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Uttarakhand Ramleela - उत्तराखंड की रामलीला

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Devbhoomi,Uttarakhand:
भगवान राम ने रावण को मार किया लंका पर फतह



  रुद्रप्रयाग, : जिला मुख्यालय से सटी ग्राम पंचायत नरकोटा में चल रही रामलीला भगवान राम के रावण को मारकर वापस अयोध्या पहुंचने के साथ ही संपन्न हो गई है। राम के राज्याभिषेक को देखने के लिए भारी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ी।


विगत चार दशक से भी अधिक समय से ग्राम पंचायत नरकोटा में प्रतिवर्ष आयोजित होती आ रही रामलीला का इस बार भी भव्य समापन हुआ। लीला के अंतिम रात्रि को भगवान राम ने मेघनाद, कुंभकरण व अहिरावण के वध के बाद लंकापति रावण के साथ घमासान युद्ध हुआ।


 अंत में रावण मारा गया और लक्ष्मण ने लंका की गद्दी पर विभीषण का राजतिलक कर दिया। इसके बाद राम सेना सीता को लेकर राम, लक्ष्मण व हनुमान अयोध्या पहुंचे।
Source dainik jagran

Pawan Pathak:
1952 में मुनस्यारी में हुई थी शुरुआत, कुमाऊंनी में होता है त्रेतायुग की कथा का मंचन
पिथौरागढ़। उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में शारदीय नवरात्र के दौरान रामलीला जैसे लोक नाट उत्सव का बड़े ही रोचक ढंग प्रस्तुतीकरण होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के प्रसंगों और त्रेतायुग की संपूर्ण कथा को अभिनय के माध्यम से कलाकार दर्शाते हैं।
कुमाऊं की रामलीला का इतिहास करीब 150 साल पुराना रहा है और इतने लंबे सफर में सबसे रोचक बात यह रही है कि कुमाऊं में सिर्फ मुनस्यारी ही एक ऐसी जगह है जहां के आधा दर्जन से ज्यादा गांवों में रामलीला के संवाद सिर्फ कुमाऊंनी भाषा में गाए जाते हैं और पिछले 52 वर्षों से यह परंपरा खंडित नहीं हुई। यह बात अलग है कि मुनस्यारी नगर में दिखाई जाने वाली रामलीला का मंचन अब पहाड़ी में नहीं होता है।
कुमाऊं ही क्या बल्कि उत्तर भारत में दूसरी ऐसी जगह ही नहीं जहां ठेठ कुमाऊंनी भाषा में रामायण के प्रसंग दिखाए और गाए जाते हैं। कुमाऊं की रामलीला विशुद्ध रूप से शास्त्रीय संगीत पर आधारित है। शहर से लेकर गांव तक रामायण की कथा का वर्ष में एक बार अभिनय और गीतों के जरिए मंचन दिखाया जाता है। मुनस्यारी नगर तथा उससे लगे गांवों में कुमाऊंनी भाषा में रामलीला की शुरुआत वर्ष 1958 में हुई थी। इस परंपरा को शुरू करने का सारा श्रेय रंगकर्मी स्व. बृजेंद्र लाल साह को जाता है। इस लोकनाट्य उत्सव के सारे संवाद कुमाऊंनी भाषा में किए गए, पात्रों ने अभिनय कुमाऊंनी में किया और फिर पहली बार 1958 में जब मंच पर इसका प्रदर्शन हुआ तो इसे स्थानीय स्तर पर काफी ख्याति मिल गई।
तब से लेकर आज तक मुनस्यारी तहसील के जोशा, चौना, बुई, जैंती, पातो, दरांती, तोमिक, माणीटुंडी, रिंगू, चुलकोट गांव में पहाड़ी भाषा में राम की लीला का मंचन होता है। इन गांवों में नवंबर से रामलीला शुरू होगी। क्योंकि तब तक लोगों की खेतीबाड़ी का काम निपट जाता है और स्वस्थ मनोरंजन के लिए पूर्ण आस्था के साथ एकजुट होकर लोग इस उत्सव को मनाते हैं। हालांकि मुनस्यारी के ही कुछ अन्य गांवों में भी पूर्व में पहाड़ी रामलीला दिखाई जाती थी, पर अब वहां मंचन ही नहीं होता।
आगे भी परंपरा का बना रहना जरूरी
संस्कृतिकर्मी तथा पूर्व विधायक हीरा सिंह बोरा मानते हैं कि पहाड़ की संस्कृति, सभ्यता, जीवनशैली और भाषा के हिसाब से पहाड़ी रामलीला अपने आप में एक अलग स्थान रखती है। क्योंकि पहाड़ी में संवाद को काफी हद तक लोग समझते हैं। उनका कहना है कि 1958 में रंगकर्मी बृजेंद्र लाल साह ने जिस परंपरा को शुरू किया था, वह आगे भी इसी तरह बनी रहनी चाहिए।
114 साल में पहली बार मंचन
पिथौरागढ़ नगरपालिका की रामलीला के 114 साल के इतिहास में इस वर्ष पहली बार सोमवार की रात डेढ़ घंटे की पहाड़ी रामलीला दिखाई गई। इतने कम समय में गौरी पूजन, जनक दरबार में धनुष यज्ञ और परशुराम लक्ष्मण संवाद का बड़े ही अद्भुत तरीके से मंचन किया गया। रिटायर्ड प्रधानाचार्य रमेश शर्मा की पहल तथा दुर्गा सिंह धर्मशक्तू के सहयोग से पात्रों ने मंच पर आकर्षक प्रस्तुति दी। सारे संवाद कुमाऊंनी भाषा में गाए गए।
Source-http://earchive.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20101019a_002115006&ileft=231&itop=1204&zoomRatio=134&AN=20101019a_002115006

Pawan Pathak:
जब राम के बाण से मर गया रावण का किरदार
कनालीछीना में 48 साल पहले रामलीला के मंच पर हो गई थी चंद्र सिंह की मृत्यु
पहली रामलीला की बचत से बना था जूनियर हाईस्कूल : जोशी
वर्ष 1934 की पहली रामलीला में राम की भूमिका निभाने वाले जोशयूड़ा (कनालीछीना) निवासी राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता रिटायर्ड शिक्षक मथुरा दत्त जोशी (96) बताते हैं कि स्यूंता (चीड़ के बीज) जलाकर सिमलपट्टा मैदान में पहली रामलीला का आयोजन हुआ। कहते हैं कि कनालीछीना में रामलीला की शुरुआत का श्रेय पंडित गोपाल सिंह सिरोला को जाता है। बताते हैं कि पहली रामलीला में 1800 रुपये की बचत हुई थी। उक्त रकम की मदद से क्षेत्र के लोगों ने श्रमदान कर जूनियर हाईस्कूल कनालीछीना के लिए भवन बनाया था, स्कूल की स्थापना की थी। पहली रामलीला में लक्ष्मण की भूमिका में चंद्र सिंह दिगारी थे। वक्ता मैनेजर पाली गांव के खड़क सिंह दिगारी थे।
राजेंद्र सामंत
कनालीछीना (पिथौरागढ़)। आजादी से पहले की कनालीछीना की रामलीला इस बार 82वें वर्ष में पहुंच गई है। वर्ष 1934 में शुरू हुई कनालीछीना की रामलीला में 48 साल पहले एक बार ऐसा भी हुआ कि राम ने रावण को मारने के लिए तीर चलाया और रावण के पात्र की वास्तव में मृत्यु हो गई।
वर्ष 1934 में पंडित के नाम से विख्यात गोपाल सिंह सिरौला के प्रयासों से कनालीछीना में रामलीला शुरू हुई। पंडित सिरोला ही रामलीला कमेटी के पहले अध्यक्ष थे। चीड़ के छिलके, मशाल के उजाले में 10 साल तक रामलीला का मंचन हुआ। 1944 में मिट्टी के तेल से जलने वाले पैट्रोमैक्स से रोशनी हुई। 70 के दशक से बिजली से रोशनी की व्यवस्था हो रही है। वर्ष 1967 की रामलीला में एक ऐसी घटना हुई, जिसे लोग अक्सर याद करते हैं। कनालीछीना रामलीला कमेटी के वक्ता मैनेजर रमेश चंद्र पांडे ने बताया कि तब राम-रावण युद्ध का मंचन हो रहा था। राम ने जैसे ही रावण की ओर तीर चलाया रावण के पात्र चंद्र सिंह दिगारी जमीन में गिर पड़े। जब वह काफी देर तक नहीं उठे, लोगों ने पास जाकर देखा तो चंद्र सिंह (50) की मृत्यु हो चुकी थी। तब राम की भूमिका में देब सिंह दिगारी थे। लोग चर्चा करते थे कि चंद्र सिंह तो बड़ा सौभाग्यशाली है, भगवान राम के वाण से स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ है। वहीं, गांव के 96 वर्षीय बुजुर्ग मथुरा दत्त जोशी ने बताया कि चंद्र सिंह की मृत्यु की वजह हार्टअटैक रही थी।
कनालीछीना की रामलीला की शुरुआत में सिरोली, ख्वांतड़ी, गुड़ोली, बंदरलीमा, सतगड़, पाली, डुंगरी, मिताड़ीगांव, चमडुंगरी, बचकोट, पीपली, कापड़ीगांव, विशूनाखान, पुखरौड़ा, बनीगांव, चौपता, देवलथल के लोगों का सहयोग रहा। वर्तमान में रामलीला कमेटी अध्यक्ष मनोहर सिंह बिष्ट हैं। उपाध्यक्ष नवीन पांडे, गणेश राम, भुवन अन्ना, भूपेंद्र दिगारी, खगेंद्र दिगारी, नवीन दिगारी, नवीन पांडे, भगवान सिंह दिगारी, चंद्र बल्लभ जोशी समेत तमाम लोग रामलीला के संचालन में सहयोग करते हैं।
Source-http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20151016a_005115006&ileft=110&itop=75&zoomRatio=130&AN=20151016a_005115006

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