Author Topic: Milestones Of Uttarakhandi Music - उत्तराखण्डी संगीत के मील के पत्थर  (Read 22084 times)

Bhishma Kukreti

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Folk Song-Dance (Drama ) of Magh month (15th Jan-15th Feb) of Jaunsar Garhwal
                     Bhishma Kukreti
Jaunsari folk song-dances are vibrant and energetic. The language is neaer to Punjabi and Himachali
Jaunsarissing-dance a special song andactdance in the month of Magh (15th January to 15th February called Baradi dance
Baradiis as Sayna 'song-dance except thatthe rythm and energy is speedy in baradi. People dnce and sing after taking alcoholic beverages and the dance is always aggressive and more vibrant than Sayana (Dr Shiva nand Nautiyal)
Afolk song issung as
एक धारा  द्वी गोरु बाकरी
दूजे धारा द्वी घोड़ी
तेरी मेरी बल दोस्तियाँ
कूण पापियाँ तोड़ी
होरे नीरेणी निगोडिये
बूण  लायी ली माणी 
थोड़े दिनां की दोस्तियाँ
पहले ही ऩा ल़ाणी 
This dance-songis of rapture of love . females and males dance together. Females and males question or answer in the song and dance with high energy

Bhishma Kukreti

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Great Garhwali Personality
 Daya Shankar Bhatt :Analyzer and Writer of  Musical Script  of Garhwali Folk Songs
                                     Bhishma Kukreti
             There are few great personalities who silently work for the whole nation but get lesser credit than what they deserve . Daya Shankar Bhatt is such personality whose contribution is incredible , whose work is amazing and worthier  than donation of billions . A couple of young Garhwalis will know his contribution but persons as late Dr Shiva Nand Nautiyal, late Bhakt Darshan (ex- central minister ) late Arjun Singh Gusain, Dr Hari Datt Bhatt Shailesh or Professor Radha Ballabh Dobhal always applauded about his contribution to Garhwali folk music.  Till the sun shines, Garhwalis always remember the name of Daya Shankar Bhatt for his immense service in Garhwali folk literature
   Daya Shankar Bhatt was born on 14th October 1905 in village Falswadi, Patti-Sitaunsyun, Pauri Garhwal Uttarakhand . He completed his initial study in Pauri and then in Dehradun
 From Dehradun, Daya Shankar  shifted to Lahor and taught there Hindi in many schools. He had more interest in poems and music. He used to publish his poetries by the name of ‘Bandi’
In Lahor, Bhatt  came in contact with many revolutionary personalities and became dedicated freedom fighter.
 From 1938-1947 he worked in Garhwal for freedom movement and was jailed for many times by British ruler .
  After independence , Daya Shankar Bhatt  became teacher in Dehradun  and became dedicated social worker of Dehradun
Daya  Shankar Bhatt wrote following books
1- Ahon men
2-Agyat sainik
3-Gaon ki or
4- Gadh chunar
5- Spandan
6- Divy sangeet
Unfortunately, Bhatt could not publish his books
From Garhwali folk literature point of view, his contribution is amazing that Bhatt wrote the Musical Script of Garhwali Folk songs as he was expert of classical music too. Daya Shankar  wrote Musical Script for almost all the available folk songs (Divy Sangeet) as following folk songs are a few examples to mention:

A- mangal geet (ban deen dain) - Ken hoi ken hoi Dhauli kaujyal
B- Gaura devi Nayan Baithin ch
C= Jando ni chhaun pachhyandio ni chhaun (dhuli arg geet)
D- Ko chhe tu Chaurade Sukilo (Chaunfala geet)
E-nandu Tyaru dadu ka Jayun ch (Chaunfala geet)
F-Meri Devi Jwalpa (Chaufla )
G-Talya syara Simi Syara malya syar gijar (mela nrity geet)
H-Badiyon ki bhumyadey (samuhik Chetana ka geet)
Daya Shankar bhatt and keshav Anuragi are the only two great personalities who worked to initiate the research on finding the classical music tone in Garhwali folk songs They both worked for many years in Dehradun on folk music of Garhwal.
Unfortunately, both could not publish their works on book forms
Daya Shankar Bhatt expired on 3rd March 1982 in Dehradun
Whenever, there will be talk and research for folk songs of Garhwal, people will always remember Daya Shankar Bhatt along with Keshav Anuragi
Copyright@ Bhishma Kukreti bckukreti@gmail.com

Devbhoomi,Uttarakhand

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फूली बुरांश जांदू मैता अब ऐगे रंगीलू चैता
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प्रसिद्ध जागर गायिका बसंती बिष्ट व उनके साथियों ने पारंपरिक गढ़वाली व कुमांऊनी गीतों की यादगार प्रस्तुति के साथ नव संवत्सर का स्वागत किया। देर रात तक चले गीत संगीत के दौर का स्थानीय कला प्रेमियों ने भरपूर लुत्फ लिया।

नव संवत्सर 2068 के आगमन पर यूनिवर्सिटी यूथ क्लब ने ऐतिहासिक गोला पार्क में संगीत संध्या का आयोजन किया। प्रसिद्ध जागर गायिका बसंती बिष्ट ने नंदा देवी के जागर के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। उन्होंने गढ़वाल और कुमांऊ में नव वर्ष और चैत के आगमन पर गाए जाने वाले पारंपरिक लोक गीतों की प्रस्तुति देकर वाह-वाही लूटी। उन्होंने 'लगी बडूली मी जांदू मैता, अब ऐगे रंगीलू चैता', 'हिट सुआ कौथिग, तेरी झबरी बजी छमाछम', 'कैलाश मां होला हेमवंत राजा' और 'पंचनाम देवा' समेत विभिन्न गीतों को अपना स्वर दिया। डोंर, थकुली और हुड़के की धुनों पर दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देर रात तक झूमते रहे। साथी कलालाकर संजय पांडे ने 'हे जीत रंचना, असंति का पारा' व 'चल फुल्यारी फूलों का' और अमित सागर ने 'जै दुर्गे, दुर्गा भवानी' और 'पंडो खेला पासौं' जैसे गीत प्रस्तुत कर दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर दिया।

Source dainik jagran

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देवराम
 
सफेद दाढी, सिर परं बँधा पारम्परिक साफा, चिलचिलाती धूप में उनके कंठ से निकलते ’हुड़किया बौल‘ के जाने पहचाने स्वर। ये पहचान है 75 वर्षीय लोक कलाओं को समर्पित बुजुर्ग देवराम का। जीवन के 75 बसंत देख चुके देवराम चौखुटिया विकासखण्ड के जमराड़ में रहते हैं। हुड़के के थाप के साथ छपेली, चाँचरी, हुड़किया बौल, मालूसाही के पे्रमगीतों के अतिरिक्त विशेष रूप से वे राजा हरिश्चन्द्र और भैरव की जागर के लिए जाने जाते हैं।
सुफला फली जाया, भूमिका भूमिया……सुफला फली जाया, हिमाला की नन्दा
ये भूमिया देवा हो……..।

हुड़किया बौल के उक्त स्वर रोपाई करती महिलाओं के हाथों में जादू बनकर उनकी कार्यक्षमता को तीव्र कर देती हैं। देवराम कहते हैं कि पुराने जमाने की महिलाओं सा स्वर नई पीढी में कहाँ ? वैसे भी आज की पीढ़ी अरुचि के कारण इन लोक कला के स्वरों को उठाने में परेशानी महसूस करती है।
लोक कला को समर्पित यह बुजुर्ग आजकल सूचना प्रसारण मंत्रालय, गीत एवं नाटक प्रभाग के सेवानिवृत्त प्रशिक्षक जसीराम आर्य के साथ किशोरों को लोक कला के गुर सिखा रहे हैं। जसीराम आर्य कहते हैं कि वे शहर छोड़कर अपने पैतृक गाँव आकर भी लोक कलाओं के संवर्धन-संरक्षण के लिए उचित जमीन नहीं तलाश सके। उनका कहना है- लोक कलाकारों का अभावग्रस्त जीवन के कारण उनकी अरुचि स्वाभाविक है तथा इन कलाओं को पुनर्जीवित करना चुनौतीपूर्ण कार्य है।
जहाँ ग्रामीण समाज में जीवन जीने का ढंग एवं व्यवसाय के प्रति दृष्टि बदल रही है तथा नई पीढ़ी में आधुनिकता का प्रभाव बढ़ा है, वहीं इलक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के साथ लोक कलाओं को परोसने से भी पारम्परिक कलाओं का क्षरण हुआ है। देवराम के चार लड़कों में से एक का भी इस पेशे में नहीं आना लोक कलाप्रेमियों के लिए चिन्ता एवं जिज्ञासा का विषय हो सकता है। एक जमाना था जब लोक कलाकार पारम्परिक रूप से ’खौकी‘ ( श्रम के बदले अनाज ) परम्परा द्वारा जीवनयापन करते थे। आर्य का कहना है कि खौकी परम्परा में कलाकारों के श्रम एवं कला को उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। जागर से जुड़े अनुसूचित जाति के कलाकारों को सामाजिक रूप से सम्मान न मिल पाना भी लोककला की दुर्गति का कारण रहा। इसके अलावा कलाकारों का तत्कालीन समाज में शोषण, यहाँ तक कि दुत्कार तथा भय के वातावरण ने नई पीढ़ी के कलाकारों को पारम्परिक कलाओं से दूर कर दिया।
भैलो, थड्या, चौंफुला जैसे नृत्य तथा करुण, श्रृंगार, सम्मोहन, वीर रसों को समेटता रमौल, भड़ौ जैसे लोक गायन शैली कब तक पुनर्जीवन के लिए बुजुर्ग कंठों से लोक धरातल पर उतरने के लिए तरसते रहेंगे, ये महत्वपूर्ण प्रश्न है।
 
http://www.nainitalsamachar.in/folk-music-is-not-getting-its-takers/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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A few more names :

1)  Basanti Devi  - First women Jagar Signer Garhwal Area
2)  Heera Singh Rana- AIR certified Singer
3)  Chandra Singh Rahi
4)  Pratap Singh Bafila
5)  Bal Krishana Bhatt

Hemant Kapkoti

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Risky Pathak

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I dont have words for this topic. excellent info. I was just searching about Mohan Reethagaadi and came to know about so many folk singers.. :)

Risky Pathak

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Thul Nantin

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बहुत उम्दा जानकारियां दी हैं मेहराजी आपने thread  में  धन्यवाद
नईमा खान उप्रेती NAIMA KHAN UPRETI

श्रीमती नईमा खान उप्रेती उत्तराखण्ड लोक संस्कृति के सम्वाहक स्व० मोहन उप्रेती जी की धर्मपत्नी हैं। आपने अल्मोड़ा से ही स्नातक की उपाधि ग्रहण की और बाल्यकाल से ही संगीत में रुचि होने के कारण लोक कलाकार संघ की सक्रिय सदस्या रहीं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, रंग मंडल में भी दो वर्ष तक कार्य किया, कई ख्यातिनाम नाटकों में भूमिका भी अदा की। १९७३ में आप दूरदर्शन से जुड़ी और १९९६ में प्रोडयूसर पद से अवकाश ग्रहण किया। कई वर्षों तक आकाशवाणी दिल्ली से गढ़वाली, कुमाऊंनी भाषा के लोकगीतों का प्रसारण किया। इनका गाया प्रसिद्ध गाना "पारा भीड़ा को छै भागी" आज भी दिल को झकझोर देता है। १९९६ से पर्वतीय कला केन्द्र, दिल्ली में सक्रिय भागीदारी की। राजुला-मालूशाही, अजुवा-बफौल, रसिक-रमौल आदि कई गीत नाटिकाओं को आपने स्वर दिये और मोहन दा के साथ देश-विदेश में कई प्रस्तुतियां दीं। मोहन उप्रेती जी का असामयिक निधन हो जाने के बाद आप पर्वतीय कला केन्द्र, दिल्ली की अध्यक्ष हैं और संस्कृति की सेवा कर रही हैं।

Hisalu

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Mohan Reethagadi ka ek geet


ऋतु औनी रौली भंवर उडला बलि,
हमारा मुलुका भंवर उडला बलि |
दै खायो पात मे भंवर उडला बलि,
के भलो मानी छो भंवर उडला बलि,
ज्यूनाली रात मे भंवर उडला बलि,
के भलो मानी छो भंवर उडला बलि,
है जा मेरी भैया भंवर उडला बलि,
यो गैली पातला भंवर उडला बलि,
पंछी वांसनया भंवर उडला बलि,
है जा मेरी भैया भंवर उडला बलि,
कविता की लेख भंवर उडला बलि,
सुणो भाई बन्दों भंवर उडला बलि,
मिली रया एक भंवर उडला बलि,
सुणो भाई बन्दों भंवर उडला बलि,
ऋतु औनी रौली भंवर उडला बलि,
हमारा मुलुका भंवर उडला बलि |


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