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रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि , शुक्र आदि   जन्य रोग
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 28 th  अठाईसवाँ  अध्याय   ( विविधशित पीतीय   अध्याय   )   पद   ७ बिटेन १८   तक
  अनुवाद भाग -  २५३
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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यूं मदे रस आदि स्थानुं म कुपित वात  आदि दोष,  जै जै स्थान पर जु जु  रोग उत्तपन्न करदन सि बुले जाल - अभद्र , भोजन म श्रद्धा नि हूण, अरुचि , भारीपन , तंद्रा , शरीर म पीड़ा , जौर , तम , अन्धकार , पाण्डु वर्ण , सूत्रों म अवरोध , नपुंस्कता , शिथिलता , सरैलौ दुर्बलता , जठरग्नि क नास , असमय झुर्रियां , आंख्युं सफेद हूण यी रसजन्य रोग छन।
रक्तजन्य रोग बुल्दां - कुष्ठ , बीसर्प , पिंडकायें , रक्त पित्त , रक्तप्रदर , गुदपाक , शिशिनौ पकण , प्लीहा , गुल्म , बिदृचि नीलिका , झांई , कामला , विप्लव , टिल जन मस्सा , दाद , चर्मदल श्वित्र , पामा , कोठ , रक्तमंडल यी रक्तजन्य रोग छन।
मांस जन्य रोग बुल्दां -अधिमांस , अर्वुद , कील , गलशालुक (गौळ म शोथन बढ्यो मांस  ), गळशुण्डिका , पूतिमांस , अब्जी , गळगंड , गंडमाळा, उपजिवहिका , यी मांसजन्य रोग छन।
मेद जन्य रोग -  प्रमेय क निन्दित  पूर्वरूप (बाळुं जटिलता , अति स्थूल क आयु ह्रास ) जन ८ रोग या स्थूलता जन्य आयु ह्रास मेद जन्य रोग छन। 
हड्डी तौळ दुसर  हड्डी आण , अधिदन्त , दंतमैद , दांत दूखण , हड्डी डाउ , बाळ , रोम व नंग क रंग, दाड़ी  मूछ  रंग  बदलेण , यी अस्थि जन्य रोग छन।
जोड़ों  म डाउ , चककर आण , मूर्छा , आंखूं समिण  अंध्यर हूण , व्रण , छुटी छुटि फुंसी हूण,  जोड़ुं म गांठ  यी सौब मज्जा जन्य रोग छन।
शुक्र दोष से नपुंसकता , संतान रोग , संतान नपुंसक या कम आयु क हूण , गर्भ स्खलन आदि हूंदन। दुषित शुक्र बच्चा व स्त्री दुयुं तै दुःख दीन्द।  १७ -१८। 

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य लीण
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   -- ३८०
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2022


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  गुडिया /गुरिया (उखीमठ) में एक भवन पारम्परिक गढवाली शैली की काष्ठ कला अलंकरण उत्कीर्णन  अंकन
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Traditional House wood Carving Art of Guriya , Ukhimath , Rudraprayag         : 
गढ़वाल के भवन (तिबारी, निमदारी, बाखली,जंगलेदार  मकान, खोलियों ) में पारम्परिक गढवाली शैली की काष्ठ कला अलंकरण उत्कीर्णन  अंकन,-630   

 
 संकलन - भीष्म कुकरेती
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रुद्रप्रायग भी चमोली की भांति भवन काष्ठ कला में विशेष स्थान वाला जनपद है।  आज इसी क्रम में गुरिया /गुड़िया (उखीमठ ) के एक भवन की काष्ठ कला पर चर्चा की जाएगी।
प्रस्तुत  गडिया  /गरिया  का भवन दुपुर व दुखंड है व अर्द्ध  तिपुर   लगता है  (ढैपुर ) ।   भवन के तल तल (ग्राउंड फ्लोर ) में लकड़ी के सभी सपाट कला दिखती है।  पहले तल में जंगला बंधा है। जंगले के १० बड़े स्तम्भ व छोटे जंगलों  के लघु स्तम्भ में सभी में ज्यामितीय कटान कीकला दृष्टिगोचर हो रही है।  बड़े स्तम्भों के मध्य गहरा कटान है जो स्तम्भों को आकर्षक दर्शाने में योग्य हैं। 
गरिया  /गडिया  के पूरे भवन में  ज्यामितीय कटान की काष्ठ कला विद्यमान है। 
सूचना व फोटो आभार: अभिषेक रावत
  * यह आलेख भवन कला संबंधी है न कि मिल्कियत संबंधी, भौगोलिक स्तिथि संबंधी।  भौगोलिक व मिलकियत की सूचना श्रुति से मिली है अत: अंतर  के लिए सूचना दाता व  संकलन  कर्ता उत्तरदायी नही हैं . 
  Copyright @ Bhishma Kukreti, 2022     
  रुद्रप्रयाग , गढवाल   तिबारियों , निमदारियों , डंड्यळियों, बाखलीयों   ,खोली, कोटि बनाल )   में काष्ठ उत्कीर्णन कला /अलंकरण ,
 नक्काशी, जखोली , रुद्रप्रयाग में भवन काष्ठ कला,   ; उखीमठ , रुद्रप्रयाग  में भवन काष्ठ कला अंकन,  उत्कीर्णन  , खिड़कियों में नक्काशी , रुद्रप्रयाग में दरवाज़ों में उत्कीर्णन  , रुद्रप्रयाग में द्वारों में  उत्कीर्णन  श्रृंखला आगे निरंतर चलती रहेंगी

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अपथ्य व पाठ्य भोजन से रोग कनै  हूंदन ?
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 28 th  अठाईसवाँ  अध्याय   ( विविधशित पीतीय   अध्याय   )   पद  ५   बिटेन   ६ तक
  अनुवाद भाग -  २५२
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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इन बुलद तब अग्निवेश न भगवान आत्रेय कुण  बोलि -हे भगवन संसारम दिखणम आंद कि जु मनिख हितकारी भोजन करदन सि रोगी दिखेंदान त अहितकारी भोजन करण वळ  बि रोगी दिखेंदन। 
भगवान आत्रेयन अग्निवेश कुण  ब्वाल - हे अग्निवेश ! जु हितकारी अन्न खांदन वूं  तै ये से रोग नि हूंद अर केवल हितकारी अन्न ही सब रोगों से बचाई सकदन।  अहित आहार छोड़ि बि रोगों  दुसर प्रकारै प्रकृति हूंद। ऋतू परिवर्तन , प्रज्ञापराध अर परिणाम , शब्द , स्पर्श , रूप , रस , गंध गंध का मिथ्यायोग ,  अतियोग,  आयोग हूण।  यी रोग का  कारण  आहार रसों क सम्यक उपयोग का  उपरान्त बि व्यक्ति म अशुभ लक्षण पैदा कर दींदन।  इलै हितकारी भोजन सेवन  करंदेर  बि  रोगी ह्वे जान्दन। 
इनि  जु अहित भोजन क उप सेवन करदन  वूंक जल्दी दोष चिन्ह नि मिल्दन।  किलैकि सम्पूर्ण अपथ्य रोगकारी नि हूंदन।  सब दोष समान शक्ति वळ बि  नि हूंदन।  सबि शरीर एकसमान रोग तै सहन नि कर सकदन। इलै अपथ्य देश चौंळ पित्तकारी छन किन्तु आनूप   देशक योग से बिंडी अपथ्य कारी ह्वे जांदन।  काल (हेमंत  म बलवान व शरद म निर्बल ) , वीर्य (संस्कार द्वारा उष्ण करण से पथ्य व शीत करण से अपथ्य ), प्रमाण व मात्रा क अतियोग से अपथ्यतम अर कम करण से निर्बल ह्वे जांदन ।  इनि  भौत सा कारणों मिलणन , विरुद्ध चिकित्सा हूण से गंभीर आशयों म , शरीर क भौत अंतर् प्रवेश से , शरीर म चिरकाल से जड़पकड़ से , शंख आदि क प्राणावयों  म   स्थित हूण से , मर्म स्थलों तै पीड़ित करण से , भौत दुःख दीणो कारण , शीघ्र विकार उतपन्न करण से , अपथ्य बलवान बण जांद।  इनि भौत म्वाटो , भौत कृश , जौंक मांस , रक्त , हड्डी , ढीला या कमजोर ह्वे  गे होवन , जैक शरीर विषम हो , जु असात्म्य भोजन सेवी हों , थोड़ा खाण वळ ह्वावो , अलप सत्व वळ रोग सहन नि कर  सकदन।  इलै अपथ्य आहार दोष शरीर की विशेषता से रोग  मृदु , दारुण , शीघ्र हूण वळ , अन्यथा देर से हूण वळ हूंदन।  हे अग्निवेश ! इलै वात , पित्त , कफ विशेष स्थलों म कुपित ह्वेका बनि बनि रोग उत्तपन्न करदन।  ५ -६। 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य लीण
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   --३७८ -३७९ 
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2022
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जोशीमठ क्षेत्र में हरीश चंदोला भवन में तिबारी की काष्ठ कला अलंकरण, उत्कीर्णन  अंकन

Traditional House Wood Carving Art from  Josh,math, Chamoli   
 गढ़वाल,कुमाऊंकी भवन (तिबारी, निमदारी,जंगलादार मकान, बाखली,खोली) में पारम्परिक गढ़वाली शैली की  काष्ठ कला अलंकरण, उत्कीर्णन  अंकन, - 629
( काष्ठ कला पर केंद्रित ) 
 
 संकलन - भीष्म कुकरेती     
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चमोली गढ़वाल में  काष्ठ कला हेतु सर्वश्रेष्ठ जनपद है।  प्रत्येक गाँव में अनोखे भवन काष्ठ कला दृष्टिगोचर होती हैं।  इसी क्रम में आज जोशीमठ क्षेत्र में हरीश चंदोला भवन की तिबारी के  सिंगाड़ों  ( स्तम्भ ) की काष्ठ कला पर चर्चा होगी।
सूचना अनुसार  चंदोला भवन की तिबारी के तीन सिंगाड़  व  तीन  दीवालगीर के दर्शन होते हैं।  सभी काष्ठ कला दृष्टि से कला भव्य प्रकार की है।
  सिंगाड़ (स्तंभ )  के आधार में अधोगामी पद्म पुष्प दल उत्कीर्ण हुआ है जिसके ऊपर ड्यूल है।  ड्यूल के ऊपर उर्घ्वगामी पद्म पुष्प दल उत्कीर्ण हुआ है।  यहां से सिंगाड़ ऊपर चलता है ऊपर जाकर यही क्रम दुबारा स्थापित हुए हैं। स्तम्भ व पुष्पों के ऊपर भी उत्तीर्ण हुआ है।   यहां से सिंगाड थांत रूप लेता हैं।  यहीं से तोरणम भी उतपन्न हुआ है।  तोरणम में प्राकृतिक कला वस्तु व सूरजमुखी पुष्प का उत्कीर्ण हुआ है। 
प्रत्येक थांत के ऊपर पक्षी रूपी व पुष्प कली मिश्रित व एक तोते के डेवलगीर स्थापित हुए हैं।
सर्वत्र कला भव्य रूप में है। 
चंदोला भवन में ज्यामितीय , प्राकृतिक व मानवीय अलंकरण का उत्कीर्णन हुआ है। 
सूचना व फोटो आभार: शशि भूषण मैठाणी
यह लेख  भवन  कला संबंधित  है न कि मिल्कियत  संबंधी  . मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत:  वस्तु स्थिति में  अंतर   हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .
Copyright @ Bhishma Kukreti, 2022 
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भोजन ही रोग उतपन्न व रोग समाप्त करद
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , 28 th  अठाईसवाँ  अध्याय   ( विविधशित पीतीय   अध्याय   )   पद  ४   
  अनुवाद भाग -  २५१
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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ये आहारन तीन वस्तु बणदन -  प्रसाद रूपी रस ,किट्टं या आहार भाग अर  मल।  यामादे किट्ट  भागन पसीना , मूत , मल , वायु , पित्त , कफ अर कन्दूड़ , आँख , दुःख , आज , कूप , प्रजनन का उपमान हूंद।  अर दाड़ी , बाळ , रोम , मूछ , नंग आदि तै पुष्ट कारी हूंद। 
आहारक रस रुपए प्रसादन रस , रक्त मांस , मेद , अस्थि , मज्जा , शुक्र , ओज तथा पृथ्वी - तेज , २ वायु , आकाश पंचभूत त  इन्द्रिय निर्मित करदन।  अत्यंत शुद्ध रूप म वायु , शरीर तै बंधण वळ स्नायु , शिरा अदि संधियां , आर्तव व दूध निम्रं करदन।  यी सब मल नामक धातु या प्रसाद रूप धातु , रस अर मल द्वारा पुष्ट हूंदा आयु अनुसार परिणाम से निर्मित हूंदन।  ये अनुसार शरीर क आपण  स्वरुप स्थिर हूण पर धातु साम्यवस्था म रौंदन।  प्रसाद रूप धातुओं क क्षय व वृद्धि जु निमित्त लेकि हूंदी वो आहार क कारण ही हूंद।  इलै  आहार द्वारा क्षय व वृद्धि का समय उतपन ह्वेका आरोग्यता उतपन्न हूंद।  इनि किट  व मल बि आरोग्य सम्पादन म सहायक हूंदन।  अपण परिमाण से बिंडी वड़ यां किट  अर  मल बि भैर निकाळि शीत  से उतपन्न मल तै उष्ण , उष्ण से उतपन्न हुयुं मल तै शीतपरिचर्या से मल शरीर क धातुओं तै समान्यवस्था म रखद।  मल का धातुओं सोत्र गमन करण का मार्ग छन अर सत्र जु जै  जैक छन  वो धातुओं तै पूर्ण करदन ।   ये प्रकार से  पूरो शरीर खायुं , पियुं , चाट्यूं , दन्तं काटयूं , आहार रुपया रस से भरपूर हूंद. रोग बि ये शरीर म खाइक , पैक , चाटिक , कातिक ही हूंद।  यूं  मदे हितकारी धातुओं सेवन हितकारी व अहितकारी धातु सेवन अहितकारी हूंदन। ४।   
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य लीण
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ३७५ -३७६
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2022

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नौडी (थलीसैण पौड़ी गढ़वाल  ) के एक भवन  की  काष्ठ कला अलंकरण,  उत्कीर्णन , अंकन

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    Tibari, Traditional  House Wood Art in House of, Naudi village, Thalisain,  Pauri Garhwal      

पौड़ी गढ़वाल, के  भवनों  (तिबारी,निमदारी,जंगलेदार मकान,,,खोली ,मोरी,कोटिबनाल ) में  गढवाली  शैली   की  काष्ठ कला अलंकरण,  उत्कीर्णन , अंकन -628 


 संकलन - भीष्म कुकरेती    

-बालकृष्ण चमोली  द्वारा प्रस्तुत छायाचित्र में भवन दुपुर है व तल तल (ग्राउंड फ्लोर ) में काष्ठ  कला कोई विशेष नहीं है क्योंकि सभी स्पॉट व ज्यामितीय कटान के द्वार व सिंगाड़ (स्तम्भ ) दिख रहे हैं।  काष्ठ कला दृष्टि से भवन के प्रथम तल पर दो भागों में कष्ट कला विशेष है।  छायाचित्र से लगता है है प्रथम तल पर दो तिबारियां हैं।  एक तिबारी में सिंगाड़ , द्वार सभी सपाट व ज्यामितीय कटान के ही हैं।  समानांतर में दुसरी र  पारम्परिक   गढ़वाली शैली के सिंगाड़ युक्त तिबारी स्थापित है।  इस तिबारी के चाओं सिंगाड़  (स्तम्भ ) के आधार में अधोगामी पद्म पुष्प दल , फिर ड्यूल ऊपर उर्घ्वगामी पद्म पुष्प दल की कला अंकन हुआ है।  इसके ऊपर स्तम्भ  फिर यही कला कर्मवत पुनरावृति होती है।  पद्म दलों ड्यूल में भी कला उत्क्रीर्ण हुआ है।  ऊपरी सीधे कमल दल के ऊपर स्तम्भ थांत में परिवर्तित होता है व यहीं से तोरणम (Arch , मेहराब ) भी अवतरित होते हैं।  तोरणम के स्कंध में फूल पत्तियों व लताओं का उकीर्ण हुआ है व किनारे पर सूरजमुखी पुष्प शगुन के रूप में अंकित हुआ है।  तिबारी में तोरणम के ऊपर चित्रकारी युक्त पत्तियां (शीर्ष पट्टी ) हैं।  ऐसा लगता है इस पट्टी पर कोई दैवी या शगुन चिन्ह लगा था।  तिबारी भव्य व सुडोल है व नौडी की शान थी।  भवन की देखरेख सही ढंग से रखने के कारण कला जीवंत है।  भवन की काष्ठ कला भव्य है व ज्यामितीय , प्राकृतिक व संभवतया मानवीय अलंकरण वाली चित्रकारियुक्त है।  

सूचना व फोटो आभार: बालकृष्ण चमोली 

यह लेख  भवन  कला संबंधित  है . भौगोलिक स्थिति व  मालिकाना   जानकारी  श्रुति से मिलती है अत: यथास्थिति में अंतर हो सकता है जिसके लिए  सूचना  दाता व  संकलन कर्ता  उत्तरदायी  नही हैं .

Copyright @ Bhishma Kukreti, 2022 

गढ़वाल,  कुमाऊँ , उत्तराखंड , हिमालय की भवन  (तिबारी, निमदारी , जंगलादार  मकान ,बाखली ,  बाखई, कोटि बनाल  ) काष्ठ  कला अंकन नक्काशी श्रृंखला  जारी रहेगी,पौड़ी गढ़वाल के भवनों की काष्ठ कला , उत्तराखंड भवनों की काष्ठ कला    * पौड़ी की लकड़ी  नक्कासी 
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योगिनी एकादशी व्रत कथा
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सर्वप्रिय लेखिका अनिता नैथानी ढौंडियाल
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हिन्दू धर्म ग्रंथों मा हर इगादसी कु अलग-अलग महत्व बतयेगी यांका हि वजा से यूं कु नौं भि अलग अलग रखे गी।हर साल मा चौबीस इगादसी होंदंन। मलमास कि इगादस्यूं तैं मिलैकि इ छब्बीस ह्वे जंदन।यूं इगादस्यूं मा एक इगादसीअसाड़ा मैना कि कृष्ण पक्ष की इगादसी च जैंतै योगिनी इगादसी बोल्दन।यांकू बर्त लेण से सौब पापूं कु नास ह्वे जांद अर ये लोक मा भि सुख अर परलोक मुक्ति मिल जांदी। बर्त कथा माभारत क टैमै बात च एक बार धर्मराज युधिष्ठिर न भगवान श्री कृष्ण म बोली कि हे त्रिलोकीनाथ मिन जेटा मैना कि शुक्ल पक्ष कि निर्जला इगादसी की कथा सुणी। अब कृपा करी असाड़ा मैनै कृष्ण पक्षै इगादसी कथा सुणावा। श्रीकृष्ण भगवान न बोली हे पांडु पुत्र असाड़ा मैनै कृष्ण पक्षै इगादसी कु नौ योगिनी इगादसी च ये बर्त से सौब पाप खतम ह्वे जंदन।यु बर्त ये लोक भोगी परलोक मा मुक्ति देण वालू होंद।हे धरमराज या इगादसी तिन्नी लोकूं मा प्रसिद्ध च तुम तैं मि परणौं कि कथा सणौदु, ध्यान से सुणा। कुबेर नौ कु एक राजा अलकापुरी नौ की नगरी मा राज करदू छौ।वु शिव भक्त छौ। वेकु हेममाली नौ कु एक यक्ष सेवक छौ जु पूजा कु तैं फूल लौदु छौ।हेममाली की विशालाक्षी नौ की भौत सुंदर स्त्री छै। एक दिन वु मानसरोवर से फूल लेकि ऐ। पर फूलूं तैं रखी अपणी घौरवली दगड़ रमण कन लगी अर दुफरु ह्वेगी राजा कुबेर हेममाली का सारा लग्यूं रै जब द्वफरा ह्वेगी त वेन भौत नाराज ह्वेकि अपणा सेवकों तैं आदेश दे कि पता लगावा कि हेममाली अबी तक फूल लेकि किलै नि ऐ। जब सेवकोंन पता करी त राजा तैं सब बात बतै।य बात सूणी राजा कुबेरन हेममाली तैं बुलै।डौरन कंबदू कंबदू हेममाली राजा समण ऐ। वे देखी राजा तैं भौत गुस्सा ऐ वेकाओंट गुस्सन फफरौंणा छा। राजन बोली हे पापी तिन मेरा पूजनीय देबतौं की बेजत्ती कै देबतौं क देव शिवजी कु अपमान कैरी, मि त्वे तैं शराप देंदू कि तू स्त्री क बिछोह मा तड़पी मृत्युलोक मा जैकी कोड़ी कु जीवन जी कुबेरा शरापन वु धरती मा पोड़ी अर कोड़ी ह्वेगी।वेन भौत कष्ट भोगनी पर शिव की किरपा से वैकी बुद्धि खतम नि ह्वे अर वे तैं पूर्व जनमै भि याद रै। अपरा पुरणा जनमै याद करी वु हिमालै पहाड़ क तरफ चल गी।चलदा चलदा वु ऋषि मार्कण्डेय क आश्रम मा पौंच गी वु ऋषि भौऔत बड़ा तपस्वी छा व ब्रम्मा जन दिखेणा छा। ऋषि तैं देखी हेममाली वख गै अर वूंका खूट्टौं मा पोड़ गी। मार्कण्डेय ऋषि न पूछी कि तिन इना क्य करम कन्नी कि तेरी य दसा हूईं च। हेममाली न सैरी बात बतै अर बोली कि कृपा करी क्वी उपाय बता जासे मेरी मुक्ति होव। मार्कण्डेय ऋषि न बोली कि तिन सब सच सच बतै ये वास्ता मि तेरा उद्धारौ एक बर्त बतौंदू। यदि तू असाड़ा मैनै कृष्ण पक्षै योगिनी इगादसी कु बर्त बिधि बिदान से कल्लू त तेरा सौब पाप खतम ह्वे जाला। ऋषि की बात सुणी हेममाली भौत खुश ह्वे अर वेन बिधी बिदान से योगिनी इगादसी कु बर्त करी।जांसे वे तैं सौब सुख प्राप्त ह्वैनी। भगवान श्रीकृष्ण न बोली हे राजन ये बर्त कथा कु फल अट्ठासी हजार बामण जिमौंणा क बराबर होंदूं।ये बर्त नसब पाप खतम ह्वे जंदन अर प्राणी मोक्ष प्राप्त करी स्वर्ग कु अधिकारी बण जांदू।
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सूर्य देव बर्त कथा
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अनिता नैथानी ढौंडियाल

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शास्त्रों क अनुसार एक साल तक लगातार हर ऐत्वारौ ये बर्त कन से सब तरै कि शरीर क पीड़ा से मुक्ति मिलदी। शास्त्रों मा लिख्यूं च कि सूर्य कु बर्त कन से शरीर निरोगु होंद अर अशुभ फल भि शुभ ह्वे जंदन। ये दिन बर्त कथा सुणण से सबी मनोकामना पूरी होंदन अर मान सम्मान धन यश अर तब्यत भी भली रैंद।यांका अलावा कैकी कुंडली मा सूर्य दोष हो त यु बर्त जरुर कन चैंद। बर्त कन्नै बिधि ये बर्त करण से पैली यु संकलप लेण जरुरी च कदगा ऐत्वार बर्त करे जाव।यांका बाद आण वाला ऐत्वार से शुरू कर सगदां। ऐत्वार सुबेर लाल कपड़ा पैरी सूर्य मंत्र कु जाप कन चैंद यांका बाद सूर्य देव तैं पाणी ,लाल चंदन,अक्षत,लाल फूल अर दुबलन अर्ध देकि पूजा कन चैंद।खाणू सूर्य असलेकी खण चैंद। खाणू मा ग्यूं क रव्ट्टी,दलिया,दूध,दै अर घी जरुर होण चैंदीं। बर्त रखी अच्छू खाणू खाण चैंद जांसे शरीर तैं तागद मिल्द।खाणू मा लोण ऐंच मा डाली नि खाण अर घाम असलेणक बाद त लोण बिल्कुल नि खाण। ये दिन चौंल मा दूद, गुड़ मिलैकि खाण से सुर्यक बुरा असर नि पोड़़द। कथा पुरणा जमनै बात च।
          एक बुढड़ी छै ज्वा हमेशा घाम औण से पैली उठी भैर जैकी अपणा चौक तैं मोलन लीपी साफ करदी छै।यांकां बाद सूर्य देव क पूजा अर्चना करदी छै अर बर्त कथा भि सुणदी छै।ये दिन सूर्य देव तैं भोग लगैकि एक बार खाणू खांदि छै। सूर्य देव वीं बुडड़ी से भौत खुश छा। जै कारण वीं तैं क्वी कष्ट नि छौ अर धन दौलत से भी भरपूर छै। जब वींकी पड़ोसनी न देखी कि वा सब तरै से सुखी च त वा वींसे जलण लगी। बुडड़ी गौड़ी नि छै इलै वा वीं पड़ोसनी क चौक बटी मोल लौंदी छै। पड़ोसी न बुडड़ी तैं परेशान कन्नू अपड़ी गौड़ी भितर बांद दे।अगला ऐत्वारौ बुडड़ी तैं चौक लिपणू मोल नि मिली त वींन सूर्य देव तैं भोग नि लगै अर ना अफू हि खाणू खै ।सैरा दिन भूकी तीसी रैकि से गी।
          अगला दिन जब वा से कि उठी त वीन देखी कि वींका चौकम एक सुंदर गौड़ी अर एक बछरू बंंध्यूं छौ वा हकबक रैगी।वीन गौड़ी तैं घास पात खलै।य देखी वींकी पड़ोसन हौर जलण लगी।पड़ोसणीन गौड़ी क समण सोना मोल देखी त वींन उ मोल उठैकि अपड़ा गौड़ा मोल वखम धैर दे।सोना मोलन पड़ोसणी भौत मलामाल ह्वेगी।बुडड़ी तैं सोना मोला बारा मा कुछ पता नि छौऔ।वा पैली तरां पूजा पाठ कथा करणी रै। जब सूर्य देव तैं पता लगी त ऊन भारी बथौं चलै दे जांसे बुडड़ीन अपणी गौड़ी भितर बांद दे। तब बुडड़ी तैं सोना मोलौ पता लगी। तब से वींन अपड़ी गौड़ी भितरी बांदी रखी। कुछ दिन मा बुडड़ी भौत र ईस ह्वेगी। अब पड़ोसणी हौर जलण लगी।वींन अपणा मालिक तैं सिखै पड़ैकि राजम भैजी।राजा सोना मोल करण वली गौड़ी देखी भौत खुश ह्वे अर गौड़ी लीग्गी। अब बुडड़ी भूकी तीसी सूर्य देव से प्रार्थना करणी छै। सूर्य देव तैं वीं पर भौत दया ऐ। वीं रात सूर्य देव राजा सुप्यन मा ऐनी अर बोली कि हे राजा बुडड़ी गौड़ी बछरु जल्दी वापस कर निथर त्वे पर भौत परेशानी ऐ जाली। राजा भौत डौर गी अर बुडड़ी गौड़ी बछरु वापस कर दे।दगड़म भौत धन दौलत देकी माफी बि मांगी।उनैं पड़ोसणी अर वींका मालिक तैं सजा बि दे।यांका बाद राजा न सैरा राज्य मा घोषणा करी कि ऐतबारौ हर क्वी बर्त करु। सूर्य देव क बर्त करण से हर क्वी धन धान्य से परिपूर्ण ह्वै जांद अर घौर बि खुशहाल ह्वै जंदन।
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शनिवार  व्रत  कथा
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सर्वप्रिय लेखिका अनिता नैथानी ढौंडियाल
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 एक बार सब्या नौग्रहौं सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, वृहस्पति ,शुक्र,शनि, राहु और केतु मा बहस ह्वेगी कि सम्मा बड़ु कु छ।सबी आपस मा लड़ण लग्गैं अर क्वी फैसला नि होण पर देवराज इन्द्र म फैसला करणू पौंछ गेनी। इन्द्र ईं बात से घबरैं गेनी अर फैसला करणू ना बोल दे। पर ऊन सला दे कि इबरी धरती मा भौत सच्चू राजा बिक्रमादित्य छ,वी ईं बातौं फैसला कर सकदन। सब्या ग्रह एक दगड़ राजम पौंच गेनी अर अपण बात बतै।अर फैसला करणू बोली।राजा भौत परेशान ह्वेगी कि कैतैं बि छ्वटु बतै त वु नाराज ह्वे सकदू।तब राजा दिमाग मा एक तरकीब ए। वेन सोना चांदी,कांसा,पितलु,कांच,रांगा ,जस्ता, अभ्रग अर लुआ सिंगासण बणवैनी अर सब्यूं तै अपणा अपणा सिंगासण मा बैठणू बोली। जु आखिरी सिंगासण मा बैठलू वी सबसे छ्वटू होलू। अब लुआ सिंगासण सबसे बादम होण से शनिदेव सबसे बाद मा बैठिनी।ए वास्ता वी सबसे छ्वटा मनै गेनी।ऊन सोची कि यु राजन जाणबूजी करी।ऊन नाराज ह्वेकि राजम बोली कि हे राजा तू मैं तैं नि जणदू। सूरज एक राश मा एक मैना, चन्द्रमा सवा द्वी मैना द्वी दिन, मंगल डेढ़ मैना, वृहस्पति तेरा मैना,बुध अर शुक्र एक एक मैना घुमदन, पर मी ढै से सड़े सात साल तक रौंदु। बड़ौ बड़ौ कु बिणास कर्यूं च मेरू। श्री राम की साढ़ेसाती औंण पर ऊंतै बणवास ह्वे,रावण तैं बांदरौं कि सेना से हरण पोड़, अब तू सावधान रै। इन बोली शनिदेव नाराज ह्वे किवख बटीचल गेनी। कुछ टैम बाद राजा की साढ़ेसाती ए ।तब शनिदेव घोणौं कु ब्यपारी बणी वख ऐ ऊं दगड़ी भौत कै बड़ियां घोड़ा छा। जब राजा तैं पता चली त वेन अपड़ा घोड़ा वाला तैं बड़िया बड़ियां घोड़ा लेणू बोली त वेन कै बड़िया घोड़ा लेनी अर एक सबसे बड़िया घोड़ा राजा तैं दे।जन्नी राजा वे घोड़ा मा बैठि वु घोड़ा जंगल मा भाग गि अर गैब ह्वेगी अर राजा भूकु तीसू भटगुणूं रै।तब एक ग्वेरन वे तैं पाणी पिलै।राजन खुश ह्वेकि वेतैं अपणी गुंठी देदे। अर अफु नगरौ चल गी वख वेन अपणु नौ उज्जैनौ रौण वालू वीका बतै। वख एक सेठा दुकानम पाणी पेकि आराम करी ।किसमत से वेदिन सेठै भौत बड़ी बिक्री ह्वे।सेठ खुश ह्वेकि वेतैं अफु दगड़ अपणा घौर लीगी अर खाणू पेणू खलै। वख वे तैं खूंटी पर हार टग्यूं दिखे जैतैं व खूंटी घुलणी छै । थोड़ा देरम वु हार गैब ह्वेगी । जब सेठन देखी कि हार गैब ह्वेगी त वेन समजी कि वीका नी चोरी होलू। वेन वीका तैं कोतवाल म पकड़वै दे। फिर राजान भि वेतैं चोर समजी हाथ खुट्टा कटवैकी नगर से भैर फिंकवै दे।वख एक तेली तैं वे पर दया ऐ अर वेन वीका तैं अपड़ी गाड़ी मा बैठै दे।वु अपणी जीबन बल्दूं तैं हंकण लग गी। वे टैम राजा की शनि दशा खतम ह्वेगी बषगाल औंण पर वु मल्हार गाण बैठ गी।उबरी वु जै नगर मा छौ वखै राजकुमारी मनभावनी तैं वु इतगा अच्छू लगी कि वीन मन ही मन कसम खै कि वा वे राग गाण वाला दगड़ हि ब्यो कल्ली।वीन दासी तैं वे तैं ढुंढणू भेजी। दासी न बतै कि वु एक चौरंगिया च। पर राजकुमारी नि मानी।अगला दिन वा अनशन पर बैठ गी कि ब्यो कल्ली त वे ही दगड़। जब भौत समझौण पर भी नि मानी त राजन वे तेली तैं बुलै अर ब्यो की तैय्यरी करणू बोली। तब वेकू ब्यो वीं राजकुमारी दगड़ ह्वे। एक दिन सैदीं दां सुपिना मा शनिदेव न राजा मा बोली कि देखी तुमुन मैं तैं छ्वटु बतै कि कतगा दुःख झेली। तब राजन वूंसे माफी मांगी प्रार्थना करी कि हे शनिदेव जन दुःख मैं तैं दे कै हौर तैं नि देनी। शनिदेव मान गेनी अर बोली कि जु मेरी कथा अर बर्त करलू वेतैं मेरी कै भि दशा मा क्वी दुःख नि होलु।जु हमेशा मेरू ध्यान करलू,अर किरमोलौं तैं आटू देलू वेका सब मनोरथ परा होला। तब राजा हाथ खुट्टा भी वापस कर देनी। सुबेर राजकुमारीन देखी त वा हकबक रैगी। तब वीकन वींतै बतै कि वु उज्जैन कु राजा विक्रमादित्य च। सब्या भौत खुश ह्वेनी।सेठन जब सुणी त वु खटृटौं मा पोड़ी माफी मंगण लगी।राजन बोली कि यु त शनिदेवौ प्रकोप छौऔ। या मा कैकू क्वी दोस नी च। तब सेठन निवेदन करी कि मै तैं शान्ति तबी मिलली जब तुम मरा घौर चली खाणू खैला।सेठन राजै खूब आवभगत करी तब सबुन देखी कि जु खूंटी हार घुलणी छै वै अब वे तैं उबलणी च।सेठन कै मोहरैं देकी राजौ कु धन्यवाद करी अर अपणी नौनी श्रीकंवरी दगड़ ब्यो करणू निवेदन करी।राजन भी खुशी से हां बोली। कुछ टैम बाद राजा अपणी द्वी राणीयूं मनभावनी अर श्रीकंवरी अरकै साजो-सामान लेकी उज्जैन नगरी तैं चली।वख भी पुरवासियौंन सीमा पर हु वेकु स्वागत करी।सैरा नगर तैं खूब सजै की सबुन खुशी मनै।राजन घोषणा करी कि मिन शनिदेव तैं छ्वटु बतै जबकि असल मा वु ही सबसे बड़ा छन। तब बटी सैरा राज्य मा शनिदेव की कथा अर पूजा नियम से होण लगी।सैरी प्रजा न भौत टैम खुशी अर आनन्द से बितै।जू क्वी बि शनिदेव की ईं कथा तैं सुणदु अर पड़दू च वेका सैरा दुःख दूर ह्वे जंदन। बर्ता दिन ईं कथा तैं जरूर पणन चैंदी।

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श्री वृहस्पतिवार बर्त कथा
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अनिता नैथानी ढौंडियाल
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-हिन्दू धर्म शास्त्रों मा गुरुवार वृहस्पति देव कु दिन मनै जान्द।नौ ग्रहों मा वृहस्पति सबसे भारी मनै गी।ये वास्ता ये दिन क्वी भारी काम करणै मनाही च। किले कि इन मनै जांद कि भारी काम करण से जीवन मा वृहस्पति ग्रह कु असर हलकू या कम ह्वे जांद।यांकां अलावा ज्योतिष मा वृहस्पति ग्रह तैं गुरु , शिक्षा अर धर्म कु कारक भि मने गी। गुरु ग्रह कमजोर होण पर पढै लिखै अर धर्म-कर्म मा लगाव कम होंद। हिन्दू धर्म की मान्यताओं क अनुसार ये दिन बाल धोण ठीक नि मनै जांद,किलै कि जनन्यूं कि कुंडली मा गुरु ग्रह पति अर संतान कु कारक होंद जां से बाल धोणन दुय्यूं क जीवन पर अशुभ प्रभाव पड़दू।ये दिन बाल अर नंग कटण भि अशुभ मनै गी।जन वृहस्पति ग्रह कु असर शरीर पर पड़दू उनी येकु असर घौर पर भि पड़दू कथा भारत वर्ष मा एक प्रतापी राजा राज करदू छौ।वु भौत दानी,गरीबौं अर बामणौं की मदद करदू छौ। य बात वेकी रानी तैं अच्छी नि लगदी छै।वा दान धरम, पूजा पाठ कुछ नि करदी छै। एक दिन राजा शिकारौ जंगल मा गै अर रानी महल मा यखुली छै।वे टैम वृहस्पति देव जोगी भेसम महल मा भीख मगणूं ऐनी पर रानीन भीख देणू ना बोल दे अर बोली कि हे जोगी माराज मि दान पून्न से परेशान ह्वे ग्यूं मेरु मालिक भी भौत दान कैरी सौब रुप्या पैसा लुटयनी।मेरी इच्छा च कि यु धन धान्य सौब खतम ह्वे जाव फिर न रालू बांस न बजली बांसुरी। जोगीन बोली देवी तु बड़ी अजीब छै। धन संतान तसबी चांदन। पुत्र अर लक्ष्मी त पापी क घरम भि होण चैंदीं। यदि तुमुम जादा च त गरीबौं तैं खाणू द्यावा,प्याव बणावा,धरमशाला बणावा , गरीब कुंवारी नौन्यूं कु ब्यो करावा अर इना भौत काम छन जांसे तुम लोक परलोक मा परसिदह्वे जैला।पर राणी पर क्वी फरक नि प्वाड़।वीन बोली मी तैं इनु धन नि चैंदु जैतैं मि जगा जगा बटणू रौं जोगीन बोली जन तेरी इच्छा।तू इन कर वृहस्पतिवरौ घौर लीपी पीला माटन मुंड ध्वैकी नहे खूब कपड़ा ध्वे,इन कन्न से सब धन धान्य खतम ह्वे जालू। इतगा बोली जोगी गायब ह्वेगी। जोगीन जन बतै राणीन उनी करी। केवल तीन वृहस्पतिवार मा ही वींकू सौब धन संपत्ति खतम ह्वेगी खाणू क भी लाला पड़ ग्यनी। एक दिन राजन राणी तैं बोली तू यखी रौ मि हैंका देश जांदूं किलैकि यख मैं तैं सब पछणदन इलै मि क्वी छोट्टू काम नि कर सकदू अर राजा परदेस चल गी। वख वु जंगल बटी लखड़ा काटी शैरम बेची अपणु जीवन जींण लगी। इना राणी अर वींकी दासी दुःखी ह्वे गैनी। एक बार राणी अर दासीन सात दिन तक खाणू नि खै त राणीन दासी मा बोली यख नजीकम मेरी बैण रौंदी तु वीम जैकी कुछ लिऔ वा भौत धनवान च। दासी राणीक बैणीम गै। वे दिन गुरुवार छौ अर राणीकी बैण वृहस्पतिवारै बर्त कथा सुणणी छै।दासी न राणी कु रैबार दे पर बैणीन क्वी जवाब नि दे त दासी दुःखी ह्वे जांद अर गुस्सा भी। दासी नराणी तैं सब बतै।राणी भि अपड़ा भाग तैं दोष देंदी। उना राणी कि बैणी न सोची कि मेरी बैणी दासी ऐ पर मिन वींतै क्वी जवाब नि दे यांसे वा दुःखी ह्वे होली। कथा अर पूजा पूरी कैकी वाअपणी बैणी क घौर गै अर बोली कि हे बैणी मि वृहस्पतिवारै बर्त कथा करणू छौ त मि दासी दगड़ नि बचै सक्यूं किलै कि जब तक कथा पूरी होंदी तबरि तक न उठद छन न बच्योंदा छन इलै अब बतौ क्य बात छ तब राणीन सैरी बात बतै। राणी कि बैणीन बोली देख भगवान वृहस्पति देव सब्यों की मनोकामना पूरी करदन।देख सैद तुमरा घौरम अनाज रख्यूं हो। पैली त राणी तैं विश्वास नि ह्वे पर बैणी क बोन्न पर वीन दासी तैं भितर भेजी त सच माभितर अनाजौ घौड़ू भ्वर्यूं छौ।इ देखी दासी झक रै गे। तब दासी न राणी मा बोली कि हे राणी जब हम खाणू नि खादां त हम बर्त ही त करदां त किलै न हम यूं से बर्त कथा की विधि पूछी कि हम भी बर्त करां।
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