Author Topic: उत्तराखण्ड के वीर सेनानी- Brave soldier of Uttarakhand  (Read 13997 times)

पंकज सिंह महर

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साथियो,
      देवभूमि उत्तराखण्ड  वासियों की कुछ चारित्रिक विशेषतायें हैं, ये हैं- स्वाभिमान, शौर्य, देश भक्ति और सन्तोष। इन्हीं गुणों से सराबोर है उत्तराखण्ड का अतीत और वर्तमान, हमारी गौरव गाथायें विश्व भर में अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इस क्षेत्र के लोगों के शौर्य और रणकुशलता से अंग्रेज भी इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इतने दूरुह, छोटे और पिछड़े क्षेत्र के लोगों के लिये अलग से रेजीमेन्ट स्थापित की थीं।
     इस टोपिक के अन्तर्गत हम उत्तराखण्ड के उन्हीं नौनिहालों तथा रणबांकुरों का परिचय देने का प्रयास करेंगे।

पंकज सिंह महर

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आनरेरी कैप्टेन उत्तम सिंह सामन्त (क्षत्रिय) Uttam Singh Samant (kshatriya)


उत्तम सिंह सामन्त (जिन्हें अंग्रेज अधिकारियों द्वारा क्षत्रिय कहा गया था) ग्राम उड़ई, देवलथल, जनपद पिथौरागढ़ के रहने वाले थे। इनका जन्म १९०८ में हुआ था।
द्वितीय विश्व युद्ध का सूरमा, अपनी श्रेणी का अकेला राजभक्त, युद्ध क्षेत्र में अपूर्व शौर्य प्रदर्शन के लिये "मार्शल क्रास" और "मिलेट्री क्रास इन वार" सम्मान से सम्मानित।
     १६ अप्रैल, १९४४ को कोहिमा का ऎतिहासिक युद्ध समाप्त हुआ और २७ मई, १९४५ को प्रकाशित अंग्रेजी सरकार के गजट में सूबेदार उत्तम सिंह क्षत्रिय की जोरदार तारीफ की गई और उन्हें "मार्शल क्रास" से सम्मानित किया गया। राजस्थान रायफल्स के राजपूत सैनिकों ने इनके सम्मान में निम्न पंक्तियों को युद्ध भूमि में लड़ाई का मजमून बनाया- "लक्ष्मीबाई की कहां राख है, सिर से उसे लगा लें हम, उत्तम सिंह का कहां क्रोध है, गात रक्त गरमा लें हम" 
       द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर की मृत्यु के बाद अखिल विश्व में अपनी हूकुमत की इच्छा रखने वाले जापान ने भारतीय सीमा तक घेर ली थी। यह खबर पाते ही आसाम रायफल्स के कमांडिंग आफीसर ने सूबेदार उत्तम सिंग के नेतृत्व में १६ वीं प्लाटून आपू पहाड़ी पर भेज दी। २ अप्रैल, १९४४ को उत्तम सिंह अपनी प्लाटून लेकर आराधूरा नामक टीले पर पहुंचे। जापानी सेना मिनिस्टर हिल की तरफ आगे बढ़ रही थी, यहीं पर सूबेदार उत्तम सिंह ने जापानी टुकड़ी को अपने कब्जे में ले लिया। इस आपरेशन में जापानी सेना के १५ जवान मारे गये, हमले में जापानी कमाण्डर तराकोने भाग निकला। हैड क्वार्टर लौटते ही इन्हें जापान अधिकृत कोकीटीला और टेनिस ग्राउण्ड जाने का हुक्म हुआ, इस पूरे क्षेत्र पर जापानी सेना का कब्जा था। यहीं पर शहीदों की याद में अंग्रेज बादशाह जार्ज पंचम ने दुनिया की सबसे बड़ी वार सिमेट्री बनवाई थी। इसी वार सिमेट्री के पास उत्तम सिंह ने सिपाही अमर बहादुर थापा को साथ लेकर जापानी सेना के ओ०पी० को धराशाई किया था। फलस्वरुप १६१ इण्डियन इन्फेन्ट्री ब्रिगेड की सारी यूनिटें आगे बढ़ सकीं। आठ घंटॆ के भयंकर युद्ध के बाद जापानी सेना मोर्चा छोड़कर भाग गई और कोकोटीला पर ब्रिटिश सेना का कब्जा जो गया। किन्तु आगे जेल हिल के पास उत्तम सिंह को दुश्मन की गोलियों ने घायल कर दिया, इनका सारा शरीर छलनी हो गया, इनके शरीर को दुश्मनों ने संगीनों से घोंप डाला। शिलांग मिलेट्री हास्पिटल में इनके शरीर से १२ गोलियां निकाली गई। इसी बहादुरी के सम्मान स्वरुप इन्हें "मार्शल क्रास" से सम्मानित किया गया।

       ..............छह महीने के इलाज के बाद सूबेदार उत्तम सिंह को फिर से युद्ध क्षेत्र में जाने का हुक्म हुआ। कोहिमा से १६१ इण्डियन इन्फैन्ट्री ने कूच कर सामरा तथा होमलिन में पड़ाव डाल रखा था। उधर यू रिवर के पास १९ इण्डियन डिवीजन का कब्जा था, लेकिन ब्रह्मपुत्र और इरावदी नदी के पार जापानी सैनिकों का कब्जा था। उत्तम सिंह अक्टूबर १९४४ में चिनमिन दरिया पार कर साइपू पहुंचे तो कर्नल स्टेनली ने इन्हें इरावदी नदी पार करने का हुक्म दिया, नाव से जब ये नदी पार कर रहे थे तो दुश्मन ने इन पर हमला बोल दिया, लेकिन अपने बुलन्द हौसले के बल पर सूबेदार उत्तम सिंह नदी पार पहुंच गये, लेकिन दुश्मनों ने इन्हें फिर से घेर लिया। रात के अन्धेरे का फायदा उठाकर जब ये लोग चमू पहुंचे तो यहां इन्हें सूचना मिली कि आसाम रायफल्स के कई जवान और कर्नल बोन जापानियों के हाथों मारे गये हैं और शेष बटालियनें भी वापस जा चुकी हैं। आखिर फरवरी, १९४५ में ये लोग सेबू के डिवीजन हैड क्वार्टर पहुंचे, मांडले पर १५,४ और ३३ ब्रिटिश कोर का घेरा था। चिनमिन तथा इरावदी नदी के बीच जनरल मोहन सिंह के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज भी वहां पर लड़ रही थी, उत्तम सिंह इस इलाके में महीनों गश्त करते रहे, इसी दौरान उन्होंने जापानियों पर हमला कर जापान द्वारा निर्मित लड़ाई का महत्वपूर्ण नक्शा अपने कब्जे में ले लिया। उसी नक्शे के आधार पर इन्होंने जापान पर हमला कर दिया और उसे तबाह कर दिया।  ११ अगस्त, १९४५ को जापान ने आत्म समर्पण कर दिया, जापान की तबाही के बाद लार्ड माउण्टबेटन ने मांडाले पर यूनियन जैक लहराया। इस कुशल अभियान के बाद सूबेदार उत्तम सिंह को दिल्ली में वायसराय लार्ड बेथल ने "मिलेट्री क्रास इन वार" से दोबारा सम्मानित किया। जूनियर होते हुये भी इन्हें सूबेदार मेजर बना दिया गया। इस पद पर यह १९६४ तक रहे।
     १९६४ में इन्हें भारत के राष्ट्रपति डा० एस० राधाकृष्णन का प्रमुख ए०डी०सी० बनाया गया, अनपढ़ होते हुये भी इन्हें कम्पनी कमाण्डर का पद दिया गया। २६ नवम्बर, १९६८ को ३९ सालों की शौर्य से भरी सराहनीय सैन्य सेवा के बाद इन्होंने अवकाश ग्रहण कर लिया। सेवा निवृत्त होने के बाद यह अपने पैतृक गांव उड़ई, देवलथल आ गये और १० साल तक ग्राम सभा के सभापति रहे। अपनी जिन्दगी भर उत्तमों में उत्तम रहे उत्तम सिंह राष्ट्र के लिये गौरव हैं।

***श्री शक्ति प्रसाद सकलानी जी द्वारा लिखित उत्तराखण्ड की विभूतियां से साभार टंकित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Rajesh Singh Adhikari


Major Rajesh Singh Adhikari, MVC was an Indian Army officer who died during the Kargil War. He was posthumously awarded the second highest Indian military honour - the Maha Vir Chakra for bravery on the battlefield.

Early life
Rajesh Singh Adhikari was brought up in Nainital, a picturesque hill station in northern India. He attended the prestigious St. Joseph's College and Kumaon University at Nainital.


[edit] Life in the Indian Army
He attended the Indian Military Academy, a premier military acdamey in India. After passing out of the Academy, he joined the 18th Grenadiers[Mech. Infantry] of the Indian Army.


[edit] Death
When heavy fighting broke out in the Kargil region of the Indian state of Jammu and Kashmir owing to planned infiltration by militants backed by the Pakistan army, the Indian Army was ordered to clear the heights of those intruders. Many tough battles took place in the region. It was one of the most significant battles, the Battle of Tololing, where Rajesh made a valiant sacrifice. He was posthumously awarded the second highest Indian Army decoration - Maha Vir Chakra for his actions in the battle.

http://en.wikipedia.org/wiki/Rajesh_Adhikari

पंकज सिंह महर

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सूबेदार चन्द्र सिंह बसेड़ा (चन्दरी चन्द्र) Chandra Singh Basera (Chandri chandra)

जन्म- १८९० के आस-पास,
ग्राम- भण्डारी गांव, देवलथल,
पिथौरागढ़।
प्रथम विश्व युद्ध का अलबेला रणबांकुरा और कुमाऊं रेजीमेण्ट का कल्पना शिल्पी।


प्रथम विश्व युद्ध लगभग अन्तिम चरण पर था, ब्रिटिश सेनायें अन्तिम दम तक लड़कर जर्मन और तुर्क सेनाओं को पछाड़ने का प्रयास कर रही थीं। अंग्रेज सैनिक अफसर इराक के मेसापोटामिया मैदान में तैनात तुर्क सेनाओं के मोर्चे को विफल करने के उद्देश्य से भारतीय सैनिकों की छिन्न-भिन्न टुकड़ियों को एकत्र कर रहे थे। इसी क्रम में दिसम्बर, १९१६ में बर्मा मिलेट्री पुलिस से २०० कुमाऊंनी सैनिकों को ३७ डोगरा रेजीमेन्ट में सम्मिलित कर दजला नदी के कुट सेक्टर के समीप बने एम २० पोस्ट पर भेजा गया। दूसरे किनारे पर तुर्क सेनायें डटी थीं, १२ फरवरी, १९१७ को १०२ ग्रिनेडस के कप्तान क्रिस्टी के नेतृत्व में कुट क्षेत्र पर आक्रमण हुआ, जिसमें ग्रिनेडस को भारी नुकसान उठाना पड़ा। परन्तु दूसरे प्रयास में एम २० मोर्चे को कामयाबी मिल गई। ३७ डोगरा रेजीमेन्ट की २ कम्पनियों का उन्हें सहायता पहुंचाने तुरन्त जाना पड़ा, इसी कम्पनी में सूबेदार चन्द्र सिंह बसेड़ा तैनात थे। दजला नदी के इस सपाट तट पर आगे बढ़ रहे इन भारतीय सिपाहियों को तुर्क सेना द्वारा की गई भारी मशीनगन फायरिंग झेलनी पड़ी, जिसमें भारी जनहानि हुई। दोनों ब्रिटिश अफसर शहीद हो चुके थे, इन नाजुक क्षणों में अपने विवेक तथा साहस का परिचय देते हुये सुबेदार चन्द्र सिंह बसेड़ा ने कम्पनी की कमाण्ड अपने हाथों में ले ली और तोपखाने के झण्डे को फहराते हुये, गोलियों की बौछार के बीच बढ़ते हुये फतह हासिल करके ही दम लिया। इससे तुर्क सेना का मनोबल टूट गया और ब्रिटिश सेना अपने मकसद में कामयाब हुई।
       इस वीरता भरे कारनामे को अंतिम क्षण पर अंजाम देने वाले सूबेदार चन्द्र सिंह बसेड़ा को युद्ध क्षेत्र में ही आई०ओ०एम० (इण्डियन आर्डर आफ मैरिट) से सम्मानित किया गया, यह भारतीय सैनिको को दिये जाने वाला उस समय का सर्वोच्च सम्मान था। उस समय तक विक्टोरिया क्रास केवल ब्रिटिश सैनिकों को ही दिया जाता था। उनके लिये जंगी इनाम अलग से घोषित किया गया, यद्यपि कुमाऊं क्षेत्र युद्ध भूमि में शौर्य के उदाहरणों से भरा पड़ा है, लेकिन शौर्य की उस परम्परा के जनक होने का श्रेय सूबेदार चन्द्र सिंह बसेड़ा को ही जाता है। श्री बसेड़ा को इस शौर्य प्रदर्शन के लिये विक्टोरिया क्रास न दे पाने की ग्लानि ब्रिटिश अधिकारियों में भी थी, इसलिये अंग्रेज अधिकारियों ने बसेड़ा जी से उनकी किसी और अभिलाषा के लिये पूछा गया। उन्होंने कुमाऊंनी सैनिकों के लिये अलग से रेजीमेन्ट के गठन की इच्छा व्यक्त सी, यही नहीं कुमांऊनी सम्मान का सर्वोच्च प्रतीक "टोपी" पहनने की इच्छा भी प्रकट की। इस साहसी और पराक्रमी सैनिक का प्रस्ताव अंग्रेजी शासन द्वारा तुरन्त ही मान लिया। इसी के फलस्वरुप २३ अक्टूबर, १९१७ को ले०कर्नल ई०एम०लंग के नेतृत्व में पृथक कुमाऊनी बटालियन का जन्म रानीखेत में हुआ।

पंकज सिंह महर

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उत्तराखण्ड की शौर्य परम्परा का निर्वहन करते हुये तीन सपूतों ने विगत वर्ष अपने प्राणों का उत्सर्ग किया, जिस हेतु गणतंत्र दिवस के अवसर पर महामहिम राष्ट्रपति, भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त अशोक चक्र (शांति काल में दिया जाने वाला सर्वोच्च वीरता पुरस्कार) प्रदान किया।
         हमें गर्व है इन शहीदों पर, इनका नाम उत्तराखण्ड के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित हो गया है।


श्री मोहन चन्द शर्मा, निरीक्षक, दिल्ली पुलिस

श्री मोहन चन्द शर्मा, इन्सपेक्टर, दिल्ली पुलिस को 19 सितम्बर 2008 को एक खास सूचना मिली कि दिल्ली श्रृंखलाबध्द बम धमाकों के संबंध में वांछित एक संदिग्ध व्यक्ति जामिया नगर, दक्षिणी दिल्ली क्षेत्र में स्थित बाटला हाउस के एक फ्लैट में छिपा हुआ है।

श्री शर्मा सात सदस्यीय दल का नेतृत्व करते हुये तुरंत उस फ्लैट पर पहुंचे। ज्यों ही उन्होंने फ्लैट में अन्य दरवाजे से प्रवेश किया, उनको फ्लैट के अंदर छुपे हुये आतंकवादियों की ओर से गोलीबारी का पहली बौछार लगी। निर्भीकता के साथ उन्होंने गोलीबारी का जवाब दिया। इस प्रकार शुरू हुई दोनों तरफ की गोलीबारी में दो आतंकवादी मारे गये तथा एक पकड़ा गया।

श्री मोहन चन्द शर्मा ने आतंकवादियों से लड़ते हुये अनुकरणीय साहस कर्तव्यपरायणता का प्रदर्शन किया तथा राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।


13621503 हवलदार बहादुर सिंह बोहरा
10वीं बटालियन पैराशूअ रेजिमेंट (विशेष बल)


हवलदार बहादुर सिंह बोहरा जम्मू-कश्मीर के लवांज के सामान्य क्षेत्र में तलाशी आपरेशन हेतु तैनात आक्रमण दल के स्क्वाड कमांडर थे। उन्होंने 25 सितम्बर, 2008 को शाम 6.15 बजे आतंकवादी दल को देखा तथा उन्हें बीच में ही रोकने के लिए शीघ्रता से आगे बढ़े। इस प्रक्रिया के दौरान, हवलदार बहादुर सिंह बोहरा शत्रु की भारी गोलीबारी की चपेट में आ गये। निर्भीकता के साथ वह आतंकवादियों पर टूट पड़े तथा उनमें से एक को मार गिराया। तथापि, उन्हें गोलियों के गहरे घाव लगे। सुरक्षित स्थान पर ले जाये जाने से इंकार करते हुये उन्होंने आक्रमण जारी रखा तथा बिल्कुल नजदीक से दो और आतंकवादियों को मार गिराया।

इस प्रकार, हवलदार बहादुर सिंह बोहरा ने आतंकवादियों के विरुध्द लड़ाई में अत्यधिक असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया तथा राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।



4073611 हवलदार गजेन्द्र सिंह
पैराशूट रेजिमेंट/51 स्पेशल एक्शन ग्रुप


27 नवम्बर, 2008 की रात हवलदार गजेन्द्र सिंह, नरीमन हाउस, मुंबई में आतंकवादियों द्वारा बंधक बनाये गये लोगों को बचाने के लिए किये जा रहे आपरेशन में अपनी टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। भवन की अंतिम मंजिल से आतंकवादियों का सफाया करने के बाद वे उस जगह पर जा पहुंचे जहां पर आतंकवादियों ने मोर्चा ले रखा था। ज्यों ही वे अंदर दाखिल हुये, आतंकवादियों ने ग्रेनेड से उन्हें घायल कर दिया। अडिग रहकर वह गोलियां बरसाते रहे और प्रतिपक्षी की भारी गोलियों का सामना करते हुये उन्होंने आतंकवादियों को घेर लिया। इस कार्रवाई में उन्होंने एक आतंकवादी को घायल कर दिया और अन्यों को कमरे के अंदर ही वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने मुठभेड़ जारी रखी लेकिन घावों के कारण वे वीरगति को प्राप्त हो गये।

हवलदार गजेन्द्र सिंह ने अति प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उत्कृष्ट वीरता का प्रदर्शन किया और आतंकवादियों के खिलाफ लड़ते हुये राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

पंकज सिंह महर

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चन्द्र सिंह भण्डारी "गढ़वाली"

जन्म- 1891, निधन- 1 अक्टूबर, 1979
ग्राम- मासी, सैणीसेरा, चौथान पट्टी, गढ़वाल।
महात्मा गांधी के शब्दों में "मुझे एक चंद्र सिंह गढ़वाली और मिलता तो भारत कभी का स्वतंत्र हो गया होता।"

११ सितम्बर, १९१४ को २/३९ गढ़वाल राईफल्स में सिपाही भर्ती हो गये, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अगस्त १९१५ में मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने सैनिक साथियों के साथ योरोप और मध्य पूर्वी क्षेत्र में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी की। अक्टूबर में स्वदेश लौटे और १९१७ में अंग्रेजों की ओर से मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया। १९२१-२३ तक पश्चिमोत्तर प्रांत में रहे, जहां अंग्रेजों और पठानों में युद्ध हो गया था। १९२० के बाद चन्द्र सिंह देश में घटित राजनैतिक घटनाओं में रुचि लेने लगे। १९२९ में गांधी जी के बागेश्वर आगमन पर उनकी मुलाकात गांधी जी से हुई और गांधी जी के हाथ से टोपी लेकर, जीवन भर उसकी कीमत चुकाने का प्रण उन्होंने कर लिया।
      १९३० में इनकी बटालियन को पेशावर जाने का हुक्म हुआ, २३ अप्रैल, १९३० को पेशावर में किस्साखानी बाजार में खान अब्दुल गफ्फार खान के लालकुर्ती खुदाई खिदमतगारों की एक आम सभा हो रही थी। अंग्रेज आजादी के इन दीवानों को तितर-बितर करना चाहते थे, जो बल प्रयोग से ही संभव था। कैप्टेन रैकेट ७२ गढ़वाली सिपाहियों को लेकर जलसे वाली जगह पहुंचे और निहत्थे पठानों पर गोली चलाने का हुक्म दिया। चन्द्र सिंह भण्डारी कैप्टेन रिकेट के बगल में खड़े थे, उन्होंने तुरन्त सीज फायर का आदेश दिया और सैनिकों ने अपनी बन्दूकें नीचीं कर ली। चन्द्र सिंह ने कैप्टेन रिकेट से कहा कि "हम निहत्थों पर गोली नहीं चलाते"  इसके बाद गोरे सिपाहियों से गोली चलवाई गई। चन्द्र सिंह और गढ़वाली सिपाहियों का यह मानवतावादी साहस अंग्रेजी हुकूमत की खुली अवहेलना और राजद्रोह था। उनकी पूरी पल्टन एबटाबाद(पेशावर) में नजरबंद कर दी गई, उनपर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया। हवलदार २५३ चन्द्र सिंह भण्डारी को मृत्यु दण्ड की जगह आजीवन कारावास की सजा दी गई, १६ लोगों को लम्बी सजायें हुई, ३९ लोगों को कोर्ट मार्शल के द्वारा नौकरी से निकाल दिया गया। ७ लोगों को बर्खास्त कर दिया गया, इन सभी का संचित वेतन जब्त कर दिया गया। यह फैसला मिलिट्री कोर्ट दआरा १३ जून] १९३० को ऎबटाबाद छावनी में हुआ। बैरिस्टर मुकुन्दीलाल ने गढ़वालियों की ओर से मुकदमे की पैरवी की थी। चन्द्र सिंह गढ़्वाली तत्काल ऎबटाबाद जेल भेज दिये गये, २६ सितम्बर, १९४१ को ११ साल, ३ महीन और १८ दिन जेल में बिताने के बाद वे रिहा हुये। ऎबटाबाद, डेरा इस्माइल खान, बरेली, नैनीताल, लखनऊ, अल्मोड़ा और देहरादून की जेलों में वे बंद रहे और अनेक यातनायें झेली। नैनी सेन्ट्रल जेल में उनकी भेंट क्रान्तिकरी राजबंदियों से हुई। लखनऊ जेल में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से भेंट हुई।
       श्री गढ़वाली एक निर्भीक देशभक्त थे, वे बेड़ियों को "मर्दों का जेवर" कहा करते थे।जेल से रिहा होने के बाद कुछ समय तक वे आनन्द भवन, इलाहाबाद रहने के बाद १९४२ में अपने बच्चों के साथ वर्धा आश्रम में रहे। भारत छोड़ो आन्दोलन में उत्साही नवयुवकों ने इलाहाबाद में उन्हें अपना कमाण्डर इन चीफ नियुक्त किया। डा० कुशलानन्द गैरोला को डिक्टेटर बनाया गया, इसी दौरान उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया, नाना जेलों में कठोर यातनायें दी गई, ६ अक्टूबर, १९४२ को उन्हें सात साल की सजा हुई। १९४५ में ही उन्हें जेल से छोड़ दिया गया, लेकिन गढ़वाल प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जेल प्रवास के दौरान उनका परिचय यशपाल से परिचय हुआ और कुछ दिन उनके साथ वे लखनऊ में रहे। फिर अपने बच्चों के साथ हल्द्वानी आ गये।
       जेल प्रवास के दौरान वे आर्य समाजी हो गये, इस बीच उन्होंने क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट विचारों को अपनाया और १९४४ में कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के रुप में सामने आये, १९४६ में चन्द्र सिंह ने गढ़वाल में प्रवेश किया, जहां जगह-जगह पर जनस्मूह ने उनका भव्य स्वागत किया। कुछ दिन गढ़वाल में रहने के पश्चात वे किसान कांग्रेस में भाग लेने लुधियाना चले गये और वहां से लाहौर पहुंचे, दोनों जगह उनका भारी स्वागत हुआ। टिहरी रियासत् की जनक्रान्ति में भी इनकी सक्रिय भूमिका रही है। नागेन्द्र सकलानी के शहीद हो जाने के बाद गढ़वाली ने आन्दोलन का नेतृत्व किया। कम्युनिस्ट विचारधारा का व्यक्ति होने के कारण स्वाधीनता के बाद भी भारत सरकार उनसे शंकित रहती थी। वे जिला बोर्ड के अध्यक्ष का चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन सरकार ने उनपर पेशावर कांड का सजायाफ्ता होने के आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया। सामाजिक बुराईयों के उन्मूलन के लिये वे सदैव संघर्षरत रहे, १९५२ में उन्होंने पौड़ी विधान सभा सीट से कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से चुनाव लडा, लेकिन कांग्रेस की लहर के आगे वे हार गये।
       उत्तराखण्ड के विकास की योजनाओं के लिये उन्होंने अपनी आवाज उठाई और बाद के वर्षों में पृथक उत्तराखण्ड राज्य के समर्थन से लेकर विभिन्न सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों में उन्होंने हिस्सेदारी की।
* बैरिस्टर मुकुन्दी लाल के शब्दों में "आजाद हिन्द फौज का बीज बोने वाला वही है"
* आई०एन०ए० के जनरल मोहन सिंह के शब्दों में "पेशावर विद्रोह ने हमें आजाद हिन्द फौज को संगठित करने की प्रेरणा दी।"

पंकज सिंह महर

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पेशावर कांड में हवलदार चन्द्र सिंह भण्डारी के अलावा निम्न सिपाहियों को लम्बी सजायें हुई-

१- हवलदार २५० नारायण सिंह गुसांई
२- नायक २२४ जीत सिं रावत
३- नायक ३८७ भोला सिंह बुटोला
४- नायक ९०६ केशर सिंह रावत
५- नायक ११७६ हरक सिंह धपोला
६- लांस नायक १६२३ महेन्द्र सिंह नेगी
७- लांस नायक १८०४ भीम सिंह बिष्ट
८- लांस नायक २०१७ रतन सिंह नेगी
९- लांस नायक २०८८ आनन्द सिंह रावत
१०- लांस नायक २२३८ आलम सिंह फरस्वाण
११- लांस नायक २२९९ भवान सिंह रावत
१२- लांस नायक २६९८ उमराव सिंह रावत
१३- लांस नायक ३१६४ हुकुम सिंह कठैत
१४- लांस नायक ४२०४ जीत सिंह बिष्ट
१५- लांस नायक १०६९ सुन्दर सिंह बुटोला
१६- लांस नायक २४७२ खुशहाल सिंह गुसाई
१७- लांस नायक २४३६ ग्यान सिंह भण्डारी
१८-  लांस नायक रुपचन्द्र सिंह रावत
१९- लांस नायक ३२१५ श्रीचन्द सिंह सुनार
२०- लांस नायक ३३२६ गुमान सिंह नेगी
२१- लांस नायक ३५६४ माधो सिंह नेगी
२२- लांस नायक ३६०७ शेर सिंह असवाल
२३- लांस नायक ३६३७ बुद्धि सिंह असवाल
२४- लांस नायक ३७९१ जूरासंध सिंह असवाल
२५- लांस नायक ३८१२ राय सिंह नेगी
२६- लांस नायक ३९३१ दौलत सिंह रावत
२७- लांस नायक ४२६७ डब्बल सिंह रावत
२८- लांस नायक ४३२३ रतन सिंह नेगी
२९- लांस नायक ४३८३ श्याम सिंह सुनार
३०- लांस नायक ४६०३ मदन सिंह नेगी
३१- लांस नायक ४६१९ खेम सिंह गुंसाई

निम्न लिखित को मिलेट्री कोर्ट मार्शल द्वारा नौकरी से निकाल दिया गया-

१-  लांस नायक ५५१ पाती राम भण्डारी
२-  लांस नायक ७०९ पान सिंह दानू
३- लांस नायक ७७९ राम सिंह दानू
४- लांस नायक १०७१ हरक सिंह रावत
५-  लांस नायक  १३०० लक्ष्मण सिंह रावत
६- लांस नायक १२४६ माधो सिंह गुसांई
७- १४७७ चन्द्र सिंह रावत
८- १४७८ जगत सिंह नेगी
९- १६७३ शेर सिंह भण्डारी
१०- २१९६ मान सिंह कुंवर
११- २२८१ बचन सिह नेगी

निम्नलिखित को नौकरी से डिस्चार्ज किया गया-

१- सूबेदार त्रिलोक सिंह रावत
२- जय सिंह बिष्ट
३- हवलदार १०५ गोरिया सिंह रावत
४- हवलदार ३७६ गोविन्द सिंह बिष्ट
५- हवलदार प्रताप सिंह नेगी
६- नायक २३४ राम शरण बडोला

हेम पन्त

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आज कारगिल युद्ध विजय सालगिरह है, इस गौरवशाली दिन को "विजय दिवस" के रूप में मनाया जाता है..
देश के सभी क्षेत्रों से वीर सेनानी कारगिल के इस मुश्किल युद्ध में शामिल हुए थे.. लेकिन उत्तराखण्ड के निवासी शहीदों की सूची में सर्वोपरि रहे...

"विजय दिवस" के उपलक्ष्य में कारगिल युद्ध के ज्ञात-अज्ञात सभी शहीदों को "मेरा पहाङ" फोरम के सदस्यों की ओर से शत-शत नमन...

पंकज सिंह महर

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गढ़वाल के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भाई-चारे के प्रतीक बन सकते हैं। आजादी के आंदोलन के समय पेशावर में चंद्र सिंह गढ़वाली ने जो काम किया, उसकी वजह से पाकिस्तान और अफगानिस्तान का पख्तून समाज (पठान) आज भी गढ़वालियों की वही इज्जत करता है। 1881 में उत्तराखं़ड के चमोली जिले के रौणीसेरा गांव में जन्मे वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ब्रिटिश फौज में हवलदार थे। 23 अप्रैल 1930 को उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की एक महान घटना को अंजाम दिया। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में उनके सैनिक साथियों ने ब्रिटिश अफसरों के पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे अपने देशवासी पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। लालकुर्ती आंदोलन के नाम से मशहूर ये खुदाई खिदमतगार बादशाह खान (खान अब्दुल गफ्फार खान) और मलंग बाबा महात्मा गांधी के गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे। ब्रिटिश राज में भारतीय सैनिकों द्वारा हुक्म मानने से इनकार की यह पहली घटना थी, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया। गढ़वाली फौज के इस अहिंसक विद्रोह का यह नतीजा हुआ कि उनका व उनके 59 साथियों का कोर्टमार्शल हुआ। चंद्र सिंह व उनके कुछ साथियों को आजीवन कारावास की सजा हुई। गढ़वाली फौज की इस हिम्मत का पठानों पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे गढ़वालियों को अपने भाई जैसा मानने लगे। पौड़ी गढ़वाल के पतगांव गांव के चंद्रप्रकाश सुंदरियाल के पिता इंद्रमणि सुंदरियाल और ताऊजी गोवर्धन प्रसाद देश के बंटवारे के समय क्वेटा (पाकिस्तान) में रह रहे थे। चंद्र प्रकाश बताते हैं देश सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहा था। तब एक पठान ने सिर्फ यह जानकर उनके पिता और ताऊ को अपने देखरेख में भारतीय सीमा तक पहुंचाया था कि वे गढ़वाली हैं। वह बताते हैं कि वह पठान हथियार के साथ सारा समय उनके पिता के साथ रहा और कहता रहा कि चाहे जान कुर्बान करनी पड़े पर वह चंद्र सिंह गढ़वाली के भाइयों का बाल भी बांका न होने देगा। देश के मशहूर चरित्र अभिनेता एके हंगल ने भी अपनी पुस्तक पेशावर से बंबई तक में लिखा है कि पेशावर कांड के बाद खुदाई खिदमतगारों ने पेशावर में शहीदों की स्मृति में एक स्मारक भी बनाया था, लेकिन बाद में ब्रिटिश फौजों ने पेशावर पर फिर से कब्जा कर यह स्मारक नष्ट कर दिया। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर व्यापक शोध करने वाले डा.एसआर शर्मा कहते हैं कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और भारत-पाक और अफगानिस्तान के एकता के प्रतीक हो सकते है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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MAHAVIR CHAKRA :Naik Nar Singh, MVC (Posthumous)
  Born                     - 14 Mar 1926 Village- Gangolakotull, Almora, Uttranchal
  Father                  - Sh Uttam Singh
  Enrolled                 - 14 Mar 1944
  Award date            - May 1948
  Religion                 - Hindu
On 31 May 1948, Naik Nar Singh, in command of a  Section of a Kumaon Battalion, was wounded during the attack on a hill feature named 'Master' in Jammu and Kashmir but refused to be evacuated.
Master' was a narrow steep feature covered with dense pine forests. The approach to this feature was along a very narrow path. The enemy was holding this feature with two companies, a section of Medium Machine Guns and detachment of 3-inch Mortars.
The attack commenced at 0530 hours. All advantages lay in the enemy hands as he was holding the high ground. Twice the feature was attacked but owing to lack of space for maneuvering and intense enemy fire, the company had to stay put at the same place where they had been pinned down.

During the second assault an enemy bullet hit Naik Nar Singh in the right shoulder. He was ordered by the company commander to be evacuated to the Regimental Aid Post. But as the third wave of the attack started, this NCO, quietly slipped out unnoticed and went on to lead his section which was the leading section of the assault wave. Shouting in his faint but courageous voice he inspired his men by telling them in his Kumaoni language, "Kumaoni Ko bachhao; Jan chali jae lekin dushman ke tukre kar dalo. Pichhe nahin hatna", with his bayonet fixed, firing his sten gun from the hip he jumped into an enemy Light Machine Gun bunker- his pre selected target, bayoneted two of the enemy Light Machine Gun gunners and captured the gun. By this time he had lost much blood. The attack had gone on successfully; the feature was in our hands by 1130 hrs.
But nobody could hear a single word from Naik Nar Singh. He was found lying dead in the enemy bunker on top of his two victims - one of his hands still clutching the Bren gun that he so gallantly captured.  Naik Nar Singh's supreme example of selfless sacrifice, devotion to duty, and determination earned him MAHAVIR CHAKARA .
(Source : http://indianarmy.nic.in/Site/)

 

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