Author Topic: Our Culture & Tradition - हमारे रीति-रिवाज एवं संस्कृति  (Read 35970 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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ढोल सागर समारोह में उत्तराखंड संस्कृति की बिखेरी छटा
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डॉ.अम्बेडकर सांस्कृतिक कला मंच के तत्वावधान में रिखणीखाल प्रखंड के अंतर्गत कोटडीसैंण में आयोजित ढोल सागर समारोह में उत्तराखंड की पौराणिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया गया।

समारोह का शुभारंभ बतौर मुख्य अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता जगमोहन सिंह नेगी ने किया। उन्होंने देवभूमि की पौराणिक संस्कृति को विलुप्त होने से बचाने के लिए इसके प्रचार-प्रसार पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि प्राचीन पंरपराओं व संस्कृति के संरक्षण व संव‌र्द्धन के साथ नई पीढ़ी को इससे अवगत कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल से ही दूरसंचार के मजबूत माध्यमों के रूप में ढोल सागर के शब्दों का प्रयोग किया जाता रहा है।

 शादी के मौकों पर बारात के आने जाने व कितना समय बारात के चलने में इन सबका कोड ढोल सागर में है। उन्होंने ब्लॉक स्तर पर ढोल सागर का प्रचार-प्रसार करने व इसके लिए प्रशिक्षण केंद्र खोलने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि राज्य निर्माण आंदोलन में ढोल सागर के वाद्य यंत्रों की अहम भूमिका रही है। उन्होंने प्रदेश सरकार से वाद्य यंत्रकारों को भी राज्य आंदोलनकारी घोषित करने की मांग उठाई।

source dainik jagran

Devbhoomi,Uttarakhand

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खास होता है चतुर्थी, नवमी और अमास्या का श्राद्ध
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सनातनी संस्कृति में सालभर में एक बार पड़ने वाले पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का तर्पण व पिंडदान किया जाता है। यह पितरों के प्रति श्राद्ध व कृतज्ञता ज्ञापित करने का अवसर होता है। यूं तो पितृपक्ष के सोलहों दिन पितरों के प्रति तर्पण आदि होते हैं, लेकिन इनमें कुछ दिन खास होते हैं।

आश्रि्वन मास के कृष्ण पक्ष में पितृपक्ष होता है। इसमें भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि भी शामिल होती है। पितृपक्ष के सभी सोलह दिनों में श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों अनुसार जिस तिथि को पूर्वज की मृत्यु होती है, उसी तिथि को उसका श्राद्ध किया जाता है।

पितृपक्ष की सबसे खास तिथि नवमी होती है। मान्यता है कि नवमी को श्राद्ध करने से मातृ ऋण कम होता है। हालांकि शास्त्र यह भी बताते हैं कि जीवन में सभी ऋणों से मुक्ति मिल जाए, लेकिन मातृ ऋण से मुक्ति नहीं मिल पाती है। इसी प्रकार पितृपक्ष में चतुर्दशी की तिथि भी खास होती है।

शास्त्रीय मान्यता है कि अकाल मौत के शिकार व्यक्तियों के निमित चतुर्दशी का श्राद्ध किया जाना चाहिए। अमावस्या को ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित श्राद्ध किए जाने का विधान है। अमावस्या की तिथि के साथ ही पितृपक्ष संपन्न हो जाते हैं और पितर धरती से पितृलोक वापसी करते हैं।

Dainik jagran

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मंच पर जीवंत हुई विभिन्न प्रांतों की लोक संस्कृति
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जाका, अल्मोड़ा: 42वीं वाहिनी एसएसबी के सभागार में देश की बहुरंगी संस्कृतियां जीवंत हो उठीं। मंच पर कलाकारों की दमदार प्रस्तुति पर जवान ही नहीं प्रशिक्षु भी खूब थिरके। कार्यक्रम का मकसद कड़े प्रशिक्षण के बीच जवानों का मनोरंजन व उन्हें विविध संस्कृतियों व लोक रंग से रूबरू कराना था।

एसएसबी सभागार में शनिवार को रंगारंग कार्यक्रमों का शुभारंभ सेनानायक जीतेंद्र जोशी ने दीप जलाकर किया। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए देश के 18 राज्यों की लोक परंपरा व संस्कृति से जवानों व प्रशिक्षुओं को जानने का अवसर मिलेगा। सेनानायक ने कहा कि ऐसे आयोजन आगे भी किए जाएंगे, ताकि प्रशिक्षु जवान मानसिक दबाव से उबर सकें और मनोबल भी बढ़ेगा। इस दौरान कलाकारों ने लोक गीत व नृत्य से समां बांध दिया। श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम में एसएसबी के अधिकारी, कर्मचारी व तमाम जवान मौजूद थे।


Source dainik jagran

Pawan Pathak

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अपणि बात
आमा की बात
‘आछत फरकैण रस्म व मंगल गीतों का है महत्व

कुमाऊं की वैवाहिक परंपराओं में अक्षत(चावल) के द्वारा स्वागत अथवा पूजन का भी अपना एक विशेष महत्व है। इसे कुमाऊं में अनेक स्थानों पर कुमाऊंनी भाषा में (आछत फरकैण) अथवा अक्षत के द्वारा मंगलमयी जीवन के लिए भी कामना की जाती है। विवाह समारोह में आछत फरकैण एक महत्वपूर्ण रस्म है। इसके लिए वर और वधू पक्ष के परिवार की महिलाओं को विशेष रूप से इसके लिए आमंत्रित किया जाता है। वे पारंपरिक परिधानों रंगवाली पिछौड़ा व आभूषण पहनकर इस कार्य को करती हैं। दूल्हे के घर में बारात प्रस्थान के समय भी इन महिलाओं द्वारा दूल्हे का अक्षतों से स्वागत किया जाता है। दूल्हे के घर में बरात पहुंचने पर वर पक्ष की महिलाएं जो आछत फरकैण के लिए आमंत्रित होती हैं। वे दूल्हा और दुल्हन का घर में प्रवेश से पहले आंगन में यह परंपरा अदा की जाती है। अक्षत को शुद्ध, पवित्रता और सच्चाई का भी प्रतीक माना जाता है। शादियों से पूर्व में मंगल गीत गाने के लिए गांव की विशेष दो महिलाएं जो गितार कहलाती थी, विवाह में मंगल गीत गाती थीं। पर अब यह परंपरा भी आधुनिकता की भेंट चढ़ती जा रही है। मंगलगीत में देवताओं का आह्वान और मंगलमयी जीवन की कामना की जाती है।[/color][/size] -भुवन बिष्ट, मौना रानीखेत, अल्मोड़ा

Source-  http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150629a_005115005&ileft=-5&itop=82&zoomRatio=130&AN=20150629a_005115005

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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पहाड़ की संस्कृति को
पहचान की तलाश
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के लोगों की राजधानी में खासी तादाद है। कुमाऊंनी लोगों की अपनी अनूठी लोक संस्कृति और परंपराएं हैं, जिन्हें वह दिल्ली जैसे शहर में भी सहेजकर रखे हुए हैं। साथ ही यह समाज बरसों से अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिशों में भी जुटा हुआ है। बता रहे हैं विवेक शुक्ला :
लोकगायक मोहन उप्रेती
दिल्ली-एनसीआर में कहां-कहां : दिल्ली में पहली पीढ़ी के कुमाऊंनी सरकारी नौकरियों में भी खूब जाते रहे। इसलिए ये आरके पुरम, आराम बाग, मोती नगर, नेताजी नगर, सरोजनी नगर, दिल्ली कैंट जैसी सरकारी कॉलोनियों में भी काफी संख्या में रहते रहे। इन्होंने इन कई कॉलोनियों में अपनी रामलीलाएं भी चालू कीं। दिल्ली कैंट में शायद सबसे पहले कुमाऊंनी रामलीला की शुरुआत हुई 60 के दशक में। बीते बीसेक सालों से कुमाऊंनी सोनिया विहार, बुराड़ी, पुष्प विहार, वेस्ट विनोद नगर, मौजपुर, घोंडा, नोएडा के राम विहार, गाजियाबाद, फरीदाबाद वगैरह में भी खासी संख्या में बस गए। मुंबईकर बनने से पहले ऐड गुरु प्रसून जोशी भी नोएडा में ही रहते थे। नौकरी दिल्ली के रानी झांसी इलाके में करते थे।
कौन हैं कुमाऊंनी
दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले कुमाऊंनी मुख्य रूप से राजपूत या ब्राह्मण हैं। रौतेला, राणा, चौहान, जीना राजपूतों के कुछ खास सरनेम हैं। उधर जोशी, पंत, पांडे, त्रिपाठी, ध्यानी ब्राह्मणों के सरनेम हैं। ध्यानी गढ़वाल में भी होते हैं। प्रेम मटियानी ने बताया कि उत्तराखंड के राजपूत मूल रूप से राजस्थान से संबंध रखते हैं। जबकि ब्राह्मण महाराष्ट्र से। ये सब उत्तराखंड में आकर बसे थे।
कुमाऊंनी सेलिब्रेटीज
उन्मुक्त चंद
क्रिकेटर
हिमांशु जोशी
कला
डॉ. पुष्पेश पंत
शिक्षा
कुलानंद भारती
राजनीति
प्रेम मटियानी
संगीत और रंगमंच
ईस्ट दिल्ली के स्वास्थ्य विहार का शादी वाला एक घर। आज वधू को मेहंदी लगनी है। सारे घर में गहमा-गहमी है। बैकग्राउंड में बज रहा है- 'बेडु पाको बारों मासा, ओ नरेण काफल पाको चैता मेरी छैला...'। ये कुमाऊं का सदाबहार लोकगीत है। 40 पार कर चुके लोग इसे गुनगुना भी रहे हैं। यानी अपनी जड़ों से दूर जाने के बाद भी कुछ लोकगीत और परंपराएं कुमाऊंनी छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, दिल्ली-एनसीआर में बसने पर भी।
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में शामिल हैं: अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल वगैरह। उत्तराखंड़ को गढ़वाल और कुमाऊं में बांटा जाता है। माना जाता है कि दिल्ली-एनसीआर में कुमाऊंनी आने शुरू हुए गोविंद बल्लभ पंत के देश का गृह मंत्री बनने के बाद। ये बातें हैं 50 के दशक की। उससे पहले कुमाऊंनी पंत जी के साथ लखनऊ में जाते रहे, बसते रहे। वरिष्ठ लेखक आशुतोष उप्रेती बताते हैं कि पंत जी के बाद 70 के दशक में बीडी भट्ट नाम के एक शिक्षा निदेशक दिल्ली आए। वे कुमाऊंनी थे। उन्होंने कुमाऊं के बड़ी संख्या में टीचरों को दिल्ली के सरकारी स्कूलों में नौकरी दी। तब नौकरी के लिए परीक्षाएं और इंटरव्यू आजकल की तरह से होते नहीं थे। नारायण दत तिवारी 1980 में इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री बनने के बाद दिल्ली आए। पर उनके साथ यहां कुमाऊंनी नहीं आए।
नाटकों और रंगमंच में जीवंत हुई संस्कृति : राजधानी में कुमाऊंनियों को उनकी संस्कृति से जोड़ने की बड़ी और सार्थक पहले मोहन उप्रेती ने की। वे सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और लोक संगीत के मर्मज्ञ थे। उनकी कुमाऊंनी संस्कृति, लोकगाथाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका रही। वे 1963 में दिल्ली आ गए थे। इंडियन ओशन बैंड से जुड़े हुए हिमांशु जोशी ने बताया कि मोहन उप्रेती ने 1968 में दिल्ली में पर्वतीय क्षेत्र के लोक कलाकारों के सहयोग से पर्वतीय कला केंद्र की स्थापना की। इसके तहत कुमाऊंनी में अनेक नाटक खेले जाते रहे। राजुला-मालूशाही, रसिक-रमौल, जीतू-बगड़वाल, रामी-बौराणी, अजुवा-बफौल जैसी लोक कथाओं पर कुमाऊंनी में नाटक खेले गए। इनके मंचन कमानी ऑडिटोरियम में होते थे। प्रसिद्ध गीतकार प्रसून जोशी भी इन नाटकों का हिस्सा रहे।
कहते हैं कि 90 के दशक तक कुमाऊंनी नाटकों को देखने के लिए ऑडिटोरियम खचाखच भरे होते थे। दिल्ली के दूर-दूर के इलाकों से कुमाऊंनी अपनी बोली में खेले जाने वाले नाटकों को देखने के लिए आते थे। इन सभी नाटकों का निर्देशन मोहन उप्रेती ही करते थे। इनमें विश्व मोहन बड़ोला, विनोद नागपाल और उर्मिला नागर जैसे रंगमंच के मंजे हुए कलाकार भी शामिल होते थे। विनोद नागपाल मूल रूप से पंजाबी होने के बाद भी कुमाऊंनी नाटकों से जुड़े थे। मोहन उप्रेती की 1992 में अकाल मौत के कारण दिल्ली में कुमाऊंनी रंगमंच को झटका लगा। हालांकि पवर्तीय कला केंद्र अब भी सक्रिय है। मोहन उप्रेती ने ही दिल्ली में कुमाउंनी रामलीला की नींव भी रखी थी। वहां की रामलीला संवाद की बजाय ओपेरा अंदाज में होती है। यानी गायन पर आधारित होती है। और अगर बात पर्वतीय कला केंद्र से हटकर करें, तो राजधानी के साउथ एक्सटेंशन में कुमाऊंनी भवन भी है। यहां भी कुमाऊंनी समाज आपस में मेलजोल करता है। बुराड़ी में उत्तरायणी मेला भी बरसों से आयोजित हो रहा है।
सांस्कृतिक दुविधा है यहां : भारत सरकार के सॉन्ग एंड ड्रामा डिविजन के पूर्व डायरेक्टर प्रेम मटियानी कहते हैं कि मैं कुमाऊंनी लोगों से बात करने की कोशिश करता हूं अपनी बोली में। लेकिन वे हिंदी में जवाब देने लगते हैं। मुझे लगता है कि उन्हें अपनी बोली में संवाद करना नापसंद है। वे खुद को उत्तराखंड का बताने से भी बचते हैं। वे शायद इस तरह से अपने को ‘छोटू की दुनिया’ से निकाल लेना चाहते हैं। वे खुद को उत्तराखंड या कुमाऊं का बताना नहीं चाहते और ये पूरी तरह से दिल्ली-एनसीआर वाला भी नहीं बन पाते। ग्रेटर नोएडा में रहने वाले उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी और महेश भट्ट की फिल्म ‘साइलेंट हीरोज’ में कर्नल थापा की भूमिका में अपनी पहचान बना चुके निर्मल पंत कहते हैं कि उत्तराखंड और कुमाऊं के लोगो में बिहारियों के विपरीत अपनी सांस्कृतिक पहनचान को बनाए रखने को लेकर किसी तरह का आग्रह दिखाई नहीं देता।
पंडिताई का भी पेशा : दिल्ली-एनसीआर के कई मंदिरों में कुमाऊंनी ब्राह्मण पंडिताई कर रहे हैं। फरीदाबाद के सेक्टर-14 के मंदिर के मुख्य पुजारी सुनील जोशी ने बताया कि पंडिताई उनका पुश्तैनी काम है। वे करीब 15 वर्षों से फरीदाबाद में पुरोहित का काम कर रहे हैं। वे हर महीने 30-35 हजार रुपये कमा लेते हैं। फरीदाबाद के अजरौदा में उन्होंने अपना घर भी बना लिया है। वैसे दिल्ली-एनसीआर में बसे कुमाऊंनी बिजनेस को छोड़कर सभी तरह के काम कर रहे हैं। लगता है कि बिजनेस करने से अभी इन्हें परहेज है। ये मेहनत-मशक्कत करके अपने लिए जगह बना चुके हैं या बना रहे हैं।
हालांकि दिल्ली-एनसीआर में कुमाऊंनी बिरादरी खासी तादाद में है, पर इनके खास व्यंजनों के बारे में गैर-पहाड़ियों को कोई जानकारी नहीं है। आशुतोष उप्रेती मानते हैं कि उत्तराखंड सरकार के सहयोग से दिल्ली-एनसीआर में उत्तराखंड फूड फेस्टिवल हर साल आयोजित होना चाहिए। इसमें पहाड़ी व्यंजन जैसे भट की चुड़काणी, मड़ुवे की रोटी, कौड़ी झुंगर का भात परोसा जाए, ताकि हमारे व्यंजनों का आनंद गैर-पहाड़ी भी लें। ये बात दीगर
है कि अब तो इनके घरों में भी
ठेठ कुमाऊंनी व्यंजन कम ही पकाए जाते हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bhupesh Pandey
 
कुमाऊँ संस्कृति के गीतों के क्रम को आगे बढ़ाते हुवे मैं आज आप को विवाह गीतों से आवगत करता हूँ , जो कि हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं ..
ज्ञात रहे ये बन्ना बन्नी नहीं हैं ये तो हमारी बुजुर्ग महिलाओं के श्री कण्ठ से निकलने वाली सुर सरिता है , जो वातावरण को बहुत ही अलौकिक व मन्त्रमुग्द्ध कर देने वाली होती है , ध्यान से इन स्वर लहरियों को सुना जाये तो ये वातावरण को प्यार , स्नेह , वात्सल्य , करुणा , मर्म , सैंन्दर्य ,त्याग , श्रंगार , हास्य व आशिर्वादों से परिपूर्ण बहुत ही आन्नदित कर हर्षोउल्लास को चरम में पहुँचाने वाली होती हैं..
१- कन्या की बारात आते समय का गीत
क)- कालो बादल उनीं आयो , मेघा बरसि आयो..
रिमझिम बरसेगो मेघ , समधि सजना आई पहुँचे जी.....
ख)- हरे हरे बाँस कटाओ , मेरे बाबुल उंची छवे चौपाल ए...
कित लख आए हस्ति रे घोड़ा , कित लख आई बरात ए...
२- कन्यादान में बैठने का गीत
अम्बन खम्बन दी़यो जगायो , वो तो झकमक जोत उजालो ए..
वो तो सुन्दर जोत उजालो जी , लाल ही कम्बल छपक बिछौना....
३- कन्यादान के समय का गीत
चन्दन चौकी बैठी लाड़ोति , केश दिये छिटकाय ए..
लाड़ो के दादाज्यू लाड़ो के ताऊज्यू यों उठी बोले...
४- गड़वे की धार देते समय का गीत
हाथ गडुंवा लेके मायली ठाढ़ी , वो तो बबज्यू कुश की डाली जी..
थर थर कम्पे बबज्यू हमारे वो तो कम्पे कुश की डाली जी.....
५- कन्यादान में अँगूठा पकड़ते समय
छोड़ो छोड़ो दुलहा हमरि अँगुठिया , हमरो अंगूठा अनमोल ए...
अब कैसे छोडूं गोरी तुमरी अंगुठिया , तुमरे दादाज्यू को बोल ए ...
६- कन्यादान के समय बिटमणा गीत
डलिया में सोना नहीं , रूपै नहीं , इतना गुनाह तोको लागो...
समधीज्यू को गोठ बाँधो जी . दुलहा को बाबा को गोठ बाँधोंजी....
७- वर पक्ष से आये वस्त्र कन्या को पहनाते समय
कैसे उपजन लागो सुहाग बिटुला , (२)
मेरे मामा जी के बाग में सुहाग बिटुला , मेरी मामी रानी सींचे भर गगरी...
८- कन्यादान के बाद का गीत
बाबुल खोलो परद बर देखिये , बीरा खोलो परद बर देखिये...
बाबुल हम गोरी बर साँवरो..
९- कन्या विदाई का गीत
क)- परदेसी परभूमी बबज्यू अति डर लागे..
हमन सूं दासी मोलाइये ...
परदेसी परभूमी बबज्यू , अति भूख लागे..
हमन सूं भोज मोलाइये...
ख)- मेरी लाड़ो दुख झन दिया हो..
दस धारी मैंले दूध पिवायो , मेरी धीया दुख झन दिया ए...
और भी बहुत कुछ है लिखने को लेकिन समयाभाव व लेख का विस्तार अत्यधिक होने के कारण यहीं पर रुक रहा हूँ , उम्मीद है आप लोग इसे पसन्द करेंगे व अपने विचार जरूर रखेंगे...

Bhishma Kukreti

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   गढ़वाल में वसंत पंचमी सरस्वती पूजा हेतु नहीं अपितु हरियाळी पूजन और सामूहिक गीत प्रारंभ हेतु प्रचलित थी
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आलेख - भीष्म कुकरेती
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  फेसबुक व अन्य इंटरनेट माध्यमों में हम (मै भी ) वसंत पंचमी को सरस्वती पूजन का पर्याय मानकर के एक दूसरे  को वधाईयें देते रहते हैं।  किन्तु गढ़वाल में वसंत पंचमी में सरस्वती पूजा एक गौण पक्ष रहता था।  हाँ यदा कड़ा कोई बच्चे को पाटी  दिखा देता था बस सरस्वती पूजा यहीं तक सीमित थी (मुझे भी इसी दिन पाटी दिखाई गयी थी ). हमारे सामान्य लोक या लोक साहित्य में कहीं  भी सरस्वती बंदना के कोई प्रतीक सामने नहीं आये हैं कि  हम कह सकें कि वसंत पंचमी का सरस्वती पूजन से सबंध है।
     वास्तव में वसंत पंचमी का वसंती रंग से भी उतना संबंध नहीं है जितना हम इंटरनेट माध्यम में शोर करते हैं।  किसी ने एकाध रुमाल हल्दी के रंग में रंग दिया तो रंग दिया अन्यथा मेरे बचपन में बसंती  रंग व पीले रंग में कोई अंतर् भी नहीं समझा जाता था।
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                     हरियाली याने कृषि और लोहार का  सम्मान
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      वास्तव में गढ़वाल में बसंत पंचमी का अलग महत्व है जो अन्य मैदानी क्षेत्रों में है ही नहीं।
   गढ़वाल में बसंत पंचमी का पहले अर्थ होता था हरियाली लगाना।  इस दिन लोहार अपने अपने ठाकुर के लिए प्रातः काल से पहले जौ को जड़ समेत उखाड़ कर अपने ठाकुर के चौक में रख देते हैं।
    फिर परिवार वाले स्नान आदि कर हरियाली अनुष्ठान शुरू करते हैं
पहले दरवाजे के ऊपरी हिस्से में हल्दी से पिटाई लगाई जाती है और पिठाई जौ के पौधों में भी छिडकी जाती है। पुराने हरियाली को उखाड़ा जाता है
      तीन चार जौ की जड़ों को ताजे गाय के गोबर में रोपा जाता है और फिर उन जौ के पौधों को दरवाजे के दोनों मोहरों  (दरवाजे के  ऊपरी कोने -क्षेत्र ) में चिपकाया जाता है।  इस तरह सभी कमरों पर हरियाली चिपकायी जाती है।  आळों में भी हरियाली चिपकायी जाती है। इसी तरह गौशाला के हर कमरे के मोहरों में भी जौ की हरियाली चिपकायी जाती है।
   इस दिन स्वाळ -पक्वड़  भी बनाये जाते हैं और बांटे जाते हैं लोहार हेतु विशेष  ध्यान रखा जाता है। लोहार को अन्न या धन दिया जाता है। इस दिन गुड़ का मीठा भात याने ख़ुश्का भी बनाया जाता है।
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             गंगा स्नान
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बहुत से लोग गंगा स्नान हेतु छोटे या बड़े संगम पंहुचते थे।
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 कर्ण व नासिका छेदन
वसंत पंचमी के दिन नासिका व कर्ण छेदन को शुभ माना जाता है।   
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  सामूहिक गीत व नृत्य की शुरुवात
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      आज बसंत पंचमी की रात से गाँवों में सामूहिक नृत्य , गीत व लोक नाट्य कार्यकर्म भी शुरू होते थे जो बैशाखी तक चलते रहते थे।
   मुझे एक लोक गीत की पहली पंक्ति याद है जो पहले दिन अवश्य ही गाया जाता था -
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 हर हरियाली जौ की
खुद लगी बौ की।
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     बद्रीनाथ कपाट खुलने  का दिन निश्चितीकरण
बसंत पंचमी के दिन न्य पंचांग भो खोला जाता है और नए वर्ष की कुंडली भी देखि जाती है।
 बसंत पंचमी के दिन बद्रीनाथ कपाट खुलने का दिन भी निश्चित होता है।   
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Copyright @ Bhishma  Kukreti , 2017
हरियाळी , हरियाली , वसंत पंचमी , गढ़वाल में बसंत पंचमी त्यौहार व जौ का धार्मिक महत्व , जौ व बसंत पंचमी का संबंध , Hariyali, Barley, jau, barley and Basant Panchami , Religious Importance of Barley on Basant panchami

       

Bhishma Kukreti

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सीमांत उत्तराखंड में जाड़ संस्कृति व भाषा

The Culture and language of Jad region, Uttarkashi, Uttarakhand 
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Posted By: Girish Lohanion: December 09, 2019
सीमांत उत्तराखंड में जाड़ संस्कृति व भाषा
सौजन्य निलोंग जोडंग  घाटी फेसबुक पेज
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जाड़ गंगा भागीरथी नदी की सबसे बड़ी उपनदी है. ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर भैरोंघाटी में भागीरथी और जाड़ गंगा का संगम होता है. भैरोंघाटी में पच्चीस किलोमीटर भीतर माणा गाड़ माणा दर्रे के पश्चिम में फैले हिमनद से निकलती है. यह निलांग से लगभग 6 किलोमीटर ऊपर जाड़ गंगा से जा मिलती है.
भैरों घाटी से तिब्बत जाने वाले थाग्ला दर्रे तक उच्च पर्वत हिम प्रदेश की पूरी घाटी निलांग नाम से जानी जाती है. निलांग 11310 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, भैरों घाटी से तिब्बत की ओर जाने वाले थाग्ला दर्रे तक की पूरी घाटी इसी नाम से जानी जाती है. यहां के मुख्य गांव निलङ और इससे ऊपर जादोंग है. यहां के निवासियों को जाड़ कहा जाता है. इनका मुख्य व्यवसाय तिब्बत जिसे ‘हूंण देश भी कहा गया, के साथ होता रहा . जाड़ व्यापारी अनाज, देशी कपड़ा या खङूवा, गुड़, चीनी, तम्बाकू, तिलहन, सूती कपड़े, धातु के बर्तन, लकड़ी के बने बर्तन या कनसिन, माला इत्यादि वस्तुओं का निर्यात तथा स्वर्ण चूर्ण व सोना, सुहागा,पश्मीना, नमक, चंवर, घोड़े, याक वा कुत्तों का आयात करते रहे. जाड़ व्यापारी तोलिंग या थोलिंग, तसपरंग व गरहोत के इलाकों में ही व्यापार करते थे तो बुशाहरी खामपा व्यापारी पूरे तिब्बत में व्यापार करने का अधिकार पाए थे. गढ़वाली व्यापारी केवल डोकपा ऑड़ तक ही जा पाते थे, जहां तिब्बत के गांव थांग, गंडोह, सरंग, करवक़ व डोकपा बसे हैं. इन्हीं गांवों से वस्तु और जिंसों का लेनदेन होता था. जाड़ व्यापारी जाड़ों के मौसम में निलांग से आगे दक्षिण की ओर हफ्ता – दस दिन पैदल चलने के बाद उत्तरकाशी में भागीरथी के किनारे डूंडा तथा भटवाड़ी में आ जाते थे. यह उनका शीतकालीन प्रवास रहता. Jad Culture and Language Uttarakhand
Jad Culture and Language Uttarakhand
जाड़ गंगा नदी.
निलांग घाटी में आदिम काल से निवास कर रही जाड़ जनजाति में जाड़ भाषा बहुतायत से बोली जाती रही है. जाड़ जनजाति के समृद्ध ऐतिहासिक अतीत का वर्णन करते हुए प्रो.डी.डी.शर्मा ने अपनी पुस्तक, तिब्बती हिमालयन लेंग्वेजिज ऑफ उत्तराखंड (1990) में लिखा है कि जाड़ समुदाय का मूल संबंध हिमाचल प्रदेश के बुशाहर राज्य के पहाड़ी इलाकों से रहा जिसे अब किन्नौर कहा जाता है. एच. एस. फकलियाल के अनुसार उत्तरकाशी के जाड़ मुख्यतः नेपाल के करनाली इलाके के जाड़ों के वंशज रहे. ये नाग वंश के राजा पृथ्वी मल्ला के समय चौदहवीं शताब्दी में इस इलाके में बस गए थे. एटकिंसन ने गढ़वाली व बुशाहरी हुणिया की मिश्रित नस्ल को जाड़ समुदाय कहा. नारी के हुणिया खुद को नारीपा तथा उच्च हिमालय इलाकों में रहने वाले को मोनपा कहते हैं. खस स्वयं को खस देश से अभिहित करते हुए उच्च पर्वत क्षेत्र में निवास करने वालों को जो तिब्बत से व्यापार करते थे, के आवास स्थलों को भोट तथा तिब्बत को हूणदेश कहते थे. वहीं तिब्बत के निवासी निलांग घाटी को चोंग्सा कहते थे.
2011 की जनगणना में जाड़ भाषा बोलने वालों की संख्या चार हजार बताई गई. जाड़ भाषा सीमांत हिमालय की तिब्बत-बर्मी भाषा समूह की उपबोलियों से सम्बंधित रही भले ही एक सीमित समुदाय में यह प्रचलित रही. 1962 में चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया. जादोंग, सुमदु, निलांग, बगोरी और हर्षिल में जाड़ भाषा का खूब प्रचलन था. 1962 से पहले निलांग घाटी में जाड़ भाषा ही सबसे अधिक बोली जाती रही. तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद तिब्बत की सीमा से लगे निवासियों को डुंडा, लंका व उत्तरकाशी के इलाकों में बसाया गया और इन इलाकों को भारतीय सेना की निगरानी में रखा गया. अब जाड़ भाषा मुख्य रूप से उत्तरकाशी, भटवाड़ी, डुंडा, बगोरी, व हर्षिल जैसे भागीरथी नदी के तटीय क्षेत्रों में बोली जाती है. ये मात्र भाषा अथवा बोली न हो कर समूचे जाड़ समुदाय की जीवन पद्धति है.
जाड़ समुदाय की जीवन पद्धति अभी भी कमोबेश परंपरागत जीवनक्रम का अनुसरण कर रही है. ये साल में छह महीने सीमांत के हिमाच्छादित इलाकों में रहते व विचरण करते हैं. जाड़ों के मौसम में ये उत्तरकाशी शहर के भटवाड़ी वा डूंडा में निवास करते हैं. सामान्यतः अभी भी ये अपने परंपरागत व्यवसाय एवं पुश्तैनी शिल्प से जुड़े हैं.
उत्तरकाशी में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश चंद्र ममगई पिछले दस सालों से जाड़ संस्कृति व जाड़ भाषा पर जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं. वह यायावर प्रकृति के हैं. कई भाषाएं जानते हैं. पहाड़ की लोकथात पर बहुत काम कर चुके हैं. इस सीमांत इनर लाइन इलाके की उन्होंने खूब पदयात्राएं की हैं. वर्षों तक स्थानीय समाज से घुलने मिलने तथा उनके द्वारा बोली जाने वाली जाड़ भाषा व शब्दावली के संकलन के साथ ही स्थानीय संस्कृति व थात पर लम्बे अनुसन्धान के नतीजे में उनका जाड़ भाषा का शब्दकोष छप चुका है. जाड़ समुदाय के सामाजिक आर्थिक स्वरुप के साथ यहाँ की परंपरागत संस्कृति पर अलग से भी उन्होंने किताब लिखी है.
सीमित व संकुचित इलाके में सिमटी पर लोकथात से समृद्ध जाड़ संस्कृति पर वह बताते हैं कि जाड़ गंगा के तटीय इलाकों के निवासियों को उत्तराखंड की स्थानीय बोलियों में पहले हुणियाँ कहा जाता था. हुणियाँ शब्द ह्यूं का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है – हिम. इस प्रकार हुणियाँ से आशय है, उच्च हिमालय-हिम आच्छादित इलाकों में रहने वाले निवासी. उत्तराखंड एवं भोट (तिब्बत )के मध्यवर्ती इलाकों के निवासी होने के कारण स्थानीय निवासियों के द्वारा इन्हें भोटिया नाम से भी पुकारा जाता रहा पर ये रोंग्पा कहलाया जाना पसंद करते हैं. जिससे आशय है पर्वत-घाटियों में रहने वाले लोग. तिब्बत से व्यापार सम्बन्ध होने के कारण जाड़ समाज को तिब्बत निवासी चोंग्सा कहते रहे. जाड़ समुदाय स्वयं को किरातों का वंशज मानते हैं. गढ़वाल में किरात जाति के प्रसार का एक प्रमाण भागीरथी का एक नाम किराती भी माना गया. कश्यप संहिता में यह उल्लेख है कि यमुना घाटी में किरातों का गढ़ था.
कुमारसम्भव (1-17 एवं 1/8) में उल्लेख है कि विक्रम की पांचवी शताब्दी में उत्तराखंड में गंगाजी के उदगम प्रदेश में किरात और किन्नर जाति निवास करती थी :
भागीरथी निर्झरसीकराणां वोढा मुहू कम्पित देवदारु:
यद् वायुर्नविष्ट मृगैः किरातैरा सेव्यते भिन्न शिखण्डिवहर
चंद किन्नर जातक (खंड 4, पृष्ठ 490-91)के सूत्रों से ज्ञात होता है कि उत्तराखंड में गंधमादन के समीप के क्षेत्र अर्थात आज के उत्तरकाशी व चमोली जनपदों में किन्नर निवास रहा. सभापर्व (52/2-3) से भी स्पष्ट होता है कि किरात जाति के वह लोग जो गढ़वाल के उच्चांश में रहते थे व हूण देश तिब्बत से सुहागा या टंकण, स्वर्ण चूर्ण, कस्तूरी का व्यापार करते थे. इन्हें तंगण या टंकण के नाम से भी जाना गया. यही टंकण वंशज उत्तरकाशी के जाड़ भी रहे.
Jad Culture and Language Uttarakhand
उत्तराखंड की जाड़ जनजाति में प्रयुक्त जाड़ भाषा-बोली उत्तरकाशी जनपद सीमांत पर्वत उपत्यकाओं में प्रयुक्त होती है. प्रोफेसर सुरेश चंद्र ममगई बताते हैं कि इस भाषा में प्राचीन समय से मौखिक रूपों में संस्कृति तथा समाज की विषेशताओं का तानाबाना रचित होते आया है. जिसमें कृषि, व्यापार , पशुचारण तथा अध्यात्म से सम्बंधित शब्दावली के अतिरिक्त गीत, लोककथाएं , मुहावरे, लोकोक्तियाँ तथा लोकगाथाएँ भी अंतर्भूत हैं.जाड़ भाषा की ध्वन्यात्मक संरचना, उच्चारण -प्रक्रिया, स्वनिम विश्लेषण, शब्द भंडार रूपात्मक संरचना (संज्ञा, लिंग, वचन, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, काल-रचना) तथा व्याकरण का सम्बन्ध तिब्बती भाषा से जुड़ा रहा है. यद्यपि जाड़ भाषा में अनेक ऐसी भी विशेषताएं भी हैं जो तिब्बती भाषा से अलग हैं. मुंडा, खस तथा दरद परिवार की भाषा-बोली बोलने वालों से जाड़ समुदाय के व्यापारिक रिश्ते रहे हैं. इसलिए इन भाषा परिवारों का प्रभाव भी जाड़ भाषा पर देखा जा सकता है. पश्चिमी गढ़वाली की अनेक उपबोलियों जैसे टिरियाली, रमोली, रंवाल्टी, बुढेरा की शब्दावली को भी जाड़ भाषा ने अपनाया है.
हिन्दू धर्म से सम्बंधित होने के कारण जाड़ समुदाय अनेक स्थानीय लोक देवी देवताओं के प्रति आस्थावान रहा. संभवतः इसी कारण यहाँ संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता भी दिखाई देती है. हिन्दू धर्म से जुड़ी आस्थाओं के अनुकूल वार्षिक महीनों के नाम (चैत, बैशाख, जेठ, अषाढ़, सौंण, भादों, असूज, कार्तिक, मंगशीर, पूस, माघ तथा फागुन) इस समुदाय ने अक्षरशः ग्रहण कर लिए हैं. यही प्रवृति सप्ताह के नामों के साथ भी देखी जाती है बाकी अन्य प्रयोक्तियों में तिब्बती भाषा का अल्प प्रभाव भी दिखाई देता है.
जाड़ गीतों में जाड़ संस्कृति व लोक थात की स्पष्ट छाप है :
थोन्मो, थोन्मो गांगा, मऊ, मऊ पांगा
लाखू -लाखू थांगा गाशिंग -गाशिंग थोगो.
पिगा याला छोमजा -छोमजा तोगा माला छोमजा
लम -ला लम -ला दोजे, गाशिंग -गाशिंग थोगो.
तला खुरु कलशा, पिरियाँ बुली टाशा
नमते, नमते छोमजा, गाशिंग -गाशिंग थोगो.
थोन्मो , थोन्मो गांगा...
इस लोकगीत में जाड़ प्रदेश का वर्णन व दिनचर्या है :
ऊँचे ऊँचे पर्वत शिखर, हरे भरे घास के मैदान, सुन्दर-सुंदर पर्वतों पर बुग्याल कितने मनमोहक प्रतीत होते हैं. वसंत ऋतु का वह समय जब हम सभी अपने पूरे परिवार और पालतू पशुओं के साथ अपने मूल घरों (निलांग तथा जादोंग )की ओर चल पड़ते हैं. शीत ऋतु के आरम्भ होते ही इसी प्रकार अपने शीतकालीन आवासों की ओर आना और रास्ते में रुक-रुक करपड़ाव डालते हुए रुकना, ठहरना और वह घुमक्कड़पन कितना प्यारा लगता है. पूरा सामान घोड़ों पे लाद के चलना, छोटे बच्चों और नवजात शिशुओं को पीठ पर बांध कर झुटपुटे में ही चल देना कितना प्यारा लगता है.
अपने गाँव छोड़ कर आने की पीड़ा का लोक स्वर :
सांग (जादोंग )छोंगसा ( निलांग)नियी युल
ईन बिजे टांजी टाग
ची बेजे बिजे काहू ला शुंग
दी युल युवी सूं...
छोंगसा शी चा सै थुँग्जे
बिजे शिमु छौरी टाग
दी युल दु...
सांग छांग सा न्यी युल ईन
बिजे टाँजी टाग
ची बेचे बिजे काहू ला शुंग
दी युल युवी सुं...
जाड़ उपत्यका की याद भरी हैं इस गीत में. तब बोल फूट पड़ते हैं कि :
जादोंग और निलांग हमारे इन दोनों गांवों की याद हमें बहुत सताती है गाँव छोड़ते समय बड़ा ही कारुणिक और दुखदायी समय होता है. वो दिन याद आते हेंजब हम सभी एक साथ बैठ कर खाते-पीते थे और प्रसन्न होते थे. गाँव की स्मृतियाँ भी हमें सताती रहती हैं.
दुर्गम सीमांत प्रदेश के जाड़ पर्वत पुत्र जानते हैं कि विषम भौगोलिक परिस्थितियों में उनकी रक्षा यही प्रकृति करती है. उनकी आस्था के बोल उभर उठते हैं समवेत स्वरों में :
कोंजोंग दो टांगबो लुग्बा
यें कोंजोंग शी लुग ईन
होनमु होनमु पांगा बला न्येला
नी थ्वी टाग वो
लुग्मा गांगा ला न्येला खुड़ी टाग
हाँ हाँ...
कांबला सानी पोदु दुगो
हां थे...
कोंजोंग दो टांगबो लुग्बा
न्ये कोंजोंग शी लुग ईन
होनमु होनमु पांगा बला न्येला
नी थ्वी टागचा...
जाड़ निवासी गा रहे हैं कि भगवान बकरी चराने वाला चरवाहा है और हम सभी उसकी बकरियां हैं. हरे भरे घास के मैदान में वो हमें मिलते हैं. वो चरवाहा हम सभी भेड़ बकरियों को हरे भरे बुग्यालों में चराने के लिए ले जाता है. चरवाहा हमारा भगवान है और हम उसकी भेड़ बकरियां हैं.
Copyright Girish Lohanion, 2019
   
सीमांत उत्तराखंड में जाड़ संस्कृति व भाषा; सीमांत उत्तरकाशी में जाड़ संस्कृति व भाषा; श्रृंखला जारी रहेगी
The Culture and language of Jad region, Uttarkashi, Uttarakhand series will continue

 

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