Author Topic: Milestones Of Uttarakhandi Music - उत्तराखण्डी संगीत के मील के पत्थर  (Read 21692 times)

पंकज सिंह महर

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साथियो,
       उत्तराखण्ड के लोक संगीत का इतिहास बहुत समृद्ध रहा है। पर्वतीय लोक संस्कृति में लोक गायन एक महत्वपूर्ण अंग है, लोक गायन प्रकृति और समाज की प्रवृत्तियों को दर्शाता है। उत्तराखण्ड में विशेष रुप से दो प्रकार का लोक गायन प्रचलित है, पहला भड़ गायन और दूसरा ऋतु गायन। भड़ गायन का संबंध आस्था और विश्वास से जुड़ा है, इसमें स्थानीय देवी-देवताओं और वीर पुरुषों के महातम्य को गाया जाता है तथा यह वीर रस में गाया जाने वाला गायन है।
      ऋतु गायन में प्रकृति की सुन्दरता, श्रृंगार रस, विरह-प्रेम आदि का वर्णन होता है। उत्तराखण्ड में अनेकों ऐसे लोक गायक हुये हैं, जिन्होंने उत्तराखण्डी लोक गायन को एक नई पहचान दी। लोक गायकी और लोक संगीत के लिये उन्होंने ऐसे अविस्मरणीय कार्य किये, जिससे वे इस क्षेत्र में मील के पत्थर सबित हो गये।
      आइये चर्चा करते हैं ऐसी ही कुछ विभूतियों की....!

पंकज सिंह महर

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आनन्द सिंह नेगी: AANAND SINGH NEGI

आनन्द सिंह नेगी जी आनन्द कुमाऊंनी के नाम से प्रसिद्ध थे, इनका जन्म २७ सितम्बर, १९२५ को नोला ग्राम, पट्टी सिलोर, अल्मोड़ा में हुआ था। इन्हें कुमाऊंनी बोली का पहला गायक माना जाता है, 1941-42 में इन्होंने दान सिंह मालदार जी के साथ काम किया। 1942 में सेना में भर्ती हो गये, द्वितीय महायुद्ध में सुमात्रा, जैसोर, इम्फाल, सिंगापुर, कोहिमा, रंगमाटी आदि स्थानों में लोक गीतकार के रुप में सैनिकों का मनोरंजन किया। 1946 में ये सेना से सेवानिवृत्त हो गये, 1955 में इन्होंने "आनन्द कुमाऊंनी एण्ड पार्टी" नाम से अपना संगीत ग्रुप बनाया। ये पहले कुमाऊंनी लोक गायक थे, जिन्होंने रष्ट्रीय स्तर पर आल इण्डिया रेडियो से 1955-57 तक कार्यक्रम दिये। 1968 से पर्वतीय कला केन्द्र से सम्बद्ध रहे, राजुला-मालूशाही, अजुवा-बफौल, सिदुवा-विदुवा रमौल, भाना-गंगनाथ, हरुहीत, जीतू बगड़वाल, हिलजात्रा और भोलानाथ आदि प्रसिद्ध कुमाऊंनी नाटकों में स्वर दिया। सांस्कृतिक मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सर्वश्रेष्ठ लोक गीत गायक के रुप में सम्मानित किये गये। पर्वतीय कला केन्द्र की ओर से सीरिया, ट्यूनिस, अल्जीरिया, मिस्र, बैंकाक, बीजिंग और उत्तरी कोरिया में प्रोग्राम दिये।

*श्री शक्ति प्रसाद सकलानी द्वारा लिखित उत्तराखण्ड की विभूतियां से साभार टंकित

पंकज सिंह महर

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अमलानन्द धस्माणा:AMLANAND DHASMANA

अमलानन्द धस्माना जी का जन्म 1885 के आस-पास बग्याली ग्राम, पौड़ी गढ़वाल में हुआ था। १९१५ के आस-पास धस्माना जी ने अपने गांव बग्याली में रामलीला मण्डली का सूत्रपात किया। इस रामलीला के सफल होने के बाद वे दूसरे गांवों में भी जाकर रामलीला करवाने लगे। धस्माना जी कराची, अमृतसर, कोटकपुरा और अंत में हापुड़ जाकर रहने लगे। जब वे कराची में थे तभी से उन्हें रामलीला मंचन का शौक हो गया। अपनी मंड्ली के लिये वे तभी से पोशाकें, आभूषण, पर्दे, गैस के हंडे खरीदने लगे। उनके मकान का आधा भाग इसी सामान से भरा रहता था। वे पूरे गढ़वाल में घूम-घूम कर रामलीला का मंचन करवाते थे। अर्थात इस ग्रामीण और पर्वतीय अंचल में रामलीला की शुरुआत कराने का श्रेय इन्हें ही है। लगभग आठ-दस वर्षों तक वे इसी प्रकार से संगीत की साधना करते रहे, इसी क्रम में उन्होंने लोक गीतों को भी इसी मंच से स्वर देना शुरु किया। एक बार रामलीला मंचन के दौरान सभी कलाकार मंचन के बाद स्टेज पर ही सो गये और सुबह १४ कलाकार मृत पाये गये, तब से धस्माना जी दुःखी हो गये और रामलीला मंचन करवाने कभी अपने गांव नहीं आये।
        श्री धस्माना सुप्रसिद्ध ज्योतिषी और गणितग्य भी थे, उनकी लिखी ज्योतिष रत्न भण्डार सारिणी उन दिनों पहाड़ के सभी ज्योतिषीयों के पास हुआ करती थी।उन्होने गणित का एक वृहद ग्रन्थ "सिद्ध खेटी" भी लिखा था।

पंकज सिंह महर

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मोहन सिंह ’रीठागाड़ी’ को उत्तराखण्ड संगीत का आधारस्तंभ कहा जा सकता है. उत्तराखण्डी संगीत को विश्वपटल पर चमकाने वाले मोहन उप्रेती जी रीठागाड़ी जी को सुनकर ही साम्यवादी राजनीति से लोकसंगीत की दुनिया में आ गये थे. यह मोहन सिंह रीठागाड़ी जी का एक सुप्रसिद्ध गीत है-

ॠतु औंने रौलि, भंवर उड़ाला बलि
हमारा मुलुक, भंवर उड़ाला बलि
दै खायो पात मां, भंवर उड़ाला बलि
के भलो मानिंछ, भंवर उड़ाला बलि
जुन्यालि रात मां, भंवर उड़ाला बलि
ऋतु औंने रौलि, भंवर उड़ाला बलि
कुमाऊं मुलुक, भंवर उड़ाला बलि
कागजि को लेख, भंवर उड़ाला बलि
सुणो भाई-बन्दो, भंवर उड़ाला बलि
मिलि रया एक, भंवर उड़ाला बलि
ॠतु औंने रौलि, भंवर उड़ाला बलि

मोहन सिंह बोरा "रीठागाड़ी" :MOHAN SINGH BORA "REETHAGARI"


मोहन रीठागाड़ी जी का जन्म 1905 में ग्राम-धपना, शेराघाट, पिथौरागढ़ में हुआ था, प्रसिद्ध संस्कृति कर्मी मोहन उप्रेती जी इन्हें अपना गुरु मानते थे। प्रख्यात रंगकर्मी स्व० ब्रजेन्द्र लाल शाह जी के शब्दों में (रीठागाड़ी जी की मृत्यु के बाद) -"लोक संस्कृति के उन्नायक मोहन सिंह बोरा "रीठागाड़ी" का गायकी जीवन ’कौन जाने उस बंजारे गायक की याद में कितने वर्षों तक सेराघाट के आस-पास सरयू तट पर ग्राम्यांए बैठती रही होंगी और मोहन की मोहक न्योलियों को सुमराति रही होंगी। राजुला मालूशाही गाथा के मर्मस्पर्शी प्रसंगों को याद कर सिसकती रही होंगी तथा बैर गायन में वाकप्टु और व्युत्पन्नम्ति, बैरी मोहन को सुमरती हुई अतीत में डुबकी लगाती रही होंगी।" एक युगान्त का अंत हो गया, मोहन सिंह रीठागाड़ी के युग का अंत हो गया, अब अतीत के घोडि़या पड़ावों की रसीली लोक-गीती संध्याएं छोटे पर्दो के चारों ओर सिमट कर रह गई हैं, दूरदर्शन स्टूडियो अथवा लोकोत्सवों में अस्वाभाविक रुप में प्रस्तुत किये गये लोकगीतों एवं नृत्यों की झांकी टेलीविजन पर अवश्य दृष्टिगोचर होती है, किन्तु उन दृश्यों में वह बंजारा कभी नहीं दिखलाई पड़ेगा। जो सरयू तीरे चांदनी रातों में घोड़े हांकता, न्योली गाता हुआ निकलता था और अपने स्वरों की झिरमिराहट से समस्त सेराघाट की घाटी को बोझिल और ओसिल बनाता हुआ आगे बढ़ जाया करता था। कौन था वह बंजारा, वह घोडिया? वह था मोहन रीठागाड़ी, रसीला और रंगीला गायक।
         ठाकुर मोहन सिंह बोरा जी की दो शादियों की ग्यारह संतानों में मोहन सबसे छोटे थे, बचपन से ही विनोद प्रिय मोहन के कानों में राजुला-मालूशाही की कथा एवं मोहक संगीत बस गया था। बकौल मोहन सिंह के यह संगीत उन्होंने गेवाड़ क्षेत्र के एक बारुड़ी शिल्पकार (टोकरी बनाने वाले) से पहली बार सुना था, उसके बाद बारुड़ी के एक्लव्य शिष्य मोहन सिंह ने आवाज के उस जादू को मृत्युपर्यन्त आत्मसात किये रखा।अल्मोड़ा जिले के सभी मेलों में मोहन सिंह नाम का युवक पहुंचकर विभिन्न प्रकार की छपेलियों, झोड़ों और चांचरियों का संगीत संचय कर अपनी सांसों से संवारने लगा। आजीविका के लिये उसने बंजारे की जिंदगी अपनाई, अल्मोडा शहर से वे घोड़ों पर सामान लादकर गंगोलीहाट, बेरीनाग, लोहाघाट और पिथौरागढ़ की मण्डियों में ले जाते। विश्राम के क्षणॊं में रात-रात भर मालूशाही गाते, हृदय को टीसने वाली न्योलियां गाकर स्वयं भी सिसकते और श्रोताओं को भी सिसकने पर मजबूर कर देते। इस प्रकार से पूरे कुमाऊं में लोक गायक मोहन रीठागाड़ी की धूम मच गई।
      शनै-शनैः मोहन सिण्ह जी की कला प्रदर्शन का क्षेत्र बढ़ता चला गया, ग्रामीण खेलों-मेलो- की सीमा से निकलकर वह कुमाऊं मण्डल के शरदोतसवों, ग्रीष्मोत्सवों और विशेष स्मारोहों में पहुंच गये। आकाशवाणी के लिये भी उन्होंने कार्यक्रम देने शुरु कर दिये। लखनऊ से दिल्ली तक उनकी मांग होने लगी, मोहन उप्रेती जी के प्रयासों से संगीत नाटक अकादमी ने उनकी गाई सम्पूर्ण मालूशाही का ध्वन्यालेखन किया और यथोचित आदर और पारितोषिक दिया। पर्वतीय कला केन्द्र, दिल्ली ने भी उन्हें काफी सम्मान दिया। २८ जनवरी, १९९८ को ७९ वर्ष की आयु में एक हुड़के की गमक अनन्त में विलीन हो गई।

पंकज सिंह महर

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उस्ताद रहीम खान : USTAD RAHIM KHAN


बीसवीं सदी के आरम्भ में जन्मे उस्ताद रहीम खान मूल रुप से संभवतः बिजनौर के वाशिंदे थे, लेकिन उनका कर्मक्षेत्र नैनीताल और अल्मोड़ा रहा। इन्होंने पेशेवर नर्तकियों को प्रशिक्षण देने में खूब प्रसिद्धि पाई, खां साहब कत्थक, भरतनाट्यम तथा पहाड़ी नृत्यों के विशेषग्य माने जाते थे, पुराने राजघरानों के रनिवासों के खोजाओं की तरह उन्हें भी कला की साधना के लिये पहले नपुंसक बन जाना पड़ा था। उनकी शिष्याओं में शास्त्रीय संगीत में पारंगत रामप्यारी, हीरुली, कल्लो, लोकगायन में इमामबाई, जग्गो और धन्नो का नाम उल्लेखनीय है। कुमाऊं क्षेत्र में सारंगी में पारंगत मौलाबरुस, गुलाब बाई, मियां गफ्फार, मियां बशीर तथा मियां  गुलाम की पिछली सदी के आरम्भ से अन्त तक बड़ी धूम रही है। कत्थक नृत्य में प्रवीण शिवदत्त और तबला वादन में प्रवीण रतन मास्टर ने खूब ख्याति अर्जित की है। राधाबाई और कमला झरिया नें फिल्मों में भी काम किया। चन्दाबाई नाम की गायिका का मधुर स्वर में गाया " सोरे की पिरुली पधानी, पाणी पीजा पाणि" गीत के रिकार्ड अब भी नैनीताल में सुरक्षित हैं।

*श्री शक्ति प्रसाद सकलानी द्वारा लिखित उत्तराखण्ड की विभूतियां से साभार टंकित

पंकज सिंह महर

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कबूतरी देवी: Kabootari Devi

कबूतरी देवी जी, ग्राम- क्वीतड़, विकास खण्ड- मूनाकोट, जनपद पिथौरागढ़ की रहने वाली हैं। ये कुमाऊंनी ऋतु गायन शैली की गायिका हैं, ये उत्तराखण्ड की पहली महिला लोक गायिका भी हैं। इन्होंने देश के विभिन्न रेडियो चैनलों से ७०-८० के दशक में कर्णप्रिय ऋतु गीत गाकर धूम मचा दी थी। इनके पिता श्री रामकाली जी भी लोक गायक रहे, लोक गायन की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने अपने पिता से ही ली। पहाड़ी गीतों में प्रयुक्त होने वाले रागों का निरन्तर अभ्यास करने के कारन इनकी शैली अन्य गायिकाओं से अलग है।
      वर्तमान में यह लोक गायिका अपनी पुत्री के साथ पिथौरागढ में निवास कर रही हैं।
    कबूतरी देवी जी की संगीत साधना का सम्मान करते हुये मेरा पहाड़ परिवार ने एक विस्तृत टापिक इन्हें समर्पित किया है। पढ़ने के लिये निम्न लिंक देखें।

http://www.merapahad.com/forum/music-of-uttarakhand/first-women-folk-singer-of-uttarakhand-kabootri-devi/

पंकज सिंह महर

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गोपाल बाबू गोस्वामी : GOPAL BABU GOSWAMI


उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के छोटे से गांव चांदीकोट में जन्मे गोपाल बाबू गोस्वामी का परिवार बेहद गरीब था. बचपन से ही गाने के शौकीन गोपाल बाबू के घरवालों को यह पसंद नहीं था क्योंकि रोटी ज़्यादा बड़ा मसला था. घरेलू नौकर के रूप में अपना करियर शुरू करने के बाद गोपाल बाबू ने ट्रक ड्राइवरी की. उसके बाद कई तरह के धंधे करने के बाद उन्हें जादू का तमाशा दिखाने का काम रास आ गया. पहाड़ के दूरस्थ गांवों में लगने वाले कौतिक - मेलों में इस तरह के जादू तमाशे दिखाते वक्त गोपाल बाबू गीत गाकर ग्राहकों को रिझाया करते थे.एक बार अल्मोड़ा के विख्यात नन्दादेवी मेले में इसी तरह का करतब दिखा रहे गोपाल बाबू पर कुमाऊंनी संगीत के पारखी स्व. ब्रजेन्द्रलाल साह की नज़र पड़ी और उन्होंने नैनीताल में रहने वाले अपने शिष्य (अब प्रख्यात लोकगायक) गिरीश तिवाड़ी 'गिर्दा' के पास भेजा कि इस लड़के को 'देख लें'. गिर्दा बताते हैं कि ऊंची पिच में गाने वाले गोपाल बाबू की आवाज़ की मिठास उन्हें पसंद आई और उनकी संस्तुति पर सांग एंड ड्रामा डिवीज़न की नैनीताल शाखा में बड़े पद पर कार्यरत ब्रजेन्द्रलाल साह जी ने गोपाल बाबू को बतौर कलाकार सरकारी नौकरी पर रख लिया.यहां से शुरू हुआ गोपाल बाबू की प्रसिद्धि का सफ़र जो ब्रेन ट्यूमर से हुई उनकी आकस्मिक मौत तक उन्हें कुमाऊं का लोकप्रिय गायक बना गया था. जनवरी के महीने में हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले में निकलने वाले जुलूस में हज़ारों की भीड़ उनके पीछे पीछे उनके सुर में सुर मिलाती थी. "कैले बाजै मुरूली", "घुरु घुरु उज्याव है गो", "घुघूती ना बासा" और "रुपसा रमोती" जैसे गाने आज भी खूब चाव से सुने जाते हैं और कुछेक के तो अब रीमिक्स तक निकलने लगे हैं.
        गोपाल बाबू गोस्वामी जी की संगीत साधना का सम्मान करते हुये मेरा पहाड़ परिवार ने दो विस्तृत टापिक इन्हें समर्पित किये हैं। पढ़ने के लिये निम्न लिंक देखें।


गोपाल बाबू गोस्वामी उत्तराखंड के महान गायक - Gopal Babu Goswami Great Singer
http://www.merapahad.com/forum/music-of-uttarakhand/gopal-babu-goswami-great-singer/

गोपाल बाबू गोस्वामी (महान गायक) की यादे ! A TRIBUTE TO GOSWAMI JI SONGS !
http://www.merapahad.com/forum/music-of-uttarakhand/a-tribute-to-gopal-babu-goswami-ji-exclusive-songs/

पंकज सिंह महर

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चन्द्र सिंह राही : CHANDRA SINGH RAHI

चन्द्र सिंह राही जी का जन्म १७ मार्च, १९४२ को ग्राम गिंवाली, पट्टी- मौंदाडस्यूं, पौड़ी में हुआ था, इन्होने आकाशवाणी के दिल्ली, लखनऊ और नजीबाबाद स्टेशनों से १९६६ से ही गीत गाने प्रारम्भ कर दिये थे। इन्होंने कई स्टेज प्रोग्राम भी दिये, १९८० से दूरदर्शन पर लोकगीतों का प्रसारण शुरु हुआ तो उत्तराखण्डी गीतों को सुमधुर तान इन्होंने ही दी थी। अब तक श्री राही लगभग ५०० लोकगीतों का गायन कर चुके हैं। श्री राही की जागर और लोकगाथाओं को उत्तराखण्ड से बाहर निकाल कर बाकी दुनियां को रेडियो और दूरदर्शन के माध्यम से रुबरु कराने में अहम भूमिका रही है।
      श्री राही जी को लोक संगीत का प्रशिक्षण उनके पिता द्वारा १२ वर्ष की आयु से ही दिया जाने लगा, उसके बाद सुगम संगीत आचार्य स्व० बचन सिंह जी अन्ध महाविद्यालय द्वारा प्रशिक्षण लिया। अब तक राही जी ने २५०० पारम्परिक लोक गीतों का संकलन किया है और मध्य हिमालय उत्तराखण्ड के लोक गीत, लोक नृत्य एवं पारम्परिक लोक वाद्य यंत्रों की लोक शैलियां भी संकलित की हैं। श्री राही ढोल-दमाऊ, डौंर, थालि, हुड़का, मोछंग, बिणै, मुरली, अलगोजा आदि वाद्य यंत्रों के वादन में प्रवीण हैं।
      श्री राही जी आकाशवाणी में बी हाई श्रेणी के कलाकार हैं और पिछले ४२ सालों से निरन्तर प्रस्तुति देते आ रहे हैं साथ ही दूरदर्शन पर लगभग ५ हजार कार्यक्रम प्रस्तुत कर चुके हैं।

इन्हें निम्न पुरस्कार भी प्राप्त हुये हैं-

१- उत्तरांचल लोक कला केन्द्र द्वारा १९८६ में लोक संगीत रत्न पुरस्कार
२- गढ़भारती, दिल्ली द्वारा १९८६ में साहित्य कला अवार्ड
३- संगीत नाटक अकादमी द्वारा सम्मानित
४- पं० टीकाराम गौड़ पुरस्कार(दिल्ली), १९९६
५- मोहन उप्रेती कला अवार्ड, अल्मोड़ा, २००४
६- गढ़गौरव सम्मान वर्ष २००५ में उत्तराखण्ड क्लब द्वारा।
७- पं० शिवानन्द नौटियाल सम्मान, लखनऊ, २००७
८- मोनाल लोक कला सम्मान, मोनाल संस्था लखनऊ द्वारा २००९
९- अखिल गढ़वाल सभाअ, देहरादून से लोक कला सम्मान, २००३
१०- दिल्ली सिटीजन फार्म द्वारा १९९८ में सम्मानित
११- माता राजराजेश्वरी त्रिपुर सुन्दरी चेतना संघ, चमोली द्वारा कला सम्मान, २००९

राही जी के अजर-अमर गीतों को सहेजने का एक प्रयास
http://www.merapahad.com/forum/music-of-uttarakhand/chandra-singh-rahi-legendary-folk-singer-of-uk/


पंकज सिंह महर

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झूसिया दमाई : JHUSIA DAMAI

झूसिया दमाई जी का जन्म पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील के ढूंगातोली गांव में १९१३ में हुआ था, ये नेपाल के बैतड़ी जिले के बसकोट ग्राम के मूल निवासी थे। ये वीर पुरुषों के सम्मान में वीर रस में गाये जाने वाले भड़ गायन के महारथी माने जाते हैं। झूसिया दमाई जी ने अपने पिता से लोक गाथायें सिखीं, इस परिवार को नेपाल और धारचूला क्षेत्र में इष्टकुल के लिये वर्षों के लिये एक ऐसा कर निर्धारित किया गया है कि चैत्र, आश्विन और कार्तिक में ये देवताओं का स्तुतिगान करें। नेपाल के त्रिपुरा सुन्दरी, जगन्नाथ और भगवती के मन्दिरों में यह परिवार पीढ़ियों से गाथायें गा रहा है। झूसिया दमाई जी के शब्दों में " इष्ट्कुल के ऋण को चुकाने के लिये हमारा गाथा गायन जरुरी काम था, इस अंचल में २२ भड़ों (वीरों) खासतौर पर छुराखाती, भीमा कठैत, संग्राम कार्की, सौन रौत, रन रौत, लाल सौन, सौन माहरा, कालू भण्डारी, उदाई छपलिया, नर सिंह धौनी आदि शामिल हैं। कहा जाता है कि उस काल में कत्यूर में विरम देव का राज था, ये २२ भड़ वीरतापूर्वक उस राजा के अत्याचारों के खिलाफ लड़े थे।" इसी कड़ी में आगे उनका कथन है कि "कुमाऊं और नेपाल में महाभारत गाथा, जागर गाथा, त्रिमल चन्द, विक्रम चन्द, मुन शाही, खर्का शाही, पैक, सौन, भनारी, कठायत, १२ ठगुरी पैक, कालिका देवता, ३३ कोटि देवताओं के अलावा ध्वज, थल केदार, छिपलाकेदार, लटपापू, ननपापू, ठ्गुरी चन्द, गुंसाई गाथा, अलाईमल, छुरमल, भागीमल, गंगनाअथ, गोलू देवता और भूतात्माओं की जागर और गाथायें प्रचलित हैं।
       झुसिया दमाई जी का भड़ गायन अपने आप में एक इतिहास को सुनने वालों के सामने खड़ा कर देता है। उत्तराखण्डी संगीत के इस मील के पत्थर पर प्रसिद्ध जनकवि गिर्दा शोध कार्य भी कर रहे हैं। झूसिया जी को दुःख इस बात का है कि गाथाये जानने और गाने वाले कुछ ही वर्षों में पूरी तरह से समाप्त हो जायेंगे।

पंकज सिंह महर

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जीत सिंह नेगी : JEET SINGH NEGI


१९२७ को ग्राम- अयाल, पैडुलस्यूं, पौड़ी गढ़्वाल में जन्में जीत सिंह नेगी जी गढ़्वाल की लोक संस्कृति को गीतों के स्वरों से जीवन्त रखने वाले बेजोड़ लोक गायक और गीतकार हैं। गढ़वाली बोली में अनेक अनूठे गीतों की इन्होंने रचना की है, गढ़वाली बोली, सामाजिक परिवेश, परम्पारयें, रुढ़िया और लोक विश्वास पर इनकी आश्चर्यजनक पकड़ है। पर्वतीय संस्कृति को उजागर करने वालों अनेकों गीतों की रचना कर सुरों में ढाला है नेगी जी ने। अभावों से अभिशप्त प्रवासी प्रवतीयों के विकल करुण जीवन के संयोग, वियोग के सैकड़ों गीत आपने लिखे हैं। इनके गीतों में निश्चल, सहज और नैसर्गिक प्रेम की अभिव्यंजन  होती है। इनमें कहीं भी खलनायक या खलनायिका के संकेत नहीं मिलते, यही उत्तराखण्डी संस्कृति का मूल रुप भी है। गीतों के अतिरिक्त नेगी जी नाटक भी लिखते हैं, मलेथा की कूल, भारी भूल, जीतू बगड़वाल इनके प्रसिद्ध नाटक हैं। रामी काव्य की नृत्य नाटिका बनाने का श्रेय भी इन्हीं को है, अपने गीतों और नाटकों का मंचन वे भारत के कई शहरों में कर चुके हैं। गीत गंगा, जौल मंजरी, छम घुंघरु बाजला इनके प्रकाशित गीत संग्रह हैं।
        छात्र जीवन के तत्काल बाद फिल्म लाइन के मोह में ये दिल्ली-बम्बई चले गये, १९४९ में अपने ६ गीतों की ग्रामोफोन रिकार्डिंग कराने में ये सफल भी रहे। १९५२ में बम्बईए के दामोदर हाल में गढ़वाल भातृ मण्डल के तत्वाधान में इन्होंने स्वरचित नाटक भारी भूल का सफल मंचन भी किया। १९५७ तक नेगी जी लोक गीतों की धुनों के मर्मग्य हो गये, आकाशवाणी, दिल्ली के तत्कालीन संगीत निर्देशक ठाकुर जयदेव सिंह ने इन्हें लोक गीतों की धुनों को सम्पन्न रुप देने के लिये आमंत्रित किया। इनका गाया लोक गीत "तू होली ऊंची डांडयूं मां, बीरा घसियारी का भेस मां, खुद मां तेरी सड़क्यों पर रुणों छौं हम परदेश मां" इतनी मार्मिकता और भावुकता से भरा है कि प्रवासी पहाड़ी की आंखें एक बार छलछला जाती हैं। श्री नेगी जी वृद्धावस्था के बाद भी निरन्तर उत्तराखण्डी लोक संगीत की साधना में रत हैं।

 

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