Author Topic: Famous Temples Of Bhagwati Mata - उत्तराखंड मे देवी भगवती के प्रसिद्ध मन्दिर  (Read 74067 times)

हेम पन्त

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देवीधूरा का प्रसिद्ध वाराही मन्दिर. इस मन्दिर के प्रांगण में रक्षाबन्धन के दिन "बग्वाल" (पाषाण युद्ध) का आयोजन होता है....


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Jhula Devi Temple, Ranikhet


 
Jhula-Devi Temple at Ranikhet  is a temple of goddess Durga. It is situated on Ranikhet Chaubatia Road just 7 Kms. from Ranikhet. It is 8th century old temple and it is believed that if a person asks for something he gets it and on fulfillment of his desire ties a bell in the temple. It is said that about 700 years ago, Chaubatia was a dense forest inhabited by wild animals. Leopards and Tigers used to roam freely and the livestock of the local residents were an easy prey for the forest animals. People felt scared and prayed to Maa Durga for protection. Maa appeared in a Shepherd’s dream and asked him to dig up a particular place where she would come as Avtar (incarnation). The villagers faithfully followed the instructions and the idol of Maa Durga was found. Villagers constructed a temple on that particular site and according to the legend posted outside the temple, ‘despite the presence of leopards and the occasional tiger in this area, villagers and their cattle roam freely inside the forest. Thus the People were freed from the horror of forest animals’. People still believe that Tigers still comes to have a glimpse of Maa at mid-night.

 

Children used to play swing merrily on the Jhula. One day Maa again appear in someone’s dream and asked for a swing for her. The devotees constructed a swing for the Maa and the same was kept inside the temple sanctorum and Maa was ceremoniously seated on the Swing. The present temple was constructed in 1935. 
What makes the place more fascinating are the sheer numbers of bells in, around and over it. The bells are testimony to the "divine and healing powers of Maa Jhula Devi", which means your wishes can come true if you tie a bell at the temple. So many bells have now been strung up and clumped together that they’ve started piling up in one corner of the temple in what looked like, well, a junk heap of bells. Countless bells hung in the temple campus speak of the divine powers of the MAA.(D.N.Barola)


by : .(D.N.Barola)

रंगीलो गेवाढ़

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thanks mehta ji for this information

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Patal Devi Temple, Village Shail, Almora (Uttarakhand)


This temple is about 200 years old and is at a very beautiful location in village Shail, Almora. There are 4 natural water sources around the temple.

http://wikimapia.org/5712796/Patal-Devi-Temple-Village-Shail-Almora-Uttarakhand

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कनार मे भगवती माता का मन्दिर.

उत्तराखंड के पिथोरागड़ जिले में मुन्सारी और बरम से बीच में एक जगह है जिसका नाम कनार है! यहाँ पर भगवती माता का बहुत प्रसिद्ध मन्दिर है !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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KALI TEMPLE.

The Kali River originates from the Greater Himalayas at Kalapaani at an altitude of 3600 m, in the Pithoragarh District of Uttarakhand, India. The river is named after the Goddess Kali whose temple is situated in Kalapaani near the Lipu-Lekh pass at the border between India and Tibet. On its upper course, this river forms India's continuous eastern boundary with Nepal. The River Kali is known as River Sharda, when it reaches in the plains of Uttarakhand and Uttar Pradesh




Kali River.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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रानीबाग - JIYA RANI KA TEMPLE

काठगोदाम से तीन किलोमीटर नैनीताल की ओर बढ़ने पर रानीबाग नामक अत्यन्त रमणीय स्थल है। कहते हैं यहाँ पर मार्कण्डेय ॠषि ने तपस्या की थी।रानीबाग के समीप ही पुष्पभद्रा और गगार्ंचल नामक दो छोटी नदियों का संगम होता है। इस संगम के बाद ही यह नदी 'गौला' के नाम से जानी जाती है। गौला नदी के दाहिने तट पर चित्रेश्वर महादेव का मन्दिर है। यहाँ पर मकर संक्रान्ति के दिन बहुत बड़ा मेला का आयोजन होता है।

'रानीबाग' से पहले इस स्थान का नाम चित्रशिला था। कहते हैं कत्यूरी राजा पृथवीपाल की पत्नी रानी जिया यहाँ चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थी। वह बहुत सुन्दर थी। रुहेला सरदार उसपर आसक्त था। जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुँची, वैसे ही रुहेलों की सेना ने घेरा डाल दिया। रानी जिया शिव भक्त और सती महिला थी। उसने अपने ईष्ट का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गई। रुहेलों ने उन्हें बहुत ढूँढ़ा परन्तु वे कहीं नहीं मिली। कहते हैं, उन्होंने अपने आपको अपने घाघरे में छिपा लिया था। वे उस घाघरे के आकार में#ं ही शिला बन गई थीं। गौला नदी के किनारे आज भी एक ऐसी शिला है, जिसका आकार कुमाऊँनी घाघरे के समान हैं। उस शिला पर रंग-विरंगे पत्थर ऐसे लगते हैं - नानो किसी ने रंगीन घाघरा बिछा दिया हो। वह रंगीन शिला जिया रानी के स्मृति चिन्ह माना जाता है। रानी जिया को यह स्थान बहुत प्यारा था। यहीं उसने अपना बाग लगाया था और यहीं उसने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। वह सदा के लिए चली गई परन्तु उसने अपने गात पर रुहेलों का हाथ नहीं लगन् दिया था। तब से उस रानी की याद में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है।

आज रानीबाग कुमाऊँ का औद्योगिक स्थान भी हो गया है। यहाँ पर घड़ी उद्योग लग चुका है। यह उद्योग हिन्दुस्तान मशीन दूल्स (एच. एम. टी.) का पाँचवा उद्योग है। रानीबाग में सेना (पुलिस) का चेकपोस्ट भी है। यह अत्यन्त रमणीय स्थान है।

रानीबाग से दो किलोमीटर जाने पर एक दोराहा है। दायीं ओर मुड़ने वाली सड़क भीमताल को जाती है। जब तक मोटर - मार्ग नहीं बना था, रानीबाग से भीमताल होकर अल्मोड़ा के लिए यही पैदल रास्ता था। वायीं ओर का राश्ता ज्योलीकोट की ओर मुड़ जाता है। ये दोनों रास्ते भुवाली में जाकर मिल जाते हैं।

रानीबाग से सात किलोमीटर की दूरी पर 'दोगाँव' नामक एक ऐसा स्थान है जहाँ पर सैलानी ठण्डा पानी पसन्द करते हैं। यहाँ पर पहाड़ी फलों का ढेर लगा रहता है। पर्वतीय अंचल की पहली बयार का आनन्द यहीं से मिलना शुरु हो जाता है।


dkunwar

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जय माँ धारी देवी की फोटो
« Reply #57 on: January 12, 2009, 02:49:00 PM »
धारी देवी का मन्दिर बद्रीनाथ-केदारनाथ जाते समय श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच में पड़ता है
यह श्रीनगर से १५-१६ किलोमीटर दूर है. अलखनंदा के किनारे पर वसा यह प्राचीन मन्दिर माँ धारी देवी के नाम से विख्यात है.

dkunwar

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Re: जय माँ धारी देवी की फोटो
« Reply #58 on: January 12, 2009, 02:50:28 PM »
धारी देवी का मन्दिर

हेम पन्त

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काठगोदाम से लगभग 1 किमी आगे जाकर रानीबाग से कुछ पहले ही मां शीतला देवी का प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है. इस मन्दिर तक जाने के लिये लगभग 1 किमी पैदल चलना होता है. जंगल के बीच स्थित इस मन्दिर में बन्दर बहुतायत में है. यह स्थान शादी-ब्याह करने के लिये बहुत उपयुक्त है. शादी का अच्छा लगन होने पर इस मन्दिर में एक ही दिन में 8 से 10 शादियां होती है.

 

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