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Some Ideal People of Uttarakhand - संगे - बुनियाद (By Rajiv Nayan Bahuguna)

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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:

Dosto,

We are sharing here details of some of the Ideal People of Uttarakhand who devoted their entire life for social cause. This information has been provided by Shri Rajiv Nayan Bahuguna ji, Journalist, folk artiest, columnist (son of noted Environmentalist Shri Sunder Lal Bahuguna ji).
Shri Rajiv Nayan ji has compiled these details during his personal meeting with these persons.   

Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna
September 6 ·

संगे - बुनियाद -1
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टिहरी गढवाल (उत्तराखंड ) के एक गाँव में रहने वाले धूम सिंह नेगी पिछले 50 वर्षों से यहाँ के सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं । 1972 में वह टिहरी ज़िले में शराब बंदी की मांग को लेकर हुए जन आन्दोलन में ज़ेल गये । उस वक़्त वह एक हाई स्कूल में प्रधानाध्यापक थे । इसके बाद वह नौकरी छोड़ पूरी तरह सार्वजनिक जीवन में समर्पित हो गये । वह चिपको आन्दोलन के प्रारम्भिक नेताओं में एक हैं । हेंवल घाटी में सचमुच का " चिपको " आन्दोलन उन्ही के नेतृत्व में चला , जहाँ वस्तुतः पेड़ों पर चिपकने की नौबत आई ।राज्य के कई महत्व पूर्ण आन्दोलन कारी , यथा कुंवर प्रसून , प्रताप शिखर और विजय जद्धारी आदि उन्हीं की देन हैं , जो कभी उनके छात्र रह चुके थे । धूम सिंह नेगी टिहरी बाँध विरोधी आन्दोलन और बीज बचाओ आन्दोलन के भी प्रथम पंक्ति के नायक रहे । वह ऋषिकेश - गंगोत्री राजमार्ग पर जाजल से करीब 3 किलोमीटर दूर पिपलेथ कालिंदी नामक गाँव में रहते हैं । लगभग 75 वर्षीय धूम सिंह नेगी प्रचार प्रसार और पुरी- पुरजन के कोलाहल से दूर एक छोटे किसान के रूप में जीवन यापन करते हैं


Dhoom Singh Negi
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M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
By Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna

संगे - बुनियाद -2
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ये हैं धर्मा नन्द नौटियाल उर्फ़ संत जी । टिहरी गढवाल ( उत्तराखंड ) के एक सुदूर लेकिन सुरम्य स्थल बूढ़ा केदार में पिछली सदी के पूर्वार्द्ध में कभी संत जी का जन्म हुआ । उनके पिता अपने इलाके के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण साहूकार थे । पिता के बाद जब व्यवसाय की कमान संत जी के हाथ में आई , तो उन्होंने सारे देनदारों का कर्ज़ माफ़ कर दिया और पुश्तैनी दूकान भी बंद कर दी । स्वाधीनता संग्राम के दिनों वह कांग्रेसी पृष्ठ भूमि के थे , पर आजादी के बाद गांधी - विनोबा के रास्ते चल पड़े । भूदान में अपनी भूमि भी दान दी । प्रसिद्द बूढ़ा केदार मन्दिर में दलितों का प्रवेश कराया तो सवर्णों ने जूतों का प्रसाद दिया । संत जी यहीं नहीं रुके । उन्होंने गाँव के एक दलित भरपूरु लाल और एक राज पूत बहादुर सिंह के साथ संयुक्त परिवार की परम्परा शुरू की । एक खानदानी ब्राह्मण की इस कार्रवाई पर रिश्तेदारों में कोलाहल मच गया । एक दलित , राजपूत और पुरोहित की रसोई इकट्ठा पकती थी । खेत साझा थे । आज से 50 वर्ष पूर्व यह एक विरल घटना थी । संत जी ता उम्र सत्ता के मोह से दूर अपने गाँव में रह कर खेती और 500 रूपये प्रतिमाह पर गुज़ारा करते रहे और खुश रहे । यह वजीफा उन्हें हरिजन सेवक संघ से मिलता था ।उत्तरा खंड के हर आन्दोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही । उन्हें सब लोग आदर से संत जी कहते थे । अभी 2 वर्ष पूर्व उन्होंने अपने गाँव में अंतिम सांस ली । जीवन भर खादी पहनते रहे । दहेज दावत वाली शादियों में नही जाते थे


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
By -Rajiv Nayan Bahuguna Bahuguna

संगे - बुनियाद -3
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दर्द को मशाल में बदलना कोई इनसे सीखे । ये विश्वेश्वर दत्त सकलानी हैं । अपनी पत्नी के निधन पर , उनकी याद में इन्होने बांज के वृक्ष लगाने शरू किये तो एक घना जंगल ही तैयार कर दिया । 93 साल की उम्र में आज भी इनका वृक्षा रोपण यग्य जारी है , भले ही अब आँखों से लाचार हैं । लेकिन हाथ की कुदाल स्वयं ही अपना लक्ष्य ढूंड लेती है । रतन टाटा ने इनके कार्यों से प्रभावित होकर इन्हें एक मंहगी कार भेंट की , जिसे इन्होने अपने याता यात वंचित क्षेत्र में जरूरत मंदों को अस्पताल और सुरकंडा देवी के मन्दिर तक ढोने में जोत दिया । साल भर में सफारी कार का भट्ठा बैठ गया । आज फिर पैदल हैं और प्रसन्न हैं ।
ये सकलाना के सामंत परिवार से हैं । देहरादून के रायपुर से लेकर मसूरी के धनोल्टी तक के राजा यही लोग थे । यह जागीर इनके कुल को अंग्रेजों ने दी थी । लेकिन इनके बड़े भाई नागेन्द्र सकलानी ने अंग्रेजों और राजाओं के विरुद्ध बिगुल बजा दिया । वह स्वाधीनता संग्राम में राजशाही फ़ौज की गोलियों से शहीद हो गये । यह स्वयं भी आजादी की लड़ाई में जेल गये ।
आजकल पुज्यार गाँव सकलाना स्थित अपने गाँव में रहते हैं और केदार नाथ आपदा में अनाथ हुयी एक मासूम कन्या को गोद लेकर उसी के साथ व्यस्त रहते हैं


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720:
By Rajiv Lochan Bahuguna

संगे - बुनियाद-4
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इंद्र मणि बडोनी : एक पुनर्मूल्यांकन
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उत्तरा खंड राज्य की अवधारणा के मूल पुरुषों में एक , इंद्र मणि बडोनी मूलतः संस्कृति कर्मी थे । टिहरी गढवाल के एक अति दुर्गम क्षेत्र ग्यारह गाँव हीन्दाव पट्टी के अखोड़ी गाँव में उनका जन्म पिछली सदी के दुसरे दशक में हुआ था । उनके गाँव में स्वादिष्ट काठे जंगली अखरोट होते थे । प्रारम्भिक शिक्षा के बाद परिवार की तंग माली हालत की वजह से उन्होंने कुछ समय नैनीताल में रिक्शा खींचा । फिर घर लौट आये और सामान्य से अधिक वय में इंटर तथा बी ए किया । स्नातक होने के बाद नौकरी न की । गाँव के प्रधान रहे । पचास के दशक में गांधी जी की चर्चित शिष्या मीरा बहन उनके इलाके में समाज सेवा के निमित्त आयीं । उन्होंने गाँव वालों से पूछा की क्या यहाँ कोई ग्रेजुएट लड़का भी है ? गाँव वालों ने जवाब दिया कि है तो सही , पर वह आजकल भैंस चराने डांडे गया है । जो युवक इलाके में एक मात्र ग्रेजुएट होकर भी भैस चराने पर्वत पर गया हो , वह अवश्य विलक्षण होगा , मीरा बहन ने यह भांप लिया । उन्होंने कुछ दिन बडोनी के डांडे से लौटने का वेट किया और फिर उन्हें गांधी जी के आश्रम सेवाग्राम में ट्रेनिंग के लिए भेज दिया । मेरे पिता सुंन्दर लाल बहुगुणा बताते हैं कि उनकी शादी में दाल भात बनाने के इंचार्ज इंद्र मणि बडोनी ही थे । (जारी )

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