रसिद्ध च, ऐ मा पुरूष महिलाओ पर रंग डलदिन और महिलाए ऊं पर लठठ और कपड़ा क बणयां कोड़ा से मरदिन, ऐ प्रकार से मथुरा और वृन्दावन म भि 15 दिनों तक होलि मनयै जांद, कुमांउ कि गीत बैठकी म शास्त्रीय संगीत कि सभा हुंदिन, ई सब होलि से कै दिन पैल शुरू ह्वै जांद,
हरियाणा कि धुलंडी म भाभी द्वीयूर थै परेशान कनक रिवाज च,बंगाल कि दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु क जन्म दिन क रूप मा मनयै जांद, जुलूस निकालिक गांण बजांण भि हूंद, ऐक अतिरिक्त महाराष्ट्र कि रंग पंचमि मा गुलाल से खेलणा कि प्रथा च, गोवा म शिमगो म जुलूस निकणक बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम क आयोजन हूंद, पंजाब मा होला मोहल्ला मा सिखों द्वारा शक्ति प्रदर्शन कि प्रथा च,
तमिल नाडू की कमन पोडिगई कामदेव कि कथा पर आधारित वसंतोत्सव च जबकि मणिपुर म याओसांग वै छवटि झोपड़ी क नाम च जु पूर्णिमा क दिन नदी तट पर बणयै जंदिन, दक्षिण गुजरात क आदिवासियो खुण होलि सबसे बढ़ पर्व च ,
छत्तीसगढ कि होलि म लोकगीतों कि परम्परा च, और मध्यप्रदेश क मालवा अंचल क आदिवासी इलाका भौत धूमधाम से मनयै जांद,
भगोरिया जु होलि क ही रूप च, बिहार क फगुआ खूब मौज मस्ती क पर्व च, नेपाल कि होली मा भि धार्मिक व सांस्कृतिक रंग हूंद, धार्मिक संस्थाओ जनकि इस्कॉन, वृन्दावन, बांकेबिहारी मंदिर, म भिन्न भिन्न प्रकार से होली क श्रंगार व उत्सव मनाण कि परंपरा च ,
होलि मनाण का तरीका
होलि कि पूर्व संध्या वला दिन होलि पूजा और होलिका दहन हूंद, होलि कि परिक्रमा शुभ मने जांद, सार्वजनिक स्थान मा लकड़ी उपलों से होलि तैयार किए जांद, होलि से काफी दिन पैल से ऐ कि तैयारि कियै जांद, गाय क गोबर का उपला जै मा बीच मा छेद हूंद जैथैं गुलरी, भरभोलिये या झाल भि ब्वलेजांद, ऐ मा मूंज कि रस्सी से माला बणयै जांद,
लकडियों व उपलो से बणी होली क विधिवत पूजन किए जांद, होली क दिन घौर मा पकवान बणैकि भोग लगयै जांद, दिन ढलण मा होलिका दहन कियै जांद, ऐ आग म गेंहू जौ चना क बलड़ा भुनै जंदिन, दूसर दिन लोग अबीर गुलाल से होली खेलदिन, ढोल बाजा और होली क गीत गंनदिन, घर घर जैकि होली खेलदिन, मित्र और रिस्तेदारों से मिलणकु जंदिन,
टोलि बणैकि रंग बिरंगा कपड़ा पैरिक नचदा गांदा छन, बच्चा पिचकरी से रंग खेलदिन, प्रीति भोज और गाणबजांण कु आयोजन भि हूंद,
होलि मा बच्चा सबसे ज्यादा खुश हूंदिन, सब्यों पर रंग डलदा भगदा दौड़दा खूब मजा करदिन, होली है, होली है कि अवाज से मोहल्ला गुंजै दिंदिन, दुफरा बाद नहयै धुवै कि नया कपड़ा पैरिक आराम कनक बाद शाम कु एक दुसर क घौर मिलणकु जंदिन,
साहित्य म होलि कु वर्णन
प्राचीन काल मा होलि संस्कृत साहित्य म होली क अनेक रूपों क वर्णन मिलद, श्रीमद्भागवत म रसों क समूह रास क वर्णन च,और रचनाओं म रंग नौ क उत्सव कु वर्णन च, जैमा हर्ष कि प्रियदर्शिका व रत्ना वली और कालिदास कि कुमरसंभव और मालिविकाग्निमित्रम शामिल छन, कालिदास रचित ऋतुसंहार म एक पूर सर्ग वसंतोत्सव थैं अर्पित च।
भारवि माघ और भि भौत कवियों न वसंत कि खूब चर्चा कैर। चंदबरदाई कि पृथ्वीराज राज रासौ मा होली क खूब वर्णन च।भक्ति काल और रीतिकाल क हिन्दी कवियों न भि होलि और फाल्गुन मास थैं विषेश महत्व द्या। आदिकालीन विध्यापति से लेकि भक्तिकालीन सूरदास, रहीम,रसायन,पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर,और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद, आदि कवियों कु भि ई प्रिय विषय रै,महाकवि सूरदास न बसंत और होलि पर 78 पद लिखिन ऐ विषय मा कवियों न जख नितांत लौकिक नायक नायिका क बीच ख्यलै गै अनुराग प्रेम कि होलि क वर्णन कैर वखी राधा कृष्ण कि बीच ख्यलै गै प्रेम और छेडछाड़ से भरीं होलि क माध्यम से निर्गुण और सगुण प्रेम कु वर्णन कैर। सूफी संत निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो,और बहादुर शाह जफर जना मुस्लिम समुदाय वलों न भि होली पर सुंदर रचनाऐं लिखि छन,
आधुनिक हिन्दी काहनियों मा प्रेमचंद, राजा हरदिल,प्रभु जोशी, अलग अलग तीलियां, तेजेन्द्र शर्मा कि एक बार फिर होली, ओमप्रकाश अवस्थी कि होली मंगलमय हो, स्वदेश राणा कि होली,मा होलि का कै रूप मिलदा छन ,भारतीय फिल्मो मा भि होलि का दृश्य और गीत सुंदरता क साथ चित्रित किए गैन,
होलि क संगीत
भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय लोक तथा फिल्मी संगीत कि परंपराओ म होलि क विशेष महत्व च। शास्त्रीय संगीत म धमार क होलि से गैरू रिश्ता च, हालांकि ध्रुपद, धमार, छवट व बड़ा ख्याल ठुमरी म भि होलि क गीतों क सुंदरता देखदा हि बणद, कत्थक नृत्य म भि होलि, धमार, और ठुमरी कि भौत हि सुंदर बन्दिश जनकि चलो गुइयां आज खेलें होरी कनहैया घर आज भि लोकप्रिय च। ध्रुपद मा गयै जाण वलि खेलत हरी संग सकल रंग भरी होरी सखी, भारतीय शास्त्रो म कुछ राग इन छन जु होलि मा विषेश रूप से गयै जंदिन, बसंत बहार, हिंडोल,और भि भौत राग छन होलि म गांण बजांण क वातावरण अफ्यी बण जांद। होली कि लोकप्रियता क अंदाज ऐ बात से हि लगयै जांद कि संगीत कि एक शैलि कु नाम ही होलि च,अलग अलग प्रान्तो म विभिन्न वर्णन सुणना कु मिलद होलिक, बृजधाम म राधा कृष्ण कि होलि, अवध मा राम सीता कि होलि, जनकि होली खेलें रघुवीरा अवध में,राजस्थान म मोइनुद्दीन चिश्ती कि दरगाह म आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है, इन्नी शंकर जी से संबंधित होली में दिगंबर खेले मसाने मे होली, भारतीय फिल्मों म भि अलग अलग रागों म होली गीत प्रस्तुत कियै गैं, जनकि रंग बरसे भीगे चुनरवाली, नवरंग कु आया होलि का त्यौहार उड़े रंग की बौछार थैं लोग आज भि नि भूल सकदा।


 

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