Author Topic: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI  (Read 68137 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #20 on: October 09, 2007, 05:22:32 PM »
Deva Prayag

Deva Prayag is where the tranquil Alaknanda embraces the tempestuous Bhagirathi and it is here that the Ganga is truly born. Devout Hindus consider this prayag second only to the Triveni in Allahabad. The most ancient stone inscriptions found in Uttarakhand are located here. The famous Raghunatha Math, one of the many names for the Rama Temple, is also situated here and it is at Deva Prayag that the priests of Badrinath sojourn in winter. According to an old legend this spot is named after Deva Sharma, a poor Brahmin who performed rigorous austerities at this spot and obtained the favor of Vishnu_s  incarnation Rama. The hero of the Ramayana had come here to expiate the sin of brahma hatya (Brahmin-slaughter) after killing the demo-king Ravana. King Dashratha, the father of Lord Rama, is also said to have undergone penance here.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #21 on: October 09, 2007, 05:23:46 PM »
Karanprayag

Karanprayag : Karn Prayag is one of five sites where the confluence of sacred rivers occurs. The five prayags are Vishnuprayag, Nandprayag, Karanprayag, Rudraprayag and Devprayag. Allahabad where the Ganga, Yamuna and mythical Saraswati join is known as Prayag and is one of the holy places of Hindu pilgrimage. The confluence of the Pindari River, which arises from the icy Pindari glacier, and the Alaknanda occurs at Karanprayag.
 
There is a temple dedicated to Karna, a mythical hero from the Mahabharata, at Karanprayag. Karna was the child of Surya the Sun god and Kunti. Karna worshipped his father here and received boons from him of impenetrable armour and protective earrings, which made him unvanquishable.

Karna Prayag is one of five sites where the confluence of sacred rivers occurs. The five prayags are Vishnuprayag, Nandprayag, Karanprayag, Rudraprayag and Devprayag. Allahabad where the Ganga, Yamuna and mythical Saraswati join is known as Prayag and is one of the holy places of Hindu pilgrimage. The confluence of the Pindari River, which arises from the icy Pindari glacier, and the Alaknanda occurs at Karanprayag.

There is a temple dedicated to Karna, a mythical hero from the Mahabharata, at Karanprayag. Karna was the child of Surya the Sun god and Kunti. Karna worshipped his father here and received boons from him of impenetrable armour and protective earrings, which
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #22 on: October 10, 2007, 01:38:20 PM »

See this photo of Yamnotri..


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #23 on: October 12, 2007, 04:59:28 PM »

More information here  on Badri nath.

एक नवागन्तुक के लिए बद्रीनाथ तथा इसका रास्ता आश्चर्यों का भंडार है। जो यहां पहले भी आये हों, उनके लिए भी यहां की ऊंची मनोरम जगहें व अन्य दृश्य सदा ही एक नए भाव, नए विचार का अहसास दिलाते हैं जो हमेशा स्मृति को बढ़ाती रहती है। और बढ़ाने के लिए एक नवीन परिदृश्य देते हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की यात्रा कभी-कभी कठिन भी हो सकती है पर केवल उनके लिए जो स्थिर चित के नहीं हों। नदी के किनारे की सड़क मात्र एक दृश्य नहीं है एक इतिहास है, नदी मात्र पानी नहीं है बल्कि संस्कृति एवं वातावरण है तथा यहां के मठ में आने वाले, देश के चेहरे हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की यात्रा बहुत कुछ सर एडमंड हिलेरी के पर्वतारोहण अभियान का एक भाग जैसा ही है, महासागर से विस्तृत आकाश की यात्रा शारीरिक एवं मानसिक दोनों रूप में यह स्वर्ग का दूसरा पथ – और आध्यात्मिक मुक्ति है।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #24 on: October 12, 2007, 05:22:02 PM »
Bahut hi achha likha hai jisne bhi likha hai.


More information here  on Badri nath.

एक नवागन्तुक के लिए बद्रीनाथ तथा इसका रास्ता आश्चर्यों का भंडार है। जो यहां पहले भी आये हों, उनके लिए भी यहां की ऊंची मनोरम जगहें व अन्य दृश्य सदा ही एक नए भाव, नए विचार का अहसास दिलाते हैं जो हमेशा स्मृति को बढ़ाती रहती है। और बढ़ाने के लिए एक नवीन परिदृश्य देते हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की यात्रा कभी-कभी कठिन भी हो सकती है पर केवल उनके लिए जो स्थिर चित के नहीं हों। नदी के किनारे की सड़क मात्र एक दृश्य नहीं है एक इतिहास है, नदी मात्र पानी नहीं है बल्कि संस्कृति एवं वातावरण है तथा यहां के मठ में आने वाले, देश के चेहरे हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की यात्रा बहुत कुछ सर एडमंड हिलेरी के पर्वतारोहण अभियान का एक भाग जैसा ही है, महासागर से विस्तृत आकाश की यात्रा शारीरिक एवं मानसिक दोनों रूप में यह स्वर्ग का दूसरा पथ – और आध्यात्मिक मुक्ति है।


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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #25 on: October 13, 2007, 10:58:35 AM »

केदारनाथ

चार धामों में सुदूरता पर भव्यतम केदारनाथ भगवान शिव के अपने निवास स्थान में स्थित है। मंदिर की प्राकृतिक अवस्था मनोहर व प्रभावशाली है, जिसमें बर्फ से ढंके ऊंचे पर्वत, झरनों एवं नदियों का कोलाहल, हरे मैदान एवं वन शामिल हैं। यहां से मंदिर तक पहुंचने के लिए दुर्गम मार्ग पर यात्रा करना भक्तों के विश्वास को और अधिक ठोस बना देता है। यह एक धार्मिक स्थल है जिसकी पवित्रता सदियों से अपरिवर्तित रही है तथा जिसकी अपनी आध्यात्मिक शक्ति है। भगवान शिव के उपासकों के लिये मुक्ति की यह अंतिम सीमा, अंतिम पथ है।


नाम : केदारनाथ मंदिर
पता : केदारनाथ
सम्पर्क व्यक्ति : रावल, केदारनाथ
पूजित प्रतिमा
(अगर कोई हों) : भगवान शिव एवं अपनी पत्नी द्रोपदी के साथ पांच पांडव की प्रतिमा।
परंपरागत महत्व : हिमालय क्षेत्र में केदारनाथ संभवत: सबसे भव्य मंदिर है। प्रभावशाली शैली एवं वास्तुकला में विशाल चट्टानों के समान टुकड़ों से एक बड़े चतुष्कोणीय हिमोढ़ मंच पर निर्मित यहां एक विशाल एवं विस्तृत चट्टान का छत है जिससे मंदिर का बाहरी भाग ढंका हुआ है। सभामंच में पत्थर की दीवारों पर उनकी पत्नी द्रोपदी सहित पांडवों की मानवाकार आकृति खुदी हुई है। मंदिर में एक मंडप तथा एक गर्भगृह है जिसके मध्य में एक पिरामिडीय ग्रेनाईट की शिला है, जिसे सांड का पिछला भाग माना जाता है जिसे भीम ने पकड़ रखा है तथा इसके चारों ओर एक संकरा प्रदक्षिणा-पथ है और इसकी पूजा भगवान शिव की तरह होती है। गर्भगृह में केदारनाथ की सजावटी मूर्ति उनकी पंचमुखी प्रतिमा है जो पंचकेदार का प्रतिनिधि है।
माना जाता है कि आदि शंकाराचार्य ने मात्र 32 वर्ष की आयु में यहां शरीर त्याग किया था। मंदिर के पीछे शंकराचार्य समाधि है, जहां शंकराचार्य की एक मूर्ति उनकी उपस्थिति दर्शाती है।

वर्ष 1939 में कानून द्वारा स्थापित एक सरकारी संस्था बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति मंदिर का प्रबंध संभालती है। मंदिर के प्रधान पुजारी दक्षिण भारत के लिंगायत ब्राह्मण रावल होते हैं, पर कर्मकांड का प्रतिपादन वास्तव में आस-पास के गांवों के ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा ही होता है। आम तीर्थ यात्रियों के दर्शन के लिये मंदिर का कपाट 7 बजे सुबह खुलता है और दोपहर के विश्राम को छोड़कर शाम तक खुला रहता है यद्यपि विशेष पूजा सबेरे 4 बजे ही आरंभ हो जाती है।

केदारनाथ मंदिर, ऊखीमठ के पुजारियों द्वारा निश्चित महाशिवरात्रि दिन के अनुसार ही अप्रैल के अंतिम या मई के प्रथम सप्ताह में खुलता है। यह दीवाली के बाद भैया दूज के दिन 6 महीने के लिये बंद हो जाता है जब श्री केदारनाथ की पूजा ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ के पुजारियों द्वारा की जाती है।
 
 




एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #26 on: October 13, 2007, 11:00:43 AM »


गंगोत्री

भारत में हिन्दुत्व के ताने-बाने से जितने निकट से गंगा जुड़ी हुई है, वैसी कोई और नदी नहीं है। अनंत काल से आध्यात्मिक शुद्दिकर्त्ता के रूप में, पूजनीय तथा स्वास्थ्य एवं उन्नति प्रदान करने वाली गंगा, देश के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन का हिस्सा है। इस पवित्र जल के आकर्षण तथा नदी के इर्द-गिर्द व्याप्त कहावतों एवं रहस्यों तथा इसके उद्गम ने पौराणिक युग से ही तपस्वियों तथा साहसिकों को आकर्षित किया है। गंगोत्री की तीर्थ यात्रा, उद्गमस्थल पर देवी गंगा को समर्पित मंदिर तथा उतराखंड के चार धामों मे से एक हिंदुओं के जीवन का पवित्रतम अनुभव है और उसी प्रकार यात्रियों के लिये उत्साह एवं प्रेरणावर्द्धक भी है। सदियों से मुक्ति की खोज में लाखों तीर्थयात्रियों ने गंगोत्री की यात्रा की है तथा पवित्र नदी ने उन्हें आवश्यक सहायता तथा आशा प्रदान है।


नाम : गंगोत्री मंदिर
पता : गंगोत्री
आरती/प्रार्थना का समय : सायं 8 बजे
पूजित देवता : गर्भ-गृह में गंगा एवं यमुना देवियों की मूर्तियां हैं। इसके थोड़ा नीचे लक्ष्मी, सरस्वती अन्नपूर्णा, भागीरथी एवं शंकराचार्य के साथ-साथ भगवान शिव एवं गणेश की मूर्तियां है। निकट ही भगवान शिव एवं भैरव को समर्पित एक छोटा मंदिर भी है।
 
ऐतिहासिक महत्व : गंगोत्री शहर धीरे-धीरे उस मंदिर के इर्द-गिर्द विकसित हुआ जिसका इतिहास 700 वर्ष पुराना हैं लगभग 2.5 लाख हिन्दु प्रति वर्ष गंगोत्री मंदिर आते हैं। हिन्दुओं के कैलेंडर के महत्वपूर्ण दिन अक्षय तृतीया को साधारणतः अप्रैल के अंत में शुरू होता है, जब भगवती गंगा की डोली गंगोत्री वापस आती है। 20 किलोमीटर दूर नीचे के मार्कण्डेय मंदिर के मुखवा गांव से जो गंगा का जाड़े का घर है। प्रत्येक पूजन एवं परंपराओं के साथ सदियों से डोली के साथ एक जुलुस होता है। मंदिर, हर वर्ष दीवाली पर बंद होता है तब डोली को साज-सज्जा एवं अर्चना के साथ मुखवा भेजी जाती है जो गंगोत्री के पुजारियों के घर होता है।
गंगोत्री मंदिर एक सहज स्पार्टाई ढ़ाचे का निर्माण है। 20 फीट ऊंचा सफेद पत्थर से बना यह मंदिर एक प्लेटफार्म पर निर्मित है। गर्भ-गृह में गंगा एवं यमुना देवियों की मूर्तियां हैं। इसके थोड़ा नीचे लक्ष्मी, सरस्वती अन्नपूर्णा, भागीरथी एवं शंकराचार्य के साथ-साथ भगवान शिव एवं गणेश की मूर्तियां है। यह सब मूर्तियां चांदी से बने एक सुन्दर चबूतरे पर रखी गई है। निकट ही भगवान शिव एवं भैरव को समर्पित एक छोटा मंदिर भी है।


प्रत्येक वर्ष मंदिर के कार्य संपादन के लिये मुखवा गांव के 10 ब्राह्मण पुजारियों का चयन बारी-बारी से किया जाता है। शहर एवं मंदिर के प्रशासन की देखभाल के लिये एक स्थानीय समिति होती है जिसमें मुखबा एवं धराली गांव के मुखिया तथा दो संन्यासी भी रहते हैं।
 
 

पंकज सिंह महर

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #27 on: November 01, 2007, 02:47:56 PM »
मेहता जी,
गोपाल दा का एक गाना भी था
जै जै हो बद्रीनाथा, जै काशी केदारा जै जै हिमाला

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #28 on: November 01, 2007, 03:02:47 PM »

Yes Mahar JI.

This is really a very good bhajan.

मेहता जी,
गोपाल दा का एक गाना भी था
जै जै हो बद्रीनाथा, जै काशी केदारा जै जै हिमाला

पंकज सिंह महर

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Re: CHAR DHAM OF UTTARAKHAND - BADRINATH, KEDARNATH, GANGORTI & YAMNOTRI
« Reply #29 on: November 06, 2007, 01:06:43 PM »
देवभूमि, पुण्यभूमि बद्रीनाथ, केदारनाथ
 
उत्तर भारत के दो तीर्थस्थलबद्रीनाथ एवं केदारनाथ संपूर्ण भारतवासियों के प्रमुख आस्था-केंद्र हैं। धामों की संख्या चार है, बद्रीनाथ, द्वारका,रामेश्वरम्एवं जगन्नाथपुरी।ये धाम भारतवर्ष के क्रमश:उत्तरी, पश्चिमी, दक्षिणी एवं पूर्वी छोरों पर स्थित है। बद्रीनाथ धाम और केदारनाथ के कपाट शरद् ऋतु में बंद हो जाते हैं और ग्रीष्म ऋतु के प्रारंभ में खुलते हैं। शेष तीन धामों की यात्रा पूरे वर्ष चलती रहती है। उत्तर के दो तीर्थस्थलबद्रीनाथ और केदारनाथ किन्हीं दृष्टियोंसे एक-दूसरे से भिन्न हैं। पहली भिन्नता तो यह है कि बद्रीनाथ धाम है और केदारनाथ तीर्थस्थलहै। दूसरी भिन्नता यह है कि बद्रीनाथ में विष्णु के विग्रह की पूजा होती है और केदारनाथ में शिव के विग्रह की पूजा। तीसरी भिन्नता यह है कि शीतकाल में बद्रीनाथ से भगवान विष्णु का विग्रह उठाकर ऊखीमठमें ले जाया जाता है। ऊखीमठमें भगवान की पूजा नहीं होती है। इसके विपरीत केदारनाथ में शिव का विग्रह यथावत् यथास्थान पर बना रहता है और कपाट बंद हो जाने पर विग्रह की पूजा नहीं होती है।

बद्रीनाथ क्षेत्र में बदरी(बैर) के जंगल थे, इसलिए इस क्षेत्र में स्थित विष्णु के विग्रह को बद्रीनाथ की संज्ञा प्राप्त हुई। किसी कालखंडमें बद्रीनाथ के विग्रह को कुछ अनास्थाशीलतत्वों ने नारदकुंडमें फेंक दिया। आदिशंकराचार्यभारत-भ्रमण के क्रम में जब यहां आए, तो उन्होंने नारदकुंडमें प्रवेश करके विष्णु के इस विग्रह का उद्धार किया और बद्रीनाथ के रूप में इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की। बद्रीनाथ के दो और नाम हैं, बदरीनाथएवं बद्रीविशाल।

केदारनाथ में शिव के विग्रह की पूजा होती है। सामान्यत:शिव की पूजा शिवलिंगके रूप में होती है, पर केदारनाथ में शिव के विग्रह का स्वरूप भैंसेकी पीठ के ऊपरी भाग की भांति हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा आती है। महाभारत के बाद परिवारजनों के हत्याजनितपाप से मुक्ति के लिए पांडव प्रायश्चित-क्रम में भगवान शिव के दर्शन करना चाहते थे। भगवान शिव पांडवों से रुष्ट थे। वे उन्हें पापमुक्तनहीं करना चाहते थे। पांडवों की खोजी दृष्टि बचने के लिए भगवान शंकर ने महिष का रूप धारण कर लिया और महिष दल में सम्मिलित हो गए। भगवान शंकर को खोजने का काम भीम कर रहे थे। किसी तरह भीम ने यह जान लिया कि अमुक महिष ही भगवान शंकर हैं। वह उनके पीछे दौडा। भीम से बचने के क्रम में भगवान शंकर पाताल लोक में प्रवेश करने लगें। कहा जाता है कि पाताल लोक में प्रवेश करते हुए भगवान शंकर के पृष्ठ भाग को पकड लिया और उन्हें दर्शन देने के लिए बाध्य कर दिया। अंतत:भगवान शंकर के दर्शन से सभी पांडव पापमुक्तहो गए। इस घटना के बाद लोक में महिष के पृष्ठभाग के रूप में भगवान शंकर की पूजा होने लगी। केदारनाथ में महिष का पृष्ठभाग ही शिव-विग्रह के रूप में स्थापित है। यह घटना जिस क्षेत्र में हुई उसे गुप्त काशी कहा जाता है।

बद्रीनाथ मंदिर के पास ब्रह्मकपालनामक एक स्थान है। यहां पितरोंके लिए पिंडदान किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जिन पितरोंका श्राद्ध यहां हो जाता है, वह देवस्थितिमें आ जाते हैं। उन्हें गया अथवा अन्य स्थान पर पिंडदान की आवश्यकता नहीं होती।

बद्रीनाथ का वर्तमान मंदिर अधिक प्राचीन नहीं है। आज जो मंदिर विद्यमान है, उसके प्रधान शिल्पी श्रीनगर के लछमूमिस्त्री थे। इस मंदिर को रामनुजसंप्रदाय के स्वामी वरदराजकी प्रेरणा से गढवाल नरेश ने पंद्रहवींशताब्दी में बनवाया। मंदिर पर सोने का छत्र और कलश इंदौर की महारानी अहिल्याबाईने चढवाया। मंदिर में वरिष्ठ और कनिष्ठ दो रावल (पुजारी) होते हैं। दोनों का चयन केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण परिवार से होता है।

बद्रिकाश्रमक्षेत्र में बद्रीनाथ धाम के अतिरिक्त और बहुत से ऐसे तीर्थस्थलहैं, जहां कम यात्री पहुंच पाते हैं। व्यासगुफाएक ऐसा ही स्थान है। यह स्थान बद्रीनाथ धाम से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर है। ढाई किलोमीटर तक यात्री लोग वाहन से जा सकते हैं। इसके बाद चढाई प्रारंभ हो जाती है और यात्रियों को पैदल चलना पडता है। व्यासगुफावह स्थान है, जहां महर्षि वेदव्यासने ब्रह्मसूत्र की रचना द्वापर के अंत और कलियुग के प्रारंभ (लगभग 5108वर्ष पूर्व) में की थी। मान्यता है कि आदिशंकराचार्यने इसी गुफामें ब्रह्मसूत्र पर शरीरिकभाष्यनामक ग्रंथ की रचना की थी। व्यासगुफाके पास ही गणेशगुफाहै। यह महर्षि व्यास के लेखक गणेश जी का वास स्थान था।

बद्रिकाश्रमक्षेत्र में अलकनंदानदी है। अलकनंदाका उद्गम-स्थान अलकापुरीहिमनद है। इसे कुबेर की नगरी कहा जाता है। अलकापुरीहिमनद से निकलने के कारण इस नदी को अलकनंदाकहा जाता है। इसी क्षेत्र में सरस्वती नदी भी प्रभावित होती है। अलकनंदाऔर सरस्वती का संगम मांणानामक ग्राम के पास होता है, जो भारत के उत्तरी छोर का अंतिम ग्राम है। मांणाग्राम की उत्तरी सीमा पर सरस्वती नदी के ऊपर एक शिलासेतुहै। इसे भीमसेतुकहा जाता है। मान्यता है कि पांडव लोग सरस्वती नदी के जल में पैर रखकर उसे अपिवत्रनहीं करना चाहते थे। इसलिए भीम ने एक विशाल शिला इस नदी पर रखकर सेतु बना दिया। इसी सेतु से होकर पांडव लोग हिमालय क्षेत्र में हिममृत्युका वरण करने के लिए गए थे। इसे संतोपथअथवा सत्यपथकहा जाता है। भीम-शिला के पास ही भीम का एक मंदिर है।

 

 

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