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Author Topic: Kumauni Holi - कुमाऊंनी होली: एक सांस्कृतिक विरासत  (Read 65750 times)

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पंकज सिंह महर

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Kumauni Holi - कुमाऊंनी होली: एक सांस्कृतिक विरासत
« on: January 04, 2008, 02:44:23 PM »
साथियों,
       जैसा कि आप लोग अवगत ही हैं कि होली एक मस्ती से भरा त्यौहार है और दुनिया में सभी जगह होली बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है। लेकिन कुमाऊंनी होली का एक अलग ही रंग है, पूरे विश्व में इस होली की अलग पहचान है, मुख्य रूप से इस होली के दो अंग हैं १- बैठकी होली २- खडी होली.  बैठकी होली बैठकर शाष्त्रीय धुनों पर गाये जाने वाली होली को कहा जाता है, जिसमें होल्यार रंग से सरोबार होकर होली गाते हैं यह होली बसंत पंचमी से शुरु हो जाती है। इसी प्रकार से खड़ी होली होली के दिनों में खड़े होकर गायी जाती है।
      बैठकी होली महिलाओं के द्वारा भी की जाती है। आइये इस अनमोल और मस्ती भरी विरासत पर अपने विचार दें।


« Last Edit: June 22, 2010, 01:30:49 PM by हेम पन्त »
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

पंकज सिंह महर

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #1 on: January 04, 2008, 02:49:36 PM »
उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल में होली की नियत तिथि से काफी पहले (बसंत पंचमी से) ही होली की मस्ती और रंग छाने लगते हैं. इस रंग में सिर्फ अबीर गुलाल का टीका ही नहीं होता बल्कि बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है. बरसाने की होली के बाद अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए कुमाऊंनी होली को याद किया जाता है. फूलों के रंगों और संगीत की तानों का ये अनोखा संगम देखने लायक होता है. शाम ढलते ही कुमाऊं के घर घर में बैठक होली की सुरीली महफिलें जमने लगती है. बैठक होली घर की बैठक में राग रागनियों के इर्द गिर्द हारमोनियम तबले पर गाई जाती है.

“.....रंग डारी दियो हो अलबेलिन में...
......गए रामाचंद्रन रंग लेने को गए....
......गए लछमन रंग लेने को गए......
......रंग डारी दियो हो सीतादेहिमें....
......रंग डारी दियो हो बहुरानिन में....”

यहां की बैठ होली में नजीर जैसे मशहूर उर्दू शायरों का कलाम भी प्रमुखता से देखने को मिलता है.
“....जब फागुन रंग झमकते हों....
.....तब देख बहारें होली की.....
.....घुंघरू के तार खनकते हों....
.....तब देख बहारें होली की......”


बैठकी होली में जब रंग छाने लगता है तो बारी बारी से हर कोई छोड़ी गई तान उठाता है और अगर साथ में भांग का रस भी छाया तो ये सिलसिला कभी कभी आधी रात तक तो कभी सुबह की पहली किरण फूटने तक चलता रहता है. होली की ये रिवायत महज़ महफिल नहीं है बल्कि एक संस्कार भी है. ये भी कम दिलचस्प नहीं कि जब होली की ये बैठकें खत्म होती हैं-

आर्शीवाद के साथ. और आखिर में गायी जाती है ये ठुमरी…..
“मुबारक हो मंजरी फूलों भरी......ऐसी होली खेले जनाब अली..... ”
 

बैठकी होली की पुरूष महफिलों में जहां ठुमरी और खमाज गाये जाते हैं वहीं अलग से महिलाओं की महफिलें भी जमती हैं. इनमें उनका नृत्य संगीत तो होता ही है, वे स्वांग भी रचती हैं और हास्य की फुहारों, हंसी के ठहाकों और सुर लहरियों के साथ संस्कृति की इस विशिष्टता में नए रोचक और दिलकश रंग भरे जाते हैं.

इनके ज्यादातर गीत देवर भाभी के हंसी मज़ाक से जुड़े रहते हैं जैसे... फागुन में बुढवा देवर लागे.......

होली गाने की ये परंपरा सिर्फ कुमाऊं अंचल में ही देखने को मिलती है. इसकी शुरूआत यहां कब और कैसे हुई इसका कोई ऐतिहासिक या लिखित लेखाजोखा नहीं है. कुमाऊं के प्रसिद्द जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठ होली के सामाजिक शास्त्रीय संदर्भों और इस पर इस्लामी संस्कृति और उर्दू के असर के बारे में गहराई से अध्ययन किया है. वो कहते हैं कि “यहां की होली में अवध से लेकर दरभंगा तक की छाप है. राजे-रजवाड़ों का संदर्भ देखें तो जो राजकुमारियां यहां ब्याह कर आईं वे अपने साथ वहां के रीति रिवाज भी साथ लाईं. ये परंपरा वहां भले ही खत्म हो गई हो लेकिन यहां आज भी कायम हैं. यहां की बैठकी होली में तो आज़ादी के आंदोलन से लेकर उत्तराखंड आंदोलन तक के संदर्भ भरे पड़े हैं .”
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #2 on: January 04, 2008, 02:53:11 PM »
होली

फाल्गुन सुदी ११ को चीर-बंधन किया जाता है। कहीं-कहीं ८ अष्टमी कोचीर बाँधते हैं। कई लोग आमलकी ११ का व्रत करते हैं। इसी दिन भद्रा-रहित काल में देवी-देवताओं में रंग डालकर पुन: अपने कपड़ों में रंग छिड़कते हैं, और गुलाल डालते हैं। छरड़ी पर्यन्त नित्य ही रंग और गुलाल की धूम रहती है। गाना, बजाना, वेश्या-नृत्य दावत आदि समारोह से होते हैं। गाँव में खड़ी होलियाँ गाई जाती हैं। नकल व प्रहसन भी होते हैं। अश्लील होलियों तथा अनर्गल बकवाद की भी कमी नहीं रहती। कुमाऊँ में यह त्यौहार ६-७ दिन तक बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। सतराली, पाटिया, गंगोली, चम्पावत, द्वाराहाट आदि की होलियाँ प्रसिद्ध हैं। गाँवों में भी प्राय: सर्वत्र बैठकें होती हैं। मिठाई व गुड़ बाँटा जाता है। चरस व भांग की तथा शहरों में कुछ-कुछ मदिरा की धूम रहती है। फाल्गुन सदी १५ को होलिका दहन होता है। दूसरे दिन प्रतिपदा का छरड़ी मनाई जाती है। घर-घर में घूमकर होलिका मनाकर सायंकाल को रंग के कपड़े बदलते हैं। धन भी एकत्र करते हैं, जिसका देहातों में भंड़ारा होता है। 


« Last Edit: March 07, 2011, 10:06:16 AM by हेम पन्त »
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #3 on: January 04, 2008, 03:00:31 PM »
मेरी पसंदीदा होलियां :-
१- हो-हो-हो मोहन गिरधारी, हां-हां-हां मोहन गिरधारी,
    ओ ऎसो अनाड़ी चुनर गयो फाडी,
    ओ हंसी-हंसी दे गयो, गारी........मोहने गिरधारी.
   हो-हो-हो मोहन गिरधारी, हां-हां-हां मोहन गिरधारी।

२-जल कैसे भरुं, जमुना गहरी-२
  ठाड़े भरुं राजा राम देखत हैं-२
  बैठे भरुं जमुना गहरी.
   जल कैसे भरुं जमुना गहरी।

३- शिव के मन माही बसे काशी.....।

 बाकी आप लोग ले बताओ पैं................होली है........
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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #4 on: January 04, 2008, 03:01:52 PM »

Mahar Ji,

This a very informative post.  I remember a few holi which i used to sing in village with some senior people.

Quote from: पंकज सिंह महर on January 04, 2008, 02:49:36 PM
उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल में होली की नियत तिथि से काफी पहले (बसंत पंचमी से) ही होली की मस्ती और रंग छाने लगते हैं. इस रंग में सिर्फ अबीर गुलाल का टीका ही नहीं होता बल्कि बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है. बरसाने की होली के बाद अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए कुमाऊंनी होली को याद किया जाता है. फूलों के रंगों और संगीत की तानों का ये अनोखा संगम देखने लायक होता है. शाम ढलते ही कुमाऊं के घर घर में बैठक होली की सुरीली महफिलें जमने लगती है. बैठक होली घर की बैठक में राग रागनियों के इर्द गिर्द हारमोनियम तबले पर गाई जाती है.

“.....रंग डारी दियो हो अलबेलिन में...
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यहां की बैठ होली में नजीर जैसे मशहूर उर्दू शायरों का कलाम भी प्रमुखता से देखने को मिलता है.
“....जब फागुन रंग झमकते हों....
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बैठकी होली में जब रंग छाने लगता है तो बारी बारी से हर कोई छोड़ी गई तान उठाता है और अगर साथ में भांग का रस भी छाया तो ये सिलसिला कभी कभी आधी रात तक तो कभी सुबह की पहली किरण फूटने तक चलता रहता है. होली की ये रिवायत महज़ महफिल नहीं है बल्कि एक संस्कार भी है. ये भी कम दिलचस्प नहीं कि जब होली की ये बैठकें खत्म होती हैं-

आर्शीवाद के साथ. और आखिर में गायी जाती है ये ठुमरी…..
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बैठकी होली की पुरूष महफिलों में जहां ठुमरी और खमाज गाये जाते हैं वहीं अलग से महिलाओं की महफिलें भी जमती हैं. इनमें उनका नृत्य संगीत तो होता ही है, वे स्वांग भी रचती हैं और हास्य की फुहारों, हंसी के ठहाकों और सुर लहरियों के साथ संस्कृति की इस विशिष्टता में नए रोचक और दिलकश रंग भरे जाते हैं.

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होली गाने की ये परंपरा सिर्फ कुमाऊं अंचल में ही देखने को मिलती है. इसकी शुरूआत यहां कब और कैसे हुई इसका कोई ऐतिहासिक या लिखित लेखाजोखा नहीं है. कुमाऊं के प्रसिद्द जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठ होली के सामाजिक शास्त्रीय संदर्भों और इस पर इस्लामी संस्कृति और उर्दू के असर के बारे में गहराई से अध्ययन किया है. वो कहते हैं कि “यहां की होली में अवध से लेकर दरभंगा तक की छाप है. राजे-रजवाड़ों का संदर्भ देखें तो जो राजकुमारियां यहां ब्याह कर आईं वे अपने साथ वहां के रीति रिवाज भी साथ लाईं. ये परंपरा वहां भले ही खत्म हो गई हो लेकिन यहां आज भी कायम हैं. यहां की बैठकी होली में तो आज़ादी के आंदोलन से लेकर उत्तराखंड आंदोलन तक के संदर्भ भरे पड़े हैं .”

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #5 on: January 04, 2008, 03:02:56 PM »

Mahar Ji..

This is also one be my favourite holi.. (1 karma to u for this exclusive information).

२-जल कैसे भरुं, जमुना गहरी-२
  ठाड़े भरुं राजा राम देखत हैं-२
  बैठे भरुं जमुना गहरी.
   जल कैसे भरुं जमुना गहरी।

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #6 on: January 04, 2008, 03:05:24 PM »


Kumaoni Holi

The uniqueness of the Kumaoni Holi lies in its being a musical affair, whichever may be its form, be it the Baithki Holi, the Khari Holi or the Mahila Holi. The Baithki Holi and Khari Holi are unique in that the songs on which they are based have touch of melody, fun and spiritualism. These songs are essentially based on classical ragas. No wonder then the Baithki Holi is also known as Nirvan Ki Holi.

The Baithki Holi begins from the premises of temples, where Holiyars (the professional singers of Holi songs) as also the people gather to sing songs to the accompaniment of classical music.

Kumaonis are very particular about the time when the songs based on ragas should be sung. For instance, at noon the songs based on Peelu, Bhimpalasi and Sarang ragas are sung while evening is reserved for the songs based on the ragas like Kalyan, Shyamkalyan and Yaman etc.

The Khari Holi is mostly celebrated in the rural areas of Kumaon. The songs of the Khari Holi are sung by the people, who sporting traditional white churidar payajama and kurta, dance in groups to the tune of ethnic musical instruments.

from:euttaranchal
« Last Edit: June 22, 2010, 01:38:44 PM by हेम पन्त »
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #7 on: January 04, 2008, 03:15:06 PM »
यो ल्हियो महाराज..

बलमा घर आये कौन दिना. सजना घर आये कौन दिना...
मेरे बलम के तीन शहर हैं
मेरे बलम के तीन शहर हैं
दिल्ली, आगरा और पटना.. बलमा घर आये कौन दिना. बलमा घर आये कौन दिना .. सजना घर आये कौन दिना।

मेरे बलम की तीन रानियां - २
मेरे बलम की तीन रानियां
पूनम, रेखा और सलमा  बलमा घर आये कौन दिना. बलमा घर आये कौन दिना .. सजना घर आये कौन दिना।




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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #8 on: January 04, 2008, 03:19:22 PM »
वाह जी वाह. .. बहुत बढिया..
आनन्द आ गया... आपको +१ कर्मा
(ये उम्मीद का साथ कि और ले के holi scripts भेजला)

Quote from: suchira on January 04, 2008, 03:11:55 PM
Some of the holi scripts
« Last Edit: January 04, 2008, 03:22:09 PM by राजु दा »
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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #9 on: January 04, 2008, 03:26:45 PM »
लियो पैं आब सुणौ on line होली उम्मेद राम जी की आवाज में

http://www.beatofindia.com/mp3/umed_ram/4-chalo_bhagwan-holi.mp3
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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #10 on: January 04, 2008, 03:33:42 PM »
मैं तो कर आई कौन करार देवा तेरे मंदिर में......
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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #11 on: January 04, 2008, 03:36:51 PM »
गजेन्द्र अधिकारी जी होली गा रहे है, एकदम शाष्त्रीय

http://www.youtube.com/watch?v=nQqtQ73TWSE


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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

पंकज सिंह महर

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #12 on: January 04, 2008, 03:40:49 PM »
सुरेश कर्नाटक जी द्वारा होली गायन

http://www.youtube.com/watch?v=D-1tfr2HlqY&feature

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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #13 on: January 04, 2008, 03:44:54 PM »
कुमाऊं में होली की लोकप्रियता का इस वीडियो से ही अंदाजा लगाया जा सकता है, पिथौरागढ़ में ॠषि शाह, उम्र ३ वर्ष तबला बजा रहे हैं..

http://www.youtube.com/watch?v=CTwaTWyiLCA
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

हलिया

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Re: कुमाऊंनी होली/kumaoni holi : एक सांस्कृतिक विरासत
« Reply #14 on: January 04, 2008, 04:20:51 PM »
पंकज महर ज्यू,
तुम्हरि जै जैकार छु हो महाराज..
गजब करिद्यो हो महाराज... और ले कै भेज्या महाराज....+१
Quote from: पंकज सिंह महर on January 04, 2008, 03:36:51 PM
गजेन्द्र अधिकारी जी होली गा रहे है, एकदम शाष्त्रीय
 
Quote from: पंकज सिंह महर on January 04, 2008, 03:40:49 PM
सुरेश कर्नाटक जी द्वारा होली गायन
 
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हौसिया छन डाना पर्वत, हौसिया छन भरौ का भाड़ा,
मन में बसौ मेरो मुलुक, आँख में रिटौ 'म्यर पहाड़' ||

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