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  • फूलदेई: March 14, 2010

Author Topic: Phool Deyi: Folk Festival Of Uttarakhand - फूल देई: एक लोक त्यौहार  (Read 65745 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,
यो देई सौ बार , बारम्बार नमस्कार,
फूल देई-छ्म्मा देई

Devbhoomi,Uttarakhand

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आप सभी को फूलदेई की ढेरों शुभकामनाये
 बसंती उल्लास के पर्व फूलदेई सक्रांति से एक माह तक अनवरत घर की दहलीज को रंग-बिरंगे फूलों की खुशबू से महकाने वाला चैत्र मास आ गया है
 वर्तमान समय में बच्चों के सूर्य ढलने के बाद फ्यूंली, बुरांश, पंय्या आदि फूलों को रिंगाल की बनी टोकरियों में सजाया जाता था, लेकिन टोकरियां की जगह अब पॉलीथिन की थैलियों ने ले ली है। बच्चे आठ दिनों तक प्रात: उठकर गांव में स्थित मठ मंदिरों व घर की चौखट पर फूल डाल कर गीत गाते हैं। इसके बदले ग्रामीण फुलारी बच्चों को परंपरागत ढंग से चौलाई से बने खील व गुड़ बच्चों में वितरित करते हैं। बच्चों के समूह में घोगा देवता (फूलदेई) की डोली को भी सजाकर बसंत गीतों के साथ झूम-झूमकर नचाया जाता है। कई स्थानों पर यह कार्यक्रम एक माह तथा अधिकांश स्थानों पर यह प्रक्रिया आठ दिनों तक चलती रहती है। आठवें दिन बच्चे सभी घरों से भोजन सामग्री व पूजा सामग्री को इकट्ठा कर सामूहिक भोज तैयार किया जाता है। इसके बाद बच्चे घोगा देवता की पूजा-अर्चना एवं भोजन चढ़ाकर तब खुद ग्रहण करते हैं। विभिन्न गांवों में केवल डोली देवता की डोलियों न ले जाकर पत्थरों पर बने देवता की मूर्ति की पूजा की जाती है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dr Anil Karki
 
फुलदेली की बधाई
'हिमाल की बेटियाँ'
किसी सुबह
ठिठुरते हुए
वे आयेंगी हिमाल से
सबसे ठन्डे दिनों में भी
अपने लत्तर झगुले की कुट्टी में
भिटाऊ
आडू-मेल-केशिया
बुरांश के फूल छुपाये
बिना कुछ मांगे
बिखरा जायेंगी वे
देहरी पर
पंखुड़ियाँ फूलों की
देहरी पर रख के फूल
देते हुए प्रेम का पैगाम
वे एक दिन चुपके से
पार चल देंगी
देहरी के
हिमाल लगा लेगा
गले से उन्हें
लौटेगा फिर बसन्त
पहाड़ों पर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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'फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार……फूल देई-छ्म्मा देई।'
आप सभी लोक पर्व #फूलदेई की मंगलकामनाएं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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फूल देई-छम्मा देई, दैंणि द्वार- भर भकार,
यौ देळी कैं बार-बार नमस्कार।
एक लोक गीत
फूलदेई -फूलदेई -फूल संग्रान्द
सुफल करी नयो साल तुमको श्रीभगवान
रंगीला सजीला फूल फूल ऐगी , डाल़ा बोटाल़ा हर्या ह्व़ेगीं
पौन पन्छ , दौड़ी गेन, डाल्युं फूल हंसदा ऐन ,
तुमारा भण्डार भर्यान, अन्न धन बरकत ह्वेन
औंद राउ ऋतू मॉस , होंद राउ सबकू संगरांद
बच्यां रौला तुम हम त फिर होली फूल संगरांद
फूलदेई -फूलदेई -फूल संग्रान्द
फूल संगरांद का यह दिन आज उत्तराखंड में कन्याओं द्वारा प्रसन्नता के साथ मान्या जाता है कन्याएं बैसाखी तक रोज सुबह सुबह देहरी में फूल डालती हैं
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आभार स्व श्री शिवा नन्द नौटियाल (लोकगीत )
एवम श्री कैलाश पांडे

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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फूल देई छिमा देई
दैणी द्वार, भर भकार
फूल देई फूल संगरांद
सुफल करो नयू बरस तुमकु भगवान
तुमारा भकार
भर्यान अन्न धन्न फुल्यान
औंदी रय्यां ऋतु मास
फुलदा रया फूल
बच्यां रौला हम तुम
फेर आली संग्रांद

Bhishma Kukreti

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फूलदेई उत्तराखंड कु पारंपरिक त्योहार व पर्व
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सरोज शर्मा-जनप्रिय गढ़वाली साहित्य -235

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    फूलदेई भारत क उत्तराखंड कु एक स्थानीय त्योहार च जु चैत माह क आगमन मा मनये जांद, संपूर्ण उत्तराखंड म चैत कि शुरुआत मा अनेक फूल खिलजंदिन जै मा फ्यूंली, लाई, ग्वीरयाल, किनगोड़, हिसर, और बुरांस प्रमुख छन, चैत कि पैलि गते से छवट छवट बच्चा हथों मा कैंणी ( बरीक बांस कीकविलास यानि कि शिव क कैलाश क सर्व प्रथम सतयुग म पुष्प पूजा कु वर्णन और महत्व सुनण कु मिलद, पुराणो मा वर्णित च कि शिव शीतकाल म अपणि तपस्या म लीन छा ऋतु परिवर्तन थैं भौत वर्ष बीत गैन पर शिव कि समाधि नि टुटणी छै, मां पार्वती ही न बल्कि नंदी और शिव गण भि भि शिव कि समाधि मा लीन हूण से परेशान ह्वै गिन, आखिर मां पार्वती न युक्ति निकाल, कविविलास मा सबसे पैल फ्योली क पीला फूल खिलणक कारण सब्या शिव गणो थैं पीताम्बरी कपड़ा पैरा कि ऊंथै अबोध बच्चो क रूप दे द्या, सब्यूं थैं ब्वाल कि इन फूल चुनिक ल्याव कि जौंसे पूरू कैलाश महक जा, सबुन पार्वती क ब्वलयूं मानिक फूल समाधिस्थ शिव थैं समर्पित करिन, इलै ये थैं फूलदेई ब्वलेजांद, और सब्यू न दगड़ मा महादेव से एक सुर मा तपस्या म बाधा डलण कि क्षमा मांगिक ब्वलण लगिन-फूलदेई क्षमा देई, भर भंकार तेरा द्वार आये महाराज, शिव कि समाधि टूटि बच्चो थैं देखिक महादेव कू गुस्सा शांत ह्वै, और वू भि प्रसन्न मन से ए त्योहार मा शामिल ह्वीं, तब से पहाड़ों म फूलदेई पर्व धूमधाम से मनयै जांद, आज भि अबोध बच्चा हि येथैं मनंदिन, और समापन बुजुर्ग करदिन, सतजुग से लेकि आजतक परम्परा क निर्वहन बाल ग्वाल ही सरया धरती का इन वैज्ञानिक हूंयी जौन
फूलों क महत्व सृष्टि थै करै,
तभि बटिक फूल देवप्रिय, जनप्रिय और लोकसमाज प्रिय मनै गैन,फूलो म कोमलता हूंद, अतः पार्वती तुल्य मनै जंदिन, ऐ कारण हि फूल महिलाओ मा ज्यादा लोकप्रिय छन, सतजुग से लेकि आजतक महिलाए आभूषण क रूप मा ऐकु प्रयोग करदिन, बाल पर्व फूलदेई से हि पहाड म हिन्दू शक संवत शुरू ह्वै, फिर भि हम ये पर्व थैं हल्का म लिंदौ, जखबटिक श्रृष्टि न अपण श्रृंगार शुरू कैर और हमथैं कोमलता सिखै, जै बसंत कि आगुवाई कोमल हथौं न कैर और आवासों कि देलि म पुष्प वर्षा कैर वखी का हम शिक्षित लोग कब समझला कि यी अबोध बचपन हमथैं जीणकु मंत्र दे ग्या,
फूलदेई क पर्व कखि आठ दिन तक कखि पूरा चैत मास तक मनयै जांद, ऐ दिन बच्चा रंग बिरंगा फूल इकठ्ठा कैरिक घोघा माता कि कंडी म रखदिन, फूलकंडी लेकि घर घर जंदिन और देहरी मा फूल डलदिन, और सुख समृद्धि कि शुभकामनाऐ दिंदिन, महिलाओ क द्वारा बच्चो क सत्कार किए जांद उपहार स्वरूप चौंल गुड़ और पैसा दिंदिन, अंतिम दिन बच्चा घोघा माता कि पूजा करदिन, और इकठ्ठा हुंयू जतगा भि चौल दाल से सामूहिक भोजन बणद, जु प्रसाद क रूप म ग्रहण कियै जांद, गीत गयै जंदिन
फूलदेई, छम्मा देई
देणी द्वार, भर भकार
ये देली स बारम्बार नमस्कार
फूले द्वार....फूलदेई छम्मा देई
ऐ दिन फूलदेई से संबंधित अनेक गीत गयै जंदिन, होली क पर्व क बाद हि लोग ऋतुरैण और चैती गायन मा डूब जंदिन, ढोल दमौ बजाण वला लोग घर घर जैकि गीत गंदिन और भेंट क रूप मा चौंल गुड़ दीणकि प्रथा च।


 

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