Author Topic: Our Culture & Tradition - हमारे रीति-रिवाज एवं संस्कृति  (Read 35781 times)

पंकज सिंह महर

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उपनयन संस्कार

इसे व्रतबंध तथा जनेऊ-संस्कार भी कहते हैं । बालक इसी दिन से द्विज कहलाता है । व्रत ग्रहण करने तथा व्रत से बंध होने के कारण यह संस्कार व्रतबंध कहा जाता है । गुरु के समीप उपनीत होने से उपनयन संस्कार कहा जाता है । चुटिया, जनेऊ धारण करने तथा संध्या करने का अधिकारी इसी दिन से प्रत्येक बालक होता है । विद्यारंभ व वेदारंभ का यह समझा जाता है ।

कुमाऊँ में यह संस्कार बड़े आडम्बर से दो दिन होता है । पहले दिन ग्रहयाग, दूसरे दिन उपनयन अनेकानेक कर्म किये जाते हैं । ८ से २५ वर्ष को कर्म दो दिन में किये जाते हैं । बहुत धन इस काम में खर्च होता है । कहीं-कहीं 'गोठ' में, मकान के निचले खंड में, कहीं यज्ञशाला में यह संस्कार किया जाता है । इसी दिन गुरु-दीक्षा भी दी जाती है । दो-चार वेद-मंत्र पढ़ाये जाते हैं । काशी पढ़ने को भेजा जाता है, फिर लौटा लिया जाता है । प्राचीन पद्धति की एक नकलमात्र की जाती है ।

पंकज सिंह महर

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विवाह संस्कार

ज्योतिष के अनुसार जन्म-कुन्डली मिलाकर तथा लग्न ठहराकर विवाह होते हैं । माता-पिता विवाह करते हैं । अपने वर्ण तथा भिन्न गोत्र-कुल की कन्या से विवाह होता है । मातृकुल में, असपिंड पितृकुल में, असगोत्र कन्या से विवाह होता है । विवाहोक्त महीनों और शुक्र तथा गुरु के उदय में उत्तम मुहूर्त देखकर ज्योतिषशास्र पंडित विवाह का लग्न स्थिर करता है । कुछ दिन पूर्व गणपति-पूजन करके तिल और गुड़ मिश्रित तथा चावल की पिट्ठी के लड्डू (लाड़ू), महालड्डू (समाधिये) एवं सुआले (एक प्रकार की सुखाई हुई पूरी) बनाये जाते हैं ।

विवाह के दिन वर तथा कन्या-पक्ष में पूजनादि होता है । कन्या के माता-पिता व्रती रहते हैं । प्रात: सायंकाल के समय बरात चढ़ती है । कभी-कभी सुबह भी आती है । ब्राह्मणों तथा वैश्यों में ध्वजा (निशान) बरात में नहीं जाते । क्षत्रियों में जाते हैं । दरवाजे में बाग्दान के संकल्प के बाद वर पक्ष को जनवासे में ठहराया जाता है । वर को कच्चा (दाल, चावल आदि) तथा बरातियों को पक्का भोजन कराया जाता है ।

पुन: विवाह का मुहूर्त जब आता है । वर, आचार्यादि वर-पक्षी तथा कन्या-पक्षी विवाहशाला में अंतपंट (पर्दा) डालकर बैठते हैं । स्रियाँ मांगलिक गीत गाती हैं । शाखोच्चारादि के पश्चात् कन्यादान संकल्प होता है , और देवता तथा ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेकर विवाह-संबंध स्थिर होता है । तत्पश्चात् शय्यादान के पश्चात् सप्तपदी मांगलिक हवन लाजा होम होता है । छोटी-मोटी पूजाऐं और भी होती है । विवाह की विधि पूरी करके प्रात:काल जलपान, भोजनादि करके, वर-वधु और बरातियों को तिलक करके बिदा कर दिया जाता है । वर-पक्ष के लोग बरातियों को दावत देकर तथा तिलक लगाकर बिदा करते हैं । चतुर्थ-रात्रि में होता है । पुन:१६ दिन के भीतर अथवा विषम वर्षों में द्विरागमन की रीति की जाती है ।

साधारणत: विवाह इसी प्रकार होता है । किंतु इनके अलावा अन्य वर्गों में और भी दस्तुर हैं, जिनका सूक्ष्म विवरण अन्यत्र जातिखंड में आवेगा ।

पंकज सिंह महर

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मृतक कर्म की रीति
« Reply #22 on: April 24, 2008, 02:58:48 PM »
      वृद्धावस्था प्राप्त हो जाने पर पुत्रवान कुटुम्बी, आस्तिक धनी काशीवास कर लेते थे, अथवा अन्यत्र कहीं गंगा-तट पर निवास करके ईश्वर-भजन करते थै । पर अब लोग पुत्रादि के समीप रहना आवश्यक समझते हैं । मृत्यु के समय गीता और श्रीमद्भागवतादि का पाठ सुनना, रामनाम का जप करना स्वर्गदायक समझा जाता है । गोदान और दश-दान कराके, होश रहते-रहते मृतक को चारपाई से उठाकर जमीन में लिटा दिया जाता है । प्राण रहते गंगा जल ड़ाला जाता है । प्राण निकल जाने पर मुख-नेत्र-छिद्रादि में सुवर्ण के कण ड़ाले जाते हैं । फिर स्नान कराकर चंदन व यज्ञोपवीत पहनाये जाते हैं । शहर व गाँव के मित्र, बांधव तथा पड़ोसी उसे श्मशान ले जाने के लिए मृतक के घर पर एकत्र होते हैं । मृतक के ज्येष्ठ पुत्र, उसके अभाव में कनिष्ठ पुत्र, भाई-भतीजे या बांधव को मृतक का दाह तथा अन्य संस्कार करने पड़ते हैं । जौ के आटे से पिंडदान करना होता है । नूतन वस्र के गिलाफ (खोल) में प्रेत को रखते हैं, तब रथी में वस्र बिछाकर उस प्रेस को रख ऊपर से शाल, दुशाले या अन्य वस्र ड़ाले जाते हैं । मार्ग में पुन: पिंड़दान होता है । घाट पर पहुँचकर प्रेत को स्नान कराकर चिता में रखते हैं । श्मशान-घाट ज्यादातर दो नदियों के संगम पर होते हैं । पुत्रादि कर्मकर्ता अग्नि देते हैं । कपाल-क्रिया करके उसी समय भ कर देते हैं । देश की तरह तीसरे दिन चिता नहीं बुझाते । उसी दिन बुझाकर जल से शुद्ध कर देते हैं । कपूतविशेष (कपोत यानि कबूतक के तुल्य सिर पर बाँधना होता है । इस 'छोपा' कहते हैं । मुर्दा फूँकनेवाले सब लोगों को स्नान करना पड़ता है । पहले कपड़े भी धोते थे । अब शहर में कपड़े कोई नहीं धोता । हाँ, देहातों में कोई धोते हैं । गोसूत्र के छींटे देकर सबकी शुद्धि होती है । देहात में बारहवें दिन मुर्दा फूँकनेवालों का 'कठोतार' के नाम से भोजन कराया जाता या सीधा दिया जाता है । नगर में उसी समय मिठाई, चाय या फल खिला देते हैं । कर्मकर्ता को आगे करके घर को लौटते हैं । मार्ग में एक काँटेदार शाखा को पत्थर से दबाकर सब लोग उस पर पैर रखते हैं । श्मशान से लौटकर अग्नि छूते हैं, खटाई खाते हैं ।

कर्मकर्ता को एक बार हविष्यान्न भोजन करके ब्रह्मणचर्य-पूर्वक रहना पड़ता है । पहले, तीसरे, पाँचवे, सातवें या नवें दिन से दस दिन तक प्रेत को अंजलि दी जाती है, तथा श्राद्ध होता है ।

मकान के एक कमरे में लीप-पोतकर गोबर की बाढ़ लगाकर दीपक जला देते हैं । कर्मकर्ता को उसमें रहना होता है । वह किसी को छू नहीं सकता । जलाशाय के समीप नित्य स्नान करके तिलाञ्जलि के बाद पिंडदान करके छिद्रयुक्त मिट्टी की हाँड़ी को पेड़ में बाँध देते हैं, उसमें जल व दूध मिलाकर एक दंतधावन (दतौन) रख दिया जाता है और एक मंत्र पढ़ा जाता है, जिसका आशय इस प्रकार है - "शंख-चक्र गदा-धारी नारायण प्रेतके मेक्ष देवें । आकाश में वायुभूत निराश्रय जो प्रेत है, यह जल मिश्रित दूध उसे प्राप्त होवे । चिता की अग्नि से भ किया हुआ, बांधवों से परिव्यक्त जो प्रेत है, उसे सुख-शान्ति मिले, प्रेतत्व से मुक्त होकर वह उत्तम लोक प्राप्त करे ।" सात पुश्तके भीतर के बांधव-वर्गों को क्षौर और मुंडन करके अञ्जलि देनी होती है । जिनके माता-पिता होते हैं, वे बांधव मुंडन नहीं करते, हजामत बनवाते हैं । दसवें दिन कुटुम्बी बांधव सबको घर की लीपा-पोती व शुद्धि करके सब वस्र धोने तथा बिस्तर सुखाने पड़ते हैं । तब घाट में स्नान व अञ्जलिदान करने जाना पड़ता है । १० वें दिन प्रेत कर्म करने वाला हाँड़ी को फोड़ दंड व चूल्हे को भी तोड़ देता है, तथा दीपक को जलाशय में रख देता है । इस प्रकार दस दिन का क्रिया-कर्म पूर्ण होता है । कुछ लोग दस दिन तक नित्य दिन में गरुड़पुराण सुनते हैं ।

ग्यारहवें दिन का कर्म एकादशाह तथा बारहवें दिन का द्वादशाह कर्म कहलाता है । ग्यारहवें दिन दूसरे घाट में जाकर स्नान करके मृतशय्या पुन: नूतन शय्यादान की विधि पूर्ण करके वृषोत्सर्ग होता है, यानि एक बैल के चूतड़ को दाग देते हैं । बैल न हुआ, तो आटे गा बैल बनाते हैं । ३६५ दिन जलाये जाते हैं । ३६५ घड़े पानी से भरकर रखे जाते हैं । पश्चात् मासिक श्राद्ध तथा आद्य श्राद्ध का विधान है ।

द्वादशाह के दिन स्नान करके सपिंडी श्राद्ध किया जाता है । इससे प्रेत-मंडल से प्रेत का हटकर पितृमंडल में पितृगणों के साथ मिलकर प्रेत का बसु-स्वरुप होना माना जाता है । इसके न होने से प्रेत का निकृष्ट योनि से जीव नहीं छूट सकता, ऐसा विश्वास बहुसंख्यक हिन्दुओं का है । इसके बाद पीपल-वृक्ष की पूजा, वहाँ जल चढ़ाना, फिर हवन, गोदान या तिल पात्र-दान करना होता है । इसके अनन्तर शुक शान्ति तेरहवीं का कर्म ब्रह्मभोजनादि इसी दिन कुमाऊँ में करते हैं । देश में यह तेरहवीं को होता है ।

श्राद्ध - प्रतिमास मृत्यु-तिथि पर मृतक का मासिक श्राद्ध किया जाता है । शुभ कर्म करने के पूर्व मासिक श्राद्ध एकदम कर दिए जाते हैं, जिन्हें "मासिक चुकाना" कहते हैं । साल भर तक ब्रह्मचर्य पूर्वक-स्वयंपाकी रहकर वार्षिक नियम मृतक के पुत्र को करने होते हैं । बहुत सी चीजों को न खाने व न बरतने का आदेश है । साल भर में जो पहला श्राद्ध होता है, उसे 'वर्षा' कहते हैं ।

प्रतिवर्ष मृत्यु-तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है । आश्विन कृष्ण पक्ष में प्रतिवर्ष पार्वण श्राद्ध किया जाता है । काशी, प्रयाग, हरिद्वार आदि तीर्थों में तीर्थ-श्राद्ध किया जाता है । तथा गयाधाम में गया-श्राद्ध करने की विधि है । गया में मृतक-श्राद्ध करने के बाद श्राद्ध न भी करे, तो कोई हर्ज नहीं माना जाता । प्रत्येक संस्कार तथा शुभ कर्मों में आभ्युदयिक "नान्दी श्राद्ध" करना होता है । देव-पूजन के साथ पितृ-पूजन भी होना चाहिए । कर्मेष्ठी लोग नित्य तपंण, कोई-कोई नित्य श्राद्ध भी करते हैं । हर अमावस्या को भी तपंण करने की रीति है । घर का बड़ा ही प्राय: इन कामों को करता है ।

शिल्पकार हरिजन जो सनातनधर्मी हैं, वे अमंत्रक क्रिया-कर्म तथा मुंडन करते हैं, और श्राद्ध ज्यादातर आश्विन कृष्ण अमावस्या को करते है । जमाई या भांजे ही उनके पुरोहित होते हैं ।

हलिया

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वर्षो पुरानी परंपरा को संजोए है गाडूघड़ी तेलकलश : Apr 28, 11:26 am

सिमली (चमोली)। करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक श्रीबदरीनाथ धाम के कपाट नौ मई को खुलने जा रहे हैं। भगवान बदरीविशाल के कपाट खुलने से हजारों वर्ष पुरानी परंपराओं का निर्वहन आज भी देखने को मिल रहा है इन्हीं परंपराओं में से गाडूघडी तेलकलश का अपना अलग ही महत्व है।

आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा ज्योतिर्मठ की स्थापना के बाद भगवान बदरीनारायण की पूजा वहां के आचार्य ही करते थे ज्योतिर्मठ के पहले शंकराचार्य त्रोटकाचार्य हुए, उनके पश्चात लगभग 11वीं सदी तक यहां शंकराचार्य नियुक्त होते रहे तब से 15वीं सदी तक के शंकराचार्यो का कोई उल्लेख इतिहास में नही मिलता है पुन: 15 सदी से संवत 1833 तक दंडीस्वामियों को यहां का शंकराचार्य नियुक्त किया जाता रहा है। इसके बाद यहां कोई दंडीस्वामी न रहने से बदरीनाथ की पूजा के लिए गढ़वाल नरेश द्वारा आचार्यो के सहायक जो कि केरल प्रान्त के नंबूदरी ब्राहमण होते थे करने लगे, उन्हें आज रावल के नाम से जाना जाता है। नंबूदरी ब्राहमण के साथ बदरीनाथ की पूजा व्यवस्था हेतु डिमरी पुजारियों को भी गढ़वाल नरेश द्वारा जिम्मेदारियां सौंपी गई थी भोग व्यवस्था, लक्ष्मी पूजा, लक्ष्मी अटका, गरूड़, चरणामृत, नारद शिला तथा बदरीविशाल की पूजा रावल के साथ आज भी डिमरी पुजारी करते आ रहे हैं। श्रीबदरीनाथ धाम से डिमरी पुजारियों का गहरा संबध होने से आज भी बदरीनाथ धाम में विभिन्न पूजास्थलों, वृत्तियों में डिमरी पुजारियों का अधिकार कायम है। इसी परिप्रेक्ष्य में श्रीबदरीनाथ गाडूघडी तेलकलश को डिमरी पुजारी पिछले कई वर्षो से शोभायात्रा का भव्य रूप देकर मनाते आ रहे हैं। इन तीन वर्षो से पूर्व गाडूघडी में तिलों के तेल पिरोने, बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने व बंद होने की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है। गाडूघडी में भरा तिलों के तेल का उपयोग भगवान बदरीविशाल की अभिषेक पूजा और मूर्ति पर लेप किए जाने के कारण गाडूघड़ी के प्रति धर्माचार्यो की आस्था दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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This is the photo of Jagar Pooja. This is one of the part of our culture.

जागर



हेम पन्त

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बच्चे द्वारा नये वस्त्र पहनने पर बुजुर्गों के चरण स्पर्श करने का रिवाज है.. बुजुर्ग भी बच्चों को "बैग फाडे, बैग पाये" कहकर आशीर्वाद देते हैं.

"बैग फाडे, बैग पाये" का तात्पर्य यह है कि नये-2 कपडे पहनने के मौके आते रहें.

खीमसिंह रावत

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sewa lagane ke liye khas kar salt area me es prakar raha hai:-
Nath, Giri, Puri ko Barhaman, Thakur aur Harijan pahale sewa lagate hai/

Natho ke liye= Adesh,
Giri ke liye= Namo Narayan,
Thakuro aur Brahmano ke liye Harijan Namsate kah kar sewa lagate hai/
Brahmano ko thakur pailagun kahkar sewa lagate hai/
Brahman Brahmano ko Namskar kahkar sewa lagate hai/
Thakuro me Rautela, Jamanal,Manral, aadi kuchh badi jatiyo ko jaudeu kahkar sewa lagate hai/

ye sab bite jamane ki bate ho gayi hai/ ab sabhi me Pailagun, Namste,Namskar ka chalan ho gaya hai/

khim

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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दोस्तों,

जैसा की आप जानते है भारतवर्ष एक विभंन्ताओ का देश है ! यहाँ अनेकता मे फिर भी एकता है ! हर राज्य की लगभग अलग भाषा एव संस्कृति है ! उसी प्रकार हमारा प्रदेश उत्तराखंड जो की दुसरे नाम " देव भूमि" से भी जाना जाता है ! वह स्थान जहाँ देवी देवता निवास करते है !

हम यहाँ पर उत्तराखंड के संस्कृति एव रीति रिवाज और आधुनिकता के दौर में विलुप्त हुए रिवाजो के बारे मे भी चर्चा करंगे ! आशा है आप भी अपना अनुभव यहाँ बाटेंगे !

एम् एस मेहता   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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पहले मे एक बहुत पुरानी प्रथा के बारे मे आपको बताना चाहूँगा !  वह है पधान चारी प्रथा !

प्रधानचारी प्रथा
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आप ने गावो मे लोगो को सुना होगा " पाधन राठ" मतलब पधान लोगो के community से!  अंग्रेजो के समय मे हर गाव मे जो मुखिया होता था उसे पधान कहते थे ! उसका काम था की जब भी अंग्रेज लोगो किसी गाव मे जाते थे तो वह उनके visit  की पूरी तैयारी करवाता था और लोगो को आवाज लगा कर कहता था कि आज ये साहब आ रहे है, सब दूध दही लाना !!   

इस प्रकार से गाव के लोग भी पधान को कुछ जमीन भी देते थे जो पधान चारी जमीन कहलाती है ! पधान के मरने में बाद उसका लड़का पधान चारी का उतराधिकारी होता था !

भारत देश के आजाद होने के बाद भी कुछ समय तक यह प्रथा रही बाद मे धीरे -२ यह विलुप्त हो गयी !  तो गाव मे पुराने पधान थे उनकी यह कहानी थी !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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भिटोली ( भिटोला) प्रथा

यह प्रथा अभी है ! खासतौर से उत्तराखंड के कुमाऊ मंडल मे ! यह प्रथा उत्तराखंड में महिलावो से संभंधित है ! पहले समय मे माता - पिता चैत के महीने मे अपनी बेटी कि ख़बर लेने के लिए उसके सुसराल जाते थे और उसे भेट मे समान एव पकवान भी देते थे !  वहां बेटिया भी ससुराल मे चैत के महीने मे आपने माँ बाप के आने कि इन्तेजार मे रहते है !

जो कि अभी सुचारूरूप चलती है !

 

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