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Author Topic: Musical Instruments Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के लोक वाद्य यन्त्र  (Read 29933 times)

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पंकज सिंह महर

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    • MERA PAHAD / मेरा पहाड़
Musical Instruments Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के लोक वाद्य यन्त्र
« on: May 26, 2008, 12:00:41 PM »
साथियो,
     सभी अवगत ही हैं कि उत्तराखण्ड की अपनी एक समृद्ध और गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा है। किसी भी सभ्यता और संस्कृति के लिये जरुरी है उनकी सांस्कृतिक गतिविधिया और इनके लिये आवश्यक होते हैं सुर और ताल, सुर जहां कंठ से निकलते हैं वहीं ताल के लिये वाद्य यंत्रों की आवश्यकता होती है। हमारे पुरखों ने स्थानीय सुरों के आधार पर स्थानीय वाद्य यंत्र भी विकसित किये तो आइये हम बात करते हैं अपने आद्य यंत्रों पर------हुड़्का, ढोल, दमाऊं, कांसे की थाली, भोंकर, तुतुरी, रणसिंगा, डोंर, कंसेरी, बिणाई, मुरुली, जोंया मुरुली..........
« Last Edit: September 05, 2009, 03:12:40 PM by हिमांशु पाठक »
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

पंकज सिंह महर

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    • MERA PAHAD / मेरा पहाड़
Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #1 on: May 26, 2008, 12:15:12 PM »
हुड़का-

लोक वद्यों में हुड़का कुमाऊं में सर्वाधिक प्रयोग में लाया जाता है। स्थानीय देवी-देवताओं के जागर के साथ ही यह विभिन्न उत्सवों, लोक गीतों और लोक नृत्यों में यह प्रयुक्त होता है। इसका मुख्य भाग लकड़ी का बना होता है, जिसे अन्दर से खोखला कर दिया जाता है, दोनों ओर के सिरे बकरे के आमाशय की झिल्ली से मढ़कर आपस में एक-दूसरे की डोरी से कस दिया जाता है, लकड़ी के इस भाग को स्थानीय भाषा में नाई (नाली) कहते हैं, इसे बजाते समय कंधे में लटकाने के लिये, इसके बीच (कमर के पास) से कपड़े की पट्टी को डोरी से बाढ दिया जाता हि। बजाते समय कपड़े की पट्टी का खिंचाव हुड़के के पुड़ों व डोरी पर पड़ता है, जिससे इसकी आवाज संतुलित की जाती है, आवाज का संतुलन एवं हुड़के की पुड़ी पर थाप की लय पर वादक को विशेष ध्यान रखना होता है।
      हुड़का जागा या जागर लगाने का एक प्रमुख वाद्य है, कुमाऊं के स्थानीय देवता गंगनाथ का जागर केवल हुड़के पर ही लगाया जाता है। बैसी में हुड़का प्रयोग में नहीं आता लेकिन ३ से ५ दिन के जागर में हुडके का ही प्रयोग होता है।.............
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

पंकज सिंह महर

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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #2 on: May 26, 2008, 12:54:15 PM »
हुडके का मुख्य भाग नाली, का निर्माण विशेष लकड़ी से किया जाता है, बरौं व खिन अथवा खिमर की लकड़ी से बने हुडके की नाली विशेष मानी जाती है-

"खिनौक हो हुड़ुक, दैण पुड़ हो बानरौक, बौं पुड़ हो लंगूरोक, जभत कै तौ हुड़्क बाजौल, उ इलाकाक डंडरी बिन न्यूतिये नाचण लागाल"

अर्थात, खिन की लकड़ी से निर्मित हुडके की नाली हो, दांया पूड़ा बन्दर की खाल का बना हो, बांई ओर का पूड़ा लंगूर की खाल का बना हो, ऎसे हुड़के में जब जगरिय के हाथों से थाप पड़ेगी तो उस क्षेत्र के जितने भी डंडरिय हैं, बिना निमंत्रण दिये ही नाचने लगेंगे।
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हेम पन्त

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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #3 on: May 26, 2008, 01:00:59 PM »
वाह पंकज दा! मान गये. बहुत ही सुन्दर टापिक शुरु किया और ज्ञान की वर्षा प्रारम्भ कर दी. आज थोडा व्यस्त हूँ, समय मिलने पर कुछ जोडने की कोशिश करुँगा...

Quote from: P. S. Mahar on May 26, 2008, 12:54:15 PM
हुडके का मुख्य भाग नाली, का निर्माण विशेष लकड़ी से किया जाता है, बरौं व खिन अथवा खिमर की लकड़ी से बने हुडके की नाली विशेष मानी जाती है-

"खिनौक हो हुड़ुक, दैण पुड़ हो बानरौक, बौं पुड़ हो लंगूरोक, जभत कै तौ हुड़्क बाजौल, उ इलाकाक डंडरी बिन न्यूतिये नाचण लागाल"

अर्थात, खिन की लकड़ी से निर्मित हुडके की नाली हो, दांया पूड़ा बन्दर की खाल का बना हो, बांई ओर का पूड़ा लंगूर की खाल का बना हो, ऎसे हुड़के में जब जगरिय के हाथों से थाप पड़ेगी तो उस क्षेत्र के जितने भी डंडरिय हैं, बिना निमंत्रण दिये ही नाचने लगेंगे।

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गारा-रा-रा ऐगे रे बरखा झुकी ऐगे...

पंकज सिंह महर

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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #4 on: May 26, 2008, 01:02:53 PM »
बिरत्वाई (बिरुदावली) की ताल देवता का अवतरण करने से पहले प्रांरभ में बजाई जाती है। इसमें समस्त देवताओं, स्थानीय देवताओं मंदिरो, तीर्थों में निवास करने वाले देवताओं का आह्वान किया जाता है, इसमें हुड़का और कांसे की थाली बजाई जाती है, हुडके के बोल इस तरह से होते हैं-
तुकि  दुं दुं दुं,        तुकि  दुं दुं दुं।
तुकि  दुं दुं दुं,        तुकि  दुं दुं दुं।
दुदुं    दुदुं         तुकि दुंग,
दुदुं,     दुदुं,            दु-दुदुं
दुदुदुं,    दुदुदुं,          दुदुं
दुदुदुं,    दुदुदुं,       दुदुं,    दुदुं,   दुदुदं
किदुं    दुदुं    दुदुदुं   किदुं   दुदं  दुदुदुं
तुकि दुं,    तुकि दुं,  तुकि दुं...............
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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #5 on: May 26, 2008, 01:13:32 PM »
ढोल-दमू पर झूमते लोग

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पंकज सिंह महर

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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #6 on: May 26, 2008, 01:24:09 PM »
हुड़के की ताल को शाष्त्रीय रुप में देखें

हुड़का-
भम-भमऽ। पम पमऽ।
भम-भमऽ। पम-पमऽ।

शाष्त्रीय ताल-

धा धींऽ। ता तींऽ।
धा धींऽ। ता तींऽ।

जब हुड़के का वादन थोड़ा तेज होता है तो
हुड़्का-
भम भमा। पम पमा। भम भमा। पम पमा।

शाष्त्रीय-
धा धी ना, धा ती ना।धा धी ना, धा ती ना।
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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #7 on: May 29, 2008, 12:08:15 PM »
बिणाई

बिणाई मुख्यतः उत्तराखण्ड की ग्रामीण महिलाओं द्वारा बजाया जाने वाला एक लोक वाद्य है। बिणाई लोहे से बना एक छोटा सा वाद्य है, जिसे महिलायें उसके दोनों सिरों को अपने दांतों के बीच में दबाकर बजाती हैं। इन दोनों सिरों के बीच लोहे की एक पतली व लचीली पत्ती लगी होती है। जिसे अंगुली से हिलाने पर कम्पन पैदा होता है, इस कम्पन से वादक के श्वांस की वायु टकराने पर एक सुरीले स्वर की उत्पत्ति होती है। श्वांस लेने और छोड़ने पर इसकी टंकार में विविधता आती है। श्वांस के कम-बाकी दबाव से इसे और भी सुरीला बनाया जा सकता है। जिससे ऎसा विरही संगीत पैदा होता है जो घंटों तक वादक और श्रोता को मंत्रमुग्ध कर देता है। इस वाद्य को स्थानीय लोहार बनाते हैं।
    वर्तमान में यह वाद्य यंत्र विलुप्त होने की कगार पर है।
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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #8 on: May 29, 2008, 12:17:10 PM »
कांसे की थाली

कांसे की थाली का उपयोग जागर में एक प्रमुख वाद्य के रुप में किया जाता है। इसे आसुरी प्रकृति का माना जाता है। इसलिये इसे जागर लगाने वाले कंसासुरी थाली (कंस की आसुरी प्रवृत्ति) भी कहते है। इसे लकड़ी के सोटे से बजाया जाता है। हुडके की थाप के साथ-साथ कांसे की थाली को भी बजाया जाता है। इसे सिर्फ पुरुष ही बजाते हैं,
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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #9 on: May 29, 2008, 12:26:02 PM »
घान, घाना या घानी

मंदिरो में जो घंटी चढ़ाई जाती है, उसके सस्ते स्वरुप को घान कहा जाता है, यह तांबे की पतली चादर से बनाया जाता है और इसके अन्दर एक लोहे की मुंगरी होती है, जो तांबे के बाहरी खोल से टकराने पर बहुत कर्णप्रिय स्वर उत्पन्न करती है।
     यह देखने में उल्टे डिब्बे जैसी होती है और इसके ऊपर एक घुण्डी लगी होती है, जिसे रस्सी के सहारे जानवरों के गले में बांधा जाता है। बकरी, गाय और भैंस के गले में यह बाधी जाती है, जिसके संगीत में यह पशु खो जाते है और अपनी धुन में मस्त होकर चरते रहते हैं और फसल का नुकसान नहीं करते और अपने झुंड से इधर-उधर भी नहीं जाते हैं। बैलों के गले में भी इसे बांधा जाता है, जिससे खेत जोतते समय उनकी एकाग्रता बनी रहती है।

इसे जानवरों को संगीत के माध्यम से बांधे रहने के लिये हमारे पुरखों ने विकसित किया।
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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #10 on: May 29, 2008, 12:37:14 PM »
घुंघरु


घुंघरु वैसे तो मुख्यतः नृत्य का वाद्य है, लेकिन उत्तराखण्ड में इसे और जगह भी इस्तेमाल किया जाता है, वैसे तो अभी गांवों में भी बच्चों के पांव में इन्हें बांधा जाता है।
उत्तराखण्ड में इसे जांठ (लाठी) में बांधा जाता था, जिससे रास्ते में आने वाले सांप, बिच्छू आदि इसकी आवाज सुनकर समीप न आंये। साथ ही पैदल चलने वाले का मन भी लगा रहता था और अकेले चलने में उसे बोरियत भी नहीं होती थी, लोकगीतों में भी इसे उदधृत किया गया है-


शेरसिंगा पतरौला- तेरी जांठी में घुंघुर छन.......

जांठी को घुंघुर सुवा, जांठी को घुंघुर,
कैथे कुनु दुख-सुख, कौ दिछ हुडुर।


इसके अलावा इसे महिलाये भी अपनी दांतुली में बांधा करती थी जो घास काटते समय उनका मन भी लगाये रहती थी और घास में छिपे सांप बिच्छुओं को भी दूर भगाती थी, ऎसी दरांती को छुणक्यानी दांतुली कहा जाता था।

ओ! मेरी घस्यारी वे, दांतुली को छुड़का बाजो,
दांतुली छुणक्याली वे दातुली को छुडका बाजो
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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #11 on: May 29, 2008, 12:41:44 PM »
कंसेरी


कंसेरी, कांसे और पीतल से बनी एक घंटी है, जो स्कूल में प्रयुक्त होने वाली घंटियो की तरह ही होती है और इसे भी लकड़ी की मुंगरी से बजाया जाता है। ४०-५० साल पहले तक इसे ढोल-दमाऊ के साथ भी बजाया जाता था, लेकिन अब इसका उपयोग कुछ मन्दिरो में आरती के समय  ही किया जाता है।
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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #12 on: May 29, 2008, 12:46:49 PM »
झांझ-


झांझ कांसे की पतली चादर से बना एक वाद्य यंत्र है, यह मजीरे का बड़ा रुप है, इसकी आमने-सामने की कटोरियों का व्यास १२ इंच तक होता है तथा इसे आपस में थाप देकर बजाया जाता है। यह मुख्य रुप से छोलिया नृत्य में बजाया जाता है। साथ ही मंदिरों में नौबत बजाते समय भी इसका उपयोग होता है।
     इसे बजाने वाला बारात में छोलियाओं को नृत्य के लिये प्रेरित करता है और छपेली और जोड़ भी गाता है।
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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #13 on: May 29, 2008, 12:51:36 PM »
चिमटा


चिमटा आप सभी मे किचन में देखा होगा, लेकिन उत्तराखण्ड में इसे वाद्य यंत्र के रुप में भी प्रयुक्त किया जाता है। यह किचन में उपयोग होने वाले चिमटे से काफी बड़ा होता है और इसकी दोनों भुजाओं में खंजरी की तरह ही लोहे और पीतल के छल्ले लगे होते हैं, जिसे गांवों में कीर्तन के समय बजाया जाता है और यह मधुर धुन उत्पन्न करते हैं।
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Re: उत्तराखण्ड के लोक वाद्य/ MUSICAL INSTRUMENT OF UTTARAKHAD
« Reply #14 on: May 29, 2008, 01:23:55 PM »
Thanks Mahar ji for the great and exclusive info.

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