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 पुल्ला (लोहाघाट , चम्पावत ) के एक भवन में कुमाऊँ  शैली'   की   काष्ठ कला अंकन , अलंकरण, उत्कीर्णन


Traditional House Wood carving Art of Pulla , Lohaghat ,  Champawat, Kumaun 

कुमाऊँ ,गढ़वाल, के भवन ( बाखली,   खोली , )  में ' कुमाऊँ  शैली'   की   काष्ठ कला अंकन , अलंकरण, उत्कीर्णन  -516

 संकलन - भीष्म कुकरेती   
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पिल्ला का  प्रस्तुत  भवन कई खंडों में हैं व कह सकते हैं कि कई भवनों का समूह है।  किनारे वाला भवन धाइपुर व दुखंड है।  तल मंजिल में कई कक्ष हैं।  इन कक्षों के द्वारों /ंवारों के स्तम्भ व द्वार पटीले ( तख्त ) ज्यामितीय कटान के सपाट हैं।  इन कक्षों के मुरिन्ड /मथिण्ड  में मेहराब /तोरणम /Arch स्थापित हैं।  छायाचित्र में  तोरणम के स्कंध सपाट  दृष्टिगोचर हो रहे हैं।   

 पिल्ला के  प्रस्तुत  भवन  के   प्रथम मंजिल में बालकोनी है जिस पर जंगला स्थापित हुआ है।  जंगले चारों  ओर   २० से अधिक स्तम्भ स्थापित हैं।  स्तम्भ आधार से ऊपर की सपाट कड़ी तक स्थापित हैं स्तम्भ ज्यामितीय कटान के अच्छे उदाहरण हैं।  स्तम्भों के निम्न भाग में जंगले XXX  आकार के हैं।  सभी काष्ठ कला के आकर्षक उदाहरण है। 

किनारे के भवन के बगल के भवनों  के  प्रथम मंजिलों में  बालकोनियों में भी जंगले  हैं व ज्यामितीय कटान से निर्मित हैं। 

सूचना व फोटो आभार : जय ठक्कर संग्रह

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी।  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2021

  चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला,  चम्पावत    तहसील , चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला,; लोहाघाट तहसील   चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला अंकन ,  पूर्णगिरी तहसील ,  चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला अंकन   ;पटी तहसील    चम्पावत , उत्तराखंड में भवन काष्ठ कला,, अंकन   
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग  :   कत्यूरी नरेश   इच्छटदेव             

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  -३३ 
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -   33
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -   335                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -   ३३५               


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
 
 सलोणादित्य के पुत्र का नाम इच्छटदेव  था।  इच्छटदेव की उपाधि भी परम् भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर ही था।  उसके उत्तराधिकारी देशटदेव, पद्मट   व सुभिक्षराज के अभिलेखों में भी यही उपाधि मिलती है (२ ) ।  इच्छटदेव  का कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं है।
 इच्छटदेव  की रानी का नाम सिन्धुदेवी व राजधानी कार्तिकेयपुर था।
 इच्छटदेव  ने पराम् भट्टारक। . उपाधि  प्रतिहार नरेश महिपाल  की मृत्यु ( ९०८ ई  ० )  बाद ही ली होगी। 
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संदर्भ :
 १ - शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  ४५८
२-  - शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग १  वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ ३८४
Copyright @ Bhishma  Kukreti
हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर , कत्यूरी युग में हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर  इतिहास
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४८ रोगुं  सूची
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   )  १  पद  ३  बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १४९
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
 
अब ' अष्टोदरीय' अध्यायौ  व्याख्या करे जाल जन भगवान आत्रेयन उपदेश कार (१ -२ ) -
ये आयुर्वेद शास्त्र म चार प्रकारा  उदर रोग छन, आठ मूत्राघात छन ,आठ प्रकारा दूध दोष , आठ प्रकारक वीर्य दोष , सात प्रकारक कुष्ठ रोग , सात पिडका, सात बीसर्प , छह प्रकारा अतिसार , छै उदावर्त ,पांच गुल्म , पांच प्लीहा दोष  , पांच कास , पांच श्वास , पांच हिचकी , चार तृष्णा , पांच अर्दि -दमन , पांच प्रकारै अन्न म अरुचि , पांच प्रकारा शिरोरोग , पांच हृदय रोग , पांच प्रकारक पाण्डु रोग , पांच उन्माद।  चार अपस्सार ,चार चक्षु व्याधि , चार कंदूड़ो रोग , चार प्रति श्याया , चार मुख रोग , चार प्रकारक गृहणी रोग , चार प्रकारक मद रोग , चार मूर्छा , चार किस्मौ शोष  , चार क्लीवता , तीन प्रकारक शोथ ,तीन किलास ,तीन तरां रक्त पित्त ,द्वी प्रकारक जौर , द्वी किस्मक व्रण ,  द्वी तरां  आयाम , द्वी गृधसी , द्वी किस्मक कामला , द्वी प्रकारक आम , द्वी वातरक्त , द्वी किस्मक अर्श।  एक अस्तम्भ , एक सन्यास , एक महामद , बीस किस्मक कृमिभेद ,बीस तरां प्रमेह , बीस तरां योनि रोग।  ये हिसाबन ये शरीर म ४८ अड़तालीस प्रकारा रोगों गणना हूंद। ३। 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २३१    बिटेन  २३०   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद
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अल्मोड़ा के भवन संख्या  १५ के द्वार में  काष्ठ कला

Traditional House Wood Carving art  in , Almora, Kumaon   
 

कुमाऊँ ,गढ़वाल, के भवन  में ( बाखली ,तिबारी, निमदारी ,जंगलादार  मकान  खोली,  कोटि बनाल )   कुमाऊं की    ' काष्ठ कला  अंकन , अलंकरण, उत्कीर्णन -515   

 

 संकलन - भीष्म कुकरेती
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प्रस्तुत अल्मोड़ा के भवन संख्या का द्वार ब्रिटिश काल में उत्तराखंड का आम द्वारों का स्मरण दिलाता है।  प्रस्तुत द्वार भवन के तल मंजिल के कक्ष का द्वार है।  दोनों द्वारों में ज्यामितीय कटान के सपाट कड़ियों व (पटिलों )  तख्तों  का प्रयोग हुआ है। 

इस तरह पाते हैं कि अल्मोड़ा बजार में  प्राप्त भवन संख्या १४ के द्वार में ज्यामितीय कटान की कला विद्यमान है। 

सूचना व फोटो आभार :  गजेंद्र बिष्ट संग्रह

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी।  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2020
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हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में   कत्यूरी युग  :     देवप्रयाग में मेधातिथि की तपस्या         

 हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर इतिहास संदर्भ में उत्तराखंड पर कत्यूरी राज भाग  - ३२
Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History with reference  Katyuri rule -32
 
Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -   334                 
                           
    हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -३३४                   


                  इतिहास विद्यार्थी ::: आचार्य भीष्म कुकरेती -
मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि  सलोणादित्य के समकालीन थे (१ ) ।  मेधातिथि के जन्म स्थल पर इतिहासकारों में मतभेद है।   काणे  व जॉर्ज बुहलर  मानते हैं कि मेधातिथि कश्मीर के थे या उत्तरीभारत के थे (२ )।  किन्तु कोई सबल तथ्य सामने नहीं आये हैं।
मेधातिथि ने मनुस्मृति की टीका की है।  यद्यपि इस टीका में शंकराचार्य का नाम नहीं है किन्तु टीका में कई विचार शंकराचार्य से मिलते हैं।  रॉबर्ट लिंगत (द  क्लासिकल लॉज़ ऑफ़ इण्डिया , ओक्सफोर्ड अमेरिका , १९७३ , पृष्ठ ११२ ) ने मेधातिथि समय ८२० ई  से ऊपर व 1050 से पहले माना है और इस विश्लेषण से मेधातिथि का समय ८२५ -९०० ई मध्य होना चाहिए (१ )।
    डा डबराल , कुकरेती का अनुमान ही नहीं अपितु बलयुक्त तर्क है कि मेधातिथि गढ़वाल के निवासी थे।  केदारखंड में उल्लेखित मेधातिथि वास्तव में मनुस्मृति के टीकाकार थे उन्होंने देवप्रयाग में तपस्या की थी व अवश्य ही मनुस्मृति की टीका देवप्रयाग में ही रची गयी थी -
 
पूरा मेधातिथिनम अनूप द्विजसत्तम: I सूर्य्य भक्तिरतो नित्यं सूर्यमेवाभजत् सदा II.
सदैव सौर्मन्त्र वै जपंस्तस्थौ तु स्वे गृहेI एकदा मुनिशार्दूल गतो मेधातिथिर्मुनि II
देवप्रयागके क्षेत्रे तीर्थानामुत्तमोत्तमे I सौरकुण्डे महातीर्तः तीर्थानां प्रवरे शुभे II
तत्र गत्वा मुनि श्रेष्ठ तपश्च्क्रे महामति: I निराहारो वतात्मा वै निर्ममो नि:स्पृहः सुधीः II
केदारखंड १५५ , ४ -८
    मेधातिथि के जीवन संबंधी यही ेल लिखित उल्लेख उपलब्ध है। 
 
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संदर्भ :
  १- शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' ,  उत्तराखंड का इतिहास भाग ३ वीरगाथा प्रेस दुगड्डा , उत्तराखंड , पृष्ठ  - ४५७ 
२- काणे पी वी ,हिस्ट्री ऑफ  धर्मशास्त्र , १९७५ , जिल्द १ , पृष्ठ ५७५
Copyright @ Bhishma  Kukreti
हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का  कत्यूरी युगीन प्राचीन  इतिहास   अगले खंडों में , कत्युरी वंश इतिहास और हरिद्वार , सहारनपुर , बिजनौर , कत्यूरी युग में हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर  इतिहास
 
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त्रिशोथ क सार

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )  ५०  पद   बिटेन  ५८  तक
  अनुवाद भाग -  १४८
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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शरीरधारियों म वात , पित्त अर कफ सदा ही रंदन। यी या त  विकृत अवस्था म हूंदन या प्राकृतिक या स्वाभाविक अवस्था म हूंदन।  विद्वान् (वैद्य ) तै चयेंद कि वो यूं  तै पछ्याण कि  विकृतावस्था म छन  या प्राकृतिक अवस्था म।  काम करणम उत्साह , सांस्क भैर भितर आण , चेष्टा , रस , रक्त आदि धातु क गति तैं सामान रखण , पुरीष , मल -मूत्र आदि गमन शील वस्तुओं सणि  ठीक से भैर करण यी वायु क अधिकृत कार्य छन।  दिखण , अन्न पचाण , देखकी , उष्णिमा, भूक -तीस क लगण , शरीर की कोमलता , कांटी , मनै प्रसन्नता , बुद्धि हूण यी अधिकृत पित्त क कार्य छन।  चिकनाई , संधियों क बंधन , स्थिरता , भारपन , पुरुषत्व , बल , सहनशक्ति , मनै स्थिरता , धैर्य , लोभ नि हूण , यी अधिकृत कफ का कार्य छन।  वात , पित्त , कफ क्षीण हूण पर लक्छण बुल्दन - स्वाभाविक कर्मों म कमी आदि अर  स्वाभाविक कार्यों विरोधी म बढ़ोतरी आंदी।  जनकि  वायु क्षीण हूण पर उत्साह म कमी  अर  विषाद बड़द , पित्त की कमी म नि दिखेण , कफ की कमी म रुखोपन हूण।  बृद्धि क लक्छण बुल्दां -  दोष क स्वभाव म वृद्धि  लक्छण हूंदन जनकि -कफ की स्निग्धता , शीतलता , अर मधुरता , या प्रकृति च यांक  अति स्निग्धता , अति मधुरता या अति शीतलता वृद्धि च।  ये हिसाबन दोषों की प्रकृति ,  हानि व वृद्धि की परिक्षा हूण  चयेंद।  ५० -५५।
शोथों की संख्या , कारण , लक्षण , साध्य असाध्य यूंसे उत्पन्न रोगुं अर जौं रोगुंम शोथ पैल हूंद , ऊंको , रोगुं विधि , भेद से तीन प्रकारै प्रकृतिक ज्ञान ,दोषुं  स्वाभाविक कार्य , वृद्धि अर कमी लक्छण , यी सब मोह , रज दोष , लोभ , मान , मद ,सम्प्रिहा यूंसे रहित पुनर्वसु महर्षि न 'त्रिशोथ'अध्याय म बोल याल।  ५६- ५८।
 
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २२९  बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद
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प्रेसर कुकर कु इतिहास
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सरोज शर्मा ( भोजन इतिहास शोधार्थी)
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इंग्लैंड मा आर्चीबाल्ड केनरिंग एंड सन्स द्वारा निर्मित 1890 म निर्मित हुयीं,
1679 मा,फ्रांसिसी भौतिक वैज्ञानिक डेनिस पापिन जु भाप पर अध्ययन कनकु प्रसिद्ध छाई वू भि जणै जंदिन वून भोजन पकाण कु समय कम कनकु वास्ते स्टीम डाइजेस्टर कु आविष्कार कार,ऊंक एयर टाइट कुकर म क्वाथनांक बड़ान क वास्ते भाप क दबाव कु इस्तेमाल कार ,जनकैक खाण जल्द बण ग्या, 1681 म पापिन ल अपण आविष्कार क वैज्ञानिक अध्ययन क रूप म लंदन कि राॅयल सोसाइटी क समण प्रदर्शन कार, बाद मा ऊं थैं सदस्य क रूप म चुने ग्यायी,
1864 म स्टटगार्ड क जार्ज गुटब्रोड न टिन क कच्चा लोहा से कुकर कु निर्माण शुरू कार,
1910 मा इंदुमाधव मलिक न स्टीम कुकर कु आविष्कार कार जु IcMIc कुकर नाम से लोकप्रिय ह्वाई, जु चौंल दाल सब्जियों थैं भाप म तेजी से पकै सकदु छाई,
1918 म स्पेन ल जारागोजा क जोस एलिक्स मार्टिनेज कु प्रेसर कुकर खुण पेटेंट किये ग्या, मार्टिनेज न ये थै बुलेटिन ऑफिसियल डे ला प्रोपिडाड इंडस्ट्रीज म पेटेंट संख्या 71143 क तहत ओला एक्सप्रेस नाम दिये ग्या,1924 मा पैल पैल कुकिंग पाॅट बुक प्रकाशित ह्वाई जै थैं जोस एलिक्स न लिख, शीर्षक छाई 360 फार्मुलस डे कोकिना पैरा गुईसर कोन ला ओला एक्सप्रेस,
1938 मा अल्फ्रेड विस्चर न न्यूयार्क म फ्लैक्स सील स्पीड कुकर प्रस्तूत कार,
विस्चर क प्रेसर कुकर सबसे पैल घरेलु उपयोग म लिए ग्या ये कि सफलता न अमेरिका और यूरोपीय निर्माताओ क बीच प्रतिस्पर्धा कु जन्म दयाई, 1939 मा नाम बदलिक प्रैसटो इंडस्ट्रीज, अपणा स्वयं का कुकर बणाण कि शुरुआत कार।

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पुलाव इतिहास

सरोज शर्मा (भोजन इतिहास शोधार्थी)
इ तिहास बतांदु च कि पुलाव क जन्म पैल ह्वाई बाद म बिरयानि आई ,पुलाव क बार म ईरानी विद्वान अविसेना क किताबों म जिक्र मिलद ,इलै एक श्रेय ईरान थैं मिलद
पर संस्कृत साहित्य म भि येकि जड़ मिल जंदिन
 
हालांकि चौंलु कि खेति दक्षिण एशिया से मध्य एशिया और पश्चिम एशिया म बहुत पैल भटिक किए जांद, अब्बासी खलीफा जमन भटिक यि चौंल (पुलाव) पकाण क सगोर छाई यि तरीका स्पेन से लेकि एक विशाल क्षेत्र म फैल ग्या,
अफगानिस्तान और सरया दुनियाभर म स्पैनिश पेला और दक्षिण एशियाई पुलाव और बिरयानी विकसित हुयीं
केटी आचार्य क अनुसार भारतीय महाकाव्य महाभारत चौंल और मांस एक साथ पकये जांणक उदाहरण भि मिलद,
पिलाफ क खुण सबसे पैल लिखयूं नुसका दसवीं शताब्दि म फारसी विद्वान इब्नसिना से आंद जौंल अपणि पुस्तक म कै
प्रकार क पिलाफ क वर्णन कर दयाई ,17वीं शताब्दि म ईरानी दार्शनिक मुल्ला सदरा कि कि किताबो मा भि पुलाव क वर्णन आंद।

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माइक्रोवेव ओवन का इतिहास।

उषा बिज्लवाण देहरादून।

यूके मा कैविटी मैग्नेट्रॉन का विकासन एक छोटा तरंग दैधर्य की विधुत चुम्बकीय तरंगो कु उत्पादन सरल बणाई ।अमेरिकी इंजिनियर पर्सी स्पेंसर तै आमतौर पर युद्ध का दौरान विकसित रडार तकनीकी से द्वितीय विश्व युद्ध क का बाद आधुनिक माइक्रोवेव ओवन का अविष्कार कु श्रेय दिये गै । राडारेंज नाम दिये गै ये तै पैली बार १९४६ मा बेची गै थौ।बाद मा रेथियॉन न घरेलू माइक्रोवेव का खातिर अपणा पेटेंट कु लाइसेंस दिनी जैतैं टप्पन न १९५० मा पेश करी थौ लेकिन अभी भी यु घरेलू उपयोग का खातिर बड़ू और मैंगू थौ। शार्प कापरिशन न १९६४ और १९६६ का बीच टनटिबल का साथ पैलू माइक्रोवेव ओवन पेश करी। काउंटरटाप माइक्रोवेव ओवन १९६७ मा अमाना कापरिशन द्वारा पेश करै गै थौ।१९७० का दशक मा माइक्रोवेव सस्ता होणा का कारण दुनिया भर मा उंकू उपयोग वाणिज्य और आवासीय रस्वाड़ों म फैल गी थौ। खाणा पकौणा का अलावा माइक्रोवेव कू इस्तमाल औद्योगिक प्रक्रियाओं म भी होन्दू। माइक्रोवेव तैयार खाणा तै गरम करणक और कै प्रकार का खाणा बणौणक होन्दू। यू कै प्रकार का खाणा तै तेजी से गरम करदू जू आम भांडौं पर सम्भव नी। माइक्रोवेव खाणा तै भूरा या कैरामेलाइज नी करदू कीक क यू माइलर्ड प्रतिक्रियाओं तै उत्पन्न करना शायद ही आवश्यक तापमान प्राप्त करदन। यन मामलों म अपवाद छ जख माइक्रोवेव कु इस्तमाल तैलीय चीजौं तै गरम करना तै किये जांदू जू उब्लदा पाणी की तुलना मा बहुत जादा छ । खाणा बणोणा मा माइक्रोवेव की एक सीमित भूमिका होन्दी कीक कि माइक्रोवेव की क्वथनांक - सीमा का तापमान से स्वादपूर्ण रासायनिक प्रतिक्रिया उत्पन्न नी होन्दी जू उच्च तापमान पर तलना भुनणा या पकौणा से होन्दी वाणिज्य उपलब्धता । एन एस सवाना परमाणु संचालित मालवाहक जहाज पर सवार रेथियॉन "राडारेंज" १९६१ क आसपास स्थापित ह्वै।१९४७ मा रेथियॉन न राडारेंज कू निर्माण करी जू व्यावसायिक रूप से उपलब्ध पैलू माइक्रोवेव ओवन थौ।यू लगभग १.८ मीटर लंबू और वजन ३४० किलो थौ और कीमत ५००० अमेरिकी डालर थौ। यू तीन किलो वाट की खपत करदू थौ जू आज का माइक्रोवेव से तीन गुणा जादा थौ और वाटर कूल्ड थौ। परमाणु ऊर्जा से चलन वालू यात्री जहाज एन एस सवाना की गैली मा एक प्रारंभिक राडारेंज स्थापित करे गै थौ। १९५४मा पेश किये गै एक प्रारंभिक वाणिज्यिक माडल न १.६ किलोवाट की खपत की और यूएस $२,००० से यूएस $३,०००मा बेचे गै थौ। रेथियॉन न १९५२ मा ओहियो का मैन्सफील्ड की टप्पन स्टोव कंपनी तै अपणी तकनीकी कू लाइसेंस दिनी ।व्हर्लपूल, वेस्टिंगहाउस और अन्य प्रमुख उपकरण निर्माताओं का अनुबंध का तहत जू अपणा पारंपरिक ओवन लाइन मा मिलान माइक्रोवेव तै जोड़न चांदन, टप्पन न आपणा निर्मित का कइ उत्पादों कु निर्माण करी। रखरखाव का कारण (कुछ इकाइयों तै वाटर कूल्ड किये गये) इन- बिल्ट आवश्यकता और लागत (यूएस $ १, २९५ से १३,००० डालर) तक बिक्री सीमित थै। जापान के शार्प कार्पोरेशन न१९६१मा माइक्रोवेव कु निर्माण शुरू करी १९६४ और१९६६ का बिच शार्प न टर्नटेबल का साथ पैलू माइक्रोवेव ओवन पेश करी जू भोजन तै और जादा गरम करना तै बढावा देणा कु एक वैकल्पिक साधन छ।१९६५ मा रेथियॉन न घरेलू बाजार मा अपणी राडारेंज तकनीकी का विस्तार करना की खोज मा जादा विनिर्माण क्षमता देणा का खातिर अमाना का अधिग्रहण करी। १८६७ मा उन US$495(२०२०डालर मा $4,000) की कीमत पर पैलू लोकप्रिय घरेलू माडल , काउंटरटाप रैडारेंज पेश करी। तीव्र माडल का विपरीत , ओवन गुहा का शीर्ष मा एक मोटर चालित मोड स्टिरर घुमाये जान्दू जै पर खाणू स्थिर रन्दू। १९६० का दशक मा लिटन न स्टडबेकर की फ्रैंकलिन विनिर्माण संपती खरीदी जैन मैग्नेट्रोन कु निर्माण और बिक्री करी। लिटन न माइक्रवेव कु एक नयु विन्यास विकसित करी जू छोटू औरचौड़ू थौ जू आज आम छ। मैग्नेट्रोन फीड भी अद्वितीय थौ। येका परिणामस्वरूप एक ओवन यनू बणी जू बिना लोड कू भी जीवित रै सकदू। नयू ओवन शिकागो मा एक व्यापार शो मा दिखाई गई थौ। १९७० मा अमेरिकी उद्योगतै ४०, ०००इकाइयों की बिक्री की मात्रा १९७५ तक बढकर १० लाख ह्वै गी।कम खर्चीला इंजीनियर मैग्नेट्रोन का कारण जापान मा बजार मा पैठ और भी तेज थै। कै और कंपनी भी बजार मा शामिल ह्वै और एक समै.तै अधिकांश सिस्टम रक्षा ठेकेदारों द्वारा बणाए गये था जू मैग्नेट्रोन से सबसे अधिक परिचित था। लिटन रेस्तरां व्यवसाय मा विशेष रूप से प्रसिद्ध थौ।
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नैनीताल के एक भवन में  कुमाऊं शैली की  काष्ठ कलाअंकन,अलंकरण, उत्कीर्णन

   Traditional House Wood Carving Art in Nainital; 
   कुमाऊँ, गढ़वाल, केभवन ( बाखली,तिबारी,निमदारी, जंगलादार मकान,  खोली, )  में कुमाऊं शैली की  काष्ठ कलाअंकन,अलंकरण, उत्कीर्णन  - 514

संकलन - भीष्म कुकरेती

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 नैनीताल जनपद से कई  काष्ठ कला युक्त भवनों  की अच्छी संख्या में सूचना मिली हैं।  आज इसी क्रम में नैनीताल के एक भवन में काष्ठ कला की चर्चा होगी।

प्रस्तुत भवन बाखली शैली का दुपुर व दुखंड  भवन है जो  बाखली से बहुत छोटा है।  काष्ठ कला विश्लेषण हेतु निम्न भागों पर ध्यान देना है।

 भवन के  तल मंजिल में  दो कक्षों के द्वारों में काष्ठ कला है।  द्वारों के स्तम्भ के आधार में उलटे कमल दल , ऊपर ड्यूल व ऊपर सीधे कमल दल का अंकन हुआ है व पुनः ऊपर इसका दोहराव हुआ है।  कक्ष के ऊपर कोई तोरणम नहीं है अपितु मथिण्ड /मुरिन्ड /शीर्ष सपाट कड़ी से निर्मित हुआ है।

   खोली प्रथम तल से पहली मंजिल तक है व खोली के सभी स्तम्भों में विवरण किये  कक्षों के स्तम्भों जैसे ही कलयुक्त हैं।  इसी तरह भवन के छाजों के स्तम्भों में काष्ठ कला प्रदर्शित हो रही हैं। 

 खोली व  पहले मंजिल में दो छाजों के शीर्ष में एक ही प्रकार की कला वाले तोरणम  /मेहराब निर्मित हैं।  तोरणमों में प्राकृतिक अलंकृत उत्कीर्णन हुआ है किन्तु छायाचित्र में ठीक से दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। 

निष्कर्ष निकलता है नैनीताल के प्रस्तुत भवन में ज्यामितीय कटान व प्राकृतिक अंकरण की काष्ठ कला विद्यमान है।  काष्ठ उत्कीर्णन उत्कृष्ट व महीन है।   

सूचना व फोटो आभार: सुमन जोशी

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी।  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: नाम /नामों में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .

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