Author Topic: Kumauni Holi - कुमाऊंनी होली: एक सांस्कृतिक विरासत  (Read 194459 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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हमार गौं में होरि कि शुरूआत एकादशी कि ब्याल भगवति मंदिर है हुछि
पैंलि होरि जो गाई जाॅछि उ छ
मैय्या के दरवार आ चल खेलें होरि
ओ देवी के दरवार आ चल खेलें होरि
ओ कौन दिशा से जातुर आया कौन दिशा को जाय अम्बा धन तेरो है
पुर्ब दिशा से जातुर आया पछिम दिशा को जाय अम्बा जुग तेरो है
कौन दिशा से जातुर आया क्या क्या ल्य्या भेट अम्बा जुग तेरो है
अच्छत चंदन गौ को गोबर चौका ले हो पुराय अम्बा धन तेरो है
कौन दिशा से जातुर आया क्या क्या ल्याया भेट अम्बा धन तेरो है
ओ सालि का चावल कपूर कि बाति जगमग जगमग होय अम्बा जुग तेरो है
हरिया पीपल द्वार बिराजे फरहर फरफर होय अम्बा जुग तेरो है
हम तो मय्या दरशन माॅगें काया अमर होय अम्बा जुग तेरो है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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एक होलि
मैं ठाड़ि जो हेरूॅ बाट मेरो सॅय्याॅ निर्मोही कब आवै
कब आवै मेरो यार बालम सय्याॅ निर्मोही कब आवै
पूरब बदरा ऊरानो हो ऊरानो
ओ पछिम भयो घनघोर मेरो सॅय्या निरमोही कब आलो
उत जन बरसे मेघा रे हो
उतहि पिया परदेश सॅय्या निरमोही कब आलो
मूगा खरदन पिया गये हैं
सात समुन्दर पार मेरो सॅय्या निरमोही कब आलो
को यो चिठी लेखि देलो हो लेखि देलो
कौन पुजाये डाक मेरो सॅय्या निरमोही कब आलो
ओ पंडित चिठी लेखि देलो हो लेखि देलो
सुवा पुजालो डाक मेरो सॅय्या निरमोही कब आलो
कब आलो मेरो यार बालम सॅय्या निरमोही कब आलो

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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होरि कि सबन भौत भौत बधै
एक ठाड़ी होरि
तलधरती पुर बादल बदरा उपज भया
ओ तल धरति पुर बादल बदरा उपज भया
कौरव पांडव भाई चचरे खेलै चौपड़ राज
तल धरति पुर बादल बदरा उपज भया
ओ कौरव जुवरा खेलें सकुनी की लेकर आड़
जा हो भीमा पांडव द्रोपदी पड़ गई हार
तल धरति पुर बादल बदरा उपज भया
जा हो अरजुन पांडव तुम पर पड़ गई मार
तल धरती पुर बादल बदरा उपज भया

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कुमाऊँनी नई होली
अब कैसे उतरें पार ऐसे कलयुग में।
अब कैसे उतरें पार ऐसे कलयुग में।।
जाहाँ भी हम देखें जग में
ताहाँ पाप हि पाप।। ऐसे कल०
धरम हीन धरती सब दीखे
करम हीन नर नर नार।। ऐसे कलयु०
योगी सन्त सभी तब हरषे
देखि पराई नार।। उसे कल०
राम नाम जपते नहिं कोई
काम हि काम विकार।। ऐसे कल०
लोभ लाभ सबके मन भावे।
नहीं किसी से प्यार।। ऐसे कल०
गंगा जमुना दोनों मैली
कहाँ कटें अब पाप।। ऐसे कल०

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कुमाऊँ क्षेत्र की एक होली ....
मत जा हो पिया होरी आई रही , मत जा हो पिया होरी आई रही ..
आई रही ऋतु जाई रही , मत जा हो पिया .....
पाँव पड़ूँगी हाथ जोड़ूँगी
बाँह पकड़ के मनाय रही मत जा हो पिया ....
आगे सजना पीछे सजनी
पाँव में पाँव मिलाय रही , मत जा हो पिया ...
जिनके पिया परदेश बसत हैं
उनकी नारी सोच मरी मत जा हो पिया ....
जिन के पिया नित घर में बसत हैं
उन की नारी रंग भरी मत जा हो पिया ...
मत जा हो पिया होरी आई रही मत जा हो पिया होरा आई रही

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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By Bhishma Kukreti

गढ़वाल में होली उत्सव के कुछ प्रचलित गीत
मूल स्रोत्र श्री शिव शरण धस्माना ग्राम बौन्दर , पिन्ग्लापाखा
पुस्तक : डा शिवा नंद नौटियाल -----गढवाल के नृत्य गीत
इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती
जब होली खिलंदर किसी गाँव में प्रवेश करते हैं तो वे गाते हैं नृत्य करते हैं
1-
खोलो किवाड़ मठ भीतर
दरसन दीज्यो माई आंबे -झुलसी रहो जी
तीलू को तेल कपास की बाटी
जगमग जोत जले दिन राती -झुलसी रहो जी
इष्ट देव , ग्राम देवता पूजा के बाद होली नर्तक गोलाकार में नाचते गाते हैं
जल कैसे भरूं जमुना गहरी जल कैसे भरूं जमुना गहरी
खड़े भरूं तो सास बुरी है
बैठे भरूं तो फूटे गगरी , जल कैसे भरूं जमुना गहरी
ठाडे भरूं तो कृष्ण जी खड़े हैं
बैठे भरूं तो भीगे चुनरिया , जल कैसे भरूं जमुना गहरी
भागे चलूँ तो छलके गगरी , जल कैसे भरूं जमुना गहरी
यह अत्यंत जोशीला नृत्य गीत है जिसमे उल्ल्हास दीखता है और श्रृंगार भी है
इसके बाद भजन गीत है जो उसी उल्हास के साथ नृत्य-गीतेय शैली का है
-----2-------
हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी I
कहाँ तेरो जनम निवास जय देवी आदि भवानी I
कांगड़ा जनम निवास , जय देवी आदि भवानी I
कहाँ तेरो जौंला निसाण , जय देवी आदि भवानी I
कश्मीर जौंल़ा निसाण , जय देवी आदि भवानी I
कहाँ तेरो खड्ग ख़पर, जय देवी आदि भवानी I
बंगाल खड्ग खपर , जय देवी आदि भवानी I
हर हर पीपल पात जय देवी आदि भवानी I
--३--
यह गीत भी होली में प्रसिद्ध है . यह गीत श्रृंगार व दार्शनिक है
चम्पा चमेली के नौ दस फूला , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
पार ने गुंथी शिवजी के गले में बिराजे , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
कमला ने गुंथी हार ब्रह्मा के गले में बिराजे , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
लक्ष्मी ने गुंथी हार विष्णु के गले में बिराजे , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
सीता ने गुन्ठो हार राम के गले में बिराजे , चम्पा चमेली के नौ दस फूला
राहदा ने गुंथे हार कृष्ण के गले में बिराजे
--४---
श्रृंगार व उत्स्साही रस भरा गीत है
मत मरो मोहन पिचकारी
काहे को तेरो रंग बनो है
काहे को तेरी पिचकारी बनी है, मत मरो मोहन पिचकारी
लाल गुलाल को रंग बनी है
हरिया बांसा की पिचकारी , मत मरो मोहन पिचकारी
कौन जनों पर रंग सोहत है
कौन जनों पर पिचकारी , मत मरो मोहन पिचकारी
रजा जनों पर रंग सोहत है
रंक जनों पर पिचकारी , मत मरो मोहन पिचकारी
---५--
जब होली खेलने वाली टोली होली खेल चुके होते हैं तो उन्हें होली इनाम मिलता है (पहले बकरा मिलता था , अब पैसा आदि ) और उस समय यह आशीर्वाद वाला नृत्य गीत खेला जाता है
हम होली वाले देवें आशीष
गावें बजावें देवें आशीष ---१
बामण जीवे लाखों बरस
बामणि जीवें लाखों बरस --२
जिनके गोंदों में लड़का खिलौण्या
ह्व़े जयां उनका नाती खिलौण्या --३
जौंला द्याया होळी का दान
ऊँ थै द्याला श्री भगवान ----४
एक लाख पुत्र सवा लाख नाती
जी रयाँ पुत्र अमर रयाँ नाती ---५
हम होली वाले देवें आशीष
गावें बजावें देवें आशीष
सौजन्य एवम आभार :
मूल स्रोत्र श्री शिव शरण धस्माना ग्राम बौन्दर , पिन्ग्लापाखा
पुस्तक : डा शिवा नंद नौटियाल -----गढवाल के नृत्य गीत


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बृज की होली :
बरसाने की होली :
कुमाऊनी होली :
नंद गांव की लट्ठमार होली
होला मोहल्ला :
सिक्खों की होली
बसंतोत्सव और डॉल जात्रा :
पश्चिम बंगाल की होली
थाबल कोनगबा (मणिपुर) :
शिग्मो फेस्टीवल (गोआ) :
मणिपुर की होली

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कुमांऊनी होली : अलग रंग अलग ढंग
होली का त्यौहार मस्ती,उल्लास और मौज मजे का पर्व है. दुनिया में सभी जगह होली बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है.लेकिन कुमाऊंनी होली का अपना एक अलग ही रंग है, पूरे विश्व में इस होली की अलग पहचान है. यहाँ होली मात्र एक दिन का त्यौहार नहीं बल्कि कई दिनों तक चलने वाला त्यौहार है. इसके साथ जो एक और चीज जुड़ी है वह है संगीत. बिना संगीत के कुमांऊनी होली की कल्पना करना भी मुश्किल है. संगीत के साथ साथ होली से जुड़े गीतों में कथ्य का भी बहुत महत्व है. होली यहाँ सिर्फ होली ही नहीं बल्कि एक सामुहिक अभिव्यक्ति का माध्यम है. इसमें सामाजिक चेतना से जुड़े मुद्दे भी हैं और तात्कालिक परिस्थितियों का चित्रण भी है.
कुमांऊनी होली एक पर्व ही नहीं है बल्कि इसकी एक सांस्कृतिक विशेषता है. यहाँ की होली मुख्यत: तीन तरह की होती है. 1. बैठी होली 2. महिला होली 3. खड़ी होली. इसके अलावा खड़ी होली का ही एक हिस्सा बंजारा होली कहलाता है.
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Prema Pande
March 4 at 4:36pm ·
एक अलौकिक ऐहसास ( कुमाँऊनी होली )
मैने देखा कि होली पर्व के आगमन का होली के मतवाले गायक बड़ी आतुरता से प्रतिक्षा करते है , पौष मास के प्रथम रविवार से होली गायन का शुभारम्भ करना शायद कुमाऊँ के अंचलों में ही प्रचलित है !
मुझे बड़ा गर्व है कि मै भी उत्तरा खण्ड के उस अँचल में पली बढ़ी हूँ , बचपन से ही पिताजी को देखती थी , कि वो पूष मास के इतवार का कैसे बेसब्री से इन्तजार किया करते थे , सास्त्रीय सँगीत मे निपुण होली गायको के स्वर आज भी कांनो में गूँजते है !
विवाह के पश्चात ससुराल में आकर भी यही माहौल देखा , ससुरजी गीतों के बड़े शौकीन थे , उन्है गाते हुऐ तो नहीं देखा , पर घर पर लगने वाली बैठक की व्यवस्था में कहीं कमी नही रखते थे , तथा तबला बजाने वाले को ताल का भी ध्यान दिलाते थे , मेरे पति व देवर आज भी बहुत अच्छे गायक व वादक हैं , हमारा परिवार हमेंशा गायक , वादक , व श्रोता रहे हैं , जिनमें मैं भी श्रोता ही रही हूँ !
मेरे पति कहा करते है , कि गीतों के रागों को उनके समयानुसार गाया जाता है , बसंतपन्चमी के बाद से ही होली गायन का आनन्द आता है ,
ज्यों ज्यों एकादशी का समय आता है , त्यों त्यों लोगों का होली के प्रति उत्साव भी बढ़ता जाता है , सभी गायक श्रोता बैठक में रँग भरे कपड़े रंगीन टोपी से सुशोभित होते दिखाई पड़ते है , अबीर गुलाल का टीका लगाना एक दूसरे के गले मिलना , मानो साक्षात राधा कृष्ण बृज भूमि में होली खेल रहे हों , इस संगीत के रस में , गोप गोपियों की ठिठोली , कृष्ण द्वारा मटकी फोड़ना , चूड़ियाँ तोड़ना , बाँहे मरोड़ देना , कृष्ण की बाल लीला का व अन्य देवी देवताओं पर आधारित वर्णन जब इस सँगीत में आता है , तब सभी गायकों की मस्ती व मनोरंजन का वर्णन इन गीतो के साथ साथ होने वाला नृत्य हाथ व चेहरे द्वारा की गई विभिन्न प्रकार की हास्यपूर्ण भाव भँगीमा गायक के हृदय की भावना व्यक्त करती है ,
पुरुषों की होली रात में व महिलाओं की होली दिन में होतीं है !
आज तक जो भी देखा सुना है , यही विषेशता देखी , कि बिना संगीत की शिक्षा ग्रहण किये स्वरों का मूल भूत ज्ञान न होने के बावजूद भी प्रत्येक व्यक्ती जो रुचि रखता हो या नहीं , परम्परागत रुप से एक दूसरे को सुनते हुऐ सीखते चले आये हैं , भले ही प्रत्येक गायक का ताल व राग का आरोह अवरोह आदि का ज्ञान नहीं होता , परन्तु वह किसी भी राग को गाने में सक्षम होता चला जाता है !
उत्तराण्ड वासियों में यही तो खूबी है , कि वहाँ का हर व्यक्ति गायक और कलाकार होता है , अब तो यह भी देखने में आ रहा है कि उत्तराखण्ड के अलावा इस संगीत का आनन्द लेंने हेतु अन्य धर्म भी गाने हेतु आगे बढ़ रहे है !
भारत वर्ष में बसन्त के आगमन पर उसके मोहक वातावरण में खोते हुऐ , अपनी उमँगो को व्यक्त करते हुऐ अकस्मात मुंह से होली पर गाये जाने वाले गीतों के स्वर गूंजने लगते है , उन्हीं गीतों को याद करते करते , होली पर आधारित गीतों को संकलित कर प्रकाशित कराने को मन हुआ !
'आई गयो फाग '
इस संकलन की भूमिका के रुप में अपना बहुमूल्य मंतब्य व्यक्त करने के लिये मैने चिकित्सा जगत में , अपना अग्रणीय स्थान रखने वाले , पद्मश्री से सम्मानित तथा लोहिया चिकित्सालय के निदेशक , स्व० एम ०सी० पन्त जी , की में कृतज्ञ हूँ , सांथ ही सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री घनानन्द पाण्डे ( मेघ ) जी को भी उनके सहयोग के लिये धन्यवाद अर्पित करती हूँ !
यह कार्य मेरे पति श्री दिनेश चन्द्र पाण्डे जी , और मेरे बच्चो के सहयोग के बिना यह किताब का लेखन सम्भव नही हो पाता !
इस संकलन के माध्यम से मैं यह संदेश देना चाहती हूँ , कि स्नेह सौहार्द और एकता के भावों से ओत प्रोत इस परम्परागत पावन होली के त्योहार की गरिमा को बनाए रखते हुऐ विलुप्त हो रही अपनी पौराणिक परम्पराओं की ज्योति जलती रहे ... जात पात ऊंच नीच के भेद भाव से उपर उठ कर मानवता का सँदेश दे सके , समस्त पाठकों के आशीर्वाद की भी आकांक्षी हूँ ....

 

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