Author Topic: राधा बहन- एक जुझारु महिला / Radha Bhatt  (Read 7986 times)

Parashar Gaur

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मिसाल बेमिसाल सबकी दीदी, राधा दीदी
प्रसून लतांत
उत्तराखंड से लौटकर

राधा भट्ट यूं तो पहाड़ की आम महिलाओं जैसी ही नजर आती हैं. लेकिन वे आम नहीं हैं. साधारण तो कतई नहीं. हां, आप उनसे बातचीत करें तो परत दर परत संघर्ष और अनुशासन का एक ऐसा रचनात्मक संसार खुलता चला जाता है, जो उन्हें सबसे अलग करता है.
राधा भट्ट का नाम आज गांधी-विनोबा युग के बचे हुए थोड़े से गांधीवादियों में प्रमुखता से शुमार किया जाता है. वे आज देश और दुनिया के शीर्षस्थ गांधीवादी संस्थाओं और संगठनों में महत्वपूर्ण पदों पर हैं और इन पदों की जिम्मेदारियों का निर्वाह एक मिसाल की तरह करती रही हैं. यही वजह थी कि उनका नाम नोबल पुरस्कार के लिए मनोनीत होने वाली सौ महिलाओं की सूची में शामिल किया गया था. वे अपनी उपलब्धियों को लेकर असाधारण हैं पर वे आम लोगों से कोई दूरी नहीं बनने देती हैं.
राधा दीदी को आज की राधा भट्ट होने के लिए भले लंबे प्रयत्न करने पड़े हों और ढेरों निजी आकांक्षाओं की कुरबानी देनी पड़ी हों लेकिन वह अपने जीवन के 75वें साल के सफर में आज जिस मुकाम पर हैं, वह उनकी सूझबूझ, दृढ़ता और हिम्मत की उपलब्धि है. यह उपलब्धि बहुतों के लिए प्रेरणास्रोत्र है.
आज 75 साल की उम्र में भी वह लगातार सक्रिय हैं. पहाड़, देश और दुनिया के अनेक देशों में उनका आना-जाना लगा रहता है. उन पर उम्र का कोई असर नहीं है. यात्रा और यात्रा! इन यात्राओं से गुजर कर वे कभी थकती नहीं हैं, बल्कि और आगे और देर तक चलने के लिए नई ऊर्जा भी अर्जित कर लेती हैं.
बचपन में अल्मोड़ा जिले में अपने गांव धुरका से नैनीताल जिले के रामगढ़ तक की लंबी पदयात्रा से लेकर विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और उत्ताराखंड में चिपको आंदोलन, शराबबंदी और खनन व नदी बचाओ जैसे आंदोलनों के दौरान की गई पदयात्राओं ने राधा दीदी के व्यक्तित्व का निर्माण किया है. बचपन में बड़े भाई और बाद में सरला बहन, फिर लक्ष्मी आश्रम की बच्चियों के साथ और अब देश भर में जगह-जगह चल रहे विभिन्न आंदोलनों के लिए चलने वाली यात्राओं में भी वे शरीक होने में वे हमेशा आगे रहती हैं.
राधा दीदी की छह-सात साल की उम्र की स्मृतियों में जाएं तो उन्हें अपने गांव धुरका स्थित अपने घर से पोखरी तक अपनी मॉ के पीछे-पीछे चलने की यात्रा आज भी याद है. इसके बाद जब उन्होंने घर से ननिहाल तक करीब बारह किलोमीटर की उतार-चढ़ाव वाली लंबी पहाड़ी पगडंडियों पर यात्रा की तो इसके अनुभवों ने उनमें इतना उत्साह भर दिया था कि वह कभी भी कहीं भी अपने उद्देश्यों के लिए चल देतीं.
अल्मोड़ा जिले में अपने गांव में पढ़ाई की व्यवस्था नहीं होने के कारण राधा दीदी और उनके बड़े भाई को नैनीताल जिले के रामगढ़ में दादा की निगरानी में पढ़ने के लिए रखा. राधा दीदी और उनके बड़े भाई की छुट्टियों में अपने गांव धुरका लौटते थे. साठ-सत्तर मील की यात्रा पैदल ही करते थे. घर पहुंचते-पहुंचते उन्हें रास्ते में दो-दो रातें अनजान गांवों में पड़ाव डालना पड़ता था. इन भाई-बहनों को इन्हीं दिनों में हलद्वानी मंडी से साल भर की जरूरत के लिए गुड़ लाने वाले जत्थे मिल जाते, जिससे इनकी यात्रा न सिर्फ सुरक्षित और मजेदार बल्कि आसान हो जाती थी.
राधा दीदी बताती हैं “ मैं हर साल बड़े उत्साह से इन दिनों की प्रतीक्षा करती थी जब गांवों के बीच ऐसी टोली के साथ हम फिर से पैदल चलते. गांव, उनके लोग व उनके सोच के प्रति मेरी रूचि जागी थी, पहली बार नौ-दस वर्ष की लड़की की शादी और विदाई पर उस बच्ची का जोर से चिल्ला-चिल्ला कर रोना भी मैंने तभी देखा था और मन की मन दृढ़ता से सोचा था कि मैं नहीं करूंगी शादी.”
वे अपने इस संकल्प पर टिकी रहीं. राधा दीदी ने तय कर लिया कि वह आजीवन समाज सेवा ही करेंगी. “ सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों को भी बेहतर से बेहतर काम के लिए आगे आना चाहिए”, यह संदेश उन्हें बचपन में आर्य समाज के स्कूल में पढ़ते हुए मिल गया था, जिसे राधा दीदी ने अपने जीवन में चरितार्थ करके दिखाया.
स्कूल में राधा दीदी अपनी पाठय-पुस्तकों में रमी रहतीं लेकिन सार्वजनिक जीवन का पहला पाठ उन्होंने इन यात्राओं में ही पढ़ा. ये जत्थे जिस गांव में रूकते वहां राधा दीदी ही घर-घर जाकर खाने के बर्तन और अन्य जरूरतों के लिए गृह स्वामियों से संपर्क करतीं. विश्राम के दौरान विभिन्न विषयों पर चर्चा होती. मसलन स्त्री-शिक्षा, आर्य समाज, गांधी और देश-विदेश के बारे में चर्चा होती.
राधा दीदी कहती हैं “ बचपन की इन बातों का किसी और के लिए क्या महत्व हो सकता है, नहीं जानती. लेकिन मेरे पदयात्रा के जीवन में इन यात्राओं का बड़ा महत्व है. दिन भर चलने के बाद शाम का सहजीवन हो, ग्रामवासियों का वह निष्छल विश्वास और उनकी उत्सुकतापूर्ण चर्चाएं हों या दिन में जंगलों के बीच घाटियों को गुंजाने वाले हमारी टोली के गीत हों या मन को मोहने वाली ऐसी कहानियां जो अधिकतर लंबी चढ़ाइयों को पार करने के लिए बड़े ही विश्रांत तरीके से कही जाती थीं या फिर मानव रहित स्थान पर ठिनक पाड़ कर आग जलाना, लोगों का तंबाकू पीते हुए ठहाका लगा कर हंसना हो, इस सबके बारे में मेरे मन में एक रस पैदा होता था.”
राधा दीदी ऐसी यात्राओं के आने के दिन गिनते हुए उत्साह के साथ प्रतीक्षा करती थीं. बचपन की इन यात्राओं ने उन्हें सामूहिक जीवन जीने की सीख दी. उनका यह अनुभव ही बाद में लक्ष्मी आश्रम को आगे बढ़ाने में काम आया. यह संयोग ही था कि यात्राओं को अपने जीवन की पाठशाला मानने वाली राधा दीदी को इस आश्रम में आने बाद और भी बड़ी-बड़ी यात्राओं में शामिल होने का मौका मिला और ये यात्राएं उनके व्यक्तित्व को तराशती रहीं.
17 वर्ष की उम्र में 1951 में लक्ष्मी आश्रम में प्रवेश किया तो उन्होंने यहीं सबसे पहले भूदान पदयात्रा के बारे में जाना. यात्रा से दीदी को तो कोई बैर कभी रहा नहीं, सो वे भूदान और ग्रामदान यात्राओं में शरीक होने लगी. इसके बाद तो उनकी यात्राओं का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा.
उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और असम में सैंकड़ों किलोमीटर पैरों से ही नाप लिया. इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्हें देश भर के सर्वोदय साथियों को भी करीब से जानने का मौका मिला. इन यात्राओं का जिक्र चलता है तो राधा दीदी अक्सर कहती हैं, “ सरला बहन के साथ पदयात्रा करना जीवन को गढ़ने की एक सचल पाठशाला होती थी, एक जंगम विद्यापीठ होती थी.”

पचास के दशक में उन्होंने सरला बहन के साथ सघन यात्राएं की.
लक्ष्मी आश्रम में राधा दीदी के आने की कहानी भी अलग है. पिता ने उन्हें यहां इसलिए पहुंचा दिया था कि वह आश्रम के कड़े नियमों के सामने घुटने टेक देगी और अपने थैले-बिस्तर लेकर घर वापस लौट आएगी तब तो फिर वह शादी के लिए भी तैयार हो जाएगी. गांव के आसपास स्कूल कॉलेज नहीं होने के कारण उनके पिता को अपनी बेटी को बहुत दूर भेज कर पढ़ाने में न कोई दिलचस्पी थी और न सामर्थ्य ही था.
लेकिन ऊँची शिक्षा लेने की जिद पर अड़ी बेटी के सामने वे विवश थे. लक्ष्मी आश्रम में राधा दीदी भले ही आगे की शिक्षा के लिए आई थीं, पर उन्हें अपने से छोटियों को शिक्षित करने में लगा दिया. सरला बहन ने आश्रम आते ही राधा दीदी को अंग्रेजी पढ़ने और कविता लेखन आदि से भी परहेज करने की हिदायत दे दी. ऐसी-ऐसी कई पाबंदियों और कई कड़े नियमों को अपनाते हुए राधा दीदी ने खुद को आश्रम के मुताबिक जल्दी ही ढाल लिया और इसके बाद वह कभी भी उस तरह से घर नहीं लौटी, जैसी उम्मीदों से उनके पिता भरे हुए थे. वह खुद भी नहीं लौटीं और अपनी अन्य बहनों को भी आश्रम से जोड़ा.
यह राधा दीदी ही थीं जो अपनी बुध्दिमता, श्रमनिष्ठा और सरल-सहज व्यवहार की वजह से बहुत जल्दी ही आश्रम की एक लोकप्रिय शिक्षिका बन गईं. हालांकि आश्रम में गांधी प्रणीत बुनियादी शिक्षा का ही इंतजाम था, लेकिन उन्होंने इसे भी जल्दी समझ लिया और कौसानी से अकेले ही प्रशिक्षण के लिए सेवाग्राम भी गई. तब अकेली लड़कियां गांव-गली-मुहल्ले की यात्रा अकेले नहीं करती थी, पर राधा दीदी ने इसे कोई चुनौती नहीं समझा. वह निर्भिक होकर सेवाग्राम पहुंच गईं. राधा दीदी ने तब ही पहली बार रेल का दर्शन भी किया था और उस पर यात्रा भी की थी.
राधा दीदी ने अब तक जो भी शिक्षा हासिल की थी, वह आर्य समाज स्कूल के बंद कमरों में, लेकिन आश्रम में उन्होंने देखा कि बच्चियॉ पेड़ के नीचे अपनी शिक्षिकाओं से शिक्षा लेती थी. शिक्षा हासिल करने का यह मुक्त स्वरूप राधा दीदी को बहुत भाया. इसी के साथ उन्हें खुले मन की सरला बहन जैसी गुरू मिली.
लक्ष्मी आश्रम वास्तव में सिर्फ सरला बहन की ही नहीं, बल्कि राधा दीदी के निरंतर कोशिशों की स्मृतियों का भी केंद्र है. सालों पहले स्थापित इस आश्रम की स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया का इससे ही अंदाजा लग सकता है कि इसे एक विदेशी युवती ने शुरु किया और उसकी उतराधिकारी एक पर्वतीय युवती राधा बहन बनीं. 23 सालों तक इसके संचालन के बाद जब राधा बहन के कंधे पर देश भर की संस्थाओं-संगठनों की जिम्मेदारी बढ़ती गई तो इन्होंने आश्रम का जिम्मा नीमा वैष्णव को सौंप दिया.
सरला बहन विदेशी थीं लेकिन उन्होंने देशज संस्कृति को आत्मसात कर लिया था. वे जब भारत छोड़ कर गईं तो भी राधा भट्ट उनसे लगातार पत्राचार से मार्गदर्शन लेती रहीं. यह पत्राचार अब पुस्तकाकार है, जिसे पढ़ने से राधा दीदी और सरला बहन के बीच के संबंधों का ही नहीं बल्कि बदलते विरासत होते लक्ष्मी आश्रम के निखरते नए स्वरूपों का भी दिग्दर्शन हो जाता है.
आश्रम अपने नए-नए परिवर्तनों के साथ आगे बढ़ ही रहा था कि उतराखंड में चिपको आंदोलन भी शुरू हो गया. इस आंदोलन में भी राधा दीदी खूब सक्रिय रहीं और उनको इस सक्रियता की वजह से आश्रम को भी एक नई पहचान मिली
राधा दीदी को किसी भी पहल के लिए अनुमति देने के पहले सरला बहन बहुत कठोरता से जांचती तभी इजाजत देती. उन्होंने राधा दीदी को बुनियादी शिक्षा के लिए अकेले सेवाग्राम जाने की अनुमति दे दी. इसके बाद 1965 में पहली बार राधा भट्ट को विदेश यात्रा के लिए डेनमार्क जाने का निमंत्रण आया. स्कूल जीवन में अंग्रेजी को अपने कस्बे में लाने का प्रयास करने वाली राधा दीदी ने आश्रम आते ही सरला बहन के कहने पर अंग्रेजी छोड़ दी थी. लेकिन जब उनको डेनमार्क जाना था तो उन्होंने आश्रम में ही अंग्रेजी सीखनी शुरू की. इसमें उनके एक विदेशी मित्र ने मदद की.
राधा दीदी ने पहली बार 1965 में विदेश की यात्रा की. इस दौरान उन्होंने डेनमार्क में प्रौढ़ शिक्षा का डिप्लोमा लिया और स्कैंडिनेवियन देशों डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन और फिनलैंड में फोक हाईस्कूलों का अध्ययन किया. यह विदेश यात्रा राधा दीदी के लिए कई तरह के नए अनुभवों के रूप में सामने आई.
विदेश यात्रा से लौटने के बाद स्थितियां तेजी से बदलीं. राधा बहन लक्ष्मी आश्रम की मंत्रर और संचालिका बनाई गई. उनके संचालन के दौरान लक्ष्मी आश्रम के भले ही कुछ नियम-कायदे में संशोधन किया गया लेकिन आश्रम की मूल आत्मा को यथावत रखा गया. उनके दौर में पर्वतीय बालिकाओं और युवतियों को बेहतर शिक्षण-प्रशिक्षण का मौका मिला. साथ ही आश्रम में कई नई गतिविधियों की शुरूआत भी हुई. खादी ग्रामोद्योग और पर्यावरण के क्षेत्र में कई कार्यक्रम शुरू हुए. वर्षों से शांति से शिक्षा देने वाला आश्रम का आंदोलनो-अभियानों के रूपों में भी सामने आया.
इसी दौर में उतराखंड में शराबबंदी आंदोलन शुरू हुआ जिसमें राधा दीदी के नेतृत्व में आश्रम की युवतियों ने सक्रिय भूमिका निभाई. खुद राधा दीदी इस आंदोलन के दौरान दो बार जेल भी गईं. सरकार को उन्हें जेल भेजने की मजबूरी इसलिए आई कि राधा दीदी के नेतृत्व में महिलाओं का संगठन सशक्त और सक्रिय हुआ. इस आंदोलन का उतराखंड की महिलाओं पर ये असर हुआ कि वे अपने गांव-कस्बे के हक के लिए आज भी कहीं से भी आंदोलन छेड़ देती हैं.
आश्रम अपने नए-नए परिवर्तनों के साथ आगे बढ़ ही रहा था कि उतराखंड में चिपको आंदोलन भी शुरू हो गया. इस आंदोलन में भी राधा दीदी खूब सक्रिय रहीं और उनको इस सक्रियता की वजह से आश्रम को भी एक नई पहचान मिली और यहां पढ़ने वाली लड़कियों को भी नए-नए अनुभवों-प्रयोगों से गुजरने का मौका मिला. उत्तराखंड और देश के दूसरे हिस्सों में राधा दीदी के चलाए हुए कार्यक्रम और आंदोलन आज भी हजारों-लाखों लोगों के लिए एक उदाहरण की तरह है.
राधा दीदी का महिला व्यवसाय के विकास के क्षेत्र में किया गया योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता. उन्होंने हस्तकलाओं द्वारा अपनी आजीविका प्राप्त करने वाली महिलाओं के लिए सुविधाएं संसाधन और उत्पादन के लिए बाजार प्राप्त हो- इसके मद्देनजर सरकारी नीतियां बदलने के लिए अभियान चलाया और महिला-हाट नाम की एक संस्था का गठन किया. इस संस्था से कुमाऊँ-गढ़वाल की कारीगर महिलाओं को निरंतर प्रत्यक्ष काम का मौका मिल रहा है.
इन्दौर में कस्तुरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट की राष्ट्रीय सचिव के रूप में काम करने का राधा दीदी को मौका मिला तो उन्होंने अपनी कार्यक्षमता और सुझबुझ से यहां के कार्यक्रमों को अपने आठ साल के कार्यकाल में और विस्तार दिया.
देशभर की दर्जनों महत्वपूर्ण संस्थाओं में राधा दीदी ऊँचे पदों पर सम्मान के साथ बिठाई गई हैं. गांधी शांति प्रतिष्ठान की वे अध्यक्ष हैं तो लक्ष्मी आश्रम को उनका मार्गदर्शन आज भी मिल रहा है. हिमालय सेवा संघ, कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट इंदौर, हिमवंती (नेपाल), केन्द्रीय गांधी स्मारक निधि, नई दिल्ली जैसी संस्थाओं में उनकी सक्रियता बनी हुई है. सक्रियता भी असाधारण. आखिर राधा दीदी साधारण नहीं हैं.
07.10.2008, 12.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
साभार- रविवार.काम

Parashar Gaur

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Re: Radha Bhatt ( DIDI/Sister)
« Reply #1 on: November 09, 2008, 10:57:39 PM »
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सबकी दीदी, राधा दीदी

 

प्रसून लतांत

उत्तराखंड से लौटकर

 

 

राधा भट्ट यूं तो पहाड़ की आम महिलाओं जैसी ही नजर आती हैं. लेकिन वे आम नहीं हैं. साधारण तो कतई नहीं. हां, आप उनसे बातचीत करें तो परत दर परत संघर्ष और अनुशासन का एक ऐसा रचनात्मक संसार खुलता चला जाता है, जो उन्हें सबसे अलग करता है.


 

राधा भट्ट का नाम आज गांधी-विनोबा युग के बचे हुए थोड़े से गांधीवादियों में प्रमुखता से शुमार किया जाता है. वे आज देश और दुनिया के शीर्षस्थ गांधीवादी संस्थाओं और संगठनों में महत्वपूर्ण पदों पर हैं और इन पदों की जिम्मेदारियों का निर्वाह एक मिसाल की तरह करती रही हैं. यही वजह थी कि उनका नाम नोबल पुरस्कार के लिए मनोनीत होने वाली सौ महिलाओं की सूची में शामिल किया गया था. वे अपनी उपलब्धियों को लेकर असाधारण हैं पर वे आम लोगों से कोई दूरी नहीं बनने देती हैं.

राधा दीदी को आज की राधा भट्ट होने के लिए भले लंबे प्रयत्न करने पड़े हों और ढेरों निजी आकांक्षाओं की कुरबानी देनी पड़ी हों लेकिन वह अपने जीवन के 75वें साल के सफर में आज जिस मुकाम पर हैं, वह उनकी सूझबूझ, दृढ़ता और हिम्मत की उपलब्धि है. यह उपलब्धि बहुतों के लिए प्रेरणास्रोत्र है.

आज 75 साल की उम्र में भी वह लगातार सक्रिय हैं. पहाड़, देश और दुनिया के अनेक देशों में उनका आना-जाना लगा रहता है. उन पर उम्र का कोई असर नहीं है. यात्रा और यात्रा! इन यात्राओं से गुजर कर वे कभी थकती नहीं हैं, बल्कि और आगे और देर तक चलने के लिए नई ऊर्जा भी अर्जित कर लेती हैं.

बचपन में अल्मोड़ा जिले में अपने गांव धुरका से नैनीताल जिले के रामगढ़ तक की लंबी पदयात्रा से लेकर विनोबा भावे के भूदान आंदोलन और उत्ताराखंड में चिपको आंदोलन, शराबबंदी और खनन व नदी बचाओ जैसे आंदोलनों के दौरान की गई पदयात्राओं ने राधा दीदी के व्यक्तित्व का निर्माण किया है. बचपन में बड़े भाई और बाद में सरला बहन, फिर लक्ष्मी आश्रम की बच्चियों के साथ और अब देश भर में जगह-जगह चल रहे विभिन्न आंदोलनों के लिए चलने वाली यात्राओं में भी वे शरीक होने में वे हमेशा आगे रहती हैं.

राधा दीदी की छह-सात साल की उम्र की स्मृतियों में जाएं तो उन्हें अपने गांव धुरका स्थित अपने घर से पोखरी तक अपनी मॉ के पीछे-पीछे चलने की यात्रा आज भी याद है. इसके बाद जब उन्होंने घर से ननिहाल तक करीब बारह किलोमीटर की उतार-चढ़ाव वाली लंबी पहाड़ी पगडंडियों पर यात्रा की तो इसके अनुभवों ने उनमें इतना उत्साह भर दिया था कि वह कभी भी कहीं भी अपने उद्देश्यों के लिए चल देतीं.

अल्मोड़ा जिले में अपने गांव में पढ़ाई की व्यवस्था नहीं होने के कारण राधा दीदी और उनके बड़े भाई को नैनीताल जिले के रामगढ़ में दादा की निगरानी में पढ़ने के लिए रखा. राधा दीदी और उनके बड़े भाई की छुट्टियों में अपने गांव धुरका लौटते थे. साठ-सत्तर मील की यात्रा पैदल ही करते थे. घर पहुंचते-पहुंचते उन्हें रास्ते में दो-दो रातें अनजान गांवों में पड़ाव डालना पड़ता था. इन भाई-बहनों को इन्हीं दिनों में हलद्वानी मंडी से साल भर की जरूरत के लिए गुड़ लाने वाले जत्थे मिल जाते, जिससे इनकी यात्रा न सिर्फ सुरक्षित और मजेदार बल्कि आसान हो जाती थी.

राधा दीदी बताती हैं “ मैं हर साल बड़े उत्साह से इन दिनों की प्रतीक्षा करती थी जब गांवों के बीच ऐसी टोली के साथ हम फिर से पैदल चलते. गांव, उनके लोग व उनके सोच के प्रति मेरी रूचि जागी थी, पहली बार नौ-दस वर्ष की लड़की की शादी और विदाई पर उस बच्ची का जोर से चिल्ला-चिल्ला कर रोना भी मैंने तभी देखा था और मन की मन दृढ़ता से सोचा था कि मैं नहीं करूंगी शादी.”

वे अपने इस संकल्प पर टिकी रहीं. राधा दीदी ने तय कर लिया कि वह आजीवन समाज सेवा ही करेंगी. “ सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों को भी बेहतर से बेहतर काम के लिए आगे आना चाहिए”, यह संदेश उन्हें बचपन में आर्य समाज के स्कूल में पढ़ते हुए मिल गया था, जिसे राधा दीदी ने अपने जीवन में चरितार्थ करके दिखाया.

स्कूल में राधा दीदी अपनी पाठय-पुस्तकों में रमी रहतीं लेकिन सार्वजनिक जीवन का पहला पाठ उन्होंने इन यात्राओं में ही पढ़ा. ये जत्थे जिस गांव में रूकते वहां राधा दीदी ही घर-घर जाकर खाने के बर्तन और अन्य जरूरतों के लिए गृह स्वामियों से संपर्क करतीं. विश्राम के दौरान विभिन्न विषयों पर चर्चा होती. मसलन स्त्री-शिक्षा, आर्य समाज, गांधी और देश-विदेश के बारे में चर्चा होती.

राधा दीदी कहती हैं “ बचपन की इन बातों का किसी और के लिए क्या महत्व हो सकता है, नहीं जानती. लेकिन मेरे पदयात्रा के जीवन में इन यात्राओं का बड़ा महत्व है. दिन भर चलने के बाद शाम का सहजीवन हो, ग्रामवासियों का वह निष्छल विश्वास और उनकी उत्सुकतापूर्ण चर्चाएं हों या दिन में जंगलों के बीच घाटियों को गुंजाने वाले हमारी टोली के गीत हों या मन को मोहने वाली ऐसी कहानियां जो अधिकतर लंबी चढ़ाइयों को पार करने के लिए बड़े ही विश्रांत तरीके से कही जाती थीं या फिर मानव रहित स्थान पर ठिनक पाड़ कर आग जलाना, लोगों का तंबाकू पीते हुए ठहाका लगा कर हंसना हो, इस सबके बारे में मेरे मन में एक रस पैदा होता था.”

राधा दीदी ऐसी यात्राओं के आने के दिन गिनते हुए उत्साह के साथ प्रतीक्षा करती थीं. बचपन की इन यात्राओं ने उन्हें सामूहिक जीवन जीने की सीख दी. उनका यह अनुभव ही बाद में लक्ष्मी आश्रम को आगे बढ़ाने में काम आया. यह संयोग ही था कि यात्राओं को अपने जीवन की पाठशाला मानने वाली राधा दीदी को इस आश्रम में आने बाद और भी बड़ी-बड़ी यात्राओं में शामिल होने का मौका मिला और ये यात्राएं उनके व्यक्तित्व को तराशती रहीं.

17 वर्ष की उम्र में 1951 में लक्ष्मी आश्रम में प्रवेश किया तो उन्होंने यहीं सबसे पहले भूदान पदयात्रा के बारे में जाना. यात्रा से दीदी को तो कोई बैर कभी रहा नहीं, सो वे भूदान और ग्रामदान यात्राओं में शरीक होने लगी. इसके बाद तो उनकी यात्राओं का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा.

उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और असम में सैंकड़ों किलोमीटर पैरों से ही नाप लिया. इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्हें देश भर के सर्वोदय साथियों को भी करीब से जानने का मौका मिला. इन यात्राओं का जिक्र चलता है तो राधा दीदी अक्सर कहती हैं, “ सरला बहन के साथ पदयात्रा करना जीवन को गढ़ने की एक सचल पाठशाला होती थी, एक जंगम विद्यापीठ होती थी.”

पचास के दशक में उन्होंने सरला बहन के साथ सघन यात्राएं की.
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लक्ष्मी आश्रम में राधा दीदी के आने की कहानी भी अलग है. पिता ने उन्हें यहां इसलिए पहुंचा दिया था कि वह आश्रम के कड़े नियमों के सामने घुटने टेक देगी और अपने थैले-बिस्तर लेकर घर वापस लौट आएगी तब तो फिर वह शादी के लिए भी तैयार हो जाएगी. गांव के आसपास स्कूल कॉलेज नहीं होने के कारण उनके पिता को अपनी बेटी को बहुत दूर भेज कर पढ़ाने में न कोई दिलचस्पी थी और न सामर्थ्य ही था.


 

लेकिन ऊँची शिक्षा लेने की जिद पर अड़ी बेटी के सामने वे विवश थे. लक्ष्मी आश्रम में राधा दीदी भले ही आगे की शिक्षा के लिए आई थीं, पर उन्हें अपने से छोटियों को शिक्षित करने में लगा दिया. सरला बहन ने आश्रम आते ही राधा दीदी को अंग्रेजी पढ़ने और कविता लेखन आदि से भी परहेज करने की हिदायत दे दी. ऐसी-ऐसी कई पाबंदियों और कई कड़े नियमों को अपनाते हुए राधा दीदी ने खुद को आश्रम के मुताबिक जल्दी ही ढाल लिया और इसके बाद वह कभी भी उस तरह से घर नहीं लौटी, जैसी उम्मीदों से उनके पिता भरे हुए थे. वह खुद भी नहीं लौटीं और अपनी अन्य बहनों को भी आश्रम से जोड़ा.

यह राधा दीदी ही थीं जो अपनी बुध्दिमता, श्रमनिष्ठा और सरल-सहज व्यवहार की वजह से बहुत जल्दी ही आश्रम की एक लोकप्रिय शिक्षिका बन गईं. हालांकि आश्रम में गांधी प्रणीत बुनियादी शिक्षा का ही इंतजाम था, लेकिन उन्होंने इसे भी जल्दी समझ लिया और कौसानी से अकेले ही प्रशिक्षण के लिए सेवाग्राम भी गई. तब अकेली लड़कियां गांव-गली-मुहल्ले की यात्रा अकेले नहीं करती थी, पर राधा दीदी ने इसे कोई चुनौती नहीं समझा. वह निर्भिक होकर सेवाग्राम पहुंच गईं. राधा दीदी ने तब ही पहली बार रेल का दर्शन भी किया था और उस पर यात्रा भी की थी.

राधा दीदी ने अब तक जो भी शिक्षा हासिल की थी, वह आर्य समाज स्कूल के बंद कमरों में, लेकिन आश्रम में उन्होंने देखा कि बच्चियॉ पेड़ के नीचे अपनी शिक्षिकाओं से शिक्षा लेती थी. शिक्षा हासिल करने का यह मुक्त स्वरूप राधा दीदी को बहुत भाया. इसी के साथ उन्हें खुले मन की सरला बहन जैसी गुरू मिली.

लक्ष्मी आश्रम वास्तव में सिर्फ सरला बहन की ही नहीं, बल्कि राधा दीदी के निरंतर कोशिशों की स्मृतियों का भी केंद्र है. सालों पहले स्थापित इस आश्रम की स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया का इससे ही अंदाजा लग सकता है कि इसे एक विदेशी युवती ने शुरु किया और उसकी उतराधिकारी एक पर्वतीय युवती राधा बहन बनीं. 23 सालों तक इसके संचालन के बाद जब राधा बहन के कंधे पर देश भर की संस्थाओं-संगठनों की जिम्मेदारी बढ़ती गई तो इन्होंने आश्रम का जिम्मा नीमा वैष्णव को सौंप दिया.

सरला बहन विदेशी थीं लेकिन उन्होंने देशज संस्कृति को आत्मसात कर लिया था. वे जब भारत छोड़ कर गईं तो भी राधा भट्ट उनसे लगातार पत्राचार से मार्गदर्शन लेती रहीं. यह पत्राचार अब पुस्तकाकार है, जिसे पढ़ने से राधा दीदी और सरला बहन के बीच के संबंधों का ही नहीं बल्कि बदलते विरासत होते लक्ष्मी आश्रम के निखरते नए स्वरूपों का भी दिग्दर्शन हो जाता है.

आश्रम अपने नए-नए परिवर्तनों के साथ आगे बढ़ ही रहा था कि उतराखंड में चिपको आंदोलन भी शुरू हो गया. इस आंदोलन में भी राधा दीदी खूब सक्रिय रहीं और उनको इस सक्रियता की वजह से आश्रम को भी एक नई पहचान मिली
 

राधा दीदी को किसी भी पहल के लिए अनुमति देने के पहले सरला बहन बहुत कठोरता से जांचती तभी इजाजत देती. उन्होंने राधा दीदी को बुनियादी शिक्षा के लिए अकेले सेवाग्राम जाने की अनुमति दे दी. इसके बाद 1965 में पहली बार राधा भट्ट को विदेश यात्रा के लिए डेनमार्क जाने का निमंत्रण आया. स्कूल जीवन में अंग्रेजी को अपने कस्बे में लाने का प्रयास करने वाली राधा दीदी ने आश्रम आते ही सरला बहन के कहने पर अंग्रेजी छोड़ दी थी. लेकिन जब उनको डेनमार्क जाना था तो उन्होंने आश्रम में ही अंग्रेजी सीखनी शुरू की. इसमें उनके एक विदेशी मित्र ने मदद की.

राधा दीदी ने पहली बार 1965 में विदेश की यात्रा की. इस दौरान उन्होंने डेनमार्क में प्रौढ़ शिक्षा का डिप्लोमा लिया और स्कैंडिनेवियन देशों डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन और फिनलैंड में फोक हाईस्कूलों का अध्ययन किया. यह विदेश यात्रा राधा दीदी के लिए कई तरह के नए अनुभवों के रूप में सामने आई.

विदेश यात्रा से लौटने के बाद स्थितियां तेजी से बदलीं. राधा बहन लक्ष्मी आश्रम की मंत्रर और संचालिका बनाई गई. उनके संचालन के दौरान लक्ष्मी आश्रम के भले ही कुछ नियम-कायदे में संशोधन किया गया लेकिन आश्रम की मूल आत्मा को यथावत रखा गया. उनके दौर में पर्वतीय बालिकाओं और युवतियों को बेहतर शिक्षण-प्रशिक्षण का मौका मिला. साथ ही आश्रम में कई नई गतिविधियों की शुरूआत भी हुई. खादी ग्रामोद्योग और पर्यावरण के क्षेत्र में कई कार्यक्रम शुरू हुए. वर्षों से शांति से शिक्षा देने वाला आश्रम का आंदोलनो-अभियानों के रूपों में भी सामने आया.

 

इसी दौर में उतराखंड में शराबबंदी आंदोलन शुरू हुआ जिसमें राधा दीदी के नेतृत्व में आश्रम की युवतियों ने सक्रिय भूमिका निभाई. खुद राधा दीदी इस आंदोलन के दौरान दो बार जेल भी गईं. सरकार को उन्हें जेल भेजने की मजबूरी इसलिए आई कि राधा दीदी के नेतृत्व में महिलाओं का संगठन सशक्त और सक्रिय हुआ. इस आंदोलन का उतराखंड की महिलाओं पर ये असर हुआ कि वे अपने गांव-कस्बे के हक के लिए आज भी कहीं से भी आंदोलन छेड़ देती हैं.

आश्रम अपने नए-नए परिवर्तनों के साथ आगे बढ़ ही रहा था कि उतराखंड में चिपको आंदोलन भी शुरू हो गया. इस आंदोलन में भी राधा दीदी खूब सक्रिय रहीं और उनको इस सक्रियता की वजह से आश्रम को भी एक नई पहचान मिली और यहां पढ़ने वाली लड़कियों को भी नए-नए अनुभवों-प्रयोगों से गुजरने का मौका मिला. उत्तराखंड और देश के दूसरे हिस्सों में राधा दीदी के चलाए हुए कार्यक्रम और आंदोलन आज भी हजारों-लाखों लोगों के लिए एक उदाहरण की तरह है.

राधा दीदी का महिला व्यवसाय के विकास के क्षेत्र में किया गया योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता. उन्होंने हस्तकलाओं द्वारा अपनी आजीविका प्राप्त करने वाली महिलाओं के लिए सुविधाएं संसाधन और उत्पादन के लिए बाजार प्राप्त हो- इसके मद्देनजर सरकारी नीतियां बदलने के लिए अभियान चलाया और महिला-हाट नाम की एक संस्था का गठन किया. इस संस्था से कुमाऊँ-गढ़वाल की कारीगर महिलाओं को निरंतर प्रत्यक्ष काम का मौका मिल रहा है.

इन्दौर में कस्तुरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट की राष्ट्रीय सचिव के रूप में काम करने का राधा दीदी को मौका मिला तो उन्होंने अपनी कार्यक्षमता और सुझबुझ से यहां के कार्यक्रमों को अपने आठ साल के कार्यकाल में और विस्तार दिया.

देशभर की दर्जनों महत्वपूर्ण संस्थाओं में राधा दीदी ऊँचे पदों पर सम्मान के साथ बिठाई गई हैं. गांधी शांति प्रतिष्ठान की वे अध्यक्ष हैं तो लक्ष्मी आश्रम को उनका मार्गदर्शन आज भी मिल रहा है. हिमालय सेवा संघ, कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट इंदौर, हिमवंती (नेपाल), केन्द्रीय गांधी स्मारक निधि, नई दिल्ली जैसी संस्थाओं में उनकी सक्रियता बनी हुई है. सक्रियता भी असाधारण. आखिर राधा दीदी साधारण नहीं हैं.

 

07.10.2008, 12.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: Radha Bhatt ( DIDI/Sister)
« Reply #2 on: November 10, 2008, 09:12:56 AM »

Gaur Ji,

This is need a very exclusive information. As far i am concerned i had not heard earlier about Radha Didi.

thanx.

पंकज सिंह महर

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Re: Radha Bhatt ( DIDI/Sister)
« Reply #3 on: November 10, 2008, 11:10:50 AM »
गौड़ जी,
      नमस्कार, राधा बहन के बारे में विस्तार से हमें अवगत कराने के लिये कोटिशः धन्यवाद।
राधा बहन उत्तराखण्ड आन्दोलन से लेकर विभिन्न जन सरोकारों से जुड़े मसलों पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही हैं, पिछले वर्ष नदी बचाओ आन्दोलने में भी उनकी प्रभावी और महत्वपूर्ण भूमिका रही।

पंकज सिंह महर

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Re: Radha Bhatt ( DIDI/Sister)
« Reply #4 on: November 10, 2008, 11:18:42 AM »




राधा बहन

पंकज सिंह महर

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गांधी जी की ६० वीं पुण्य दिथि पर राधा बहन का संदेश

पंकज सिंह महर

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She is one of the 1000 women proposed fort the Nobel Peace Price 2005

Radha Bhatt’s work in the picturesque but poor Himalayan foothills is a canny combination of progressive ideas and Gandhian ideals-and they have functioned wonderfully. She is working for the Kasturba National Memorial Trust (KNMT), which received NGO Consultative Status (II) by the UN.
This Instutute of Social Studies Trust ISST, has conducted over the years several pioneering research studies, with a view of designing alternative development strategies that recognise the role and contribution of vulnerable groups, including women.

From protesting against the raw deal uneducated women in the Uttaranchal Himalayas are handed out to become one of the best known social and political activists in the country - that has been Radha Bhatt’s journey over the past 70 - odd years. Along the way, she has tackled alcoholism among men in Uttaranchal, the empowerment of women, the Chipko (tree-hugging) movement, open mining on the fragile Uttaranchal highlands, and has been part of the nationwide protest against big dams.

She is part of the trainers of the first workshop organised by Friends of Tibet (INDIA) on ‘Non-Violence & Social Action’ (Rangzen Workshop Series) with the theme: ‘Non-Violence, Spirituality and Community Action’ by Radha Bhatt. She is part time teacher at the Bhavan Institute of Indian Art and Culture. And she gives also courses in workshops of organic farming.

The Hunger Project’s Work in India - Chair Radha Bhatt: The Hunger Project has been working for some time in the Anjani and Amvar villages of the extremely remote tribal district of Mandla.

In Anjani village, the council has formed a women’s organization for health, education and income generation. At the Amvar cluster of villages, the council is working with the people to gain access to water and a market road. As there are virtually no voluntary organizations in this district, the field work is being carried out in partnership with the Madhya Pradesh Institute of Socio-Economic Studies, and is focusing on improvements in delivery of health and education services.

One of its extreme disadvantages has been the lack of any access road. The villagers have to travel on foot for at least 10 kms on a muddy track to reach the market for the purchase of basic items or even to gain access to any kind of transport system. The Hunger Project brought the district collector and the block development officers to this area, and they immediately sanctioned a road to be constructed, which is now complete. Recently, the first steps were taken to expand SPIA into five additional blocks in partnership with five highly respected NGOs in those areas.

The Union Minister for Environment & Forests Shri T.R. Baalu presenting the Indira Gandhi Paryavaran Puraskar-1994 (Award)to Smt. Radha Bhatt for outstanding contribution in the field of Environmental Protection, forest conservation and reclamation of mined land, at a function in New Delhi on September 19, 2000.

Radha Bhatt, dedicated to the Gandhian vision, lives out spirituality as a much needed source of nourishment in her daily life. She runs Lakshmi Ashram in Kausani in Uttar Pradesh, India. “Gandhiji wanted this institution set up,” she explains, “to awaken the hidden shakti of hill women, I came here as a young girl to study. Now, I teach girls from remote villages.
She says: “The day begins with a morning prayer and spinning. The schoolgirls spin as they pray together. Then there are classes and practical work. Satyagraha (upholding the truth) and sarvodaya (the upliftment of all) involve integration of the various elements of the self—the spiritual with the mundane.” For Bhatt, this is a family, connected by bonds deeper than the blood ties.

पंकज सिंह महर

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Smt Radha Bhatt:

Woman leader of the Chipko, the well-known environmental movement based in the hills of Uttarakhand, India and a regional women's network from the Hindu Kush Himalayas. Radha Bhatt has presented various papers which examines the social context of these environmental movements; especially reasons for the proactive role women played and continue to play, also the presence of Van Panchayat(s) in the hills and the reasons for their inability to manage community forest lands.

पंकज सिंह महर

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Written by Radha Bhatt, Gandhi Peace Foundation     
Monday, 30 June 2008 

I start my submission with a quotation written by Mahatma Gandhi, which was published in one of his magazines, Harijan Sewak, on 23.06.1946 on page number 186-87.

"Today people in West speak of Jesus but in fact their lives are being guided by the inspiration which is totally against Jesus.  Just as in the same way there are people who talk of Islam but in reality they follow the "Shaitan."  This is the miserable position of we people believing in religion (I would like to add that the same contradictory lives are being led by Hindus, Buddhists and Jains etc.).

"If the people would have followed God, the corruption, violence and exploitation which is prevailed today in the society, would have withered away completely.  At present the rich are growing richer, while the poor are being pushed down to become ever poorer.  Everywhere the cruel game of hunger, nakedness and death is being played.  These are not the symptoms of God's world, but are the signs of the empire of "Shaitan or Ravana" and the elements against Jesus.
We cannot bring God's kingdom on the earth by repeating this name only by our lips.  Our work and life practices should be according to God, not to "Shaitan."

"When the kingdom of God will prevail in the hearts of the people, then only they will be free of anger and violence."  Mahatma Gandhi Harijan Sewak 20.04.1947, page 406.

These beautiful quotations on religion and the violence give such a clear direction on which we could make our search for a way out from the present violent situations.

The violence in the world right now is in two forms, first is the visible form, wars among different nations, terrorism spread all over the world, clashes between different ethnic groups and communal riots among the different faiths.  But there is also invisible violence which has become part and parcel of our social structure.  To some extent this structural violence is the root cause of the visible violence of wars, terrorism and communal riots too.  On the other hand, the religions have also forgotten the original values of their religion, which was given to them by the prophets or the enlightened ones.  It is like this funny story told by the people in India.  Somebody was given the nectar (religion) in a golden cup to drink.  He drank the nectar and became immortal but the other who came behind him took his golden cup and considered it the religion holding the cup strongly in their arms and fighting to other faiths, "Our golden cup (religion) is the best to reach God."  So, though, not a single religion had ever shown a single small path of violence in their doctrines, in practice so much blood had been shaded in the past and present in the name of religion.

In fact the religion is above and over to those traditional formalities which in due time had developed according to the different geography, climate and cultural conditions.   I should say that religion is the inner and practical quest of the human beings which reflects in their lifestyles and brings them closer and closer to their spiritual truth and at least makes them one with that permanent bliss.  This truth could be called the almighty spirit, the creator of this cosmos or give it the name of God.  This truth is equally based in the center of every faith.  This single similarity is a strong chain which brings every religion in one destiny and our responsibility towards humanity.  If religions see their souls in this new outlook instead of their traditional dogmatic outer frames, every religion will become the messenger of nonviolence.

If we go deep into concept and practice of the religion truly, it is as open as the sky and as vast as the earth.  There are no geographic boundaries and human limitations to it.  All the faiths like Hinduism, Islam, Christianity, Buddhism, Jainism etc are the different paths to reach to the same goal, which is the truth or the peace.  The peace of mind, the peace in human society, the peace in the nature around the Globe and beyond it the peace of Sun, Moon, stars and those planets circling around each other.

So why do we think of peace only to humans, why should not it be for whole creation?  This is the right essence of the religion, which can be able to combat the violence.  The massage in this context is very powerful given in the Vedas.  The "Rishi" of Vedas sings the "Mantra" like this

"shun na surya Uruchaksha Udetu"     Source Rigveda

"We pray for the peace to the Sun, which is the very source of life and energy to this globe.  We wish peace to all directions.  We wish peace to the mountains that they stand permanently as the North Star does.  We wish peace to the oceans, rivers and the vegetation all over the world."

Thus the religions have to hug the whole creation with everlasting love and combat the violence forced by its followers, namely the human beings.  Then the religions will fulfill their definition which is given in old Sanskrit scripts as -

"Dharaynti iti Dharma." Dharma or religion is that which holds the life on the earth.

Now in this august gathering, I would humbly ask all of you to ponder while believing on our religions, we do not become the part of the system which is spoiling the air and waters, ruining the oceans and forests just for human luxuries.  We are also the part of the pollution in the rivers and waters and soil.  Ultimately the earth and the sun are also adversely affected by all what the humans are doing in the name of progress and development around the Globe.  The human is trying to win the nature instead of living with it in a friendly relation.  This is violence and unreligious act by the religious human. If we change this with a religious understanding that will prove  a true combat against violence.  I should say if the religions become so broadbased, certainly the wars and terrorism etc would be combated.       

 
साभार- www.worldpeaceforum.net

पंकज सिंह महर

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चिपको, शराबबंदी और उत्तराखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली और गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा भट्ट इन दिनों राज्यव्यापी नदी बचाओ अभियान में सक्रिय हैं। उनके नेतृत्व में उत्तराखंड में इस साल (नदी बचाओ अभियान वर्ष) मनाया जा रहा है। इस अभियान के बारे में आपसे बातचीत:

-आपके अभियान में प्रदेश के कितने संगठन सक्रिय हैं और वे किस तरह इस मुहिम को मजबूत बनाने में जुटे हुए हैं?

इस अभियान में उत्तराखंड राज्य की दो दर्जन से अधिक संस्थाएं और संगठन जुड़े हुए हैं। उनके स्वयंसेवक अपनी-अपनी घाटियों में आमजनों के साथ मिलकर स्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं। सरकार तक लोगों की समस्याओं को पहुंचाने में लगे हैं। धरना-सत्याग्रह में जुड़ रहे हैं और नदी बचाने के लिए वृक्षारोपण करने में लगे हैं। इसके अलावा जंगलों को आग से बचाने और चाल-खाल बनाने में जुटे हुए हैं।

- अभियान का एक प्रतिनिधिमंडल आपके नेतृत्व मे प्रदेश के मुख्यमंत्री से मिल चुका है। उन्होंने आंदोलनकारियों को क्या आश्वासन दिया है?

प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री से जनवरी की राज्यव्यापी पदयात्रा के दौरान उन सब मुद्दों को लेकर मिला था, जो उत्तराखंड में जल संवर्धन और नदियों के संरक्षण के लिए लोगों की ओर से उठाए गए थे। मुख्यमंत्री ने हमारी बातें सुनीं। लेकिन कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया था, केवल मीडिया में कहते रहे हैं कि बड़े बांधों के निर्माण पर पुनर्विचार करेंगे और धार्मिक नदियों पर कम से कम छेड़छाड़ करेंगे।

- आपकी अगली रणनीति क्या होगी?

अभियान सभी निर्णय सामूहिक रूप से उठाता है, जिन-जिन नदियों पर संयोजक समितियां व संयोजक मिलकर कदम तय करते हैं और स्थितियां बनती हैं वैसा कदम मिल कर तय करेंगे। अभी हमारा अभियान प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के उपवास पर ध्यान केंद्रित किए हुए है।

- उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान में जनता की भागीदारी किस प्रकार बढ़ रही है?

जनता की भागीदारी विभिन्न घाटियों में बढ़ रही है। जो पहले अपने कष्टों को धीरे से कह रहे थे वे अब ज्ञापन दे रहे हैं, धरना उपवास कर रहे हैं। महिलाएं संगठित हो रही हैं। वे अपने क्षेत्र की नदियों के प्रति सजग होकर वहां होने वाले रेत-बजरी आदि के खनन के व्यापारिक दोहन को रोक रही है। जंगलों में लगने वाली आग को बुझा रही हैं। उनके प्रयासों पर लोग अधिक से अधिक चाल-खाल बना रहे हैं। आरक्षित वनों को बचाने के लिए भी सक्रियता और प्रतिबद्धता से काम कर रही है।

- क्या इस अभियान को उत्तराखंड के बाहर से भी समर्थन मिल रहा है? मिल रहा है तो किस तरह से?

प्रदेश के बाहर से कई सामाजिक क्षेत्र में पर्यावरण के लिए काम करने वाले लोग नदियों को बचाने के लिए लोगों में जागृति लाने के मकसद से राज्यव्यापी पदयात्राओं के बाद रामनगर में हुए सम्मेलन में शामिल हुए थे। आर्थिक दृष्टि से की गई हमारी अपील पर अनेक मित्रों व इन कामों में विश्वास रखने वाले साथियों ने अपनी छोटी-छोटी मदद भी भेजी है, जिससे स्थानीय स्तर पर चल रहे प्रयासों को ताकत मिली है। दूसरे प्रदेशों में भी इस वर्ष को उत्तराखंड की तर्ज पर नदी बचाओ अभियान वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। नदी के सवाल पर प्राफेसर जीडी अग्रवाल के आमरण अनशन के फैसले को देखते हुए देश भर के आईआईटी वाले सर्वोदयी साथी और उनके शिष्य सक्रिय हो गए हैं। प्रो. अग्रवाल के फैसले का पूर्ण समर्थन करते हुए उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान के साथी भी अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों को जगा रहे हैं। संगठित कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम से आन लाइन आवेदन पर हस्ताक्षर अभियान चलाए जा रहे हैं। उनके समर्थन में अभियान के साथी भी प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर सामूहिक उपवास कर रहे हैं।
साभार- http://hindi.indiawaterportal.org     

 

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