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  • Uttarayani - उत्तरायणी कौतिक(मकर संक्रान्ति): January 14, 2014

Author Topic: Uttarayani घुघुतिया उत्तरायणी (मकर संक्रान्ति) उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा पर्व  (Read 90907 times)

lalit.pilakhwal

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सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का त्योहार है ‘उत्तरायणी’

साथियो,
आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि दिल्ली सरकार ने ‘उत्तरायणी’ पर्व 14-15 जनवरी, 2016 को सरकारी स्तर पर मनाने की घोषणा की है। हम उत्तराखंडवासी इसके लिये सरकार का आभार व्यक्त करते हैं। सरकार की घोषणा के अनुसार इस वर्ष दिल्ली में ‘उत्तरायणी’ चार स्थानों पर मनाई जायेगी। सरकार की इस पहल से भविष्य में ‘उत्तरायणी’ को और व्यापक रूप से मनाने का रास्ता भी सापफ हो गया है। सांस्कृतिक एकता किसी भी समाज की पूंजी होती है। इसे बनाये रखने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने के लिए हमें उन तमाम संस्थाओं और समाजों से भी संवाद करना होता है जो इसे व्यापक फलक पर उतारने में मदद कर सकते हैं। इसमें सरकार और अन्य संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। संस्कृति का मतलब ठहराव नहीं, बल्कि यह जितनी प्रवाहमय होगी उतनी समृद्ध होगी। ‘उत्तरायणी’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ‘मकर संक्राति’ के रूप में ‘उत्तरायणी’ पूरे देश में मनाई जाती है। अलग-अलग प्रान्तों और समाजों में इसके अनेक रूप हैं। हिमालय और देश की जीवनदायनी नदियों का उद्गम स्थल होने से ‘उत्तरायणी’ देश की सांस्कृतिक समरसता का अद्भुत त्योहार है। राजधानी दिल्ली में लंबे समय से प्रवास में रह रहे उत्तराखंड के लोग ‘उत्तरायणी’ पर्व को अपनी तरह से मनाते रहे हैं। बरेली और लखनऊ में तो दशकों से उत्तरायणी बहुत उत्साह के साथ मनाई जाती है। असल में यह हमारे लिये चेतना का त्योहार भी है।

उत्तरायणी का सांस्कृतिक पक्ष भारतीय परंपरा में ‘मकर संक्रान्ति’ को सूर्य के उत्तर दिशा में प्रवेश के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड में इसे ‘उत्तरायणी’ कहा जाता है। पहाड़ में इसे घुगुतिया, पुस्योडि़या, मकरैण, मकरैणी, उतरैणी, उतरैण, घोल्डा, घ्वौला, चुन्या त्यार, खिचड़ी संगंराद आदि नामों से जाना जाता है। इस दिन सूर्य धनुर्राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इसे ‘मकर संक्रान्ति’ या ‘मकरैण’ कहा जाता है। सौर चक्र में सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर चलता है, इसलिये इसे ‘उत्तरैण’ या ‘उत्तरायणी’ कहा जाता है। ‘उत्तरायणी’ जहां हमारे लिये ट्टतु
का त्योहार है वहीं यह नदियों के संरक्षण की चेतना का उत्सव भी है। ‘उत्तरायणी’ पर्व पर उत्तराखंड की हर नदी में स्नान करने की मान्यता है। उत्तरकाशी में इस दिन से शुरू होने वाले माघ मेले से लेकर सभी प्रयागों बिष्णुप्रयाग, नन्दप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग, सरयू-गोमती के संगम बागेश्वर के अलावा अन्य नदियों में लोग पहली रात जागरण कर सुबह स्नान करते हैं। असल में उत्तराखंड में हर नदी को मां और गंगा का स्थान प्राप्त है।

कुमाऊं मंडल में ‘उत्तरायणी’ को घुघुतिया त्योहार के रूप में जाना जाता है। उत्तरायणी की पहली रात को लोग जागरण करते हैं। पहले इस जागरण में आंड-कांथ ;पहेलियां-लोकोक्तियांद्ध, फसक-फराव अपने आप गढ़ीबातेंद्ध,
कुछ समासामयिक प्रसंगों पर भी बात होती थी। रात को ‘तत्वाणी’ गरम पानी से नहानाद्ध होती है। सुबह ठंडे पानी से नदी या नौलों में नहाने की परंपरा रही है। ‘उत्तरायणी’ की पहली शाम को आटा-गुड़ मिलाकर ‘घुघुते’
बनाने का रिवाज है। आटे के खिलौने, तलवार, डमरू आदि के साथ इन्हें पफूल और पफलों की माला में पिरोकर बच्चे गले में डालकर आवाज लगाते हुये कव्वों को आमंत्रित करते हैं-

काले कव्वा काले, घुघुती माला खाले।
ले कव्वा बड़, मैंके दिजा सुनौंक घ्वड़।
ले कव्वा ढाल, मैंके दिजा सुनक थाल।
ले कोव्वा पुरी, मैंके दिजा सुनाकि छुर।
ले कौव्वा तलवार, मैंके दे ठुलो घरबार।

कुमाऊं क्षेत्रा में ‘उत्तरायणी’ के संदर्भ में कई पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं। इनमें एक कहानी यह है कि पुरातन काल में यहां कोई राजा था। उसे ज्योतिषयों ने बताया कि उस पर मारक ग्रहदशा है। यदि वह ‘मकर संक्रान्ति’ के दिन बच्चों के हाथ से कव्वों को घुघुतों फाख्ता पक्षीद्ध का भोजन कराये तो उसके इस ग्रहयोग के प्रभाव का निराकरण हो जायेगा। लेकिन राजा अहिंसावादी था। उसने आटे के प्रतीात्मक घुघुते तलवाकर बच्चों द्वारा कव्वों को खिलाया। तब से यह परंपरा चल पड़ी। इस तरह की और कहानियां भी हैं। फिलहाल ‘उत्तरायणी’ का एक पक्ष मान्यताओं पर आधारित है। गढ़वाल में ‘उत्तरायणी’ को ‘मकरैणी’ के नाम से जाना जाता है। उत्तरकाशी, पौड़ी, टिहरी, चमोली में ‘मकरैणी’ को उसी रूप में मनाया जाता है, जिस तरह कुमाऊं मंडल में। यहां कई जगह इसे ‘चुन्या त्यार’ भी कहा जाता है। इस दिन दाल, चावल, झंगोरा आदि सात अनाजों को पीसकर उससे एक विशेष व्यंजन ‘चुन्या’ तैयार किया जाता है। इसी प्रकार इस दिन उड़द की खिचड़ी ब्राह्मणों को दिये जाने और स्वयं खाने को ‘खिचड़ी त्यार’ भी कहा जाता है। ऐसे भी कुछ क्षेत्र हैं जहां घुघुुतों के समान ही आटे के मीठे ‘घोल्डा/घ्वौलों’ ;मृगोंद्ध के बनाये जाने के कारण इसे ‘घल्डिया’ या ‘घ्वौल’ भी कहा जाता है।‘उत्तरायणी’ के दिन पौड़ी गढ़वाल जिले एकेश्वर विकासखंड के डाडामंडी, थलनाड़ी आदि जगहों पर ‘गिंदी मेले’ का आयोजन होता है। ‘गिंदी मेलों’का पहाड़ों में बहुत महत्व है। यह मेला माघ महीने की शुरुआत में कई जगह होता है। डाडामंडी और थलनाड़ी के ‘गिंदी मेले’ बहुत मशहूर हैं। दूर-दूर से लोग इन मेलों में शामिल होने के लिए आते हैं। मेले में गांव के लोग एक मैदान में दो हिस्सों में बंट जाते हैं। दोनों टीमों के सदस्य एक डंडे की मदद से गेंद को अपनी तरपफ कोशिश करती हैं। एक तरह से यह पहाड़ी हाॅकी का रूप है। कुमाऊं में इसे ‘गिर’ कहते हैं।उत्तरायणी और सामाजिक चेतना‘उत्तरायणी’ का जहां सांस्कृतिक महत्व है, वहीं यह हमारी चेतना और संकल्पों को मजबूत करने वाला त्योहार भी है। परंपरागत रूप से मनाई जाने वाली ‘उत्तरायणी’ स्वतंत्राता आंदोलन के समय जन चेतना की अलख जगाने लगी। आजादी की लड़ाई के दौर में जब 1916 में कुमाऊं परिषद बनी तो आजादी के आंदोलन में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। अपनी समस्याओं के समाधान के लिये स्थानीय स्तर पर जो लोग लड़ रहे थे उन्हें लगा कि आजादी ही हमारी समस्याओं का समाधान है। इसलिये बड़ी संख्या में लोग संगठित होकर कुमाऊं परिषद के साथ जुड़ने लगे। अंग्रेजी शासन में ‘कुली बेगार’ की प्रथा बहुत कष्टकारी थी। अंग्रेज जहां से गुजरते किसी भी पहाड़ी को अपना ‘कुली’ बना लेते। उसके एवज में उसे पगार भी नहीं दी जाती। अंग्रेजों ने इसेे स्थानीय जनता के मानसिक और शारीरिक शोषण का हथियार बना लिया था। इसके खिलापफ प्रतिकार की आवाजें उठने लगी थी। धीरे-धीरे इस प्रतिकार ने संगठित रूप लेना शुरू किया। कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में 14 जनवरी, 1921 को बागेश्वर के ‘उत्तरायणी’ मेले में हजारों लोग इकट्ठा हुये। सबने सरयू-गोमती नदी के संगम का जल उठाकर संकल्प लिया कि ‘हम कुली बेगार नहीं देंगे।’ कमिश्नर डायबिल बड़ी पफौज के साथ वहां पहुंचा था। वह आंदोलनकारियों पर गोली चलाना चाहता था, लेकिन जब उसे अंदाजा हुआ कि अधिकतर थोकदार और मालगुजार आंदोलनकारियों के प्रभाव में हैं तो वह चेतावनी तक नहीं दे पाया। इस प्रकार एक बड़ा आंदोलन अंग्रेजों के खिलापफ खड़ा हो गया। हजारों लोगों ने ‘कुली रजिस्टर’ सरयू में डाल दिये। इस आंदोलन के सूत्राधारों में बद्रीदत्त पांडे, हरगोविन्द पंत, मोहन मेहता, चिरंजीलाल, विक्टर मोहन जोशी आदि महत्वपूर्ण थे।

बागेश्वर से कुली बेगार के खिलापफ आंदोलन पूरे पहाड़ में पफैला। 30 जनवरी 1921 को चमेठाखाल गढ़वाल में वैरिस्टर मुकन्दीलाल के नेतृत्व में यह आदोलन बढ़ा। खल्द्वारी के ईश्वरीदत्त ध्यानी और बंदखणी के मंगतराम खंतवाल
ने मालगुजारी से त्यागपत्रा दिया। गढ़वाल में दशजूला पट्टी के ककोड़ाखाल ;गोचर से पोखरी पैदल मार्गद्ध नामक स्थान पर गढ़केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के नेतृत्व में आंदोलन हुआ और अधिकारियों को कुली नहीं मिले। बाद में

इलाहाबाद में अध्ययनरत गढ़वाल के छात्रों ने अपने गांव लौटकर आंदोलन को आगे बढ़ाया। इनमें भैरवदत्त धूलिया, भोलादत्त चंदोला, जीवानन्द बडोला, आदि प्रमुख थे। उत्तरायणी का ही संकप था कि पहली बार यहां की महिलाओं ने अपनी देहरी लांघकर आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी करना शुरू किया। कुन्तीदेवी, बिसनी साह जैसी महिलायें ओदालनों का नेतृत्व करने लगी।

गीत भी बनने लगे-

अपना गुलामी से नाम कटा दो बलम,
तुम स्वदेशी नाम लिखा दो बलम।
मैं भी स्वदेशी प्रचार करूंगी,
मोहे परदे से अब तो हटा दो बलम।
यह एक बड़ी चेतना का आगाज था, जिसने बाद में महिलाओं को सामाजिक जीवन में
आगे आने का आकाश दिया। बिशनी साह ने कहा- ‘सोने के पिंजरे में रहने से
अच्छा, जंगल में रहना है।’ एक गीत बड़ा लोकप्रिय हुआ-
‘घाघरे गुनी, बाजरक र्वट,

सरकारक उजड़न ऐगो,
डबल में पड़गो ट्वट।।

‘उत्तरायणी’ आजादी के बाद भी आंदोलनों में हमारा मार्गदर्शन करती रही है। बागेश्वर के सरयू-गोमती बगड़ में तब से लगातार चेतना के स्वर उठते रहे हैं। आजादी के बाद सत्तर के दशक में जब जंगलात कानून के खिलापफ आंदोलन
चला तो आंदोलनकारियों ने उत्तरायणी के अवसर पर यहीं से संकल्प लिये। आंदोलनों के नये जनगीतों का आगाज

हुआ- ‘आज हिमाला तुमन क ध्यतौंछ,
जागो-जागो ये मेरा लाल।’
अस्सी के दशक में जब नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन’ चला तो इसी ‘उत्तरायणी’ से आंदोलन के स्वर मुखर हुये। 1987 में भ्रष्टचार के खिलापफ जब भवदेव नैनवाल ने भ्रष्टाचार के प्रतीक ‘कनकटै बैल’ को प्रधानमंत्राी राजीव गांधी के सामने पेश करने के लिये दिल्ली रवाना किया तो बागेश्वर से ही संकल्प लिया गया। उत्तराखंउ राज्य आंदोलन के शुरुआती दौर में राज्य आंदोलन के लिये हर वर्ष नई चेतना के लिये आंदोलनकारी बोगश्वर के ‘उत्तरायणी’ मेले में आये। उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण बनाने के लिये संकल्प-पत्रा और वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम पर गैरसैंण का नाम ‘चन्द्रनगर’ रखने का प्रस्ताव भी 1992 में यहीं से पास हुआ। तभी जनकवि ‘गिर्दा’ ने उत्तराखंउ आंदोलन को स्वर देते हुये कहा कि-
‘उत्तरैणी कौतिक ऐगो,
वैं पफैसाल करूंलों, उत्तराखंड ल्हयूंल हो दाज्यू उत्तराखंड ल्हयूंलो।’

जनवरी 1921 से आज तक सरयू-गोमती के संगम में ‘उत्तरायणी’ के अवसर पर जन चेतना के लिये राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का जमावड़ा रहता है। इसलिये ‘उत्तरायणी’ हमारे लिये चेतना का त्योहार भी है।साथियो, इस प्रकार ‘उत्तरायणी’ न केवल हमारी सांस्कृतिक थाती है, बल्कि हमारे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और समसामयिक सवालों को समझने और उनसे लड़ने की प्रेरणा भी है। जब हम ‘उत्तरायणी’ को मनाते हैं तो हमारे सामने
संकल्पों की एक लंबी यात्रा के साथ चलने की प्रेरणा भी होती है।

उत्तराखंड के बहुत सारे सवाल राज्य बनने के इन पन्द्रह वर्षो बाद भी हमें बेचैन कर रहे हैं। यह बेचैनी अगर इस बार की ‘उत्तरायणी’ तोड़ती है तो हम समझेंगे कि हमारी चेतना यात्रा सही दिशा में जा रही है।आप सब लोगों को ‘उत्तरायणी’ की बहुत सारी शुभकामनायें। इस आशा के साथ कि ‘उत्तरायणी’ का यह पर्व आप सबके लिये नये संकल्पों का हो। ऐसे संकल्प जो मानवता के काम आये।

लेख : चारु तिवारी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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काले कौवा काले , घुघुति माला खाले,
लै कौवा बड़ा, आपू सबुनै के दिये सुनक ठुल ठुल घड़ा,
रखिये सबुने कै निरोग, सुख सम़ृद्धि दिये रोज रोज।
सबै भै बैणियों के मकर संक्रान्तिक ढेर सारी शुभकामनायें.
www.MeraPahad.com

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मकर संक्रांति स्पेशल: उत्तराखंड का यह मेला देता है बहू-बेटियों को अपनों से मिलने का मौका
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प्रतीकात्मक चित्रपौड़ी गढ़वाल: उत्तराखंड सहित पूरे देश में मकर संक्रांति के साथ मेले और त्यौहारों की शुरूआत हो गई। आज जहां लोग जीवन की आपाधापी और आधुनिकता के कारण अपनी प्राचीन संस्कृति और परंपराओं से कटते जा रहे हैं, वहीं उत्तराखंड के निवासी "गेंदी की कौथिक" जैसी त्यौहारों को मना कर खुद को नई ऊर्जा और ताजगी से भर रहे हैं।
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चौदह जनवरी को पौ फटने (सुबह) होने के साथ ही पौड़ी गढ़वाल में एक पहाड़ की तलहटी में स्थित त्योडो गाड में लोगों के हुजुम को देखा जा सकता है। इस स्थान पर पिछले तीन दशक से मकर संक्रांति त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता रहा है। यहां यह त्यौहार दो दिनों तक आयोजित होता है।
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एक साल से था इस मेले का इंतजार...
इस त्यौहार के मौके पर यहां एक मेला लगता है, जिसमें आसपास के दस किलोमीटर के दायरे के 25 गांवों से लगभग 2000 ग्रामीण एकजुट होते हैं। यह मेला गांव-समाज की उन बहू-बेटियों, जो वर्षों से अपने परिवार से मिल नहीं पाई है, को परिवारजनों (मायके वालों) से मिलने का अवसर देता है।
मेले में आयी एक विवाहिता निशा बताती हैं, "मैं इस मेले का एक साल से इंतजार कर रही थी ताकि वह अपने मायके वालों से मिल सके। मैं यहां अपनी बहनों और सहेलियों से मिलने आयी हूं। यह हमारा मिलन-स्थल है।"
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फिर मिलेंगे, उसी जगह, उसी समय...
भूमि देवी जैसी एक बुजुर्ग महिला इसके बारे में बताते हुए हुए भावुक हो जाती हैं। वे कहती हैं, "यह मेला साल में एक बार लगता है। मैं यहां अपनी बेटी और दामाद से मिलने आती हूं और फिर घर लौट जाती हूं, जहां मैं अपने भेंड़ और मवेशियों के साथ अकेली रहती हूं।"
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यहां के स्थानीय लोगों के लिए इस प्रकार के मेले और उत्सव उन्हें रोजमर्रा की सांसारिक व्यस्तता से विराम देते हैं। यह मेला उनके घर की स्त्रियों और बच्चों को शाम तक पारंपरिक व्यंजनों और पकवानों का लुत्फ उठाने के साथ-साथ परिवार और अन्य परिचितों से पिछले साल की तरह मिलने का मौका देता है- एक निश्चित समय पर, एक निश्चित स्थान पर।

Raje Singh Karakoti

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मेरा पहाड़ फोरम के सभी सदस्यो को उत्तरायणी (मकर संक्रान्ति) त्यौहार की शुभकामना

आपका अभिन्न मित्र
राजे सिंह कड़ाकोटी
ग्राम नेपालकोट , तहसील भिकियासैण
ज़िला अल्मोड़ा , उत्तराखंड

Bhishma Kukreti

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मुंबईम मकर संक्रांति मा खिचड़ी से बिरयानी यात्रा
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 संस्कृति परिवर्तन दर्शक   :::   भीष्म कुकरेती   

मनिख जब पलायन करद  त कुछ दिन तलक अपण पुरातन संस्कृति बचाव मा  जी जान लगै दींद।  प्रथम कुछ साल वो भूतकाल तैं वर्तमान मा जीणै कोशिस करदो।  अर यु मीन मुंबई मा गढ़वाल दर्शन मा दिख्युं च।
गढ़वाल दर्शन जोगेश्वरी , मुंबई याने गढ़वाल का एक बड़ो गाँव याने ए बिग गढ़वाली विलेज ! जी हाँ आज बी गढ़वाल दर्शन मा गढ़वाल का चरित्र ज़िंदा छन।  कुछ बूड बुड्या बच्यां छन तो गढ़वाल की संस्कृति दर्शन ह्वे इ जांदन।  कुछ नी त गाळी त बचीं इ छन।  इख तलक कि गैर गढ़वाली बच्चा बि यूं गाळयूं प्रयोग करणम गर्व महसूस करदन।
     गढ़वाल दर्शन की एक बड़ी विशेषता या छे कि जु बि जनानी इक आयी छे उ सीधा ट्रेन से इकि आयी बीच मा दिल्ली देहरादून दर्शन करिक क्वी नि ऐ छायी।  तो यूं जनान्युं तै अपण संस्कृति दगड़म लाणम क्वी शरम नि लग अर कसम से यूं जनान्युंन या यूंक पतियोंन या बच्चोंन कबि बि मकर संक्रांति तै लोहड़ी या बिखोत तैं बैशाखी नि बोल।  जन दिल्ली देहरादून का प्रवासी आपस मा 'लोहड़ी दि वधाई ' बुल्दन उन गढ़वाल दर्शन का गैर गढ़वाली बि नि बुल्दन।  इख आज बि 5 साल का गढ़वाली बच्चा हो या गैर गढ़वाली बच्चा हो उ मकर संक्रांति तैं मक्रैणी इ समजद।  हां चूंकि मक्रैणी अर्थ उत्तरायणी या पतंग बाजी बि हूंद तो वो उत्तरायणी बि बोल लींद   किन्तु मकरैणी  को अर्थ जणदु च।
  मेरी मा इख 1972 का करीब ऐ होली-  ट्रेन से सीधा ऋषिकेश से मुंबई।  इनि गढ़वाल दर्शन का अन्य गढ़वाली जनानी बि ऐ छा।  अर एक विशेषता या छे कि 80 प्रतिशत गढ़वाली ढांगू (उदयपुर। लंगूर अजमेर सब ) , बदलपुर ,का छा , कुछ मौ पैनों , बणेलस्यूं , मनियारस्यूं  असवालस्यूं, चौंदकोट, पयासु   वळ बि छा। याने दक्षिण गढ़वाळयूं  बहुमत।  ढांगू (मतबल अजमेर , लंगूर , शीला ) वळुं अधिपत्य त अबि बि बरकरार च। आज बी कुकरेती इक बहुमत का करीब ही छन।  निथर रिस्तेदार मिलैक त बहुमत ही च। तो एक हैंक से रिस्तेदारी या अन्य संबंध का मामला से बि कुछ हद तलक गढ़वाली भोजन संस्कृति इख अबि बि बचीं च।  बार त्यौवारौ दिन स्वाळ -भूड़ा बंटण अर अन्य दिन सागै कटोरी कु आदान प्रदान अबि चलणु रौंद।
   हां त विस्तृत ढांगू वळुं अधिपत्य हूण से , मकरैणी दिन बि भोजन संस्कृति कुछ हद तक अबि बि ज़िंदा च।
     सन 1971 -75 मा मक्रैणी मतलब छौ खिचड़ी संग्रांद।  म्यार पिता जी तैं सूंटै खिचड़ी पसंद छे तो हमर इक बूबा जीक ज़िंदा रौण तक मक्रैणी दिन सूंटै खिचड़ी बणदि छे।  अर जौंक इक उड़दै खिचड़ी बणदि छै तो खिचड़ी आदान प्रदान बि ह्वे जांद छौ तब हमर ब्वे या बुबा लोग भोजन आदान प्रदान तै बुरु नि मानदा छा।  चूंकि कुकरेती , जखमोला या बलोदी गंगाड़ी छन (इन मथि मुलक्या सर्यूळ बुल्दन ) तो हम भात का मामला मा ज्यादा संवेदन शील बि नि छंवां।  त हमर इक नगर गाँव,  असवाल स्यूं का चौहान जी या जखनोळी गाँव , मनियारस्यूं का नेगी जीक इखन खिचड़ी ऐ बि जांद छौ तो हम खै लींद छा।  तो वै बगत मक्रैणी दिन चार पांच किसमौ खिचड़ी खाणो सुवसर मिल जांद छौ।
   अब चूंकि मेरी माँ का उमर की जनान्युं मा मेरी माँ अर खमण की बोडी  (स्व कृष्ण दत्त बडा जी की धर्मपत्नी ),  जैं गां अजमेर की बिष्ट्यांण भाभी ही बचीं छन अर बोडी व बिष्ट्यांण भाभी  बि अब गढ़वाल दर्शन म नि रौंदन त खिचड्या संग्रांद अब पुलाव या बिरयानी संग्रांद तक सीमित ह्वे गे या बंद ही समजो।
     मेरी माँ कु जब तक राज छौ त खिचड़ी , झुळळी का अलावा स्वाळ -भूड़ा आवश्यक छा।  अब धीरे धीरे ना खिचड़ी महत्व रै गे ना स्वाळ -पक्वड़ की।  अब त्यौहारौ गंध लगाणो बान गुलगुला बण जांदन अर पुलाव या   बिरयानी।
     भौत साल तक गढ़वाल दर्शन मा तिल्लुं लडूं क्वी ख़ास महत्व नि छा किन्तु अब तिल्लुं लडू बि आण लग गेन किन्तु बरानामौ कुण। फिर बि द्वी चार घौरम स्वाळ -पक्वड़ बण इ जांदन।
   
      बच्चा लोग देखादेखी पतंग खिल्दा छा पर अब पतंगबाजी बि कम ही ह्वे गे।   नौनी अधिक ह्वे गेन त पतंगबाजी बि समाप्ति ही समजो।
 


14/1 / 2018, Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India ,
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