Author Topic: FREEDOM FIGHTER OF UTTARAKHAND - उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी  (Read 74450 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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BALDEV SINGH ARYA


Baldev Singh Arya was born in 1912 in Umath village of district Pauri Garhwal. In 1930, he was sentenced to rigorous imprisonment for six months by the Britishers for the anti government speech. He had played very important role in ‘Doli Palki Movenment’ for the rights of lower castes. This great leader was died 1992.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Captain Narayan Singh Negi, Freedom Fighter from uttarakhand, Close to Subhash Chandra Bosh.

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Dehra Dun: Captain Narayan Singh Negi, a close associate of Netaji Subhash Chandra Bose, died of a heart attack at his residence here.

He was 85, family sources said today.

The mortal remains of Negi, who breathed his last yesterday, were consigned to flames with full state honour at Lakkhibagh area here in the presence of a large number of politicians and state government officials, they said.

Expressing grief over the demise of Capt Negi, Uttarakhand Chief Minister B C Khanduri described him as a great soldier.

Chairman of the state media advisory committee Devendra Bhasin also laid a wreath on the body of Capt Negi on behalf of the ailing Chief Minister.

Capt Negi came in contact with Netaji Subhash Chandra Bose in 1943 when he joined his Azad Hind Fauj. Later Netaji appointed him as his body guard commander.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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NAME OF SOME MORE FREEDOM FIGHTER FROM UTTARAKHAND
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Ram Singh Dhoni (Saalam Satyagrah) (Freedom fighter)
Teeka Singh Kanyal (Saalam Satyagrah) (Freedom fighter)
Jyotiram Kandpal (Freedom fighter)
Indra Singh Nayal (Freedom fighter)
Chandra Singh Pathani (Freedom fighter)
Sher Singh Karki (Satyagrahi) (Freedom fighter)

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डूंगर सिंह बिष्ट : आजादी की जंग में 8 बार गए जेल
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जागरण कार्यालय, नैनीताल: भारत माता को ब्रिटिश हुकूमत की बेडि़यों से छुड़ाने वाले सपूतों में एक-दो लोग ही बचे हैं, जो आज की पीढ़ी के लिए देशभक्ति की जीती-जागती मिशाल हैं। इन्हीं में एक नाम 91 वर्षीय डूंगर सिंह बिष्ट का है। जो आजादी की जंग में 8 बार जेल भेजे गए, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और ब्रिटिश हुकूमत की जड़े उखाड़कर ही चैन लिया। जागरण के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभव बांटते हुए धारी तहसील अन्तर्गत सुंदरखाल आगर गांव निवासी वर्ष 1919 में जन्मे श्री बिष्ट की कड़क आवाज आज भी सच्चे आंदोलनकारी होने का एहसास दिलाती है। वह बताते हैं कि 1937 में अंग्रेजों द्वारा यह फरमान जारी किया गया कि जो युवा हाईस्कूल व इंटर पास हैं, उन्हें सीधे सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर तैनाती दी जाएगी। इसके बाद जब वह भर्ती में भाग लेने के लिए अल्मोड़ा पहुंचे तो भर्ती अफसर एटकिंशन ने उन्हें देखते ही चयनित करने का फरमान सुना दिया। इसी बीच जब वह घर लौटने के बाद एक दिन हल्द्वानी गए तो वहां पं.गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में सत्याग्रह आंदोलन चल रहा था। सत्याग्रह आंदोलन से प्रभावित होकर श्री बिष्ट ने तत्कालीन कांग्रेस जिलाध्यक्ष भीमताल निवासी मोतीराम पाण्डे से सत्याग्रह की इच्छा जताई। इसके बाद महात्मा गांधी को पत्र लिखकर सत्याग्रह आंदोलन की अनुमति देने का आग्रह किया। वर्ष 1929 को जब गांधी जी कुमाऊं भ्रमण में मुक्तेश्र्वर पहुंचे तो उन्होंने श्री बिष्ट को सत्याग्रह आंदोलन की अनुमति दे दी। श्री बिष्ट बताते हैं कि पहली मार्च 1941 को मुक्तेश्र्वर के सरगाखेत में सत्याग्रह आंदोलन कार्यक्रम तय किया गया परन्तु अंग्रेजों की जबरदस्त पहरेदारी से उन्हें एक पखवाड़े पूर्व घर से फरार होना पड़ा और अपने पुरोहित भवानी दत्त जोशी के घर में शरण ली। श्री बिष्ट ने बताया कि सत्याग्रह आंदोलन में हजारों लोग इकट्ठा हुए। इसी बीच आंदोलन में जुटे लोगों को तहसीलदार ने गिरफ्तार कर नैनीताल पहुंचा दिया और आंदोलन भड़काने के जुर्म में उन्हें आठ माह की सजा सुनाई गई। उन्हें नैनीताल जेल से हल्द्वानी व फिर बरेली जेल पहुंचाया गया। सजा खत्म होने के बाद जेल से छूटे तो महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन का आगाज हो गया। इसी बीच उन्हें कांग्रेस कमेटी का सचिव बना दिया गया। भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के बाद श्री बिष्ट की गिरफ्तारी का आदेश जारी हो गया। कई पटवारियों को गिरफ्तारी वारंट तामील करने के लिए भेजा गया, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी कि उन्हें गिरफ्तार करे। बिष्ट के अनुसार सभी पटवारी तहसीलदार को बताते थे कि वह घर पर नहीं मिले। इसी बीच 9 अगस्त को आयोजित सत्याग्रह में सभी आंदोलनकारी प्यूड़ा में जुटे। किसी ने अंग्रेजों को खबर कर दी कि श्री बिष्ट भी इसमें भाग लेने वाले हैं। इसके बाद 50 पुलिस कर्मियों ने ढोलीगांव के जंगल में घेरकर उन्हें पकड़ लिया और चंपावत कारागार भेज दिया। वहां उन्हें साढ़े तीन साल की सजा सुनाई गई। इसके बाद उन्हें लोहाघाट जेल पहुंचा दिया गया। जब उन्होंने जेल में अंग्रेजी कानून न मानने का ऐलान किया तो उन्हें हथकड़ी लगाकर अल्मोड़ा जेल भेजा गया। जेल में कड़े तेवरों के चलते उन्हें अल्मोड़ा से बरेली, फिर लखनऊ, लखीमपुर, बनारस व बाराबंकी जेल भेजा गया। 1945 में सजा समाप्ति के बाद रिहा हो गये। श्री बिष्ट को खुशी है कि देश निरंतर तरक्की कर रहा है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि नौजवान पीढ़ी कुछ पाने के लिए गांधीवादी तरीका अपनाने के बजाय तोड़फोड़ का रास्ता अख्तियार कर रही है। उन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समस्याओं के निराकरण को गांधीवादी तरीके का सबसे कारगर हथियार बताया।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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रीठा गाड़ से. (जिला  बागेश्वर)
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वीर सिह - निवासी ग्राम बौडी, डाकघर कनाराछीना ! पिता देव सिह ! 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया ! एक साल का कारावास और 25 रूपये अर्थ दंड ना देने पर ३ माह की कैद बड़ी !

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Talla Daanpur Area
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Revadhar : From village Vaida, Father's name Teeka Ram. He participated in 1941 "Personal Satyagrah Movement" for which he was sentenced one year rigorious punishment.

When he could not pay 40 rupees, his punishment was extended for next three months.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Mohan Singh Aithani
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His village was Aithan, Post Office Kapkot, Father's name Lal Singh Aithani. He also participated in 1941 "Vyaktigat Satyagrah".For this, he was served 3 months rigorous punishment and 50 Rupees fine.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Vishnu Dutt Joshi
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His village name is Utrola, Dak Ghar Kapkot. He actively participated in "Vyaktigat Satyagrah". He was accused for participating in "Vyatigat Satyagrah" and was sentenced punishment till the court adjourned. Additionally, he had to pay Rs 10 as a fine.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bahadur Singh Shahi
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Village name Ason, Kapkot. Father's name Dault Singh. He participated in 1941 "Vyaktigat Satyagarh. For which he was sentenced 1 yrs rigorous punishment. His punishment was extended for next three months when he could not pay 30 rupees as a fine.
 

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Narottam
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Narottam Ji was from village Utroda, Kapkot. His father's name was Durga Dutt.

He too actively participated in the "Vaykatigat Satyagrah". He paid 10 rupees fine and punishment till the court adjourned.

 

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