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महाभारत और मेडिकल टूरिज्म में मीडिया प्रतिनिधित्व का महत्व
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(Benefits from Media in Place Branding )
(महाभारत महाकाव्य  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -18

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  18                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--123 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 123   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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   मेरे नियमित पाठक व विद्वान् समीक्षक श्री गजेंद्र बहुगुणा  ने मेरे द्वारा उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म को महाभारत से जोड़ने पर घोर आपत्ति जताई।  उनका कहना था कि महाभारत कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है और  यदि महाभारत के चमत्कार सत्य थे तो वह टेक्नोलॉजी कहाँ गयी।
        आज उत्तर देने का समय आ गया है।  पहली बात यह है कि मैं मार्केटिंग पर लेख लिख रहा हूँ ना कि इतिहास पर।  मार्केटिंग कुछ नहीं है अपितु एक कला, विज्ञानं व दर्शन का मिश्रण है और हर संवाद (चित्र , शब्द, स्वाद , सूंघने  व स्पर्श से जो अनुभव हो ) मार्केटिंग ही है।  फिर मान भी लिया जाय कि महाभारत महाकाव्य सर्वथा काल्पनिक है जैसे जेम्स हेडली के उपन्यास तो भी यह सत्य है कि यह महकाव्य है ही। महाभारत में जो है उसकी विवेचना या महाभारत का संदर्भ देने  में कोई बुराई नहीं है। महाभारत के उदाहरण देने में कोई कुतर्क भी नहीं है।
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                     उत्तराखंड को महाभारत से लाभ

          महाभारत में उत्तराखंड पर बहुत अधिक लिखा गया है और हस्तिनापुर  पर कम। महाभारत में उत्तराखंड का भूगोल , नदियां , पहाड़ , भूमि , पेड़ , समाज , संस्कृति , दर्शन सभी कुछ मिल जाता है।  महाभारत में उत्तराखंड विवरण से आज भी उत्तराखंड पर्यटन या स्थान छविकरण को लाभ ही मिलता है। महाकवि कालिदास ने महाभारत से विषय उठाकर कई नाटकों की रचना की जिसमे मध्य हिमालय ही केंद्र में हैं। महाभारत के कारण कई प्राचीन संस्कृत व आधुनिक हिंदी नाटकों की पृष्ठभूमि उत्तराखंड ही रही है   महाभारत में उत्तराखंड वर्णन से उत्तराखंड के बारे में कई धारणाएं आज भी हैं और कई धारणाओं ने इतिहास भी रचा है। तैमूर लंग का गढ़वाल पर धावा बोलने प्रयाण के पीछे महाभारत की रची छवि थी कि गढ़वाल में स्वर्ण चूर्ण भंडार व धातु अणु शालाओं की भरमार।  शाहजहां के सेनापति द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण के पीछे भी उपरोक्त दोनों धारणाएं थी।  और मजेदार बात यह रही कि दोनों बार घटोत्कच के पत्थर फेंकने की रणनीति ने आक्रांताओं को ढांगू क्षेत्र से भगाया गया।  दोनों बार गढ़वालियों ने घटोत्कच का ही रूप लिया।
              महाभारत में वर्णित तीर्थ बद्रिकाश्रम , गंगोत्री या गंगा महत्व ने उत्तराखंड की छवि को मलेसिया -इंडोनेसिया , ईरान तुरान तक पंहुचाया।  उत्तराखंड यदि हजारों साल पहले ही धार्मिक स्थल बन पाया तो उसके पीछे महाभारत जैसे महाकाव्य या अन्य श्रुतियाँ ही थीं।
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                 महाभारत और  स्थान छविकरण में मीडिया प्रतिनिधित्व का महत्व

      महाभारत , कालिदास साहित्य , ध्रुवस्वामिनी नाटक , हुयेन सांग का यात्रा वर्णन , स्कंदपुराण (केदारखंड ) , तैमूर लंग का लिखवाया /लिखा इतिहास , पीछे बहुत से यात्रियों द्वारा यात्रा वर्णन वास्तव में आज के मीडिया द्वारा उत्तराखंड विषयी जानकारी देना जैसा ही है।  कई टीवी चैनलों में उत्तराखंड संबंधित विषय दिखाना भी महाभारत में वर्णित उत्तराखंड जैसा ही तो है।  स्थान ब्रैंडिंग (मेडिकल टूरिज्म एक भाग है ) हेतु उत्तराखंड पर्यटन के भागीदारियों  को मीडिया प्रतीतिनिधित्व क महत्व समझना आवश्यक है।
  प्रसिद्ध प्लेस ब्रैंडिंग विशेषज्ञ मार्टिन बोइसेन (2011 ) ने सिद्ध किया कि मीडिया द्वारा किसी भी स्थान की छवि वृद्धि या छवि बिगाड़ने में अत्यंत बड़ी भूमिका निभाते हैं।  इसका अनुभव हमें तब होता है जब उत्तराखंड में जब यात्रा मार्ग पर सड़क टूट जाती है और टीवी मीडिया सुबह से शाम तक ब्रेकिंग न्यूज द्वारा ऐसा दिखलाता है जैसे फिर से केदारनाथ डिजास्टर पैदा हो गया है।  बहुत से संभावित पर्यटक अपनी उत्तराखंड यात्रा स्थगित कर देते हैं।  किन्तु फिर यही मीडिया उत्तराखंड की बाड़ियों में बर्फबारी (बर्फ का राक्षस ही सही ) की सूचना देता है तो हिम का आनंद लेने वाले उत्तराखंड की ओर गमन करने लगते हैं।  मसूरी पर्यटकों से भर जाता है।
       सचिन तेंदुलकर या महेंद्र सिंह धोनी का मसूरी में घर खरीदना या उमा भारती का उत्तराखंड में आश्रम होना  मास मीडिया द्वारा सूचना उत्तराखंड पर्यटन या निवेश हेतु सकारात्मक समाचार बन जाता है।पतांजलि विश्वविद्यालय आदि का मीडिया में स्थान पाना उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म हेतु सकारात्मक पहलू है।
    किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा उत्तराखंड भ्रमण जैसे प्रधान मंत्री द्वारा केदारनाथ यात्रा का विवरण मीडिया द्वारा देना एक लाभकारी सूचना थी।  केदारखंड में डिजास्टर के बाद केदारनाथ यात्रा की जो नकारात्मक छवि बनी थी वह छवि मोदी जी की यात्रा से धूमिल पड़ गयी है और अब दूर  दूर  के यात्री केदारनाथ यात्रा हेतु तैयार हो गए हैं।
     अभी कुछ दिन पहले केदारनाथ मंदिर में कपाट बंद समय बर्फबारी  में कुछ अधिकारी या नेताओं द्वारा बर्फबारी में भी कपट खोलने की चित्र सहित सूचना मीडिया में फैली।  हमारे कई पत्रकार जो उत्तराखंड पर्यटन को ऊंचाई पर देखना चाहते हैं और स्वयं कई धार्मिक पर्यटन स्थलों के बारे में सूचना देने बहुत खोज व परिश्रम करते हैं ने इस घटना नकारात्मक पहलू को सोशल मीडिया में प्रचारित करना शुरू कर दिया ।   आधुनिक प्लेस ब्रैंडिंग से अपरिचित इन  विद्वानों ने शीतकाल में केदारनाथ कपाट खोलने पर इंटरनेट मीडिया में प्रश्न चिन्ह लगाने शुर कर दिए।  जब कि यह सूचना तो समस्त भारत के कोने कोने में जानी चाहिए थी कि अब केदारनाथ यात्रा सुरक्षित यात्रा है।  वास्तव में शीतकाल में केदारनाथ कपाट खुलने पर  कई  संवेदनशील व उत्तराखंड प्रेमी पत्रकार द्वारा नकारात्मक रुख अपनाना यह दर्शाता है कि तत्संबन्धी विभाग 'प्लेस ब्रैंडिंग में मीडिया रिप्रेंजेंटेसन ' का महत्व नहीं समझ सके।  अधिकारियों को पत्रकारों को अवगत कराना चाहिए था  व उन्हें विश्वास दिलाना चाहिए था कि शीत  काल में केदारनाथ कपाट खोलने का अर्थ है अब हम नई से नई टेक्नोलॉजी प्रयोग कर रहे हैं।  प्लेस ब्रैंडिंग के भागीदारों को भी (उत्तराखंड के पत्रकार व राजनीतिक कार्यकर्ता भी भागीदार हैं -स्टेकहोल्डर ) प्लेस ब्रैंडिंग/स्थान छविकरण की समझ में बदलाव लाना आवश्यक है।  आज प्लेस ब्रैंडिंग में भारी बदलाव आ चुका है।
   प्लेस ब्रैंडिंग विशेषज्ञ जैसे कैरोल व मैककॉम्ब्स (2003 ) का सही कहना है कि मीडिया कवरेज जितनी अधिक हो स्थानछवि वृद्धि या छवि कमी को उतना लाभ -हानि होता है।  मीडिया समाचार में वर्णित स्थान गुणों से ग्राहक स्थान छवि बनाता जाता है।

            मूर्धन्य लेखकों /पत्रकारों को उत्तराखंड से बाहर के पत्र पत्रिकाओं में लिखना चाहिए

  प्लेस ब्रैंडिंग पिता  एस. ऐनहोल्ट प्लेस ब्रैंडिंग के भागीदारों को सदा आगाह करते हैं कि प्लेस ब्रैंडिंग में जनसम्पर्क सूचना सबसे अधिक कारगार हथियार है।  उत्तराखंड के लेखकों को अन्य प्रदेशों , देशों के पत्र पत्रिकाओं में उत्तराखंड संबंधी लेख समाचार प्रकाशित करने या करवाने चाहिए।
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             मीडिया को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है

   बहुत बार मीडिया स्थान विषय के बारे में नकारात्मक सूचना देते हैं। प्लेस ब्रैंडिंग विद्वान् मर्फी का कहना है कि स्थान छवि भागीदारों को इन नकारात्मक सूचनाओं को एकदम से खारिज नहीं करना चाहिए अपितु अन्य ब्रैंडिंग हथियारों से सकारात्मक छवि हेतु आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
        मीडिया को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है किन्तु मीडिया प्रतिनिधित्व विधि द्वारा टूरिज्म  विभाग वांछित सूचना मीडिया में दिलवाते ही हैं।


 
     
             



Copyright @ Bhishma Kukreti   /2 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;

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महाभारत और मेडिकल टूरिज्म में मीडिया प्रतिनिधित्व का महत्व
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(Benefits from Media in Place Branding )
(महाभारत महाकाव्य  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -18

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  18                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--123 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 123   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
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   मेरे नियमित पाठक व विद्वान् समीक्षक श्री गजेंद्र बहुगुणा  ने मेरे द्वारा उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म को महाभारत से जोड़ने पर घोर आपत्ति जताई।  उनका कहना था कि महाभारत कोई प्रमाणिक इतिहास नहीं है और  यदि महाभारत के चमत्कार सत्य थे तो वह टेक्नोलॉजी कहाँ गयी।
        आज उत्तर देने का समय आ गया है।  पहली बात यह है कि मैं मार्केटिंग पर लेख लिख रहा हूँ ना कि इतिहास पर।  मार्केटिंग कुछ नहीं है अपितु एक कला, विज्ञानं व दर्शन का मिश्रण है और हर संवाद (चित्र , शब्द, स्वाद , सूंघने  व स्पर्श से जो अनुभव हो ) मार्केटिंग ही है।  फिर मान भी लिया जाय कि महाभारत महाकाव्य सर्वथा काल्पनिक है जैसे जेम्स हेडली के उपन्यास तो भी यह सत्य है कि यह महकाव्य है ही। महाभारत में जो है उसकी विवेचना या महाभारत का संदर्भ देने  में कोई बुराई नहीं है। महाभारत के उदाहरण देने में कोई कुतर्क भी नहीं है।
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                     उत्तराखंड को महाभारत से लाभ

          महाभारत में उत्तराखंड पर बहुत अधिक लिखा गया है और हस्तिनापुर  पर कम। महाभारत में उत्तराखंड का भूगोल , नदियां , पहाड़ , भूमि , पेड़ , समाज , संस्कृति , दर्शन सभी कुछ मिल जाता है।  महाभारत में उत्तराखंड विवरण से आज भी उत्तराखंड पर्यटन या स्थान छविकरण को लाभ ही मिलता है। महाकवि कालिदास ने महाभारत से विषय उठाकर कई नाटकों की रचना की जिसमे मध्य हिमालय ही केंद्र में हैं। महाभारत के कारण कई प्राचीन संस्कृत व आधुनिक हिंदी नाटकों की पृष्ठभूमि उत्तराखंड ही रही है   महाभारत में उत्तराखंड वर्णन से उत्तराखंड के बारे में कई धारणाएं आज भी हैं और कई धारणाओं ने इतिहास भी रचा है। तैमूर लंग का गढ़वाल पर धावा बोलने प्रयाण के पीछे महाभारत की रची छवि थी कि गढ़वाल में स्वर्ण चूर्ण भंडार व धातु अणु शालाओं की भरमार।  शाहजहां के सेनापति द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण के पीछे भी उपरोक्त दोनों धारणाएं थी।  और मजेदार बात यह रही कि दोनों बार घटोत्कच के पत्थर फेंकने की रणनीति ने आक्रांताओं को ढांगू क्षेत्र से भगाया गया।  दोनों बार गढ़वालियों ने घटोत्कच का ही रूप लिया।
              महाभारत में वर्णित तीर्थ बद्रिकाश्रम , गंगोत्री या गंगा महत्व ने उत्तराखंड की छवि को मलेसिया -इंडोनेसिया , ईरान तुरान तक पंहुचाया।  उत्तराखंड यदि हजारों साल पहले ही धार्मिक स्थल बन पाया तो उसके पीछे महाभारत जैसे महाकाव्य या अन्य श्रुतियाँ ही थीं।
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                 महाभारत और  स्थान छविकरण में मीडिया प्रतिनिधित्व का महत्व

      महाभारत , कालिदास साहित्य , ध्रुवस्वामिनी नाटक , हुयेन सांग का यात्रा वर्णन , स्कंदपुराण (केदारखंड ) , तैमूर लंग का लिखवाया /लिखा इतिहास , पीछे बहुत से यात्रियों द्वारा यात्रा वर्णन वास्तव में आज के मीडिया द्वारा उत्तराखंड विषयी जानकारी देना जैसा ही है।  कई टीवी चैनलों में उत्तराखंड संबंधित विषय दिखाना भी महाभारत में वर्णित उत्तराखंड जैसा ही तो है।  स्थान ब्रैंडिंग (मेडिकल टूरिज्म एक भाग है ) हेतु उत्तराखंड पर्यटन के भागीदारियों  को मीडिया प्रतीतिनिधित्व क महत्व समझना आवश्यक है।
  प्रसिद्ध प्लेस ब्रैंडिंग विशेषज्ञ मार्टिन बोइसेन (2011 ) ने सिद्ध किया कि मीडिया द्वारा किसी भी स्थान की छवि वृद्धि या छवि बिगाड़ने में अत्यंत बड़ी भूमिका निभाते हैं।  इसका अनुभव हमें तब होता है जब उत्तराखंड में जब यात्रा मार्ग पर सड़क टूट जाती है और टीवी मीडिया सुबह से शाम तक ब्रेकिंग न्यूज द्वारा ऐसा दिखलाता है जैसे फिर से केदारनाथ डिजास्टर पैदा हो गया है।  बहुत से संभावित पर्यटक अपनी उत्तराखंड यात्रा स्थगित कर देते हैं।  किन्तु फिर यही मीडिया उत्तराखंड की बाड़ियों में बर्फबारी (बर्फ का राक्षस ही सही ) की सूचना देता है तो हिम का आनंद लेने वाले उत्तराखंड की ओर गमन करने लगते हैं।  मसूरी पर्यटकों से भर जाता है।
       सचिन तेंदुलकर या महेंद्र सिंह धोनी का मसूरी में घर खरीदना या उमा भारती का उत्तराखंड में आश्रम होना  मास मीडिया द्वारा सूचना उत्तराखंड पर्यटन या निवेश हेतु सकारात्मक समाचार बन जाता है।पतांजलि विश्वविद्यालय आदि का मीडिया में स्थान पाना उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म हेतु सकारात्मक पहलू है।
    किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा उत्तराखंड भ्रमण जैसे प्रधान मंत्री द्वारा केदारनाथ यात्रा का विवरण मीडिया द्वारा देना एक लाभकारी सूचना थी।  केदारखंड में डिजास्टर के बाद केदारनाथ यात्रा की जो नकारात्मक छवि बनी थी वह छवि मोदी जी की यात्रा से धूमिल पड़ गयी है और अब दूर  दूर  के यात्री केदारनाथ यात्रा हेतु तैयार हो गए हैं।
     अभी कुछ दिन पहले केदारनाथ मंदिर में कपाट बंद समय बर्फबारी  में कुछ अधिकारी या नेताओं द्वारा बर्फबारी में भी कपट खोलने की चित्र सहित सूचना मीडिया में फैली।  हमारे कई पत्रकार जो उत्तराखंड पर्यटन को ऊंचाई पर देखना चाहते हैं और स्वयं कई धार्मिक पर्यटन स्थलों के बारे में सूचना देने बहुत खोज व परिश्रम करते हैं ने इस घटना नकारात्मक पहलू को सोशल मीडिया में प्रचारित करना शुरू कर दिया ।   आधुनिक प्लेस ब्रैंडिंग से अपरिचित इन  विद्वानों ने शीतकाल में केदारनाथ कपाट खोलने पर इंटरनेट मीडिया में प्रश्न चिन्ह लगाने शुर कर दिए।  जब कि यह सूचना तो समस्त भारत के कोने कोने में जानी चाहिए थी कि अब केदारनाथ यात्रा सुरक्षित यात्रा है।  वास्तव में शीतकाल में केदारनाथ कपाट खुलने पर  कई  संवेदनशील व उत्तराखंड प्रेमी पत्रकार द्वारा नकारात्मक रुख अपनाना यह दर्शाता है कि तत्संबन्धी विभाग 'प्लेस ब्रैंडिंग में मीडिया रिप्रेंजेंटेसन ' का महत्व नहीं समझ सके।  अधिकारियों को पत्रकारों को अवगत कराना चाहिए था  व उन्हें विश्वास दिलाना चाहिए था कि शीत  काल में केदारनाथ कपाट खोलने का अर्थ है अब हम नई से नई टेक्नोलॉजी प्रयोग कर रहे हैं।  प्लेस ब्रैंडिंग के भागीदारों को भी (उत्तराखंड के पत्रकार व राजनीतिक कार्यकर्ता भी भागीदार हैं -स्टेकहोल्डर ) प्लेस ब्रैंडिंग/स्थान छविकरण की समझ में बदलाव लाना आवश्यक है।  आज प्लेस ब्रैंडिंग में भारी बदलाव आ चुका है।
   प्लेस ब्रैंडिंग विशेषज्ञ जैसे कैरोल व मैककॉम्ब्स (2003 ) का सही कहना है कि मीडिया कवरेज जितनी अधिक हो स्थानछवि वृद्धि या छवि कमी को उतना लाभ -हानि होता है।  मीडिया समाचार में वर्णित स्थान गुणों से ग्राहक स्थान छवि बनाता जाता है।

            मूर्धन्य लेखकों /पत्रकारों को उत्तराखंड से बाहर के पत्र पत्रिकाओं में लिखना चाहिए

  प्लेस ब्रैंडिंग पिता  एस. ऐनहोल्ट प्लेस ब्रैंडिंग के भागीदारों को सदा आगाह करते हैं कि प्लेस ब्रैंडिंग में जनसम्पर्क सूचना सबसे अधिक कारगार हथियार है।  उत्तराखंड के लेखकों को अन्य प्रदेशों , देशों के पत्र पत्रिकाओं में उत्तराखंड संबंधी लेख समाचार प्रकाशित करने या करवाने चाहिए।
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             मीडिया को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है

   बहुत बार मीडिया स्थान विषय के बारे में नकारात्मक सूचना देते हैं। प्लेस ब्रैंडिंग विद्वान् मर्फी का कहना है कि स्थान छवि भागीदारों को इन नकारात्मक सूचनाओं को एकदम से खारिज नहीं करना चाहिए अपितु अन्य ब्रैंडिंग हथियारों से सकारात्मक छवि हेतु आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
        मीडिया को कंट्रोल नहीं किया जा सकता है किन्तु मीडिया प्रतिनिधित्व विधि द्वारा टूरिज्म  विभाग वांछित सूचना मीडिया में दिलवाते ही हैं।


 
     
             



Copyright @ Bhishma Kukreti   /2 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;

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   उत्तराखंड परिपेक्ष में हलवा का इतिहास : हिल जाओगे !     
 
  उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास -- 88   

  History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -88

 आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
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  हलुवा /हलवा /हलुआ के बगैर हिन्दुस्तानी हिन्दू कोई पूजा कार्य समझ ही नहीं सकता।  जब पंडीजी गणेश (पूजा स्थल ) के सामने नैवेद्यम कहते हैं तो सबकी नजर हलवा पर जाती है।  जब कथा या कीर्तन समाप्ति बाद पंडीजी कहते हैं " हां अब चरणामृत और प्रसाद बांटो " तो चरणामृत , आटा या सूजी की पंजरी  , और सूजी का हलवा ही मतलब होता है। व्याह शादियों में पहले जीमण का अर्थ होता था पूरी परसाद। 
     हलवे पर न जाने कितने कहावतें मशहूर हैं धौं।  एक कहावत मेरे चचा जी बहुत प्रयोग करे थे -" अफु स्यु उख हलवा पूरी खाणु अर इख बुबा लूंग लगैक पुटुक पळणु " (लूंग =न्यार बटण ) . हलवा पूरी खाएंगे खुसी व सम्पनता का सूचक है।  पहाड़ियों में मृतक शोक तोडना याने बरजात तोड़ने पर भूड़ा और सूजी तो बनती ही है।  आजकल कहावत भी चल पड़ी है --" एक मोदी तो क्रिकेट लोटत कर से लन्दन में हलवा खा रहा है , दूसरा बैंक लूट कर अमेरिका में हलवा खा रहा है और बेचारा नरेंद्र मोदी व्रत रख रहा है " .
    याने हम हलवा बगैर जिंदगी समझ नहीं सकते हैं।  हलवा याने किसी वस्तु को घी में भूनकर गुड़ /शक़्कर के साथ बाड़ी।  आज दस से अधिक हलवा बनते हैं , खाये जाते हैं और नई नई किस्मे ईजाद हो रहे हैं
   
               अनाज के आटे से बने हलवा

गेंहू , रवा /सूजी ; मकई , चावल , मंडुआ , जौ , मर्सू (चूहा , राजदाना , चौलाई ) , आदि
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              दालों से बगैर आटा बनाये बना हलवा
 
     मूंग , अरहर व चना
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              सब्जियों से बना हलवा

गाजर , लौकी , आलू , जिमीकंद , चुकुन्दर आदि
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      फलों का हलवा

कच्चे पपीते का हलवा , कच्चे केले का हलवा , कद्दू को उबालकर  हलवा , अनन्नास , आम , तरबूज , भुज्यल /पेठा , खजूर , कटहल को मिलाकर
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     अति स्थानीय हलवा

  राजस्थान आदि में मिर्ची या हल्दी का हलवा
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     सूखे मेवों  हलवा
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    नथ -बुलाक जैसे ही हलवा हिन्दुस्तानी नहीं है

     सुनकर आपके हलक में हलवा फंस जाएगा कि जैसे नथ -बुलाक गहने हिन्दुस्तानी ओरिजिन के नहीं हैं वैसे ही हलवा   का जन्म हिन्दुस्तान में नहीं हुआ।  हवा संट हो जायेगी कई हिन्दुओं की जब जानेंगे कि हिंदुस्तान में हलवा सबसे पहले किसी हिन्दू पाकशाला  में नहीं अपितु मुगल रसोई में बनी थी।
      जी हाँ और इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।  जरा तर्क से काम लें तो पाएंगे कि हमारे पुराने मंदिरों में हलवा नैवेद्य चढ़ाने की संस्कृति नहीं है , ना ही किसी ग्रह , नक्षत्र या राशि को प्रसन्न करने के लिए ज्योतिषी किसी विशेष हलवे की सिफारिश करते हैं ।  प्राचीन संस्कृत में हलवा शब्द ही नहीं है।  जातक कथाओं , जैन कथाओं व आधुनिकतम पुराणों में हलवा जैसे भोजन का नाम नहीं आता है। लपसी का नाम सब जगह आता है।
                 गढ़वाल -कुमाऊं -हरिद्वार में ही देख लीजिये तो पाएंगे कि मंदिरों में अधिकतर भेली चढ़ाई जातीं हैं ना कि हलवा चढ़ाया जाता है।  गढ़वाल -कुमाऊं में क्षेत्रीय देव पूजन में रोट काटा जाता है ना कि गुड़जोळी (आटे का हलवा ) या हलवा।  डा हेमा उनियाल ने भी केदारखंड या मानसखंड में कहीं नहीं लिखा कि फलां मंदिर में हलवा ही चढ़ाया जाता है।  यदि किसी मंदिर में हलवा चढ़ाया भी जाता है तो समझ लो यह मंदिर अभी अभी का है और पुजारी ने अपनी समझ से हलवा को महत्व दिया होगा।  तो अब आप सत्य नारायण व्रत कथा की बात कर रहे हैं ? जी तो इस व्रत कथा का प्रचलन प्राचीन नहीं है जी। लगता है हलवा आने के बाद ही सत्य नारायण व्रत कथा का प्रचलन भारत में हुआ होगा। 
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         तुर्की हलवे का जन्म दाता है

 यद्यपि तुर्की के आस पास के कई अन्य देश भी तकरीर देते हैं कि हलवा उनके देश में जन्म किन्तु अधिसंख्य भोजन इतिहास कार तुर्की को होला का जन्मस्थल मानते हैं।  इस्ताम्बुल वाले तो अभी भी ताल थोक कर कहते हैं हमने हलवाह का अविष्कार किया।  कुछ कहते हैं कि हलवाह तो 5 000 साल पुराना खाद्य है। हो सकता है गोंद , गुड़ , आटे , तेल से बना कोई खाद्य पदार्थ रहा हो।
    लिखित रूप में सबसे पहले तेरहवीं सदी में रचित 'किताब -अल -ताबीख ' में हलवाह की छह डिसेज का उल्लेख है।  उसी काल की स्पेन की एक किताब में भी इसी तरह के खाद्य पदार्थ का किस्सा है।ऑटोमान के सुल्तान महान  सुल्तान सुलेमान (1520 -1566 ) ने तो अपने किले के पास हलवाहन नामक किचन ही मिठाईयाँ पकाने के  लिए बनाया और वहां  कई मिष्ठान  बनते थे।
 लिली  स्वर्ण 'डिफरेंट ट्रुथ ' में बताती हैं कि हलवाह सीरिया से चलकर अफगानिस्तान आया और फिर सोलहवीं सदी में मुगल बादशाओं की रसोई की शान बना और फिर सारे भारत  गया। देखते देखते मिष्ठान निर्माता 'हलवाई ' बन बैठे।  वैसे हलवाई को लाला भी कहा जाता है तभी तो तमिल में लाला का हलवा कहा जाता है।  याने लाला लोग उत्तरी भारत से हलवा को दक्षिण भारत ले गए।  आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  तभी तो बंगलौर शहर में मिठाई व्यापार में अग्रवालों का एकाधिकार है।
    हाँ किन्तु उत्तरी भारत के हलवाइयों को इतना भी गर्व नहीं करना चाहिए।  केरल में हलवा प्राचीन अरबी व्यापारी लाये थे। 
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      उत्तराखंड में हलवा

उत्तराखंड में हलवा ने यात्रीयों  द्वारा प्रवेश किया होगा। यात्री अपने साथ या तो सूजी लाये होंगे और चट्टियों में बनवाया होगा या उत्तराखंडी हरिद्वार , बरेली , मुरादाबाद गए होंगे और इस मिष्ठान की बनाने की विधि सीख लिए होंगे।  सूजी का प्रचलन तो सम्पनता के साथ ही आया होगा। सन 1960  तक तो सूजी भी जो कभी कभार बनती थी भी  सौकारों का ही भोजन माना जाता था।  हाँ अब ग्रामीण युवा पूछते हैं बल गुड़जोळी किस खाद्यान या पेय को कहते हैं। 
           
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Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

Notes on History of Culinary, Gastronomy in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pithoragarh Uttarakhand; History ofCulinary,Gastronomy in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History ofCulinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History ofCulinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Haridwar Uttarakhand;

 ( उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला ) 
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   उत्तराखंड परिपेक्ष में हलवा का इतिहास : हिल जाओगे !     
 
  उत्तराखंड में कृषि व खान -पान -भोजन का इतिहास -- 88   

  History of Agriculture , Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -88

 आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व सांस्कृति शास्त्री )
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  हलुवा /हलवा /हलुआ के बगैर हिन्दुस्तानी हिन्दू कोई पूजा कार्य समझ ही नहीं सकता।  जब पंडीजी गणेश (पूजा स्थल ) के सामने नैवेद्यम कहते हैं तो सबकी नजर हलवा पर जाती है।  जब कथा या कीर्तन समाप्ति बाद पंडीजी कहते हैं " हां अब चरणामृत और प्रसाद बांटो " तो चरणामृत , आटा या सूजी की पंजरी  , और सूजी का हलवा ही मतलब होता है। व्याह शादियों में पहले जीमण का अर्थ होता था पूरी परसाद। 
     हलवे पर न जाने कितने कहावतें मशहूर हैं धौं।  एक कहावत मेरे चचा जी बहुत प्रयोग करे थे -" अफु स्यु उख हलवा पूरी खाणु अर इख बुबा लूंग लगैक पुटुक पळणु " (लूंग =न्यार बटण ) . हलवा पूरी खाएंगे खुसी व सम्पनता का सूचक है।  पहाड़ियों में मृतक शोक तोडना याने बरजात तोड़ने पर भूड़ा और सूजी तो बनती ही है।  आजकल कहावत भी चल पड़ी है --" एक मोदी तो क्रिकेट लोटत कर से लन्दन में हलवा खा रहा है , दूसरा बैंक लूट कर अमेरिका में हलवा खा रहा है और बेचारा नरेंद्र मोदी व्रत रख रहा है " .
    याने हम हलवा बगैर जिंदगी समझ नहीं सकते हैं।  हलवा याने किसी वस्तु को घी में भूनकर गुड़ /शक़्कर के साथ बाड़ी।  आज दस से अधिक हलवा बनते हैं , खाये जाते हैं और नई नई किस्मे ईजाद हो रहे हैं
   
               अनाज के आटे से बने हलवा

गेंहू , रवा /सूजी ; मकई , चावल , मंडुआ , जौ , मर्सू (चूहा , राजदाना , चौलाई ) , आदि
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              दालों से बगैर आटा बनाये बना हलवा
 
     मूंग , अरहर व चना
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              सब्जियों से बना हलवा

गाजर , लौकी , आलू , जिमीकंद , चुकुन्दर आदि
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      फलों का हलवा

कच्चे पपीते का हलवा , कच्चे केले का हलवा , कद्दू को उबालकर  हलवा , अनन्नास , आम , तरबूज , भुज्यल /पेठा , खजूर , कटहल को मिलाकर
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     अति स्थानीय हलवा

  राजस्थान आदि में मिर्ची या हल्दी का हलवा
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     सूखे मेवों  हलवा
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    नथ -बुलाक जैसे ही हलवा हिन्दुस्तानी नहीं है

     सुनकर आपके हलक में हलवा फंस जाएगा कि जैसे नथ -बुलाक गहने हिन्दुस्तानी ओरिजिन के नहीं हैं वैसे ही हलवा   का जन्म हिन्दुस्तान में नहीं हुआ।  हवा संट हो जायेगी कई हिन्दुओं की जब जानेंगे कि हिंदुस्तान में हलवा सबसे पहले किसी हिन्दू पाकशाला  में नहीं अपितु मुगल रसोई में बनी थी।
      जी हाँ और इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।  जरा तर्क से काम लें तो पाएंगे कि हमारे पुराने मंदिरों में हलवा नैवेद्य चढ़ाने की संस्कृति नहीं है , ना ही किसी ग्रह , नक्षत्र या राशि को प्रसन्न करने के लिए ज्योतिषी किसी विशेष हलवे की सिफारिश करते हैं ।  प्राचीन संस्कृत में हलवा शब्द ही नहीं है।  जातक कथाओं , जैन कथाओं व आधुनिकतम पुराणों में हलवा जैसे भोजन का नाम नहीं आता है। लपसी का नाम सब जगह आता है।
                 गढ़वाल -कुमाऊं -हरिद्वार में ही देख लीजिये तो पाएंगे कि मंदिरों में अधिकतर भेली चढ़ाई जातीं हैं ना कि हलवा चढ़ाया जाता है।  गढ़वाल -कुमाऊं में क्षेत्रीय देव पूजन में रोट काटा जाता है ना कि गुड़जोळी (आटे का हलवा ) या हलवा।  डा हेमा उनियाल ने भी केदारखंड या मानसखंड में कहीं नहीं लिखा कि फलां मंदिर में हलवा ही चढ़ाया जाता है।  यदि किसी मंदिर में हलवा चढ़ाया भी जाता है तो समझ लो यह मंदिर अभी अभी का है और पुजारी ने अपनी समझ से हलवा को महत्व दिया होगा।  तो अब आप सत्य नारायण व्रत कथा की बात कर रहे हैं ? जी तो इस व्रत कथा का प्रचलन प्राचीन नहीं है जी। लगता है हलवा आने के बाद ही सत्य नारायण व्रत कथा का प्रचलन भारत में हुआ होगा। 
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         तुर्की हलवे का जन्म दाता है

 यद्यपि तुर्की के आस पास के कई अन्य देश भी तकरीर देते हैं कि हलवा उनके देश में जन्म किन्तु अधिसंख्य भोजन इतिहास कार तुर्की को होला का जन्मस्थल मानते हैं।  इस्ताम्बुल वाले तो अभी भी ताल थोक कर कहते हैं हमने हलवाह का अविष्कार किया।  कुछ कहते हैं कि हलवाह तो 5 000 साल पुराना खाद्य है। हो सकता है गोंद , गुड़ , आटे , तेल से बना कोई खाद्य पदार्थ रहा हो।
    लिखित रूप में सबसे पहले तेरहवीं सदी में रचित 'किताब -अल -ताबीख ' में हलवाह की छह डिसेज का उल्लेख है।  उसी काल की स्पेन की एक किताब में भी इसी तरह के खाद्य पदार्थ का किस्सा है।ऑटोमान के सुल्तान महान  सुल्तान सुलेमान (1520 -1566 ) ने तो अपने किले के पास हलवाहन नामक किचन ही मिठाईयाँ पकाने के  लिए बनाया और वहां  कई मिष्ठान  बनते थे।
 लिली  स्वर्ण 'डिफरेंट ट्रुथ ' में बताती हैं कि हलवाह सीरिया से चलकर अफगानिस्तान आया और फिर सोलहवीं सदी में मुगल बादशाओं की रसोई की शान बना और फिर सारे भारत  गया। देखते देखते मिष्ठान निर्माता 'हलवाई ' बन बैठे।  वैसे हलवाई को लाला भी कहा जाता है तभी तो तमिल में लाला का हलवा कहा जाता है।  याने लाला लोग उत्तरी भारत से हलवा को दक्षिण भारत ले गए।  आश्चर्य नहीं होना चाहिए।  तभी तो बंगलौर शहर में मिठाई व्यापार में अग्रवालों का एकाधिकार है।
    हाँ किन्तु उत्तरी भारत के हलवाइयों को इतना भी गर्व नहीं करना चाहिए।  केरल में हलवा प्राचीन अरबी व्यापारी लाये थे। 
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      उत्तराखंड में हलवा

उत्तराखंड में हलवा ने यात्रीयों  द्वारा प्रवेश किया होगा। यात्री अपने साथ या तो सूजी लाये होंगे और चट्टियों में बनवाया होगा या उत्तराखंडी हरिद्वार , बरेली , मुरादाबाद गए होंगे और इस मिष्ठान की बनाने की विधि सीख लिए होंगे।  सूजी का प्रचलन तो सम्पनता के साथ ही आया होगा। सन 1960  तक तो सूजी भी जो कभी कभार बनती थी भी  सौकारों का ही भोजन माना जाता था।  हाँ अब ग्रामीण युवा पूछते हैं बल गुड़जोळी किस खाद्यान या पेय को कहते हैं। 
           
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दादी कि.....

दादी कु जोड़ा मां,बुराँस फूली गे
दादी कि गलोड़ी,फ्योंली सि शरमिगे

लाल लाल ऊंटडी नि,रंग  इन  जमाई
दादी कि आंख्युं न,घुटी सबु थे पिलाई

दादी कि बिंदुली न,कथा जबैर लगैई
भैर बैथ्यून दादा,भीतर झट दौड़ी आई

दादी कि कमरी लसाक मारीगे
रासो मां दादी आज खुब झूमिगे
ढोल दामों मां इन रास लगैई
हैंसदरी दादी न आज सबु थे हैंसैई

दादी कु जोड़ा मां,इनि बुराँस फूली रे  ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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उत्तराखण्ड की राजधानी-गैरसैंण
 
गैरसैंण आंदोलन-3

‘गैरसैंण’ की चिट्ठी राजधानी विरोधियों के नाम
टोपी बचाने के लिये सिर और स्वाभिमान बचाने के लिये दिल में आग जरूरी

प्रिय डेढ दशक के सत्ताधारी,
आशा है आप आनंद से होंगे। आपकी खबर मुझे बहुत देर में मिलती है। तब जब कुछ ‘सिरफिरे’ आकर मुझमें राज्य के विकास का अक्श देखते हैं। वे हमेशा से सोचते रहे हैं कि मेरे बिना उनका अस्तित्व नहीं है। मुझे तो यह नहीं पता, लेकिन अब मैं भी बहुत भावनात्मक रूप से इनके साथ जुड़ गया हूं। बहुत लंबा रिश्ता है मेरा इन लोगों से। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के जमाने से। उन्होंने सबसे पहले कहा था कि मुझे ही राजधानी बनाया जाना चाहिये। अस्सी के दशक में राज्य आंदोलन की अगुआई करने वाले लोगों ने मुझे अपनी राजधानी घोषित कर दिया। बहुत बड़े समारोह में। मेरा नामकरण भी किया। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम पर मेरा नामकरण हुआ ‘चन्द्रनगर’। इन लोगों ने एक बोर्ड भी लगा दिया- ‘राजधानी चन्द्रनगर (गैरसैंण) में आपका स्वागत है।’ मैं गर्व से फूला नहीं समाया। मुझे लगा कि मेरी जनता मुझे कितना मान देती है। उसी वर्ष वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली की प्रतिमा लगाकर मेरा श्रंृगार भी कर दिया। स्वाभिमान के साथ। ताकत के साथ। संकल्प के साथ। संघर्ष की एक इबारत लिख दी गई मेरे शरीर में। बहुत आत्मीयता के साथ। संवेदनाओं के साथ। इस उम्मीद के साथ कि जब राज्य बनेगा तो मुझे ही अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया जायेगा। बहुत बसंत देखे मैंने। जब भी तुमने मेरे लालों को भरमाने की कोशिश की वे मेरे पास आये। मैं भी तनकर खड़ा रहा। एक बार लगा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने एक सरकारी समिति बनाकर पूरे राज्य के लोगों से पूछ लिया कि मुझसे किसी को कोई परेशानी तो नहीं। अल्मोड़ा, नैनीताल, काशीपुर, पौड़ी, देहरादून और लखनऊ में सबसे पूछा गया। सबने एक स्वर में मेरा चयन भी कर दिया। सरकारी समिति ने भी अपना फैसला मेरे पक्ष में सुना दिया। मेरे महत्व को देखते हुये कुछ कार्यालय खोलने की कवायद भी चली।

नब्बे के दशक में एक बार राज्य आंदोलन फिर तेज हो गया। मुझे उस समय भी लोगों ने उसी शिद्दत के साथ याद किया। 2000 में राज्य भी बन गया। हमारे साथ दो और राज्य बने। उनकी राजधानी भी तय हो गई। एक और राज्य बना उसने भी अपनी राजधानी बना दी। इन राज्यों की जहां राजधानी बनी वह तो वहां की जनता के स्वाभिमान का प्रश्न भी नहीं था, लेकिन हुआ उल्टा। हमारे यहां मुझे राजधानी चुनने के लिये आंदोलन करने पड़े। बाबा मोहन उत्तराखंडी की शहादत हो गई। तुम लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ा। तुमने मेरे चयन के लिये एक आयोग बैठा दिया जो ग्याहर साल तक मेरा परीक्षण करता रहा। मुझ पर दोष ढूंढता रहा। लांछन भी लगाता रहा। कई विशेषज्ञों को लाकर यह भी बताने की कोशिश की गई कि मैं भूगर्भीय दृष्टि से बहुत संवेदनशील हूं। हालांकि मेरी समझ में यह बात कभी नहीं आई कि जब मेरे क्षेत्र में बने सदियों पुराने मंदिर और सैकड़ों साल पहले बने मकानों में बड़ी भूगर्भीय हलचलों के बाद दरार तक नहीं आई तो क्या भूकंप राजधानी बनने का इंतजार कर रहा है?

खैर, यह बात लंबी हो जायेगी। मैं आपसे कभी कुछ नहीं कहता। बहुत मजबूरी में यह पत्र लिख रहा हूं। तुम्हारे झूठ-फरेब से तंग आकर। मुझे लगता है कि अब मुझे भी अपने अस्तित्व के लिये आंदोलन में शामिल हो जाना चाहिये। तुम लोग कितनी बेशर्मी पर उतर आये हो। कितना जनविरोधी चेहरा है तुम्हारा। कितने धूर्त हो तुम लोग। मेरा नाम लेकर ठगने की कला सीख ली है तुमने। बहुत छला है तुमने मुझे। यहां आकर तुमने बहुत सारे भवन खड़े कर दिये। रेस्ट हाउस बना दिये। विधानसभा भवन भी बना दिया। यहां आकर तुम करोड़ों के वारे-न्यारे कर विधानसभा सत्र भी लगा जाते हो। मैं पूछना चाहता हूं कि जब तुम यह सब कर रहे हो तो मुझे राजधानी क्यों नहीं घोषित कर रहे हो? इससे साबित होता है कि तुम किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने के फिराक में हो। तुम्हारे एक विधानसभा अध्यक्ष गोबिन्द सिंह कुंजवाल तो मेरे नाम पर राजधानी के ‘नायक’ ही बन गये। एक बार लग रहा था कि वे अपनी ‘जान पर खेलकर’ भी राजधानी बना देंगे। उनके आका तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत मैदान में अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में गैरसैंण को राजधानी घोषित करने की बजाय गोबिन्दसिंह कुंजवाल के कंधे में बंदूक रखकर गोली चलाते रहे। लेकिन उन्हें सजा मिली। मैदानी क्षेत्र के दोनों सीटों से चुनाव हारकर उन्हें एहसास हो गया होगा कि ‘आंसू हमेशा आंखों से आते हैं घुटनों से नहीं।’ उनसे पहले के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पहले नेता थे जिन्होंने यहां विधानसभा सत्र शुरू किया। बताते हैं कि इसके पीछे सतपाल महाराज का दबाव था। आज वे दोनों ‘शुद्ध’ होकर भाजपा में हैं। सतपाल महाराज तो मंत्री हैं उन्हें भी अब मेरी जरूरत महसूस नहीं होती। इनकी पार्टी भाजपा ने जिस तरह का रवैया मेरे खिलाफ अपनाया है उसका प्रतिकार जनता तो कर ही रही है, मुझे भी भारी घुटन महसूस हो रही है। मुझे लगता है कि तुम्हारे काले कारनामों को अब एक बार सबके सामने लाना ही होगा।

पिछले एक-दो महीने से जब कुछ ‘सिरफिरे’ मुझे राजधानी बनाने की मांग को लेकर सड़कों पर आये तो मेरी समझ में आया कि मेरा राजधानी के लिये चयन करना किसी स्थान का चयन नहीं है। यह आम जनता के सरोकरों से जुड़ा है। जो बातें उन्होंने मुझे बताई उससे लगा कि पूरा पहाड़ हमारे हाथ से निकल रहा है। मैं तो बहुत दूर पहाड़ में रहता हूं। देहरादून में तो रहता नहीं हूं। मुझे तो जो कुछ बताती है जनता ही बताती है। मुझे पता चला कि इन सत्रह सालों में तुमने हमारे 3600 प्राइमरी स्कूल बंद कर दिये हैं। पता चला कि 246 हाईस्कूलों की लिस्ट भी बंद होने के लिये बन गई है। मुझे पता चला कि हमारे दो मेडिकल काॅलेज सेना के हवाले कर दिये हैं। मुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र के तीन अस्पताल भी एक बड़ी मेडिकल युनिवर्सिटी को सौंप दिये गये हैं। कई को फाउंडेशनों को देने की तैयारी है। नदियां तो पहले ही थापर, रेड्डी और जेपियों के हवाले कर दी हैं। केदारनाथ के पुनर्निर्माण में भी कई पूंजीपति पैसा लगाने वाले हैं। शराब तो खोली ही अब बंद बारों को भी खोलने की संस्तुति दे दी गई है। मजखाली और पोखड़ा की बेशकीमती जमीन को जहां तुमने पूंजीपतियों को स्कूल और इंटस्टीट्यूट बनाने को दिये, वहीं हमारे एनआईटी के लिये तुम्हारे पास जमीन नहीं है। हमारे साढ़े तीन सौ गांव जो विस्थापन की राह देख रहे हैं उनके लिये एक इंच जमीन नहीं है। देहरादून से लेकर पिथौरागढ़, कोटद्वार से लेकर धूमाकोट तक, हल्द्वानी से लेकर रामगढ़ तक, टनकपुर से लेकर चंपावत तक जमीनों को जिस तरह से खुदबर्द किया गया उससे पूरे पहाड़ का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। अभी टिहरी के बाद पंचेश्वर बांध परियोजना से 134 गांवों को डुबाने का ऐलान भी हो चुका है। सरकार बड़ी बेशर्मी से ‘पलायन आयोग’ बना रही है। जब मुझे राजधानी बनाने का आंदोलन करने वालों ने पूछा कि तुम ये सब क्यों कर रहे हो तो तुम्हारा जबाव था कि सरकार यह सब काम करने की स्थिति में नहीं है। मेरा कहना है कि जब सब काम जिंदल, थापरों ने करना है तो आप सरकार में क्यो हैं? किसी जिंदल, थापर, रेड्डी को मुख्यमंत्री बना दो तुम उनके प्रवक्ता (लाइजनर) बन जाओ। बंद आंखों से पहाड़ को देखने वालो थोड़ा आंखों की शर्म तो कर लेते। बहुत सारी और बातें भी हैं जो मेरे मर्म को समझने वाले बता गये हैं, उसे फिर अगली चिट्ठी में लिखूंगा। फिलहाल मैं इस चिट्ठी के माध्यम से तुम्हें आगाह करना चाहता हूं कि तुमने पूरे हिमालय में बारूद बिछा दिया है। तुमने हिमालय की शांत वादियों में इतनी तपन पैदा कर दी है कि हिमालय लाल होने लगा है। मैं बहुत नजदीक से उस तपन को महसूस कर सकता हूं। हिमालय के लोगों के बारे में दागिस्तानी कवि रसूल हमजातोव ने लिखा है- ‘पहाड़ का आदमी दो चीजों की हमेशा हिफाजत करता है। एक अपनी टोपी की और दूसरा अपने स्वाभिमान की।’ टोपी बचाने के लिये उसके नीचे ‘सिर’ का होना जरूरी है और स्वाभिमान को बचाने के लिये दिल में ‘आग’ का। अब हमारे लोग अपनी टोपी बचाने के लिये सिर को ‘मजबूत’ कर रहे हैं और स्वाभिमान को बचाने के लिये दिल में ‘आग’ पैदा कर रहे हैं। बस मुझे अभी इतना ही कहना है।

शुभेच्छु
तुम्हारा ही उपेक्षित
‘गैरसैंण’

श्री चारु तिवारी जी की कलम से साभार
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उत्तराखण्ड की राजधानी-गैरसैंण
January 16 ·
मोदी सर, आपने श्रीनगर गढ़वाल में पिछले साल भाषण में गढ़वाली में दो शब्द कहे तो मुझे बहुत अच्छा लगा था.

मेरे पिता कहते हैं कि यदि राजधानी गैरसैंण होती तो गांव में ये समस्याएं नहीं होती. नेता और अधिकारी पहाड़ में हमारी तरह रहते तो हमारा दर्द समझ पाते. यदि राजधानी गैरसैंण होती तो लोग पहाड़ छोड़कर मैदानों की ओर नहीं.

आकांक्षा नेगी

कक्षा – 7 अ

https://www.thelallantop.com/…/gairsain-vs-dehradun-why-fi…
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उत्तराखण्ड की राजधानी-गैरसैंण
January 28 at 9:16am · Dehra Dun ·
गैरसैंण पर धाद और उत्तरजन के संस्थापक और पहाड़ के प्रति समर्पित चेतना के पक्षधर श्री लोकेश नवानी जी की कविता एक लड़ाई और लड़े।

एक लड़ाई और लड़ें। एक चढ़ाई और चढ़ें।।
गैरसैंण के लिए चलें। गैरसैंण के लिए बढ़ें।।

हमने बहस खड़ी की थी, हमने लड़ी लड़ाई थी
हमने जुल्मों को झेला, लाठी-गोली खाई थी।
हमने झंडे थामे थे, हमने हाथ उठाए थे
इस मिट्ट इस धरती के, गीत हमीं ने गाए थे।
जिन सपनों की खातिर हम, एक संग थे हुए खड़े
उठो, चलो फिर कूच करो, एक लड़ाई और लड़ें। एक चढ़ाई और चढ़ें।।

हमने सपने देखे थे, हमने सपने बोए थे
जीवन के कुछ सुंदर पल, हमने भी तो खोए थे।
हमने खुद को झोंका था, हमनें कसमें खाईं थी
सपने जिंदा रक्खेंगे, असली यही लड़ाई थी।
जो आवाम का मकसद था, उस मंजिल की ओर बढ़ें।
उठो चलो फिर कूच करो, एक लड़ाई और लड़ें। एक चढ़ाई और चढें।

पर्वत जंगल पानी के, बहती हुई जवानी के
हर घाटी हर चोटी, किस्से और कहानी के।
इस धरती के बच्चों के, इस धरती की बहनों के
ख्वाबों को लग जाएं पर, गांवों के खलिहानों के।
इस धरती की हर बेटी, अपने सपने आप गढ़े।
उठो चलो फिर कूच करो, एक लड़ाई और लड़ें। एक चढ़ाई और चढें।

जो गरीब की चिन्ता है, सरोकार जो जन-जन के
प्रश्न आम लोगों है, सपने वे उत्तरजन के।
रचना का है समय यही, शुरुआत इस पाली की
नींव रखें समरस्ता की, जन-जन की खुशहाली की।
इस माटी के सपनों को, एक बार फिर और पढ़ें।
उठो चलो फिर कूच करो, एक लड़ाई और लड़ें। एक चढ़ाई और चढे।
9
सुनो ...............

ये घर कुछ बोल रहे हैं ?
दिल की आवजों को टटोल रहे हैं
जड़ों से अपने जो दूर हो रहे
ये घर कुछ बोल रहे हैं ?

वीरान सुनसाना कहानी
आबाद थी कभी यहाँ की जवानी
चहल पहल कभी खूब था यहाँ पर
उसी गुमशुदा उम्मीद को ढूंढ रहे हैं

दुख है उसका तो निवारण भी होगा
कर्ता तेरा कुछ कारण भी होगा
जड़ों से जोड़ी जो विरासत छोड़ रहे हैं
पहचान पर शर्मिंदगी हैं वो बोल रहे हैं

साये में धूप है फिर भी वो जी रहा हैं
टूटी कड़ियों को जोड़ने कोशिश कर रहा है
आज आपने छूटे टूटे द्वार वो खोल रहा है
मिट्टी चलो फिर से जोड़ें फिर बोल रहा है

इनके टूटे खव्बों का बोझ उठाना पड़ेगा
दूर गया तुझे लौट कर फिर आना पड़ेगा
झड़ती पत्तियाँ अपने जड़ों की ओर झडेंगी नहीं
तभी तक इन पर वो नई कलियाँ खिलेंगी नहीं

ये घर कुछ बोल रहे हैं ? ...........

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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महाभारत में उत्तराखंड के तीर्थ ,  आश्रम  और  शिक्षा  निर्यात से  लाभ

 Religious and Educations Centers Of Uttarakhand  in Mahabharata Epic
(महाभारत महाकाव्य  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म )

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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  17

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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )  -17                 

  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--122 )   

      उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 122   

 
    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
 
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                                     महाभारत में उत्तराखंड के तीर्थ

    महाभारत महाकाव्य में दक्षणियानन  भाग में गढ़वाल को अति महत्व दिया गया है और लगता है कि वे महाभारत रचियता व्यासों का जन्म या तो गढ़वाल में हुआ था अथवा उन्होंने यहाँ जीवन बिताया था।  महभारत में निम्न तीर्थों का उल्लेख  हुआ है  जो ऋषि धौम्य द्वारा पांडवों को सुनाया गया था -
       गंगाद्वार के  पास कनखल , कुब्जाम्रक , कुशावत , गंगाद्वार , नागतीर्थ , नील पर्वत , बिल्वक  तीर्थ थे. अन्य तीर्थ थे - अगस्त्य वट , अग्निशिर , अंगार पर्ण ,अनगिराश्रम , गंगामहाद्वार , बलाका , भारद्वाज तीर्थ , भृगु तीर्थ , भृगुतुंग (उदयपुर पट्टी , हरिद्वार निकट ), बसुधारा आदि। यमुना स्रोत्र को भी तीर्थ मन गया है।
        प्रय्ग शब्द का खिन प्रयोग नहीं हुआ है किन्तु संगम शब्द का प्रयोग हुआ है। इन तीर्थों में देव पूजन अथवा मंदिरों का वर्णन नहीं मिलता है।  देवयतनों का उल्लेख केवल कण्वाश्रम प्रसंग में मिलता है।  यह भी इतिहास सम्मत है कि मंदिर बौद्ध संस्कृति की देन  है ना कि सनातन धर्मियों की।
     
                         महाभारत में उत्तराखंड में आश्रम

              महाभारत में कुलिंद जनपद के अंतर्गत निम्न आश्रमों का वर्णन है -अंगिराश्रम , उपमन्यु आश्रम,  कण्वाश्रम , देवलाश्रम , नर -नारायण आश्रम , भारद्वाज आश्रम।

                  महाभारत में उत्तराखंड में   विद्या केंद्र

    महाभारत में उत्तराखंड निम्न विद्या केंद्रों का वर्णन मिलता है -
  व्यास आश्रम - व्यास आश्रम बद्रिकाश्रम में स्थित था। वहां केवल पांच शिष्य वेदाध्ययन करते थे -महाभाग सुमन्तु , महाबुद्धिमान जैमुनि , तपस्वी पैल , वैशम्पायन व व्यासपुत्र शुकदेव

  शुकाश्रम - शुक आश्रम गंधमादन में स्थित था। शुक अस्त्र -शस्त्र , धनुर्विद्या का ज्ञान देते थे। पांडवों ने  धनुर्विद्या यहीं प्राप्त की थी।
 
  भारद्वाज आश्रम - भारद्वाज आश्रम गंगा द्वार के पास था और राजकुमार  द्रुपद , द्रोण अदि यहाँ विद्या ग्रहण व धनुर्विद्या सीखते थे।

     कण्वाश्रम - कण्वाश्रम भाभर में मालनी नदे तीर पर था और वास्तव में विश्व विद्यालय था जहां नाना प्रकार की विद्यायी सिखलाई जाती थीं।  कण्वाश्रम के पास छोटे छोटे अन्य विद्या केंद्र भी थे।

       आश्रमों में सभी तरह की विद्याएं दी जाती थीं।  छात्रावास थे।
       उपरोक्त तथ्यों से पता चलता है कि उत्तराखंड से शिक्षा निर्यात होती थी।

               शिक्षा निर्यात विकासोन्मुखी होता है

             देहरादून , श्रीनगर , पंत कृषि विश्वविद्यालय  उदाहरण हैं की शिक्षा निर्यात वास्तव में शिक्षा पर्यटन ही है और उससे से स्थान का  विकास होता है और प्लेस ब्रैंडिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देहरादून में IMA , लाल बहादुर संस्थान , पेट्रोलियम संस्थान उदाहरण हैं कि किस तरह शिक्षण संस्थान  स्थान को अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिला सकते हैं।         



Copyright @ Bhishma Kukreti   /2 //2018 



Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                    References

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी
३- शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास भाग -2 , पृष्ठ 335 ,359 -363
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;

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