Author Topic: Jhoda Chachari Baaju Band - चाचारी झोडा बाजु बन्द: लोक संस्कृति की पहचान  (Read 39512 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Basanti Kabootar-Jhoda-तवे कैले दियाना लटी का फुना

Singers : Sher Singh Mehar, Nain Nath Rawal, Prahlad Singh Mehra, Ramesh Bhatrauji, Basanti Devi Bisht, Shiv Joshi,
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बहुत ही अच्छी जुगल बंदी है ,जरुर सुनिए

तवे कैले दियाना लटी का फुना
तवे कैले दियाना लटी का फुना

पुरुष :

बतूछे बता, लटी का फुना, ले खांछे मारा
तवे कैले दियाना लटी का फुना

महिला :

मै मैता गियो, लटी का फुना..
इजू ले दियाना.. लटी का फुना
तवी खाली भेमा.. लटी का फुना

तवे कैले दियाना लटी का फुना
तवे कैले दियाना लटी का फुना


http://ishare.rediff.com/music/kumaoni-folk/tve-kailai-dyana-lati-ka-funa/10060777

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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This is one of the Best Jhoda

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Aasha hairage.. Bageshwar Kautik
Aasha Hairage..

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http://ishare.rediff.com/music/kumaoni-devotional-folk/asha-haraige-bageshwara-kauteek/10060902

हलिया

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   इस झोडे का आनंद लीजिये:



kumaoni ghoras

kumkum pandey

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एक झोडा तो ले छु   ड्यौसिल मारो मेर भीना, रंगीलो  भीना ड्यौसिल मारो :D :)

हेम पन्त

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झोड़ त बढिया लागि रो पाण्डेज्यू,,, अघिल के कि छू?

एक झोडा तो ले छु   ड्यौसिल मारो मेर भीना, रंगीलो  भीना ड्यौसिल मारो :D :)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Jhoda About Madho Singh Bhandari Village - Maletha.   


  कनु छ भंडारी तेरो मलेथा
  ऐ जाणू  रुकमा मेरा मलेथा
  मेरा मलेथा भैस्यो का खरक
  मेरा मलेथा घाडियो को घमणाट!
  मेरा मलेथा बाखरियो को तान्दो!

  कस छो भंडारी तेरो मलेथा?
  देखण को भल मेरो मलेथा !
  लगदी कूल मेरा मलेथा
  गौ मथे को सेरो मेरो मलेथा
    गौ मथे को पंधारो मेरो मलेथा !


    कस छो भंडारी तेरो मलेथा?
  पालिंगा की बाड़ी मेरा मलेथा!
  लासण की क्यारी मेरा मलेथा!
  बांदू की लसक मेरा मलेथा
  बैखू की ठसक मेरा मलेथा
  ऐ जाणू  रुकमा मेरा मलेथा

  हिंदी में :
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  भंडारी कैसा तेरा मलेथा
  मेरा मलेथा आ जाओ रुकुमा!
  मेरा मलेथा में भैसों के करक है!
  मेरे मलेथा में घंटियों का घमणाट है!
  मेरे मलेथा में बकरियों के झुण्ड है!

  भंडारी कैसा है तेरा मलेथा ?
  देखने में भला है तेरा मलेथा,
  चलती नहर है मेरा मलेथा में!
  मेरे मलेथा में गाव के ऊपर पनघट है !

  भंडारी कैसा है तेरा मलेथा ?
  मेरे मलेथा में लहसन की क्यारीया है,
  मेरे मलेथा में पालक की बाडिया है,
  सुन्दरियों  की लचक है मेरे मलेथा में,
  मेरे मलेथा में पुरुषो की शान है,
  रुकुमा आ जाओ मेरे मलेथा में !


   

                         

Devbhoomi,Uttarakhand

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                       अरुणाचल से लद्दाख तक बिखरे हैं चांचड़ी के रंग
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लोक' ऐसा अनूठा समंदर है, जो तमाम नदियों को अपनाकर फिर ऐसी ही तमाम नदियों को जन्म भी देता है। लोक कभी मरता नहीं, बल्कि वह तो तब तक जीवित रहेगा, जब तक कि धरती पर अंतिम मनुष्य है। लोक के कंठ से जब लय-ताल में सुर फूटे तो वह लोकगीत बन गए। जहां जैसी जमीन मिली, उसी के अनुरूप ढल गए और जब नृत्य इनके साथ जुड़ा तो नृत्यगीत हो गए। उत्तराखंड हिमालय का ऐसा ही प्रचलित नृत्य गीत है 'चांचड़ी', जो अरुणाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक किसी न किसी रूप में मौजूद है।

असल में चांचड़ी अखिल हिमालयी है, इसलिए हिमालय का हर रंग उसमें समाया हुआ है। आस्था एवं विश्वास से लेकर प्रेम, श्रृंगार, परिस्थिति, नारी व्यथा, खुद, प्रकृति, पर्यावरण, फौजी जीवन जैसे प्रतिबिंबों की प्रतिकृति हैं चांचड़ी नृत्यगीत। यही वजह है कि देवभूमि उत्तराखंड में उल्लास के हर मौके पर चांचड़ी नृत्य होता रहा है। यह जरूर है कि गढ़वाल, कुमाऊं व जौनसार में इसके रंग अलग-अलग हैं, लेकिन हर रंग में चांचड़ी का ही रूप समाया है।

सूबे के अलग-अलग हिस्सों में वहां की प्रकृति एवं परिस्थिति के अनुसार चांचड़ी को चांचरी, झुमैला, दांकुड़ी, थड़्या, ज्वौड़, हाथजोड़ी, न्यौल्या, खेल, ठुलखेल, भ्वैनी, भ्वींन, रासौं, तांदी, छपेली, हारुल, नाटी व झेंता जैसे नामों से जाना जाता है।

 इस सबके बावजूद हर क्षेत्र में नृत्य के साथ अनिवार्य रूप से गीत गाने की परंपरा है। चांचड़ी गीतों की रचना किसी गीतकार ने नहीं की, बल्कि घास काटने वाली महिलाओं, गाय-बकरी चुगाने वाले युवाओं, बूढ़े व सयानों, दूर ब्याही बेटियों आदि के सुरों से जो बोल फूटे, वही कालांतर में लोकगीत बन गए। यही चांचड़ी है। यही वजह है कि अरुणाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक किसी न किसी रूप में चांचड़ी नृत्य की बानगी देखने को मिलती है।

Jagran news

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मोहना लौड़ा नौल सिपाही
तेरी गाडी में रम बोतल .


Kumaoni Jhoras

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Devbhoomi,Uttarakhand

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दुडागीत ---इस प्रकार के गीतों को स्वयंबर प्रथा का स्वरूप माना जाता है,पर्वतों के मध्य घास कटती हुई महिलाएं दूर पशु चराते हुए युवक से ही परिचय पूछ्हती है

तिले धारु बोला झम
बाटा का बटोई,गोरा मेरु नौं झम
ढाकरी पालाण-गोरा दे
छोड़ गंगापार गोरा दे,ओ मेरा सलान झम

 

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