Author Topic: Chholiya Dance - छोलिया नृत्य: युद्ध का प्रतीक नृत्य  (Read 54670 times)

पंकज सिंह महर

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Choliya Dance
 
Dating back to over a thousand years, the Chholiya Dance has its origins in the warring Khasiya Kingdom of Khasdesh, when marriages were performed at the point of the swords. They were united by the Chand kings who arrived' on the scene in the 10th century. In Nepal, the word Khasa is still asynonym for Kashatrya, and in Khasdesh, too, they took on the customs of the Rajputs, who were themselves honorary Kashatryas.

Keeping the old tradition alive, the Rajputs dance this at their weddings as a part of the marriage procession itself, led by the male dancers who go on dancing till they reach the bride's house. Performed by the Rajputs with sword and shield in pairs, the drummers are usually Harijans called Dholies, while the Turi and Ransing are played by Bairagis, Jogis or Gosains. The Turi and Ransing are typical Kumaon instruments. Perfectly synchronized, and marked with jumps and turns of the body, the dancers show several sword-fighting feats. Attired in the material costumes of ancient warriors, the flashing swords and shields, along with the war-like music, huge red flag with various animal symbols stuck on it conveys fear, joy, awe and wonder, through eyes, eyebrows and shoulders, creating at the same time, the impression of group advancing for an attack.

The costumes consist of a Churidar Pyjama, one long Chola, one cross belt, one belt round the waist, pattis on the legs and a turban. With' Chandan, or Sandalwood paste, and red vermillion they decorate their face, while on the ears are ear-rings, a bronze shield and real sword complete the ensemble. Specially trained, though dancing is not their profession, these Rajput dancers come from the Champawat and Almora. The full team consists of 22 person, eight of which are dancers, and 14 musicians. Cultivators all, they assemble when invited.

रंगीलो गेवाढ़

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सर, छोलिया निर्त्य और  सरंकार एक ही होता है क्या ?

पंकज सिंह महर

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कुमाऊंनी संस्कृति में बदल गया छलिया नृत्य


पिथौरागढ़। कुमाऊंनी बारातों में ढ़ाल और तलवार के साथ सबसे आगे नाचते दो नृतक यहां राजाओं द्वारा युद्घ कर हरण कर सुन्दरियों को जीतने की परम्परा को दिखता है। 60 के दशक तक बारातों में ही नजर आने वाला छलिया नृत्य पहली बार 1963-1964 में मंच पर आया और धीरे-धीरे यह नृत्य कुमाऊं की संस्कृति के साथ जुड़ा।

छलिया नृत्य पहली बार 26 जनवरी को दिल्ली के ताल-कटोरा में मंच पर दिखाया गया इस नृत्य में प्रदर्शन करने के लिए पिथौरागढ़ के महरखोला से दो छलिया तथा रं संस्कृति के कुछ कलाकार संस्कृति कर्मी डूंगर सिंह ढ़करियाल के नेतृत्व में दिल्ली गये और यही वह समय था जब छलिया नृत्य कुमाऊं की विशिष्ट पहचान बन गया।

भीड़ भरी बारात में अपने पहनावे से ही पहचाने जाने वाले छलिया सर पर तुर्रेदार पगड़ी पहनते है, शरीर पर घुटनों तक लम्बा पूरी बांह का घेरेदार झगुला, कमर में फेंटा और चुड़ीदार पयजामा पहने हाथ में ढ़ाल और तलवार पकड़े छलिया मध्यकालीन भारत के योद्घा से लगते है। संस्कृत कर्मी पद्मा दत्त पंत कहते है कि छलिया नृत्य शुरू होने का कोई प्रमाण नहीं है लेकिन नगाड़ों की विविध धुनों तथा उन धुनों पर छलियाओं के नचाने के विभिन्न तरीकों से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह कला कम से कम छह सौ वर्ष पुरानी तो होगी।

राजाओं द्वारा सुन्दरियों का हरण कर विवाह रचाने का भारत में इतिहास रहा है। भीष्म द्वारा कशिराज की कन्याओं तथा कृष्ण द्वारा रुक्मणी का हरण महाभारत की प्रसिद्घ कथायें है मध्यकाल में पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता के हरण ने तो भारत के इतिहास का रुख ही बदल दिया था। छलिया नृत्य इस परम्परा के जीवंत प्रतिक के रूप में आज भी है।

आज भी कुमाऊं में विवाह के दौरान कन्या के घर के निकट पहुंचने पर कन्या का भाई बारात रोकता है और इसके बाद वर पक्ष तथा कन्या पक्ष में वाद्य यंत्रों को बजाने की प्रतियोगिता होती है। शुरुआती दौर में बड़े राजा ही इस परंपरा को चलाते थे लेकिन समय के साथ ही छोटे राजाओं ने भी अपनी बारातों में छलिया नृत्य की परंपरा शुरू की और आज यह नृत्य कुमाऊं की संस्कृति बन गया।

पंकज सिंह महर

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hi

दीपिका जी नमस्कार,
    मेरा पहाड़ पोर्टल पर आपका स्वागत है, आप पिथौरागढ़ में किस जगह से हैं, इसका पूर्ण विवरण कृपया निम्न लिंक पर दें-
http://www.merapahad.com/forum/index.php?topic=2.0
अपने गांव की विस्तृत जानकारी आप यहां पर दे सकती हैं
http://www.merapahad.com/forum/index.php?topic=255.0

पंकज सिंह महर

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इस नृत्य के बारे में हमारे तरुण दा ने निम्न लिंक पर एक विस्तृत लेख लिखा है-

http://www.readers-cafe.net/uttaranchal/2008/02/07/chholiya-kumaoni-folk-dance-of-uttarakhand/


जरुर पढे़

पंकज सिंह महर

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deepikakholia

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hi mujhe chholiya dance bahut pasand hai m born n broughtup in delhi but i m realy very much in love with my culture.... chholiya rocks...

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Deepika ji aapko Pahad ki bahumulya jaankaariyan is forum main alag alag board pai uplabdh hain. Apna intro kripya Introduction ki thread main de.

hiii

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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yeh lijiey kuch aur pics:


 

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