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Folk Stories from Garhwal - गढ़वाल के लोक कहानियां

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Bhishma Kukreti:

जमरखोळी कूंतणी हद्दम कनकैक  आयी ? एक लोमहर्षक लोक कथा

लोक कथा संपादन : आचार्य भीष्म कुकरेती

 कथा सुणाण  वळि  : श्रीमती सूमा देवी डबराल कुकरेती (मैत -कूंतणी )

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  डबराल स्यूं पट्टी म कूंतणी अर खमण  द्वी गां लग्गा बग्गा क  गौं छन , दुयुंक साड़ी कखम खत्म हूंदी कखम शुरू हूंद पता लगाण कठण  च।  डबराल स्यूं म तकरीबन हरेक गां  डबराल बाहुल्य गांव इ छन अपवाद बिसरी जावो।  खमण कुकरेती बाहुल्य गां च , बल इन बुल्दन बल डबराळुंन  खमण  भेंट या घर जंवाई म कुकरेत्यूं  तै दे बल (ग्वीलक प्रथम पुरुष बृष जी ? ) .

  कूंतणीम एक सारी च जमरखोळी जो कूंतणी अर खमण अर खमणक हद्द पर च।  बल  बूड  बुड्या   बुल्दा  छा बल कबि जमारखोळी खमण वळुं  जमीन छे बल अब त कूंतणी वळुं  च।

   बल इ राम दा  कन कन  मनखिण  हूंदन हैं धौं  ! बल एक छे हम डबरालुं दादि भड्डु डबराल जैंक मैत खमण  थौ।  क्वी बुल्दो  बल भड्डू तै खमण से प्रेम नि छौ बल त क्वी बुल्द बल वीं दादी तैं  जमरखोळी से  कुछ बिंडी इ प्रेम छौ।  भड्डून खमण वळुं  तै जमरखोळी कूंतणी वळुं  तै दीणै भौत मिन्नत कार।  भड्डू दादि खमण येम गे , तैम गे , कैम  नि  गे पर क्वी बि खमण वळ जमर खोळी कूंतणी वळुं  तै दीणो तयार  नि  ह्वे।  हूणी तै कु क्या भीमाता बि नि टाळ सकदी।

   जब खमण वळुं न जमरखोळी कूंतणी  वळुं दीणो साफ़ ना बोली दे त बल वा ददि  निरसे गे बल।  एक दिन गे वा भड्डू ददि जमरखोळी ऐंच अर खट चलाई वींन पैनी थमाळी अपण मौणी पर  अर धळ से मौणि  अलग कर दे।  मोरद दें  भड्डू  ददि खमण वळुं  तै सराप  दे गे बल क्वी खमण वळ नि खैन यी खोळी अनाज।

   हौळौ  बगत खमण वळ  जमरखोळी  हळयाणो गेन।  कैक हळयाण अर कैक बल्द जुतण।  हौळ , निसुड़ , ज्यू पर सब जगा बनि बनिक गुरा ऑवर , पिंगळा पता नई कटना गुर्रा धौं।  खमण वळ बगैर हळयां जमरखोळी बिटेन वापस ऐ गेन।  सब समजी गेन  बल भड्डू न सराप  दियाल।   तब खमण वळुं न जमरखोळी  कूंतणी वळुं  तै  दे द्याई।  इ राम दा  ज़िंदा  म इ  दे दींद त भड्डू ददि बि दिखदी बल। 


 

Interpretation Copyright@ Acharya Bhishma Kukreti, 2018

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Bhishma Kukreti:

छयूंत्यूं  दगड़ भेळ लमडण

सलाणी लोककथौं जणगरु  :  आचार्य भीष्म कुकरेती

कथा सुणाण वळ  : स्व . श्री मुरलीधर अम्बादत्त कुकरेती (जसपुर ढांगू  )
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   या कथा गढ़वाळै सार्वभौमिक लोक कथा च।
    अर बल जन कि बल हरेक अडगैं /क्षेत्र म लाटा कालूं  गाँव हूंदन हमर जिना  बि एक लटंग नामौ गाँव थौ।  बल अब  त क्यांक लटंग सब साब बणी गेन।  बल तबाकि बात च बल जब लालटैन फालटैन नाम नि सूणी थौ।  इ राम दा  ! तब दिवळ छिल्लुं जमन थौ।   जुत्त ? कैपर लगाण छौ जुत्त।  केक जुत्त ? हां त बुन्याल बल मि लटंग गौं कथा लगाणु  छौ बल जै गाँव म हुस्यार मिलण इनि  छौ  जन बिरळ औंर अर तिमला फूल।  हाँ हाँ त्यार सौ बल तै लटंग गौं म सब लाटा  काल ही था बल।
  हां त एक दैं जड्डुं दिन रै ह्वाल सैत हां इनि दिन रै ह्वाल।  लटंग गां  वळ छयूंती कट्ठा करणो कालु डांड गेन बल।  हां त बुन्याल  बल भल नामो बि हर्चन्त ह्वे  तौंकुण ! डांडो नाम बि धार जौन कालु
डांड।  काळों डांड ना।  कालु डांड।  सब लोग मवरां जण बच्चों समेत पोंछि गेन कुंळै डांड मतबल कालु डांड।  ये ब्वे क्या दिन रै ह्वाल भै जब सब काम छोड़ि छ्यूंती कट्ठा करणो जांद रै होला।
  जब सब कालु डांड पौंचेन त तौं लाट कालूं तैं एक बड़ो कुंळै उच्चु डाळ दिखे जख पर छ्यूंत्यूं झुम्पा पर बि झुम्पा लग्यां छा। अर कुंळैं डाळ बि पुट्ट भ्याळ पर।
  क्या कुंळैं हूंद रै  ह्वाल तब।  अब त  रणी दे।  सबुंन सकड़ पकड़ कार बल कुंळै डाळ काटे  जाव अर तब छयूंती तुड़े जाल।  डाळ भेळ जोग नि ह्वावो तो कुछ लोगुंन अपण क्र पर डुडड़ बांधिन अर फिर डुडड़ कुंळै डाळ क ग्वाळ पर बाँधी दे।  कुछ लोग कुलाड़ीन कुंळै डाळ धळकाण मिसे गेन।  क्या पैनी कुलाड़ि रौंद रै होली हैं तब।  बस मिनटों म डाळ चड़ चड़ करदो भेळ जोग ह्वे गे अर जु डाळ पर बंध्या  छा  सब भेळुन्द जोग ह्वे गेन  जु मथि रै गे  छा ऊंन स्वाच जु भेळ जोग ह्वेन ऊंन सब छयूंति ली जाण अर बिना अगवाड़ी पिछाड़ी सोचिक सबुंन भेळुंद छलांग मारी दे अर क्या बुन  भग्यान ह्वे गेन।
 बूबा कबि नि दीण बेटी लाटा कालों गां। 


संर्दर्भ - भीष्म कुकरेती , (1960 ) गढ़वाल की लोककथाएं , बिनसर प्रकाशन , दिल्ली

Interpretation Copyright@ Acharya Bhishma Kukreti, 2018.

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Bhishma Kukreti:

गौड़ी अर भूत
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लोक कथा संकलन  : आचार्य भीष्म कुकरेती



 कथा सुणाण  वळ : स्व श्री बलदेव प्रसाद रघुवर दत्त कुकरेती 'मास्टर  जी ' (जसपुर ढांगू )

 
   कुज्याण कथगा साखी पैला छ्वीं छन धौं। एक सुखी गौं छौ।  इ राम दा तब बल सुखी रौंद छा बल।  इन बुल्दन बल एक दैं भूतुं रौळ बौळ मची गे।  भूत लोकुं तैं  डरावन  अर चैन छीन द्यावन।  दिन रात बस भूतूं आतंक बस आतंक।

    हरेक मौन भूत भजाणो बान क्या जतन नि कार हरेकन अपण पंडी जी से पूजा कराई  ंचाई क्या इख तलक बल कुखुड़  मारिन पर इन भुभरड़ जम बल भतूं पर फरक नि पोड़ उल्टां तौंक डराण बढ़ इ गे।

 लोग कवौंम गेन बल सौ सायता कारो।  कवौंन भूतुं तै डराई  धमकाई क्या मुठकाई पर केक डौर भूत और बि  उच्छेदी  ह्वे गेन अब त यी बुड्यों तै बि डराण मिसे गेन।  लोकुंन काखड़ , बिरळ क्या स्याळुं से सौ सायता मांग पर कुछ नि ह्वे भूतुं उत्पात बढ़दो जि गे।

   तब सब गौड्यूंम गेन  तै बचाओ।  गौड्यूंन सांत्वना दे बल सि  सब भूत भगाला।  सब गौड़ी गांवक सरद (सीमा ) पर खड़ ह्वे गेन।  जनि भूत ऐन तनि गौड्युंन भूतुं समिण  शर्त रख दे बल यदि तुम हम मादे कै बि गौड़ी पूछो बाळ गण देल्या त तुम गाँव भितर प्रवेश कौर सकदा निथर प्रवेश बंद। 

  भूत भूत ही ठैर ऊंन शर्त मानी अर ले एक गौड़ी पूछो बाळ गणन लगी।  केक गणन अर क्यांक गणन।  एक जब तलक कुछ बाळ गौणो  गौड़ी पूछ हलै द्यावो या भूत गणती  भूल जावन।  पता नी बल कै गैणा रात खुलिन धौं पर भूत एक इ  गौड़ीक पूछो बाळ नि  गौण सकिन।  हौर गौड़ुं बात त जाणी  द्यावो एक गौड़ी  से इ चकर खै गेन भूत।  भूतुंन हार मान दे बल।

भूत डौरन गाँव  छोड़ि इ नि गेन बल्कणम गौड्युं  से वादा कौरिक बि चल गेन   तब बिटेन कबि  बि क्वी मनिख गौड़ी पर लग्युं  हो तो वैपर कबि बि  भूत नि लगल बल।





संदर्भ

भीष्म कुकरेती (1984 ) गढ़वाल की लोक कथाएं , बिनसर प्रकाशन , नई दिल्ली -3 , पृष्ठ 33 -34

Interpretation Copyright@ Acharya Bhishma Kukreti, 2018

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Bhishma Kukreti:


 छिपड़ु  कूड़  कबि नि  बणदु


लोक कथा संकलन  : आचार्य भीष्म कुकरेती


 कथा सुणाण  वळ : स्व. श्री बलदेव प्रसाद रघुवर दत्त कुकरेती 'मास्टर जी ' (जसपुर )

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 भौत पुरण छ्वीं छन बल जब जीव जंतु आपसम छ्वीं लगान्द छा।  ह्यूंदु  बगत छौ बल।  त बल तख एक छिपड़ छौ बल तैक क्वी घौर न बॉस न क्वी घोल न कुछ।  जखि रात पोड़ी तखि  बास।  त एक रात स्यु छिपड़ु एक डाळी फ़ौंटम छौ सियुं।  निंद  बि इन कि क्या बुलण।  तबि कखि दूर डांडों म रात बरफ पोड़ी गे।  तखाकि ठंडी हवा इनै आयी अर छिपड़ पर ठंड लगण मिसे गे।  छिपड़न हाथ पैरूं बुट्ठी मरण शुरू कर दे।  अड़गटे क बुरा हाल छा तैक।  घोल जि हूंद त ह्यूंदा ठंड जि क्या लगद तै छिपड़ु तैं।  जब ठंड न बू हाल ह्वे गेन त तब छिपड़न कसम खैन सुबेर हूंदी घोल बणाल।

     सुबेर ह्वे त मुर्दार पड़्युं छिपड़ तै घोल बणानो कसम याद आयी पर छिपड़न स्वाच जरा घाम ऐ जाव त हथ खुट खुल जावन तब घोल बणालु।  घाम बि आयी त तै अळगसिन घड्याई बल जरा घाम तपे जाव त घोल बणालु।  घाम तपण से तैक हथ खुट्ट खुली गेन अर स्यु छिपड़ अब बर्बरु ह्वे गे।  अब तैन स्वाच बल जरा भोजन पाणी ह्वे जा त तब घोल बणाये जाव।  इनि करदा करदा दुफरा से रात ह्वे गे अब जि क्या घोल बणन छौ।  स्यु कै हैंक डाळौ फौन्टीम पोड़ी गे।  रात फिर  बरफ पोड़ी होली अर छिपड़ तै लगण बिसे गे।  तैन फिर से सुबेर लेक घोल बणानो  कसम खायी।  सुबेर ह्वे तै छिपड़न फिर स्वाच घाम आणो परान्त  घोल बणौलु , भोज उपरान्त घोल बणौलु , स्याम दै घोल बणौलु।  किलै बणन छौ घोल।

 फिर रात आयी  छिपड़ तैं ठंड लग छिपड़न घोल बणाणै कसम खायी अर दुसर दिन बि टालबरायी म घोल नि बौण।

 हूंद करदा कुज्याण कति दिन रात ऐन धौंरात छिपड़ घोल बणाणो कसम ल्यावो अर दिन म टालमटोळ कर द्यावो।

 एक रात ये छवाड़ बि जोरक ह्युं पोड़ गे।  इथगा हयूं पोड़ बल छिपड़ ह्यूं तौळ दबेक मोरी गे।  कुजातक छिपड़।  समय पर घोल बणै लींदो त  किलै मोरण छौ तैन  ह्यूं तौळ दबिक़।

बुबा जु बि काज करण हो समय पर पूरो करि ही दीण निथर छिपड़ जनि कुगति मिलदी हाँ। 


 

Interpretation Copyright@ Acharya Bhishma Kukreti, 2018

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  द्वी दुबस्ता ढिबरियूं  कथा


लोक कथा संकलन  : आचार्य भीष्म कुकरेती


 कथा सुणाण  वळि  : स्व. श्रीमती कुकरी देवी शीशराम कुकरेती (जसपुर ढांगू )

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    ( मीन जब गढ़वाल की लोक कथाये  कथाघळ म लेखी बल लोक कथाओं मुख्य प्रयोजन प्रबंध विज्ञान की शिक्षा च त कुछ समालोचकों न मेरो ये कथन की आलोचना कार।  बल लोक कथा  तै  विज्ञान व परबध दृष्टि से नि दिखे जै सक्यांद।  पर या कथा ज्वा बिनपढ़ीं  लिखीं जनान्युं रचित कथा त यी बताणी च बल लोक कथौं म प्रबंध विज्ञान एक आवश्यक अवयव च।  मेरी बड़ी ददि (बाबा जीक बोडी ) यीं  कथा तै हरेक गर्भवती युवती तै रोकी जरूर सुणांद छे )

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 भौत साल पैली कुज्याण कथगा सौण  पैली  धौं हमर गां मा द्वी द्यूराण  जिठाण ढिबरी छा - मयळी  अर गरगरी।  एक दै  बत्थ  छन बल द्वी  ढिबरी इकदगड़ी आशाबन्द (गर्भवती ) ह्वे गेन।  मयळि ढिबरी लौबाणि छे त गरगरी कुछ धुर्या जन छे।  मयळि जनि आशाबन्द ह्वे वा सैण भूमि म जावो , कै पाख पख्यड़ म नि चौढ़ धौं। मयळि ढिबरी हमेशा सुचणी रावो वींक बच्चा संत हो , अगनै पैथर दिखण  वळ हो। मयळि रोज भगवान तै याद करदी गे। मयळि ढिबरीन हौरुं दगड़ फ्वीं, फ्वीं , फ्वींफाट   सब बंद कर दे क्वी ढिबरी लड़णो बि आवो त  मयळि काख लग जा।   मयळिहिटणम  चलणंम , बाच बचनम, घस्स खाणम , पाणी पीणम बड़ो ध्यान द्यावो

   ऊना गरगरी  हौर बि गरगरी हूंद गे।  उच्च पाख पख्यड़ म चढ़ण नई छवाड़  कना कना उच्चा डाळम चौढ़न नि छवाड़ वीं गरगरी न।  अर लड़णो तो इन तयार रौंदी छे कि क्या बुलण।

      स्वील हूणो बगत आयी त मयळितै स्वीलाक पीड़ा बि नि  ह्वे अर द्वी सुंदर चिनख ह्वे गेन।  कैन जाणी  बि नी बल  मयळिकब स्वील ह्वे।

    अर बूबा रै गरगरी स्वील हूणो क्या छ्वीं लगाणो तब।  एक दिन रात तक वा स्वील पीड़ा म तड़फणी राई।  जब कुछ नि ह्वे त वींक मालिकन वींक चिनख अपर हथों न भैर खैंच।  चिनख त भैर आयी पर  गरगरी क प्राण चल गेन।  चिनख जि बची गे।  खाडू छौ बल ब्वे खवा।

 ये ब्वे बल स्यु खाडू बि बड़ो अन्याड़ निकळ बल।  जै कै दगड़ ले लड़ै भिड़ै।  रागस छौ रागस।  एक दिन कै खस्सी खाडू दगड़ रिकौण  म मारे गे।  गरगरी न कुछ नि  पायी।

 

   

 

Interpretation Copyright@ Acharya Bhishma Kukreti, 2018

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