Author Topic: Tribute To Gopal Babu Goswami - गोपाल बाबू गोस्वामी(महान गायक) की यादे  (Read 38292 times)

प्रहलाद तडियाल

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घुरू घुरू उज्याव है गो का अनुवाद


हौले हौले सुबह की उजास हो गई है
जंगलों में सरसराहट है
बंसुरी के सुर बजने लगे हैं
हौले हौले सुबह की उजास हो गई है

ग्रह्स्वामिनी जागने लगी है
देवीदेवता और हिमशिखर जागने लगे हैं
शिव के डमरू की धमक
मेरे हिमालय में गूंजने लगी है
घंटियां भी टुनटुनाने लगी हैं
हौले हौले सुबह की उजास हो गई है

हाथों में तांबे की गगरियां लिये
सुघड़ नारियां पानी भर लाने को चल दी हैं
रस्ते-बाटों में घुंघरू छ्मकाती इन स्त्रियों की
गगरियों से पानी के छ्लकने की
मीठी आवाज़ निकल रही है
हौले हौले सुबह की उजास हो गई है

Risky Pathak

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ोपाल बाबू गोस्वामी ने उत्तराखण्ड के लोकसंगीत को सरल भाषा व लोकवाद्यों के साथ जनता के सामने रखा. वह अकेले नही तो सर्वप्रथम गायक हैं जिन्होने कुमाऊँनी-गढवाली दोनों आंचलिक भाषाओं में गाने गाये. गोपाल बाबू गोस्वामी ने अपने मीठे कंठ और सुमधुर संगीत से सजे कुमाऊनी-गढवाली गानों की बदौलत उत्तराखण्ड और देश के अन्य भागों में भी खासा नाम कमाया. जो निर्वात गोस्वामी जी के असमय निधन से उत्पन्न हुआ वो इतने साल बाद भी भरा नही जा सका है. गोपाल दा का जन्म अल्मोडा जनपद के पाली पछाऊँ तहसील, पट्टी गेवाड चौखुटिया, ग्राम चाँदीखेत में 2 फरवरी 1941 को हुआ. परिवार में पिता श्री मोहन गिरी , माता श्रीमती चनुली देवी और एक बहन राधा देवी थीं.  5वीं कक्षा चौखुटिया से ही पास की लेकिन 8वीं पास करने से पूर्व ही पिता का देहावसान हो गया. गोपाल को युवा होने से पहले ही पहाडी बेरोजगारों की परम्परानुसार दिल्ली में नौकरी के लिए भटकना पडा. प्राइवेट नौकरी की.  अस्थायी कर्मचारी के तौर पर डी.जी.बी.आर. में नौकरी की. नौकरी पक्की नही हो सकी. वापस गांव आकर खेती-बाडी करने लगे. 1970 में गीत और नाटक प्रभाग का एक दल चौखुटिया गया.गोस्वामी जी उनके सम्पर्क में आये. नैनीताल में साक्षात्कार हुआ और 1971 में गीत और नाटक प्रभाग में नियुक्ति मिल गयी. गोस्वामी जी तब कुमाऊँनी गाने गाते थे लेकिन शोहरत से दूर थे. प्रभाग के मंच पर आकर उन्होने आकाशवाणी लखनऊ में अपना पहला गाना "कैले बजै मुरुली ओ बैणा, उंचि-निचि डांन्यू मां" गाया, जो लोकप्रियता के उच्चतम शिखर को छू गया. उनके आकाशवाणी अल्मोडा और नज्ञीबाबाद से प्रसारित होने वाले गानों का लोगों को बेसब्री से इन्तजार रहने लगा. मित्रों द्वारा प्रोत्साहित करने पर 1976 में पहली कैसेट एच.एम.वी. से निकली.  उनकी काफी कैसेट रिलीज हुई, जिन्हें लोगों ने बहुत अधिक पसन्द किया. उनके गानों में पहाड का सौन्दर्य था, तो सामान्य जनमानस की सोच तथा सामाजिक मुद्दों पर भी वो चुटकियां लेते थे. गोस्वामी जी का कन्ठ के मधुरता गजब की थी. उनकी यह भी विशेषता थी कि वह ऊंचे पिच के गानों को भी वह बडी सहजता से गाते थे.   उनके द्वारा गाये गये गीत विदेशों तथा मैदानी इलाकों में रहने वाले उत्तराखण्डी लोगों में भी बेहद लोकप्रिय हुये. गोपाल दा द्वारा गाये गये गानों की एक लंबी सूची है. इनमें से कुछ ये हैं बेडू पाको बारामासा , जै मैया दुर्गा भवानी , रुपसा रमौति घुंघुर नि बजा छुम-छुमा , भुर-भुर उज्यावो हैगो , मालुरा हरयाला डांड का पार , आखि तेरि कायी-कायी , नै रो चेली नै रो , हिमाला का ऊंचा डांडा आदि गोस्वामी जी ने हिन्दी तथा कुमाउनी में कुछ किताबें भी लिखीं. जिनमें दर्पण , राष्ट्रज्योति , जीवनज्योति (हिन्दी) , गीतमाला ( कुमाउनी ) प्रमुख हैं. एक पुस्तक उज्याव अप्रकाशित है. गोपाल दा की पूरी जिन्दगी उतार-चढाव के बीच गुजरी. उन्हें ब्रैन ट्यूमर हो गया, AIIMS में सर्जरी हुई लेकिन अन्ततः 26 नवम्बर 1996 को गोपाल दा ने शरीर त्याग दिया. लेकिन अपने गानों के साथ गोपाल दा आज भी उत्तराखण्ड के हर निवासी के अन्दर जिन्दा हैं. गोपाल दा की कमी आज भी खलती है.

प्रहलाद तडियाल

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le ek orr sundoo pe.............
घुघूती बासूती

घुघूती कबूतर जैसी एक चिडिया होती है जो बौर आने के साथ ही आम के पेडों पर बैठ कर बहुत उदास तरीके से गुटरगूँ करती है. पहाडी प्रेमिकाएं इसी पाखी के माध्यम से परम्परागत प्रेम का एकालाप किया करती हैं.
बच्चों को सुलाने के लिये भी इस की घुरघुर का प्रयोग माताएं किया करती हैं. बच्चों को पैरों पर बिठा कर घुघूती बासूती कहते हुए झुलाया जाता है. बच्चे थकने के साथ साथ मज़े भी बहुत लेते हैं.
घुघूती न बोल, घुघूती न बोल
आम की डाली में घुघूती न बोल

तेरी घुर्घुर सुन कर मैं उदास हो बैठी
मेरे स्वामी तो वहां बर्फ़ीले लद्दाख में हैं

भीनी भीनी गर्मियों वाला चैत का महीना आ गया
और मुझे अपने पति की बहुत याद आने लगी है

तुझ जैसी मैं भी होती तो उड के जाती
जी भर अपने स्वामी का चेहरा देख आती

उड जा ओ घुघूती लद्दाख चली जा
उन्हें मेरा हाल बता देना



पंकज सिंह महर

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प्रह्लाद दा बहुत बढ़िया कार्य किया है आपने।
गोपाल दा का इतना जीवन्त वृतान्त मैंने आज तक नहीं पढा था।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Thanx. Prahald ji.

We want to put lyrics of Goswami Ji’s those songs were which new generation had hardly listened.  We will try our best do the same.


ोपाल बाबू गोस्वामी ने उत्तराखण्ड के लोकसंगीत को सरल भाषा व लोकवाद्यों के साथ जनता के सामने रखा. वह अकेले नही तो सर्वप्रथम गायक हैं जिन्होने कुमाऊँनी-गढवाली दोनों आंचलिक भाषाओं में गाने गाये. गोपाल बाबू गोस्वामी ने अपने मीठे कंठ और सुमधुर संगीत से सजे कुमाऊनी-गढवाली गानों की बदौलत उत्तराखण्ड और देश के अन्य भागों में भी खासा नाम कमाया. जो निर्वात गोस्वामी जी के असमय निधन से उत्पन्न हुआ वो इतने साल बाद भी भरा नही जा सका है. गोपाल दा का जन्म अल्मोडा जनपद के पाली पछाऊँ तहसील, पट्टी गेवाड चौखुटिया, ग्राम चाँदीखेत में 2 फरवरी 1941 को हुआ. परिवार में पिता श्री मोहन गिरी , माता श्रीमती चनुली देवी और एक बहन राधा देवी थीं.  5वीं कक्षा चौखुटिया से ही पास की लेकिन 8वीं पास करने से पूर्व ही पिता का देहावसान हो गया. गोपाल को युवा होने से पहले ही पहाडी बेरोजगारों की परम्परानुसार दिल्ली में नौकरी के लिए भटकना पडा. प्राइवेट नौकरी की.  अस्थायी कर्मचारी के तौर पर डी.जी.बी.आर. में नौकरी की. नौकरी पक्की नही हो सकी. वापस गांव आकर खेती-बाडी करने लगे. 1970 में गीत और नाटक प्रभाग का एक दल चौखुटिया गया.गोस्वामी जी उनके सम्पर्क में आये. नैनीताल में साक्षात्कार हुआ और 1971 में गीत और नाटक प्रभाग में नियुक्ति मिल गयी. गोस्वामी जी तब कुमाऊँनी गाने गाते थे लेकिन शोहरत से दूर थे. प्रभाग के मंच पर आकर उन्होने आकाशवाणी लखनऊ में अपना पहला गाना "कैले बजै मुरुली ओ बैणा, उंचि-निचि डांन्यू मां" गाया, जो लोकप्रियता के उच्चतम शिखर को छू गया. उनके आकाशवाणी अल्मोडा और नज्ञीबाबाद से प्रसारित होने वाले गानों का लोगों को बेसब्री से इन्तजार रहने लगा. मित्रों द्वारा प्रोत्साहित करने पर 1976 में पहली कैसेट एच.एम.वी. से निकली.  उनकी काफी कैसेट रिलीज हुई, जिन्हें लोगों ने बहुत अधिक पसन्द किया. उनके गानों में पहाड का सौन्दर्य था, तो सामान्य जनमानस की सोच तथा सामाजिक मुद्दों पर भी वो चुटकियां लेते थे. गोस्वामी जी का कन्ठ के मधुरता गजब की थी. उनकी यह भी विशेषता थी कि वह ऊंचे पिच के गानों को भी वह बडी सहजता से गाते थे.   उनके द्वारा गाये गये गीत विदेशों तथा मैदानी इलाकों में रहने वाले उत्तराखण्डी लोगों में भी बेहद लोकप्रिय हुये. गोपाल दा द्वारा गाये गये गानों की एक लंबी सूची है. इनमें से कुछ ये हैं बेडू पाको बारामासा , जै मैया दुर्गा भवानी , रुपसा रमौति घुंघुर नि बजा छुम-छुमा , भुर-भुर उज्यावो हैगो , मालुरा हरयाला डांड का पार , आखि तेरि कायी-कायी , नै रो चेली नै रो , हिमाला का ऊंचा डांडा आदि गोस्वामी जी ने हिन्दी तथा कुमाउनी में कुछ किताबें भी लिखीं. जिनमें दर्पण , राष्ट्रज्योति , जीवनज्योति (हिन्दी) , गीतमाला ( कुमाउनी ) प्रमुख हैं. एक पुस्तक उज्याव अप्रकाशित है. गोपाल दा की पूरी जिन्दगी उतार-चढाव के बीच गुजरी. उन्हें ब्रैन ट्यूमर हो गया, AIIMS में सर्जरी हुई लेकिन अन्ततः 26 नवम्बर 1996 को गोपाल दा ने शरीर त्याग दिया. लेकिन अपने गानों के साथ गोपाल दा आज भी उत्तराखण्ड के हर निवासी के अन्दर जिन्दा हैं. गोपाल दा की कमी आज भी खलती है.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गोस्वामी जी के इस भजन मे पहाड़ के देवताओ की वंदना

जय जय हो बद्री नाथ
जय काशी केदार जय जय हिमाला

शिव जी की तप भूमि
यो पार्वती का मैत
जय जय हिमालय

पंचाचोली नंदा देवी
जय जय गोमुखा
संतो की तपो भूमि
जय हरी हरिद्वार
जय जय हिमाला

जाग नाथ बागनाथ
जय जय हो बद्री नाथ
जय काशी केदार जय जय हिमाला

दुंग माटा मे राम श्याम
डाई बोटी भगवान् रे

Mukesh Joshi

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गोपाल दा की आवाज और पहाड़ एक दुसरे के पूरक है
कभी तो में सोचता था की पहले कोन जन्मा
ये आवाज  समस्त उत्तराखंड की वादियों में घुली है
जो थके हारे को जीवांतृत करती है और करती रहेगी
मन को स्वर्ग की अनुभूति कराती है 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गोस्वामी जी का यह गाना.. गोस्वामी जी ने यह गाना पुरूष एव महिला दोनों की आवाज में ख़ुद इस गाने को गाया है !

पुरूष 

त्वीके कैले दियाना छा
झनका फुना ...
त्वीके कैले दियाना छा
झनका फुना ...

महिला

बाजू ले दियाना छा
झनका फुना ...


पुरूष
जो तेरा बाजू वो मेरा सौरा
त्वीके कैले दियाना छा
झनका फुना

महिला

ईजा ले दियाना छा
झनका फुना ...

पुरूष
जो तेरा ईजा वो मेरी सासू 
त्वीके कैले दियाना छा
झनका फुना

इस प्रकार से रिस्तो को जोड़ -२ यह गाना आगे बढता है !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गोस्वामी जी सबसे सदाबहार गाना . जिसकी धुन "जब वी मेट" हिन्दी फ़िल्म मे भी लिया गया "

कैले बजे मुरूलीऽऽऽऽऽऽ
वो बैणा
ऊँची नीची डाणों मां
चीरी है कलेजी,
ऊ देख मन मां,

मेरी मैते की भगवती
तू दैणी ह्वै जाए
कुशल मंगल मेरा स्वामी घर ल्याये,
नगारा निशा्णा ल्यूहलो देवी
मैं तेरा थाना में

कैले बजे मुरूली
ओ बैणा
ऊँची नीची डाणों मां

भूमि का भूमिया देवो
तुम धरी दिया लाज
पंचनाम देबो तुम
स्वामी रया साथ,
दगडा रया होऽऽऽऽऽ देवो
स्वामी का साथ मां

कैले बजे मुरूली
ओ बैणा
ऊँची नीची डाणुं मां/b]

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गोस्वामी जी यह गाना जो शादी पर बना है ! जब बेटी सुसराल के लिए बिदा होते है उस समय बाप अपनी बेटी से क्या कहता है इस गाने मे लिखा है !

     बैटी बराता चेली बैठ डोली मा
   बाट लागी बराता चेली बैठ डोली मा

   बाट घाटा भली के जाए
   मेरी कलेजी तो छे तुकुडा
   मेरी धरिये लाज चेली  बैठ डोली मा

   बाट लागी बराता चेली बैठ डोली मा
 
   बैटी बराता चेली बैठ डोली मा
   बाट लागी बराता चेली बैठ डोली मा

 

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