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Author Topic: उत्तराखंड की लोक संस्किर्ति पर दैविक प्रभाव तथा वैदिक कालीन प्रथायें  (Read 711 times)

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हिमालय की विराटता,शुचिता भाब्य्ता एवं शुभ्रता के समक्ष हिमालय की गोद में निवास करने वाले पर्वतवासियों की चेतना ब्यापक हो जाती है !
वह परमसत्ता की अनुभूति स्वयम अपने अन्ड़ान्र करने लगते हैं !उनके लिए प्रकिती,मनुष्य और देवता,तीनों उत्तराखंड के लिए चेतन्य हैं !
"जुगराज रैया या धरती और याखाका मनखी जय देवभूमि उत्तराखंड "

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५-अन्न साटी   

आर्यों के देश में धान तथा जौ अधिक होता था,आर्य महिलायें जौ भूनती थीं !जौ को सूप से छानकर "सतु" बनता था !और आर्य उसमें घी मिलाकर खाते थे!

 हमारी संसकिरती और अमाज में जौ को देवान्न माना जाता है !इसकिये तब से आज तक हवन में जौ का प्रयोग किया जाता है !आज भी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में जौ की खेती होती है!और सतु आर्यों के मुख्य आहारों में से एक है !
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६-सुरा

 आर्य सोम -सुरा थे,सोम के अतिरिक्त अन्न से निर्मित एक स्वतंत्र मादक पेय था !जो सुरा के नाम से बिख्यात था! आज भी सीमान्त क्षेत्रों के लोग वैदिक आर्यों की भांति सतु  मिलाकर सुरा का सेवन करते हैं !
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७-सोने और तांबा का प्रयोग

ऋग्वैदिक काल मैं आर्यों के देश मैं सोने का प्रयोग होता था सप्त शिन्धु क्षेत्र जो आज का मध्य हिमालय है !स्वर्ण का भंडार माना जाता था

!आज भी ग्रामीण अंचलों मैं तांबे की गागर व बर्तनों का परम्परागत प्रचलन है !और ऋग्वैदिक काल की भाँती तांम्बे के बर्तन मैं पानी शुद्ध माना जाता है !
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