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Author Topic: Musical Instruments Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के लोक वाद्य यन्त्र  (Read 5747 times)

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Offline पंकज सिंह महर

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साथियो,
     सभी अवगत ही हैं कि उत्तराखण्ड की अपनी एक समृद्ध और गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा है। किसी भी सभ्यता और संस्कृति के लिये जरुरी है उनकी सांस्कृतिक गतिविधिया और इनके लिये आवश्यक होते हैं सुर और ताल, सुर जहां कंठ से निकलते हैं वहीं ताल के लिये वाद्य यंत्रों की आवश्यकता होती है। हमारे पुरखों ने स्थानीय सुरों के आधार पर स्थानीय वाद्य यंत्र भी विकसित किये तो आइये हम बात करते हैं अपने आद्य यंत्रों पर------हुड़्का, ढोल, दमाऊं, कांसे की थाली, भोंकर, तुतुरी, रणसिंगा, डोंर, कंसेरी, बिणाई, मुरुली, जोंया मुरुली..........
« Last Edit: September 05, 2009, 03:12:40 PM by हिमांशु पाठक »
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

 

Offline पंकज सिंह महर

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मशकबीन


मशकबीन के लिये कहा जाता है कि यह एक विदेशी वाद्य है, लेकिन हमारी संस्कृति में यह काफी पहले से है तो मुझे लगता है कि यह भी हमारा प्राचीन वाद्य है।
       मशकबीन में एक चमड़े की थैली होती है, जिसमें चार छेद किये जाते है और तीन पाइप ऊपर की ओर और एक पाइप नीचे की ओर जोड़ा जाता है। साथ ही इसमें हवा भरने के लिये एक पाइप और डाला जाता है, इस पाइप में कोई छेद नहीं किया जाता, बाकी चारों पाइपों में छेद किये जाते हैं। मशक में मुंह से फूंक मार कर हवा भरी जाती है और यह हवा कंधे पर रखे अलग-अलग तीन पाइपों में जाती है और मशक में जो पाइप नीचे की ओर होता है, जिसमें छेद बने होते हैं और इन्हीं छेदों से वादक धुनें निकालता है, इस पाइप को चण्डल कहते हैं।


« Last Edit: March 25, 2009, 11:58:36 AM by पंकज सिंह महर »
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
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मशकबीन में मुख्य कार्य पाइपो का है, कंधे पर रखे तीन पाइपों में कई छेद होते हैं जो स्पीकर की तरह काम करते हैं, अर्थात आवाज को बाहर निकालते हैं, नीचे को लटका बांसुरीनुमा पाइप अलग-अलग धुन निकालता है और वादक के मुंह से एक पाइप लगातार मशक में हवा भरता रहता है, इस मशक को वादक अपनी बगल में दबाकर रखते हैं।
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
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इन सब के अतिरिक्त शंख और घंटी को भी उत्तराखण्ड का लोक वाद्य माना जा सकता है। शंख भी तीन तरह के होते हैं, सुर्यमुखी शंख, सामान्य शंख और उर्ध्वमुखी शंख। इनके अलावा खड़ताल, मंजीरा, खंजरी,इकतारा, दोतारा और गोपीचंद का इकतारा भी उत्तराखण्डी लोक वाद्य की श्रेणी में हैं।
आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
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दो तारा भी उत्तराखण्ड में भजन-कीर्तन के समय बजाया जाने वाला वाद्य है, लोक गीतों में भी इसका समावेश है


दो तारी को तार, भगवान भरिया भकार,
गढ़्तिर गजार, घुघुती को त्यारऽऽऽऽऽऽ
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Offline Himanshu Risky Pathak

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Very Good Info... Pankaj Daa...

लुकी छिपी बादवो में चमकी जैसी ज्यून तेरो मुख चमको
तेरा रसीला होठो बे आज मौ जै टपको

Offline पंकज सिंह महर

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धतिया नगाड़ा


धतिया का अर्थ है, धात लगाना (आवाज देना, किसी खास प्रयोजन के लिये) ऎसी जोर की आवाज लगाना जो दूर-दूर तक सुनाई दे। अपनी भयंकर गर्जना युक्त आवाज से दूर-दूर तक संदेश देने के लिये प्रयुक्त होने के कारण इसे धतिया नगाड़ा कहा जाता था।
     यहां पर "था" का प्रयोग मैंने इसलिये किया क्योंकि एक-दो जगह के अलावा अब यह नगाड़े कहीं पर हों, मेरे संग्यान में तो नहीं है। पूर्वकाल में जब आज की तरह संचार के साधन नहीं थे तो राजा को अपने राज्य में कोई अकस्मात सूचना देनी होती थी या किसी राज्य पर चढ़ाई करनी होती थी या दुश्मन ने अगर राज्य में चढ़ाई कर दी तो जनता को सचेत भी करना होता था, ऎसे में जनता को सतर्क करने और युद्ध के तैयार होने की सूचना भी इसी नगाड़े से दी जाती थी। यह नगाडा़, आजकल के नगाड़ों से कहीं ज्यादा बडा़ होता था और अष्ट धातु का बना होता था।......
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.......धतिया नगाड़ा बजाने के लिये सामंती काल में स्थान नियत होते थे, जो ऎसे स्थान पर स्थित होते थे, जहां से इसकी आवाज दूर-दुर तक पहुंच जाये। जिस पत्थर पर यह नगाड़ा बजाया जाता था उसे धती ढुंग कहा जाता था। ऎसा एक पत्थर वृद्ध जागेश्वर के पास आज भी स्थित है।
     कुमाऊं की लोक कथाओं में भी इसका वर्णन है, "बाईस भाई बफौल" में कहा जाता है कि बफौली कोट के राजा बफौल भाई जब भी इस नगाड़े को बजाते थे तो चंद राजाओं की राजधानी गढ़ी चंपावत मे, तत्कालीन राजा भारती चंद के परिवार में कुछ अनिष्ट हो जाता था। धतिया नगाड़ा बजाना भी वीरता का प्रतीक था।
      पूरे कुमाऊं में जागेश्वर धाम में चंद राजाओं द्वारा चढ़ाया गया धतिया नगाड़ा आज भी मौजूद है। इसका वजन १६ किलो है और इसके मुंह का व्यास लगभग १८ इंच है।..........
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.......उक्त धतिया नगाड़े को राजा दीपचंद ने जागेश्वर मंदिर में चढ़ाया था। इसे वृद्ध जागेश्वर के धती ढुंग से बजाया जाता था, इस स्थान से रीठागाड़ी, गंगोलीहाट, चौकोड़ी और बेरीनाग तक साफ दिखाई देता है, उस समय गंगोलीहाट में मणकोटी राजाओं का राज था। किवदंतियों के अनुसार जब यह नगाड़ा बजता था तो गंगोल में गर्भवती महिलाओं के गर्भ गिर जाते थे और जब भी यह बजता तो मणकोटी राजा के राज्य में कुछ न कुछ अनिष्ट हो जाता था।
      इस नगाड़े के सहायक वाद्य के रुप में दो बिजयसार के ढोल, दो तांबे के दमुवे, दो तुरही, दो नागफणी, दो रणसिंग, दो भोंकर और दो कंसेरी बजाई जाती थी। इसे बजाने से पहले इसकी पूजा विधिवत पंडित द्वारा कराई जाती थी।
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जोशीमठ (चमोली)। स्थानीय वाद्य यंत्रों के समाप्त हो रहे अस्तित्व को बचाने के लिए संस्कृति विभाग की ओर से जोशीमठ में वाद्य यंत्रों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। राष्ट्रीय लोक नृत्य महोत्सव में शिरकत कर चुके सांस्कृतिक सम्मान से सम्मानित युवाओं को प्रशिक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

गढ़वाल की सांस्कृतिक धरोहरों को समय के साथ विलुप्त होने से बचाने को यह कदम उठाया गया है। संस्कृति विभाग गुरू-शिष्य परंपरा को जीवंत रखने के लिए भी प्रयासरत है। इस प्रशिक्षण में ढोल, दमाऊं, हुड़का, डौंर, भूंकर, भाणू, बांसुरी का गुर स्थानीय युवाओं को भी सिखाया जा रहा है। संस्कृति विभाग उत्तराखंड के उप निदेशक डा.लालता प्रसाद ने बताया कि गढ़वाल हिमालयी क्षेत्रों के लुप्त होते वाद्य यंत्रों को बचाने व प्रोत्साहित करने का इससे अच्छा तरीका नहीं हो सकता है। प्रशिक्षक सांस्कृतिक सम्मान प्राप्त कर चुके प्रेम लाल हिंदवाल ने बताया कि विलुप्त हो रहे वाद्य यंत्रों को पुन: प्रचलन में लाने के लिए इन्हें बजाने वाले कलाकारों को विशेष प्रोत्साहन देना जरूरी है। साथ ही समय-समय पर ऊर्जावान लोगों को इन वाद्य यंत्रों को बजाने का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए। उन्होंने जानकारी दी कि सभी अभ्यर्थियों का मानदेय उत्तरी मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक विभाग पटियाला एवं संस्कृति विभाग उत्तराखंड द्वारा दिया जाएगा।



यह प्रयास बहुत ही सराहनीय है, संस्कृति विभाग की यह पहल अच्छी है, क्योंकि जिस प्रकार से आज हमारे लोक वाद्य विलुप्ति की कगार पर हैं, यदि यही क्रम चलता रहा तो ५० साल बाद जागर भी बैंड पर ही लगवानी पड़ेगी। यह जरुरी है कि समय रह्ते इनका संरक्षण किया जाय।
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एक हजार वर्ष तक जो सभ्यता कायम रहती है, उसके क्रियाकलाप धीरे-धीरे लोकप्रिय होकर एक छोटी-सी संस्कृति को जन्म देते हैं और फिर यही छोटी-सी संस्कृति हमारा आचरण बन जाती है। ढोल भी हमारे आचरण का ऐसा ही अंग है, जो पहाड़ के सोलह संस्कारों में शामिल है। यह दुनिया का एकमात्र वेद प्रतिष्ठित वाद्ययंत्र है। ढोल का अपना शास्त्र है, जिसे ढोलसागर नाम से जाना गया है। लेकिन, अफसोस! हमें ढोल के संरक्षण की चिंता नहीं है। क्या यह उत्तराखंड का राजकीय वाद्ययंत्र बनने का हकदार नहीं है? यह उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकगायक प्रीतम भरतवाण की चिंता है, जिसे उन्होंने शनिवार को प्रेस क्लब की ओर से आयोजित प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में पत्रकारों के साथ शेयर किया। प्रीतम कहते हैं कि ढोल ने हजारों वर्षो के सफर के बाद संपूर्णता पाई है, इसलिए इसके स्वरूप में छेड़छाड़ उचित नहीं। ढोल का स्वरूप बदलने की बात वही करते हैं, जिन्होंने इसे जिया नहीं। यह शास्त्रीय मानकों पर खरा वाद्य है, अलबत्ता इसका आकार छोटा जरूर किया जा सकता है।
 
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पारंपरिक वाद्ययंत्रों से रूबरू होंगे युवा

देहरादून: दिल्ली में होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में भाग लेने के लिए उत्तराखंड के लगभग 40 कलाकार इन दिनों तैयारियों में जुटे हैं। संस्कृति विभाग के निदेशक सुब‌र्द्धन ने बताया कि इन दिनों कलाकारों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसमें उत्तराखंड राज्य के समस्त जिलों के कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। यह सभी कलाकार उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे ढोल, दमाऊ, भंकौर, मसकबीन, रणसिंघा, तुर-तुरी, हुडकी डौर, नगाणा, ऊर्दमुखीनाद, सूर्यमुखी, वीणाई का प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने बताया कि स्थानीय कलाकारों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पारंपरिक लोकगीत व वाद्य यंत्रों के प्रदर्शन का मौका मिलेगा। साथ ही युवा पीढ़ी के लिए भी यह अनोखा अनुभव होगा जहां वह अपने पारंपरिक वाद्ययंत्रों को जान पाएंगे।
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जौंया मुरुली


जौंया कुमाऊनी में जुड़वा को कहा जाता है और जौंया मुरुली का अर्थ भी जुड़वा मुरुली ही है। इसमें एक मुरुली से एक स्वर निरन्तर निकलता है और दूसरी से वह स्वर निकलता है, जिसे वादक बजाना चाहता है।
     इस मुरुली को बजाना सामान्य मुरुली से कहीं ज्यादा कठिन है साथ ही इसे बनाना भी कठिन है। रिंगाल के दो तनों को ऎसे स्वच्छ तालाब में डाला जाता है, जिसमें भंवर हो, यह दोनों तने इस भंवर में घूमते रहते हैं और कुछ दिनों बाद आपस में चिपक जाते हैं, फिर जौंया मुरुली का निर्माण किया जाता है। बांई ओर के रिंगल के डंके को प्रकृति का प्रतीक माना जाता है और इसमें तीन छेद किये जाते हैं, यह छेद सत, रज और तम के प्रतीक माने जाते हैं। दांयी ओर के डंके में पाछ छेद किये जाते हैं, पुराने जानकार मानते हैं कि पांच छेद वाला डंक पंचतत्व से बनी देह का प्रतीक है।
     इसमें मुरुली की तरह लोकगीत नहीं बजते इसमे मात्र चार धुनें ही बजाई जा सकती हैं-
१- रंगीली धुन- यह एक रसिक धुन होती है, कहा जाता है कि गंगनाथ जी इसे बजाया करते थे।
२- वैरागी धुन- यह वैरागी धुन है, कहा जाता है कि इस धुन को सुनने के बाद आम आदमी में भी वैराग की भावना आ जाती है।
३- उदासी धुन
४- जंगली धुन- इसे ग्वालों द्वारा बजाया जाता है, इसे भैंसिया धुन भी कहा जाता है। कहते हैं कि इस धुन से जानवर सम्मोहित हो जाते हैं और ग्वाला अपनी धुनों से ही उन्हें निर्देश देता था।

     अब इन धुनों और इस वाद्य को बजाने वाले काफी कम लोग रह गये हैं, वैसे भी बुजुर्गों द्वारा इसे बजाये जाने से मना किया जाता है, कहा जाता है कि इस मुरुली की धुन परियो को अच्छी लगती है, जिनके प्रभाव में बजाने वाला व्यक्ति भी आ जाता है।



आज जौंया मुरुली/अलगोजा बजाने वाले एक कलाकार से रुबरु हुआ-

LAL SINGH RAWAL

Village: Thag
Post office: Kanari Chhinna (Vaya Barechhina)
District: Almora, Uttarakhand, India
Ph: 91-9410564029 (son)

One of the few artistes of this unique and fascinating instrument which is somewhere between a flute and a bagpipe, Lal Singh at the age of eighty plus still enthralls with his Algoza.

उनकी कुछ धुनें आप निम्न लिंक पर भी सुन सकते हैं।
http://www.beatofindia.com/arists/ls.htm     
« Last Edit: December 11, 2008, 03:25:48 PM by पंकज सिंह महर »
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Dying beat of Uttarakhand 'dhol'


 Dusk has descended on the Garhwal hills and the music of the local drum and bagpipe keeps a small crowd, riveted to its haunt, on a beaten track. This, however, may be one of the last few times they get to hear it. Music from the Uttarakhand "dhol," or drum, once enveloped these entire hills. Today, these beats sound the knell of not just one of the finest instruments but also of a people.

"There are only 10 people left on these hills who know the complete art of playing the dhol. It is just not a viable option for us drummers any more," says Sohan Lal, 32, one of the very few who still plays the dhol. "Once the dhol dictated our entire lives; we played it when a child was born, at weddings, at deaths and at any other ceremony. Today, we don't get to hear it even on special occasions."

A socially marginalized group of people called "Das" usually plays the dhol. The instrument is integrally bound to the social and religious lives of the hill people.

"Every village used to have four or five Das families and only one is called to play the dhol at a village function," says Lal.Once little bands of musicians wound their way to different villages on the hill slopes.

Hindu epics and stories were recited and set to the beat of the dhol. These festivities could go on for as long as 1,000 hours. "Pavade", or traditional songs in praise of god, were sung for three days and three nights to the accompaniment of the dhol."There is not enough money in it. The brass bands are called at all the functions and they get the lion's share of the money," complains Lal. "There is no respect for us.

Villagers get drunk, abuse us and create a scene. How can we continue to play like this?" Lal has written a book on the dhol with a view to preserving the dying art. "There has not been any documentation of the dhol music before this," he says. Many drummers have moved to the plains in search of jobs. Besides there are no musicians left to teach the younger generation an art form that was once also used to communicate messages over vast distances.

Even historically, arts and crafts of Uttaranchal have had it tough. While arts flourished under royal patronage in other parts, it was different in this region. Royal patronage was only salutary, since the local princedoms were too poor to afford the luxury of court musicians and dancers.

The economy of performing arts in the region has therefore always been fragile. Today the dhol is dying a natural death. These drummers are desperately looking for new ways to keep the home fires burning. Small efforts are under way to help this community to revive the music of their dhols.

The Shri Bhuvaneshwari Mahila Ashram (SBMA) here is trying to identify the problems of the drummers and arrange for artistes to teach it to the younger generation.

There are those who can play the dhol but very few who can teach it," says Gajendra Nautiyal of the Indian People's Theatre who coordinates with SBMA in an effort to preserve the art form.

"We plan to organize live performances of the dhol. We will also plan to find master trainers and have a residential training course here for eight children at a time," says Nautiyal.

"We are living with the last generation of dhol players, we have to save this music before it dies out" says Lal, for whom the beat of the dhol is still more than a way of life.
"जुगराज रैया या धरती और याखाका मनखी जय देवभूमि उत्तराखंड "

http://myaarupahad.blogspot.com/

 

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