Author Topic: Today's Thought - पहाड़ के मुहावरों/कथाओं एवं लोक गीतों पर आधारित: आज का विचार  (Read 45420 times)

पंकज सिंह महर

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गोपाल बाबू गोस्वामी का यह गाना उत्तराखण्ड की एकता जो प्रदर्शित करता है-
जै-जै हो, बद्रीनाथा, जै काशी-केदार, जै-जै हिमाला,
तथा

हिमाला को...हिमाला को....।
हिमाला को ऊंचा डाणा, ऊंचो तेरो नौ,
छबीलो गढ़वाल मेरो, रंगीलो कुमाऊं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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दिन उन जाना रेया
मेरो पहाड़ माँ बहिना - बुत देखिया रेया

पंकज सिंह महर

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वनों की रक्षा करने के लिये

बांजा नी काट, बांजा नी काट,
हमरौ यो धुर जंगला, बांजा नि काट।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Himala ka uncha dana
payro mero gaav
Chabeelo Gardwal Mero Rangeelo Kumoan

पंकज सिंह महर

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गिरीश तिवारी "गिर्दा" की मर्मस्पर्शी कविता


आज हिमाल तुमन के धत्यूंछौ, जागौ-जागौ हो म्यरा लाल,
नी करण दियौ हमरी निलामी, नी करण दियौ हमरो हलाल।
विचारनै की छां यां रौजै फ़ानी छौ, घुर घ्वां हुनै रुंछौ यां रात्तै-ब्याल,
दै की जै हानि भै यो हमरो समाज, भलिकै नी फानला भानै फुटि जाल।
बात यो आजै कि न्हेति पुराणि छौ, छांणि ल्हियो इतिहास लै यै बताल,
हमलै जनन कैं कानी में बैठायो, वों हमरै फिरी बणि जानी काल।
अजि जांलै कै के हक दे उनले, खालि छोड़्नी रांडा स्यालै जै टोक्याल,
ओड़, बारुणी हम कुल्ली कभाणिनाका, सांचि बताओ धैं कैले पुछि हाल।
लुप-लुप किड़ पड़ी यो व्यवस्था कैं, ज्यून धरणै की भें यौ सब चाल,
हमारा नामे की तो भेली उखेलौधें, तैका भितर स्यांणक जिबाड़ लै हवाल।
भोट मांगणी च्वाख चुपड़ा जतुक छन, रात-स्यात सबनैकि जेड़िया भै खाल,
उनरै सुकरम यौ पिड़ै रैई आज, आजि जांणि अघिल कां जांलै पिड़ाल।
ढुंग बेच्यो-माट बेच्यो, बेचि खै बज्याणी, लिस खोपि-खोपि मेरी उधेड़ी दी खाल,
न्यौलि, चांचरी, झवाड़, छपेली बेच्या मेरा, बेचि दी अरणो घाणी, ठण्डो पाणि, ठण्डी बयाल।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मुश क जान जाण रे
विराव क खेल. .

मतलब किसी की जान पर आफत और किसी का आनंद उठाना.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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इस गाने के लाइन मे कटु सत्य छुपा है.

आशमानी जहाज उडो
पछिलो घुराट
छेली ले सौराश जानो, चेलो ले परदेश

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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हिट बसंती नै जणू पहाडा
रंगीलो पहाडा मायालू पहाडा.

पहाड़ की सुन्दरंता की क्या कहना

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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आज का विचार.....

कितना सच...

" पहाड़ का पानी पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नही आती"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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पुरान पात ले झन न भए
और नयी पात ले लागन भए

इसका मतलब -- नयी पत्ती आ आना तय और पुरानी पत्ती का गिरना

 

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