Author Topic: उत्तराखण्ड की समाजसेवी और दानवीर विभूतियां Social activist of Uttarakhand  (Read 5748 times)

पंकज सिंह महर

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श्रीमती मंगला देवी जुयाल- इनका जन्म टिहरी गढवाल जिले की सकलाना पट्टी में रायबहादुर महेन्द्र दत्त सकलानी के घर में हुआ। इनका विवाह श्री चक्रधर जुयाल जी के छोटे भाई श्रीधर जुयाल के साथ हुआ, लेकिन दुर्योग से मात्र चौदह वर्ष की आयु में ये विधवा हो गईं। उसके बाद उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज सेवा में लगा दिया, इन्होंने ढकरानी (देहरादून) में एक धर्मार्थ चिकित्सालय संचालित किया। श्रीमती जुयाल आदर्श साध्वी, परोपकारिणी, स्वाभिमानी, धैर्यशालिनी और अपनी संस्कृति की अद्भूत धरोहर थी। एक बार फील्ड मार्शल करियप्पा ब्रिगेडियर जुयाल के आमंत्रण पर ढकरानी आये तो मंगला जी के औषधालय और सेवाभाव को देखकर बहुर प्रसन्न हुये और कहा कि "आण्टी जी, आप तो इनाम की हकदार हैं"।

पंकज सिंह महर

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श्री घनानन्द खंडूड़ी (1882-1924) इनका जन्म पौड़ी जिले की कटुलस्यूं पट्टी के मरगदना गांव में हुआ था। ये अपने समय के बड़े वन-व्यवसायी (टिम्बर मर्चेन्ट) थे, अपने व्यवसाय के अतिरिक्त ये दानवीर और समाजसेवी भी थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इनका व्यवसाय चरम पर था और यह टिहरी नरेश के भी अत्यन्त शुभचिन्तक थे। एक सीमा विवाद के सिलसिले में टिहरी दरबार की ओर से १९१७ में यह तिब्बत भी गये थे और अपने कौशल से वहां के राज्याधिकारियों से बातचीत कर सरहदी झगड़े को निपटाया। नेलंग-हर्सिल के जाड़ों के लिये डुण्डा में इन्होंने एक व्यापारिक मण्डी की भी स्थापना करवाई, टिहरी रियासत की ओर से एक बार इन्हें जंगलात वर्किंग प्लान का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया था। राज्य के प्रति निष्ठावान सेवाओं के कारण टिहरी रियासत के महाराजा नरेन्द्र शाह ने इन्हें १९२० में सोने की तलवार और खिलअत भी प्रदान की गई।
इनकी दानशीलता के चर्चे आज भी गढ़वाल में आदरपूर्वक कहे जाते हैं, कई गरीब और मेधावी छात्रों को इन्होंने आर्थिक सहायता देकर उच्च शिक्षा दिलवाई। इन्होंने बैरिस्टर मुकुन्दी लाल को अपने खर्चे पर इंग्लैण्ड भेजा था और बैरिस्टरी पास करवाई थी। मसूरी में अपने छोटे भाई की स्मृति में "श्री चन्द्र बल्लभ स्मारक छात्रवॄत्ति ट्रस्ट" स्थापित कर सैकड़ों गरीब और प्रतिभावान गढ़वाली युवकों को पढ़ने में अमूल्य सहयोग प्रदान किया। समूरी में ही "चन्द्रबल्लभ आयुर्वदिक दातव्य औषधालय" की स्थापना की और तिलक हाल के निर्माण में भी भरपूर सहयोग दिया। उत्तरकाशी में "श्री कीर्ति संस्कृत पाठशाला" की भी इन्होंने स्थापना की थी। अपने अर्जित धन से पाठशालायें खोलकर इन्होंने स्थानीय युवकों को विद्याध्ययन करने, व्यवसाय आरम्भ क्रने और सम्मानपूर्वक आजीविका कमाने में अनोखा योगदान किया। 1920 में इन्हें "रायबहादुर सम्मान" से भी विभूषित किया गया। इनकी स्मृति में मसूरी में स्थापित घनानन्द इण्टर कालेज आज भी गरिमा के साथ चल रहा है।

पंकज सिंह महर

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श्रीमती जसूली दताल उर्फ जसूली सौक्याण

इनका अनुमानित जीवनकाल 1805 से 1895 तक का है, इनका जन्म पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील के दारमा परगने के अन्तर्गत दांतू गांव में हुआ था। यह एक धनाढय परिवार में जन्मी थीं और अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान थीं। विवाह के बाद इनकी कोई सन्तान भी नहीं हुई थी। इनके जीवन से संबंधित एक विचित्र और सत्यकथा यह है कि एक बार कुमाऊं के कमिश्नर हैनरी रैमजे अपने दौरे पर दुग्तू से दांतू गांव की ओर जा रहे थे, रास्ते में उन्होंने देखा कि एक वृद्ध महिला न्यूलामती नदी के किनारे पर चांदी के सिक्कों को एक-एक कर नदी में बहा रही थी। दांतू पहुंच कर गांव वालों से जब रैमजे ने इस विचित्र महिला के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि जसूली जी हर सप्ताह मन भर चांदी के सिक्के न्यूलामती नदी को दान कर देती हैं। रैमजे ने जसूली को समझाया कि इस धन का उपयोग जनहित में हो सकता है, वे इस प्रस्ताव को मान गई और धर्मशालायें बनवाने की इच्छा जताई और इनका असीम धन भेड़-बकरियों पर लाद कर अल्मोड़ा पहुंचवाया गया। इसी धन से हैनरी रैमजे ने जसूली सौक्याण के नाम से ३०० से अधिक धर्मशालायें बनवाई, इन्हें बनने में २० वर्ष से अधिक का समय लगा। इनमें सबसे प्रसिद्ध हैं- नारायण तिवाड़ी देवाल, अल्मोड़ा की धर्मशाला, इसके अलावा वीरभट्टी (नैनीताल), हल्द्वानी, रामनगर, कालाढूंगी, रातीघाट, पिथौरागढ़, भराड़ी, बागेश्वर, सोमेश्वर, लोहाघाट, टनकपुर, ऐंचोली, थल, अस्कोट, बलुवाकोट, धारचूला कनालीछीना, तवाघाट, खेला, पांगू आदि अनेक स्थानों पर धर्मशालायें हैं, जो उन महान विभूति की दानशीलता का स्मरण आज भी कराती हैं।

 

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