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अति स्थूल व्यक्ति लक्षण
अथवा
बिंडी म्वाटो  व्यक्ति  लक्छण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   अध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   पद  ४  बिटेन  १०  तक
  अनुवाद भाग -  १६६
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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यूं आठों व्यक्तियों मदे अतिस्थूल अर अतिकृष सबसे अधिक निंदनीय ( अफु तै नुकसानदायी)   हूंदन। अतिस्थूल व्यक्तिक -
आयु कम हूंदी
बुढ़ापा जल्दी आंद ,
 मैथुन म कठिनता ,
 दुर्बलता ,
सरैल म दुर्गंध ,
अस्यौ (पसीना ) भौत आंद ,
 भूक -बिंडी लगद
तीस बिंडी लगद ,
यी आठ दोष हूंदन। 
या अतिस्थूलता बिंडी भोजन से , गुरु , मधुर , शीत , स्निग्ध पदार्थों सेवन से , व्यायाम नि करण से , मैथुन नि करण से , दिन म सीण से , नित्य बेफिकर रौण से , अति स्थूल ब्वे बाब से।  हूंदन .
अतिस्थूल व्यक्ति क मेद बढ़न से मेद इ बड़द अर अन्य धातु नि बड़दान।  इलै विषम धातु हूण से आयु कम हूंदी।  मेदक सुकुमार शिथिल व भारी हूण  से बुढ़ापा जल्दी आंद , शुक्र कम हूण से , मेद द्वारा शुक्रवाःनियों पर रुक्का से मैथुन म कठिनाई हूंद।  विषम धातुन कमजोरी , मेद दोषन,  मेद स्वभावन , अधिक अस्यौ हूणन दुर्गंध , मेडक श्लेष्मा से मिलण पर , सड़नन , भौत हूण से , भारी हूण से ,परिश्रम सहन  नि कर सकण से पसीना भौत आंद।  अग्नि प्रबल हूण से , कोष्ठ म वायु की अधिकता से भूक तीस बिंडी लगद।  ४। 
मेद क द्वारा स्रोत्रों रुक जाण से ,वायु कोष्ठक आश्रय लेकि  गति करद यां से अग्नि तै तेज करद अर भोजन तै शुष्क कर दींद ।  ये से अग्नि आहार तै शीघ्र जीर्ण (पचै  दीण ) कर दींद ,अर हौर भोजन की इच्छा हूण मिसे जांद। आहार कालक अतिक्रमणन कई रोग पैदा हूंदन। यी अग्नि विशेषकर वायु तै उपद्रव करण वळ हूंदन।  जन आग जंगल जळै दींद तनि अग्नि व वायु स्थूल व्यक्ति तै दुःख पौंछाँद।  मेद वृद्धिन वायु , पित्त , कफ भयानक रोगों तै उतपन्न कौरि जीवन कम करद।  मेदक अति  वृद्धि से व्यक्तिक पूठ , दुदल , पुटुक बढ़ जांदन।  शरीर क आकर  बेडोल व उत्साह कमजोर पोड जांदन।  इन व्यक्ति तै अतिस्थूल बुल्दन।  यी मेदस्वी व्यक्ति क दोष , कारण अर लक्षण बोल ऐन।  एक अगनै अतिक्रिश की चर्चा ह्वेलि।  ५ - १०
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४७   बिटेन २४८    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद
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Distillation: A source for Place Branding (Whisky Tourism)

Art as a strong Tool for Tourism Promotion and Place Branding -8
Different Marketing Strategies for fighting with Competitors
Strategies for Executive for marketing warfare
Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 382
       Bhishma Kukreti (Marketing Strategist)
s= आधी अ

जलवायवग्निसंयोगनिरोधैश्च  क्रिया कला
The process of Separation of Air and liquid (water) with the help of fire (distillation) is an art.
(Shukraneeti, Chapter 7 Vidya va   Kala Nirupan- 64)
Distilleries are very strong medium for place branding, developing place for business and tourism by distilleries is a well-known facts. 
Perfume making, alcohol making, separation of oxygen, nitrogen etc, petro-oil separation etc are example of distillation and all are tools for place branding.
Following places are famous due to alcohol distillation-
Marker’s Mark , Kentucky USA
Jack Daniels, Lynchburg, Tunisia, USA
Old Jameson, Dublin, Ireland
Yamazaki, Suntory, Japan
The Glenfidich , Dufftown,Scotland
Old Bush mills, County Antrim, Ireland



Reference:
Shukraniti, Manoj Pocket Books, Delhi pp 222
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2021
Strategies for Executive for marketing warfare
Tactics for the Chief Executive Officers responsible for Marketing
Approaches   for the Chief Executive Officers responsible for Brand Image
Strategies for the Chief Executive Officers responsible for winning Competitors
Immutable Strategic Formulas for Chief Executive Officer
(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)
(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)
Successful Strategies for successful Chief executive Officer
Art is the strong medium of Tourism Development
Art a strong tool for place branding

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  देवराड़ी बागेश्वर में स्व डी  डी  पंत के भवन में  काष्ठ कला अलंकरण, उत्कीर्णन अंकन 

Tradiitonal House wood Carving Art in Bageshwar, Kumaun
कुमाऊँ, गढ़वाल, के भवन(बाखली, तिबारी,निमदारी,जंगलेदार,मकान, खोली,कोटि बनाल)  में कुमाऊं शैली; की काष्ठ कला अलंकरण, उत्कीर्णन अंकन- 529 
संकलन - भीष्म कुकरेती

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 जनपद बागेश्वर के देवराड़ी में  कुमाऊं विश्व विद्यालय के प्रथम कुलपति स्व डी डी पंत के भवन  दुपुर है।  तल मंजिल में खोली शुरू होती है।  तल मंजिल गौशाला व भंडार हेतु सुरक्षित है।  इन कक्षों में सिंगाड़ (स्तम्भ ) , कड़ियाँ सपाट हैं (ज्यामितीय अलंकरण उदाहरण )। 

खोली के स्तम्भों में कमल दलों  के अंकन से से घुंडी निर्मित हुयी हैं व दो घुंडियों के मध्य ड्यूल भी है।  ऊपर मुरिन्ड /मथिण्ड /header में तोरणम भी ज्यामितीय कटान का सपाट संरचना है।  तोरणम के स्कंध में कोई अंकन नहीं दिख रहा है।  ऊपर की कड़ियों में जाली व लड़ियों का अंकन हुआ है।

खोली के मुरिन्ड/शीर्ष  के ऊपर के पांच  चौखटों में अलग देव व पक्षी अंकित हुए हैं।  दो चौखट वर्ग में मयूर , एक चौखट में गणपति , व दो चौखटों में देव अंकन हुआ है।

 जनपद बागेश्वर के देवराड़ी में  कुमाऊं विश्व विद्यालय के प्रथम कुलपति स्व डी डी पंत के भवन के पहले  मंजिल में तीन जोड़ी छाज हैं।  प्रत्येक छाज के सिंगाड़ों /स्तम्भों की कला खोली की सिंगाड़ों की प्रतिरूप ही है।  छाजों के तोरणम /मेहराब के स्कंध भी स्पॉट संरचना वाले ही हैं। 

छाजों के निम्न तल की संरचना में जालीदार/छेद  युक्त  संरचनाएं भी सपाट हैं। 

 जनपद बागेश्वर के देवराड़ी में  कुमाऊं विश्व विद्यालय के प्रथम कुलपति स्व डी डी पंत के भवन कला दृष्टि व अंकन दृष्टि उत्कृष्ट है व इसमें प्राकृतिक , ज्यामितीय व मानवीय अलंकरण लिए हुए हैं। 

सूचना व फोटो आभार: सोनु  पाठक (FB ) 

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है नकि मिल्कियत  संबंधी Iभौगोलिक  व मालिकाना   सूचना  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2021

 कांडा तहसील , बागेश्वर में परंपरागत मकानों में   काष्ठकला अंकन  ;  गरुड़, बागेश्वर में परंपरागत मकानों में काष्ठकला अंकन  ; कपकोट ,  बागेश्वर में परंपरागत मकानों में काष्ठकला अंकन )
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग  :  कत्यूरी नरेश चरित्र             

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - ४८
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule 48 -
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 350                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  ३५०                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 
चौदह कत्यूरी नरेशों में त्रिभुवनराज , निंबर व सलोणादित्य को छोड़ अन्य कत्यूरी नरेशों की उपादि पट्टमभट्टारक महाराजधिराज रहा है।  अभिलेखों में कत्यूरी राजाओं को सतयुग राजा सामान बतलाया गया है।  इन कत्यूरी नरेशों को दया , दाक्षिण्य , सत्य , सत्व , शील , शौर्य , औदार्य , गाम्भीर्य आदि गुणों सहित बताया गया है (२ )।  ताम्रशासनों में कत्यूरी नरेशों के लिए अंकित है कि ये नरेश आदर्श जीवन यापन करते थे। 
कत्यूरी नरेश दींन अनाथों के रक्षक थे।
नरेश विद्याभाषी थे।  कत्यूरी नरेशों की राज सभा में दूर दूर से विद्वान् तर्क हेतु आते थे व राजा उन्हें पारितोषिक देते थे (१ )।   
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संदर्भ :
 १ - शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४६६
२- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग १  वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड पृष्ठ ३८० (कत्यूरी शासकों के ताम्र शासन )
Copyright @ Bhishma  Kukreti
हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर , कत्यूरी युग में हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर  इतिहास
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निन्दित पुरुष (शरीर से )
 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   अध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   पद  १  बिटेन ३   तक
  अनुवाद भाग -  १६५
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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एक अगनै 'अष्टौनिंदितीय अध्याय'  की व्याख्या करला जन भगवान आत्रेयन बोली छौ। १ , २।
ये लोकम शरीर संबंधित (मन की बात पृथक ) आठ लोग निन्दित मने जांदन -
अतिदीर्घ ,
अतिह्रस्व
अतिलोमा (बिंडी बाळ वळ )
अलोमा (बिलकुल बाळ हीण )
अतिकृष्ण  (अति काळो )
अतिगौर (अति ग्वारो )
अतिस्थूल (भौत म्वाटो )
अतिकृश ( भौत पतळु ) ३। 
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४६   
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद
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Dyeing and block making make a place famous as Jetpur (Saurashtra,  Gujarat )

Art as a strong Tool for Tourism Promotion and Place Branding -7
Different Marketing Strategies for fighting with Competitors
Strategies for Executive for marketing warfare
Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 381
       Bhishma Kukreti (Marketing Strategist)
s= आधी अ
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हीनमध्यादिसंयोग- वर्णाद्यै रंजनं कला I
The (textile) dyeing by using inferior , meddling and other colours is an art
(Shukraneeti, Chapter 7 Vidya va   Kala Nirupan- first verse of 64)
. Dyeing is nothing but an art . The art of dyeing makes a place famous as other art offer employment to the artisans same way, dyeing offer employment to the artisans and offer fame to the place.
 Jetpur (Saurashtra Gujarat )  became famous due to dyeing and block making . Same way, Bhiwandi, Ichhalkranji, Maleganv  became textile centres due to facilities of dyeing in those cities.
Reference:
Shukraniti, Manoj Pocket Books, Delhi pp 222
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2021
Strategies for Executive for marketing warfare
Tactics for the Chief Executive Officers responsible for Marketing
Approaches   for the Chief Executive Officers responsible for Brand Image
Strategies for the Chief Executive Officers responsible for winning Competitors
Immutable Strategic Formulas for Chief Executive Officer
(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)
(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)
Successful Strategies for successful Chief executive Officer
Art is the strong medium of Tourism Development
Art a strong tool for place branding
7
Ajanta Clocks made Morbi (Gujarat ) famous worldwide

Art as a Medium of Tourism Development -5
Different Marketing Strategies for fighting with Competitors
Strategies for Executive for marketing warfare
Guidelines for Chief Officers (CEO) series – 380
       Bhishma Kukreti (Marketing Strategist)
s= आधी अ
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घट्याद्यनेकयन्त्रांनां वाद्यानां तु कृति: कला I63I
The assembling of clocks, watches and making /constructing of musical instruments is an art .
(Shukraneeti, Chapter 7 Vidya va   Kala Nirupan- 63)
 Making watches and musical instruments is an art and both are tools for place branding or both art creates images for the places.
  For example Morbi (a Town in  Saurashtra of West Gujrat ) became very famous worldwide  due to Ajanta Clock manufacturing in Morbi.
 Same way,  the places where musical instrument are made or sold become famous.
Watch making acts contributed the enhancement of fame for Switzerland. Same way , Japan also became famous due to watch manufacturing.
Reference:
Shukraniti, Manoj Pocket Books, Delhi pp 222
Copyright@ Bhishma Kukreti, 2021
Strategies for Executive for marketing warfare
Tactics for the Chief Executive Officers responsible for Marketing
Approaches   for the Chief Executive Officers responsible for Brand Image
Strategies for the Chief Executive Officers responsible for winning Competitors
Immutable Strategic Formulas for Chief Executive Officer
(CEO-Logy, the science of CEO’s working based on Shukra Niti)
(Examples from Shukra Niti helpful for Chief executive Officer)
Successful Strategies for successful Chief executive Officer
Art is the strong medium of Tourism Development
Watch, Musical instruments manufacturing Centres as tools for place branding

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भनार (चम्पावत ) भवन  ३ में काष्ठ कला

 भनार (चम्पावत )  के भवन संख्या ३ में काष्ठ कला अंकन , अलंकरण, उत्कीर्णन

Traditional House Wood carving Art of Bhanar     Champawat, Kumaun 

कुमाऊँ ,गढ़वाल, के भवन ( बाखली,   खोली , )  में ' कुमाऊँ  शैली'   की   काष्ठ कला अंकन , अलंकरण, उत्कीर्णन  -528

 संकलन - भीष्म कुकरेती   
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भनार के कुछ भवनों की जानकारी मिली। है।  प्रस्तुत भनार    तिपुर ( तल मंजिल + २ मंजिल )  व दुखंड है।  तल मंजिल में गौशाला व भंडार हैं व काष्ठ कला  ज्यामितीय सपाट कटान  के अतिरिक्त   कुछ विशेष उल्लेखनीय नहीं है।  खोली तल मंजिल पर है जिसके स्तम्भ (सिंगाड़ों  ) में कुम्भियाँ कटी हैं।  खोली के मथिण्ड /मुरिन्ड /header /शीर्ष में कोई  है किन्तु छायाचित्र से स्पष्ट है कि मुरिन्ड में देव मूर्ति स्थापित हुयी होगी।

भनार के भवन संख्या ३ के प्रथम मंजिल में पांच जोड़े छाज दृष्टिगोचर हो रहे हैं।  छाजों से स्तम्भ व तोरणम (मथिण्ड ) में सपाट काश्त कला दिख रही है।  झरोखों (छाजों ) के ढक्क्नों व दरवाजों में ज्यामितीय कटान ही मिल रहा है।  ढक्क्नों के नीचे भी सपाट व जालीनुमा संरचना मिली हैं। 

भनार के प्रस्तुत भवन में तीसरे मंजिल में जंगला स्थापित हुआ है।  जंगले में स्तम्भ सपाट ज्यामितीय कटान मिला है।  जंगले के स्तम्भों के मध्य आधार में भी उप जंगला संरचना स्थापित हुए हैं।  जंगलों के उप स्तम्भों में ज्यामितीय  कला दृष्टिगोचर हो रही हैं।  कडिओं में भी सपाट कटान हुआ है। 

सूचना व फोटो आभार : जय  ठक्कर  संग्रह

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी।  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2021

  चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला,  चम्पावत    तहसील , चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला,; लोहाघाट तहसील   चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला अंकन ,  पूर्णगिरी तहसील ,  चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला अंकन   ;पटी तहसील    चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला,, अंकन   
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 सहारनपुर , बिजनौर हरिद्वार पर कत्यूरी शासन समाप्ति          

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - ४७
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -47
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  - 349                   
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - ३४९                 


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 वर्तमान जोशीमठ में कत्यूरी राजधानी होने का अर्थ है कि कत्यूरियों की उत्तरी सीमा तिब्बत - भारत की मध्यवर्ती पहाड़ों की श्रेणी तक था (१ )।
प्राचीन जनश्रुति जिसे एटकिनसन  ने उद्घृत किया है (२ ) कि  जोशीमठ को राजधानी बनाकर कत्यूरी नरेशों का राज्य सतलज तट से लेकर पूर्व गंडकी तक था।  तथा महा हिमालय से लेकर दक्षिण मैदान व रुहेलखंड तक था। 
यमुना से सतलज तक कत्यूरी राज्य की पुष्टि अभी तक किसी ऐतिहासिक अभिलेखों व प्रमाणों से नहीं हुयी है।  सतलज के तट में निरत स्थान में एक बूटधारी सूर्य मूर्ती का मंदिर भी है (१ )। राहुल अनुसार (कुमाऊं , पृष्ठ ३३ ) इस सूर्य मंदिर की स्थापना ८ -९ वीं ईश्वी में हुआ था।  राहुल की धारणा है कि ललित शूर समय यह मंदिर कत्यूरी नरेशों के अधिकार में था। 
 कत्यूरियों ने लगभग २५० ढाई सौ वर्षों तक राज किया।  और तीन वंशजों के राज होने से कई बदलाव अवश्यंभावी हैं। 
वैजनाथ कांगड़ा शिलालेख (कांगड़ा गजेटियर परइ ५०१ ) अनुसार दसवीं सदी के अंत में तीरगत जालंधर नरेशों की शक्ति विस्तृत थी।  संभवतया इस समय कत्यूरी अधिकार यमुना के पश्चिम में समाप्त हो चला होगा (१ )।  तारीख यामिनी अनुसार (इलियट डाउसन , हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया खंड २  पृष्ठ ४७ इंडियन कल्चर गव डॉट कॉम डॉट इन /रेयर बुक्स  )  दसवीं सदी में अम्बाला -सहारनपुर , सिरमौर व देहरादून (पश्चमी भाभर ) पर किसी चाँद राय का अधिकार था।  ओकले व गैरोला अनुसार (३ ) मायापुर , हरिद्वार व गढ़वाल भाभर में सामंत भी स्वतंत्र बन बैठे थे।  इससे अनुमान लगता है कि अंतिम काल में कत्यूरियों का शासन बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर पर समाप्त हो गया था। 
 
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संदर्भ :
 १ - शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ   ४६४
२-  एटकिनसन ,  हिमालय डिस्ट्रिक्ट्स खंड २ , पृष्ठ ४६७
३-ओकले   - गैरोला हिमालयन फ़ोल लोर पृष्ठ १०२ - १०३
Copyright @ Bhishma  Kukreti
हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर , कत्यूरी युग में हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर  इतिहास
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कफ विकार : पहचान व निदान
 
कफ रोग पछ्याणक व चिकित्सा

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  बीसवां      अध्याय  (  महारोगाध्याय  )   पद   १८ बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १६४
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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यूं सब कफक विकार जु बुले गेन  या नि बुले गेन विकारों म सब या  भाग  , कफक स्वाभवाविक रूपन  , कार्योन , लक्छणोंन कुशल वैद  पछ्याणक करी संदेहरहित श्लेष्म विकार ही च को इन निश्चय करदो यथा - चिकास , शीतलता , सफेदी , भारीपन , मधुरता , पिछलता यी सब कफक रूप छन।  निम्न कार्यों कफक  पछ्याणक  हूंद -
शरीर क अवयवों म भितर छीरी (प्रवेश ) कफ सफेदी , शीतलता , खाज , जड़ता , भारपन , निष्क्रियता , खिन्नता , चिकनापन , अवरोध , मधुरता , देर म कार्य करण यी सब कफक कार्य छन।  यूं से कफ तै जणन चयेंद . ये कफ तैं शांत करणो कुण कटु ,तिक्त   , कसाय , तीखो , गरम अर रूखो उपक्रमन चिकत्सा करण  चयेंद।  मात्रा , समय  अनुसार स्वेद , वमन  , व्यायाम आदि श्लेषनाशक तत्वों प्रयोग करण चयेंद।  कफ तै शांत करणों कुण  वैद  वमन तै सबसे भलो उपक्रम मणदन।  वमन जल्दी से आमाशय म पौंची श्लेष्म तै जड़ से भैर कर दीन्द।  ये कफक पूर्ण शांत नि हूण पर बि शरीर क भितर अन्य कफ शांत ह्वे जांदन।  जन धान , जाऊ क खेत पाणी से भर्यां हूंदन अर जनि मींड टुटद तनि पुंगड़ सूको ह्वे जांद उनि कफक निकळण से कफ रोग खतम ह्वे जांद।  १८ - १९।
सबसे पैल रोगै परिक्षा करण  चैन्द,  फिर औषध की परीक्षा यांक पैंथर वैद चिकित्सा कारो।  जु  वैद बिन रॉक निश्चय करी चिकित्सा शुरू कर दींद भले इ वु औषध विज्ञान म प्रवीण ह्वावो , तब बि विकि सफलता निश्चित नी।  जु वैद  रोग की जानकारी लींद , औषध बि जणद दगड़म क्षेत्र , प्रकृति , मात्रा अर समय बि पछ्यणद वैक चिकित्सा सफल होली हि।  २० -२२।
रोगुं संक्छिप्त संख्या , युंकी जगा , साक्छात व प्रेरक कारण , आसन्देह , अनुबंधन , दोषुं स्थान , नाना प्रकार की रोग गणना , दोषुं अलग अलग रूप , स्वाभाविक कर्म , दोषुं पृथक पृथक शान्ति उपाय , यी सब महारोग अध्याय म भगवन पुनर्वसुन बोल यालिन।  २३ - २४।
 
अब बीसवां अध्याय समाप्त।  =======================
 
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २४४  बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , कफकफ विकार : पच्चाण व निदान  का पाठ 
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