Author Topic: Songs On Bird Ghughuti - घुघुती पक्षी पर रचित उत्तराखंड के सबसे ज्यादे गाने  (Read 14683 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड की पहली लोक गायिका कबूतरी देवी ने यह गाने में घुघूती के बारे जिक्र किया है :

      नी बासु घुघती
    लागेछी हिकुरी

    काटी हाछे यो पापी कलेजी


     नी बासु घुघती
    लागेछी हिकुरी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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See in this Jod also, there is mentioned about Ghughti Bird.

    Ghut- Ghut Batuli Laagi, Meri Gawa ma
    Mai Yekuli Kasi Runa Swami, Yo pahada ma

   Jod..

    Yo dano maa ghughti Ghurachhe
     Meeka Yaad Dilandi, apanu maiki .



pushkar_429

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aap sabhi logon dwara yahan pe diye gaye sabhi bichar achhe lage..

ghughuti ghuron legi mera mait ki...

baudu baudi ayege ritu ritu chet ke,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Tu ni basa.. ghughuti ruma jhuma, mera maita ka disha ruma jhuma...2
Dhukha-sukha kaithai me kunu, tera bata chaeye raijanu,
tura-turo karuchha parana, mera aankha suva dabdabana
tu ni basha.........

umeshbani

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बचपन में घुघुती घुघुती  आम का छु ?..............

Risky Pathak

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1 more old song..

Ghoor ghuguti ghura ghura... Neen hai ge chura chura.. Ghuguti naa ghuraa.. Mita desha dooraa...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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There is mentioned about Ghughuti Bird written by our senior members D N Badola.
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Bhitauli festival of Kumaon

For the married women, the month of Chaitra has special significance. They feel great psychological attachment for Chaitra Mash, as they are remembered by their brothers and parents who offer them presents called Bhitauli. They patiently wait for the arrival of this month. A Kumaoni song depicts their feelings

Ni Ghughuti (bird) Chait ki;
Mikoon narwai lagi Chait ki.basa
 
नि घुघूती चैत की,
 मिकूं नरवाई लगी चैत की बसा 

‘This year so far I have not heard the melody of singing Ghughuti. I remember the month of Chaitra very much’.


Ghughuti Bird (Rufous turtle dove)


A family which is fortunate to have brothers, sisters and others express their sentiments in the following way.

Derani jithaani ka ijoo, main bhetuli lyangay we;
Bojyu myara sunla, angiya maulala we,
Iju meri sunli, bhai bhetu lagali we.

दिरानी जेठानी का इजू, भै  भैटुली ल्वेंगे वे;
बौज्यू मेरा सुनला, अंगिया मौलाला वे ,
इजू मेरी सुणली भै भैटू लगाली वे

The sister without any brother laments:

Ichali kanyali ijoo, ghughuti ghurailee;
Bin bhaiya ki banuwan, anshu jai dawelee we.

इचाली कन्याली इजू, घुघूती घुरैली;
बिन भैया की बैनुवा, आंसू जै ढवेली  वे

The Ghughuti bird flies from field to field and the girl remembers her brother.  But the girl has no brother, hence she sings as above.


Ghughuti Bird

The folk song contains blessings to the daughters and also welcome the New Year called Nav Samvastshar.

जो भागी जियाला इजू,
नौ ऋतू सुनौलौ वे, अबावे य दिन य मास;
जुग जुगा भेटी आला

Devbhoomi,Uttarakhand

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घुघुती
प्यारी घुघूति जैलि मेरी मांजी तैं पूछि एैलि पहाड़ के इस लोकगीत में छिपी उदासी कठोर से कठोर हृदय को भी पिघला देती है। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल के लोकजीवन की बात हो और उसमें घुघुती का जिक्र न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। पहाड़ में सुख-दु:ख, संयोग-वियोग, खुद, प्यार-दुलार, त्याग और वहां की संपूर्ण संस्कृति से घुघुती का अटूट रिश्ता है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गढ़वाल-कुमाऊं के लोकगीतों में इसे समान रूप से प्रमुखता मिली है। पर्वतीय अंचल में सभी जगह पाई जाने वाली घुघुती ही एकमात्र ऐसा पक्षी है, जिसका यहां के संपूर्ण जनमानस और संवेदनाओं के साथ बेहद करीबी संबंध है। पहाड़ की माटी के रंग में रची-बसी और दिखने में बेहद सुंदर घुघुती की घूर-घूर बरबस ही अपनी ओर खींचती है। यह आज से नहीं बल्कि सदियों से पहाड़ी लोकजीवन का अहम् हिस्सा है। यही वजह है कि लोकरंग में जितना महत्व घुघुती को मिला है, उतना किसी अन्य पक्षी को नहीं। लोकगीतों का ही जिक्र करें तो प्यारी घुघूति जैलि मेरी मांजी तैं पूछि एैलि. लोकप्रिय खुदेड़ गीत आज भी आंखों को नम कर देता है। देश के आन-बान- शान की हिफाजत को सरहद पर तैनात अपने फौजी पति की यादों में खोई उसकी पत्नी घुघुती की घूर-घूर सुनते ही कह उठती है-ना बास घुघुती घूर-घूर, स्वामि जयां छन दूर-दूर..। घुघुती के उड़ने पर पति याद में उदास पत्‍‌नी को उसका संदेशा पति तक पहंुचने की अनुभूति होती है। ना बासा ना बासा, घुघुती न बासा, अमै की डाई मां घुघुती न बासा.., घुघुती घुरौण लैगे मेरा मैत की, बौडि़-बौडि़ ऐगे ऋतु चैत की., ना बास घुघुती चैत की खुद लगीं च मां मैत की. समेत अन्य तमाम लोकगीत आज भी कर्णप्रिय हैं। ये सभी सुख-दु:ख, संयोग-वियोग, रैबार, खुद, स्नेह आदि से जुड़े हैं। यानी पहाड़ के कण-कण से गहरा नाता है घुघुती का और यह पहाड़वासियों के दिलों पर राज करती है। लोगों का कहना है कि पहाड़ी संस्कृति में रची-बसी घुघुती के संरक्षण के लिए भी सरकारी स्तर पर प्रयास होने चाहिएं।




 

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