Author Topic: FREEDOM FIGHTER OF UTTARAKHAND - उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी  (Read 74429 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Veer Chandra Singh Garwali. Photo by harish rawat our member.

The statute is at Gairsain.


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Sham Lal Gangola (Freedom Fighter)
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बागेश्वर क्षेत्र स्वतंत्रता आन्दोलन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यह क्षेत्र अंग्रेजी सरकार के लिए सदा ही सिरदर्द बना रहा, क्योंकि यहां उनकी दमनकारी नीतियों व कार्यों के उपरान्त भी स्वतंत्रता आन्दोलन सदा फलता-फूलता रहा। उत्तराखंड के क्रांतिकारी इतिहास में स्वर्णिम रहा कुली बेगार आंदोलन की शुरूआत भी यहीं से हुई है।

स्वतंत्रता आंदोलन में उत्तराखंड के अमर सेनानियों में से एक अविस्मरणीय नाम स्व.श्याम लाल गंगोला का है। स्वतंत्रता आन्दोलन के प्रति इनका जीवन सदा समर्पित था। स्वतन्त्रता प्राप्ति की चाहत में इन्होंने पारिवारिक सुख, व्यापारिक उपलब्धि तथा सब कुछ समर्पित कर दिया। उन्हें न तो मां की ममता रोक सकी, न ही पत्नी व परिवार के अबोध बाल सदस्यों का मोह। साह तन-मन-धन से राष्ट ªीय आन्दोलन को समर्पित
थे। इसलिए अंग्रेज सरकार ने उन पर अपनी पैनी नजर रखी और हर प्रकार से परेशान कर उनके मनोबल को तोड़ने की लगातार कोशिश की, किन्तु दमनात्मक कार्यवाहियों के उपरान्त भी उनकी स्वतंत्रता की भावना बिल्कुल नहीं डिगी। उनका जन्म 1888 में बागेश्वर में हुआ। गोवर्धन साह के इकलौते पुत्र थे। वे रामजे इण्टर कालेज अल्मोड़ा के छात्र रहे। बचपन से ही सामाजिक कार्यों के प्रति सजग थे। अल्मोड़ा में उनका सम्पर्क तत्कालीन युवा नेताओं से रहा, जिसमें गोविन्द बल्लभ पन्त, बद्रीदत्त पाण्डे, हरगोविन्द पन्त व विक्टर मोहन जोशी प्रमुख थे। सन् 1969 में स्व.श्री गोविन्द बल्लभ पन्त के सम्पर्क में आए तथा कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर राजनीति में सक्रिय भाग लेना प्रारम्भ कर दिया। कुमांऊ परिषद के प्रमुख सदस्य रहे। प्रतिनिधि मण्डल के मुख्य कार्यकर्ता के रूप में इन्होंने लखनऊ में कुमांऊ परिषद् की मांग करते हुए कुमांऊ में संगठित रूप से आन्दोलन चलाने पर बल दिया। सन् 1920 में काशीपुर ;नैनीतालद्ध में हरगोविन्द के सभापतित्व में कुमांऊ परिषद का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ। इस कुमांऊ परिषद के भीतर हरगोविन्द पन्त, विक्टर मोहन जोशी, श्यामलाल साह गंगोला, बद्रीदत्त पाण्डे चेतना के प्रतिनिधि एवं प्रतीक थे। ये कुली बेगार की समाप्ति या जंगलाद नीति में सुधार ही नहीं वरन् इस स्थाई आन्दोलन को राष्ट्रीय संग्राम असहयोग के साथ जोड़ना अनिवार्य समझते थे। इस अधिवेशन में बद्रीदत्त पाण्डे द्वारा कुली बेगार विरोधी प्रस्ताव रखा गया, जिसमें श्री साह ने कुली बेगार प्रथा की चर्चा में भाग लिया तथा गर्म दल का साथ  देकर बद्रीदत्त पांडे तथा विक्टर मोहन जोशी के पक्ष में समर्थन दिया।
काशीपुर अधिवेशन में बद्रीदत्त पांडे व श्यामलाल

साह सहित अधिकांश नेता सन् 1929 में नागपुर के
विशाल जनांदोलन में गए। जिस आंदोलन का नेतृत्व
प्रथम बार महात्मा गांधी कर रहे थे। वहां गांधीजी से
बागेश्वर आने का आग्रह किया गया। गांधीजी तत्कालीन
उत्तराखंड के ग्रामीण चेतन तथा आक्रोश को भली-भांति
न समझ सके, जिस कारण उन्होंने बागेश्वर आने में
असमर्थता व्यक्त की।
सन् 1921 में श्यामलाल साह तथा अन्य नेता
नागपुर से लौटे ही थे कि उन्होंने चामी गांव ;बागेश्वरद्ध
के एक मंदिर में लगभग 400 लोगों की एक सभा की।
जिसमें श्यामलाल साह व चामी के शिवदत्त, रामदत्त व
केशवदत्त प्रमुख व्यक्ति थे। इस सभा में उपस्थित सभी
लोगों ने बेगार न देने की शपथ ली तथा पहाड़ की
संपूर्ण जनता को इस निर्णय में शामिल करने का निश्चय
लिया और आगामी उत्तरायणी मेला बागेश्वर में बेगार
प्रथा का विरोध करने हेतु बनने वाली रूपरेखा में सक्रिय
भाग लिया। जिसकी सूचना तत्कालीन ग्राम के पटवारी
ने शासन को भेज दी थी। शासन को सूचना मिलते ही
इस आंदोलन को दबाने के लिए जिला मुख्यालय
अल्मोड़ा से सेना के 500 गोरखा जवान व डिप्टी
कमिश्नर बागेश्वर पहुंचे।
सन् 1921 में बागेश्वर में उत्तरायणी मेले के दौरान
कुली बेगार आंदोलन को देखते हुए सरकार ने कड़ी
सुरक्षा व्यवस्था के साथ मेला बंद की घोषणा कर दी
थी, जिससे तनाव की स्थिति आ गई। तब श्री साह
बिना किसी चिंता के आंदोलन को सक्रिय रूप देते रहे।
तब उनके निजी मकान ने एक होटल का रूप लिया था,
जहां बाहर से आए हुए स्वतंत्रता सेनानी रहते थे। सरयू
तट पर 15 जनवरी 1921 से उस ऐतिहासिक आंदोलन
को सफल बनाने के लिए पुरजोर कोशिश की। विक्टर
मोहन जोशी व बद्रीदत्त पांडे आदि नेताओं के साथ कंधे
से कंधा मिलाकर कार्य करते रहे
औपनिवेशिक-नौकरशाही न दमन कर सकी न ही
दबाव डाल सकी। मेले में दिन भर हजारों लोगों ने साथ
में गंगाजल लेकर बेगार न देने का संकल्प लिया। 15
जनवरी 1921 को हुए इस ऐतिहासिक स्वतंत्रता आंदोलन
में श्यामलाल साह ही उत्तराखंड के सर्वप्रथम व्यक्ति थे,
जिन्हें उत्तराखंड से पहली बार गिरफ्तार किया गया।
इसके पश्चात देवीलाल साह आदि अन्य साथियों को
पकड़ा गया।  भरे बाजार में जिला जेल अल्मोड़ा ले जाते समय

वे अपने मकान के आगे रुके। वहां उनकी मां इंतजार
कर रही थी। अपने सुपुत्र को फूल माला पहनाकर और
आरती उतारकर इतना ही संदेश दिया कि ‘देश के लिए
मर मिटना पर माफी मांगकर वापस मत आना।’ श्री
साह के जेल जाने के बाद लोगों ने बेगार देना बंद कर
दिया। बागेश्वर की इस विजय के बारे में बद्रीदत्त व
अन्य नेताओं ने जगह-जगह सभाएं कर बताया। तीन
माह बाद कुली बेगार आंदोलन, असहयोग आंदोलन में
बदल गया।
इस आंदोलन में श्री साह को 1929 में डेढ़ साल
की सख्त सजा जिला जेल अल्मोड़ा में हुई तथा अर्थदंड
न देने पर घर की समस्त संपत्ति की नीलामी व कुड़की
निकाल दी गई। सजा भुगतने के उपरांत भी अंग्रेजी
शासन के खिलाफ उनका आंदोलन जारी रहा। इन सभी
बातों की गुप्त सूचना स्थानीय अधिकारियों ने शासन
को दे दी। फलस्वरूप उन्हें पुनः जनवरी 1924 में
गिरफ्तार कर लिया गया। 21 जनवरी 1924 को क्रमशः
ह.द.1988 पर छह माह व ह.द.145 पर दो साल और
ह.द.117 पर भी दो साल का कठोर कारावास व अर्थदंड
न देने पर इस बार भी उनके घर की संपत्ति पर पुनः
कुड़की व नीलामी की गई। बरेली जेल में उन्हें अनेक
प्रकार की यात्नाएं दी गई तथा कारागार से छूटने के पूर्व
बिजली का करेंट देकर उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप
से अस्वस्थ कर दिया गया, ताकि वे भविष्य में कुछ भी
ना कर सकें। जेल से छूटने के बाद वे भले ही अस्वस्थ
रहे हों, लेकिन फिर भी अंग्रेजों के विरु( आंदोलन
करते रहे। 1929 में उन्होंने आग्रह कर महात्मा गांधी से
बागेश्वर में 22 जून 1929 को विक्टर मोहन जोशी व
शांति भाई के साथ स्वराज्य मंदिर की आधारशिला
रखवाई। इसके बाद भी वे लगातार कांग्रेस का सक्रिय
कार्य करते रहे।
सन् 1936 में साह जी ने बागेश्वर में एक ऊनी
कारोबार समिति बनाई। उसमें वे डायरेक्टर पद पर
कार्य करते रहे। कारावास में मिली असह्य वेदना से
उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य गिरता रहा। 1939
में उनका स्वर्गवास हो गया। उनके नाम पर बागेश्वर में
उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘श्यामलाल साह स्मारक राजकीय
उच्चीकृत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र’ खोला।

(Sabhar - Regional Reporter)

Anil Arya / अनिल आर्य

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी फते सिंह का निधन
नारायणबगड़। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भंगोटा गांव निवासी फते सिंह मेहरा (90) का मंगलवार रात्रि को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे अपने पीछे दो पुत्र, दो पुत्रियां और पौत्र-पौत्रियों का भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके निधन से क्षेत्र में शोक की लहर छा गई है। बुधवार को पैत्रिक घाट पर राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्वतंत्रता सेनानी को प्रशासन की ओर से तहसीलदार सीएल शाह, थानाध्यक्ष थराली एसएस बिष्ट, सब इंस्पेक्टर रामजन्म सिंह नेगी ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए अंतिम सलामी दी। मृतक सेनानी के पुत्र कर्णसिंह मेहरा ने चिता को मुखाग्नि दी। इस मौके पर ब्लाक युवक कांग्रेस अध्यक्ष भगत सिंह नेगी, प्रधान विनोद मेहरा, पटवारी राजेश गोरखा, त्रिलोक सिंह मेहरा, सूबेदार मोहन सिंह मेहरा, गबर सिंह ने श्रद्धासुमन अर्पित किए।
http://epaper.amarujala.com/svww_index.php
मै स्व. श्री फते सिंह जी को श्रधा सुमन अर्पित करते हुए आपकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करता हु. :(

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Kotdwar

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मुरली सिंह रावत व स्वतंत्रता संग्राम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darwan Singh Negi
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भारत का इतिहास उत्तराखंड के वीरों के अनुपम शौर्य एवं गौरवशाली सैनिक परम्पराओं तथा बलिदान की गाथाओं से भरा पड़ा है। विपरीत परिस्तिथियों में संघर्ष करने की शक्ति गढ़वालियों की विशेषता रही है। इन बहादुर सैनिकों में भी श्री दरबान सिंह नेगी ने संघर्ष करते हुए प्रथम पंक्ति में ख्याति अर्जित की है। इन्हें प्रथम विश्व युद्ध में अपनी अभूतपूर्व बहादुरी एवं शौर्य प्रदर्शित करने के उपलक्ष्य में ‘विक्टोरिया क्रास’पदक से सम्मानित एवं अलंकृत किया गया था।

जिला चमोली गढ़वाल के कड़ाकोट(नारायण बगड़ क्षेत्र) के अंतर्गत ग्राम कफारतीर में दिसम्बर १८८१ में पिता कमल सिंह के घर जन्मे दरबान सिंह नेगी बहुत कम शिक्षा प्राप्त कर मार्च १९०२ में लगभग २१ वर्ष की आयु में लैन्सडाउन जाकर फौज में भर्ती हो गये। प्रथम विश्व युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व १९११ में लैंसनायक तथा १९१४ में नायक बनाये गये। इसके बाद दरबान सिंह अपनी १@३९वीं गढ़वाल राइफल्स बटालियन के साथ शीघ्र फ्रांस की रणभूमि में पंहुच गये।

प्रथम विश्व युद्ध में फ्रांस के फोस्टवर्ट के समीप खाइयों के भीतर २५ दिन तक लगातार कठिन परिश्रम के पश्चात २३ नवम्बर १९१४ को आपकी टोली छुट्टी मिलने पर आराम करने के लिये अपने शिविर लौट रही थी कि वे फिर बुलाये गये। जर्मनी की पल्टन ने अंग्रेजों की एक महत्वपूर्ण खाई के कुछ भाग पर दखल कर दिया था और उन्हें खदेड़ने की चेष्टा व्यर्थ हो गयी। तत्काल नायक दरबान सिंह की दोनों टोलियां पुन: बुलाई गयी। पहली टोली ने धावा किया और दूसरी टोली सहायता के लिये पीछे रही। धावा के समय संगीनों की मार मारते हुए आप व आपके साथी टेढ़ी–मेढ़ी खाइयों के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में‚ दूसरे से तीसरे में‚ तीसरे से चौथे में‚ इसी भांति अन्त तक आगे बढ़ते गये और साथ ही शत्रुओं की लाशें भी जमीन पर बिछाते चले गये। वे जर्मनी के बम के गोलों की बौछार में आगे बढ़ते रहे‚ घायल होकर भी नहीं रुके। अर्द्धरात्रि के बाद प्रात: चार बजते–बजते ३०० गज लम्बी खाई जर्मनों के चंगुल से निकाल ली गई। न मालूम उस वक्त कितने जर्मन मारे गये। १०५ जर्मन कैद किये गये। तीन तोपें‚ बहुत सी बन्दूकें और सामग्री भी हाथ लगी।

यह सब इस वीर गढ़वाली बहादुर एवं साहसी सेनानी दरबान सिंह के पराक्रम का परिणाम था। यदि वीर दरबान सिंह इतनी निर्भयता एवं आत्मविश्वास से अपनी टोली के आगे नहीं रहते तो इनके पक्ष की बहुत क्षति होती और वह खाई भी शत्रुओं के हाथ से नहीं छीनी जा सकती थी।

इस असाधारण बहादुरी प्रदर्शित करने के ११ वें दिन इन्हें सेना का सर्वोच्च पुरस्कार‚ विकट वीरत्व सूचक पदक ‘विक्टोरिया क्रास’प्रदान किये जाने की घोषणा की गयी और इन्हें शीघ्र हवलदार तथा कुछ समय बाद सूबेदार बना दिया गया। कुछ दिन बाद दिसम्बर १९१४ को स्वयं जार्ज पंचम ने अपने हाथों से लंदन के एक समारोह में बहादुर दरबान सिंह नेगी को ‘विक्टोरिया क्रास’पदक पहनाकर सम्मानित किया गया। इस सम्मान से भारतीय सेनाओं और विशेषकर गढ़वाली सैनिकों में एक नया उत्साह पैदा हो गया। गढ़वाल गौरवान्वित हुआ और सर्वत्र हर्ष की लहर फैल गयी। इस प्रथम महायुद्ध में इस पदक को प्राप्त करने वाले केवल १० भारतीय थे जिनमें दो गढ़वाली वीर थे। प्रथम दरबान सिंह नेगी और दूसरे गब्बर सिंह नेगी को यह पदक मरणोपरान्त प्रदान किया गया था।
प्रथम विश्व युद्ध से लौटने के बाद दरबान सिंह नेगी फौज में देश–विदेश में और भी सम्मान प्राप्त कर सेवारत रहे और सन् १९२३ में अवकाश प्राप्त कर पेंशन पर घर आ गये। मृदुभाषी श्री दरबान सिंह नेगी सर्वत्र वीसी साहब कहकर पुकारे जाते रहे और लोकप्रियता अर्जित करते रहे।

गढ़वाल के वीरवर दरबान सिंह नेगी वी.सी. आदि अनेक बहादुर भूतपूर्व सैनिकों से भेंट करने‚ उन्हें प्रोत्साहित करने एवं गढ़वाल का आभार प्रदर्शित करने हेतु सन् १९३५ के ग्रीष्मकाल में तत्कालीन वायसराय लार्ड विलिंग्डन की धर्म पत्नी लेडी विलिंग्डन गौचर में पधारी थी। उस सुअवसर पर गढ़वाल की जनता तथा यहां के बहादुर सेनानियों ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया था।

देश व गढ़वाल का मस्तक ऊंचा करने वाला यह बहादुर सेनानी अपना यशस्वी जीवन व्यतीत करता हुआ २४ जून‚ १९५० को लगभग ७० वर्ष की आयु में चिरनिद्रा में सो गया।

गढ़वाल राइफल्स के कीर्ति स्तम्भ एवं बहादुर सेनानी दरबान सिंह नेगी वी.सी. गौरवपूर्ण गाथा भावी पीढ़ी को भी प्रेरित और प्रोत्साहित करती रहेगी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नहीं भुलाया जा सकता चन्द्रसिंह शाही का योगदान
 
  Browse: Home / नहीं भुलाया जा सकता चन्द्रसिंह शाही का योगदान  नहीं भुलाया जा सकता चन्द्रसिंह शाही का योगदान 
स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रसिंह शाही का देहान्त 12 मार्च 1988 को हुआ था। लेकिन उनका अभाव आज भी कपकोट क्षेत्र की जनता को खलता है। उनका जन्म 12 अगस्त 1909 को बागेश्वर जिले के ग्राम असौं, कपकोट में हुआ था। वे सन् 1938 से ही कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता रहे थे। तब वह मंडल कांग्रेस कमेटी कपकोट के मंत्री थे। उन्होंने 17 फरवरी 1941 को प्रथम बार कपकोट में व्यक्तिगत सत्याग्रह किया। सरकारी आदेश से पटवारी दलीप सिंह ने उन्हें कपकोट में गिरफ्तार कर 19 फरवरी 1941 को अल्मोड़ा जिला मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।
   
जिला मजिस्ट्रेट ने श्री शाही को एक दिन की सजा तथा एक सौ रुपए का जुर्माना किया। जुर्माना न देने पर दो माह के कैद की सजा दी। जेल से छूटने के बाद पुनः नुमाइशखेत बागेश्वर में सत्याग्रह आरम्भ कर दिया। तल्ला कत्यूर के पटवारी केशव दत्त, दुग के पटवारी खीम सिंह और तत्कालीन कानूनगो ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 3 मार्च 1941 को जिला मजिस्ट्रेट ने उन्हें 15 माह की कैद और 200 रुपए का दण्ड दिया। अर्थ दण्ड न देने पर छः माह की कैद और बढ़ा दी गई। चन्द्रसिंह शाही के साथ उनके गाँव के ग्यारह व्यक्ति बहादुर सिंह शाही, कुंजर सिंह शाही, चन्द्र सिंह द्वितीय, घुन सिंह शाही आदि भी आंदोलन में शामिल रहे। 15 मार्च 1941 को चन्द्र सिंह शाही को अल्मोड़ा जेल से बरेली जेल भेज दिया गया। बरेली से 22 जुलाई 1941 को उन्हें कैम्प जेल लखनऊ भेज दिया गया। दिसम्बर 1941 को वह लखनऊ से रिहा हुए।
 
14 अगस्त 1942 को ह.द. 129 डी.आई.आर. के अधीन चन्द्र सिंह को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया। 17 अगस्त 1942 को उन्हें सिक्यूरिटी प्रिजनर का कठोर कारावास अल्मोड़ा जेल में दिया गया। उन्हें जेल में यातनाएँ भी दी गयीं। 30 अगस्त 1942 को उन्हें अल्मोड़ा जेल से बरेली जेल में स्थान्तरित कर दिया गया। 27 दिसम्बर 1944 को चन्द्र सिंह शाही को जेल से रिहा कर देने के बाद उन्होंने कपकोट में मंडल कांग्रेस की स्थापना की और वे मंत्री बने। सन् 1950 में वे तहसील कांग्रेस कमेटी बागेश्वर के मंत्री बने। 1948 से 1958 तक वह जिला बोर्ड अल्मोड़ा के निर्वाचित सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने कपकोट के विकास के लिए कई कार्य किए। उन्होंने जूनियर हाई स्कूल सनेती और जूनियर हाई स्कूल कर्मी की स्थापना में सहयोग किया। साल्वे मिडिल स्कूल कपकोट को हाई स्कूल का दर्जा दिलवाया। बाद में साल्वे स्कूल को इण्टर की मान्यता दिलाई। 1950 में उनहोंने असौं में जूनियर हाई स्कूल खोला, फिर इसे हाई स्कूल व बाद में इंटरमीडिएट बनवाया। 1945-48 के बीच दानपुर में अकाल पड़ा। श्री शाही जी ने अकाल पीड़ितों की बहुत सहायता की।
 
चन्द्र सिंह शाही ने बागेश्वर से कपकोट तक श्रमदान से सड़क बनवाई। सड़क निर्माण में दानपुर के प्रत्येक गाँव के नागरिकों ने सहयोग दिया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त जी ने चन्द्रसिंह की बागेश्वर नुमाइश खेत में बहुत प्रशंसा की और उन्हें भरोसा दिलाया कि वर्तमान में राजकोष में धन का अभाव है। जब राज्य के पास संसाधन हो जायेंगे तो सरकार बागेश्वर-भराड़ी सड़क के लिए धन उपलब्ध करा देगी।
 
चन्द्र सिंह शाही ने अपना सारा जीवन समाज के उत्थान में लगाया। शराब और मन्दिरों में पशुबलि के वे कट्टर विरोधी थे। उन्होंने कई बार असौं के गोलू मन्दिर में देवी भागवत करवाये। वे महात्मा गांधी के भक्त थे। वे हिन्दू समाज में जातीय भेदभाव को मिटाने का प्रयास करते थे। वे हरिजन, ठाकुर, पण्डित सबको समान देखते हुए हरिजन और गरीब तबके के उत्थान में तत्पर रहते थे। वे अन्धविश्वास और बलिपूजा का विरोध करते थे। क्षेत्र के बहुत सारे प्रभुत्वजनों का सुझाव है कि चन्द्रसिंह शाही की याद को चिरस्थाई रखने के लिए राजकीय महाविद्यालय कपकोट का नाम उनके नाम से हो और एक महाविद्यालय की तरह ही तमाम जरूरी संसाधनों से परिपूर्ण वह संस्थान हो।
 
(Source Nainital Samachar)

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जयदत्त वैला: Great Freedom Figther of Uttarakhand
« Reply #96 on: May 30, 2011, 03:03:31 PM »
    जयदत्त वैला: Great Freedom Fither   
1917 में रानीखेत के रिखाड़ गाँव में जन्मे जयदत्त वैला की प्रारम्भिक शिक्षा पाली के स्कूल में हुई। नैनीताल के चेतराम साह स्कूल से मैट्रिक कर के वे बनारस चले गये, जहाँ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.ए. कर अर्थशास्त्र में एम.ए. करने लगे। इसी बीच वे राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभाव में आये तथा छात्रसंघ के अध्यक्ष बने। उनकी सरकार विरोधी गतिविधियों के चलते उन्हें विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। कालान्तर में उन्होंने बरेली कॉलेज से वकालत की डिग्री ली।
1939 में जयदत्त रानीखेत लौट आये तथा ताड़ीखेत स्थित प्रेम विद्यालय में अध्यापक बन गये, जहाँ उन्हें हरगोविन्द पन्त तथा देवकीनन्दन पाण्डे सरीखे संग्रामियों का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। प्रेम विद्यालय गांधीवादी विचारों से ओतप्रोत एक ऐसी संस्था थी, जहाँ विद्यार्थियों को रोजगारपरक प्रशिक्षण के अतिरिक्त देशप्रेम की दीक्षा दी जाती थी। यहाँ वे कौमी सेवा दल के सदस्य रहे तथा नायक प्रथा उन्मूलन सम्बन्धी आन्दोलन में भी सक्रिय योगदान दिया। 29 से 30 अक्टूबर 1939 को रानीखेत-द्वाराहाट मार्ग पर स्थित कफड़ा के उभ्याड़ी मैदान पर कांग्रेस का एक विशाल सम्मेलन हुआ, जिसमें देश के नामचीन नेताओं ने भाग लिया। पूरा मैदान तम्बुओं के एक शहर में तब्दील हो गया, जिसका नाम चंद वंश के राजा आनन्द सिंह की पत्नी विमलेन्दु कुमारी के नाम पर विमलानगर रखा गया। इस पूरे आयोजन की कमान युवा जयदत्त वैला तथा रामसिंह बिष्ट ने सम्भाली। द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने पर जयदत्त को बागेश्वर भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने प्रेम विद्यालय की एक शाखा खोली। इसमें जनता को उनके व्यापार से सम्बन्धित उद्योग जैसे कताई, रंगाई व बुनाई के प्रशिक्षण के साथ गुप्त रूप से देशप्रेम का पाठ भी पढ़ाया जाता था।
ऐसे में ब्रिटिश प्रशासन की वक्र दृष्टि पड़ना स्वाभाविक था। 1940 में डी.आई.आर. के अन्तर्गत जयदत्त को राजद्रोह के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया और अल्मोड़ा जेल भेजा गया। जेल में चक्की चलाने से इन्कार करने पर बदायूँ जेल स्थानांतरित कर दिया गया। यहाँ भी उनका विरोध जारी रहा, जिसके फलस्वरूप कुछ दिन ‘तनहाई’ में रखने के बाद चुनार की कैम्प जेल में रखा गया। जेल की यातनाओं से मुक्त होकर वे वापस प्रेम विद्यालय आ गये। भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ होने पर ताड़ीखेत स्थित गोलज्यू के मंदिर में एक विशाल सभा हुई और अगले ही दिन क्षेत्र के सभी प्रमुख नेता गिरफ्तार हो गये। उनकी अनुपस्थिति में आन्दोलन की कमान जयदत्त के हाथ में रही। धरना, प्रदर्शन, शराब भट्टी की पिेकेटिंग कर पहले अल्मोड़ा फिर बरेली जेल भेज दिया गया। तीन साल तक कारावास की यातना के बाद 1945 में उन्हें मुक्ति मिली।
 
स्वाधीनता के उपरान्त जयदत्त वैला ने कुछ समय नैनीताल तथा बाद में रानीखेत में वकालत प्रारम्भ कर दी। साथ ही इलाके के तमाम राजनैतिक व सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहे। वे सच्चे अर्थों में गांधीवादी थे। शांत, मृदुभाषी, सदैव खद्दर धारण करने वाले, झूठ व लालच से कोसों दूर। उन्हीं के अनुसार दीवानी मुकदमों में वे सदैव गरीबों की ही पैरवी करते रहे। कभी किसी पद व सम्मान के मोहताज नहीं रहे। शायद इसीलिये कभी उनको पद्मश्री या उत्तराखंड रत्न जैसी उपाधियों के लायक नहीं समझा गया। आधी शताब्दी से भी अधिक समय तक क्षेत्र के अग्रणी वकील होने के बावजूद अपने लिये एक मकान तक नहीं बना पाये और आजीवन किराये के एक जीर्ण-क्षीण मकान में रहे। पत्नी व ज्येष्ठ पुत्र की असामयिक मृत्यु को भी उन्होंने साहस व धीरता के साथ झेल लिया। पिछले साल तक वे तिमुर की लाठी लिये सदर बाजार में देखे जा सकते थे। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि राजनीति के वर्तमान परिदृश्य, विशेषकर कांग्रेस की संस्कृति में गिरावट से वह कितना खिन्न व निराश थे। उनका निधन एक अपूरणीय क्षति है।
 
(Source) नैनीताल समाचार परिवार की श्रद्धांजलि।
 

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एक भूले – बिसरे स्वतंत्रता सेनानी की याद By कार्यालय प्रतिनिधि on February 9, 2011
  स्वतंत्रता संग्रामी हरस्वरूप पाण्डेय की मूर्ति का अनावरण व स्मारक स्थल का उद्घाटन न होने से पट्टी मल्ला स्यूनरा (अल्मोड़ा) की जनता नाराज है। लोगों ने 26 फरवरी 2011 को भैंसोड़ी स्थित स्मारक स्थल पर धरना-प्रदर्शन कर आगे की रणनीति तय करने का निर्णय लिया है।
हरस्वरूप पाण्डेय का जन्म 15 अगस्त 1909 को और 26 सितम्बर 1978 को निधन हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भागीदारी के साथ एक वैद्य के रूप में भी उन्होंने क्षेत्र के लोगों की ताउम्र सेवा की। वे आयुर्वेदिक औषधियों से घर-घर जाकर निःशुल्क सेवा करते थे। यदि कभी शुल्क भी लिया तो आठ पुड़िया दवा के साथ एक ‘धर्म की पुड़िया’ खुराक के रूप में साथ में देते थे।
उनके पुत्रों व क्षेत्र के जागरूक लोगों के प्रयासों से 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी ने हरस्वरूप पाण्डेय की मूर्ति, स्मारक तथा एक कक्ष निर्माण की स्वीकृति प्रदान की थी। 2007 में इस कार्य की शुरुआत हुई। 3 सितम्बर 2009 को मूर्ति स्थापित भी कर दी गई। विगत वर्ष 7 मीटर लम्बे व 4 मीटर चौड़े एक कक्ष का निर्माण भी पूरा हो गया। लेकिन इस स्मारक का उद्घाटन लगातार प्रयासों के बावजूद नहीं हो पाया है।
यहाँ हम हरस्वरूप पाण्डेय जी के हाथ से लिखा एक संक्षिप्त लेख प्रस्तुत कर रहे हैं। 28 दिसम्बर 1956 को लिखा यह संस्मरण उन्होंने तत्कालीन कांग्रस कमेटियों व भारत सरकार को भी भेजा है, जिसके संदर्भ में उन्होंने एक टिप्पणी की है:-
‘‘15 अगस्त 47 के बाद भारत को स्वतंत्र होने के उपरान्त काँग्रेस कमेटियों व सरकार द्वारा समय-समय पर स्वतंत्रता संग्राम के कार्यकर्ताओं की जीवनियाँ मागी गई। उन पर क्या हुआ व होगा यह तो अभी तक ज्ञात न हो पाया। इतिहास के किसी कोने में तो वह शायद ही अंकित हो पर तसल्ली देने को ऐसा समय-समय पर होता आ रहा है। जो भी हो कभी आवश्यकता रहे, इस उद्देश्य से अतीत की जो-जो स्मृतियाँ इस समय याद आई हैं वह लिख रहा हूँ।’’
हरस्वरूप पांडेय आत्मज श्री अंबा दत्त पांडेय शिमल्टिया, ग्राम भैंसोड़ी पट्टी मल्ला स्यूनरा, जन्म तिथि दिनांक 15 अगस्त 1909। मेरे पिता श्री अंबादत्त पांडेय जोतिष, कर्मकाण्ड तथा तांत्रिक विद्या के एक नामी विद्वान थे पर लक्ष्मी के भक्त नहीं। साधारण किसान जीवन में ही उनका तथा मेरा जीवन गुजरा व चला आ रहा है। पिताजी मेरे राजभक्त थे, पर मैं बालकाल से ही ब्रिटिश सत्ता का असहयोगी होता चला आया। बागेश्वर के मेले में जिस दिन कुली उतार का आंदोलन कूर्मांचल केशरी श्री बद्रीदत्त पांडेय जी के नेतृत्व में हुआ व सरयू के गंगा के बगड़ में उन्हें गिरफ्तार किया गया तो तभी से मेरे हृदय में देश सेवा के प्रति उद्गार उत्पन्न हो गये। उस दिन के दृश्य को उस छोटी अवस्था में देखने से अभी तक नहीं भुला पाया हूँ। पिताजी मेरी ओर से बहुत सतर्क रहते थे। 18 नवम्बर 1928 को अल्मोड़ा स्कूल में दिन के करीब 9 बजे जब में क्लास छोड़कर लाला लाजपत राय के शोक जलूस में शामिल होने चला आया तो फिर घर से भी बागी करार हो गया और बहुत डांट-फटकार खानी पड़ी। मेरी सब सहायतायें बंद कर दी गयी। 1929 जून के बाद स्कूली पढ़ाई भी बंद कर दी गयी। पर छिपे-छिपे मैं हमेशा काँग्रेस कार्यकर्ताओं के संपर्क में व सभाओं में आता-जाता रहा। सन् 1934 में घर से बाहर रहने के कारण हल्द्वानी शराब बंदी में धरना देने वालों की टोली में चला गया। पुलिस हमें 90/92 आदमियों (लड़कों) को पकड़ मोटर में बिठा कर बड़े-बड़ों को थाने में बंद कर छोटों को लालकुआ व किच्छा के जंगलों में छोड़ देती थी। 2-3 दिन बाद हम फिर पैदल हल्द्वानी आ जाते थे। 15 दिन तक मैं भी इसी क्रम में रहा। फिर हमें नहीं पकड़ा गया। पिताजी के देहावसान के बाद में प्रकट रूप से राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के संपर्क में चला गया। सन् 1933 से 38 के मध्य तक शैल आश्रम बिनसर (खाली) में सेठ जमना लाल बजाज जी के पास चला गया, जहाँ क्रान्तिकारियों से भेंट हुआ करती थी। 1934 दिसम्बर से 35 के मध्य तक अखिल भारतीय ग्राम उद्योग संघ व हरिजन सेवक संघ की ओर से ग्राम गुलड़िया, जिला बदायूँ में रहा। वहाँ स्वास्थ्य खराब होने के कारण घर चला आया और स्थाई रूप से अपने गाँव में ही सड़क के किनारे मकान तथा दुकान बना कर रहने लगा।
मई 1936 के बाद मल्ला स्यूनरा में ही काँग्रेस के राजनैतिक संगठन का श्रीगणेश किया। सन् 38 के मध्य में ही दुकानदारी काँग्रेस संगठन में लगे रहने के कारण ठप हो गई। फिर श्री गांधी आश्रम चनौदा-सोमेश्वर को चला गया। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण घर आना पड़ा और यहीं से सन् 1940 में सत्याग्रह ट्रेनिंग कैम्प में ट्रेनिंग लेकर सत्याग्रह की तैयारी में रहा। सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के लिये बापू जी ने मुझे भी छाँट लिया था। अतः 26-2-1941 को ताकुला पड़ाव में युद्ध विरोधी नारे लगाने पर गिरफ्तार कर लिया गया। 28-2-41 को इलाका हाकिम दानपुर की अदालत से मुझको एक साल की सख्त कैद व 40 रुपया जुर्माना कर दिया गया। अल्मोड़ा, बरेली, तथा लखनऊ कैम्प में सजा पूरी काट कर दिसम्बर 41 के आखिर में रिहा हुआ और फिर अगस्त 42 के दिन शाम के 4 बजे अपने निवास स्थान भैंसोड़ी में ही भारत रक्षा विधान की धारा 129 के अनुसार गिरफ्तार कर जिला जेल अल्मोड़ा में नजरबंद कर दिया गया। अल्मोड़ा जिले में आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया। आंदोलन में हिंसात्मक कार्यवाहियाँ होने के कारण अल्मोड़ा जेल के समस्त नजरबंदों के साथ बिना पूर्व सूचना के सेना के संरक्षण में दिनांक 30 अगस्त 1942 को जिला जेल बरेली भेज दिया और 29-8-1943 को बिना शर्त जिला जेल बरेली से रिहा कर दिया। जेल से छूटने के बाद फिर मल्ला स्यूनरा में ही काँग्रेस संगठन में जुट गया। 15 अगस्त 1947 को देश भक्तों के बलिदानों से भारत स्वतंत्र घोषित हो गया। अतः आंतरिक कल्पना साकार हो गई मेरे राजनैतिक जीवन की।
 
Source :
 
http://www.nainitalsamachar.in/remembering-unsung-hero-harswaroop-pandey/

विनोद सिंह गढ़िया

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देश की आजादी के लिए जूझे लेकिन सुखों की चाह नहीं की

जीवन पर्यन्त गुमनाम रहे आजादी के दीवाने वीर सिंह



गरुड़। आजादी की लड़ाई में पूरे जोश से शामिल हुए तमाम सेनानी ऐसे भी थे जो जीवन पर्यंत गुमनामी में ही रहे। यह उनकी महानता ही थी कि उन्होंने कभी सुख-सुविधाओं की मांग नहीं उठाई लेकिन सरकार ने भी कभी उनकी सुध नहीं ली। आजादी आंदोलन के ऐसे ही एक योद्धा थे वीर सिंह नेगी। उनको सुविधाएं तो दूर स्वतंत्रता सेनानी का सरकारी तमगा भी हासिल नहीं हो सका। इस स्वाधीनता सेनानी के परिजन उनको मरणोपरांत यह सम्मान दिलाने के लिए प्रयासरत हैं।विकास खंड गरुड़ के पाये गांव निवासी वीर सिंह नेगी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। वर्ष 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने के फलस्वरूप उन्हें तब अदालत उठने तक की सजा सुनाई गई थी। उन्होंने अपने परिजनों से सत्याग्रह आंदोलन के फलस्वरूप सजा मिलने की बात का जिक्र कभी नहीं किया।

देश आजाद हुआ। स्वाधीनता सेनानियों के प्रति कृतज्ञता जताते हुए सरकार ने उनको पेंशन आदि सुविधाएं दीं। लेकिन वीर सिंह नेगी को न तो पेंशन मिली और न ही अन्य सुविधाएं।यहां तक कि उन्हें स्वाधीनता सेनानी भी घोषित नहीं किया गया। गुमनाम रहते हुए ही वर्ष 1977 में उनका निधन हो गया।

परिजनों को उनके स्वतंत्रता आंदोलन में सजा काटने की बात पता भी नहीं चलती यदि वर्ष 1973 में अविभाजित अल्मोड़ा जिले के जिलाधिकारी सुशील चंद्र त्रिपाठी ने स्वतंत्रता रजत जयंती के मौके पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्मारिका प्रकाशित नहीं की होती। इस स्मारिका में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर सिंह का उल्लेख भी किया गया था।

पिछले दिनों स्मारिका और नेट में अपने पिता का नाम देखकर उनके छोटे पुत्र दिवान सिंह नेगी ने जिलाधिकारी बागेश्वर और अभिलेखागार अल्मोड़ा में पत्राचार किया। अभिलेखागार अल्मोड़ा ने नेगी को लिखकर दिया है कि वीर सिंह नेगी को 15 अप्रैल 1941 में 38 डीआईआर में अदालत उठने तक की सजा हुई थी। जिलाधिकारी बागेश्वर सीएस नपलच्याल ने बताया कि अब उनकी पत्रावली गृह विभाग को भेज दी गई है।

व्यक्तिगत सत्याग्रह में सजा काटने के बावजूद नहीं मिला स्वाधीनता सेनानी सम्मान


•सजा का जिक्र कभी परिजनों तक से नहीं किया स्मारिका से पता चला परिवार वालों को


http://epaper.amarujala.com/svww_index.php

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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     शहीद टीका सिंह कन्याल  स्वाधीनता सेनानी कन्याल ने 23 वर्ष की उम्र में दी शहादत     जैंती (अल्मोड़ा): 23 वर्ष की उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले शहीद टीका सिंह कन्याल ने अपनी छाती में अंग्रेजों की गोली खाकर यह दिखा दिया कि ब्रिटिश हुक्मरानों के अत्याचारों से निजात के लिए क्रांतिकारी गोली के भय से पीठ दिखाने वाले नहीं। अगस्त क्रांति में स्वर्णाक्षरों में दर्ज टीका सिंह का जन्म भी आज से 92 वर्ष पूर्व ठीक 15 अगस्त को हुआ। लेकिन आज शहीद टीका सिंह कन्याल का जन्मदिन मनाने की तक शासन-प्रशासन ने जहमत नहीं उठाई। इस बार ग्रामीणों ने आगमी 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के साथ-साथ शहीद टीका सिंह का जन्मदिवस भी धूमधाम से मनाने का निर्णय लिया है। 15 अगस्त 1919 को कांडे निवासी जीत सिंह कन्याल के घर में पैदा हुए टीका ंिसह कन्याल पर बचपन में सालम के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी के व्यक्तित्व की अमिट छाप पड़ी। स्कूली पढ़ाई छोड़ मात्र 18 वर्ष की उम्र में आजादी के तराने गाने का बीड़ा उठाया। अविवाहित टीका सिंह स्व.प्रताप सिंह बोरा व दुर्गा दत्त शास्त्री के साथ गांव-गांव जाकर नौजवानों को अपनी टोली में शामिल कर अंग्रेजों के जुल्म की कहानी बयां करते थे। 9 अगस्त को गांधी जी के करो या मरो नारे का पालन किया। 25 अगस्त को शहीद हुए टीका सिंह कन्याल ने धामद्यो के टीले में गोरी फौज से निहत्थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने वह लोहा लिया। जिसकी मिशाल कम ही मिलती है। इस दौरान जहां टीका सिंह के साथ ही चौकुना निवासी नर सिंह धानक भी मौके पर ही शहीद हो गए।
 
(Source Dainik Jagran)
 
 

 

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