Author Topic: Folk Songs on Market,Fairs & Jeeja Saali etc - बाजारों, मेलो एव जीजा साली पर गीत  (Read 12250 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bhishma Kukreti
1 hr ·

सतपुळि बजार क्यों आंदि ? -- गढ़वाली लोक गीत

इंटरनेट प्रेजेंटेशन -भीष्म कुकरेती

सतपुळि बजार क्यों आंदि
मेरि ब्वारी गौमती या ?मेरि ब्वारी गौमती या ?
सतपुळि बजारै आन्दु
मी तुमारा बान या, मी तुमारा बान या
काटी च जमणि ये ब्वारि , काटी च जमणि ये ब्वारि
मी तै नि मिलणो ए ब्वारि ,
सबुकी समणि , या सतपुळि
तमाखू का कोया ए जिवरो, तमाखू का कोया ए जिवरो,
डौर छाई तुमतै त पैलि
केकु ज्वाड़ माया या
सतपुळि बजार क्यों आंदि
बामणु कि पोथी ए ब्वारि , बामणु कि पोथी ए ब्वारि ,
भली बिराज दींदि ए ब्वारि
तेरी काळि धोति या
सतपुळि बजार क्यों आंदि
स्वैरि जाली सौँळि जिवरो , स्वैरि जाली सौँळि जिवरो ,
कन बिराज दींदि जिवरो ,
बुलबुलूं कि कौंळ या
सतपुळि बजार क्यों आंदि
मेरि ब्वारी गौमती या ?मेरि ब्वारी गौमती या ?

Curtsey _ Shri Totaram Dhoundiyal Dhad magazine June 1990

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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By Bhisham Kukreti.

क्रान्ति - जन कविता गढ़वळि कवितौं मा परिवर्तन लैन
कवि -नेत्र सिंह असवाल

--

प्रस्तुत है नेत्र सिंह असवाल की सन 1977 में रची एक कविता जो गढ़वाली कविता में परिवर्तन का एक उदाहरण है। कविता विषय और कवित्व पक्ष के हिसाब से अंतर्राष्ट्रीय कविताओं की टक्कर की कविता है -

क्रान्ति !
क्रान्ति जूनीs बगडौ खबेश नी च
जु अचणचक्कि परगट ह्वेकि
फरकै द्या पोड़ -क-पोड़
लमडै द्या सभि ल्वाड़ा
अर निशाणौ बदल जाण नी छ प्रमाण ----
बुगठ्या -खवा धुधरट्या द्यबतौं बदल जाणु !
जन दाढि मुंडि दीणि
नी छ गारंटी -वींकि नि जमणै दुबारा।
जणदु छै
क्रान्ति थैं जनम दीणा खुण
छ्वाप दीण प्वड़द -मन्द्राचली भारु /अपणा कांधों मा
छवळण पोड़द -समोदर का समोदर
दीण प्वड़द -नीलकंठी परीक्सा
सैण प्वड़द -ब्वे -बुबा याद कराणवळि प्रसव वेदना
अर फिर /वीं थैं अपणा खुटों पर
खड़ु हूण लैक बणाण तक
बिलण प्वड़दीं हजारों -हजार पापड
होम करण प्वड़दीं - अपणा मनै गाणि /सुपिना -दुबिना
नि समझि सकदु
क्वारा छिरक्वा कुर्सीखोर !
तु यु सब कुछ नि समझि सकदु !

Copyright@ Netra Singh Aswal, New Delhi


जिन कविताओं ने गढ़वाली कविताओं शक्ल -सूरत-शैली बदली !
अस्सी के दशक में कन्हया लाल डंडरियाल , जया नन्द खुकसाल बौऴया , रघुवीर सिंह अयाल, नेत्र सिंह असवाल , विनोद उनियाल , पूरण पन्त 'पथिक' ललित केशवान , अबोध बंधू बहुगुणा , प्रेम लाल भट्ट , गिरधारी लाल कंकाल सरीखे कवियों ने गढ़वाली कविता की शक्ल , शरीर , शैली , भौण , कवित्व पक्ष , विषय में परिवर्तन का विगुल बजाया और गढवाली कविताओं को आधुनिक जामा पहनाया।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bhishma Kukreti
19 hrs ·

तिला धारा बोला
(एक दुड़ो गढ़वाली प्रेम लोकनृत्य गीत )

इंटरनेट प्रस्तुति -भीष्म कुकरेती

तिला धारा बोला -!
गौरा दे भली बांद दे ,
तिला धारा बोला झम।
झंगोरा को दाऊँ -गौरा दे झंगवरा को दाऊँ
सड़को की घसेरी , क्या छ नाम तेरो झम।
बिराळा का भाऊँ -गौरा दे , बिराल़ा का भाऊँ -गौरा
बाटा का बटोई बटोई
गौरा मेरा नाउ झम।
तिला धारा बोला झम।
पाथी छौं -लंगड़ा-गौरा दे , पाथी छौं -लंगड़ा-गौरा दे
घास काटण छोड़ , गौरा दे
औ मेरा दगड़ झम ।
जोगी सी कांडा को मैन्दरु
कै गौं को छे बटोई . खांकल्य़ा राडो को झम।
बूती जालो सूंट़ा -गौरा दे बूती जालो सूंट़ा -गौरा दे
देश पोडि जौंला ला गौरा दे
बैलूं जसी जुंटा झम।
नाउँ धारे शोभा गौरा दे -नाउँ धारे शोभा गौरा दे
पिंगळी मुखडी गौरा दे , लाल बिंदी शोभा झम।
झंगोरा की बोट मैन्दरु , झंगोरा की बोट मैन्दरु ,
बल बिराज देंद मैन्दरु तेरो शिकारी कोट -झम।
अगेलि को रुआँ गौरा दे , अगेलि को रुआँ गौरा दे
खचरु मध्ये उड़े गौरा दे , सिगरेट को धुंआ झम।

तुमड़ी को घ्यू छ मैन्दरु ,तुमड़ी को घ्यू छ मैन्दरु
कांडाखाल बटी मैन्दरु , त्वै मा मेरु ज्यू झम।
बाखरा की ल्वेई गौरा दे ,बाखरा की ल्वेई गौरा दे
राम न जम्पे सीता गौरा दे , मी जम्पदु त्वेई -झम ।
घुगति को मैण -गौरा दे ,घुगति को मैण -गौरा दे
कै भागी ह्वेली गौरा दे , मुखडी को मोल -झम।
चिलमी को पीच मैन्दरु चिलमी को पीच
रुपया देण कु मैन्दरु , तेरो सगोर नी च -झम
बखरो बुडियों छ -गौरा दे बखरो बुडियों छ
तेरा दीनू देखि गौरा दे , सरील उड़ियों छ -झम।
ढकरी पालाण -गौरा दे , ढकरी पालाण -गौरा दे
छोड़ गंगा पार गौरा दे , आउ मेरा सलाण -झम

---------------------------------
संदर्भ , शिवा नन्द नौटियाल , गढ़वाली लोकगीत , श्याम बुक डिपो , देहरादून

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bhishma Kukreti
July 17 at 12:44pm ·

सतपुळी मोटर बौगिन खास

(इंटरनेट प्रस्तुति एवं व्याखा : भीष्म कुकरेती )
(सन्दर्भ:डा शिव प्रसाद नैथाणी लोक संस्कृति , उद्गाता , 2011, पृष्ट 87 -118 )

सतपुळी मोटर बौगिन खास

द्वि हजार आठ भादों का मास,
सतपुळी मोटर बौगिन खास ।
औडर आये कि जाँच होली,
पुर्जा दिखण कु जांच होली।
अपणी मोटर साथ लावो,
भोळ जांच होलि अब सोई जावो।
सेइ जौंला भै बंधो बरखा ऐगे,
गिड़ गिड़ थड़ थड़ सुणेण लैगे।
गाड़ी छत मा अब पाणी ऐगे,
जिकुड़ि डमडम कमण लैगे।
या पाणी नयार कन आये मैकु,
जिया ब्वे बोलणु नी रोणु मैकु।
जिया ब्वे बोलणु नी रोणु मैकु।।
द्वि हजार आठ भादों का मास,
सतपुळी मोटर बौगिन खास ।
It was August - September 1951.
The Motors washed away by flood.
There was order that the officer would check the motors.
There was order that the officer would check the components of motors
There was to bring all motors.
The officers informed that there would be checking next day.
He advised to sleep.
While we were sleeping, there was a heavy rain.
The rain water reached up to roof of motors.
We were afraid.
The Nayar River flood washed away all motors.
O mother! Don’t weep for me.

The said folk song is still popular in Garhwal.

Copyright (Interpretation) @ Bhishma Kukreti, 25/06/2013

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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By Bhisham Kukreti

डांडा चली जौंला चकोर (श्रृंगार, प्रेम लोक गीत )
(Garhwali , Kumaoni Love Folk Song )

( साभार - डा नन्द किशोर हटवाल )

इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

डांडा चली जौंला चकोर
ये घामिला बार चकोर
ये चैत बैसाख चकोर
तू स्याळी मी भीना चकोर
गौड़ भैंस्यों दगड़ी चकोर
कन भलो लगंद चकोर
निति का बौडर चकोर
कन स्वाणो लगंद चकोर
रिम खिम बौडर चकोर
हर्याळी घूरा चकोर
उन्याणी पातल चकोर
पंवाळी कांठा चकोर
बुरांशी पातल चकोर
निंगाली छमा चकोर
सौ हाथ सागर चकोर
ये चैत बैसाख चकोर
मुल्या मुल्या घाम चकोर
ठंडी ठंडी हवा चकोर
बुग्या बुग्या घास चकोर
छूम्यां छुम्या पाणी चकोर
कन भलो मन्यान्द चकोर
ये चैत ....
कन ऋतु जाण्यांदी चकोर
बारा ऋतु जाण्यांदी चकोर
बण प्वथल्यों बासंदी चकोर
बण फून्यों फुलंदी चकोर
डांडा चली जौंला चकोर
ये घामिला बार चकोर
भैंस्यों का दगड़ा चकोर
भैंसवाळा ह्वेक रला चकोर
तू घास काटली चकोर
मी पूळी बांधलु चकोर
तू रवटि पकैली चकोर
मी भुज्जी बणौलू चकोर
तू छांछ छवोळली चकोर
मी नौणि गाडलू चकोर
डांडा चली जौंला चकोर
ये घामिला बार चकोर
तखी ली जौंला भैंसी चकोर
डांडा चली जौंला चकोर

कन भलो मन्यान्द चकोर
ये सौण अर भादों चकोर
चौमास्यों का दिन चकोर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मानंद -बिस्वासी (श्रृंगार, प्रेम लोक गीत
(Garhwali , Kumaoni Love Folk Song )

( संदर्भ -नरेंद्र सिंह भंडारी व डा नन्द किशोर हटवाल )

इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती

मानंद , लो तामा की पीटण
मानंद , दूरे बे पछ्याणदी,
मानंद , तेरी झूमण हीटण।
बिस्वासी ,, देबी को तगत
बिस्वासी , वै तू मेरी जोग्याण,
बिस्वासी , मै च तेरु भगत।
मानंद, लो कोदु बोयूं रेक
मानंद, लो बामणो का खोळा
मानंद, भलू च बिगरौ बैख
हे चखुली बाबूला की कुची
हे चखुली माला खौळा दिख्यांदी
विस्वासी, सबी बानो मा उचि
मानंद, काटी जालो प्याज।
मानंद, ब्याखुनी ह्वे गे
मानंद,यखी रै आज।
विस्वासी, चौंळु भरी सेर
विस्वासी, रात रैणी बाना
विस्वासी, आयूँ मै ब्याखुनि देर।
विस्वासी,हे तिमली को पात
विस्वासी, मै अज्यों नि खाई
बिस्वासी , तेरो पकायुं भात।
मानंद, हिरण को गात
मानंद, कनै खालो टीपाउ
मानंद, तेरी बामणे जात
विस्वासी, हे साँदण की सौंळी
विस्वासी, तेरी माया खातिर
विस्वासी, तोड़ी मैंन जनेऊ की कोंळी
मानंद, लपलप कोई
मानंद,लोग राम जपदा
मानंद, मैं जपदु तोई

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मयूर नृत्य गीत : एक गढ़वाली लोक नृत्य गीत की छटा
इन्टरनेट प्रस्तुति : भीष्म कुकरेती
मूल स्रोत्र : केशव अनुरागी
डा शिवा नन्द नौटियाल : गढ़वाल के लोक नृत्य-गीत

ह्युंचळी डांड्यु की चली हिंवाळी कन्कोर
रंगमतु ह्व़े , नचण लगे मेरा मन का मोर
धौळी गंगा का छाल़ू पाणी
भगीरथी कजोळ
देवप्रयाग रघुनाथ मन्दिर
नथुली सि पंवोर
ह्युंचळी डांड्यु की चली हिंवाळी कन्कोर
रंगमतु ह्व़े , नचण लगे मेरा मन का मोर
आरू, घिंघारू , बांज , बुरांस
सकिनी झका झोर
लखिपाखे बण मांग बिरड़ी
चकोरी की चकोर
ह्युंचळी डांड्यु की चली हिंवाळी कन्कोर
रंगमतु ह्व़े , नचण लगे मेरा मन का मोर
डांड का रसूली कूळईं
झुप झुपा चंवोर
ऊंची डांडी चौडंडी बथों
गैरी गंगा भंवोर
ह्युंचळी डांड्यु की चली हिंवाळी कन्कोर
रंगमतु ह्व़े , नचण लगे मेरा मन का मोर
बसुधारा को ठंडो पाणी
केदार को ठौर
त्रिजुगी नारेण तख
बद्री सिर मौर
ह्युंचळी डांड्यु की चली हिंवाळी कन्कोर
रंगमतु ह्व़े , नचण लगे मेरा मन का मोर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कथगा खैल्या

कवि :नरेन्द्र सिंह नेगी (पौड़ी गाँव, पौड़ी )

1- Stanza
कमीशन कि मीट भात, रिश्वत को रेलों
कमीशन कि शिकार भात, रिश्वत को रेलों
रिश्वत को रैलो रे ...
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ ..
कथगा जि खैलो रे ...
यनि घुळणु रैल्यो , कनकै पचैल्यो
दुख्यारो ह्व़े जैल्यो रे
कमीशन कि मीट भात, रिश्वत को रेलों
रिश्वत को रैलो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza -2
घुण्ड -घुन्ड़ो शिकार -सुरवा कमर-कमर भात रे
भात रे भात बासमती भात
घुण्ड -घुन्ड़ो शिकार -सुरवा कमर-कमर भात रे
इथगा खाण -पचाण तेरे बसै बात रे ..
मैगे की मरीं जनता ..हे जनता ..
कनक्वे बुथैल्यो रे...
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza -3
नयो नयो राज उत्तराखंड आसमा छन लोग
लोग जी लोग आसमा लोग
नयो नयो राज उत्तराखंड आसमा छन लोग
बियाणा छन डाम यख लैन्दो को छ जोग
कुम्भ न्हेगे भूलू ..हे भूलू ...
अब आपदा नहेल्यो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ

Stanza -4

नियुक्त्युं की रस मलाई , ट्रांसफ़रों को हलवा
हलवा रे हलवा सोहन हलवा
नियुक्त्युं की रस मलाई , ट्रांसफ़रों को हलवा
माना कि भागमा तेरा , चेलों को जलवा
चेलों को जलवा , चेलों को जलवा
बिंडी मिट्ठो नि खलौवु त्यूँ सूगर बढी जालो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza - ५
छप्पन डामों की डड्वार कै कैन बांटी
बांटी रे बांटी कै कैन बांटी
छप्पन डामों की डड्वार कै कैन बांटी
स्टरडिया की रबडी कथगौन्न चाटी
कथगौन्न चाटी कथगौन्न चाटी
बारम चुनौ छ भूलू हे भूलू ..
हंसल्यो कि रोल्यो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza- 6
कमीशन को डेंगू रोग . सर्यीं दिल्ली मा फैल्युं
फैल्युं रे फैल्युं रे दिल्ली मा फैल्युं रे
कमीशन को डेंगू रोग . सर्यीं दिल्ली मा फैल्युं
नेता अफसर लीगेनी भोरी भोरी थैल्युं रे
भोरी भोरी थैल्युं, भोरी भोरी थैल्युं
भोरे गेन बिदेसी बैंक ..हे बैंक
भोरे गेन बिदेसी बैंक .अब कख कुचोल्यो रे
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ
Stanza -7
रास्ट्रमंडल खेल टू जी घोटाला
घोटाला रे घोटाला टू जी घोटाला
रास्ट्रमंडल खेल टू जी घोटाला
अरबों .खरबों को माल लगेयाली छाला
लगेयाली छाला , लगेयाली छाला
ये देस की लाज प्रभो कनक्वे बच्योले रे ....
बस कर बै ! बिंडी ना सपोड़ अब कथगा खैल्यौ

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गढवाली -कुमाउनी तलवार लोकनृत्य गीत

इंटरनेट प्रस्तुति -भीष्म कुकरेती
१- डांडा सि शेर: गढवाल का एक लोक तलवार नृत्य गीत

भुला ! डांडा सि शेर छंवा
कमल सि फूल छवां
बयाळी सि बाग़ छवां
पर इतनी सि बात मा
तुम क्या वै माल सणि
सर नि करी सकदवां ?

२- झंकरू बीर भड़ : गढवाल का एक लोक तलवार नृत्यगीत

झंकरू रे ! तू माई मरदान का चेला
जोंकी मासी मॉस बंद चला कोट ल़ो बाणछन
जौका हे लम्बीझार गंगा चली वाला
स्योणियाँ बाण छन
लोहा गिरी बाण
शश्त्र वस्त्र सौंकली का जामा छन
झंकरू ! ऐराड़ा माई मरदान का चेला
(संदर्भ -डा शिवानंद नौटियाल )

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मेको पाड़ नि दीण पितैजी (गढ़वाली लोकगीत )


इंटरनेट प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती


मेको पाड़ नि दीण पिताजी मेको पाड़ नि दीण पिताजी
उख पाड़ी लोग खराब होंदन
मेको पाड़ नि दीण पिताजी उख पाड़ी लोग खराब होंदन
मेको पाड़ नि दीण पिताजी
उख फाणु मा बाड़ी खान्दन
मेको पाड़ नि दीण पिताजी उख फाणु मा बाड़ी खान्दन
मेको पाड़ नि दीण पिताजी
उख मा बैणि की गाळी दीन्दन
मेको पाड़ नि दीण पिताजी उख मा बैणि की गाळी दीन्दन
मेको पाड़ नि दीण पिताजी उख पाड़ी लोग खराब होंदन

 

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